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Tuesday, November 5, 2019

सिनेमालोक : अब की पति पत्नी और वो


सिनेमालोक
अब की पति पत्नी और वो
-अजय ब्रह्मात्मज
41 साल पहले 12 मई 1978 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ की रीमेक 6 दिसंबर 2019 को रिलीज होगी. सामाजिक विषयों पर गंभीर और उत्तेजक फिल्मों के निर्देशन-निर्माण के लिए मशहूर बीआर चोपड़ा ने अपनी मुख्य शैली से विक्षेप लेकर ‘पति पत्नी और वो’ का निर्माण और निर्देशन किया था. आज के दर्शकों को मालूम नहीं होगा कि इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने लिखा था. कमलेश्वर ने पुरुष के जीवन में पत्नी के अलावा वो की कल्पना से इस कॉमिक सिचुएशन की फिल्म सोची थी. सामाजिक सच्चाई तो यही है कि समाज में ऐसे किस्से’सुनते को मिलते रहते हैं और वो की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.
कमलेश्वर ने पुरुष की फितरत के रूप में वो की कल्पना की थी. मूल फिल्म में पहले एक एनिमेशन आता है, जिसमें आदम और हव्वा को दिखाया गया है. आदम और हव्वा निषिद्ध सेव खाते हैं और उनके अंदर कामेच्छा जगती है. इसकी वजह से उन्हें स्वर्ग से निकालकर धरती पर धकेल दिया जाता है. कहते हैं आदम और हव्वा धरती पर रहते हैं और कभी-कभी उनकी जिंदगी में वह निषिद्ध फल वो की तरह आ ही जाता है. फिल्म की शुरुआत किशोर कुमार की आवाज में आदम-हव्वा की कहानी के गीत से होती है, जो आज के संजीव कुमार(रंजीत चड्ढा) और विद्या सिन्हा(शारदा चड्ढा) के परिचय साथ पूरी होती है. साइकिल की टक्कर से दोनों में प्यार होता है. शादी होती है और एक बच्चा भी हो जाता है. दोनों की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही है. इस बीच रंजीत का प्रमोशन होता है. उन्हें एक सेक्रेटरी रंजीता कौर(निर्मला देशपांडे} मिल जाती है. इसके बाद सारे समीकरण बदलते हैं और हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं.
2019 की ‘पति पत्नी और वो’ कानपुर शिफ्ट हो गई है. अब पति का नाम चिंटू उर्फ़ अभिनव त्यागी(कार्तिक आर्यन) हो गया है. उनकी पत्नी वेदिका त्यागी(भूमि पेडणेकर) हैं और वो के रूप में तपस्या सिंह(अनन्या पांडे) आती हैं. शहर कानपुर होने से परिवेश और पृष्ठभूमि बदली है. 2019 की कहानी होने से काल बदल गया है चिंटू त्यागी पिता के दबाव में रहता है और शहर में ही छोटी-मोटी नौकरी कर लेता है. मूल फिल्म में रंजीत चड्डा का दोस्त अब्दुल करीम दुर्रानी(असरानी) है. रीमेक में भी पति चिंटू त्यागी का दोस्त मुसलमान है. उसका नाम रिज़वी(अपारशक्ति खुराना) हो गया है. वह वास्तव में चिंटू त्यागी का फ्रेंड,फिलोस्फर और गाइड है.
मूल फिल्म कमलेश्वर ने लिखी थी. रीमेक फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने लिखी है. मुदस्सर की फिल्मों में गजब की कॉमिक टाइमिंग और पंच लाइनें रहती है. रीमेक का ट्रेलर देख चुके पाठक मानेंगे कि इस बार आज के हिसाब से पंच लाइनें हैं और उनमें कानपुर का लहजा भी है. मुदस्सर अज़ीज़ ने कार्तिक आर्यन के लुक पर मेहनत की है. कार्तिक आर्यन के बाल ‘शॉकड’ स्टाइल में बिखरे और खड़े रहते हैं. इस फिल्म में मांग निकालकर करीने से संवारे गए हैं. कुछ-कछ ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के सीधे-सादे शाह रुख खान की याद आती है. मुदस्सर की भाषा पर अनोखी पकड़ है, जो इस फिल्म के संवादों में झलकती है. हालांकि अभी ट्रेलर ही आया है, लेकिन उम्मीद बनती है कि कुछ हल्का-फुल्का मजेदार  मनोरंजन मिलेगा.
फिल्म की घोषणा के समय मुझे भी लगा था कि संजीव कुमार की भूमिका कार्तिक आर्यन कैसे निभा पाएंगे? लेकिन ट्रेलर से यूं लगा कि मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म की थीम तो ‘पति पत्नी और वो’ की ही रखी है, लेकिन प्रस्तुति पूरी तरह बदल दी है. उसे आज के मिजाज और अंदाज में ढाला है. हाँ,ट्रेलर में रंजीत और शारदा का बिटवा नहीं दिखा है. हो सकता है, उसे गायब ही कर दिया गया हो. कार्तिक आर्यन के साथ भूमि पेडणेकर पत्नी और अनन्या पांडे वो की भूमिका में हैं. मूल फिल्म के गीत रीक्रिएट नहीं किए गए हैं. पता चला कि चिंटू त्यागी ‘ठंडे ठंडे पानी’ से गुनगुनाते रहते हैं.
बीआर चोपड़ा की बहू रेणु चोपड़ा और पोते जोनी चोपड़ा ने रीमेक का निर्माण किया है.



Tuesday, October 29, 2019

सिनेमालोक : बड़े सितारों की चूक


सिनेमालोक
बड़े सितारों की चूक
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते आई साजिद नाडियाडवाला की  फिल्म 'हाउसफुल 4' ने दर्शकों और समीक्षकों को निराश किया. इसकी वजह से फिल्म का कारोबार अपेक्षा से बहुत कम रहा. निर्माता को उम्मीद थी की दिवाली के मौके पर रिलीज हो रही यह फिल्म पहले 3 दिनों में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी. ट्रेड पंडितों का अनुमान था कि पहले दिन ही फिल्म का कारोबार 25 से 35 करोड़ के बीच होगा. अक्षय कुमार  समेत तीन अभिनेताओं और कृति ससैनन समेत तीन अभिनेत्रियों की यह फिल्म रिलीज के पहले से तहलका मचा रही थी.  एक गीत 'बाला बाला बाला शैतान का साला' विचित्र नृत्य मुद्राओं की वजह से लोकप्रिय हो गया था.बाला चैलेंज के तहत फिल्म बिरादरी के सदस्य और आम प्रशंसक हास्यास्पद वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे थे. उन्हें निर्माता रिट्वीट कर रहे थे. यूँ लग रहा था कि फ़िल्म को इस श्रेणी की पुरानी फिल्मों की तरह भारी कामयाबी मिलेगी.
ऐसा नहीं हो सका. अक्षय कुमार की लोकप्रियता से पहले दिन थोड़े दर्शक आये,लेकिन अगले दिन दर्शक ससससससZकम हो गए. कामयाब फिल्मों का एक ट्रेंड है कि शनि और रविवार को उनके कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत का इजाफा होता है. इस फ़िल्म का कलेक्शन अगले दिन घट गयाससस्वस्स्ज़ज़्ज़और अब बढ़ने की उम्मीद भी नहीं है. बेहतरीन फिल्में तारीफ से दर्शक बटोरती हैं तो बुरी फिल्में निंदा से दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पातीं. यही 'हाउसफुल 4' के साथ हुआ. आम दर्शकों के साथ बैठ करफ़िल्में देखने से उनकी प्रतिजरियासमझ में आ जाती हैं. निर्माताओं ने तो सोचा था कि दिवाली का वी ।केंड उनके लिए फायदेमंद होगा.
'हाउसफुल 4' का निर्देशन पहले साजिद खान कर रहे थे। उनके 'मी टू' विवाद में फंसने के बाद फ़िल्म की शूटिंग रोक दी गई थी. कलाकारों में भी फेरबदल हुई थी. बाद में फरहाद - शामजी को ज़िम्मेदारी दी गई. फूहड़ और मज़ाकिया संवादों के लिए मशहूर निर्देशक द्वय को निर्देशन की कागज़ी ज़िम्मेदारी दी गई. यह नहीं बताया गया कि साजिद खान ने कितनी गिलम शूट कर ली थी? और फरहाद - शामजी ने कितना किया? यूँ दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा था कि निर्देशन की कमान तो साजिद नाडियाडवाला के हाथों में ही थी. खानापूर्ति के लिए फरहाद-शामजी का नाम दिया गया. इस फ़िल्म की कहानी साजिद नाडियाडवाला की ही है. उन्हें पुनर्जन्म की यह अजीबोगरीब कहानी सूझी,जिसे शूट करने में भारी खर्च भी किया गया. यह बात फैलाई गई कि फ़िल्म की लागत 80 करोड़ ही है. और कलेक्शन पर भी विवाद हुआ कि उसे बढ़ा- चढ़ा कर बताया जा रहा है.
स्थिति जो भी हो,इस तथ्य से इनकार नहीं जिया जा सकता कि अक्षय कुमार औरसजिद नाडियाडवाला सेभरी चूक हुई. जिस मसालेदार युक्ति पर उन्हें विश्वास और भरोसा था,वह काम नहीं आया. पुनर्जन्म जैसी धारणा को इस तरीके से पेश करना दर्शकों के पल्ले नही पड़ा. बाकी कलाकारों की छवि में तो फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,लेकिन अक्षय कुमार की लोकप्रियता को बट्टा लाह. उनकी पिछली कुछ फिल्में कंटेंट और राष्ट्रवाद के नारों की वजह से चलीं. अभी के दौर में वे भरोसेमंद स्टार माने जाते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि छोटी सी चूक के भी परिणाम बड़े होते हैं. उनके पास कुछ बेहतरी  फिल्में हैं. सचमुच उन्हें ऐसी फूहड़ फिल्मों से किनारा कर लेना चाहिए.


Tuesday, October 22, 2019

सिनेमालोक : गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में

सिनेमालोक
गांधी के विचारों पर बनेगी फिल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों आमिर खान, शाह रुख खान,राजकुमार हिरानी और एकता कपूर समेत फ़िल्म बिरादरी के 45-50 सदस्य प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. छन्नू लाल मिश्र और एक-दो शास्त्रीय गायक भी इस मुलाकात में शामिल थे. सेल्फी सक्रिय फ़िल्म बिरादरी ने मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर प्रधान मंत्री के पहल और सुझाव की तारीफ की झड़ी लगा दी. प्रधानमंत्री ने उनके ट्वीट के जवाब दिए और उनके प्रयासों की सराहना की. सभी ने अलग-अलग शब्दों और बयानों में मोदी जी की बात दोहराई और जुछ ने महात्मा गांधी की प्रासंगिकता की भी बात कही। इस साल 2 अक्टूबर से गांधी की 150वीं जयंती की शुरुआत हो चुकी है. सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने गंफ़ही जयंती पर कोई खास सक्रियता नहीं डिझायी है. खबर तो यह थी कि दो साल पहले ही एक समिति बनी थी,जिसे 150 वीं जयंती की रणनीति तय करनी थी। क्या रणनीति बनी?
बहरहाल, प्रधान मंत्री से फ़िल्म बिरादरी के सदस्यों की मुलाक़ात और विशेष बैठक उल्लेखनीय है. इसका महत्व तब और बढ़ जाता है,जब हम देखते हैं कि कुछ सालों पहले भक्तों के निशाने पर आएआमिर खान और शाह रुख खान इस बैठक में मौजूद रहे. उन्होंने मोदी जी के साथ सेल्फ़ी निकाली. उस सेल्फी में मोदी जी मुस्कुरा रहे थे. शायद भक्तों तक यह संदेश गया हो कि नाम से खान दोनों लोकप्रिय कलाकार गद्दार और देशद्रोही नहीं हैं. खान के अलावा फिल्म बिरादरी के महिला सदस्यों(कलाकार और निर्माता) ने अलग से प्रधान मंत्री के साथ तस्वीरें और सेल्फी लीं. एकता कपूर ने महिला सशक्तिकरण की पहचान की बात की,जिसे बाद में स्वयं प्रधान मंत्री ने रिट्वीट कर दोहराया. याद होगा कि फ़िल्म बिरादरी और प्रधान मंत्री की मुलाकातें लगातार खबरें बन रही हैं.हालांकि यह पता नहीं चल पा रहा है कि उनके प्रभाव और प्रेरणा से क्या नई गतिविधियां आरम्भ हुई हैं?
इस बार की मुलाक़ात से भगवा भक्तों और खान द्वय के प्रशंसकों को आश्चर्य भी हुआ. कहीँ कोई और कारण या दबाव तो काम नहीं कर रहा? यह भी हो सकता है कि भाजपा के दूसरी बार सत्ता में आने से विरोधी और आलोचनात्मक आवाज़ों को लग रहा हो कि सरकार और प्रधान मंत्री के साथ रहने में ही भलाई है. यह भी हो सकता है कि भाजपा की तरफसे ऐसी कोशिशें हो रही हों. गौर कर सकते हैं कि इस बार की मुलाक़ात में कोई घोर समर्थक कलाकार नहीं दिखा. एक कंगना रनोट ही थीं,जो पूरी तरह से समर्थन में बोलती नज़र आती है. किसी भी आशंका या स्किम से परे हम तो यही उम्मीद करेंगे कि फ़िल्म बिरादरी गांधीवाद की फिल्मी अभिव्यक्ति को लेकर मुखर हो.
पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सत्ता और फ़िल्म बिरादरी की नज़दीकियों को ध्यान से देखा जा सकता है. फिल्मों में नेहरू युग का व्यापक प्रभाव रहा है. खास कर राज कपूर की लोकप्रिय गिल्मों में...उस दौर के बाकी फिल्मकारों ने भी देश के नव निर्माण की कहानियां दिखाईं. सामंती सामजिक सोच और सरंचना को प्रेम के बहाने तोड़ा. आज़ादी के बाद के रूढ़ियों में जकड़े समाज में प्रेम बाद प्रतिरोध था. शास्त्री जी के आह्वान पर मनोज कुमार ने 'जय जवान,जय किसान' की थीम पर फ़िल्म बनाई और भारत कुमार के नाम से मशहूर हुए.
गांधीवाद पर फिल्में बनाने बेहतर है. विश्व शांति और भाईचारे के लिए यह ज़रूरी है. अभी तो 'राष्ट्रवाद के नवाचार' के फैशन में जबरदस्ती फिल्मों में नारेबाजी चल रही है. संकीर्णता और असहिष्णुता के प्रकोप में गांधीवाद से प्रेरित फ़िल्में विकल्प बन सकती है. दो-चार भी बन जाएं तो काफी है. राजकुमार हिरानी ने नामाकन पेश किया,जिसमें गांधी के विचारों के बीज शब्दों की बात की. पर्दे पर उन्हें लोकप्रिय सितारों ने पेश किया।

Tuesday, October 15, 2019

सिनेमालोक : मामी फिल्म फेस्टिवल


सिनेमालोक
मामी फिल्म फेस्टिवल
-अजय ब्रह्मात्मज  
मामी (मुंबई एकेडमी ऑफ मूवी इमेजेज) के नाम से मशहूर मुंबई का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल पिछले 20 सालों में फिल्मों के चयन, प्रदर्शन और विमर्श से ऐसे मुकाम पर आ गया है कि देश भर के सिनेप्रेमी सात दिनों के लिए मुंबई पहुंचते हैं. देश में और भी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हैं. छोटे शहरों और कस्बों से लेकर मीडिया घरानों तक के अपने-अपने फेस्टिवल चल रहे हैं और कमाल है कि सभी इंटरनेशनल हैं. इनके आयोजन और लोकप्रियता से बढ़ती फिल्मों की समझदारी के बावजूद देश में ‘वॉर’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी हिंदी फिल्में अपार कामयाबी हासिल कर लेती हैं.
पिछले सालों में देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में देखने का सिलसिला बढ़ा है. लेकिन हम या तो विदेशियों को सिखा-बता रहे हैं या उनसे ही सीख-समझ रहे हैं. देश की भाषाओँ में बनी फिल्मों की हमें खास जानकारी नहीं रहती. मुझे लगता है कि फिलहाल देश में एक राष्ट्रीय यानि कि नेशनल फेस्टिवल की जरूरत है. सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय और एनएफडीसी पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की मदद से पहल कर सकते हैं. हाल ही में चीन के फिंगयाओ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत के ‘नया सिनेमा’ पर केन्द्रित आयोजन हुआ. यहां दिखाई गई फिल्मों के साथ बड़े पैमाने पर भारतीय फिल्मों के फेस्टिवल आयोजित किए जा सकते हैं. सिनेमा की लोकप्रियता और स्वीकृति को देखते हुए जरूरी हो गया है.
मामी ने पिछले कुछ सालों में रूप और स्वरूप बदला है. अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के आने के बाद पिछले पांच सालों में मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के  लोकप्रिय चेहरे इससे जुड़े. इनके जुड़ाव से आम युवा दर्शक फिल्म फेस्टिवल के प्रति आकर्षित हुआ है. इस पर बहस हो सकती है कि वर्तमान प्रबंधन समिति की कार्यशैली फेस्टिवल की प्रकृति के अनुकूल है या नहीं? मामी मेला और मास्टर क्लास में हिंदी और मुख्य भारतीय भाषाओं के परिचित चेहरों को बुलाने से उन्हें देखने-सुनने के लिए भीड़ उमड़ती है. उनमें से कुछ बेहतरीन फिल्मों के देखने के के साथ सुधि और सिद्ध दर्शकों में बदलते हैं. दर्शकों को जुटाने और उन्हें कलात्मक बेहतरीन फिल्मों के प्रति संवेदनशील बनाने का यह तरीका सही है.
पिछले रविवार को मुंबई के बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित मूवीमेला एक आकर्षक आयोजन था. इस मेले के चार सेशन में दीपिका पादुकोण, राधिका मदान, मृणाल ठाकुर, अनन्या पांडे, जान्हवी कपूर, अविनाश तिवारी, श्रीराम राघवन, कोंकणा सेन शर्मा, अमर कौशिक, सिद्धार्थ आनंद, अमित शर्मा, मेघना गुलजार, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और करण जौहर शामिल हुए. आलिया भट्ट और करीना कपूर खान से करण जौहर ने सवाल किए. बाकी सभी सेशन अनुपमा चोपड़ा और राजीव मसंद ने संचालित किए. यह आयोजन दर्शकों को शहद चटाने की तरह था. मीठे आयोजन के बाद के सात दिनों के फेस्टिवल में हर विधा और रस की कलात्मक फिल्में दिखाई जाएंगी. पिछले 20 सालों में मैंने देखा है कि यह फेस्टिवल व्यवस्थित होने के साथ ही दर्शकों के अनुकूल हुआ है.
मामी समेत हमारे देश के अधिकांश फेस्टिवल सितंबर के बाद होते हैं. तब तक सनडांस, लोकार्नो, कान,बर्लिन.वेनिस,टोरंटो,बुशान,पेइचिंग आदि शहरों में फेस्टिवल हो चुके होते हैं. नतीजा यह होता है कि इन फेस्टिवल में दिखाई और चर्चित हो चुके फिल्में ही आ पाती हैं. हां, कभी-कभी कोई नई फिल्म वर्ल्ड प्रीमियर के लिए मिल जाती है, लेकिन अधिकांश फिल्में किसी और फेस्टिवल से होकर यहां पहुंचती हैं. फिर भी दर्शकों के लिए राहत और खुशी की बात होती है कि उन्हें चर्चित फिल्में मुंबई में देखने को मिल जाती हैं. मामी में भारत में बनी फिल्मों को भी प्रतिनिधित्व और पुँरास्कर मिलने लगा है. उत्सुकता और भागीदारी बढ़ी है. भारतीय कलाकारों और फिल्मकारों की निगाहें भी मामी पर टिकी रहती हैं.
लेकिन...मामी समेत तमाम भारतीय फिल्म फेस्टिवल में पिछले सालों में अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ा है. सब कुछ अंग्रेजी में ही दिखाया-बताया जाता है. विडंबना यह है कि हिंदी फिल्मों में सक्रिय कलाकारों और फिल्मकारों की भी पहली भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. भारत में आयोजित फिल्म फेस्टिवल भारत के गैरअंग्रेजी भाषी दर्शकों की बिल्कुल परवाह नहीं करते. हिंदीभाषी इलाकों में महत्वाकांक्षी कलाकारों और फिल्मकारों को लंबा संघर्ष करना पड़ता है. मालूम नहीं, कोलकाता और तिरुअनंतपुरम के फेस्टिवल में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया जाता है या नहीं? मुंबई में तो सब कुछ अंग्रेजी में ही चल रहा है.
बहरहाल, मामी में इस साल 53 देशों की 49 भाषाओं में 190 फिल्में प्रदर्शित होंगी.


Thursday, October 3, 2019

सिनेमालोक : कुछ फिल्में गांधी की


सिनेमालोक 
कुछ फिल्में गांधी की 
-अजय ब्रह्मात्मज 
भक्त विदुर (1921) - निर्देशक कांजीलाल राठौड़ ने कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए 'भक्त विदुर' का निर्देशन किया था. फिल्म के निर्माता द्वारकादास संपत और माणिक लाल पटेल थे. दोनों ने फिल्म में क्रमशः विदुर और कृष्ण की भूमिकाएं निभाई थीं. इस फिल्म में विदुर ने गांधी टोपी और खद्दर धारण किया था. यह मूक फ़िल्म दर्शकों को भा गई थी. इतनी भीड़ उमड़ी थी कि पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा. इस फिल्म को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. आदेश में लिखा था, 'हमें पता है कि आप क्या कर रहे हैं? यह विदुर नहीं है, यह गांधी है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.' 'भक्त विदुर' भारत की पहली प्रतिबंधित फ़िल्म थी.
महात्मा गांधी टॉक्स(1931) – अमेरिका की फॉक्स मूवीटोन कंपनी ने गांधी जी से बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके लिए वे बोरसाद गांव गए थे. गांधी जी की आधुनिक तकनीकी चीजों में कम रूचि थी, फिर भी उन्होंने इसे रिकॉर्ड की अनुमति दी. वैसे उन्होंने कहा भी कि ‘मैं ऐसी चीजें पसंद नहीं करता, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया है.
महात्मा गांधी 20 वीं सदी का मसीहा(1937) - एक के चेट्टियार ने गांधी जी पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया था. इस डॉक्यूमेंट्री में तमिलनाडु के तिरुपुर में सूत कातती 200 महिलाएं नजर आती हैं. पीछे से कर्नाटक के गायक डीके पटेल की आवाज में आडू राति(चरखे को चलने दो) गीत सुनाई पड़ता है. तमिल में बनी इस फिल्म को बाद में तेलुगू और हिंदी में भी डब किया गया. कुल 50000 फीट के फुटेज को एडिट कर 12000 फीट की फिल्म बनी थी.
महात्मा/धर्मात्मा(1935) - वी शांताराम निर्देशित यह फिर मराठी और हिंदी में प्रदर्शित हुई थी. इसमें बालगंधर्व ने अभिनय किया था. संत तुकाराम के जीवन पर आधारित इस फिल्म का शीर्षक अधिकारियों को गांधीजी के संबोधन से मिलता-जुलता लगा था.इसलिए विशेष आदेश देकर फिल्म का शीर्षक बदला गया. वी. शांताराम ने फिर ‘धर्मात्मा’ शीर्षक से इसे रिलीज किया.
गांधी(1982) - रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ महात्मा गांधी के जीवन पर सर्वाधिक चर्चित और देखि गयी फिल्म है. भारत सरकार के सहयोग से निर्मित इस फिल्म को देश-विदेश में प्रशंसा मिली. महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रयोगों को समेटती यह फिल्म  स्वतात्न्त्रता आन्दोलन की भी झलक देती है. शीर्षक चरित्र महात्मा गांधी इस आंदोलन के प्रभावी नेता के रूप में दिखते हैं. गांधी के व्यक्तित्व-कृतित्व को समझने के लिए यह बेहतरीन फिल्म है. इसमें गांधी की भूमिका गुजराती मूल के बेन किंग्सले ने निभाई थी. इसे ऑस्कर के कई पुरस्कार मिले थे.
द मेकिंग ऑफ महात्मा(1996) - निर्देशक श्याम बेनेगल की ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ गांधी के महात्मा बनने की कहानी है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के 20 वर्षों के प्रवास और अनुभवों को समेटती यह फिल्म बताती है कि कैसे एक महत्वाकांक्षी बैरिस्टर ने ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और महसूस किया कि उन्हें भारत में आकर देश के आजादी के लिए काम करना चाहिए. दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों के बीज पड़े थे. युवा गांधी की भूमिका राजित कपूर ने निभाई थी.
गांधी माय फादर(2017) - फिरोज फिरोज खान निर्देशित ‘गांधी माय फादर’ गांधी और उनके बेटे हरिलाल के तनावपूर्ण संबंध की कहानी है. इस फिल्म में हम देखते हैं कि देश की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहा शखस  अपने सिद्धांतों और मूल्यों की वजह से गलतफहमी का शिकार होता है. ऐसा लगता है कि गांधी हरिलाल के लिए आदर्श पिता नहीं थे..  पारिवारिक द्वंद्व में फंसे गांधी का मानवीय पहलू नज़र आता है. जहाँ वे एक कमज़ोर,विवश और लाचार पिता के रूप में दिखते हैं.
इन सभी फिल्मों के अलावा कुछ ऐसी भी फिल्में हैं, जिनमें फोकस गांधी पर नहीं है, वे इन फिल्मों में सहयोगी और खास चरित्र के रूप में दिखते हैं. ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’, ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर’, ‘सरदार’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस – द फॉरगोटन हीरो’ और वीर सावरकर जैसी फिल्मों में हम उन्हें एक अलग छवि में देखते हैं. इन फिल्मों के लेखको और निर्देशकों ने गांधी से संबंधित पॉपुलर शिकायतों का इस्तेमाल किया है. ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘रोड टू संगम’ और ‘गांधी टू हिटलर’ में गांधी के आदर्शों और प्रयोगों का प्रासंगिक उपयोग हुआ है.
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर आप इन फिल्मों को खोज कर देख सके तो फिल्मों के माध्यम से उन्हें अच्छी तरह समझ सकेंगे.


Tuesday, September 17, 2019

सिनेमालोक : थिएटर से आए एक्टर


सिनेमालोक
थिएटर से आए एक्टर
पारसी थियेटर के दिनों से फिल्मों में थिएटर से एक्टर आते रहे हैं. आज भी एनएसडी, बीएनए और अन्य नाट्य संस्थाओं और समूहों से एक्टरों की जमात आती रहती है. ड्रामा और थिएटर किसी भी एक्टर के लिए बेहतरीन ट्रेनिंग ग्राउंड हैं. ये कलाकारों को हर लिहाज से अभिनय के लिए तैयार करते हैं. थिएटर के  प्रशिक्षण और अभ्यास से एक्टिंग की बारीकियां समझ में आती हैं. हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्मों में थिएटर से आये एक्टर टिके हुए हैं. वे लंबी पारियां खेल रहे हैं. लोकप्रिय स्टारों को भी अपने कैरियर में थिएटर से आये एक्टर की सोहबत करनी पड़ती है. लॉन्चिंग से पहले थिएटर एक्टर ही  स्टारकिड को सिखाते, दिखाते और पढ़ाते हैं,
आमिर खान चाहते थे कि उनके भांजे इमरान खान फिल्मों की शूटिंग आरंभ करने से पहले रंगकर्मियों के साथ कुछ समय बिताएं. वे चाहते थे कि लखनऊ के राज बिसारिया की टीम के साथ वे कुछ समय रहें और उनकी टीम के साथ आम रंगकर्मी का जीवन जियें. फिल्मों में आ जाने के बाद किसी भी कलाकार/स्टार के लिए साधारण जीवन और नियमित प्रशिक्षण मुश्किल हो जाता है. अपनी बातचीत में आमिर खान ने हमेशा ही अफसोस जाहिर किया है कि अपनी लोकप्रियता की वजह से वह देश के विभिन्न शहरों के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के साथ बेहिचक समय नहीं बिता पाते. उनके पास साधन और सुविधाएं हैं, इसलिए अपनी हर फिल्म की खास तैयारी करते हुए वे संबंधित प्रशिक्षकों को मुंबई बुला लेते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. आमिर को कभी रंगमंच में विधिवत सक्रिय होने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कोशिश जरूर की थी.
एक्टर होने का मतलब सिर्फ नाचना, गाना और एक्शन करना नहीं होता, फिल्मों में एक्टर के परीक्षा उन दृश्यों में होती है, जब वे अन्य पात्रों के साथ दृश्य का हिस्सा होते हैं, क्लोजअप और मोनोलॉग में हाव-भाव और संवाद के बीच सामंजस्य और संतुलन बिठाने में उनके प्रतिभा की झलक मिलती है, पिछले 10-20 सालों की फिल्मों पर गौर करें तो पाएंगे कि फिल्मों में थिएटर से आये एक्टरों की आमद बढ़ी है. पारसी थियेटर,इप्टा,एनएसडी,एक्ट वन, अस्मिता और दूसरे छोटे -बड़े थिएटर ग्रुप से एक्टर फिल्मों में आते रहे हैं. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ओम शिवपुरी, प्यारे मोहन सहाय, मनोहर सिंह, सुरेखा सीकरी, अनुपम खेर,परेश रावल, नीना गुप्ता, ओम पुरी, इरफान, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रघुवीर यादव और राजपाल यादव जैसे कलाकारों की लम्बी फेहरिश्त तैयार की जा सकती है. इन सभी की मौजूदगी ने गहरा प्रभाव डाला है.
21वीं सदी में फिल्मों का अभिनय बिल्कुल बदल चुका है. अब स्टाइल से अधिक जोर नेचुरल होने पर दिया जा रहा है. कलाकारों के ऑर्गेनिक एक्सप्रेशन की मांग बढ़ रही है. निर्देशक थिएटर से आए एक्टर से अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ नया करेंगे. उनकी वजह से फिल्मों में जान आ जाती है. एक थिएटर एक्टर ने बहुत पहले बताया था कि उनके जैसे एक्टर ही किसी फिल्म के स्तंभ होते हैं. स्टार तो दमकते कंगूरे होते हैं. फिल्में उन पर नहीं टिकी रहती है, लेकिन चमक-दमक के कारण वे ही दर्शकों की निगाह में रहते हैं. फिल्मों की सराहना और समीक्षा में सहयोगी कलाकारों के योगदान पर अधिक बल और ध्यान नहीं दिया जाता. सच्चाई तो यह है कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकार हों तो फिल्म के हीरो/स्टार को बड़ा सहारा मिल जाता है. सहयोगी कलाकारों का सदुपयोग करने में आमिर खान सबसे होशियार हैं. ‘लगान’ के बाद उनकी हर फिल्म में सहयोगी कलाकारों की खास भूमिका रही है.
थिएटर से आये एक्टर ने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग बदल दि है. यकीन ना हो तो कुछ दशक पहले की फिल्में देखें और अभी की फिल्में देखें. तुलना करने पर आप पाएंगे कि थिएटर एक्टरों के संसर्ग में आने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों के स्टार की शैली और अभिव्यक्ति में गुणात्मक बदलाव आ जाता है. इसके अलावा एक और बात है. आम पाठक और दर्शक नहीं जानते होंगे कि किसी भी नए कलाकार/स्टारकिड की ट्रेनिंग के लिए थिएटर से आये एक्टर को ही हायर किया जाता है. शूटिंग आरंभ होने से पहले वे इन्हें प्रशिक्षित करते हैं. संवाद अदायगी से लेकर विभिन्न इमोशन के एक्सप्रेशन के गुर सिखाते हैं. वे उनकी प्रतिभा सींचते और निखारते हैं.


Tuesday, September 10, 2019

सिनेमालोक : करण देओल की लॉचिंग


सिनेमालोक
करण देओल की लॉचिंग
-अजय ब्रह्मात्मज
अगले हफ्ते सनी देओल के बेटे और धर्मेंद्र के पोते करण देओल की पहली फिल्म ‘पल पल दिल के पास’ रिलीज होगी. इसका निर्माण और निर्देशन खुद सनी देओल ने किया है. शुरू में खबर आई थी कि इम्तियाज अली या राहुल रवैल इस फिल्म का निर्देशन करेंगे, लेकिन सनी देओल ने बेटे की लॉचिंग की कमान किसी और को नहीं सौंपी. जब उनसे पूछा गया कि किसी और को निर्देशन की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी तो उनका जवाब था कि मैं खुद निर्देशक हूं. सच्ची, इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है, लेकिन यह बात तो जहन में आती है कि सनी देओल निर्देशित फिल्मों का क्या हश्र हु? पुत्रमोह में सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना हो तो कोई भी कारण, प्रश्न या तर्क समझ में नहीं आएगा,
इस फिल्म के ट्रेलर और गानों से यह एहसास तो हो रहा है कि ‘पल पल दिल के पास’ खूबसूरत लोकेशन पर बनी फिल्म है’ इस फिल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट ने दुर्गम घाटियों की चढ़ाई की. करण देवल और सहर बांबा ने मुश्किल स्टंट किए. फिल्म एक्शन और रोमांस से भरपूर है. कोशिश है कि दादा धर्मेंद्र और पिता सनी देओल की अभिनय छटा और छवि के साथ करण देओल को पेश किया जाए. सनी देओल ने नयनाभिरामी लोकेशन के साथ दिल दहला देने वाले एक्शन को जोड़ा है. यह फिल्म दादा-पिता के भाव और अंदाज को साथ लेकर चलती है. ट्रेलर में ही दिख रहा है कि करण देओल को भी पिता की तरह चीखने के दृश्य दिए गए हैं. फिलहाल ढाई किलो का मुक्का तो नहीं दिख रहा है,लेकिन मुक्का  है और उसकी गूंज भी सुनाई पड़ती है.
‘पल पल दिल के पास’ टाइटल धर्मेंद्र की फिल्म ‘ब्लैकमेल’ के गीत से लिया गया है’ इस गीत में राखी और धर्मेंद्र के रोमांटिक खयालों के दृश्य में अद्भुत आकर्षण है’ पहाड़ी लोकेशन पर शूट किए गए इस गीत में धर्मेंद्र के प्यार को शब्द दिए गए हैं. उसी रोमांस को दोहराने और धर्मेंद्र के साथ जोड़ने के लिए फिल्म का टाइटल चुना गया. इस फिल्म का नाम सुनते ही धर्मेंद्र का ध्यान आता है. उनके साथ करण देओल का रिश्ता उनकी लोकप्रियता को ताजा कर देता है. सनी देओल ने सोच-समझकर ही यह रोमांटिक टाइटल चुना है. वे अपने पिता से मिली विरासत से बेटे को रुपहले पर्दे पर जोड़ रहे हैं. करण देओल के प्रति जो भी उत्साह बनाया वह सिर्फ और सिर्फ धर्मेंद्र और सनी देओल की वजह से है. रिलीज होने के बाद पता चलेगा कि यह फिल्म दर्शकों के दिल के पास टिकती है या नहीं?
हिंदी फिल्मों में नेपोटिज्म की चर्चा जोरों पर है. यही सच्चाई है कि स्टार और डायरेक्टर अपने बच्चों के लिए प्लेटफार्म बनाते रहेंगे. सामंती समाज के हिंदी दर्शक दादा और पिता से बेटे को सहज ही जोड़ लेते हैं. हिंदी फिल्मों में आए और आ रहे आउटसाइडर ईर्ष्या करते रहें और भिन्नाते रहें. नेपोटिज्म का सिलसिला चलता रहेगा. आने वाले सालों में और भी स्टारकिड लॉन्च किए जाएंगे. उनकी लॉचिंग को वाजिब ठहराने की कोशिश भी की जाएगी. इस सिलसिले और तरकीब के बावजूद हमें या नहीं भूलना चाहिए कि दर्शक आखिरकार खुद फैसला लेते हैं और चुनते हैं. उन्होंने सनी देओल को प्यार दिया लेकिन बॉबी देओल को भूल गए. कपूर खानदान और सलमान खान के परिवार में भी हम इसके उदाहरण देख सकते हैं. प्रचार के बाद भी चलता वही है जिसमें सार हो. दर्शक थोथी प्रतिभाओं को उड़ा देते हैं.
‘पल पल दिल के पास’ में सनी देओल ने और भी पुरानी तरकीब इस्तेमाल की है. गौर किया होगा कि फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम करण और सहर ही हैं. उनके सरनेम भले ही सिंह और सेठी कर दिए गए हों. ‘बेताब’ में सनी देओल का नाम सनी ही रखा गया था. किरदार को कलाकार का नाम देने के पीछे यही यत्न रहता है कि नए कलाकार का नाम दर्शकों को बार-बार सुनाया और बताया जाए. करण देओल और सहर बांबा अभी पूरे आत्मविश्वास में नहीं दिख रहे हैं. विभिन्न चैनलों पर आये इंटरव्यू में वे दोनों सनी देओल के साथ ही दिखे. हर इंटरव्यू में सनी देओल ही बोलते रहे. करण देओल ने कम बातें कीं और सहर बांबा ने तो और भी कम. ना तो पत्रकारों के पास करण देओल के लिए नए सवाल थे और न करण के जवाबों में कोई नवीनता सुनाई पड़ी.
अब देखना है कि अगले हफ्ते दर्शक क्या फैसला सुना रहे हैं?


Tuesday, September 3, 2019

सिनेमालोक : लागत और कमाई की बातें


सिनेमालोक
लागत और कमाई की बातें
-अजय ब्रह्मात्मज

निश्चित ही हम जिस उपभोक्ता समाज में रह रहे हैं, उसमें कमाई, आमदनी, वेतन आदि का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ गया है, काम से पहले दाम की बात होती है, सालाना पैकेज पर चर्चा होती है, जी हां, पहले हर नौकरी का मासिक वेतन हुआ करता था. अब यह वार्षिक वेतन हो चुका है. समाज के इस ट्रेंड का असर फिल्म इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. आये दिन फिल्मों के 100 करोड़ी होने की खबर इसका नमूना है. अब तो मामला कमाई से आगे बढ़कर लागत तक आ गया है. निर्माता बताने लगे हैं कि फलां सीन, फला गाने और फला फिल्म में कितना खर्च किया गया?
कुछ महीने पहले खबर आई थी कि साजिद नाडियाडवाला की नितेश तिवारी निर्देशित ‘छिछोरे’ के एक गाने के लिए 9 करोड़ का सेट तैयार किया गया था. फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि सेट की वजह से उक्त गाना कितना मनोरंजक या प्रभावशाली बन पाया? फिलहाल 9 करोड़ की लागत अखबार की सुर्खियों के काम आ गई. सोशल मीडिया. ऑनलाइन और दैनिक अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. मीडिया के व्यापक कवरेज से फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ ही गई होगी. जाहिर सी बात है कि सामान्य से अधिक लागत का जिक्र करने से निर्माताओं को फायदा ही होता है,इसलिए वे इस पर जोर देने लगे हैं.

Tuesday, August 27, 2019

सिनेमालोक : गेट बचा रहेगा आरके का


सिनेमालोक
गेट बचा रहेगा आरके का
-अजय ब्रह्मात्मज
दो साल पहले 16 सितंबर 2017 को आरके स्टूडियो में भयंकर आग लगी थी. इस घटना के बाद कपूर खानदान के वारिसों में तय किया कि वे इसे बेच देंगे. इसे संभालना, संरक्षित करना या चालू रखने की बात हमेशा के लिए समाप्त हो गई. आग लगने के दिन तक वहां शूटिंग चल रही थी. यह आग एक रियलिटी शो के शूटिंग फ्लोर पर लगी थी. देखते ही देखते आरके की यादें जलकर खाक हो गईं. कोई कुछ भी सफाई दे, लेकिन कपूर खानदान के वारिसों की लापरवाही को नहीं भुलाया जा सकता. स्मृति के तौर पर रखी आरके की फिल्मों से संबंधित तमाम सामग्रियां इस आगजनी में स्वाहा हो गईं. अगर ढंग से रखरखाव किया गया रहता और समय से बाकी इंतजाम कर दिया गया होता तो आग नहीं लगती. आरके स्टूडियो की यादों के साक्ष्य के रूप में मौजूद संरचना, इमारतें,स्मृति चिह्न और शूटिंग फ्लोर सब कुछ बचा रहता.
पिछले हफ्ते खबर आई कि आरके स्टूडियो खरीद चुकी गोदरेज प्रॉपर्टीज कंपनी ने तय किया है कि इस परिसर के अंदर में जो भी कंस्ट्रक्शन हो इसके बाहरी रूप में बदलाव् नहीं किया जाएगा. आरके स्टूडियो का गेट जस का तस बना रहेगा. कहा यह भी जा रहा है कि इस प्रावधान से इस परिसर के दर्शकों, पर्यटकों और रहिवासियों को आरके की याद दिलाता रहेगा. चेम्बूर से गुजर रहे राहगीर इसे अपनी सवारियों से ही देख सकेंगे. पूरा मामला कुछ यूं है कि आरके स्टूडियो की यादों को दरबान बना दिया जाएगा. प्रेम पत्र के लिफाफे में बिजली बिल रखने जैसा इंतजाम है यह. राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर ने इस प्रावधान पर खुशी जाहिर की है. राज कपूर के बेटों की मजबूरी रही होगी, लेकिन भारत और महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में पहल कर सकती थी. पूरे भूभाग को खरीदकर राज कपूर समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के संग्रहालय के रूप में इसे विकसित किया जा सकता था. अभी पेडर रोड पर फिल्म्स डिवीजन के प्रांगण में भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय खोला गया है. उसके लिए या एक मुनासिब और यादगार जगह होती’
याद करें तो राज कपूर ने 1948 में आरके स्टूडियो के स्थापना की थी. उस दौर में स्टूडियो सिस्टम का बोलबाला था. इरादों के पक्के राज कपूर ने पहली फिल्म का प्रोडक्शन अपने बैनर से ही किया. उनकी पहली फिल्म ‘आग’ ज्यादा नहीं चल पाई थी, लेकिन दूसरी फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी ने राज कपूर को हौसला दिया. ‘बरसात’ के एक रोमांटिक दृश्य को राज कपूर ने आरके फिल्म्स स्टूडियो का लोगो बना दिया. ‘बरसात’ के उस दृश्य में नरगिस मस्ती भरे अंदाज में राज कपूर की दाहिनी बांह में झूल रही हैं और आज कपूर के बाएं हाथ में वायलिन है. यह युगल दशकों से राज कपूर के प्रशंसकों को लुभाती रही है,
राज कपूर के निधन के बाद उनके तीनों बेटों ने मिलजुल कर स्टूडियो को संभाला. राज कपूर के मशहूर कॉटेज, नरगिस के मेकअप रूम और बाकी स्ट्रक्चर को समय के साथ नया रूप-रंग भी दिया गया. लंबे समय तक बेटे बताते रहे कि वे आरके फिल्म्स के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे. बेटों ने आरंभिक प्रयासों के बाद कुछ नहीं किया. फिर राज कपूर के पोते रणबीर कपूर मशहूर हुए तो उनसे यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या वे आरके के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे? रणबीर कपूर ने हमेशा हां कहा, लेकिन कोई निश्चित तारीख या योजना नहीं बताई. मजेदार तथ्य है कि यह सवाल कभी करिश्मा कपूर या करीना कपूर से नहीं पूछा गया. आखिर उत्तराधिकारी तो पुरुष ही होता है? 
आरके स्टूडियो का पटाक्षेप होने के बाद मुंबई में उस दौर के तीन स्टूडियो बच गए हैं. महबूब स्टूडियो, फिल्मिस्तान और फिल्मालय. फिल्मालय का एक हिस्सा मॉल और कुछ हिस्सा अपार्टमेंट में तब्दील हो चुका है. फिल्मिस्तान में बदलाव हुआ है. महबूब स्टूडियो पर भी दबाव है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निजी पहल से इन स्टूडियो के रखरखाव और संरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए. हम एक-एक कर अपनी फिल्म विरासत को नष्ट करते जा रहे हैं. दरअसल, भारतीय समाज और सरकार के पास फिल्मी विरासत के संरक्षण और संभाल की कोई स्कीम ही नहीं है.



Tuesday, August 20, 2019

सिनेमालोक : अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...

सिनेमालोक
अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...
-अजय ब्रह्मात्मज
निश्चित ही वे हंस रहे होंगे. उनके लिए यह मौज-मस्ती और परनिंदा का विषय बन गया होगा. ‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के कुछ पहले से अभिनेत्रियों के बीच टिप्पणियों की धींगामुश्तीआरंभ हुई है. यह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. कंगना रनोट और तापसी पन्नू आमने-सामने हैं. दोनों की तरफ से टिप्पणियां चल रही है. एक दूसरे में कमियां निकालने का क्रम जारी है. कहीं न कहीं इस अनावश्यक विवाद से दोनों को लाभ ही हो रहा है. दोनों चर्चा में हैं. सामने से मीडिया और पीछे से इंडस्ट्री का खास तबका मजे ले रहा है. दो बिल्लियों की लड़ाई चल रही है और बाकी उनकी ‘म्याऊं-म्याऊं’ पर सीटी और ताली बजा रहे हैं.
‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के पहले तापसी पन्नू के ट्वीट का संदर्भ लेते हुए कंगना रनोट की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी पन्नू पर टिप्पणी करते हुए उन्हें अपनी बहन की ‘सस्ती कॉपी’ कह दिया. उनकी इस टिप्पणी पर अनुराग कश्यप ने ‘प्रतिटिप्पणी’ की तो रंगोली चंदेल उन पर भी टूट पड़ीं. मामला आगे बढ़ा और ‘जजमेंटल है क्या’ के प्रमोशन के समय कंगना रनोट के हर इंटरव्यू में दो-चार सवाल इस कथित विवाद पर पूछे ही गए. कंगना रनोट ने अपना पक्ष रखा और जवाब देने के लहजे में मखौल और छींटाकशी का टोन रखा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर आप किसी पर टिप्पणी करती हैं तो आपको खुद भी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए. सही बात है, लेकिन इस मामले में दोनों ‘आउटसाइडर’ अभिनेत्रियों को सोचना चाहिए कि इस ‘तू-तू मैं- मैं’ में वे खुद को हास्यास्पद स्थितियों में डाल रही हैं.
इस विवाद की पृष्ठभूमि है. ‘मनमर्जियां’ के प्रमोशन के समय एक रैपिड फायर स्टेशन में कंगना रनोट के लिए सलाह के सवाल पर तापसी पन्नू ने कह दिया था कि उन्हें कुछ भी बोलने के पहले ‘डबल फिल्टर’ का इस्तेमाल करना चाहिए. तात्पर्य था कि बयानबाजी में कंगना रनोट संयम से काम लें. यह बिन मांगी रंगोली चंदेल और कंगना रनोट दोनों को नागवार गुजरी थी. दोनों बहनें मौके की तलाश में थीं. उन्हें मौका मिला तो उन्होंने तापसी पन्नू के लिए ‘पलट टिप्पणी’ कर दी और फिर मामले ने तूल पकड़ लिया’ ‘सस्ती कॉपी’ की टिप्पणी तापसी पन्नू को सबक सिखाने के लिए की गई थी. ऐसा कंगना रनोट ने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा.
यूं हीरोइनों की आपसी खटपट देविका रानी के जमाने से चली आ रही है. कामयाबी की राह में आगे बढ़ति अभिनेत्रियां साथ चलते-चलते कई बार अपनी गति और चाल बढ़ाने के लिए हमसफर अभिनेत्रियों पर इस तरह की टिप्पणियां कर देती हैं. पहले यह दबे-ढके और गुटबाजी के तौर पर होता था. द्वंद्व और द्वेष में भी लिहाज रखा जाता था. अब ऐसा नहीं होता. करीना कपूर, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा के सक्रिय दौर में इंटरव्यू और बातचीत में उनकी परस्पर भद्दी टिप्पणियां चलती रहती थीं. कुछ लोगों को याद होगा कि जब बिपाशा बसु आई ही थीं और उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी तो इंडस्ट्री से आई एक अभिनेत्री ने उन पर अशोभनीय टिप्पणी की थी. श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के प्रतियोगी सालों में भी ऐसा होता रहा था.
प्रकृति का नियम है कि हमेशा नई पौध ज्यादा तेजी से लहलहाती है. उससे स्थापित और थोड़ी पुरानी हो चुकी प्रतिभाओं को अनजान खतरा महसूस होता है. पहले तो एक प्रतियोगी अभिनेत्रि को कोई निर्माता-निर्देशक अतिरिक्त भाव दे दे तो दूसरी अभिनेत्रि रूठ जाती थी. फिल्म अटका देती थी. कई बार छोड़ भी देती थी. ताजा मामले में देखें तो कंगना रनोट निजी मेहनत और निर्देशकों के सहयोग से आगे बढ़ी हैं. उन्हें दर्शकों और समीक्षकों का प्यार मिला है, लेकिन ‘मणिकर्णिका’ पर फिल्म इंडस्ट्री और समीक्षकों से अपेक्षित प्रशंसा और सहयोग न मिलने से वह ज्यादा संवेदनशील हो गई हैं. पिनक जाती हैं. दूसरी तरफ सलीके से आगे बढ़ रही तापसी पन्नू जिस तरह दर्शकों और निर्देशकों का ध्यान खींच रही हैं, उससे थोड़ी सीनियर अभिनेत्रियों में खलबली मची हुई है. अभिनेत्रियों के बीच मौखिक झडपें होती हैं तो मीडिया को चटकारे लेने का मौका मिल जाता है और फिर चालू होता है तमाशा...


Tuesday, August 13, 2019

सिनेमालोक : लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर


सिनेमालोक
लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर
--अजय ब्रह्मात्मज
कश्मीर पृष्ठभूमि, लोकेशन और विषय के तौर पर हिंदी फिल्मों में आता रहा है. देश के किसी और राज्य को हिंदी फिल्मों में यह दर्जा और महत्व हासिल नहीं हो सका है. याद करें तो कुछ गाने भी मिल जाएंगे हिंदी फिल्मों के, जिनमें कश्मीर के नजारो और खूबसूरती की बातें की गई हैं. कश्मीर की वादियों की तुलना स्वर्ग से की जाती है. अमीर खुसरो से लेकर हिंदी फिल्मों के गीतकरों तक ने कश्मीर को जन्नत कहा है. कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य हर पहलू से फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है. 1990 के पहले की हिंदी फिल्मों में यह मुख्य रूप से लोकेशन के तौर पर ही इस्तेमाल होता रहा है. ‘जब जब फूल खिले’ जैसी दो-चार फिल्मों में वहां के किरदार दिखे थे.
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के फिल्मकारों से आग्रह किया है कि वे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में अपनी फिल्मों की शूटिंग करें, इससे वहां के लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, फिल्मों की शूटिंग से कुछ हफ्तों और महीनों के लिए स्थानीय लोगों को अनेक तरह के रोजगार मिल जाते हैं, अगर फिल्म लोकप्रिय हो जाए तो बाद में टूरिज्म से उस इलाके का फायदा होता है. कश्मीर घूम चुके हुए लोगों को मालूम होगा कि वहां एक ‘बेताब वैली’ है. कश्मीर के हालात बिगड़ने से पहले देश के संपन्न मद्य्वार्गीय नवदंपतियों के हनीमून का एक ठिकाना कश्मीर हुआ करता था. वहां जाकर कश्मीरी लबादे में तस्वीरें खिंचवाना, शिकारे पर सैर करते हुए शम्मी कपूर के अंदाज में झटकेदार पोज की पिक्चर उतारना और उसे एल्बम में संजोकर रखना. आज भी कुछ घरों में पूर्वजों के एल्बमों में कश्मीर इन तस्वीरों में सुरक्षित है.
‘जंगली’, ‘जानवर’,’कश्मीर की कली’, ‘आरजू और’ ‘जब जब फूल खिले’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों ने देश के दर्शकों को कश्मीर जाने के लिए प्रेरित किया’ वहां की बर्फीली वादियों में घूमने का अलग रोमांच हुआ करता था’ बताते हैं कि 1947 के अक्टूबर महीने में भारत में शामिल होने के फैसले के बाद राजा हरि सिंह ने फिल्मकारों से कश्मीर आने का व्यक्तिगत आग्रह किया था’ उनके आग्रह को राज कपूर ने अधिक गंभीरता से स्वीकार किया. ‘बरसात’ से लेकर ‘हिना’ तक वह अपनी फिल्मों में किसी न किसी बहाने कश्मीर को लाते रहे’ उनकी फिल्म ‘हिना’ में तो किरदार भी कश्मीर के थे’ कश्मीर में पैदा हुई दिक्कतों के बाद हिंदी फिल्मों को स्विट्जरलैंड का चस्का लगा’ कुछ मजबूरी और कुछ वहां मिल रही सुविधाओं ने यश चोपड़ा समेत अनेक फिल्मकारों को खींच लिया’ कश्मीर में शूट की गई हिंदी फिल्मों की सूची बनाएं तो गिनती 60-75 के आसपास होगी.
कश्मीर के अंदरूनी हलचल की जानकारी पहली बार मणि रत्नम की फिल्म ‘रोजा’ में मिलती है. इस फिल्म में मणि रत्नम ने सबसे पहले कश्मीर की वास्तविक स्थिति के बारे में बताया और दिखाया. ऊपर से दिख रही खूबसूरती की तह में लहूलुहान स्थितियां है. ‘रोजा’ में पड़ोसी देश को नाम और चेहरे के साथ रेखांकित किया गया. उसके बाद तो विलेन का कॉस्ट्यूम ही पठानी सूट हो गया. कई सालों के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मिशन कश्मीर’ में वहां की वास्तविक कठिनाइयों और विरोधाभासों को फिल्म के कथानक में प्रस्तुत किया. उसके बाद से लगातार आतंकवाद के साए में जी रहे कश्मीरियों की कहानियां अलग-अलग दृष्टिकोण से पर्दे पर आती रहीं हैं. कभी किसी ने आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया, लेकिन प्रशासन और सैनिकों की मौजूदगी से कश्मीर की आम जिंदगी में पड़ी खलल पर अधिकांश ने उंगली उठाई. ‘हैदर’ में विशाल भारद्वाज ने गंभीरता से कश्मीरियत के सवाल को छुआ और फिल्म के कुछ पर्संग और दृश्य में इसे ‘चुत्स्पा शब्द से अभिव्यक्त किया’
पिछले साल कश्मीर की तकलीफों को लेकर तीन फिल्में आयीं- ‘नोटबुक’, ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ और ‘हामिद’. इनमें से हामिद को 2018 का श्रेष्ठ उर्दू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. ‘मिशन कश्मीर’ की तरह ही पिछले साल की तीनों फिल्मों में वहां के किरदारों के जरिए फिल्मकारों ने स्थानीय व्यथा का वृत्तांत सुनाया, सुजीत सरकार की ‘यहां’, ओनीर की ‘आई एम...’ और संतोष सिवन की ‘तहान’ आदि फिल्मों में हम वहां के दर्द को देख-सुन सकते हैं’ दरअसल, कश्मीर सिर्फ लोकेशन मात्र नहीं है. थोड़ा गहरे उतरने पर हिंदी फिल्मों के तमाम मसाले वहां मौजूद मिलेंगे. कश्मीर में इमोशन, एक्शन, ड्रामा, ट्रेजडी और प्रहसन सब कुछ है. कोई फिल्मकार हमदर्दी के साथ कश्मीर जाए तो दिल दहला देने वाली कहानियां लेकर लौटेगा. आने वाले सालों में कुछ और दर्दनाक कहानियां वहां से आएंगी. उसके साथ ही कोशिश रहेगी कि खुशहाल कश्मीर के मुस्कुराते चेहरों को भी हिंदी फिल्मों के परदे पर लाया जाए.
पिक्चर अभी बाकी है...


Tuesday, August 6, 2019

सिनेमालोक : इतिहास लेखन में आलस्य -


सिनेमालोक
इतिहास लेखन में आलस्य
-अजय ब्रह्मात्मज

भारतीय सिनेमा का इतिहास 100 साल से अधिक पुराना हो चुका है, लेकिन इस इतिहास पर दर्जन भर किताबें भी नहीं मिलती हैं. भारतीय सिनेमा के इतिहास पर बहुत कम लिखा गया है. ज्यादातर किताबें बीसवीं सदी में ही लिखी गईं. 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समरोह के तहत भारतीय सिनेमा के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में खूब लिखा गया. लगभग हर फिल्मी और गैर फिल्मी संस्था और संगठन में 100 सालों के भारतीय सिनेमा का बखान हुआ. सभी अपनी सीमित जानकारी से गुणगान करते रहे. आज भी गौरव गाथाएं प्रकाशित होती हैं. अतीत की तारीफ और वर्तमान की आलोचना/भर्त्सना होती रहती है. कहा जाता है कि सिनेमा के हर क्षेत्र में क्षरण हुआ है. दरअसल, समाज में हमेशा कुछ लोग अतीतजीबी होते हैं और देखा गया है कि वे वाचाल और सक्रिय भी रहते हैं. उन्हें वर्तमान से शिकायत रहती है. उनका भी ध्यान इतिहास लेखन की और नहीं रहता.

अतीतगान से निकल के जरा सोचें और देखें तो हम पाएंगे कि सिनेमा के इतिहास के दस्तावेजीकरण का काम हमने नहीं किया है. भारत की किसी भी भाषा की फिल्म इंडस्ट्री का व्यवस्थित इतिहास नहीं मिलता. दशकों पहले कुछ अध्येताओं के प्रयास से कुछ किताबें आ गई थीं. अब उन्हीं में कुछ-कुछ जोड़ा जाता है. उसे अद्यतन कर दिया जाता है. भारत सरकार या किसी फिल्मी संगठन की तरफ से इतिहास लेखन का कोई कदम नहीं उठाया गया है. यहां तक कि विश्वविद्यालयों में ट्रेंड और कंटेंट को लेकर शोध होते रहते हैं. सेमिनार में लाखों खर्च होते हैं. लेकिन इतिहास लेखन का कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाता.

भारतीय फिल्मों का कोई भारतीय कोष भी नहीं है. किताब या ऑनलाइन कहीं भी नहीं है. इंटरनेट की सुविधा और साइबर आर्काइव की संभावनाओं के बावजूद हम आईएमडीबी और विकिपीडिया जैसे विदेशी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर निर्भर करते हैं. भारत में नेशनल फिल्म आर्काइव की तरफ से इसकी कोशिश की जा सकती है. फौरी तौर पर इसी साल से वार्षिक रिपोर्ट के तौर पर तथ्य और आंकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं. अगर कोई ऐसा प्लेटफॉर्म बन जाए तो निर्माता भी अपनी फिल्मों की जानकारी वहां भेज सकते हैं. तथ्य और आंकड़े रहेंगे तो कोई अध्तेता और इतिहासकार उनका विश्लेषण और अध्ययन कर किताब लिख सकता है. हमारी आदत और दिक्कत है कि हम अपने ही इतिहास के संकलन और संग्रहण  में रुचि नहीं रखते. पत्र-पत्रिकाओं के कुछ ही दफ्तरों में फिल्मों से संबंधित सामग्रियों की लाइब्रेरी मिलेंगी. इंटरनेट की सुविधा आ जाने से जानकारियां और तस्वीरें इंटरनेट से ले ली जाती हैं, जिनमें कई बार भयंकर गलतियां रहती हैं.

पिछले दिनों मुंबई स्थित फ़िल्मी संगठनों में जा-जाकर मैंने पता करने की कोशिश की. मुझे यह जानना था कि क्या निर्देशक,निर्माता,कलाकार,लेखक,तकनीकी विभाग के कर्मचारी आदि के संगठन अपने वर्तमान और पुराने सदस्यों की पूरी जानकारी का दस्तावेजीकरण करते हैं? लगभग सभी के यहां से नकारात्मक जवाब ही मिला. इस दिशा में कोई सोचता ही नहीं. उन्हें इसकी जरूरत और उपयोगिता महसूस नहीं होती. कायदे से सभी संगठनों को अपने वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत रिकॉर्ड कर लेनी चाहिए. वे उन्हें अपने साइट पर प्रकाशित करें और शेयर करने की सुविधा दें. यह अभी तक नहीं हुआ है तो जल्दी से जल्दी से आरंभ किया जा सकता है. सभी संगठनों के पास पर्याप्त पैसे हैं,जिनसे संसाधन जुटाए जा सकते हैं. भारत सरकार के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय इसकी देख-रेख कर सकता है.
किसी भी दस्तावेज को सुरक्षित और दीर्घायु रखने का एक ही तरीका है कि उसे संरक्षित करने के साथ वितरित भी कर दो. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक तथ्य पहुंचे रहेंगे तो किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहेंगे. सरकार,संस्थान,संगठन और  विश्वविद्यालयों को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. लापरवाही में हम बहुत कुछ गवा चुके हैं. अभी से भी जागृत हुए तो बहुत कुछ बचाया भी जा सकता है.


Tuesday, July 30, 2019

सिनेमालोक : गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’


सिनेमालोक
गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’.
-अजय ब्रह्मात्मज

दुर्वा सहाय हिंदी की लेखिका हैं. उनकी कहानियां ‘हंस’ समेत तमाम पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है. ‘रफ्तार’ नाम से उनका एक कहानी संग्रह भी है. लेखन के साथ फिल्मों में भी उनकी रुचि रही है. 1993 में आई गौतम घोष की ‘पतंग’ की वह सहनिर्माता थीं. इसे उस साल सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. हाल-फिलहाल में उन्होंने कुछ शार्ट फिल्में बनाईं,जिन्हें लेकर वह कान फिल्म महोत्सव तक गयीं. इन फिल्मों के लिए उनकी प्रशंसा हुई. प्रशंसा और सराहना से उनकी हिम्मत बढ़ी और अब उन्होंने ‘आवर्तन’ नाम की फीचर फिल्म पूरी की है. उन्होंने स्वयं ही इसका लेखन और निर्देशन किया है.
गुरु-शिष्य परंपरा और संबंध के नाजुक पहलुओं को उकेरती यह फिल्म स्नेह, राग, द्वेष, ईर्ष्या और कलह के मनोभावों को अच्छी तरह से दर्शाती है. भावना सरस्वती कत्थक की मशहूर नृत्यांगना हैं. वह युवा प्रतिभाओं को नृत्य का प्रशिक्षण भी देती हैं. उनकी एक शिष्या निरंतर अभ्यास और लगन से दक्ष होती जाती है. उसके नृत्य प्रतिभा से प्रभावित होकर भावना सरस्वती उसके मंचप्रवेश की तैयारी करती हैं. एक तरह से वह अपने गुरु होने का दायित्व पूरा करती हैं और शिष्या को सुधि दर्शकों और समीक्षकों के बीच ले जाती हैं. समस्या मंच से ही आरंभ होती है. नृत्य में मगन शिष्य मंच के बीच में आ जाती है और लाइमलाइट ले लेती है. गुरु को बगल में परफॉर्म करना पड़ता है. अगले दिन एक रिपोर्टर उल्लेख करता है कि शिष्य ने गुरु के प्रभाव को कम किया.
गुरु ईर्ष्यावश शिष्य से द्वेष करने लगती हैं. वह शिष्य को किनारे करने लगती हैं. उसकी उपेक्षा करती हैं. उनका प्रेम और सद्भाव बदल जाता है. वह बोलती तो नहीं हैं, लेकिन उनके व्यवहार में तिरस्कार नजर आने लगता है. शिष्या अपनी गुरु के इस भाव और प्रतिक्रिया से अनजान है. उसे लगता है कि उससे ही कोई भूल हुई है. वह पूछती भी है, लेकिन गुरु सही जवाब देने की जगह तंज मारती हैं. शिष्यको एहसास हो जाता है, लेकिन वह विवश है. प्रेम और नृत्य के दोराहे पर खड़ी शिष्य दुविधा से जूझती है.
दुर्वा सहाय ने ‘आवर्तन’ में गुरु-शिष्य के बीच में पल रही ईर्ष्या और उससे उपजे द्वेष को बारीकी से चित्रित किया है. उन्हें शोवना नारायण जैसीसमर्थ नृत्यांगना मिली हैं. ‘आवर्तन’ में भावना सरस्वती की भूमिका शोभना नारायण ने निभाई है. वह ख्यातिलब्ध कत्थक नृत्यांगना हैं. इस फिल्म में भावना के किरदार को निभाते हुए शोभना जाहिर करती हैं कि वह कुशल अभिनेत्री भी हैं. उनके अभिनय की स्वभाविकता प्रभावित करती है. पर्दे पर अभ्यास, नृत्य और परफॉर्मेंस के दृश्यों में अपने नृत्य कौशल की वजह से वह अद्भुत रूप से बाँध लेती हैं. फिल्म के भावुक,द्वंद्व और भिन्न मनोभावों के दृश्यों में भी वह भावपूर्ण लगती हैं. यह दुर्वा सहाय की पारखी नजर है कि उन्होंने नृत्यांगना भावना के किरदार के लिए कत्थक प्रवीण शोभना नारायण को चुना.
‘आवर्तन’ छोटे पैमाने पर बनाई गई खूबसूरत फिल्म है. इसमें प्रचलित हिंदी फिल्मों का ताम-झाम नहीं है. दुर्वा सहाय शिल्प और तकनीकी कलाकारी पर जोर नहीं दिया है. उन्होंने सिंपल तरीके से गुरु-शिष्य के चक्र(आवर्तन) की कहानी कही है. हिंदी फिल्मों में ऐसे विषयों पर कम फिल्में बनी हैं. कुछ सालों पहले तनुजा चंद्रा के निर्देशन में ‘सुर’ आई थी, जिसमें गायन के क्षेत्र में गुरु-शिष्या के बीच की कलह और ईर्ष्या का चित्रण किया गया था. लकी अली और गौरी कर्णिक अभीनीत ‘सुर’ के बाद दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’ आएगी. ‘आवर्तन’ नृत्य जगत की पृष्ठभूमि की गुरु-शिष्या की फिल्म है.
दुर्वा सहाय ने फिल्म के लिए जरूरी कुछ नृत्य परफॉर्मेंस रखे हैं. इनका फिल्मांकन रेअलिस्ट तरीके से लाइव कथन और वादन के साथ हुआ है. शोभना नारायण को कत्थक के भावमुद्राओं में देखना अद्भुत अनुभव है. उनकी शिष्या की भूमिका मृणालिनी ने निभाई है. फिल्म की मांग के मुताबिक मृणालिनी ने शोभना नारायण का बराबर साथ दिया है. परफॉर्मेंस में वह आभास देती है कि कौशल में वह अपने गुरु के समकक्ष पहुंच रही है. यही फिल्म की जरूरत थी. अभ्यास के दृश्यों में दुर्वासा सहाय ने शोभना नारायण की शिष्याओं को लेकर नृत्य के सभी दृश्यों को समान रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है.
दुर्गा सहाय ने गुरु-शिष्या संबंध की फिल्म ‘आवर्तन’ में यह बताने और दिखाने की कोशिश की है कि श्रेष्ठ प्रतिभाएं भी कमजोर पड़ने पर मानवीय दुर्बलताओं में फिसलती हैं. और किसी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करती हैं. फिर उन्हें जब अपनी भूल और दायित्व का एहसास होता है तो वह उदात्त व्यवहार से दिल जीत लेती हैं.