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Friday, October 29, 2010

फिल्म समीक्षा:दाएं या बाएं

-अजय ब्रह्मात्मज

ना कोई प्रेमकहानी, ना ही कोई गाना-बजाना.. ढिशुम-ढिशुम भी नहीं.. बेला नेगी की दाएं या बाएं पहाड़ी जीवन की एक सरल कहानी है, जो संवेदनशील तरीके से पहाड़ में आ रहे बदलाव की झलक देती है। बेला ने रमेश मजीला को फिल्म के नायक के तौर पर चुना है, जो हिंदी फिल्मों के कथित नायक की परिभाषा में फिट नहीं होता। आम जिंदगी में हम कहां फिल्मी नायक होते हैं? रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्ष में हमारे कुछ फैसले खास होते हैं। उनसे दिशा बदल जाती है। रमेश मजीला की जिंदगी में भी ऐसी घड़ी आती है और उसका फैसला हमें प्रभावित करता है।

पहाड़ों से मुंबई आकर टीवी सीरियल के लेखक बन चुके रमेश शहरी माहौल से उकता कर अपने गांव काण्डा लौट जाते हैं। उनके सामने कोई स्पष्ट प्लान नहीं है। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि गांव में आजीविका का कैसे इंतजाम हो पाएगा। बस एक जज्बा कि अब गांव में ही कुछ करना है। गांव लौटने के बाद स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से वे काण्डा कला केन्द्र की स्थापना की योजना बनाते हैं। इस बीच एक जिंगल लिखने से उनके घर कार आ जाती है। आने के साथ ही कार उनकी गतिविधियों की धुरी बन जाती है। हम गांव में आ रही तब्दीली को विभिन्न स्तरों पर महसूस करते हैं। रमेश मजीला परिवार, दोस्त और ख्वाहिशों के बीच उलझते जाते हैं। आखिरकार उन्हें अपनी तुच्छता और कार की व्यर्थता का एहसास होता है। वे सब कुछ छोड़ कर अपने परिवार के साथ गांव की और लौटते हैं।

बेला नेगी ने मध्यवर्गीय परिवार के सपनों और संवेदना को पहाड़ी परिवेश की प्राकृतिक खूबसूरती के बैकड्राप में चित्रित किया है। उन्होंने फिल्मी ताम-झाम और लटकों-झटकों का इस्तेमाल नहीं किया है। स्थानीय संसाधनों ,प्रतिभाओं और सामग्रियों के इस्तेमाल से फिल्म विश्वसनीय और नैचुरल लगती है। हालांकि सीमित बजट का दबाव दृश्यों के विधान में नजर आता है, लेकिन वह कथा प्रवाह के आड़े नहीं आता। दीपक डोबरियाल पहाड़ों में बाहर से गए एक्टर नहीं लगते। उन्होंने रमेश मजीला की मनोदशा को समझा है। यही वजह है कि उनकी भाव-भंगिमाएं बनावटी नहीं लगतीं। सहयोगी कलाकारों का अनगढ़पन फिल्म के लिए उपयोगी साबित हुआ है। इस फिल्म में विख्यात संस्कृतिकर्मी गिरदा उर्फ गिरीश तिवारी को देखा जा सकता है। उनका हाल ही में निधन हुआ है। दाएं या बाएं पहाड़ों से शहरों की ओर निकल रही आबादी की समस्या को भोले तरीके से रखती है। साथ ही हिंदी सिनेमा के विषय में आ रहे फैलाव और बदलाव का छोटा उदाहरण बनती है।

*** तीन स्टार