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नमक आंखों में होना चाहिए: विद्या बालन

साड़ी में लिपटी विद्या बालन को देखकर उनके आलोचक अक्सर बगलें झांकने लगते हैं। पारंपरिक भारतीय परिधान साड़ी में विद्या जितनी खूबसूरत और सहज दिखती हैं, उतनी शायद ही कोई अन्य अभिनेत्री दिखती हो। नए जमाने की अभिनेत्रियां साड़ी में असहज और बनावटी लगती हैं। उनकी चाल बिगड़ जाती है। विद्या कहती हैं, नमक-मिर्च आंखों में होनी चाहिए, कपड़ों में नहीं। कपड़ों में हया हो तो ज्यादा अच्छा है। साड़ी में हया है, नजाकत है। मुझे नहीं लगता कि साड़ी से ज्यादा सेक्सी कोई ड्रेस है। शबाना जी, रेखा जी, महारानी गायत्री देवी की खूबसूरती में उनकी साडि़यां चार-चांद लगाती हैं।.और हां, स्मिता पाटिल कितनी अच्छी लगती थीं साड़ी में। हल्के बॉर्डर वाली सिंपल साड़ी में कितनी एट्रेक्टिव दिखती थीं वे। एक्चुअली पा में मेरा लुकस्मिता पाटिल के लुक से ही प्रभावित है। पा में विद्या इंडो-वेस्टर्न लुक में भी दर्शकों के सामने होंगी। विद्या बताती हैं, डिफरेंट-सा लुक है। चूंकि,पा में मैं गायकोनॉलिजिस्ट की भूमिका में भी हू, इसलिए मेरे लुक में सिंप्लिसिटी है। लेडी डॉक्टर भड़काऊ कपड़े नहीं पहनतीं। हाई हील वाली चप्पलें नहीं पहनतीं।

फिल्‍म समीक्षा : पा

-अजय ब्रह्मात्‍मज आर बाल्की ने निश्चित ही निजी मुलाकातों में अमिताभ बच्चन के अंदर मौजूद बच्चे को महसूस करने के बाद ही पा की कल्पना की होगी। यह एक बुजुर्ग अभिनेता के अंदर जिंदा बच्चे की बानगी है। अमिताभ बच्चन की सुपरिचित छवि को उन्होंने मेकअप से हटा दिया है। फिल्म देखते समय हम वृद्ध शरीर के बच्चे को देखते हैं, जो हर तरह से तेरह साल की उम्र का है। पा हिंदी फिल्मों में इन दिनों चल रहे प्रयोग में सफल कोशिश है। एकदम नयी कहानी है और उसे सभी कलाकारों ने पूरी संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। फिल्म थोड़ी देर के लिए ऑरो की मां की जिंदगी में लौटती है और उतने ही समय के लिए पिता की जिंदगी में भी झांकती है। फिल्म की स्क्रिप्ट केलिए आवश्यक इन प्रसंगों के अलावा कहानी पूरी तरह से ऑरो पर केंद्रित रहती है। ऑरो प्रोजेरिया बीमारी से ग्रस्त बालक है, लेकिन फिल्म में उसके प्रति करुणा या दुख का भाव नहीं रखा गया है। ऑरो अपनी उम्र के किसी सामान्य बच्चे की तरह है। मां, नानी, दोस्त और स्कूल केइर्द-गिर्द सिमटी उसकी जिंदगी में खुशी, खेल और मासूमियत है। स्कूल में आयोजित एक प्रतियोगिता का पुरस्कार लेने