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फिल्‍म समीक्षा : डैडी

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फिल्‍म रिव्‍यू अरुण गवली की जीवनी डैडी -अजय ब्रह्मात्‍मज
विवादों और उनकी वजह से प्रदर्शन के डर से हिंदी में समकालीन घटनाओं और व्‍यक्तियों पर फिल्‍में नहीं बनतीं। इस लिहाज से असीम आहलूवालिया की ‘डैडी’ साहसिक प्रयास है। असीम ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अरुण गवली के जीवन पर यह फिल्‍म बनाई है। इसे बॉयोपिक विधा की श्रेणी में रखा जा सकता है। मिल मजदूर के बेटे अरुण गवली का जीवन मुंबई के निम्‍न तबके के नौजवानों की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है। मिलों के बंद होने के बाद ये बेरोजगार नौजवान अपराध की दुनिया में आए। उनमें से हर कोई अरुण गवली की तरह कुख्‍यात अपराधी और बाद में सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिज्ञ नहीं बना,लेकिन कमोबेश सभी की जिंदगी ऐसे ही तबाह रही। असीम आहलूवालिया और अर्जुन रामपाल ने मौजूद तथ्‍यों और साक्ष्‍यों के आधार पर अरुण गवली की जीवनी लिखी है। फिल्‍म अरुण गवली को ग्‍लैमराइज नहीं करती। अपराध की दुनिया में विचरने के बावजूए यह हिंदी की अंडरवर्ल्‍ड फिल्‍मों से अलग है। डैडी के रूप में अरुण गवली हैं। बाकी वास्‍तविक किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं। फिर भी मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड से वाकिफ दर…

फिल्‍म समीक्षा : कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह

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फिल्‍म रिव्‍यू फिसला है रोमांच कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह -अजय ब्रह्मात्‍मज सुजॉय घोष चार सालों से ज्‍यादा समय बीत गया। मार्च 2012 में सीमित बजट में सुजॉय घोष ने ‘कहानी’ निर्देशित की थी। पति की तलाश में कोलकाता में भटकती गर्भवती महिला की रोमांचक कहानी ने दर्शकों को रोमांचित किया था। अभी दिसंबर में सुजॉय घोष की ‘कहानी 2’ आई है। इस फिल्‍म का पूरा शीर्षक ‘कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह’ है। पिछली फिल्‍म की कहानी से इस फिल्‍म को कोई संबंध नहीं है। निर्माता और निर्देशक ने पिछली ‘कहानी’ की कामयाबी का वर्क ‘कहानी 2’ पर डाल दिया है। यह वर्क कोलकाता,सुजॉय घोष और विद्या बालन के रूप में नई फिल्‍म से चिपका है। अगर आप पुरानी फिल्‍म के रोमांच की उम्‍मीद के साथ ‘कहानी 2’ देखने की योजना बना रहे हैं तो यह जान लें कि यह अलहदा फिल्‍म है। इसमें भी रोमांच,रहस्‍य और विद्या हैं,लेकिन इस फिल्‍म की कहानी बिल्‍कुल अलग है। यह दुर्गा रानी सिंह की कहानी है। दुर्गा रानी सिंह का व्‍याकुल अतीत है। बचपन में किसी रिश्‍तेदार ने उसे ‘यहां-वहां’ छुआ था। उस दर्दनाक अनुभव से वह अभी तक नहीं उबर सकी है,इसलिए उसका रोमांटिक जीवन परेशान…

फिल्‍म समीक्षा : रॉय

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*1/2 डेढ़ स्‍टार
-अजय ब्रह्मात्‍मज  बहुत कम फिल्में ऐसी होती हैं,जो आरंंभ से अंत तक दर्शकों को बांध ही न पाएं। विक्रमजीत सिंह की 'रॉय' ऐसी ही फिल्म है। साधारण फिल्मों में भी कुछ दृश्य, गीत और सिक्वेंस मिल जाते हैं,जिसे दर्शकों का मन बहल जाता है। 'रॉय' लगातार उलझती और उलझाती जाती है। हालांकि इसमें दो पॉपुलर हीरो हैं। रणबीर कपूर और अर्जुन रामपाल का आकर्षण भी काम नहीं आता। ऊपर से डबल रोल में आई जैक्लीन फर्नांडिस डबल बोर करती हैं। आयशा और टीया में बताने पर ही फर्क मालूम होता है या फिर रणबीर और अर्जुन के साथ होने पर पता चलता है कि वे दो हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी 'रॉय' इंडस्ट्री की गॉसिप इमेज ही पेश करती है। फिल्म के एक नायक कबीर ग्रेवाल के 22 संबंध रह चुके हैं। उनके बारे में मशहूर है कि वे अपनी प्रेमिकाओं की हमशक्लों को फिल्मों की हीरोइन बनाते हैं। कुछ सुनी-सुनाई बात लग रही है न ? बहरहाल,'रॉय' कबीर और रॉय की कहानी है। रॉय चोर है और कबीर उसकी चोरी से प्रभावित है। वह उस पर दो फिल्में बना चुका है। तीसरी फिल्म की शूटिंग के लिए मल…

फिल्‍म समीक्षा : डी डे

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-अजय ब्रह्मात्‍मज निखिल आडवाणी की 'डी डे' राष्ट्रीय स्वप्न और भारत का पलटवार के तौर पर प्रचारित की गई है। पड़ोसी देश में छिपे एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी को जिंदा भारत लाने की एक फंतासी रची गई है। इस फंतासी में चार मुख्य किरदार भारतीय हैं। वे पाकिस्तान के कराची शहर से आतंकवादी इकबाल उर्फ गोल्डमैन को भारत लाने में जिंदगी और भावनाओं की बाजी लगा देते हैं। उनकी चाहत, मोहब्बत और हिम्मत पर फख्र होता है, लेकिन फिल्म के अंतिम दृश्यों में इकबाल के संवादों से जाहिर हो जाता है है कि फिल्म के लेखक-निर्देशक की सोच क्या है? फिल्म की शुरुआत शानदार है, लेकिन राजनीतिक समझ नहीं होने से अंत तक आते-आते फिल्म फिस्स हो जाती है। अमेरिकी एंजेंसियों ने मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन को मार गिराया और उसके बाद उस पर एक फिल्म बनी 'जीरो डार्क थर्टी'। भारत के मोस्ट वांटेड का हमें कोई सुराग नहीं मिल पाता, लेकिन हम ने उसे भारत लाने या उस पर पलटवार करने की एक फंतासी बना ली और खुश हो लिए। भारत का मोस्ट वांटेड देश की व‌र्त्तमान हालत पर क्या सोचता है? यह क्लाइमेक्स में सुनाई पड़ता है। निश्चित ही यह …

फिल्‍म समीक्षा : इंकार

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  सुधीर मिश्र ने 'इंकार' में ऑफिस के परिवेश में 'यौन उत्पीड़न' का विषय चुना है। हर दफ्तर में यौन उत्पीड़न के कुछ किस्से होते हैं, जिन्हें आफिस, व्यक्ति या किसी और बदनामी की वजह से दबा दिया जाता है। चूंकि हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं, इसलिए 'यौन उत्पीड़न' के ज्यादातर मामलों में स्त्री शिकार होती है और पुरुष पर इल्जाम लगते हैं। इस पृष्ठभूमि में सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) के राहुल और सोलन (हिमाचल प्रदेश) की माया की मुलाकात होती है। दोनों एक ऐड एजेंसी में काम करते हैं। राहुल ऐड व‌र्ल्ड का विख्यात नाम है। एक इवेंट में हुई मुलाकात नजदीकी में बढ़ती है। प्रतिभाशाली माया को राहुल ग्रुम करता है। अपने अनुभव और ज्ञान से धार देकर वह उसे तीक्ष्ण बना देता है। माया सफलता की सीढि़यां चढ़ती जाती है और फिर ऐसा वक्त आता है, जब वह राहुल के मुकाबले में उसके समकक्ष नजर आती है। काम के सिलसिले में लंबे प्रवास और साथ की वजह से उनके बीच शारीरिक संबंध भी बनता है। सब कुछ तब तक सामान्य तरीके से चलता रहता है, जब तक माया राहुल की सहायिका बनी रहती है। जैसे ही उसे …

फिल्‍म रिव्‍यू : चक्रव्‍यूह

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-अजय ब्रह्मात्मज  पैरेलल सिनेमा से उभरे फिल्मकारों में कुछ चूक गए और कुछ छूट गए। अभी तक सक्रिय चंद फिल्मकारों में एक प्रकाश झा हैं। अपनी दूसरी पारी शुरू करते समय 'बंदिश' और 'मृत्युदंड' से उन्हें ऐसे सबक मिले कि उन्होंने राह बदल ली। सामाजिकता, यथार्थ और मुद्दों से उन्होंने मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने शैली और नैरेटिव में बदलाव किया। अपनी कहानी के लिए उन्होंने लोकप्रिय स्टारों को चुना। अजय देवगन के साथ 'गंगाजल' और 'अपहरण' बनाने तक वे गंभीर समीक्षकों के प्रिय बने रहे, क्योंकि अजय देवगन कथित लोकप्रिय स्टार नहीं थे। फिर आई 'राजनीति.' इसमें रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और कट्रीना कैफ के शामिल होते ही उनके प्रति नजरिया बदला। 'आरक्षण' ने बदले नजरिए को और मजबूत किया। स्वयं प्रकाश झा भी पैरेलल सिनेमा और उसके कथ्य पर बातें करने में अधिक रुचि नहीं लेते। अब आई है 'चक्रव्यूह'। 'चक्रव्यूह' में देश में तेजी से बढ़ रहे अदम्य राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन नक्सलवाद पृष्ठभूमि में है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में कुछ किरदार रचे गए हैं। उन क…

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह

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- दुर्गेश सिंह

निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत:


अभय देओल
मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से अलग हो जात…

हीरोइन की छह तस्‍वीरें

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फिल्‍म समीक्षा : वी आर फैमिली

-अजय ब्रह्मात्‍मज
क्या आप ने स्टेपमॉम देखी है? यह फिल्म 1998 में आई थी। कुछ लोग इसे क्लासिक मानते हैं। 12 सालों के बाद करण जौहर ने इसे हिंदी में वी आर फेमिली नाम से प्रोड्यूस किया है। सौतेली मां नाम रखने से टायटल डाउन मार्केट लगता न? बहरहाल, करण जौहर ने इसे आधिकारिक तौर पर खरीदा और हिंदी में रुपांतरित किया है। इस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता,फिर भी इसे मौलिक नहीं कहा जा सकता। इसका निर्देशन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें काजोल और करीना कपूर सरीखी अभिनेत्रियां हैं और अर्जुन राजपाल जैसे आकर्षक अभिनेता हैं।हिंदी में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जिन में नायिकाएं कहानी की दिशा तय करती हों। वी आर फेमिली का नायक कंफ्यूज पति और प्रेमी है, जो दो औरतों के प्रेम के द्वंद्व में है। साथ ही उसे अपने बच्चों की भी चिंता है। 21 वीं सदी में तीन बच्चों के माता-पिता लगभग 15 सालों की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं। तलाक की खास वजह हमें नहीं बतायी जाती। हमारा परिचय तीनों किरदारों से तब होता है जब तलाकशुदा पति के जीवन में नई लड़की आ चुकी है। पूर्व पत्‍‌नी माया और प्रेमिका श्रेया …