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Tuesday, September 17, 2019

सिनेमालोक : थिएटर से आए एक्टर


सिनेमालोक
थिएटर से आए एक्टर
पारसी थियेटर के दिनों से फिल्मों में थिएटर से एक्टर आते रहे हैं. आज भी एनएसडी, बीएनए और अन्य नाट्य संस्थाओं और समूहों से एक्टरों की जमात आती रहती है. ड्रामा और थिएटर किसी भी एक्टर के लिए बेहतरीन ट्रेनिंग ग्राउंड हैं. ये कलाकारों को हर लिहाज से अभिनय के लिए तैयार करते हैं. थिएटर के  प्रशिक्षण और अभ्यास से एक्टिंग की बारीकियां समझ में आती हैं. हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्मों में थिएटर से आये एक्टर टिके हुए हैं. वे लंबी पारियां खेल रहे हैं. लोकप्रिय स्टारों को भी अपने कैरियर में थिएटर से आये एक्टर की सोहबत करनी पड़ती है. लॉन्चिंग से पहले थिएटर एक्टर ही  स्टारकिड को सिखाते, दिखाते और पढ़ाते हैं,
आमिर खान चाहते थे कि उनके भांजे इमरान खान फिल्मों की शूटिंग आरंभ करने से पहले रंगकर्मियों के साथ कुछ समय बिताएं. वे चाहते थे कि लखनऊ के राज बिसारिया की टीम के साथ वे कुछ समय रहें और उनकी टीम के साथ आम रंगकर्मी का जीवन जियें. फिल्मों में आ जाने के बाद किसी भी कलाकार/स्टार के लिए साधारण जीवन और नियमित प्रशिक्षण मुश्किल हो जाता है. अपनी बातचीत में आमिर खान ने हमेशा ही अफसोस जाहिर किया है कि अपनी लोकप्रियता की वजह से वह देश के विभिन्न शहरों के रंगकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के साथ बेहिचक समय नहीं बिता पाते. उनके पास साधन और सुविधाएं हैं, इसलिए अपनी हर फिल्म की खास तैयारी करते हुए वे संबंधित प्रशिक्षकों को मुंबई बुला लेते हैं. उनके साथ समय बिताते हैं. आमिर को कभी रंगमंच में विधिवत सक्रिय होने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कोशिश जरूर की थी.
एक्टर होने का मतलब सिर्फ नाचना, गाना और एक्शन करना नहीं होता, फिल्मों में एक्टर के परीक्षा उन दृश्यों में होती है, जब वे अन्य पात्रों के साथ दृश्य का हिस्सा होते हैं, क्लोजअप और मोनोलॉग में हाव-भाव और संवाद के बीच सामंजस्य और संतुलन बिठाने में उनके प्रतिभा की झलक मिलती है, पिछले 10-20 सालों की फिल्मों पर गौर करें तो पाएंगे कि फिल्मों में थिएटर से आये एक्टरों की आमद बढ़ी है. पारसी थियेटर,इप्टा,एनएसडी,एक्ट वन, अस्मिता और दूसरे छोटे -बड़े थिएटर ग्रुप से एक्टर फिल्मों में आते रहे हैं. पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ओम शिवपुरी, प्यारे मोहन सहाय, मनोहर सिंह, सुरेखा सीकरी, अनुपम खेर,परेश रावल, नीना गुप्ता, ओम पुरी, इरफान, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रघुवीर यादव और राजपाल यादव जैसे कलाकारों की लम्बी फेहरिश्त तैयार की जा सकती है. इन सभी की मौजूदगी ने गहरा प्रभाव डाला है.
21वीं सदी में फिल्मों का अभिनय बिल्कुल बदल चुका है. अब स्टाइल से अधिक जोर नेचुरल होने पर दिया जा रहा है. कलाकारों के ऑर्गेनिक एक्सप्रेशन की मांग बढ़ रही है. निर्देशक थिएटर से आए एक्टर से अपेक्षा करते हैं कि वे कुछ नया करेंगे. उनकी वजह से फिल्मों में जान आ जाती है. एक थिएटर एक्टर ने बहुत पहले बताया था कि उनके जैसे एक्टर ही किसी फिल्म के स्तंभ होते हैं. स्टार तो दमकते कंगूरे होते हैं. फिल्में उन पर नहीं टिकी रहती है, लेकिन चमक-दमक के कारण वे ही दर्शकों की निगाह में रहते हैं. फिल्मों की सराहना और समीक्षा में सहयोगी कलाकारों के योगदान पर अधिक बल और ध्यान नहीं दिया जाता. सच्चाई तो यह है कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकार हों तो फिल्म के हीरो/स्टार को बड़ा सहारा मिल जाता है. सहयोगी कलाकारों का सदुपयोग करने में आमिर खान सबसे होशियार हैं. ‘लगान’ के बाद उनकी हर फिल्म में सहयोगी कलाकारों की खास भूमिका रही है.
थिएटर से आये एक्टर ने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग बदल दि है. यकीन ना हो तो कुछ दशक पहले की फिल्में देखें और अभी की फिल्में देखें. तुलना करने पर आप पाएंगे कि थिएटर एक्टरों के संसर्ग में आने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों के स्टार की शैली और अभिव्यक्ति में गुणात्मक बदलाव आ जाता है. इसके अलावा एक और बात है. आम पाठक और दर्शक नहीं जानते होंगे कि किसी भी नए कलाकार/स्टारकिड की ट्रेनिंग के लिए थिएटर से आये एक्टर को ही हायर किया जाता है. शूटिंग आरंभ होने से पहले वे इन्हें प्रशिक्षित करते हैं. संवाद अदायगी से लेकर विभिन्न इमोशन के एक्सप्रेशन के गुर सिखाते हैं. वे उनकी प्रतिभा सींचते और निखारते हैं.


Tuesday, September 10, 2019

सिनेमालोक : करण देओल की लॉचिंग


सिनेमालोक
करण देओल की लॉचिंग
-अजय ब्रह्मात्मज
अगले हफ्ते सनी देओल के बेटे और धर्मेंद्र के पोते करण देओल की पहली फिल्म ‘पल पल दिल के पास’ रिलीज होगी. इसका निर्माण और निर्देशन खुद सनी देओल ने किया है. शुरू में खबर आई थी कि इम्तियाज अली या राहुल रवैल इस फिल्म का निर्देशन करेंगे, लेकिन सनी देओल ने बेटे की लॉचिंग की कमान किसी और को नहीं सौंपी. जब उनसे पूछा गया कि किसी और को निर्देशन की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी तो उनका जवाब था कि मैं खुद निर्देशक हूं. सच्ची, इस तथ्य से कौन इंकार कर सकता है, लेकिन यह बात तो जहन में आती है कि सनी देओल निर्देशित फिल्मों का क्या हश्र हु? पुत्रमोह में सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखना हो तो कोई भी कारण, प्रश्न या तर्क समझ में नहीं आएगा,
इस फिल्म के ट्रेलर और गानों से यह एहसास तो हो रहा है कि ‘पल पल दिल के पास’ खूबसूरत लोकेशन पर बनी फिल्म है’ इस फिल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट ने दुर्गम घाटियों की चढ़ाई की. करण देवल और सहर बांबा ने मुश्किल स्टंट किए. फिल्म एक्शन और रोमांस से भरपूर है. कोशिश है कि दादा धर्मेंद्र और पिता सनी देओल की अभिनय छटा और छवि के साथ करण देओल को पेश किया जाए. सनी देओल ने नयनाभिरामी लोकेशन के साथ दिल दहला देने वाले एक्शन को जोड़ा है. यह फिल्म दादा-पिता के भाव और अंदाज को साथ लेकर चलती है. ट्रेलर में ही दिख रहा है कि करण देओल को भी पिता की तरह चीखने के दृश्य दिए गए हैं. फिलहाल ढाई किलो का मुक्का तो नहीं दिख रहा है,लेकिन मुक्का  है और उसकी गूंज भी सुनाई पड़ती है.
‘पल पल दिल के पास’ टाइटल धर्मेंद्र की फिल्म ‘ब्लैकमेल’ के गीत से लिया गया है’ इस गीत में राखी और धर्मेंद्र के रोमांटिक खयालों के दृश्य में अद्भुत आकर्षण है’ पहाड़ी लोकेशन पर शूट किए गए इस गीत में धर्मेंद्र के प्यार को शब्द दिए गए हैं. उसी रोमांस को दोहराने और धर्मेंद्र के साथ जोड़ने के लिए फिल्म का टाइटल चुना गया. इस फिल्म का नाम सुनते ही धर्मेंद्र का ध्यान आता है. उनके साथ करण देओल का रिश्ता उनकी लोकप्रियता को ताजा कर देता है. सनी देओल ने सोच-समझकर ही यह रोमांटिक टाइटल चुना है. वे अपने पिता से मिली विरासत से बेटे को रुपहले पर्दे पर जोड़ रहे हैं. करण देओल के प्रति जो भी उत्साह बनाया वह सिर्फ और सिर्फ धर्मेंद्र और सनी देओल की वजह से है. रिलीज होने के बाद पता चलेगा कि यह फिल्म दर्शकों के दिल के पास टिकती है या नहीं?
हिंदी फिल्मों में नेपोटिज्म की चर्चा जोरों पर है. यही सच्चाई है कि स्टार और डायरेक्टर अपने बच्चों के लिए प्लेटफार्म बनाते रहेंगे. सामंती समाज के हिंदी दर्शक दादा और पिता से बेटे को सहज ही जोड़ लेते हैं. हिंदी फिल्मों में आए और आ रहे आउटसाइडर ईर्ष्या करते रहें और भिन्नाते रहें. नेपोटिज्म का सिलसिला चलता रहेगा. आने वाले सालों में और भी स्टारकिड लॉन्च किए जाएंगे. उनकी लॉचिंग को वाजिब ठहराने की कोशिश भी की जाएगी. इस सिलसिले और तरकीब के बावजूद हमें या नहीं भूलना चाहिए कि दर्शक आखिरकार खुद फैसला लेते हैं और चुनते हैं. उन्होंने सनी देओल को प्यार दिया लेकिन बॉबी देओल को भूल गए. कपूर खानदान और सलमान खान के परिवार में भी हम इसके उदाहरण देख सकते हैं. प्रचार के बाद भी चलता वही है जिसमें सार हो. दर्शक थोथी प्रतिभाओं को उड़ा देते हैं.
‘पल पल दिल के पास’ में सनी देओल ने और भी पुरानी तरकीब इस्तेमाल की है. गौर किया होगा कि फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम करण और सहर ही हैं. उनके सरनेम भले ही सिंह और सेठी कर दिए गए हों. ‘बेताब’ में सनी देओल का नाम सनी ही रखा गया था. किरदार को कलाकार का नाम देने के पीछे यही यत्न रहता है कि नए कलाकार का नाम दर्शकों को बार-बार सुनाया और बताया जाए. करण देओल और सहर बांबा अभी पूरे आत्मविश्वास में नहीं दिख रहे हैं. विभिन्न चैनलों पर आये इंटरव्यू में वे दोनों सनी देओल के साथ ही दिखे. हर इंटरव्यू में सनी देओल ही बोलते रहे. करण देओल ने कम बातें कीं और सहर बांबा ने तो और भी कम. ना तो पत्रकारों के पास करण देओल के लिए नए सवाल थे और न करण के जवाबों में कोई नवीनता सुनाई पड़ी.
अब देखना है कि अगले हफ्ते दर्शक क्या फैसला सुना रहे हैं?


Tuesday, September 3, 2019

सिनेमालोक : लागत और कमाई की बातें


सिनेमालोक
लागत और कमाई की बातें
-अजय ब्रह्मात्मज

निश्चित ही हम जिस उपभोक्ता समाज में रह रहे हैं, उसमें कमाई, आमदनी, वेतन आदि का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ गया है, काम से पहले दाम की बात होती है, सालाना पैकेज पर चर्चा होती है, जी हां, पहले हर नौकरी का मासिक वेतन हुआ करता था. अब यह वार्षिक वेतन हो चुका है. समाज के इस ट्रेंड का असर फिल्म इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. आये दिन फिल्मों के 100 करोड़ी होने की खबर इसका नमूना है. अब तो मामला कमाई से आगे बढ़कर लागत तक आ गया है. निर्माता बताने लगे हैं कि फलां सीन, फला गाने और फला फिल्म में कितना खर्च किया गया?
कुछ महीने पहले खबर आई थी कि साजिद नाडियाडवाला की नितेश तिवारी निर्देशित ‘छिछोरे’ के एक गाने के लिए 9 करोड़ का सेट तैयार किया गया था. फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा कि सेट की वजह से उक्त गाना कितना मनोरंजक या प्रभावशाली बन पाया? फिलहाल 9 करोड़ की लागत अखबार की सुर्खियों के काम आ गई. सोशल मीडिया. ऑनलाइन और दैनिक अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा. मीडिया के व्यापक कवरेज से फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ ही गई होगी. जाहिर सी बात है कि सामान्य से अधिक लागत का जिक्र करने से निर्माताओं को फायदा ही होता है,इसलिए वे इस पर जोर देने लगे हैं.

Tuesday, August 27, 2019

सिनेमालोक : गेट बचा रहेगा आरके का


सिनेमालोक
गेट बचा रहेगा आरके का
-अजय ब्रह्मात्मज
दो साल पहले 16 सितंबर 2017 को आरके स्टूडियो में भयंकर आग लगी थी. इस घटना के बाद कपूर खानदान के वारिसों में तय किया कि वे इसे बेच देंगे. इसे संभालना, संरक्षित करना या चालू रखने की बात हमेशा के लिए समाप्त हो गई. आग लगने के दिन तक वहां शूटिंग चल रही थी. यह आग एक रियलिटी शो के शूटिंग फ्लोर पर लगी थी. देखते ही देखते आरके की यादें जलकर खाक हो गईं. कोई कुछ भी सफाई दे, लेकिन कपूर खानदान के वारिसों की लापरवाही को नहीं भुलाया जा सकता. स्मृति के तौर पर रखी आरके की फिल्मों से संबंधित तमाम सामग्रियां इस आगजनी में स्वाहा हो गईं. अगर ढंग से रखरखाव किया गया रहता और समय से बाकी इंतजाम कर दिया गया होता तो आग नहीं लगती. आरके स्टूडियो की यादों के साक्ष्य के रूप में मौजूद संरचना, इमारतें,स्मृति चिह्न और शूटिंग फ्लोर सब कुछ बचा रहता.
पिछले हफ्ते खबर आई कि आरके स्टूडियो खरीद चुकी गोदरेज प्रॉपर्टीज कंपनी ने तय किया है कि इस परिसर के अंदर में जो भी कंस्ट्रक्शन हो इसके बाहरी रूप में बदलाव् नहीं किया जाएगा. आरके स्टूडियो का गेट जस का तस बना रहेगा. कहा यह भी जा रहा है कि इस प्रावधान से इस परिसर के दर्शकों, पर्यटकों और रहिवासियों को आरके की याद दिलाता रहेगा. चेम्बूर से गुजर रहे राहगीर इसे अपनी सवारियों से ही देख सकेंगे. पूरा मामला कुछ यूं है कि आरके स्टूडियो की यादों को दरबान बना दिया जाएगा. प्रेम पत्र के लिफाफे में बिजली बिल रखने जैसा इंतजाम है यह. राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर ने इस प्रावधान पर खुशी जाहिर की है. राज कपूर के बेटों की मजबूरी रही होगी, लेकिन भारत और महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में पहल कर सकती थी. पूरे भूभाग को खरीदकर राज कपूर समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के संग्रहालय के रूप में इसे विकसित किया जा सकता था. अभी पेडर रोड पर फिल्म्स डिवीजन के प्रांगण में भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय खोला गया है. उसके लिए या एक मुनासिब और यादगार जगह होती’
याद करें तो राज कपूर ने 1948 में आरके स्टूडियो के स्थापना की थी. उस दौर में स्टूडियो सिस्टम का बोलबाला था. इरादों के पक्के राज कपूर ने पहली फिल्म का प्रोडक्शन अपने बैनर से ही किया. उनकी पहली फिल्म ‘आग’ ज्यादा नहीं चल पाई थी, लेकिन दूसरी फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी ने राज कपूर को हौसला दिया. ‘बरसात’ के एक रोमांटिक दृश्य को राज कपूर ने आरके फिल्म्स स्टूडियो का लोगो बना दिया. ‘बरसात’ के उस दृश्य में नरगिस मस्ती भरे अंदाज में राज कपूर की दाहिनी बांह में झूल रही हैं और आज कपूर के बाएं हाथ में वायलिन है. यह युगल दशकों से राज कपूर के प्रशंसकों को लुभाती रही है,
राज कपूर के निधन के बाद उनके तीनों बेटों ने मिलजुल कर स्टूडियो को संभाला. राज कपूर के मशहूर कॉटेज, नरगिस के मेकअप रूम और बाकी स्ट्रक्चर को समय के साथ नया रूप-रंग भी दिया गया. लंबे समय तक बेटे बताते रहे कि वे आरके फिल्म्स के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे. बेटों ने आरंभिक प्रयासों के बाद कुछ नहीं किया. फिर राज कपूर के पोते रणबीर कपूर मशहूर हुए तो उनसे यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या वे आरके के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे? रणबीर कपूर ने हमेशा हां कहा, लेकिन कोई निश्चित तारीख या योजना नहीं बताई. मजेदार तथ्य है कि यह सवाल कभी करिश्मा कपूर या करीना कपूर से नहीं पूछा गया. आखिर उत्तराधिकारी तो पुरुष ही होता है? 
आरके स्टूडियो का पटाक्षेप होने के बाद मुंबई में उस दौर के तीन स्टूडियो बच गए हैं. महबूब स्टूडियो, फिल्मिस्तान और फिल्मालय. फिल्मालय का एक हिस्सा मॉल और कुछ हिस्सा अपार्टमेंट में तब्दील हो चुका है. फिल्मिस्तान में बदलाव हुआ है. महबूब स्टूडियो पर भी दबाव है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निजी पहल से इन स्टूडियो के रखरखाव और संरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए. हम एक-एक कर अपनी फिल्म विरासत को नष्ट करते जा रहे हैं. दरअसल, भारतीय समाज और सरकार के पास फिल्मी विरासत के संरक्षण और संभाल की कोई स्कीम ही नहीं है.



Tuesday, August 20, 2019

सिनेमालोक : अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...

सिनेमालोक
अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...
-अजय ब्रह्मात्मज
निश्चित ही वे हंस रहे होंगे. उनके लिए यह मौज-मस्ती और परनिंदा का विषय बन गया होगा. ‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के कुछ पहले से अभिनेत्रियों के बीच टिप्पणियों की धींगामुश्तीआरंभ हुई है. यह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. कंगना रनोट और तापसी पन्नू आमने-सामने हैं. दोनों की तरफ से टिप्पणियां चल रही है. एक दूसरे में कमियां निकालने का क्रम जारी है. कहीं न कहीं इस अनावश्यक विवाद से दोनों को लाभ ही हो रहा है. दोनों चर्चा में हैं. सामने से मीडिया और पीछे से इंडस्ट्री का खास तबका मजे ले रहा है. दो बिल्लियों की लड़ाई चल रही है और बाकी उनकी ‘म्याऊं-म्याऊं’ पर सीटी और ताली बजा रहे हैं.
‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के पहले तापसी पन्नू के ट्वीट का संदर्भ लेते हुए कंगना रनोट की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी पन्नू पर टिप्पणी करते हुए उन्हें अपनी बहन की ‘सस्ती कॉपी’ कह दिया. उनकी इस टिप्पणी पर अनुराग कश्यप ने ‘प्रतिटिप्पणी’ की तो रंगोली चंदेल उन पर भी टूट पड़ीं. मामला आगे बढ़ा और ‘जजमेंटल है क्या’ के प्रमोशन के समय कंगना रनोट के हर इंटरव्यू में दो-चार सवाल इस कथित विवाद पर पूछे ही गए. कंगना रनोट ने अपना पक्ष रखा और जवाब देने के लहजे में मखौल और छींटाकशी का टोन रखा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर आप किसी पर टिप्पणी करती हैं तो आपको खुद भी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए. सही बात है, लेकिन इस मामले में दोनों ‘आउटसाइडर’ अभिनेत्रियों को सोचना चाहिए कि इस ‘तू-तू मैं- मैं’ में वे खुद को हास्यास्पद स्थितियों में डाल रही हैं.
इस विवाद की पृष्ठभूमि है. ‘मनमर्जियां’ के प्रमोशन के समय एक रैपिड फायर स्टेशन में कंगना रनोट के लिए सलाह के सवाल पर तापसी पन्नू ने कह दिया था कि उन्हें कुछ भी बोलने के पहले ‘डबल फिल्टर’ का इस्तेमाल करना चाहिए. तात्पर्य था कि बयानबाजी में कंगना रनोट संयम से काम लें. यह बिन मांगी रंगोली चंदेल और कंगना रनोट दोनों को नागवार गुजरी थी. दोनों बहनें मौके की तलाश में थीं. उन्हें मौका मिला तो उन्होंने तापसी पन्नू के लिए ‘पलट टिप्पणी’ कर दी और फिर मामले ने तूल पकड़ लिया’ ‘सस्ती कॉपी’ की टिप्पणी तापसी पन्नू को सबक सिखाने के लिए की गई थी. ऐसा कंगना रनोट ने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा.
यूं हीरोइनों की आपसी खटपट देविका रानी के जमाने से चली आ रही है. कामयाबी की राह में आगे बढ़ति अभिनेत्रियां साथ चलते-चलते कई बार अपनी गति और चाल बढ़ाने के लिए हमसफर अभिनेत्रियों पर इस तरह की टिप्पणियां कर देती हैं. पहले यह दबे-ढके और गुटबाजी के तौर पर होता था. द्वंद्व और द्वेष में भी लिहाज रखा जाता था. अब ऐसा नहीं होता. करीना कपूर, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा के सक्रिय दौर में इंटरव्यू और बातचीत में उनकी परस्पर भद्दी टिप्पणियां चलती रहती थीं. कुछ लोगों को याद होगा कि जब बिपाशा बसु आई ही थीं और उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी तो इंडस्ट्री से आई एक अभिनेत्री ने उन पर अशोभनीय टिप्पणी की थी. श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के प्रतियोगी सालों में भी ऐसा होता रहा था.
प्रकृति का नियम है कि हमेशा नई पौध ज्यादा तेजी से लहलहाती है. उससे स्थापित और थोड़ी पुरानी हो चुकी प्रतिभाओं को अनजान खतरा महसूस होता है. पहले तो एक प्रतियोगी अभिनेत्रि को कोई निर्माता-निर्देशक अतिरिक्त भाव दे दे तो दूसरी अभिनेत्रि रूठ जाती थी. फिल्म अटका देती थी. कई बार छोड़ भी देती थी. ताजा मामले में देखें तो कंगना रनोट निजी मेहनत और निर्देशकों के सहयोग से आगे बढ़ी हैं. उन्हें दर्शकों और समीक्षकों का प्यार मिला है, लेकिन ‘मणिकर्णिका’ पर फिल्म इंडस्ट्री और समीक्षकों से अपेक्षित प्रशंसा और सहयोग न मिलने से वह ज्यादा संवेदनशील हो गई हैं. पिनक जाती हैं. दूसरी तरफ सलीके से आगे बढ़ रही तापसी पन्नू जिस तरह दर्शकों और निर्देशकों का ध्यान खींच रही हैं, उससे थोड़ी सीनियर अभिनेत्रियों में खलबली मची हुई है. अभिनेत्रियों के बीच मौखिक झडपें होती हैं तो मीडिया को चटकारे लेने का मौका मिल जाता है और फिर चालू होता है तमाशा...


Tuesday, August 13, 2019

सिनेमालोक : लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर


सिनेमालोक
लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर
--अजय ब्रह्मात्मज
कश्मीर पृष्ठभूमि, लोकेशन और विषय के तौर पर हिंदी फिल्मों में आता रहा है. देश के किसी और राज्य को हिंदी फिल्मों में यह दर्जा और महत्व हासिल नहीं हो सका है. याद करें तो कुछ गाने भी मिल जाएंगे हिंदी फिल्मों के, जिनमें कश्मीर के नजारो और खूबसूरती की बातें की गई हैं. कश्मीर की वादियों की तुलना स्वर्ग से की जाती है. अमीर खुसरो से लेकर हिंदी फिल्मों के गीतकरों तक ने कश्मीर को जन्नत कहा है. कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य हर पहलू से फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है. 1990 के पहले की हिंदी फिल्मों में यह मुख्य रूप से लोकेशन के तौर पर ही इस्तेमाल होता रहा है. ‘जब जब फूल खिले’ जैसी दो-चार फिल्मों में वहां के किरदार दिखे थे.
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के फिल्मकारों से आग्रह किया है कि वे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में अपनी फिल्मों की शूटिंग करें, इससे वहां के लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, फिल्मों की शूटिंग से कुछ हफ्तों और महीनों के लिए स्थानीय लोगों को अनेक तरह के रोजगार मिल जाते हैं, अगर फिल्म लोकप्रिय हो जाए तो बाद में टूरिज्म से उस इलाके का फायदा होता है. कश्मीर घूम चुके हुए लोगों को मालूम होगा कि वहां एक ‘बेताब वैली’ है. कश्मीर के हालात बिगड़ने से पहले देश के संपन्न मद्य्वार्गीय नवदंपतियों के हनीमून का एक ठिकाना कश्मीर हुआ करता था. वहां जाकर कश्मीरी लबादे में तस्वीरें खिंचवाना, शिकारे पर सैर करते हुए शम्मी कपूर के अंदाज में झटकेदार पोज की पिक्चर उतारना और उसे एल्बम में संजोकर रखना. आज भी कुछ घरों में पूर्वजों के एल्बमों में कश्मीर इन तस्वीरों में सुरक्षित है.
‘जंगली’, ‘जानवर’,’कश्मीर की कली’, ‘आरजू और’ ‘जब जब फूल खिले’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों ने देश के दर्शकों को कश्मीर जाने के लिए प्रेरित किया’ वहां की बर्फीली वादियों में घूमने का अलग रोमांच हुआ करता था’ बताते हैं कि 1947 के अक्टूबर महीने में भारत में शामिल होने के फैसले के बाद राजा हरि सिंह ने फिल्मकारों से कश्मीर आने का व्यक्तिगत आग्रह किया था’ उनके आग्रह को राज कपूर ने अधिक गंभीरता से स्वीकार किया. ‘बरसात’ से लेकर ‘हिना’ तक वह अपनी फिल्मों में किसी न किसी बहाने कश्मीर को लाते रहे’ उनकी फिल्म ‘हिना’ में तो किरदार भी कश्मीर के थे’ कश्मीर में पैदा हुई दिक्कतों के बाद हिंदी फिल्मों को स्विट्जरलैंड का चस्का लगा’ कुछ मजबूरी और कुछ वहां मिल रही सुविधाओं ने यश चोपड़ा समेत अनेक फिल्मकारों को खींच लिया’ कश्मीर में शूट की गई हिंदी फिल्मों की सूची बनाएं तो गिनती 60-75 के आसपास होगी.
कश्मीर के अंदरूनी हलचल की जानकारी पहली बार मणि रत्नम की फिल्म ‘रोजा’ में मिलती है. इस फिल्म में मणि रत्नम ने सबसे पहले कश्मीर की वास्तविक स्थिति के बारे में बताया और दिखाया. ऊपर से दिख रही खूबसूरती की तह में लहूलुहान स्थितियां है. ‘रोजा’ में पड़ोसी देश को नाम और चेहरे के साथ रेखांकित किया गया. उसके बाद तो विलेन का कॉस्ट्यूम ही पठानी सूट हो गया. कई सालों के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मिशन कश्मीर’ में वहां की वास्तविक कठिनाइयों और विरोधाभासों को फिल्म के कथानक में प्रस्तुत किया. उसके बाद से लगातार आतंकवाद के साए में जी रहे कश्मीरियों की कहानियां अलग-अलग दृष्टिकोण से पर्दे पर आती रहीं हैं. कभी किसी ने आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया, लेकिन प्रशासन और सैनिकों की मौजूदगी से कश्मीर की आम जिंदगी में पड़ी खलल पर अधिकांश ने उंगली उठाई. ‘हैदर’ में विशाल भारद्वाज ने गंभीरता से कश्मीरियत के सवाल को छुआ और फिल्म के कुछ पर्संग और दृश्य में इसे ‘चुत्स्पा शब्द से अभिव्यक्त किया’
पिछले साल कश्मीर की तकलीफों को लेकर तीन फिल्में आयीं- ‘नोटबुक’, ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ और ‘हामिद’. इनमें से हामिद को 2018 का श्रेष्ठ उर्दू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. ‘मिशन कश्मीर’ की तरह ही पिछले साल की तीनों फिल्मों में वहां के किरदारों के जरिए फिल्मकारों ने स्थानीय व्यथा का वृत्तांत सुनाया, सुजीत सरकार की ‘यहां’, ओनीर की ‘आई एम...’ और संतोष सिवन की ‘तहान’ आदि फिल्मों में हम वहां के दर्द को देख-सुन सकते हैं’ दरअसल, कश्मीर सिर्फ लोकेशन मात्र नहीं है. थोड़ा गहरे उतरने पर हिंदी फिल्मों के तमाम मसाले वहां मौजूद मिलेंगे. कश्मीर में इमोशन, एक्शन, ड्रामा, ट्रेजडी और प्रहसन सब कुछ है. कोई फिल्मकार हमदर्दी के साथ कश्मीर जाए तो दिल दहला देने वाली कहानियां लेकर लौटेगा. आने वाले सालों में कुछ और दर्दनाक कहानियां वहां से आएंगी. उसके साथ ही कोशिश रहेगी कि खुशहाल कश्मीर के मुस्कुराते चेहरों को भी हिंदी फिल्मों के परदे पर लाया जाए.
पिक्चर अभी बाकी है...


Tuesday, August 6, 2019

सिनेमालोक : इतिहास लेखन में आलस्य -


सिनेमालोक
इतिहास लेखन में आलस्य
-अजय ब्रह्मात्मज

भारतीय सिनेमा का इतिहास 100 साल से अधिक पुराना हो चुका है, लेकिन इस इतिहास पर दर्जन भर किताबें भी नहीं मिलती हैं. भारतीय सिनेमा के इतिहास पर बहुत कम लिखा गया है. ज्यादातर किताबें बीसवीं सदी में ही लिखी गईं. 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समरोह के तहत भारतीय सिनेमा के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में खूब लिखा गया. लगभग हर फिल्मी और गैर फिल्मी संस्था और संगठन में 100 सालों के भारतीय सिनेमा का बखान हुआ. सभी अपनी सीमित जानकारी से गुणगान करते रहे. आज भी गौरव गाथाएं प्रकाशित होती हैं. अतीत की तारीफ और वर्तमान की आलोचना/भर्त्सना होती रहती है. कहा जाता है कि सिनेमा के हर क्षेत्र में क्षरण हुआ है. दरअसल, समाज में हमेशा कुछ लोग अतीतजीबी होते हैं और देखा गया है कि वे वाचाल और सक्रिय भी रहते हैं. उन्हें वर्तमान से शिकायत रहती है. उनका भी ध्यान इतिहास लेखन की और नहीं रहता.

अतीतगान से निकल के जरा सोचें और देखें तो हम पाएंगे कि सिनेमा के इतिहास के दस्तावेजीकरण का काम हमने नहीं किया है. भारत की किसी भी भाषा की फिल्म इंडस्ट्री का व्यवस्थित इतिहास नहीं मिलता. दशकों पहले कुछ अध्येताओं के प्रयास से कुछ किताबें आ गई थीं. अब उन्हीं में कुछ-कुछ जोड़ा जाता है. उसे अद्यतन कर दिया जाता है. भारत सरकार या किसी फिल्मी संगठन की तरफ से इतिहास लेखन का कोई कदम नहीं उठाया गया है. यहां तक कि विश्वविद्यालयों में ट्रेंड और कंटेंट को लेकर शोध होते रहते हैं. सेमिनार में लाखों खर्च होते हैं. लेकिन इतिहास लेखन का कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाता.

भारतीय फिल्मों का कोई भारतीय कोष भी नहीं है. किताब या ऑनलाइन कहीं भी नहीं है. इंटरनेट की सुविधा और साइबर आर्काइव की संभावनाओं के बावजूद हम आईएमडीबी और विकिपीडिया जैसे विदेशी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर निर्भर करते हैं. भारत में नेशनल फिल्म आर्काइव की तरफ से इसकी कोशिश की जा सकती है. फौरी तौर पर इसी साल से वार्षिक रिपोर्ट के तौर पर तथ्य और आंकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं. अगर कोई ऐसा प्लेटफॉर्म बन जाए तो निर्माता भी अपनी फिल्मों की जानकारी वहां भेज सकते हैं. तथ्य और आंकड़े रहेंगे तो कोई अध्तेता और इतिहासकार उनका विश्लेषण और अध्ययन कर किताब लिख सकता है. हमारी आदत और दिक्कत है कि हम अपने ही इतिहास के संकलन और संग्रहण  में रुचि नहीं रखते. पत्र-पत्रिकाओं के कुछ ही दफ्तरों में फिल्मों से संबंधित सामग्रियों की लाइब्रेरी मिलेंगी. इंटरनेट की सुविधा आ जाने से जानकारियां और तस्वीरें इंटरनेट से ले ली जाती हैं, जिनमें कई बार भयंकर गलतियां रहती हैं.

पिछले दिनों मुंबई स्थित फ़िल्मी संगठनों में जा-जाकर मैंने पता करने की कोशिश की. मुझे यह जानना था कि क्या निर्देशक,निर्माता,कलाकार,लेखक,तकनीकी विभाग के कर्मचारी आदि के संगठन अपने वर्तमान और पुराने सदस्यों की पूरी जानकारी का दस्तावेजीकरण करते हैं? लगभग सभी के यहां से नकारात्मक जवाब ही मिला. इस दिशा में कोई सोचता ही नहीं. उन्हें इसकी जरूरत और उपयोगिता महसूस नहीं होती. कायदे से सभी संगठनों को अपने वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत रिकॉर्ड कर लेनी चाहिए. वे उन्हें अपने साइट पर प्रकाशित करें और शेयर करने की सुविधा दें. यह अभी तक नहीं हुआ है तो जल्दी से जल्दी से आरंभ किया जा सकता है. सभी संगठनों के पास पर्याप्त पैसे हैं,जिनसे संसाधन जुटाए जा सकते हैं. भारत सरकार के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय इसकी देख-रेख कर सकता है.
किसी भी दस्तावेज को सुरक्षित और दीर्घायु रखने का एक ही तरीका है कि उसे संरक्षित करने के साथ वितरित भी कर दो. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक तथ्य पहुंचे रहेंगे तो किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहेंगे. सरकार,संस्थान,संगठन और  विश्वविद्यालयों को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. लापरवाही में हम बहुत कुछ गवा चुके हैं. अभी से भी जागृत हुए तो बहुत कुछ बचाया भी जा सकता है.


Tuesday, July 30, 2019

सिनेमालोक : गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’


सिनेमालोक
गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’.
-अजय ब्रह्मात्मज

दुर्वा सहाय हिंदी की लेखिका हैं. उनकी कहानियां ‘हंस’ समेत तमाम पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है. ‘रफ्तार’ नाम से उनका एक कहानी संग्रह भी है. लेखन के साथ फिल्मों में भी उनकी रुचि रही है. 1993 में आई गौतम घोष की ‘पतंग’ की वह सहनिर्माता थीं. इसे उस साल सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. हाल-फिलहाल में उन्होंने कुछ शार्ट फिल्में बनाईं,जिन्हें लेकर वह कान फिल्म महोत्सव तक गयीं. इन फिल्मों के लिए उनकी प्रशंसा हुई. प्रशंसा और सराहना से उनकी हिम्मत बढ़ी और अब उन्होंने ‘आवर्तन’ नाम की फीचर फिल्म पूरी की है. उन्होंने स्वयं ही इसका लेखन और निर्देशन किया है.
गुरु-शिष्य परंपरा और संबंध के नाजुक पहलुओं को उकेरती यह फिल्म स्नेह, राग, द्वेष, ईर्ष्या और कलह के मनोभावों को अच्छी तरह से दर्शाती है. भावना सरस्वती कत्थक की मशहूर नृत्यांगना हैं. वह युवा प्रतिभाओं को नृत्य का प्रशिक्षण भी देती हैं. उनकी एक शिष्या निरंतर अभ्यास और लगन से दक्ष होती जाती है. उसके नृत्य प्रतिभा से प्रभावित होकर भावना सरस्वती उसके मंचप्रवेश की तैयारी करती हैं. एक तरह से वह अपने गुरु होने का दायित्व पूरा करती हैं और शिष्या को सुधि दर्शकों और समीक्षकों के बीच ले जाती हैं. समस्या मंच से ही आरंभ होती है. नृत्य में मगन शिष्य मंच के बीच में आ जाती है और लाइमलाइट ले लेती है. गुरु को बगल में परफॉर्म करना पड़ता है. अगले दिन एक रिपोर्टर उल्लेख करता है कि शिष्य ने गुरु के प्रभाव को कम किया.
गुरु ईर्ष्यावश शिष्य से द्वेष करने लगती हैं. वह शिष्य को किनारे करने लगती हैं. उसकी उपेक्षा करती हैं. उनका प्रेम और सद्भाव बदल जाता है. वह बोलती तो नहीं हैं, लेकिन उनके व्यवहार में तिरस्कार नजर आने लगता है. शिष्या अपनी गुरु के इस भाव और प्रतिक्रिया से अनजान है. उसे लगता है कि उससे ही कोई भूल हुई है. वह पूछती भी है, लेकिन गुरु सही जवाब देने की जगह तंज मारती हैं. शिष्यको एहसास हो जाता है, लेकिन वह विवश है. प्रेम और नृत्य के दोराहे पर खड़ी शिष्य दुविधा से जूझती है.
दुर्वा सहाय ने ‘आवर्तन’ में गुरु-शिष्य के बीच में पल रही ईर्ष्या और उससे उपजे द्वेष को बारीकी से चित्रित किया है. उन्हें शोवना नारायण जैसीसमर्थ नृत्यांगना मिली हैं. ‘आवर्तन’ में भावना सरस्वती की भूमिका शोभना नारायण ने निभाई है. वह ख्यातिलब्ध कत्थक नृत्यांगना हैं. इस फिल्म में भावना के किरदार को निभाते हुए शोभना जाहिर करती हैं कि वह कुशल अभिनेत्री भी हैं. उनके अभिनय की स्वभाविकता प्रभावित करती है. पर्दे पर अभ्यास, नृत्य और परफॉर्मेंस के दृश्यों में अपने नृत्य कौशल की वजह से वह अद्भुत रूप से बाँध लेती हैं. फिल्म के भावुक,द्वंद्व और भिन्न मनोभावों के दृश्यों में भी वह भावपूर्ण लगती हैं. यह दुर्वा सहाय की पारखी नजर है कि उन्होंने नृत्यांगना भावना के किरदार के लिए कत्थक प्रवीण शोभना नारायण को चुना.
‘आवर्तन’ छोटे पैमाने पर बनाई गई खूबसूरत फिल्म है. इसमें प्रचलित हिंदी फिल्मों का ताम-झाम नहीं है. दुर्वा सहाय शिल्प और तकनीकी कलाकारी पर जोर नहीं दिया है. उन्होंने सिंपल तरीके से गुरु-शिष्य के चक्र(आवर्तन) की कहानी कही है. हिंदी फिल्मों में ऐसे विषयों पर कम फिल्में बनी हैं. कुछ सालों पहले तनुजा चंद्रा के निर्देशन में ‘सुर’ आई थी, जिसमें गायन के क्षेत्र में गुरु-शिष्या के बीच की कलह और ईर्ष्या का चित्रण किया गया था. लकी अली और गौरी कर्णिक अभीनीत ‘सुर’ के बाद दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’ आएगी. ‘आवर्तन’ नृत्य जगत की पृष्ठभूमि की गुरु-शिष्या की फिल्म है.
दुर्वा सहाय ने फिल्म के लिए जरूरी कुछ नृत्य परफॉर्मेंस रखे हैं. इनका फिल्मांकन रेअलिस्ट तरीके से लाइव कथन और वादन के साथ हुआ है. शोभना नारायण को कत्थक के भावमुद्राओं में देखना अद्भुत अनुभव है. उनकी शिष्या की भूमिका मृणालिनी ने निभाई है. फिल्म की मांग के मुताबिक मृणालिनी ने शोभना नारायण का बराबर साथ दिया है. परफॉर्मेंस में वह आभास देती है कि कौशल में वह अपने गुरु के समकक्ष पहुंच रही है. यही फिल्म की जरूरत थी. अभ्यास के दृश्यों में दुर्वासा सहाय ने शोभना नारायण की शिष्याओं को लेकर नृत्य के सभी दृश्यों को समान रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है.
दुर्गा सहाय ने गुरु-शिष्या संबंध की फिल्म ‘आवर्तन’ में यह बताने और दिखाने की कोशिश की है कि श्रेष्ठ प्रतिभाएं भी कमजोर पड़ने पर मानवीय दुर्बलताओं में फिसलती हैं. और किसी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करती हैं. फिर उन्हें जब अपनी भूल और दायित्व का एहसास होता है तो वह उदात्त व्यवहार से दिल जीत लेती हैं.


Tuesday, July 23, 2019

सिनेमालोक : इलाकाई सिनेमा और ‘धुमकुड़िया’


सिनेमालोक
इलाकाई सिनेमा और ‘धुमकुड़िया’
-अजय ब्रह्मात्त्मज
पिछले दिनों रांची में निर्माता सुमित अग्रवाल और निर्देशक नंदलाल नायक की फिल्म ‘धुमकुड़िया’ देखने का अवसर मिला. झारखंड के नागपुरिया भाषा में बनी यह फिल्म वहीं के स्थानीय समस्या मानव तस्करी (खासकर लड़कियां) पर केंद्रित है. बताते हैं कि पिछले 10 सालों में 38000 लड़कियों की तस्करी हो चुकी है. उन्हें रोजगार दिलाने के लालच में ले जाया जाता है. घरेलू काम करवाने के अलावा खुलेआम उनका यौन शोषण भी होता है. मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. इनमें से बहुत कम लड़कियां ही अपने गांव लौट पाती हैं. अधिकांश इस देश की अनगिनत आबादी में खो जाती हैं या मर-खप जाती हैं. निर्देशक नंदलाल नायक ने सच्ची घटनाओं पर आधारित एक कहानी बुनी है और उसे फिल्म का रूप दिया है. गौरतलब है कि नंदलाल नायक स्वयं इसी कम्युनिटी के सदस्य हैं और तस्करी की शिकार लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम कर रहे हैं. उन लोगों की कोशिश है कि मानव तस्करी पर ही रोक लगाई जाए.
नंदलाल नायक ने मुंबई के कुछ प्रसिद्ध कलाकारों के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को शामिल कर फिल्म यूनिट तैयार की. फिल्म में रिशु को हॉकी खेलने का शौक है. उसके पिता भी हॉकी खिलाड़ी रहे थे. अपने इसी शौक के वशीभूत वह अपने जीजा के साथ गांव से निकलती है. उसका सपना है हॉकी खिलाड़ी बनना. सीधे स्वभाव का जीजा का संपर्क बुधुआ से होता है, जो उसे हॉकी खिलाड़ी के प्रशिक्षण के बहाने दिल्ली भेज देता है. दिल्ली पहुंचने पर रिशु को घरेलू नौकरानी का काम करना पड़ता है. परिवार के मर्द की नजर उस पर है. वह उसके साथ लगातार बलात्कार करता है, जिससे रिशु गर्भवती हो जाती है, एक दिन उसे दिल्ली का घर छोड़ना पड़ता है, वहां से झारखंड लौटने में उसे आगे भी शोषण का शिकार होना पड़ता है,
नंदलाल नायक ने रिशु के जरिए झारखंड से गायब होती लड़कियों की दर्द भरी दास्तान दिखाई है, उनकी तस्करी में परिवार के सदस्यों से लेकर उनके समुदाय के लोग भी शामिल रहते हैं, कुछ के लिए यह धंधा है तो कुछ के लिए अनजान मजबूरी... इसी फिल्म में जीजा और बुधुआ को देख सकते हैं. बुधुँआ को अपने समुदाय के हित की चिंता भी है, लेकिन वह पूरे कुचक्र का एक छोटा हिस्सा बन चूका है. नंदलाल नायक ने झारखंड के वास्तविक और मनोहारी लोकेशन पर फिल्म की शूटिंग की है. फिल्म के गीतों में स्थानीय धुनों और भाव का सुंदर इस्तेमाल किया गया है.
इलाकाई फिल्मों में ‘‘धुमकुड़िया’ जैसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए. उन्हें दर्शकों का समर्थन भी मिले, लेकिन उसके लिए ऐसी फिल्मों का थिएटर में आना जरूरी है. यहीं समस्या बड़ी हो जाती है. झारखंड समेत उत्तर भारत के सभी राज्यों में हिंदी फिल्मों का प्रचार और प्रभाव बहुत ज्यादा है. वितरकों और प्रदर्शको का तंत्र लाभ के लिए इन फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन में अधिक रूचि नहीं लेता. वे ऐसी फिल्मों को प्रश्रय नहीं देते. अगर ‘धुमकुडिया’ रिलीज भी हो जाती है तो उसका मुकाबला उसी हफ्ते रिलीज हुई हिंदी और हॉलीवुड की फिल्मों से होगा. ऐसी स्थिति में दर्शकों के अनुकूल शोटाइम का मिल पाना मुमकिन नहीं है. अगर प्रदेशों की सरकारें महाराष्ट्र की तरह राज्य की भाषाओं के समर्थन में खड़ी हों और उन्हें प्राइम टाइम में शो देना सुनिश्चित करवाएं, तभी ऐसी फिल्मों को थिएटर और दर्शक मिल पाएंगे.
हिंदी प्रदेशों में इलाकाई और भाषा की फिल्मों का निर्माण की सक्रियता नहीं दिखाई दे रही है. सच्चाई यह है कि इलाकाई फिल्मों की सक्रियता से ही स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को सिनेमाई अभिव्यक्ति मिलेगी. विविधता से पूर्ण देश में भाषा और संस्कृति के विकास में सिनेमा का बड़ा योगदान हो सकता है. सरकारें इनका महत्व समझ कर पहल और हस्तक्षेप करें तो निश्चित ही इलाकाई फिल्मों के निर्माण में तेजी आएगी. हालांकि झारखंड में एक फिल्म नीति बनी है, जिसके तहत आर्थिक सहयोग का प्रावधान है. रोचक तथ्य है कि प्रावधान का लाभ स्थानीय प्रतिभाएं कम ले पाती हैं. इसका लाभ भी महेश भट्ट और अनुपम खेर जैसे फिल्मकार और कलाकार हथिया लेते हैं.
धूम कुरिया के साथ नंदलाल नायक ने दमदार दस्तक दी है अब इसे सरकार और दर्शक दर्शकों का सहयोग मिले तो बात आगे बढ़े हां नंदलाल नायक इस मुंह में से बचना होगा कि वह इसे अखिल भारतीय स्तर पर रिलीज कर या फेस्टिवल में दिखाकर कारोबारी प्रतिष्ठा अर्जित कर लेंगे उन्हें अपने समुदाय के बीच इस फिल्म को लेकर जाना चाहिए तभी इलाकाई सिनेमा को सार्थकता मिलेगीज़


Tuesday, July 16, 2019

सिनेमालोक : कंगना से ताज़ा टकराव के बाद


सिनेमालोक
कंगना से ताज़ा टकराव के बाद
पिछले दिनों कंगना रनोट की एक फिल्म के सोंग लॉन्च के इवेंट में एक पत्रकार से उनकी तू तू मैं मैं हो गई. बात उलाहने से शुरू हुई और फिर फिसलती गई. लगभग 8 मिनट की इस बाताबाती में कंगना रनोट का अहम और अहंकार उभर कर आया. पत्रकार लगातार उनकी बातों से इंकार करता रहा. बाद में कंगना रनोट के समर्थकों और उनकी बहन रंगोली चंदेल ने उक्त पत्रकार के पुराने ट्वीट के स्क्रीनशॉट दिख कर यह साबित करने की कोशिश की कि वह लगातार उनके खिलाफ लिखता रहा है. उनकी गतिविधियों का मखौल उड़ाता रहा है. हालाँकि इस आरोपण में दम नहीं है.
फिलहाल फिल्म पत्रकारिता का जो स्वरूप उभरकर आया है, उसमें फिल्म बिरादरी के सदस्यों से सार्थक और स्वस्थ बातचीत नहीं हो पाती, पत्रकारों की संख्या बढ़ गई है, इसलिए फिल्म स्टार के इंटरव्यू और बातचीत का अंदाज और तरीका भी बदल गया है. पहले बमुश्किल एक दर्जन फिल्म पत्रकार होते थे. उनसे फिल्म कलाकार की अकेली और फुर्सत की बातचीत होती थी. लिखने के लिए कुछ पत्र पत्रिकाएं थीं. उनमें ज्यादातर इंटरव्यू, फिल्म की जानकारी और कुछ पन्नों में गॉसिप छपा करते थे, पत्रिकाओं से अखबारों में आने और फिल्म के रंगीन होने के बाद फिल्म पत्रकारिता में तेजी से परिवर्तन आया, उधर फिल्म इंडस्ट्री में पीआर (प्रचारक) का जोर बढ़ा. इन सभी के साथ मीडिया का विस्तार होता रहा. कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के आ जाने के बाद तो संयम और सदाचार के सारे बांध टूट गए. टाइमलाइन की रिपोर्टिंग और कवरेज ने गंभीरता समाप्त कर दी. यह दोनों तरफ से हुआ. इसके लिए पत्रकार और कलाकार दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं.
कुछ मीडिया संस्थानों से जुड़े फिल्म पत्रकारों की ही क़द्र रह गई है. बाकी को पीआर और फिर इंडस्ट्री भीड़ से अधिक नहीं समझते. इसकी बड़ी वजह मीडिया की भेड़चाल ही है. मीडिया की बेताबी और जरूरतों को देखते हुए फिल्म कलाकारों के पीआर ने अंकुश लगाने के साथ शर्तें लड़नी शुरू कर दी हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि पिछले दिनों एक लोकप्रिय स्टार का इंटरव्यू का वॉइस मेल सभी पत्रकारों को भेज दिया गया. बताया गया स्टार को फुर्सत नहीं है. पीआर ने तो अपनी सुविधा देखी. ताज्जुब तब हुआ जब ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं में उसी वॉइस मेल की बातचीत छपी हुई पढ़ने-सुनने को मिली.
कंगना रनोट अपने वीडियो मैं बोलते समय असंयमित हो गई और उन्होंने पत्रकारों के बारे में कुछ उटपटांग बातें भी कीं. उन्होंने एक तरफ से सभी को समेट लिया. जिन्हें ‘मणिकर्णिका’ पसंद नहीं आई,उन्हें ‘देशद्रोही’ तक कह डाला. यह कैसा बचकानापन है. दरअसल, गुस्से में कई बार हम व्यक्ति के साथ उसके परिवार, समूह, समुदाय और समाज को भी समेट लेते हैं, करना रनोट भूल गईं कि इसी मीडिया में से अधिकांश ने हमेशा उनकी हिम्मत की दाद दी, उनकी प्रतिभा का बखान किया, दिग्गजों से भिड़ने के समय उनके साथ रहे. वह अपने उलाहने में उन्हें अलग नहीं कर सकीं. नतीजतन मीडिया के सक्रिय सदस्य दुखी और नाराज हुए.
फिलहाल गतिरोध बना हुआ है, लेकिन कंगना रनोट अपनी आगामी फिल्म के प्रचार में जुटी हुई हैं. आनन-फानन में बने संगठन द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद कंगना से मीडिया की बातचीत हो रही है. आज के संदर्भ में किसी फ़िल्म पत्रकार के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह अपने समूह के आवाहन पर संस्थान के निर्देशों का उल्लंघन कर सके. पेशेवर पत्रकार के तौर पर यह मुमकिन भी नहीं है.
यह मौका है कि हम सभी फिल्म पत्रकारिता के स्वरूप और ढंग पर विचार करें. आज की जरूरतों और मांग के अनुसार उस में फेरबदल करें. कलाकारों से हो रही बातचीत को केवल क्विज और रैपिड फायर के नाम पर लतीफा और छींटाकशी का मंच न बनाएं. चंद् पत्रकार ही कलाकारों से बातें करते समय फिल्मों पर खुद को केंद्रित करते हैं. ज्यादातर बातचीत में कलाकारों की प्रतिक्रिया और सफाई रहती है. वे खुलासा कर रहे होते हैं. कलाकारों से ढंग की बातचीत नहीं हो पाने का सबसे बड़ा कारण बगैर फिल्म देखे किसी फिल्म पर बातचीत करना है. कलाकार कुछ बताना नहीं चाहते और पत्रकारों के पास भेदी सवाल नहीं होते. विदेशों की तरह फिल्म दिखा कर बातचीत की जाए तो उससे फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया संस्थान और दर्शक सभी का भला होगा.


Tuesday, July 9, 2019

सिनेमालोक : अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार


 सिनेमालोक
अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार
-अजय ब्रह्मात्मज
वेब सीरीज धड़ल्ले से बन रही हैं. लगभग सारे कलाकार, तकनीशियन और बैनर किसी ने किसी वेब सीरीज के निर्माण से जुड़े हैं, फिल्म और टीवी के बाद आया वेब सीरीज का यह क्रिएटिव उफान सभी के लिए अवसर और लाभ जुटा रहा है. वेब सीरीज के प्रसारण के लिए विशेष प्लेटफॉर्म बन गए हैं. देश-विदेश के अनेक उद्यमी इस दिशा में सक्रिय हैं. सभी को अनेक संभावनाएं दिख रही है. खासकर वेब सीरीज पर सेंसर का अंकुश नहीं होने की वजह से लेखक, निर्देशक और कलाकार अभिव्यक्ति की नई उड़ानें भर रहे हैं, कुछ के लिए यह उनकी कल्पना का असीमित विस्तार है तो कुछ क्रिएटिव व्यभिचार में मशगूल हो गए हैं.
वेब सीरीज में गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स की भरमार चिंता का विषय है, समाज के नैतिक पहरुए तो लंबे समय से शोर मचा रहे हैं कि वेब सीरीज के कंटेंट की निगरानी हो. वे आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों पर कैंची चलाना चाहते हैं. दूसरा तबका सेंसरशिप के सख्त खिलाफ है. फिल्म और टीवी की सेंसरशिप से उकताया यह तबका थोड़ी राहत महसूस कर रहा है. पिछले दिनों निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने एक बातचीत में साफ शब्दों में कहा था कि पहली बार हमें क्रिएटिव आजादी मिली है. हम दर्शकों को बेहतरीन कंटेंट दे पा रहे हैं. फिल्म और टीवी माध्यम पर सेंसरशिप का अंकुश न होने की वजह से विषय, कथ्य और दृश्यों के वर्जित क्षेत्र खुल गए हैं’ लेखकों और निवेशकों को बड़ा मौका मिला है.
यह बड़ा मौका किसी बाढ़ की तरह गंदगी भी लेकर आ चुका है. खासकर वेब सीरीज की भाषा(गाली-गलौज) और सेक्स चित्रण में कुछ लेखक-निर्देशक मिली छूट और स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं. वे उत्तेजना और आकर्षण के लिए फूहड़ और अश्लील हो जाने की गलतियां कर रहे हैं. इस तरह वे पाबंदी और सेंसरशिप के समर्थकों को अवसर दे रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने ऐसी आपत्तियों और जनहित याचिकाओं को फिलहाल ठुकरा दिया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही वेब सीरीज की ढीली लगाम खींच ली जाएगी. ऐसा हुआ तो वेब सीरीज के विस्तार और संभावनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.
वेब सीरीज पर पाबंदी और सेंसरशिप के पक्ष-विपक्ष की बहसों से अलग भी इस मुद्दे से संबंधित समस्याएं हैं. पिछले दिनों एक अभिनेता ने इसका खुलासा किया. अभिनय का प्रशिक्षण लेकर फिल्मों में आए इस अभिनेता की पिछले कुछ सालों में अपनी पहचान मिली है. सार्वजनिक स्थानों पर उनके दर्शक-प्रशंसक उनके साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए बेताब रहते हैं. प्रशंसकों से घिरे अभिनेता ने फुर्सत मिलते ही अपनी दुविधा और उससे जुड़ा द्वंद्व शेयर किया. उन्हें इन दिनों काफी काम मिल रहा है और काम का बड़ा हिस्सा वेब सीरीज है.
अभिनेता ने बताया कि इन दिनों वेब सीरीज की भाषा से हमें दिक्कत होती है. कई दृश्यों में गाली-गलौज की जरूरत नहीं होती है. अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए संवादों में हम ममूली शब्दों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन उसे नाटकीय  और कथित रूप से प्रभावपूर्ण बनाने के लिए जबरन गालियां ठूसी जा रही हैं. गालियों में अद्भुत प्रयोग हो रहे हैं. भाषा की अश्लीलता के साथ ही सेक्स दृश्यों की अधिकता भी हमें परेशान कर रही है. मुमकिन है कि स्त्री-पुरुष के अंतरंग और कामुक दृश्यों में दर्शकों को स्फुरण और आनंद आता हो, लेकिन हमारी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. पिछले दिनों एक निर्देशक ने बताया कि बेडरूम सीन के बाद हम आपके नितंब से कैमरा पुल करेंगे और आपको नंगे खड़े होकर तौलिया लपेटते हुए अपना संवाद बोलना है. जब मैंने आपत्ति की तो निर्माता का फोन आ गया. वह धमकी भरे अंदाज में अनुबंध का हवाला देने लगा. यह भी तर्क दिया गया कि हम इसे पूरे एस्थेटिक के साथ शूट करेंगे. आपको लाज या ग्लानि नहीं होगी. निर्देशक निर्माता की जिद देखने के बाद मुझे दूसरे इमोशनल और लॉजिकल तरीके से उन्हें समझाना पड़ा. फिर बात बनी और उन्होंने बॉक्सर पहनने की अनुमति दे दी. लेकिन एक अभिनेता कब तक ऐसे दबावों से बचेगा. मैं मना करूंगा तो कोई और तैयार हो जाएगा.  


Tuesday, July 2, 2019

सिनेमालोक : महज टूल नहीं होते कलाकार


 सिनेमालोक
महज टूल नहीं होते कलाकार
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दो हफ्तों में ‘कबीर सिंह’ और ‘आर्टिकल 15 रिलीज हुई हैं. दोनों में दर्शकों की रुचि है. वे देख रहे हैं. दोनों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण से बहसें चल रही हैं. बहसों का एक सिरा कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है. क्या फिल्मों और किरदारों(खासकर नायक की भूमिका) को चुनते समय कलाकार अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

‘आर्टिकल 15 के संदर्भ में आयुष्मान खुराना ने अपने इंटरव्यू में कहा कि कॉलेज के दिनों में वह नुक्कड़ नाटक किया करते थे. उन नाटकों में सामाजिक मुद्दों की बातें होती थीं. मुद्दों से पुराने साहचर्य के प्रभाव में ही उन्होंने अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15 चुनी. कहा यह भी जा रहा है कि अनुभव ने उन्हें पहले एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ऑफर की थी, लेकिन ‘मुल्क’ से प्रभावित आयुष्मान खुराना ने वैसे ही मुद्दों की फिल्म में रुचि दिखाई.अनुभव ने मौका नहीं छोड़ा और इस तरह ‘आर्टिकल 15 सामने आई. कह सकते हैं कि आयुष्मान खुराना ने अपनी लोकप्रियता का सदुपयोग किया. वह एक ऐसी फिल्म के साथ आए जो भारतीय समाज के कुछ विसंगतियों को रेखांकित करती हैं. उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति का लाभ फिल्म को मिला. उसे दर्शक मिले.

आमिर खान फिल्म को मनोरंजन का माध्यम समझते हैं. उनकी फिल्में इसी उद्देश्य से बनती और प्रदर्शित होती हैं. फिर भी हम देखते हैं कि उनकी ज्यादातर फिल्मों में संदेश और कुछ अच्छी बातें रहती हैं. अपने कैरियर के आरंभ में आमिर खान ने भी दूसरे अभिनेताओं की तरह हर प्रकार की फिल्में कीं. उनमें कुछ ऊलजलूल भी रहीं, लेकिन ‘सरफरोश’ के बाद उनका चुनाव बदल गया है. उनकी स्लेट सार्थक फिल्मों से भरी है. उन्होंने एक बातचीत में मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं अपनी लोकप्रियता का उपयोग ऐसी फिल्मों में करना चाहता हूं, जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सुकून और शिक्षा भी दें. हमारे होने की वजह से उन फिल्मों में दर्शकों की जिज्ञासा रहती है. वे फ़िल्में देखने आते हैं.

फिल्म कलाकारों में बड़ी जमात ऐसे अभिनेता/अभिनेत्री की है, जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है. वे और उनके प्रशंसक समर्थक मानते हैं कि कलाकार दो कलाकार होता है. उसे जो भी किरदार दिया जाता है, वह उसे निभाता है. एक स्तर पर यह तर्क सही है, लेकिन फिल्मों के प्रभाव को देखते हुए किसी भी अभिनेता/अभिनेत्री को यह तो देखना ही चाहिए कि उसकी फिल्म अंतिम प्रभाव में क्या कहती है? फिल्म में उनका किरदार पॉजीटिव या नेगेटिव हो सकता है, लेकिन इन किरदारों को निर्देशक कैसे ट्रीट करता है और फिल्म का क्या निष्कर्ष है? अगर इन बातों पर ध्यान ना दिया जाए तो फिजूल फिल्मों की झड़ी लग जाएगी. घटिया, अश्लील और फूहड़ फिल्मों की संख्या बढ़ती चली जाएगी. फ़िल्में  मनोरंजन और मुनाफा हैं, लेकिन इन उद्देश्यों के लिए उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता.

‘कबीर सिंह’ सिंह के संदर्भ में शाहिद कपूर के प्रशंसक और समर्थक के साथ कुछ समीक्षक और विश्लेषक भी कहते नजर आ रहे हैं कि हमें शाहिद कपूर की मेहनत और प्रतिभा का कायल होना चाहिए. उनकी तारीफ करनी चाहिए. उन्होंने एक नेगेटिव किरदार को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया. और फिर उन्होंने निर्देशक की मांग को पूरा किया. एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी है कि वह अपने किरदार को सही तरीके से निभा ले जाए, लेकिन यह सोचना जरूरी है कि क्या कलाकार कोई मशीन है? वह मनुष्य है और उसकी अपनी सोच-समझ होनी चाहिए. कलाकार केवल टूल नहीं है कि चाभी देने या ऑन करने मात्र से चालू हो जाए. अपनी समझदारी से वह तय करता है कि कैरियर के लाभ के लिए उसे कौन सी फिल्म चुननी है? खासकर नायक हैं तो इतनी संवेदना तो होनी चाहिए कि  किरदार और फिल्म के प्रभाव को समझ सके.

भारतीय समाज में फिल्म कलाकारों की भूमिका बढ़ गई है, अब वे फिल्मों के अलावा सोशल इवेंट और प्रोडक्ट एंडोर्समेंट भी करते हैं. ज्यादातर कलाकारों को देखा गया है कि वे इवेंट और प्रोडक्ट चुनते समय यह खयाल रखते हैं कि उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? किसी इवेंट में जाना या किसी प्रोडक्ट को एंडोर्स करना उनके लिए कितना उचित होगा? इसी आधार पर उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझ व्यक्त होती है. मामला सिर्फ फिल्मों के चुनाव का ही नहीं है. पूरी जीवन शैली और उन सभी फैसलों का भी है, जिनका असर सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है. कोई भी कलाकार सिर्फ यह कहने से नहीं छूट या बच सकता कि हमें निर्देशक जो भी कहते हैं, हम कर देते हैं.


Tuesday, June 25, 2019

सिनेमालोक : कबीर सिंह के दर्शक


सिनेमालोक
कबीर सिंह के दर्शक
अजय ब्रह्मात्मज

पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई ‘कबीर सिंह’ मूल फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से अच्छा कारोबार कर रही है. ‘अर्जुन रेड्डी’ ने कुल 51 करोड़ का कारोबार किया था, जबकि ‘कबीर सिंह’ ने तीन दिनों के वीकेंड में 70 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है. अगले दो नहीं तो तीन दिनों में यह 100 करोड़ी क्लब में शामिल हो जाएगी. कारोबार के लिहाज से ‘कबीर सिंह’ कामयाब फिल्म है. जाहिर है इसकी कामयाबी का फायदा शाहिद कपूर को होगा. वे इस की तलाश में थे. पिछले साल ‘पद्मावत’ ने जबरदस्त कमाई और कामयाबी हासिल की, पर उसका श्रेय संजय लीला भंसाली दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के बीच बंट गया था. ‘कबीर सिंह’ में शाहिद कपूर अकेले नायक हैं, इसलिए पूरे श्रेय कि वे अकेले हकदार हैं.
इस कामयाबी और शाहिद कपूर के स्टारडम के बावजूद ‘कबीर सिंह’ पर बहस जारी है. आलोचकों की राय में यह फिल्म स्त्रीविरोधी और मर्दवादी है. पूरी फिल्म में स्त्री यानि नायिका केवल उपभोग (कथित प्रेम) के लिए है. फिल्म के किसी भी दृश्य में नायिका प्रीति आश्वस्त नहीं करती कि वह 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी मेडिकल छात्र हैं, जिसका अपना एक करियर भी होना चाहिए. मुग्ध दर्शकों को नायिका के इस चित्रण पर सवाल नहीं करना है? उन्हें ख्याल भी नहीं होगा कि वह स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में क्यों नहीं उभरती हैं? फिल्म के आरंभिक संवाद में ही नायक घोषणा करता है कि ‘प्रीति मेरी बंदी है’. ‘बंदी’ का एक अर्थ लड़की है लेकिन उसका दूसरा शाब्दिक/लाक्षणिक अर्थ ‘कैदी’ भी तो है. पूरी फिल्म में वह कैदीद ही नजर आती है. कभी कबीर सिंह की तो कभी अपने पिता की. इन दोनों के बाद वह परिस्थिति की भी कैदी है. लेखक-निर्देशक ने उसे गर्भवती बनाने के साथ पंगु भी बना दिया है. कबीर से अलग होने के बाद वह मेडिकल प्रैक्टिस भी तो कर सकती थी.
फिल्म के समर्थकों का आग्रह है कि कबीर सिंह के किरदार को पर्दे पर जीवंत करने के लिए शाहिद कपूर की तारीफ की जानी चाहिए. फिल्म के शिल्प और सभी तकनीकी पक्षों पर भी बातें होनी चाहिए. इस आग्रह में बुराई नहीं है, लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या ऐसे (खल)नायक की सराहना होनी चाहिए. साहित्य और फिल्मों में इसे हम ‘एंटी हीरो’ के नाम से जानते हैं. फिल्म का ऐसा नायक जिसमें नेगेटिव और ग्रे शेड हो. हॉलीवुड की फिल्मों में एंटी हीरो’ का अच्छा-खासा ट्रेडिशन रहा है. हिंदी फिल्मों में भी ‘एंटी हीरो’ का क्रेज रहा है अमिताभ बच्चन का फिल्मी विशेषण ‘एंग्री यंग मैन’ इसी ‘एंटी हीरो’ का पर्याय था. अनिल कपूर,शाह रुख खान और अन्य अभिनेताओं ने भी ‘एंटी हीरो’ के किरदार निभाए हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में एंटी हीरो के पीछे सलीम-जावेद तर्क ले लिए आते थे. नायक के साथ हुए अन्याय की पृष्ठभूमि रहती थी, जिसमें उसकी नेगेटिव और गैरकानूनी गतिविधियां उचित लगती थीं. सारे चित्रण और ग्लेमर के बावजूद फिल्म के अंतिम दृश्य में एंटीहीरो को अपराध बोध और पश्चाताप से ग्रस्त दिखाया जाता था. उसे ग्लानि होती थी. वह अपने लिए और अपनी गलतियों के लिए अफसोस जाहिर करता था. भारतीय शास्त्रों, नाटकों और सिनेमा में खलनायकों को गरिमा प्रदान नहीं की जाती है. उन्हें रोमांटिसाइज़ नहीं किया जाता. ‘कबीर सिंह’ का नायक किसी ग्लानि में नहीं आता. उसे अपनी करतूतों पर पश्चाताप भी नहीं होता है. वह लड़कियों को महज उपभोग की वस्तु समझता है. चाकू की नोक पर उनके कपड़े उतरवाता है. डॉक्टर दोस्तों के मरीजों से हवस मिटाता है. प्रेमिका के विछोह में वह व्यभिचारी हो जाता है. ताज्जुब यह है कि  दर्शक उसे पर्दे पर देखकर लहालोट हो रहे हैं. तालियां बजा रहे हैं. सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में तर्क के गढ़ रहे हैं.
‘कबीर सिंह’ के प्रशंसकों और समर्थकों को लगता है कि शाहिद कपूर ने अपने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय इस फिल्म में किया है. अभिनय की श्रेष्ठता और उदात्तता की सभी परिभाषाओं को भूलकर वे इस किरदार से मोहित हैं. देर-सबेर इस फिल्म की कामयाबी का सामाजिक अध्ययन होगा. कारण खोजे जाएंगे कि 2019 के जून में क्यों ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्म दर्शकों को पसंद आई. कारण स्पष्ट है. हमारा समाज जिस तेजी से पुरुष प्रधानता को प्रश्रय दे रहा है और उसकी बेजा हरकतों को उचित ठहरा रहा है. जिस देश में दिन-रात बलात्कार हो रहे हैं. अपराधियों को सजा नहीं मिल पा रही है. जिस समाज में बेटियों की भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक आम है, गली मोहल्लों में लड़कियों पर भद्दी टिप्पणियां और इशारे करने में युवकों को गुरेज नहीं होता... उस समाज और देश में ‘कबीर सिंह’ की जलील और अश्लील हरकतों में कोई खामी क्यों दिखेगी?
आज ऐसे किरदार का नाम कबीर रखा गया है. कल राम,कृष्ण, मोहम्मद, यीशु,विवेकानंद,बुद्ध, गाँधी,नानक भी हो सकता है. जब पूरा जोर कमाई और कामयाबी पर हो तो क्रिएटिव कर्तव्य की कौन सोचे?