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Friday, August 31, 2018

फिल्म समीक्षा : स्त्री

 फिल्म रिव्यू
स्त्री
-अजय ब्रह्मात्मज

अमर कौशिक निर्देशित ‘स्त्री’ संवादो,किरदारों और चंदेरी शहर की फिल्म है. इन तीनों की वजह से यह फिल्म निखरी है. सुमित अरोड़ा, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना,अभिषेक बनर्जी और चंदेरी शहर की खूबियों का अमर कौशिक ने रोचक मिश्रण और उपयोग किया है. हिंदी फिल्में घिसी-पिटी लकीर से किसी भी नई पगडंडी पर निकलती है तो नजारा और आनंद अलग होता है. ‘स्त्री’ प्रचार हॉरर कॉमेडी फिल्म के तौर पर किया गया है. यह फिल्म हंसाती और थोड़ा डराती है. साथ-साथ टुकड़ों में ही सही लेकर बदल रहे छोटे शहरों की हलचल,जरूरत और मुश्किलों को भी छूती चलती है.

चंदेरी शहर की मध्यवर्गीय बस्ती के विकी .बिट्टू और जना जवान हो चुके हैं. विकी का मन पारिवारिक सिलाई के धंधे में नहीं लगता. बिट्टू रेडीमेड कपड़े की दुकान पर खुश नहीं है. जना पास कोई काम नहीं है. छोटे शहरों के ये जवान  बड़े शहरों के बयान से बदल रहे हैं. बातचीत में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर धौंस जमाते हैं.विकी तो ‘चंदेरी के मनीष मल्होत्रा’ के नाम से मशहूर है. उनकी ठहरी और सुस्त जिंदगी में तब भूचाल आता है, जब विकी की मुलाकात अचानक एक लड़की से हो जाती हैं. लड़की का नाम-पता विकी को भी नहीं मालूम.

शहर में चर्चा है पूजा के पहले चार दिनों मेंकोई स्त्री(चुड़ैल) आती है और मर्दों को उठा ले जाती है.वह  केवल उसके कपड़े फेंक जाती है. बिट्टू और जना को लगता है कि विकी के पीछे भी हो ना हो कोई ना कोई स्त्री है. चिंता के साथ ईर्ष्या की वजह से विकी को सावधान करते हैं. गांव के पुस्तक भंडार के मालिक रुद्र चुड़ैलों के विषय के ज्ञाता हैं.  अंदर से डरपोक लेकिन खुद को जानकार बताने वाले रूद्र इन तीनों को सलाह और मदद देते हैं. हास्य के पुट के साथ फिल्म रहस्य और डर भी रचती है. ‘ओ स्त्री कल आना’ का प्रसंग रोचक और कहानी में गुंथा हुआ है.

नई फिल्मों और नई भूमिकाओं के साथ राजकुमार राव के आयाम खुलते जा रहे हैं. इस फिल्म के सामान्य से किरदार को उन्हें शिद्दत और जरूरी भाव के साथ पर्दे पर निभाया है. छोटे शहर के युवकों की शेखी,शर्म और शरारत को वे अच्छी तरह अपनी चाल और भूल  बोलचाल के लहजे में ले आते हैं. उनके साथअपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी की तिगड़ी जमती है. तीनों ने बहुत खूबसूरती से छोटे शहरों के युवकों की मासूमियत और शोखी पकड़ी है. दृश्यों में पंकज त्रिपाठी के आते ही निखार आ जाता है. इस फिल्म के कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि कलाकार तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया और बातों से कुछ नया टांक देते हैं, जो उस दृश्य की खूबसूरती को बढ़ा देता है. सुमित अरोड़ा के संवादों का धागा तो उन्हें मिला ही हुआ है.कलाकारों में श्रद्धा कपूर इन सक्षम अभिनेताओं के साथ कदम नहीं मिला पातीं. सीमित भावों की श्रद्धा कपूर को यह सपोर्ट मिल गया है कि वह बाहर से आई लड़की हैं.

अवधी : 108 मिनट
***1/2