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Monday, March 11, 2013

परदे पर साहित्‍य -ओम थानवी

ओम थानवी का यह लेख जनसत्‍ता से चवन्‍नी के पाठकों के लिए लिया गया है। ओम जी ने मुख्‍य रूप से हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्‍य पर बात की है। इस जानकारीपूर्ण लेख से हम सभी लाभान्वित हों। 
 -ओम थानवी
जनसत्ता 3 मार्च, 2013: साहित्य अकादेमी ने अपने साहित्योत्सव में इस दफा तीन दिन की एक संगोष्ठी साहित्य और अन्य कलाओं के रिश्ते को लेकर की। एक सत्र साहित्य और सिनेमापर हुआ। इसमें मुझे हिंदी कथा-साहित्य और सिनेमा पर बोलने का मौका मिला।
सिनेमा के मामले में हिंदी साहित्य की बात हो तो जाने-अनजाने संस्कृत साहित्य पर आधारित फिल्मों की ओर भी मेरा ध्यान चला जाता है। जो गया भी। मैंने राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा उर्फ बिज्जी के शब्दों में सामने आई लोककथाओं की बात भी अपने बयान में जोड़ ली।
बिज्जी की कही लोककथाएं राजस्थानी और हिंदी दोनों में समान रूप से चर्चित हुई हैं। हिंदी में शायद ज्यादा। उनके दौर में दूसरा लेखक कौन है, जिस पर मणि कौल से लेकर हबीब तनवीर-श्याम बेनेगल, प्रकाश झा और अमोल पालेकर का ध्यान गया हो?
वैसे हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा फिल्में- स्वाभाविक ही- उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की रचनाओं पर बनी हैं। इसलिए नहीं कि जब बंबई (अब मुंबई) में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ, प्रेमचंद ने खुद बंबई फिल्म जगत की ओर रुख किया। वहां वे विफल ही हुए। सरस्वती प्रेस के घाटे के चलते साप्ताहिक जागरणको दो साल चलाकर बंद करना पड़ा था। सो मोहन भावनानी की कंपनी अजंता सिनेटोन के प्रस्ताव पर 1934 में आठ हजार रुपए सालाना के अच्छे-खासे अनुबंध पर वे मुंबई पहुंच गए।
प्रेमचंद की कहानी पर मोहन भावनानी ने 1934 में मजदूर बनाई। उसका नाम कभी मिल हुआ, कभी सेठ की बेटी भी। प्रेमचंद का क्रांतिकारी तेवर उसमें इतना प्रभावी था कि फिल्म सेंसर के हत्थे चढ़ गई। मुंबई प्रांत; पंजाब/लाहौर; फिर दिल्ली- फिल्म पर प्रतिबंध लगते गए। उसमें श्रमिक अशांतिका खतरा देखा गया। फिल्म की विधा तब नई थी, समाज में फिल्म का असर तब निरक्षर समुदाय तक भी पुरजोर पहुंचता था।
अंतत: मजदूर सेंसर से पास हुई, पर चली नहीं। हां, उसके असर ने कहते हैं प्रेमचंद के अपने सरस्वती प्रेस के मजदूरों को जागृतकर दिया था! वहां के श्रमिकों में असंतोष भड़क गया!
1934 में ही प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन’ (जो पहले उर्दू में बाजारे-हुस्न नाम से लिखा गया था) पर नानूभाई वकील ने फिल्म बनाई। प्रेमचंद उससे उखड़ गए थे। हिंदी साहित्य में लेखक और फिल्मकार की तकरार की कहानी वहीं से शुरू हो जाती है। हालांकि चार साल बाद इसी उपन्यास पर तमिल में के. सुब्रमण्यम ने जब फिल्म बनाई, प्रेमचंद उससे शायद संतुष्ट हुए हों। उस फिल्म में एमएस सुब्बुलक्ष्मी नायिका थीं। अभिनय, सुब्बुलक्ष्मी के गायन आदि के कारण वह फिल्म बहुत सफल हुई।
अगले वर्ष उनके उपन्यास नवजीवन पर फिल्म बनी। इस बीच प्रेमचंद का मोहभंग हुआ, पीछे सरस्वती प्रेस के मजदूर भी हड़ताल पर चले गए। वे मुंबई छोड़ बनारस लौट आए। 1936 में उनका निधन हो गया। निधन के बाद उनकी कहानी पर स्वामी (औरत की फितरत/त्रिया चरित्र), हीरा-मोती (दो बैलों की कथा), रंगभूमि, गोदान, गबन और बहुत आगे जाकर सत्यजित राय सरीखे फिल्मकार के निर्देशन में शतरंज के खिलाड़ी और सद्गति बनीं।
हिंदी फिल्मों में सत्यजित राय को छोड़कर शायद ही किसी फिल्मकार ने प्रेमचंद के साहित्य के मर्म को समझने की कोशिश की हो। यों मृणाल सेन ने भी कफनकहानी पर तेलुगु में फिल्म (ओका उरी कथा) बनाई है, जिसे मैं अब तक देख नहीं सका हूं। राय ने शतरंज के खिलाड़ी  में बहुत छूट ली- उस पर आगे बात होगी- लेकिन रचना की उनकी समझ पर कौन संदेह कर सकता है?
वैसे प्रेमचंद अजंता सिनेटोन में अपना अनुबंध पूरा होने के पहले ही समझ गए थे कि रचना को लेकर फिल्म वाले फिल्मी ही हैं। 28 नवंबर, 1934 को जैनेंद्र कुमार को लिखे एक पत्र में प्रेमचंद कहते हैं- ‘‘फिल्मी हाल क्या लिखूं? मिल (बाद में मजदूर नाम से जारी चलचित्र) यहां पास न हुआ। लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है। मैं जिन इरादों से आया था, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आता। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियां बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। वल्गैरिटीको ये एंटरटेनमेंट बैल्यूकहते हैं।... मैंने सामाजिक कहानियां लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे; लेकिन उनकी फिल्म बनाते इन लोगों को संदेह होता है कि चले, या न चले!’’
प्रेमचंद की कृतियों पर बनी फिल्मों के दौर में ही अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, सुदर्शन, सेठ गोविंददास, होमवती देवी, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और आचार्य चतुरसेन की रचनाओं पर भी फिल्में बनीं। वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर दो-दो बार। आम तौर वे सब साधारण फिल्में थीं।
1966 में फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफामपर बासु चटर्जी ने तीसरी कसम बनाई। भारी कर्ज लेकर फिल्म में पैसा शैलेंद्र ने लगाया। राज कपूर और वहीदा रहमान को लेकर भी फिल्म नहीं चली। कहते हैं इस सदमे में शैलेंद्र की जान चली गई। लेकिन आज वह फिल्म क्लासिक मानी जाती है। अभिनय, गीत-संगीत, नृत्य आदि में फिल्म उत्तम थी। छायांकन में उत्कृष्ट। पथेर पांचाली सहित सत्यजित राय की अनेक फिल्मों के छविकार सुब्रत मित्र ने तीसरी कसम भी फिल्माई थी। पर फिल्म का संपादन कमजोर था। रोचक कहानी भी बिखर-बिखर जाती थी। दूसरे, हीराबाई का दर्द फिल्म में उभर कर ही नहीं आया।
इसके बाद बासु चटर्जी ने राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाश (1969)   और मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर रजनीगंधा (1974) फिल्में बनाईं, जो चलीं। हालांकि फिल्म की सफलता से यह शायद ही जाहिर होता हो कि फिल्म ने कथा को बखूबी प्रस्तुत किया या नहीं। बासु चटर्जी, साफ नीयत के बावजूद, भावुकतावादी लोकप्रिय बुनावट के कारीगर हैं। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार आदि हमारे यहां यही काम करते रहे हैं।
इस दौर को मैं साहित्य के संदर्भ में हिंदी फिल्मों का खुशगवार दौर कहता हूं। जो और फिल्में साठ और सत्तर के दशक में हिंदी लेखन को केंद्र में रखकर बनीं उनमें उल्लेखनीय थीं- फिर भी (तलाश): कमलेश्वर/शिवेंद्र सिन्हा, बदनाम बस्ती: कमलेश्वर/प्रेम कपूर; 27 डाउन (अठारह सूरज के पौधे): रमेश बक्षी/अवतार कौल; चरणदास चोर: विजयदान देथा/श्याम बेनेगल; त्यागपत्र (जैनेंद्र कुमार/रमेश गुप्ता); आंधी (काली आंधी): कमलेश्वर/गुलजार; जीना यहां (एखाने आकाश नाय): मन्नू भंडारी/बासु चटर्जी, आदि। इस तरह की फिल्में बंबइया बाजार की लीक से कुछ हटकर थीं। मगर थीं व्यावसायिक।
इनसे हटकर हिंदी फिल्मों का वह दौर है, जिसे नई धारा का समांतर सिनेमा भी कहा गया। साहित्य से इसका संबंध ईमानदार रहा, भले ही लेखक अपनी कृति के दृश्यों में ढले रूप से संतुष्ट न रहे हों।
साहित्यिक रचनाओं पर बनी सभी फिल्मों की सूची देना या उनकी समीक्षा करना यहां मेरा प्रयोजन नहीं है। पर उदाहरण के बतौर कुछ फिल्मकारों का उल्लेख और उनके काम की चर्चा मैं करता चलता हूं।
समांतर सिनेमा के दौर में हिंदी साहित्य को सबसे ज्यादा महत्त्व और निष्ठाभरी समझ मणि कौल ने दी। इसी दौर में कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पण पर फिल्म बनाई। इसके अलावा दामुल (कबूतर): शैवाल/प्रकाश झा; परिणति: विजयदान देथा/प्रकाश झा; पतंग: संजय सहाय/गौतम घोष; सूरज का सातवां घोड़ा: धर्मवीर भारती/श्याम बेनेगल; कोख (किराए की कोख): आलमशाह खान/आरएस विकल; खरगोश: प्रियंवद/परेश कामदार जैसी फिल्में भी कथा के निरूपण की दृष्टि से बेहतर थीं।
मणि कौल ने पूना फिल्म संस्थान की दीक्षा के फौरन बाद उसकी रोटी (1969) बनाई। मोहन राकेश की कहानी पर बनी इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा में कथा कहने का तरीका सिर से पांव तक बदल दिया। मणि के दिमाग में राकेश की कहानी का मर्म था, कथोपकथन और घटना-क्रम उन्होंने उतना ही लिया जितना अनिवार्य जान पड़ा। इस तरह उसकी रोटी ट्रक-ड्राइवर सुच्चा सिंह और उसकी पत्नी बालो की घरेलू दास्तान न बनकर मर्द की बेरुखी और औरत की वेदना का काव्यात्मक चित्रण बन गई। संवादों की अदायगी, संगीत की जगह सहज आवाजों का इस्तेमाल और छायांकन (के.के. महाजन) में ठहरी हुई छवियों की काली-सफेद भंगिमा ने कहानी को जैसे परदे की कविता में ढाल दिया।
खयाल करने की बात है कि इसी अंदाज में माया दर्पण (1972) चलती है, जो रंगीन भी है। कहानी का निर्वाह उसमें काव्यात्मक- दूसरे अर्थ में कलात्मक- है। लेकिन उसमें बिखराव भी है। चाहे प्रयोग हो, पर दर्शक के साथ तारतम्य टूटने का मतलब होता है, फिल्म का अपनी लय से छूटना। साहित्य में पाठक के साथ रिश्ता टुकड़ों में शक्ल ले सकता है, लेकिन सिनेमा में दर्शक को एक निरंतरता चाहिए। फिल्म के साथ अपने रिश्ते को दर्शक- पाठक की तरह- आगे भी आविष्कृत कर सकता है, लेकिन हर बार उसे एक तारतम्य फिर भी चाहिए।
अपने अंदाज में ही मणि कौल ने बाद में आषाढ़ का एक दिन (मोहन राकेश), दुविधा (विजयदान देथा), सतह से उठता आदमी (मुक्तिबोध) और नौकर की कमीज (विनोद कुमार शुक्ल) फिल्में बनाईं। सतह से उठता आदमी जरूर- माया दर्पण की तरह- किसी संगति से उचट जाती है, लेकिन नौकर की कमीज संगति के मामले में उन्हें बिल्कुल मुकम्मल ढंग से पेश करती है।
प्रसंगवश जिक्र करना मुनासिब होगा कि 1994 में एक जर्मन निर्माता के लिए मणि कौल ने एक छोटी फिल्म द क्लाउड डोर (बादल द्वार) बनाई थी। भास के नाटक अविमारकऔर जायसी के महाकाव्य पद्मावतपर आधारित फिल्म सिनेमाई बिंबविधान की दृष्टि से, मेरी समझ में, मणि कौल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है।
साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को जोड़े रखने में दूरदर्शन की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन कड़ियों में घर-घर को ध्यान में रखकर बनने वाले फिल्म-रूप आम तौर पर लचर ही देखे गए हैं। छोटे परदे के लिए फिल्मांकन की अपनी सीमाएं होती हैं। सद्गति (प्रेमचंद/सत्यजित राय) और तमस (भीष्म साहनी/गोविंद निहलानी) को छोड़कर कोई उल्लेखनीय चित्रांकन मुझे खयाल नहीं पड़ता। यों चंद्रकांता (देवकीनंदन खत्री), निर्मला (प्रेमचंद), राग दरबारी (श्रीलाल शुक्ल), कब तक पुकारूं (रांगेय राघव), मुझे चांद चाहिए (सुरेंद्र वर्मा), नेताजी कहिन (कक्काजी कहिन, मनोहर श्याम जोशी) पर भी धारावाहिक फिल्मांकन हुआ है। अन्य अनेक कहानियों पर भी। प्रेमचंद की कहानियों पर तो गुलजार ने काम किया। लेकिन यह सब कहानियों का इस्तेमाल भर रहा।
साफ कर दूं कि सिनेमा या टीवी के लिए संवाद या पटकथा लेखन को मैं यहां दूर रखता हूं। वरना प्रेमचंद के अलावा सुदर्शन, हरिकृष्ण प्रेमी, सेठ गोविंददास, द्वारकाप्रसाद मिश्र, धनीराम प्रेम, अमृतलाल नागर, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी ने फिल्मों और टीवी के लिए भी बड़ी कलम-घिसाई की।
पर सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी के लिए हमें सत्यजित राय पर अलग से बात करनी चाहिए। हिंदी में राय ने   दो ही फिल्में बनाईं; दोनों प्रेमचंद की कहानियों पर। शतरंज के खिलाड़ी 1977 में बनी। सद्गति दूरदर्शन के लिए चार साल बाद बनाई। पहली फिल्म पर विवाद उठा। दरअसल, ‘शतरंज के खिलाड़ीछोटी कहानी है, पूर्ण अवधि की फिल्म उस पर बन नहीं सकती। राय फिल्म में वाजिद अली शाह और लॉर्ड डलहौजी के सैनिकों की पेशकदमी ले आए। वरना प्रेमचंद की कहानी घर-परिवार और समाज-सरकार को ताक पर रख हरदम शतरंज खेलने वाले दो निकम्मे नवाबों के गिर्द सिमटी रहती है। राय ने कहानी का अंत फिल्म में बदल दिया।
सत्यजित राय ने प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ीका विस्तार तो किया ही था, अंत भी बदल दिया था। मिर्जा और मीर वहां एक दूसरे को तलवार से मौत के घाट नहीं उतारते, फिर से बाजी जमा कर बैठ जाते हैं। परस्पर मार-काट दो नवाबों की आपसी कहानी बन कर रह जाता; फिल्म में तमंचे निकाल कर, चला कर अंतत: फिर बाजी पर आ जाना अंगरेजी फौज के हमले के प्रति अवध की (व्यापक अर्थ में हमारी) अनवरत उदासीनता का मंजर बन जाता है। मुझे लगता है राय ने प्रेमचंद को आदर भी दिया (कहानी का चुनाव और उस पर उस दौर में बड़े बजट की फिल्म बनाना भी एक प्रमाण है) और उसके असर में इजाफा भी किया।
हालांकि किसी लेखक के गले यह बात न उतरे कि फिल्मकार- चाहे कितना ही महान हो- अपनी पुनर्रचना में इतनी छूट ले सकता है। आलोचकों ने इसे खिलवाड़कहा।
राय अपनी ज्यादातर फिल्में कथा-साहित्य पर ही केंद्रित रखते आए थे। शायद ही कभी कथा में बड़ा बदलाव उन्होंने किया हो। हिंदी कहानी के साथ यह प्रयोगभारी आलोचना का कारण बना। विवाद का नतीजा था या राय ने खुद सद्गति में किसी तरह के परिवर्तन की जरूरत अनुभव नहीं की, कहा नहीं जा सकता।
इस बारे में मेरा विचार यह है कि अगर फिल्मकार पाए का है और लेखक को उस पर भरोसा है तो फिल्मकार को पर्याप्त छूट मिलनी चाहिए। एक फिल्मकार किसी कहानी, उपन्यास या नाटक पर हमेशा इसलिए फिल्म नहीं बनाता कि उसे फिल्म की पटकथा के लिए बना-बनाया कथा-सूत्र चाहिए। इसके लिए उसे बेहतर लोकप्रिय चीजें- गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक ढेर उदाहरण मिल जाएंगे- मिल सकती हैं। साहित्यिक कृति को चुनने में ही गंभीर सृजन के प्रति उसका सम्मान जाहिर हो जाता है; अगर लेखक का भी भरोसा उसमें हो तो अपनी कृति उसे फिल्मकार के विवेक पर छोड़ देनी चाहिए। वह परदे पर संवर भी सकती है, बिगड़ भी सकती है।
हम इस बात का खयाल रखें कि किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म उसके पाठकों का विस्तार करने के लिए नहीं बनाई जाती। न इसलिए कि जिन तक लेखनी न पहुंच सके, चाक्षुष रूप में फिल्म पहुंच जाए। फिल्म शब्दों का दृश्य विधा में अनुवादनहीं हो सकती। यह फिल्म की विधा को कमतर करके देखना होगा, और साहित्य को भी। फिल्मकार के उपकरण जुदा होते हैं। वह रचना को शब्दों के पार ले जाना चाहता है। मुश्किल यहीं पर है, जब साहित्यजगत फिल्म में से साहित्य को हू-ब-हू देखना चाहता है। एक हद तक यह लगभग असंभव अपेक्षा ही है; गद्य का विवरण- नैरेटिव- फिल्म में सिर्फ पार्श्व से बोलकर व्यक्त किया जा सकता है- सूरज का सातवां घोड़ा- पर वह हमेशा शायद ही कारगर साबित हो।
साहित्य पर बनी गंभीर और ईमानदार फिल्म दृश्यों, ध्वनियों, रंगों और प्रकाश के आयामों में एक कृति को समझने की कोशिश होती है। पाठक रचना से हजार अर्थ लेकर बाहर निकलते हैं, एक फिल्मकार भी एक श्रेष्ठ कृति का अपना पाठ प्रस्तुत करता है। इस तरह वह किसी रचना की पुनर्रचना भी करता है, जो बड़ा काम है।
हिंदी में सौ वर्षों में साहित्यिक कृतियों पर सौ फिल्में भी नहीं बनी हैं। कुमार शहानी जैसे फिल्मकार ने माया दर्पण बनाई, पर निर्मल वर्मा उसमें अपनी कहानी देखते थे। शहानी कहते थे, यह उस कहानी का बिंबों में पुनराविष्कार है।
मन्नू भंडारी के उपन्यास आपका बंटीपर फिल्म बनी तो मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया। अंत में यह समझौता हुआ कि फिल्म आपका बंटीसे जोड़कर नहीं प्रचारित की जाएगी। वह फिल्म समय की धारा नाम से दिखाई गई। बहरहाल, यह व्यावसायिक फिल्म थी। बाजार के लिए किए गए बदलाव छूट के घेरे में नहीं आ सकते।
यहीं मायादर्पण का मामला यहां अलग हो जाता है। शतरंज के खिलाड़ी या उसकी रोटी का भी। दुविधा के सिनेमाई भाष्य में मणि कौल और अमोल पालेकर में रात-दिन का भेद है। श्याम बेनेगल ने भी चरणदास चोर में अपने भाष्य की खूब छूट ली है। कहानी उसे निखारती ही है।
विदेश में साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बेहतर है। वहां शेक्सपियर की कृतियों पर बेशुमार फिल्में बनी हैं। एक ही कृति पर अनेक बार फिल्म बनना जाहिर करता है कि हर फिल्मकार कृति को नए सिरे से पढ़ना’, अपनी विधा में आविष्कृत करना चाहता है। बालजाक, सरवांतेस, तोलस्तोय, चार्ल्स डिकंस, टॉमस हार्डी, मार्क ट्वेन, अल्बेयर कामू, ग्राहम ग्रीन, ईएम फॉस्टर, व्लादीमिर नाबोकोव, मार्शल प्रूस्त, एमिल जोला, गुंथर ग्रास, हरमन हेस... सूची बेहद लंबी है। उनकी कृतियों पर अच्छी फिल्में भी मिलती हैं, बुरी भी। गाब्रिएल गार्सिया मार्केस ने अपने तीन उपन्यासों पर बनी फिल्में देखने के बाद निश्चय किया कि अ हंड्रेड इयर्स आॅफ सॉलिट्यूडपर फिल्म बनाने की इजाजत कभी नहीं देंगे।
मैं समझता हूं फिल्म की विधा जब तक कथा का   आधार चाहती है- हालांकि अब इस पद्धति में बदलाव आ रहे हैं- तब तक उसे साहित्य को अपना भाष्य देने की आजादी रहनी चाहिए। साहित्य और सिनेमा का यह सार्थक रिश्ता होगा। हिंदी में तो अनेक कृतियों में सिनेमा की संभावनाएं हैं। किसी कृति का मेरा पाठ मुझ में है, पर मैं यह भी क्यों न जानना चाहूं कि चाक्षुष विधा का कोई गंभीर सर्जक बाणभट्ट की आत्मकथा, नदी के द्वीप, अमृत और विष, दिव्या या मैला आंचल को किस तरह सामने ला सकता है?

Sunday, August 21, 2011

कभी-कभी ही दिखता है शहर

-अजय ब्रह्मात्मज

हर शहर की एक भौगोलिक पहचान होती है। अक्षांश और देशांतर रेखाओं की काट के जरिये ग्लोब या नक्शे में उसे खोजा जा सकता है। किताबों में पढ़कर हम उस शहर को जान सकते हैं। उस शहर का अपना इतिहास भी हो सकता है, जिसे इतिहासकार दर्ज करते हैं। किंतु कोई भी शहर महज इतना ही नहीं होता। उसका अपना एक स्वभाव और संस्कार होता है। हम उस शहर में जीते, गुजरते और देखते हुए उसे महसूस कर पाते हैं। जरूरी नहीं कि हर शहरी अपने शहर की विशेषताओं से वाकिफ हो, जबकि उसके अंदर उसका शहर पैबस्त होता है। साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में विभिन्न शहरों के मर्म का चित्रण किया है। उनकी धड़कनों को सुना है।

फिल्मों की बात करें, तो हम देश-विदेश के शहरों को देखते रहे हैं। ज्यादातर फिल्मों में शहर का सिर्फ बैकड्रॉप रहता है। शहर का इस्तेमाल किसी प्रापर्टी की तरह होता है। शहरों के प्राचीन और प्रसिद्ध इमारतों, वास्तु और स्थानों को दिखाकर शहर स्थापित कर दिया जाता है। मरीन लाइंस, वीटी स्टेशन, बेस्ट की लाल डबल डेकर, काली-पीली टैक्सियां, स्टाक एक्सचेंज और गेटवे ऑफ इंडिया आदि को देखते ही हम समझ जाते हैं कि फिल्म के किरदार मुंबई में घूम-जी रहे हैं। इसी प्रकार लालकिला, कुतुब मीनार, संसद भवन, इंडिया गेट, कनाट प्लेस आदि देखकर दर्शकों को दिल्ली का अनुमान लग जाता है। विदेशी शहरों के मशहूर चौराहे, इमारतें, पुल और मीनारें देख कर हम सही अंदाजा लगा लेते हैं कि किस शहर में हैं।

अब जरा फिल्मों के जरिये अलग-अलग शहरों को देख चुके दर्शक याद करें, तो पाएंगे कि उन्होंने सभी शहरों को देख कर भी नहीं देखा है। वे उन शहरों को महसूस नहीं कर सके हैं। निर्माता-निर्देशकों की कोशिश भी नहीं रहती कि वे शहरों के डिटेल में जाएं या अपने किरदारों का ऐसा चित्रण करें कि शहर का स्वभाव समझ में आ सके। फिल्मों में वर्णित दृश्यों के आधार पर तो मुंबई की यही धारणा बनेगी कि इस शहर में पांव रखते ही व्यक्ति लुट जाता है। उसकी जेब कट जाती है। आप अंडरव‌र्ल्ड के शिकार हो जाते हैं, जबकि मुंबई में लगभग सवा करोड़ लोग गुजर-बसर कर रहे हैं। वे इस शहर को छोड़ कर भी नहीं जाना चाहते।

दरअसल, ज्यादातर फिल्मों में शहर को किरदार के तौर पर पेश करने की दरकार ही नहीं रहती। अगर शहर को चरित्र बनाया, तो निर्देशक को शहर का चरित्रांकन फिल्म के दूसरे किरदारों की तरह ही करना पड़ता है। कुछ ही फिल्मकार ऐसी कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए रामगोपाल वर्मा की सत्या देखते हुए हम मुंबई शहर के स्वभाव के एक पहलू से बखूबी परिचित होते हैं। यह निर्देशकों की मंशा और समझ पर निर्भर करता है कि वे अपनी फिल्मों में शहर का कौन सा पोट्र्रेट प्रस्तुत करते हैं। कभी यह पॉजीटिव तो कभी निगेटिव होता है।

चूंकि शहरों के चित्रण और उसे स्थापित करने में निर्देशकों को अलग से मेहनत करनी पड़ती है। परिवेश पर ध्यान देना पड़ता है। उसकी कंटीन्यूटी और बाकी कनेक्टिंग सामग्रियों पर भी बारीक नजर रखनी पड़ती है, इसलिए अधिकांश निर्देशक ऐसी मेहनत से बचते हैं। आपने लगभग सभी हिंदी फिल्मों में देखा होगा कि किरदारों का कोई शहर और काल नहीं होता। पता नहीं चलता कि वे किस समय विशेष या स्थान विशेष में रहते हैं। निर्देशक पूरी छूट लेते हैं। वे अपने किरदारों को इस शहर से उस शहर घुमाते रहते हैं। उनका मकसद सिर्फ इतना ही रहता है कि पृष्ठभूमि सुंदर, रंगीन और भव्य हो। वह आकर्षण पैदा करे। पृष्ठभूमि हिंदी फिल्मों की कहानी में अलग से कुछ नहीं जोड़ती।

इधर के फिल्मकारों ने परिवेश और समय पर ध्यान देना शुरू किया है। उसकी वजह से हमें पता चलता है कि हम कहां की और कब की कहानी देख रहे हैं। नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्म का निर्देशक अगर कोताही बरतेगा तो उसकी फिल्म विश्वसनीय नहीं लगेगी। वही अगर थोड़ी मेहनत करेगा और पृष्ठभूमि को चरित्रों की संगत में ले आएगा तो फिल्म दर्शकों को भा जाएगी। इस फिल्म के साथ यही हुआ भी।

Monday, March 14, 2011

एक सुखद अनुभूति थी आलम आरा-सुरेन्‍द्र कुमार वर्मा

यह लेख 14 मार्च 2011 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण मेंछपा है...

भारतीय सिनेमा के लिए वह दिन बहुत खास था। दर्शक रुपहले परदे पर कलाकारों को बोलते हुए देखने को आकुल थे। हर तरफ चर्चा थी कि परदे पर कैसे कोई कलाकार बोलते हुए दिखाई देगा। आखिरकार 14 मार्च 1931 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब बंबई (अब मुंबई) के मैजिस्टक सिनेमा में आलम-आरा के रूप में देश की पहली बोलती फिल्म रिलीज की गई। उस समय दर्शकों में इसे लेकर काफी कौतूहल रहा था। फिल्म में अभिनेत्री जुबैदा के अलावा पृथ्वी राज कपूर, मास्टर विट्ठल, जगदीश सेठी और एलवी प्रसाद प्रमुख कलाकार थे, जिन्हें लोग पहले परदे पर कलाकारी करते हुए देख चुके थे, लेकिन पहली बार परदे पर उनकी आवाज सुनने की चाह सभी में थी। दादा साहेब फाल्के ने अगर भारत में मूक सिनेमा की नींव रखी तो अर्देशिर ईरानी ने बोलती फिल्मों का नया युग शुरू किया। हालांकि इससे पूर्व कोलकाता तब कलकत्ता की फिल्म कंपनी मादन थिएटर्स ने चार फरवरी 1931 को एंपायर सिनेमा (मुंबई) में दो लघु फिल्में दिखाई थी, लेकिन इस फिल्म में कहानी को छोड़कर नृत्य और संगीत के दृश्य थे। इसलिए आलम-आरा को देश की पहली फीचर फिल्म कहा जाता है। चार साल पहले 25 मई 1927 को अमेरिका में दुनिया की पहली बोलती फिल्म रिलीज की गई थी। वार्नर ब्रदर्स ने द जॉज सिंगर के नाम से बोलती फिल्मों का इतिहास शुरू किया। यह फिल्म भी उस समय बहुत चर्चित रही और इसके बाद तो कई और कंपनियां बोलती फिल्मों के निर्माण में जुट गई। हालांकि मूक फिल्मों के सुपर स्टार चार्ली-चैपलिन को फिल्मों में आवाज डालने की परंपरा रास नहीं आई, इसे वह अभिनय में बाधक मानते थे। विश्व स्तर पर मूवी और टॉकी फिल्मों को लेकर जबर्दस्त बहस शुरू हो गई थी। जबकि भारत में इस नवीन प्रयोग को हाथों-हाथ लिया गया और एक के बाद एक फिल्में बनने लगीं। बोलती फिल्मों का युग शुरू होने से पूर्व मूक फिल्मों को मूवी कहा जाता था, क्योंकि इसमें कलाकार सिर्फ हिलते-डुलते थे। और जब बोलती फिल्मों का युग आया तो वह टॉकी के रूप में परिवर्तित हो गया। मूक फिल्मों की शुरुआत करने वाले दादा साहेब को भी अपनी मूक फिल्म सेतुबंध को बोलती फिल्म में तब्दील करना पड़ा था। इस स्तर से सेतुबंध भारत की पहली डब फिल्म बन गई। तब डब कराने में 40 हजार रुपये खर्च आया था। उस समय बोलती फिल्मों को बनाना आसान काम नहीं था। आज की तरह ढेरों सुविधाएं भी नहीं थीं। सवाक फिल्मों के आगमन से कई नई चीजें जुड़ीं तो कुछ चीजों का महत्व खत्म हो गया। मूक फिल्मों में कैमरे का कमाल होता था, लेकिन बाद में माइक्रोफोन के कारण इसकी आजादी पर अंकुश लग गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब स्टूडियो में गानों की रिकार्डिग नहीं होती थी और शूटिंग स्थलों पर ही संवाद के साथ-साथ गाने भी रिकॉर्ड किए जाते थे। गानों की रिकार्डिग के लिए संगीतकार अपनी पूरी टीम के साथ शूटिंग स्थल पर मौजूद रहते थे। कलाकार खुद अपना गाना गाते थे और साजिंदों को वहीं आसपास पेड़ के पीछे या झोपड़ी अदि में छिपकर बाजा बजाना पड़ता था। कभी-कभी तो उन्हें पानी में रहकर या पेड़ पर बैठकर बजाना पड़ता था। इस दौरान किसी से भी छोटी गलती हो जाने पर शूटिंग दोबारा करनी पड़ती थी। आलम-आरा में सात गाने थे। फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत दे दे खुदा के नाम पर.. वजीर मोहम्मद खान (डब्ल्यूएम खान) ने गाया था। हालांकि खान साहब इन फिल्म के मुख्य नायक नहीं थे, लेकिन उन्होंने इतिहास रचा और भारतीय सिनेमा जगत के पहले गायक बन गए। खान साहब इस फिल्म में एक फकीर की भूमिका में थे। बदला दिलवाएगा या रब.. गाने से अभिनेत्री जुबैदा भारत की पहली फिल्मी गायिका बनीं। फिल्म में संगीत दिया था फिरोज शाह मिस्त्री और बी ईरानी ने। इस फिल्म में संगीत के लिए महज तीन वाद्ययंत्रों का ही प्रयोग किया गया था। अपनी संवाद अदायगी के लिए पहचाने जाने वाले पृथ्वी राज कपूर की आवाज को तब फिल्मी समीक्षकों ने नकार दिया था। यह फिल्म उस समय चर्चित एक पारसी नाटक पर आधारित थी। एक राजकुमार और बंजारन लड़की के बीच प्रेम संबंधों पर आधारित इस फिल्म के लेखक जोसेफ डेविड थे, जो 124 मिनट लंबी थी। आलम-आरा फिल्म से सबसे चर्चित हस्ती में पृथ्वी राज कपूर का नाम आता है, जिन्होंने नौ मूक फिल्मों में काम करने के बाद बोलती फिल्म में काम किया था। फिल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए 1971 में दादा साहेब फाल्के सम्मान से नवाजा गया। फिल्म की नायिका जुबैदा ने बोलती फिल्मों में आने से पहले गैर बोलती फिल्मों में भी काम किया था। उन्होंने काला नाग (1924), पृथ्वी वल्लभ (1924), बलिदान (1927) और नादान भोजाई (1927) जैसी कई मूक फिल्मों में काम किया। शरत चंद्र के उपन्यास देवदास पर 1936 में बनी पहली हिंदी फिल्म में पारो की भूमिका उन्होंने ही निभाई थी। इस फिल्म से अभिनेता के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले एलवी प्रसाद आगे चलकर हिंदी और तेलुगु फिल्मों के मशहूर निर्माता-निर्देशक बने। उनकी निर्देशित कुछ चर्चित हिंदी फिल्में शारदा (1957), छोटी बहन (1959) और जीने की राह (1969) है। बतौर निर्माता हमराही (1963), मिलन (1967), खिलौना (1970) और एक दूजे के लिए (1981) उनकी कुछ यादगार फिल्में हैं। प्रसाद को 1982 में भारतीय सिनेमा में अमूल्य योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के सम्मान से नवाजा गया। कई नायाब सितारे देने वाली यह फिल्म आज अपने अस्तित्व में नहीं है। दुर्भाग्य से आठ साल पहले 2003 में पुणे की राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में लगी आग से आलम-आरा फिल्म के नामोनिशान खाक हो गए। आलम-आरा ही नहीं, भारतीय सिनेमा की और भी कई अमूल्य धरोहर इसमें स्वाहा हो गई। इस अग्निकांड के बाद पूरे देश में इसके प्रिंट की खोज की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। फिल्म ही नहीं, इसके गाने भी उसी आग में नष्ट हो गए। उस समय फिल्मी गानों को ग्रामोफोन रिकार्ड तैयार करवाने की शुरुआत नहीं हुई थी, इसलिए उसे अलग से संरक्षित भी नहीं किया जा सका। आज इस फिल्म को रिलीज हुए 80 साल बीत चुके हैं। हमारा भारतीय सिनेमा कहां से कहां तक पहुंच गया है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम फिल्मी इतिहास के शुरुआती पन्ने ही बचाकर नहीं रख सके। हालांकि इस फिल्म के कुछ फोटो जरूर बचे हुए हैं, जिसे देखकर हम संतोष कर सकते हैं।

Friday, March 11, 2011

देश के अंदर ही हैं अनेक दर्शक

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मेरी धारणा मजबूत होती जा रही है कि हिंदी सिनेमा पर अलग-अलग दृष्टिकोण से विचार-विमर्श करने की जरूरत है। मुंबई या दूसरे महानगरों से हम हिंदी सिनेमा को जिस दृष्टिकोण से देखते और सही मानते हैं, वह पूरे देश में लागू नहीं किया जा सकता। हिंदी फिल्मों के विकास, प्रगति और निर्वाह के लिए मुंबइया दृष्टिकोण का खास महत्व है। उसी से हिंदी फिल्में संचालित होती हैं। सितारों की पॉपुलैरिटी लिस्ट बनती है, लेकिन हिंदी फिल्मों की देसी अंतरधाराओं को भी समझना जरूरी है। तभी हम दर्शकों की पसंद-नापसंद का सही आकलन कर सकेंगे।

मैं पिछले बीस दिनों से बिहार में हूं। राजधानी पटना में कुछ दिन बिताने के बाद नेपाल की सीमा पर स्थित सुपौल जिले के बीरपुर कस्बे में आ गया हूं। इस कस्बे की आबादी एक लाख के आसपास होगी। कोसी नदी में आई पिछली बाढ़ में यह कस्बा और इसके आसपास के गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। इस इलाके के नागरिकों को पलायन करना पड़ा था। जलप्लावन की विभीषिका के बाद कस्बे में जीवन लौटा, तो लोगों की पहली जिज्ञासाओं में सिनेमाघर के खुलने का इंतजार भी था। यह बात मुझे स्थानीय कृष्णा टाकीज के मालिक और व्यवस्थापक शैलेश कुमार सिंह ने बताई।

थोड़ा पीछे लौटते हैं। 20-25 साल पहले जब मैं यहां हाईस्कूल का छात्र था, तो यहां दो सिनेमाघर थे। 1971 में इसे अधिसूचित क्षेत्र घोषित कर शहर का दर्जा दे दिया गया था। हालांकि कोसी परियोजना का केंद्र होने की वजह से यहां छोटे स्तर पर कास्मोपोलिटन कल्चर आ चुका था, लेकिन शहर का दर्जा मिलने के बाद प्रशासनिक सुविधाएं बढ़ीं। इलाके के लोगों की आमदनी बढ़ी, तो सिनेमाघर भी भरने लगे। उन दिनों अमूमन 6 से 9 महीनों के बाद नई फिल्में यहां आ पाती थीं। माधुरी पत्रिका के जरिये नई फिल्मों से वाकिफ होने के बावजूद हमें नई फिल्मों का छमाही इंतजार करना पड़ता था। उन दिनों केवल फारबिसगंज के मेले के समय नई फिल्में तत्काल देखने को मिलती थीं। लकड़ी की बेंच और सामान्य कुर्सियों पर बैठ कर देखने पर भी फिल्में भरपूर मजा देती थीं। फ्रंटस्टॉल यानी चवन्नी छाप दर्शकों के लिए तब पुआल पर बोरे बिछा दिए जाते थे। फिल्म के दौरान और इंटरवल में पापड़, भूंजा और घुघनी ही स्नैक्स के नाम पर उपलब्ध थे।

2011 में कस्बे की आबादी बढ़ गई है। गोल चौक से हटिया चौक तक की सड़क पक्की हो गई है। सड़क के बाएं-दाएं दोनों तरफ ठसमठस खुली दुकानों में इस इलाके के लोगों की जरूरत की सारी चीजें मिल जाती हैं। इस बदलाव में सिनेमाघरों की संख्या दो से एक हो गई है। सिनेमा देखने और उनके चुनाव में भारी फर्क आ गया है। पिछले दस दिनों में ही यहां तीसरी फिल्म लग चुकी है। कानून हमार मुट्ठी में और रोबोट के बाद आज के करण अर्जुन लगी है। तीन में से दो भोजपुरी फिल्में हैं। शैलेश कुमार सिंह ने बताया कि केवल दिनेश लाल यादव निरहुआ की फिल्म ही एक हफ्ते से ज्यादा चल पाती है। अगर सुनील शेट्टी और मिथुन चक्रवर्ती की पुरानी फिल्में भी लग जाएं तो एक हफ्ते तक फिल्म टिकती है। रोबोट बमुश्किल तीन दिन चल पाई। मुंबई में चली और चर्चित फिल्मों का भी यही हाल है। शैलेश ने बताया कि उनके सिनेमाघर के दर्शक अभी तक रितिक रोशन से परिचित नहीं हैं। खानों में केवल सलमान खान को ही वे जानते हैं। आमिर खान और शाहरुख खान की फिल्में उन्हें पसंद नहीं आतीं। रणबीर कपूर, शाहिद कपूर, कट्रीना कैफ और प्रियंका चोपड़ा का उन्होंने नाम भी नहीं सुना है। हाल-फिलहाल में में केवल दबंग ही महीने भर चल पाई। इस बानगी से हम समझ सकते हैं कि देश के अंदर ही फिल्मों और सितारों की पसंद में कितना फर्क है। हम फिल्मों की चर्चा करते समय इन दर्शकों के बारे में सोचते भी नहीं। क्या इन दर्शकों की रुचि पर विचार किए बिना हिंदी सिनेमा का सम्यक अध्ययन किया जा सकता है?


Tuesday, August 31, 2010

हिंदी सिनेमा में खलनायक-मंजीत ठाकुर

मंजीत ठाकुर

हिंदी फिल्मों का एक सच है कि अगर नायक की को बड़ा बनाना हो तो खलनायक को मजबूत बनाओ। उसे नायक जैसा बना दो। यह साबित करता है कि रामायण और महाभारत केवल राम और कृष्ण की वजह से ही नहीं, रावण और दुर्योधन की वजह से भी असरदार हैं।

हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक में धार्मिक कथाओं और किंवदंतियों पर सारी फ़िल्में बनीं। इन कथाओं के नायक देव थे और खलनायक राक्षसगण।

हिंदुस्तानी सिनेमा में गांधी जी असर बेहद खास था और शायद इसी वजह से पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर नहीं थे और उनके चरित्र भी सुपरिभाषित नहीं थे। उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वासग्रस्त लोग थे।

अछूत कन्यामें प्रेम-कथा के विरोध करने वाले जाति प्रथा में सचमुच विश्वास करते थे। इसीतरह महबूब खान की नज़मामें पारंपरिक मूल्य वाला मुसलिम ससुर परदा प्रथा नामंजूर करने वाली डॉक्टर बहू का विरोध करता है और 1937 में दुनिया ना मानेका वृद्ध विधुर युवा कन्या से शादी को अपना अधिकार ही मानता है।

पचास और साठ के दशक में साहूकार के साथ दो और खलनायक जुड़े- डाकू और जमींदार। खलनायक का ये चरित्र साहूकारी पाशका सूदखोर महाजन मंटो की लिखी किसान हत्यासे होते हुए अपनी बुलंदियों पर महबूब खान की औरतमें पहुंचा और कन्हैयालाल ने इसी भूमिका को एक बार फिर1956 में मदर इंडियामें प्रस्तुत किया।

भारत में डाकू की एक छवि रॉबिनहुडनुमा व्यक्ति की भी रही है और समाज में मौजूद अन्याय और शोषण की वजह से मजबूरी में डाकू बनने वाले किरदार लोकप्रिय रहे हैं। सुनील दत्त की सतही मुझे जीने दोके बाद यह पात्र दिलीप कुमार की गंगा-जमुनामें 'क्लासिक डायमेंशन' पाता है।

सत्तर और अस्सी के दशक में तस्कर और व्यापारी विलेन बन गए और अब वे अधिक सुविधा-सम्पन्न और खतरनाक भी हो गए थे। चूंकि स्मगलिंग विदेशों में होती थी, इसलिए खलनायक के साथ एक अंग्रेज-सा दिखने वाला किरदार भी परदे पर आने लगा, जो दर्शर्कों की सहूलियत के लिए हिन्दी बोलता था।

यह उस युग की बात है जब अर्थनीति 'सेंटर' में थी और आज जब अर्थनीति की रचना में लेफ्टशामिल है, ‘गुरूजैसी फ़िल्म बनती है जिसमें पूंजीपति खलनायक होते हुए भी नायक की तरह पेश है और आख़िरी रील में वह स्वयं को महात्मा गाँधी के समकक्ष खड़ा करने का बचकाना प्रयास भी करता है।

पाँचवे और छठे दशक में ही देवआनंद के सिनेमा पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय में अमेरिका में पनपे (noir) नोए सिनेमा का प्रभाव रहा और खलनायक भी जरायमपेशा अपराधी रहे हैं जो महानगरों के अनियोजित विकास की कोख से जन्मे थे।

फिर समाज में हाजी मस्तान का उदय हुआ। सलीम-जावेद ने मेर्लिन ब्रेंडो की वाटर फ्रंटके असर और हाजी मस्तान की छवि में दीवारके एंटी-नायक को गढ़ा जिसमें उस दौर के ग़ुस्से को भी आवाज़ मिली।

इसी वक्त नायक-खलनायक की छवियों का घालमेल भी शुरु हुआ। श्याम बेनेगल की अंकुरऔरनिशांतमें खलनायक तो जमींदार ही रहे लेकिन अब वे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे। इसी क्रम में पुलिस में अपराध के प्रवेश को गोविंद निहलानी की अर्धसत्यमें आवाज मिली और पुलिस के राजनीतिकरण और जातिवाद के असर को देवमें पेश किया गया।

इसी दौरान खलनायक अब पूरे देश पर अपना अधिकार चाहने लगे। सिनेमा ने अजीबोगरीब दिखने वाले, राक्षसों-सी हंसी हंसने वाले, सिंहासन पर बैठे, काल्पनिक दुनिया के से खलनायकों को जन्म दिया। शाकाल, डॉक्टर डैंग और मोगेंबो इन्हीं में से थे।

इसी बीच 1975 में एक ऐसा खलनायक आया जिसके बुरा होने की कोई वजह नहीं थी। वह बस बुरा था। वह गब्बर सिंह था, जिसका नाम सुनकर पचास कोस दूर रोते बच्चे भी सो जाते थे। हिन्दी समझने वाला ऐसा भारतीय मुश्किल ही मिलेगा, जिसने अब तेरा क्या होगा बे कालियान सुना हो।

अमजद खान के बाद वैसा खौफ सिर्फ दुश्मनऔर संघर्षके आशुतोष राणा ने ही पैदा किया। इन दोनों फिल्मों का सीरियल किलर नब्बे के दशक के उत्तरार्ध के उन खलनायकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो मानसिक रूप से बीमार थे।

मानसिक अपंगता के साथ शारीरिक अपंगता भी बॉलीवुड में खलनायकों के गुण की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। अपनी क्षतिग्रस्त आंख के कारण ललिता पवार सालों तक दुष्ट सास के रोल करती रहीं।डरके हकलाते शाहरुख और ओमकाराका लंगड़ा त्यागी भी इसी कड़ी में हैं।

इसी बीच हीरो हीरोइन के घर से भागकर शादी करने वाली फिल्मों ने उनके माता-पिता को ही खलनायक बनाना शुरु कर दिया। इसके उलट बागबानऔर अवतारकी संतानें अपने माता-पिता की खलनायक ही बन गईं। कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा तो रोजाने पाकिस्तान और आतंकवादियों के रूप में बॉलीवुड को एक नया दुश्मन दिया। इन्ही दिनों बॉलीवुड के चरित्न वास्तविक जीवन के चरित्नों की तरह आधे भले-आधे बुरे होने लगे। परिंदा’, ‘बाजीगर’, ‘डर’, ‘अंजामऔर अग्निसाक्षी जैसी फिल्मों ने एक नई परिपाटी शुरु की, जिनके मुख्य चरित्न नकारात्मकता लिए हुए थे।

लेकिन पहले सूरज बड़जात्या और फिर आदित्य चोपड़ा और करण जौहर ने अपनी फिल्मों से विलेन को गायब कर दिया। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में पिता शुरु में विरोध करते हैं और लगता है कि वे हीरो-हीरोइन के प्रेम में विघ्न पैदा करेंगे, लेकिन हीरोइन उनसे बगावत नहीं करती और हीरो मुकाबला नहीं करता। दोनों पिता का दिल जीतते हैं, इस कहानी में हीरोइन का मंगेतर हीरो के मुकाबले में आता है, लेकिन पूरी कहानी में उसकी जगह किसी प्यादे से ज्यादा नहीं है।

संयोग ऐसा रहा कि तीनों की फिल्में सफल रहीं। लिहाजा बाकी निर्देशकों को भी लगा कि अब फिल्मों में विलेन की जरूरत नहीं रह गई है। पिछले दस सालों में तनुजा चंद्रा की फिल्म दुश्मन का गोकुल पंडित ही ऐसा विलेन आया है, जिसे देखकर घृणा होती है। फिल्मों से खलनायकों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि फिल्मों की कहानियों से नाटकीयता गायब हो गई है।

बहरहाल, सिनेमा अपने एकआयामी चरित्रों और कथानकों के साथ जी रहा है, लेकिन तय है कि खलनायकों की वापसी होगी, क्योंकि खलनायकत्व उत्तेजक है।


Wednesday, July 21, 2010

समाज का अक्स है सिनेमा - मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा पर मंजीत ठाकुर ने यह सिरीज आरंभ की है।
भाग-1

सिनेमा, जिसके भविष्य के बारे में इसके आविष्कारक लुमियर बंधु भी बहुत आश्वस्त नहीं थे, आज भारतीय जीवन का जरूरी हिस्सा बना हुआ है। 7 जुलाई 1896, जब भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था, तबसे आज तक सिनेमा की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है। हम अपने निजी औरसामाजिक जीवन की भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम ही दिखेगा।

सिनेमा ने समाज के सच को एक दस्तावेज़ की तरह संजो रखा है। चाहे वह 1930 में आर एस डी चौधरी की बनाई व्रत हो, जिसमें मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्म को बैन भी कर दिया था, चाहे 1937 में वी शांताराम की दुनिया न माने। बेमेल विवाह पर बनी इस फिल्म को सामाजिक समस्या पर बनी कालजयी फिल्मों में शुमार किया जा सकता है।

जिस दौर में पाकिस्तान अलग करने की मांग और सांप्रदायिक वैमनस्य जड़े जमा चुका था, 1941 में फिल्म बनी पड़ोसी, जो सांप्रदायिके सौहार्द्र पर आधारित थी। फिल्म शकुंतला के भरत को नए भारत के मेटाफर के रुप में इस्तेमाल किया गया था। जाति हालांकि आज भी लगान और राजनीति तक में दिखी है,लेकिन इससे बहुत पहले 1936 में ही देविका रानी और अशोक कुमार बॉम्बे टॉकीज़ की अछूत कन्या में जाति प्रथा का मुद्दा उठा चुके थे। दलित मुद्दे पर फिल्मों में बाद में बनी फिल्म सुजाता को कोई कैसे बिसरा सकता है।

देश आजाद हुआ तो एक नए किस्म का आदर्शवाद छाया था। फिल्में भी इस लहर से अछूती नहीं थीं। देश के नवनिर्माण में उसने कदमताल करते हुए युवा वर्ग को नई दिशा, नया सोच और नए सपने बुनने के अवसर प्रदान किए।

50 का दशक संयुक्त परिवार और सामाजिक समरता की फ़िल्मोंका दशक था। संसार’, ‘घूँघट’,घराना’, औरगृहस्थीजैसी फ़िल्मों ने समाज की पारिवारिक इकाई में भरोसे को रुपहले परदे पर आवाज़ दी।

इन्हीं मूल्यों और सुखांत कहानियों के बीच कुछ ऐसी फिल्में भी इस दौर में आईं, जिनने समाज में वैचारिक स्तर पर आ रहे बदलाव को रेखांकित भी किया।

एक ओर तो राज कपूर-दिलीप कुमार-देव आनंद की तिकड़ी अपने रोमांस के सुनहरे रोमांस से दुनिया जीत रहे थे। लेकिन राज कपूर की फिल्मों एक वैचारिक रुझान साफ दिख रहा था, और वह असर था मार्क्सवादका। गौरी से करिअर शुरु करने वाले राज कपूर अभिनेता के तौर पर चार्ली चैप्लिन का भारतीय संस्करण पेश करने की कोशिश में थे। हालांकि श्री 420 में वह नायिका के साथ एक ही छतरी के नीचे बारिश में भींगकर गाते भी हैं, और इस तरह राज कपूर ने दब-छिप कर रहने वाले भारतीय रोमांस को एक नया अहसास दिया।

हालांकि, भारतीय सिनेमा के संदर्भ में किसी विचारधारा की बात थोड़ी विसंगत लग सकती है। लेकिन पचास के दशक के शुरुआती दौर में विचारधारा का असर फिल्मों पर दिखा। बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन भारत में नव-यथार्थवाद का मील का पत्थर है।

लेकिन ज्यादातर भारतीय फिल्मों में वामपंथी विचारधारा के दर्शन होते हैं वह कोई क्रांतिकारी विचारधारा न होकर सामाजिक न्याय की हिमायत करने वाली है। इसमें समाज सुधार, भूमि सुधार,गाँधीवादी दर्शन और सामाजिक न्याय सभी कुछ शामिल है। लेकिन हर आदर्शवाद की तरह फिल्मों का यह गांधी प्रेरित आदर्शवाद ज्यादा दिन टिका नहीं। ऐसे में आराधना से राजेश खन्ना का आविर्भाव हुआ। खन्ना का रोमांस लोगों को पथरीली दुनिया से दूर ले जाता, यहां लोगों ने परदे पर बारिश के बाद सुनसान मकान में दो जवां दिलों को आग जलाकर फिर वह सब कुछ करते देखा, जो सिर्फ उनके ख्वाबों में था।

इस तरह का पलायनवाद ज्यादा टिकाऊ होता नहीं। सो, ताश के इस महल को बस एक फूंक की दरकार थी। दर्शक बेचैन था। मंहगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और पंगु होती व्यवस्था से लड़ने वाली एक बुलंद आवाज़ कीज़रुरत थी। ऐसे में एक लंबे लड़के की बुलंद आवाज़ परदे पर गूंजने लगी गई। इस नौजवान के पास इतना दम था कि वह व्यवस्था से खुद लोहा ले सके, और ख़ुद्दारी इतनी कि फेंके हुए पैसे तक नहीं उठाता।

कुछ लोग तो इतना तक कहते है कि अमिताभ के इसी गुस्सेवर नौजवान ने सत्तर के दशक में एक बड़ी क्रांति की राह रोक दी। बहरहाल, अमिताभ का गुस्सा भी कुली, इंकलाब आते-आते टाइप्ड हो गया। जब भी इस अमिताभ ने खुद को या अपनी आवाज को किसी मैं आजाद हूं में, या अग्निपथ में बदलना चाहा, लोगों ने स्वीकार नहीं किया।

तो नएपन के इस अभाव की वजह से लाल बादशाह, मत्युदाता, और कोहराम का पुराने बिल्लों और उन्हीं टोटकों के साथ वापस आया अमिताभ लोगों को नहीं भाया। वजह- उदारीकरण के दौर में भारतीय जनता का मानस बदल गया था। अब लोगो के पास खर्च करने के लिए पैसा था, तो वह रोटी के मसले पर क्यों गुस्सा जाहिर करे।

ऐसे में एक और नए लड़के ने दस्तक दी। यह लड़का कूल है, इतना कि अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक चला आए। परदेसी भारतीयों की कहानियों पर और परदेसी भारतीयों के लिए बनाई गई फिल्मों में शाहरुख खान का किरदार राज मल्होत्रा एक सिंबल के तौर पर उभरा।

हालांकि, परदेसी भारतीयों के लिए बनाए जा रहे सिनेमा में तड़क-भड़क ज्यादा हो गया और भारत के आम आदमी का सिनेमा के कथानक से रिश्ता कमजोर हो गया। ऐसे में मिड्ल सिनेमा ताजा हवा का झोंका बनकर आया है। व्यावसायिक रुप से सफल इन फिल्मों का क्राफ्ट और कंटेंट दोनों मुख्यधारा की फिल्मों से बेहतर है। आमिर खान की लगान, तारे ज़मीन पर जैसी कई फिल्मों, शाहरुख की स्वदेश और चक दे इंडिया,और श्याम बेनेगल की वेवकम टू सज्जनपुर और बेलडन अब्बा ने सामयिक विषयों को फिल्मो में जगह दी है। और तब अलग से यह कहने की ज़रुरत रह नही जाती कि सिनेमा समाज का अक्स है।