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Friday, September 8, 2017

फिल्‍म समीक्षा : डैडी



फिल्‍म रिव्‍यू
अरुण गवली की जीवनी
डैडी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

विवादों और उनकी वजह से प्रदर्शन के डर से हिंदी में समकालीन घटनाओं और व्‍यक्तियों पर फिल्‍में नहीं बनतीं। इस लिहाज से असीम आहलूवालिया की डैडी साहसिक प्रयास है। असीम ने आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे अरुण गवली के जीवन पर यह फिल्‍म बनाई है। इसे बॉयोपिक विधा की श्रेणी में रखा जा सकता है।
मिल मजदूर के बेटे अरुण गवली का जीवन मुंबई के निम्‍न तबके के नौजवानों की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है। मिलों के बंद होने के बाद ये बेरोजगार नौजवान अपराध की दुनिया में आए। उनमें से हर कोई अरुण गवली की तरह कुख्‍यात अपराधी और बाद में सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिज्ञ नहीं बना,लेकिन कमोबेश सभी की जिंदगी ऐसे ही तबाह रही। असीम आहलूवालिया और अर्जुन रामपाल ने मौजूद तथ्‍यों और साक्ष्‍यों के आधार पर अरुण गवली की जीवनी लिखी है। फिल्‍म अरुण गवली को ग्‍लैमराइज नहीं करती। अपराध की दुनिया में विचरने के बावजूए यह हिंदी की अंडरवर्ल्‍ड फिल्‍मों से अलग है। डैडी के रूप में अरुण गवली हैं। बाकी वास्‍तविक किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं। फिर भी मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड से वाकिफ दर्शक उन्‍हें पहचान सकते हैं। यह फिल्‍म एक प्रकार से मुंबई के अंडरवर्ल्‍ड की दास्‍तान भी है,जिसके केंद्र में अरुण गवली हैं।
असीम आहलूवालिया ने क्‍लोज फ्रेम में सभी किरदारों और उनकी गतिविधियों को रखा है। फिल्‍म की थीम के अनुसार गहरी और मद्धिम रोशनी रखी गई है। शूटिंग की शैली रियलिस्टिक और सामान्‍य जीवन के करीब है। फिल्‍म विवरणात्‍मक है। घटनाओं के उल्‍लेख और फोकस से कई बार यह डाक्‍यूमेंट्री के करीब पहुंच जाती है। क्‍या इसे डाक्‍यूमेंट्री फार्मेट में रखा जाता तो फिल्‍म का प्रभाव कम होता? किरदार इतने घीमे स्‍वर में तेजी से मराठी मिश्रित संवाद बोलते हें। मुंबई के बाहर के आम दर्शकों को उनकी बातें समझने में दिक्‍कत हो सकती है। मुंबई के दगड़ी चाल को क्रिएट करने में तकनीकी टीम सफल रही है। क्‍लोज फ्रेम का फार्मेट फिल्‍म के लिए कारगर साबित हुआ है। अधिकांश किरदारों को अपरिचित अभिनेताओं ने निभाया है,इसलिए वास्‍तविकता और बढ़ गई है।
अर्जुन रामपाल ने अरुण गवली के रूप में ढलने की जीतोड़ सफल कोशिश की है। उन्‍होंने उनके लुक के साथ चाल-ढाल भी अपनायी है। जवान और फिर प्रौढ़ होने पर वे अनुकूल बॉडी लैंग्‍वेज अपनाते हैं। निशिकांत कामथ पुलिस अधिकारी विजयकर की उल्‍लेखनीय भूमिका में जंचे हैं। डैडी की बीवी की भूमिका में ऐश्‍वर्या राजेश ने बराबर साथ निभाया है। अन्‍य कलाकारों का चयन उपयुक्‍त है। वे सभी अपने किरदारों में दिखते हैं।
अरुण गवली की इस जीवनी में दो-तीन चीजें उल्‍लेखनीय हैं। अंडरवर्ल्‍ड के वर्चस्‍व की लड़ाई के दिनों में कभी अरूण गवली को हिंदू डॉन के रूप में प्रचारित किया गया था। उन्‍हें मुस्लिम डॉन दाऊद इब्राहिम के मुकाबले में खड़ा किया गया था। यह राज्‍य व्‍यवस्‍था की हार थी। दूसरे इस फिल्‍म में डैडी एक ऊंची बिल्डिंग से नीचे झांकते हुए बताता है कि हम ने चॉल हटवाए। वहां ये ऊंची बिल्डिंगें आई और उनमें अब नेता और बिजनेसमैन रहते हैं। मुंबई शहर के विकास और स्‍वरूप पर संकेत करते डैडी के इस कथन का मर्म सारगर्भित है। विधान सभा में चुनाव जीत कर आने के बाद भी अन्‍य विधायकों के रवैए से दुखी डैडी कहता है कि जनता ने तो मुझे माफ कर दिया,लेकिन आप सभी मुझे गैंगस्‍टर ही मानते हैं। मैं बदल गया,लेकिन तुम लोग बदलने नहीं देते, डैडी के इस संवाद की गहराई में जाएं तो डैछी का मानवीय दर्द का एहसास होता है।
अवधि-135 मिनट
*** तीन स्‍टार 

Friday, December 2, 2016

फिल्‍म समीक्षा : कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह



फिल्‍म रिव्‍यू
फिसला है रोमांच
कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सुजॉय घोष
चार सालों से ज्‍यादा समय बीत गया। मार्च 2012 में सीमित बजट में सुजॉय घोष ने कहानी निर्देशित की थी। पति की तलाश में कोलकाता में भटकती गर्भवती महिला की रोमांचक कहानी ने दर्शकों को रोमांचित किया था। अभी दिसंबर में सुजॉय घोष की कहानी 2 आई है। इस फिल्‍म का पूरा शीर्षक कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह है। पिछली फिल्‍म की कहानी से इस फिल्‍म को कोई संबंध नहीं है। निर्माता और निर्देशक ने पिछली कहानी की कामयाबी का वर्क कहानी 2 पर डाल दिया है। यह वर्क कोलकाता,सुजॉय घोष और विद्या बालन के रूप में नई फिल्‍म से चिपका है। अगर आप पुरानी फिल्‍म के रोमांच की उम्‍मीद के साथ कहानी 2 देखने की योजना बना रहे हैं तो यह जान लें कि यह अलहदा फिल्‍म है। इसमें भी रोमांच,रहस्‍य और विद्या हैं,लेकिन इस फिल्‍म की कहानी बिल्‍कुल अलग है। यह दुर्गा रानी सिंह की कहानी है।
दुर्गा रानी सिंह का व्‍याकुल अतीत है। बचपन में किसी रिश्‍तेदार ने उसे यहां-वहां छुआ था। उस दर्दनाक अनुभव से वह अभी तक नहीं उबर सकी है,इसलिए उसका रोमांटिक जीवन परेशान हाल है। अचानक छूने भर से वह चौंक जाती है। उसे अपने स्‍कूल में मिनी दिखती है। मिनी के असामान्‍य व्‍यवहार से दुर्गा रानी सिंह को शक-ओ-सुबहा होता है। वह मिनी के करीब आती है। घृणीत भयावह सच जानने के बाद वह मिनी को उसके चाचा और दादी के चुगल से आजाद करना चाहती है। मिनी और दुर्गा की बातचीत और बैठकों से घर की चहारदीवारी में परिवार के अंदर चल रहे बाल यौन शोषण(चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज) की जानकारी मिलती है।
सुजॉय घोष ने अपने लेखकों के साथ मिल कर समाज के एक बड़े मुद्दे को रोमांचक कहानी का हिस्‍सा बना कर चुस्‍त तरीके से पेश किया है। फिल्‍म तेज गति से आगे बढ़ती है। मिनी और दुर्गा के साथ हमारा जुड़ाव हो जाता है। दोनों का समान दर्द सहानुभूति पैदा करता है। भोले चाचा और शालीन दादी से हमें घृणा होती है। लेखक-निर्देशक ने कलिम्‍पोंग की पूष्‍ठभूमि में यहां तक की कहानी से बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कहानी फिसलती है और फिर अनुमानित प्रसंगों और नतीजों की ओर मुड़ जाती है। रोमांच कम होता है,क्‍योंकि यह अंदाजा लग जाता है कि फिल्‍म हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित राजमार्ग पर ही आएगी। इंटरवल के
एक ही औरत की दोहरी भूमिका में विद्या बालन फिर से साबित करती हैं कि वे ऐसी कहानियों और फिल्‍मों के लिए उचित अभिनेत्री हैं। दुर्गा रानी सिंह और विद्या सिन्‍हा के रूप में एक ही औरत के दो व्‍यक्तित्‍वों को उन्‍होने बखूबी समझा और प्रभावशाली तरीके से जीवंत किया है। दोनों की चिंता के केंद्र में मिनी है,लेकिन समय के साथ बदलते दायित्‍व का विद्या बालन अच्‍छी तरह निभाया है। विद्या बालन समर्थ अभिनेत्री हैं। वह चालू किस्‍म की भूमिकाओं में बेअसर रहती हैं,लेकिन लीक से अलग स्‍वतंत्र किरदार निभाने में वह माहिर हैं। कहानी 2 ताजा सबूत है। कामकाजी महिला के मोंटाज में विद्या बालन जंचती हैं। इस बार अर्जुन रामपाल भी किरदार में दिखे। उन्‍होंने इंद्रजीत के रूप में आ‍कर्षित किया। अन्‍य सहयोगी किरदारों में आए स्‍थानीय कलाकारों का योगदान उल्‍लेखनीय है। जुगल हंसराज की स्‍वाभाविकता फिल्‍मी खलनायक बनते ही खत्‍म हो जाती है। लेखक-निर्देशक उनके चरित्र के निर्वाह में चूक गए हैं।   
सुजॉय घोष की फिल्‍मों में कोलकाता सशक्‍त किरदार के रूप में रहता है। इस फिल्‍म में वे कोलकाता की कुछ नई गलियों और स्‍थानों में ले जाते हैं। कहानी 2 में कोलकाता,चंदनपुर और कलिम्‍पोंग का परिवेश कहानी को ठोस आधार देता है। हालांकि मुख्‍य किरदार हिंदी ही बोलते हैं,लेकिन माहौल पूरी तरह से बंगाली रहता है। सहयोगी किरदारों और कानों में आती आवाजों और कोलाहल में स्‍थानीय पुट रहता है। किरदारों के बात-वयवहार में भी बंगाल की छटा रहती है।
फिल्‍म की थीम के मुताबिक सुजॉय घोष ने फिल्‍म का रंग उदास और सलेटी रखा है।
अवधि 130 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, February 13, 2015

फिल्‍म समीक्षा : रॉय

 
*1/2 डेढ़ स्‍टार

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
बहुत कम फिल्में ऐसी होती हैं,जो आरंंभ से अंत तक दर्शकों को बांध ही न पाएं। विक्रमजीत सिंह की 'रॉय' ऐसी ही फिल्म है। साधारण फिल्मों में भी कुछ दृश्य, गीत और सिक्वेंस मिल जाते हैं,जिसे दर्शकों का मन बहल जाता है। 'रॉय' लगातार उलझती और उलझाती जाती है। हालांकि इसमें दो पॉपुलर हीरो हैं। रणबीर कपूर और अर्जुन रामपाल का आकर्षण भी काम नहीं आता। ऊपर से डबल रोल में आई जैक्लीन फर्नांडिस डबल बोर करती हैं। आयशा और टीया में बताने पर ही फर्क मालूम होता है या फिर रणबीर और अर्जुन के साथ होने पर पता चलता है कि वे दो हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी 'रॉय' इंडस्ट्री की गॉसिप इमेज ही पेश करती है। फिल्म के एक नायक कबीर ग्रेवाल के 22 संबंध रह चुके हैं। उनके बारे में मशहूर है कि वे अपनी प्रेमिकाओं की हमशक्लों को फिल्मों की हीरोइन बनाते हैं। कुछ सुनी-सुनाई बात लग रही है न ?
बहरहाल,'रॉय' कबीर और रॉय की कहानी है। रॉय चोर है और कबीर उसकी चोरी से प्रभावित है। वह उस पर दो फिल्में बना चुका है। तीसरी फिल्म की शूटिंग के लिए मलेशिया जाता है। वहीं वह आयशा से टकराता है। आयशा उसकी जिंदगी के साथ फिल्म में भी चली आती है। दूसरी तरफ रॉय भी मलेशिया में है। वह अंतिम चोरी के लिए आया है,जिसके बाद उसे किसी अनजान देश के अनजान शहर में अनजान नाम से जिंदगी जीना है। रॉय और कबीर की इस कहानी में टीया और आयशा की वजह से गड्डमड्ड होती है। जैक्लीन फर्नांडिस दोनों रूपों में एक सी लगती हैं। डबल रोल सभी के वश की बात नहीं होती। खास कर जब हिंदी बोलने और पढऩे नहीं आता हो तो संवाद अदायगी में फर्क कैसे आएगा?
'रॉय' की सबसे कमजोर कड़ी जैक्लीन फर्नांडिस हैं। उन्होंने नाच-गाने में भरपूर ऊर्जा दिखाई है। अभिनय से अभी वह कोसों दूर हैं। अर्जुन रामपाल और रणबीर कपूर समर्थ अभिनेता हैं। निर्देशक ने इस फिल्म में उनके सामथ्र्य का उपयोग गैरजरूरी समझ है। दोनों ने बेपरवाही के साथ काम किया है। अन्य दिक्कते भी हैं। अर्जुंन रामपाल की दाढ़ी चिपकाई हुई दिखती है। रॉय के रूप में रणबीर कपूर भी खोए-खोए से हैं। उनका चरित्र ही वैसा गढ़ा गया है। दोनों एक समय के बाद नीरस और अप्रभावी हो जाते हैं।
फिल्म की थीम के हिसाब से सलेटी रंग चुना गया है,लेकिन वह अधिक काम नहीं आ पाता। निर्देशक और लेखक ने पटकथा पर अधिक मेहनत नहीं की है। कुछ नया करने और दिखाने के चक्कर में फिल्म फिसल गई है। फिल्म के गाने ठीक-ठाक हैं। उनकी लोकप्रियता से कुछ दर्शक भले ही आ जाएं। फिल्म में खामोशी,खामोशी का शोर और खामोशी का जहां जैसे शब्दों का प्रयोग बार-बार हुआ है। फिल्म में एक संवाद है कि जो बात समझ में नहीं आती,वह सुनाई भी नहीं पड़ती। उसी तर्ज पर कहें तो जो दृश्य समझ में नहीं आते, वे दिखाई भी नहीं पड़ते।
अवधि: 147 मिनट


Friday, July 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : डी डे

D Day-अजय ब्रह्मात्‍मज
निखिल आडवाणी की 'डी डे' राष्ट्रीय स्वप्न और भारत का पलटवार के तौर पर प्रचारित की गई है। पड़ोसी देश में छिपे एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी को जिंदा भारत लाने की एक फंतासी रची गई है। इस फंतासी में चार मुख्य किरदार भारतीय हैं। वे पाकिस्तान के कराची शहर से आतंकवादी इकबाल उर्फ गोल्डमैन को भारत लाने में जिंदगी और भावनाओं की बाजी लगा देते हैं। उनकी चाहत, मोहब्बत और हिम्मत पर फख्र होता है, लेकिन फिल्म के अंतिम दृश्यों में इकबाल के संवादों से जाहिर हो जाता है है कि फिल्म के लेखक-निर्देशक की सोच क्या है? फिल्म की शुरुआत शानदार है, लेकिन राजनीतिक समझ नहीं होने से अंत तक आते-आते फिल्म फिस्स हो जाती है।
अमेरिकी एंजेंसियों ने मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन को मार गिराया और उसके बाद उस पर एक फिल्म बनी 'जीरो डार्क थर्टी'। भारत के मोस्ट वांटेड का हमें कोई सुराग नहीं मिल पाता, लेकिन हम ने उसे भारत लाने या उस पर पलटवार करने की एक फंतासी बना ली और खुश हो लिए। भारत का मोस्ट वांटेड देश की व‌र्त्तमान हालत पर क्या सोचता है? यह क्लाइमेक्स में सुनाई पड़ता है। निश्चित ही यह लेखक-निर्देशक ने तय किया है कि इकबाल क्या बोलेगा? बोलते-बोलते वह बरखा, राजदीप और अर्णब जैसे राजनीतिक टीवी पत्रकारों का भी नाम लेता है। यहां आकर पूरी कोशिश हास्यास्पद और लचर हो जाती है। गनीमत है कि वह वहीं रूक गया। वह यह भी कह सकता था कि फिर मुझ पर एक फिल्म बनेगी और सारे फिल्म समीक्षक रिव्यू लिखेंगे।
'डी डे' एक फंतासी है। भारत के मोस्ट वांटेड को पकड़ कर भारत लाने का राष्ट्रीय स्वप्न (?) निर्देशक निखिल आडवाणी ने फिल्म में पूरा कर दिया है। इस मिशन के लिए रॉ की तरफ से चार व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं। चारो लंबे अर्से से कराची में हैं। वे मोस्ट वांटेड को घेरने और करीब पहुंचने की यत्‍‌न में लगे हैं। अखबार की खबरों को थोड़े उलटफेर से दृश्यों और घटनाओं में बदल दिया गया है। उनमें इन चारों व्यक्तियों को समायोजित किया गया है। कैसा संयोग है कि भारतीय रॉ एजेंट विदेशों में सीक्रेट मिशन पर जाते हैं तो पाकिस्तानी लड़कियों से प्रेम करने लगते हैं। यहां तो कथाभूमि ही पाकिस्तान की है। दोनों नायक प्रेम करते हैं। एक का तो पूरा परिवार बस जाता है और दूसरा एक तवायफ से प्रेम करने लगता है। अपने मिशन में भी वे मोहब्बत को नहीं भूलते। मिशन और इमोशन के द्वंद्व में उलझा कर उनसे एक्टिंग करवाई गई है। इरफान, अर्जुन रामपाल, श्रीस्वरा और श्रुति हसन ने लेखक-निर्देशक की दी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। उनके उम्दा अभिनय से ही फिल्म की थीम को नुकसान पहुंचा है, क्योंकि इस स्पाई थ्रिलर में जबरदस्ती रोमांस, कमिटमेंट और प्रेम थोपा गया है। हुमा कुरेशी इसलिए कमजोर पड़ी हैं कि उन्हें इस मिशन में किसी से मोहब्बत करते नहीं दिखाया गया है। उनकी पहले ही शादी करवा इी गई है और बताया गया है कि ड्यूटी की वजह से उनका दांपत्य खतरे में है।
'डी डे' ऐसी उलझनों की वजह से साधारण फिल्म रह गई है। इस साधारण फिल्म में इरफान, अर्जुन रामपाल और अन्य उम्दा कलाकारों की प्रतिभा की फिजूलखर्ची खलती है। सवाल उठता है कि केवल मोस्ट वांटेड को भारत लाने की कहानी दर्शकों को पसंद नहीं आती क्या? लेखक-निर्देशक की दुविधा ही फिल्म को कमजोर करती है।
अवधि-150 मिनट
** 2.5 ढाई स्टार

Friday, January 18, 2013

फिल्‍म समीक्षा : इंकार

inkaar movie review-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सुधीर मिश्र ने 'इंकार' में ऑफिस के परिवेश में 'यौन उत्पीड़न' का विषय चुना है। हर दफ्तर में यौन उत्पीड़न के कुछ किस्से होते हैं, जिन्हें आफिस, व्यक्ति या किसी और बदनामी की वजह से दबा दिया जाता है। चूंकि हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं, इसलिए 'यौन उत्पीड़न' के ज्यादातर मामलों में स्त्री शिकार होती है और पुरुष पर इल्जाम लगते हैं।
इस पृष्ठभूमि में सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) के राहुल और सोलन (हिमाचल प्रदेश) की माया की मुलाकात होती है। दोनों एक ऐड एजेंसी में काम करते हैं। राहुल ऐड व‌र्ल्ड का विख्यात नाम है। एक इवेंट में हुई मुलाकात नजदीकी में बढ़ती है। प्रतिभाशाली माया को राहुल ग्रुम करता है। अपने अनुभव और ज्ञान से धार देकर वह उसे तीक्ष्ण बना देता है। माया सफलता की सीढि़यां चढ़ती जाती है और फिर ऐसा वक्त आता है, जब वह राहुल के मुकाबले में उसके समकक्ष नजर आती है। काम के सिलसिले में लंबे प्रवास और साथ की वजह से उनके बीच शारीरिक संबंध भी बनता है। सब कुछ तब तक सामान्य तरीके से चलता रहता है, जब तक माया राहुल की सहायिका बनी रहती है। जैसे ही उसे अवसर और अधिकार मिलते हैं, राहुल असहज महसूस करने लगता है। दोनों के बीच असहयोग बढ़ता है। तनातनी होती है। अल्फा मेल अपने आसपास अल्फा फीमेल को बर्दाश्त नहीं कर पाता। माया से रहा नहीं जाता और वह राहुल पर 'यौन उत्पीड़न' का आरोप लगा देती है।
फिल्म अंदरूनी कामदार जांच कमिटी की सुनवाई से आरंभ होती है। सुनवाई के दौरान राहुल और माया के बयानों और पक्ष से हमें दोनों की जिंदगी में आई लहरों की जानकारी मिलती है। कामदार सुनवाई में एक बार मानती भी हैं कि दो खूबसूरत लोग लंबे समय तक साथ काम करेंगे तो उनके बीच शारीरिक संबंध बनना अस्वाभाविक नहीं है। जीवन के बदलते मूल्यों ने लव और सेक्स के प्रति अप्रोच बदल दिए हैं। बड़े-छोटे शहरों में सभी संस्थानों में ऐसे संबंध बनते हैं। मीडिया,्र फिल्म, फैशन और ऐड व‌र्ल्ड में खुलापन ज्यादा है तो ऐसे संबंधों की तादाद ज्यादा होती है। कोई परवाह नहीं करता और न ही कोई बिसूरता है। मानवीय संबंधों में उत्तर आधुनिकता की वजह से आए इस प्रभाव के बावजूद भारत में देखा जाता है कि अधिकांश मामलों में ऐसे संबंध भावनात्मक हो जाते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों ही इसे दिल पर ले लेते हैं।
'इंकार' की यही कहानी स्त्री-पुरुष के बजाए दो पुरुषों की होती है तो इसे ईष्र्या और द्वेष का नाम दिया जाता। चूंकि इस कहानी में एक स्त्री और दूसरा पुरुष है और दोनों के बीच भावनात्मक शारीरिक संबंध भी बने हैं। इसलिए व्यक्तिगत द्वेष 'यौन उत्पीड़न' का टर्न ले लेता है। करिअर में राहुल और माया के आमने-सामने आने के पहले सब कुछ सहज और स्वाभाविक है। राहुल का पुरुष अहंमाया की तरक्की और समकक्षता बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह कठोर और रूखा होता है तो माया बिफर जाती है। 'यौन उत्पीड़न' का आरोप फिल्म में बदले की एक चाल के रूप में आता है। सतह पर बिगड़े संबंधों के नीचे राहुल और माया की भावनात्मक संवेदना की धारा है। राहुल आखिरकार भारतीय पुरुष है। उसकी एक ही चिंता है कि माया ने जॉन के साथ क्या किया? क्या किया से उसका तात्पर्य सिर्फ इतना है कि वह उसके साथ सोई तो नहीं थी? दूसरी तरफ भारतीय नारी माया जॉन के करीब आने के बाद साथ सोने से मु•र जाती है। अंतिम दृश्यों में आकर 'इंकार' साधारण और चालू फिल्म बन जाती है।
अर्जुन रामपाल और चित्रांगदा सिंह ने अपने किरदारों को सही तरीके से पर्दे पर उतारा है। चित्रांगदा सिंह कभी भूमिका को लेखक-निर्देशक का समर्थन मिला है। छोटी भूमिका में होने के बावजूद गुप्ताजी (विपिन शर्मा) की मारक टिप्पणियां याद रह जाती हैं।
सुधीर मिश्र अगर बोल्ड कल्पना करते और माया के साथ जाते तो 'इंकार' 21वीं सदी में महेश भट्ट की 'अर्थ' के समान एक प्रोग्रेसिव फिल्म हो जाती। अफसोस एक अच्छी सोच और कोशिश अपने निष्कर्ष में प्रभावहीन हो गई। 
अवधि-131 मिनट
*** तीन स्टार

Thursday, October 25, 2012

फिल्‍म रिव्‍यू : चक्रव्‍यूह

Really hit the character Chakravyuh-अजय ब्रह्मात्मज
 पैरेलल सिनेमा से उभरे फिल्मकारों में कुछ चूक गए और कुछ छूट गए। अभी तक सक्रिय चंद फिल्मकारों में एक प्रकाश झा हैं। अपनी दूसरी पारी शुरू करते समय 'बंदिश' और 'मृत्युदंड' से उन्हें ऐसे सबक मिले कि उन्होंने राह बदल ली। सामाजिकता, यथार्थ और मुद्दों से उन्होंने मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने शैली और नैरेटिव में बदलाव किया। अपनी कहानी के लिए उन्होंने लोकप्रिय स्टारों को चुना। अजय देवगन के साथ 'गंगाजल' और 'अपहरण' बनाने तक वे गंभीर समीक्षकों के प्रिय बने रहे, क्योंकि अजय देवगन कथित लोकप्रिय स्टार नहीं थे। फिर आई 'राजनीति.' इसमें रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और कट्रीना कैफ के शामिल होते ही उनके प्रति नजरिया बदला। 'आरक्षण' ने बदले नजरिए को और मजबूत किया। स्वयं प्रकाश झा भी पैरेलल सिनेमा और उसके कथ्य पर बातें करने में अधिक रुचि नहीं लेते। अब आई है 'चक्रव्यूह'।
'चक्रव्यूह' में देश में तेजी से बढ़ रहे अदम्य राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन नक्सलवाद पृष्ठभूमि में है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में कुछ किरदार रचे गए हैं। उन किरदारों को पर्दे पर अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपेयी, अभय देओल, ईशा गुप्ता, अंजलि पाटिल और ओम पुरी ने निभाया है। किरदारों के दो समूह हैं। नक्सल किरदारों में राजन [मनोज बाजपेयी], गोविंद सूर्यवंशी [ओम पुरी] और जूही [अंजलि पाटिल] हैं। दूसरी तरफ आदिल खान [अर्जुन रामपाल] और रिया मेनन [ईशा गुप्ता] हैं। इन दोनों के बीच कबीर उर्फ आजाद [अभय देओल] हैं। 'चक्रव्यूह' को देखने और समझने की एक कुंजी अभय देओल हैं। उन्हें आदिल खान अपने एजेंट के तौर पर नक्सलों के बीच भेजते हैं। शुरू में कबीर उनकी मदद भी करते हैं, लेकिन नक्सलों के साथ दिन-रात बिताने के बाद उन्हें एहसास होता है कि सत्ता के घिनौने स्वार्थ हैं। उसके हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं। आदिवासियों पर सचमुच अत्याचार और जुल्म हो रहे हैं। 'महानता' कंपनी स्थापित करने के पीछ सिर्फ विकास का ध्येय नहीं है। कबीर पाला पलटता है और इसके बाद 'चक्रव्यूह' रोमांचक हो जाती है। हिंदी फिल्मों के दो दोस्तों की कहानी। पॉपुलर सिनेमा में अंतर्निहित मनोरंजन का दबाव गंभीर और वैचारिक विषयों में भी विमर्श की गुंजाइश नहीं देता। किरदारों की मुठभेड़ और घटनाओं में विषय का रूपांतरण हो जाता है। मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है और फिल्म कुछ व्यक्तियों इंडिविजुल की कहानी होकर आम हो जाती है। मुमकिन है कि अधिकांश दर्शकों तक पहुंचने का यह आसान तरीका हो, लेकिन जब मुद्दा ही किसी फिल्मी हीरोइन की तरह असहाय हो जाए तो हम मुठभेड़ में भिड़े किरदारों से परिचालित होने लगते हैं। जब चरित्र और पटकथा का निर्वाह घिसे-पिटे फॉर्मूले में घुसता है तो हमें दशकों से चले आ रहे 'आस्तिन का सांप' और 'क्या पता था कि जिसे दूध पिलाया, वही सांप मुझे डंसेगा'..जैसे संवाद सुनाई पड़ते हैं। ऐसा लगने लगता है कि कथ्य कहीं पीछे छूट गया और मनोरंजन हावी हो गया।
यह समय का दबाव हो सकता है। समर्पित और प्रतिबद्ध फिल्मकार से उम्मीद रहती है कि वह ऐसे दबावों के बीच ही कोई नई राह या शैली विकसित करेगा। प्रकाश झा नई राह और शैली की खोज में दिखाई पड़ते हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के आगे घुटने टेक दिए हैं। उन्होंने फार्मूले का इस्तेमाल अपनी तरह की फिल्मों के लिए किया है। इस कोशिश में उन्होंने सिनेमा की नई भाषा रची है। उनकी फिल्में इंगेज करती हैं कि हमारे समय की किसी मुद्दे से रू-ब-रू कराती हैं। सिनेमा के आज के लोकप्रिय दौर में यह कोशिश भी उल्लेखनीय है।
मनोज बाजपेयी एक बार फिर साबित करते हैं कि वे समकालीन अभिनेताओं में सबसे उम्दा और योग्य हैं। सघन चरित्र मिलें तो वे उनकी प्रतिभा खिल उठती है। अभय देओल को मिली भूमिका को लेखक और निर्देशक का पूरा सपोर्ट है, लेकिन इस बार वे चूकते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी के लिए वे सक्षम नहीं हैं। अर्जुन रामपाल सामान्य है। ईशा गुप्ता आरंभिक लड़खड़ाहट के बाद संभल जाती हैं। कामकाजी और और गृहिणी की दोहरी सोच से बने अपने किरदार के साथ उन्होंने न्याय किया है। फिल्म में अंजलि पाटिल चकित करती हैं। उनमें इंटेनसिटी और एक्सप्रेशन है। जूही के किरदार को वह विश्वसनीय बनाती हैं। प्रकाश झा की फिल्मों में सहयोगी कलाकारों की भूमिका भी उल्लेखनीय होती है। मुकेश तिवारी, चेतन पंडित, मुरली शर्मा, दयाराम पांडे आदि ने सशक्त सहयोग किया है।
प्रकाश झा की 'चक्रव्यूह' बेहतरीन फिल्म है। समकालीन समाज के कठोर सच को सच्चाई के साथ पेश करती है। साथ ही सावधान भी करती है कि अगर समय रहते निदान नहीं खोजा गया तो देश के 200 जिलों में फैला नक्सलवाद भविष्य में पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगा। राजनीतिक भटकाव के शिकार नहीं हैं नक्सली.. दरअसल, असमान विकास में पीछे छूट गए देशवासियों की जमात और आवाज हैं नक्सल, जो हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
**** [चार स्टार]

Saturday, September 22, 2012

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह

- दुर्गेश सिंह


निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत:


अभय देओल
मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से अलग हो जाते हैं। मैंने और प्रकाश जी ने बैठकर रीडिंग और डिस्कशन किए। प्रकाश जी की खासियत है कि आप किरदार के बारे में इनकी स्क्रिप्ट पढक़र जान जाते हैं। मसलन नक्सल विचारधारा और सोनी सोरी के बारे में फिल्म की स्क्रिप्ट पढऩे के बाद ही मुझे पता चला।

प्रकाश झा- मैं एक ऐसे राज्य से संबंध रखता हूं जहां के लोगों के लिए यह विचारधारा और इससे जुड़ा आंदोलन नई बात नहीं है। इस आंदोलन से जुड़े लोंगों से मेरी मुलाकात काफी पहले से होती रही है। बिहार और झारखंड में जहां-जहां नक्सल गतिविधियां है उसके बारे में मुझे पता है। 2003 में जब अंजुम रजबअली ने मुझे यह कहानी सुनाई तो मुझे लगा था कि इस पर बिना रिसर्च के फिल्म नहीं बन सकती है। यह कहानी दो ऐसे दोस्तों की कहानी है, जो समान सोच रखते हंै। एक पुलिस अधिकारी है जबकि दूसरा कानून की रेखा के दूसरी ओर जाकर नक्सली बन जाता है। फिल्म में समाज और उसकी व्यवस्था से जुड़े कई सवाल हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दंगे। साठ साल की आजादी के बाद अब जब लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं तो इस तरह के संकेत खतरनाक है।

अर्जुन रामपाल
मैं हिंदू कालेज से पढ़ा हूं, मैंने अपने कई दोस्तों को इस विचारधारा का सपोर्ट करते हुए देखा है। मुंबई आने के बाद मैं कॉमर्शियल सिनेमा करता रहा और महानगर में रहने की वजह से मुझे इतनी जानकारी नहीं थी कि नक्सल क्या होते हैं और क्या करते हैं लेकिन मुझे पता चल गया। दर्शक को भी इस फिल्म के बाद पता चल जाएगा। प्रकाश जी के साथ काम करके एक ट्यूनिंग बन गई है। राजनीति प्रकाश छह साल पहले बनाना चाहते थे लेकिन उसमें देर हुई। छह साल पहले ही वो पृथ्वी के किरदार के लिए मेरे पास आए थे। जब फिल्म बनने लगी तो भी वो किरदार उन्होंने मुझे फिर से इस फिल्म का ऑफर दिया। एक निर्देशक का उम्र के इस पड़ाव में डेडिकेशन देखते बनता है। उनकी स्तर की रिसर्च करने वाले बहुत ही कम निर्देशक हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में। मुझे और अभय को तो उन्होंने कई बाद ऐसी स्थिति में डाल दिया कि अरे यार अब यह कैसे होगा?

मनोज बाजपेयी
मैंने तो इस विचारधारा के साथ जीवन के कई साल बिताए हैं। मेरे लिए नक्सली का किरदार निभाना बहुत मुश्किल नहीं रहा। किरदार का लुक कैसा होगा? किरदार कैसे बोलेगा, हां इस पर जरूर थोड़ी बात हुई। बाकी प्रकाश झा के साथ काम करके अच्छा लगता है। अपने गांव- देश के हैं और दूसरी चीजों को लेकर उनकी समझ एकदम स्पष्ट है। इस मसले पर किसी भी तरह का स्टैंड लेना गलत होगा। जिसकी जमीन छीनी जा रही है, वह अपने हक के लिए लड़ेगा ही जबकि राज्य सत्ता के विरूद्ध जाना प्रजातंत्र के खिलाफ जाना है। हमें इस मसले पर बीच का रास्ता निकालना होगा अन्यथा स्थितियां विकट होती जाएंगी।

प्रकाश झा
फिल्म का काम है समस्या को उजागर करना न कि समाधान बताना। कोई फिल्मकार समाधान कैसे बता सकता है। वह भी एक ऐसी समस्या का जिसकी चपेट में देश के 250 जिले आते हों। शहरों में बैठकर हमें समस्या जितनी सरल लगती है उतनी सरल है नहीं। आजादी के बाद जो कुछ भी हुआ है इस देश में वह लगभग गलत हुआ है। आज साठ साल की आजादी के बाद हम लोकतंत्र पर सवाल उठा ही चुके हैं। पिछले सात-आठ सालों में जितना घूमता रहा हूं उतना ही रिसर्च किया है। गडचिरोली से लेकर बालाघाट तक और झारखंड के इलाकों में उसको देखकर लगता है समस्या इतना सरल नहीं है। मैंने जमीनी रिसर्च को ही कहानी में पिरोने की कोशिश की है। मसलन, नक्सलों की सबसे बड़ी आमदनी वसूली से आती है, पुलिस के फेक इनकाउंटर से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के सलवा जुडूम के गठन तक की कहानी फिल्म की मूल कहानी को कहीं न कहीं इंस्पायर तो करती ही हैं। साथ ही इस फिल्म में गरीब और अमीर के बीच बढ़ती जा रही खाई की वजह से जो हिंसक विचारधारा पनप रही है उसकी भी बात की गई है।

अभय देओल
मुझे लगता है कि यही पटकथा की खासियत है जो प्रकाश जी ने दो दोस्तों के माध्यम से कहने की कोशिश की है। दो दोस्तों की कहानी है जो विचारधारा अलग होने की वजह  से अलग हो जाते हैं और फिर जब उनमें दुश्मनी होती है तो वे कैसे एक दूसरे से पेश आते हैं। दो लाइन में कहूं तो यही फिल्म की कहानी है। नक्सल विचारधारा के साथ् कहानी को कैसे गूंथा जाए, ये प्रकाश जी का कमाल है। वो अपनी फिल्मों का अंत दर्शकों के ऊपर छोड़ देते हैं। एक निर्देशक के तौर पर उन्हें पता है कि क्या गलत है और क्या सही है लेकिन दर्शकों के सामने उनकी किसी भी फिल्म का एक अंत नहीं होता। यह दर्शकों पर होता है कि उन्हें इस फिल्म से क्या सीख लेनी है।

अर्जुन रामपाल
फिल्म में मेरा एक संवाद है कि देश को सीमा पार के दुश्मनों से उतना खतरा नहीं है जितना अंदर बैठे दुश्मनों से है। एक आईपीएस अधिकारी अधिकारी का किरदार निभाने के दौरान मुझे पता लगा कि किसी भी पुलिस अधिकारी को काम करने में कितनी मुश्किल होती होगी। इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पूरे देश को पता है कि सिस्टम फेल हो रहा है तो क्या सिस्टम को सुधारा ही नहीं जा सकता। करप्शन से पूरा देश परेशान है लेकिन उसका समाधान कैसे होगा? एक लडक़ा अपना हक पाने के लिए नक्सली बनता है लेकिन उसकी विचारधारा की आड़ में भी करप्शन पनप रहा है। ऐसे कई मुद्दे इस फिल्म के माध्यम से उठाए गए हैं। दर्शकों के लिए यह फिल्म एक सीख के तौर पर भी है कि एक फिल्म की कहानी के जरिए देश में घटित हो रही चीजों की भी जानकारी आपको मिल रही है।


प्रकाश झा
लोग कहते हैं कि राजनीति के बाद से मैंने फिल्मों में स्टैंड लेना बंद कर दिया है। मैंने अपनी किसी फिल्म में कभी कोई स्टैंड नहीं लिया है। मैंने अपनी हर  फिल्म में किरदारों या कहानी के जरिए तथ्यों को पेश किया है। मृत्युदंड का उदाहरण लें तो पाएंगे कि तीन औरतें आर्थिक उदारीकरण और मंडल कमीशन के बाद के दौर में जूझ रही हैं लेकिन मैंने वहां भी नहीं बताया कि मंडल कमीशन गलत है या सही या फिर आर्थिक उदारीकरण गलत है या सही। मुझे कहानी के माध्यम से जो समीकरण सही लगता है वही दर्शकों के सामने पेश करता हूं। मैंने आज तक कभी कोई स्टैंड नहीं लिया यहां तक कि दामुल में भी मैंने दर्शकों के सामने स्पष्ट तौर पर कोई निर्णय दिया।

मनोज वाजपेयी
हमारे मुल्क में इतनी विविधताएं हैं और अलग-अलग विचारधाराओं के लोग हैं। आप एक विवादित मसले पर अपना फैसला किसी फिल्म के जरिए नहीं सुना सकते हैं। जिस नक्सल कमांडर का किरदार मैं निभा रहा हूं वह एकबारगी आपको देश के कई नक्सल कमांडरों का मिक्स वर्जन लगेगा लेकिन इसका किरदार ही ऐसा है कि आप किसी एक नाम नक्सल कमांडर से इसको कनेक्ट न कर सकें। हमारे देश में इतने पढ़े- लिखे लोग हैं कि न जाने किसकी विचारधारा कहां से आहत हो जाए? सिनेमा के जरिए स्टैंड लेना मुझे नहीं लगता कि उचित है।


Friday, September 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वी आर फैमिली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

क्या आप ने स्टेपमॉम देखी है? यह फिल्म 1998 में आई थी। कुछ लोग इसे क्लासिक मानते हैं। 12 सालों के बाद करण जौहर ने इसे हिंदी में वी आर फेमिली नाम से प्रोड्यूस किया है। सौतेली मां नाम रखने से टायटल डाउन मार्केट लगता न? बहरहाल, करण जौहर ने इसे आधिकारिक तौर पर खरीदा और हिंदी में रुपांतरित किया है। इस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता,फिर भी इसे मौलिक नहीं कहा जा सकता। इसका निर्देशन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें काजोल और करीना कपूर सरीखी अभिनेत्रियां हैं और अर्जुन राजपाल जैसे आकर्षक अभिनेता हैं।

हिंदी में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जिन में नायिकाएं कहानी की दिशा तय करती हों। वी आर फेमिली का नायक कंफ्यूज पति और प्रेमी है, जो दो औरतों के प्रेम के द्वंद्व में है। साथ ही उसे अपने बच्चों की भी चिंता है। 21 वीं सदी में तीन बच्चों के माता-पिता लगभग 15 सालों की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं। तलाक की खास वजह हमें नहीं बतायी जाती। हमारा परिचय तीनों किरदारों से तब होता है जब तलाकशुदा पति के जीवन में नई लड़की आ चुकी है। पूर्व पत्‍‌नी माया और प्रेमिका श्रेया की आरंभिक भिड़ंत के बाद ही पता चल जाता है कि माया कैंसर से पीडि़त है और उसकी जिंदगी अब चंद दिनों के लिए बची है। सालों को लमहों में जीने की डॉक्टर की सलाह के बाद माया चाहती है कि श्रेया उसके परिवार में आ जाए और बच्चों की जिम्मेदारी संभाल ले। सब कुछ इतना भावुक,अश्रुपूर्ण और मैलोड्रामैटिक हो जाता है कि उनकी परेशानियों से कोफ्त होने लगती है। सुबकते-रोते हुए फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी।

करण जौहर ब्रांड की फिल्में विभ्रम का सृजन करती है। इस फिल्म की कथा भूमि विदेश की है। नाते-रिश्ते और स्त्री-पुरुष संबंध के पहलू विदेशी हैं। भारत के चंद महानगरों में विवाह की ऐसी समस्याओं से दंपति जूझ रहे होंगे, लेकिन मूल रूप से विदेशी चरित्रों और स्थितियों को लेकर बनी यह फिल्म अपने आसपास की लगने लगती है, क्योंकि इसमें हमारे परिचित कलाकार हैं। वे हिंदी बोलते हैं। वी आर फेमिली भारतीय कहानी नहीं है। यह थोपी हुई है। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर विदेशियों को पीछे खड़ा कर विदेशों में फिल्मांकित इन फिल्मों से करण लगातार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को मनोरंजन के विभ्रम में रखने में सफल हो रहे हैं। ंिहंदी सिनेमा के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

दो अभिनेता या अभिनेत्री एक साथ फिल्म में आ रहे हों तो दर्शक उनके टक्कर से मनोरंजन की उम्मीद रखते हैं। काजोल और करीना कपूर के प्रशंसक इस लिहाज से निराश होंगे, क्योंकि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच संतुलन बना कर रखा है। काजोल और करीना कपूर दक्ष अभिनेत्रियां हैं। दोनों अपने किरदारों को सही ढंग से निभा ले गई हैं। अर्जुन रामपाल को सिर्फ आकर्षक लगना था। शंकर उहसान लॉय का संगीत अब सुना-सुना सा लगने लगा है।

** दो स्टार