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Tuesday, December 31, 2019

सिनेमालोक : विदा 2019


सिनेमालोक
विदा 2019
अजय ब्रह्मात्मज
2019 का आखिरी दिन है आज. पिछले हफ्ते रिलीज हुई राज मेहता की फिल्म ‘गुड न्यूज़’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को कामयाबी का शुभ समाचार दे गई. अक्षय कुमार. करीना कपूर खान. दिलजीत दोसांझ और कियारा आडवाणी की यह फिल्म पहले वीकेंड में 60 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर चुकी है. जाहिर सी बात है कि अक्षय कुमार की फिल्म 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगी.’केसरी’, ‘मिशन मंगल’. ‘हाउसफुल 4’ और ‘गुड न्यूज़’ की भरपूर कमाई से अक्षय कुमार सफल सितारों की अगली कतार में सबसे आगे खड़े हैं. उन्हें रितिक रोशन की वाजिब मुकाबला दे रहे हैं. ‘सुपर 30’ और ‘वॉर’ की कामयाबी ने उन्हें अगली कतार में ला दिया है. कुछ और सितारे भी जगमगाते रहे कुछ की चमक बढ़ी और कुछ की धीमी पड़ी. बकामयाबी के दूसरे छोर पर आयुष्मान खुराना भी तीन फिल्मों की सफलता के साथ मुस्कुरा रहे हैं. इन दोनों छोरों के बीच कार्तिक आर्यन हैं, जो धीमे से अपनी धमक बढ़ाने में आगे रहे. कामयाब रणवीर सिंह भी रहे.
अभिनेत्रियों की बात करें तो तापसी पन्नू और भूमि पेडणेकर के लिए 2019 विविधता लेकर आया. दोनों अभिनेत्रियों ने बढ़त हासिल की और जाहिर किया कि वे हर तरह की भूमिकाओं में सक्षम हैं. दोनों कंगना रनोट के साथ अगली कतार में हैं. कंगना रनोट ‘मणिकर्णिका’ और ‘जजमेंटल है क्या’ से साबित करती हैं कि वह इस दौर की समर्थ अभिनेत्री हैं. पिछले साल की चर्चित और कामयाब अभिनेत्रियां इस साल कम रिलीज और गौण भूमिकाओं की वजह से अगली कतार से खिसक गयीं. कियारा आडवाणी की फिल्में कामयाब रहीं, लेकिन फिल्मों की सफलता का सेहरा अभिनेताओं को मिला. कियारा आडवाणी का हाल कहीं सोनाक्षी सिन्हा सरीखा ना हो जाए जो तमाम बेहतर कमाई की फिल्मों की नायिका तो रहीं लेकिन उनके हिस्से कामयाबी नहीं आई.
अभिनेता-अभिनेत्रियों के उल्लेख के बाद 10 सफल फिल्मों की सूची कलेक्शन के हिसाब से बनाएं तो रितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ की सिद्धार्थ आनंद की ‘वॉर’ सबसे आगे रही है. उससे यशराज फिल्म्स को निश्चित ही बड़ी राहत और ताकत मिली है. दूसरे नंबर की कामयाब फिल्म ‘कबीर सिंह’ है. ‘कबीर सिंह’ की लोकप्रियता बताती है कि हिंदी फिल्मों के दर्शक किस प्रकार के नायक से अभिभूत होते हैं. बाकी सात फिल्मों में ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘भारत’. ‘मिशन मंगल’, ‘हाउसफुल 4’, गली ब्वॉय’, ‘टोटल धमाल’, ‘छिछोरे’ और ‘सुपर 30’ हैं. इन फिल्मों से आम दर्शकों की पसंद की जानकारी मिलती है. ‘टोटल धमाल’ और ‘हाउसफुल 4’ की जबरदस्त कामयाबी सुधि समीक्षकों को चौकाती है, लेकिन इस सच्चाई से कैसे इनकार किया जा सकता है कि आम दर्शक ऐसी फिल्मों में भी रुचि लेता है. वह सीमित संख्या में ‘आर्टिकल 15’. सेक्शन 375 और ‘सोनी’ जैसी फिल्में भी पसंद करता है ,लेकिन उन्हें सिर-माथे पर नहीं उठाता.
2019 के अपनी पसंद के सार्थक फिल्मों की बात करूं तो उनमें कुछ ऐसी फिल्में होंगी जो दर्शकों तक ढंग से पहुंची नहीं सकीं. उनका हश्र अफसोसनाक है. फिल्मों की वितरण प्रणाली की पेंच में ये फ़िल्में उलझ गयीं. उन्हें बॉक्स ऑफिस पर पर्याप्त समय और ध्यान नहीं मिला, जिसकी वजह से उनकी उड़ान संतोषजनक नहीं दिखती. इस संदर्भ में इवान आयर की ‘सोनी’ और जैगम इमाम की ‘नक्काश’ का विशेष उल्लेख जरूरी होगा. दोनों ही फिल्में कंटेंट और परफॉर्मेंस के लिहाज से आला दर्जे की हैं. समय के साथ दोनों की दर्शकता बढ़ेगी. उनका जिक्र होता रहेगा. ‘आर्टिकल 15 दर्शकों और समीक्षकों की पसंद बनी. ‘गोन केश’, ‘मर्द को दर्द नहीं होता’.’सोनचिरिया’, ‘द स्काई इज पिंक’, ‘हामिद’ और ‘बोम्बरिया’ जैसी फिल्मों ने भी दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान खींचा. ये फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए.
और अंत में ‘पानीपत’ का उल्लेख करूंगा. आशुतोष गोवारिकर की ऐतिहासिक फिल्म अर्जुन कपूर की अपकीर्ति की शिकार हुई. इस फिल्म को न तो दर्शक मिले और ना ही समीक्षक, जबकि पूर्वाग्रहों से परे होकर देखें तो आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘राष्ट्रवाद’ की चपेट में आने से बची. फिल्म में इतिहास को सम्यक नजरिए से पेश किया गया. अभी चल रही भगवा लहर के ‘राष्ट्रवाद’ से अनेक फिल्में प्रभावित दिखीं, जिनमें बेवजह ‘देशभक्ति का उद्घोष’ सुनाई पड़ता रहा. कुल मिला कर यह साल मिश्रित संतोष ही दे सका.


Tuesday, December 24, 2019

सिनेमालोक : फाल्के पुरस्कार और अमिताभ बच्चन


सिनेमालोक
फाल्के पुरस्कार और अमिताभ बच्चन
-अजय ब्रह्मात्मज
कल दिल्ली में 2018 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरित किए गए. विभिन्न श्रेणियों में देश की सभी भाषाओं की प्रतिभाओं को सम्मानित करने का यह समारोह पुरस्कार प्रतिष्ठा और प्रभाव के लिहाज से देश में सर्वश्रेष्ठ है. इन दिनों अनेक मीडिया घरानों और संस्थानों द्वारा हिंदी समेत तमाम भाषाओं में फिल्म पुरस्कार दिए जा रहे हैं. इन पुरस्कारों की भीड़ में यह अकेला अखिल भारतीय फिल्म पुरस्कार है, जिसमें देश की सभी भाषाओं के बीच से प्रतिभाएं चुनी जाती हैं. निश्चित ही इस पुरस्कार का विशेष महत्व है. फीचरफिल्म, गैरफीचर फिल्म और फिल्म लेखन की तीन मुख्य श्रेणियों में ये पुरस्कार दिए जाते हैं. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के साथ ही दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी दिया जाता है. यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के विकास और संवर्धन में अप्रतिम योगदान के लिए किसी एक फिल्मी व्यक्तित्व को सौंपा जाता है. इस साल यह पुरस्कार अमिताभ बच्चन को दिया गया है
पुरस्कार की पूर्व संध्या को अमिताभ बच्चन ने ट्वीट कर अपने प्रशंसकों को सूचना दी... वह बुखार में हैं. उन्हें यात्रा करने से मना किया गया है, इसलिए दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय पुरस्कार में वे शामिल नहीं हो सकेंगे... दुर्भाग्य है मेरा... अफसोस.’ अमिताभ बच्चन इस खास अवसर पर समारोह में उपस्थित नहीं हो सके. उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू ने उनके सम्मान में कहा कि अमिताभ बच्चन स्वयं में एक संस्थान हैं. पिछले पांच दशकों से वे देश-विदेश के दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं. उन्होंने एंग्री यंग मैन से लेकर वृद्ध पिता तक की अपनी भूमिकाओं से पूरे देश की फिल्म इंडस्ट्री को प्रेरित किया है. उन्होंने पूरे मिशन और पैशन के साथ यह सब किया है.
66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के अंतर्गत 50वें दादा साहब फाल्के पुसे सम्मानित अमिताभ बच्चन की फ़िल्मी सक्रियता का भी यह पचासवां साल है. अमिताभ बच्चन ने 1969 में ‘सात हिंदुस्तानी’ से फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी. मशहूर  निर्देशक ख्वाजा मतलब अब्बास ने उन्हें पहला मौका दिया था. उनकी आखिरी रिलीज फिल्म ‘बदला’ है, जिसे सुजॉय घोष ने निर्देशित किया है. अभिनय के साथ अमिताभ बच्चन ने कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया है. टीवी पर जारी उनका शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ भारतीय परिदृश्य में एक अनोखा और लोकप्रिय शो है. 77 साल के हो चुके अमिताभ बच्चन की निरंतर सक्रियता चकित करती है. अच्छी बात है कि उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से भूमिकाएं मिल रही हैं. लेखक उनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए स्क्रिप्ट लिखते हैं और निर्देशक हर फिल्म में उनकी प्रतिभा के नए आयाम उद्घाटित करते हैं. वे देश के अनोखे और अलहदा अभिनेता हैं, जो इस उम्र में भी सार्थक रूप से सक्रिय हैं.
दैनंदिन जीवन में उनकी सक्रियता का अंदाजा उनकी गतिविधियों से लगाया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर वह सुबह सवेरे स्टूडियो में हाजिर मिलते हैं. शूटिंग और जिम्मेदारियों से फ्री होने के बाद सोशल मीडिया पर उनकी एक्टिविटी चालू होती है. सोशल मीडिया पर उनकी नियमित मौजूदगी भी हैरान करती है. ट्विटर और ब्लॉग पर अमिताभ बच्चन का एक विस्तारित परिवार भी है. अपने फ़ॉलोअर को वे इसी नाम से बुलाते हैं. वे उनसे बातें करते हैं. उन्हें पूरा सम्मान देते हैं. उनकी कोशिश रहती है कि वे विस्तारित परिवार की खुशी में वे शामिल रहें. अपने हर ट्विट और ब्लॉग को वह क्रमिक संख्या देते हैं. उनके ट्विट और ब्लॉग लेखन का अध्ययन और शोध होना चाहिए. उन्होंने अपने जीवन, कैरियर और जिंदगी की बाकी चीजों पर जमकर लिखा है.
इधर वे थोड़े अस्वस्थ चल रहे हैं. उनकी बीमारियों और अस्पताल में भर्ती होने की खबरें आती रहती हैं. अमिताभ बच्चन अपनी बीमारियों को धत्ता देकर पहली फुर्सत में सेट और स्टूडियो में आ जाते हैं. सेट पर लंबे डग भरते हुए उनका आना ही सभी में स्फूर्ति का संचार कर देता है. उनके सहयोगी कलाकारों ने बार-बार बताया है कि वह दो शॉट के बीच में कभी भी वैनिटी में नहीं जाते, वे सेट पर रहना चाहते हैं. सहयोगी कलाकारों की मदद करते हैं. उनसे बातें करते हैं. इस बातचीत में उनकी वरिष्ठता कभी आड़े नहीं आती. सेट पर निर्देशक का आदेश ही उनके लिए सर्वोपरि होता है. अमिताभ बच्चन को कभी किसी ने नखरे दिखाते हुए नहीं देखा या भड़कते हुए भी नहीं देखा. काम के प्रति उनका लगाव और अनुशासन अनुकरणीय है. समय की उनकी पाबंदी के तो आने किस्से हैं. अभिनय में प्रखर अमिताभ बच्चन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखर नहीं रहते. उनकी चुप्पी खलती है, लेकिन यही उनका स्वभाव है. वे शायद ही कभी किसी के विरोध में नजर आए हों. उनके व्यक्तित्व का यह पहलू रहस्यपूर्ण है. क्या यह लोकप्रिय होने की मजबूरी है या कुछ और?


Tuesday, December 17, 2019

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन की बढ़ी लोकप्रियता


सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन की बढ़ी लोकप्रियता
-अजय ब्रह्मात्मज
मुदस्सर अजीज की ‘पति पत्नी और वो’ अभी तक सिनेमाघरों में चल रही है। इस फिल्म की कामयाबी से कार्तिक आर्यन की लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है। ट्रेड पंडितों की राय में कार्तिक आर्यन भरोसेमंद युवा स्टार के तौर पर उभरे हैं। उनकी लोकप्रियता नई पीढ़ी के दूसरे अभिनेताओं से अलग और विशेष है। पिछले दो-तीन सालों में कार्तिक आर्यन, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना और विकी कौशल ने अपनी फिल्मों से दमदार दस्तक दी है। इन चारों में कार्तिक आर्यन को शेष तीन की तरह विषय प्रधान फिल्में नहीं मिलीं। बतौर एक्टर उन्हें बड़ी सराहना भी नहीं मिली, बल्कि कुछ समीक्षकों की राय में कार्तिक आर्यन को अभी समर्थ अभिनेता की पहचान बनाने में थोड़ा वक्त और लगेगा। समीक्षकों की उपेक्षा और आलोचना के बीच कार्तिक आर्यन ने दर्शकों के बीच लोकप्रियता हासिल की। फिल्म दर फिल्म उनकी स्थिति मजबूत होती गई है। इम्तियाज अली की उनकी फिल्म पूरी हो चुकी है, जो अगले साल फरवरी में रिलीज होगी।
कार्तिक आर्यन 2011 शुरुआत की। ‘प्यार का पंचनामा’ उनकी पहली फिल्म थी। इस फिल्म के बाद उन्हें ‘आकाशवाणी’ और ‘कांची’ जैसी फिल्में मिलीं. ‘कांची’ के निर्देशक सुभाष घई थे। इन दोनों फिल्मों को दर्शकों ने अधिक पसंद नहीं किया था। जाहिर सी बात है कि ठोस मौजूदगी ना हो तो पिछली फिल्मों की असफलता कैरियर के लिए ग्रहण बन जाती है। रोशन हो रही राह में अंधेरा छाने लगता है। आसपास के लोग कन्नी काटने लगते हैं और कामयाबी के ककहरे पर चलने वाली फिल्म इंडस्ट्री के लिए आप कम प्रयोग में आने वाले अक्षर बन जाते हैं। ठीक-ठाक सी शुरुआत के बाद मिले ऐसे अंधेरों से डर लगता है कि कहीं कैरियर की गति पर स्थाई विराम न लग जाए? कार्तिक आर्यन भी छोटे कैरियर में उदास दिनों से गुजर चुके हैं। उनकी घबराहट और छटपटाहट भी देखी है मैंने।
फिर फिल्में चलनी शुरू हुईं और राह में रोशनी लौटी। ‘प्यार का पंचनामा 2 और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी ने’ जरूरी कामयाबी दी। उत्तरोत्तर मिल रही सफलता में कार्तिक ने संयम से काम लिया। वह सधे कदमों से सीढ़ियां चढ़ते रहे। ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ की सफलता ने उनके लिए फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे का एक पल्ला खोल दिया। कार्तिक आर्यन ने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया और ढंग से फिल्मों का चुनाव किया और कैरियर की लॉन्चिंग की। नतीजा सभी के सामने है। ‘लुकाछिपी’ और ‘पति पत्नी और वो’ ने उनके दर्शक और प्रशंसक बढ़ा दिए। उनकी आरंभिक कामयाबी में लव रंजन का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनकी फिल्मों से ही कार्तिक आर्यन को आवश्यक पहचान मिली। अदायगी की कुछ विशेषताएं उनके साथ जुड़ीं। इसके बाद ‘लुकाछिपी’ और ‘पति पत्नी और वो’ ने उनकी स्थिति काफी मजबूत कर दी है। इन दोनों फिल्मों की रिलीज के पहले वे इम्तियाज अली की फिल्म साइन कर चुके थे, जिसमें उनकी हीरोइन सारा अली खान हैं।
इस फिल्म के शुरू होने से पहले एक टॉक शो में सारा अली खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह कार्तिक आर्यन के साथ डेट पर जाना चाहेंगी। सैफ अली खान की बेटी सारा का यह उद्घाटन कार्तिक आर्यन के लिए कारगर साबित हुआ। टॉक शो के आने के पहले ही उनकी चर्चा होने लगी और गूगल पर भारी सर्च हुआ। कुछ समय के बाद इम्तियाज अली ने कार्तिक आर्यन और सारा अली खान को लेकर फिल्म की घोषणा कर दी। यह कहीं न कहीं कार्तिक आर्यन की बढ़ती लोकप्रियता पर एक सफल फिल्मकार की मुहर थी।
कार्तिक आर्यन के व्यक्तित्व में स्टारडम की बात करें तो वह मिलेनियल पीढ़ी के शहरों और कस्बाई युवकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी खास स्टाइल है, जो युवक-युवतियों को पसंद आती है। बिखरे-खड़े बाल और हल्की दाढ़ी के साथ ज्यादाटार जैकेट और हुडी में नजर आने वाले कार्तिक आर्यन धीरे-धीरे फैशन आइकन के तौर पर उभरे हैं। जिस मात्र और प्रकार से कंज्यूमर प्रोडक्ट उनका उपयोग कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि बाजार में उनकी मांग बढ़ी है। इधर फिल्में कामयाब हो ही रही है। 2019 हर लिहाज से उनके लिए सार्थक साबित हुआ है। यह 2020 और आगे का संकेत भी दे रहा है।


Tuesday, December 3, 2019

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने


सिनेमालोक
हिंदी फिल्मों में पंजाबी गाने
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्मों की कहानियां हिंदी प्रदेशों में जा रही हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार के साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की कहानियां हिंदी फिल्मों में आने लगी हैं. हिंदी फिल्मों का यह शिफ्ट नया और सराहनीय है. लंबे समय तक हिंदी फिल्मों ने पंजाब की सैर की. पंजाब आज भी हिंदी फिल्मों में आ रहा है, लेकिन अब वह यश चोपड़ा वाला पंजाब नहीं रह गया है. युवा फिल्मकार किसी फिल्म में उनसे आगे तो किसी फिल्म में उनसे पीछे दिखाई पड़ते हैं. सच्ची और सामाजिक कहानियां भी बीच-बीच में आ जाती हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में पंजाब का प्रभाव रच-बस गया है. फिल्म कलाकार पंजाब से आते हैं. फिल्मों के किरदारों के सरनेम पंजाबी होते हैं. पंजाबी रीति-रिवाज और संगीत भी हिंदी फिल्मों में पसर चुका है. किसी समय यह नवीनता बड़ा आकर्षण थी. अब इसकी अधिकता विकर्षण पैदा कर रही है. हिंदी प्रदेशों की कहानियों में जब अचानक पंजाबी बोल के गाने सुनाई पड़ते हैं तो खटका लगता है. कई फिल्मों में खांटी पटना, लखनऊ, कानपुर, भोपाल और इलाहाबाद के किरदार पंजाबी गीत गाते सुनाई पड़ते हैं, किसी शोधार्थी को इस विषय पर शोध करना चाहिए कि क्यों और कैसे हिंदी फिल्मों में पंजाबी गानों का चलन बढ़ा? यह शोध का रोचक विषय हो सकता है.
देश विभाजन के पूर्व हिंदी फिल्मों के आरंभिक काल में मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर में भी हिंदी फिल्में बन रही थीं.मुंबई के समकक्ष तो नहीं, लेकिन लेकिन उल्लेखनीय संख्या में बंगाल पंजाब की प्रतिभाएं हिंदी फिल्मों में योगदान कर रही थीं. आकार ले रही हिंदी फिल्मों के संवाद की भाषा में स्थानीय भाषाओं का प्रभाव था, लेकिन वह मुख्य रूप से हिंदी-उर्दू की मिश्रित हिंदुस्तानी का रूप ले रही थी. कोलकाता की हिंदी फिल्मों में बांग्ला भाषा और संस्कृति का ठोस प्रभाव दिखाई पड़ता था. वैसे ही लाहौर में बन रही हिंदी फिल्मों में पंजाबी भाषा और संस्कृति का पुट रहता था. खास कर संगीत में यह पुट और स्पष्ट तरीके से परिलक्षित होता था. गीत-संगीत में इस प्रभाव से विविधता भी आ रही थी. इधर मुंबई की हिंदी फिल्में स्थानीय मराठी संगीत और संस्कृति के प्रभाव से निकलकर अखिल भारतीय स्वरूप ले रही थीं. आजादी के पहले और उसके बाद के दशकों में पंजाबी संगीत का प्रभाव हिंदी फिल्मों में मजबूत हुआ. संगीतकार और गीतकार भी पंजाब से आए. नतीजा हुआ कि हिंदी फिल्मों के संगीत और धुनों पर पंजाब का रंग रहा. पंजाब के रंग के साथ ही पुरबिया संगीत के साथ बोली भी हिंदी फिल्मों में सुनाई पड़ती रही.भोजपुरी और अवधी के शब्द सुनाई पड़ते रहे.
इधर दो दशकों से हिंदी फिल्मों में पंजाबी संगीत का असर तेजी से बढ़ा है. धीरे-धीरे पंजाबी गीत-संगीत ने राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया है. ना सिर्फ फिल्म... हिंदी समाज के दैनंदिन जीवन (शादी और दूसरे पारिवारिक समारोह) में पंजाबी गीतों का चलन बढ़ा है. बारात में डीजे पंजाबी गीत बजाते हैं और हिंदी समाज के युवा बाराती उन धुनों पर खूब नाचते हैं. अनायास और अप्रत्यक्ष रूप से पंजाबी गीत-संगीत की लोकप्रियता इस कदर फैली है कि उनके बिना हर समारोह अधूरा और उदास लगता है. पंजाबी गीत-संगीत के साथ पांव उछलने और शरीर मचलने लगता है. क्या पंजाबी गीतों की धुन में ऐसी जबरदस्त थिरकन है या हमने बाकी गीत-संगीत को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है.
ट्रेड के लोग बताते हैं कि अभी टी सीरीज म्यूजिक कंपनी के तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय है. इन दिनों वे फिल्म निर्माण में भी आ गए हैं. उनके पास पंजाबी गीतों का खजाना है. उस खजाने में से एक-दो लोकप्रिय धुनों को वे नई फिल्म के हिसाब से चुनते हैं और जरूरत नहीं होने पर भी फिल्मों में डाल देते हैं. कई बार फिल्म की थीम से उन गानों की संगति नहीं होती, लेकिन जबरदस्त प्रचार और प्रमोशन से वे गाने पॉपुलर हो जाते हैं. दावा तो यह भी किया जाता है कि फिल्म की सफलता में इन पंजाबी गीतों का योगदान होता है. कमाई और लाभ के हिसाब से यह ठीक हो सकता है, लेकिन हिंदी फिल्मों में पंजाबी गीत-संगीत की मौजूदगी स्थानीयता को खत्म करती है. परोक्ष रूप से ही यह फिल्म के प्रभाव को भी कमजोर करती है.