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फिल्‍म समीक्षा : कोयलांचल

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  आशु त्रिखा की फिल्म 'कोयलांचल' कुख्यात कोल माफिया की जमीन को टटोलती हुई एक ऐसे किरदार की कहानी कहती है, जिसकी क्रूरता एक शिशु की मासूम प्रतिक्रियाओं से बदल जाती है। आशु त्रिखा ने मूल कहानी तक पहुंचने के पहले परिवेश चित्रित करने में ज्यादा वक्त लगा दिया है। नाम और इंटरवल के पहले के विस्तृत निरूपण से लग सकता है कि यह फिल्म कोल माफिया के तौर-तरीकों पर केंद्रित होगी। आरंभिक विस्तार से यह गलतफहमी पैदा होती है। 'कोयलांचल' में व्याप्त हिंसा और गैरकानूनी हरकतों को आशु त्रिखा ने बहुत अच्छी तरह चित्रित किया है। मालिक (विनोद खन्ना) के अमर्यादित और अवैध व्यवहार की मुख्य शक्ति एक व्यक्ति करुआ है। मालिक के इशारे पर मौत को धत्ता देकर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार करुआ स्वभाव से हिंसक है। संयोगवश एक शिशु के संपर्क में आने पर उसकी क्रूरता कम होती है। वह संवेदनाओं से परिचित होता है। वह पश्चाताप करता है और अपने व्यवहार में बदलाव लाता है। इस फिल्म में हिंसा जघन्यतम रूप में दिखती है। आशु त्रिखा का उद्देश्य अपने मुख्य किरदार को पेश करने के लिए उचित परिवे…

धर्मयुग की पत्रकारिता से संवाद लेखन में मुड़ गया-संजय मासूम

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  संजय मासूम ने पहली फिल्‍म 'जोर' से ही जोरदार दस्‍तक दी। उनकी अगली फिल्‍म 'कृष 3' नवंबर में आ रही है। संजय ने यहां संवाद लेखन के प्रति अपने झुकाव,चुनौती और स्थिति की बातें की हैं। -काफी व्यस्त हो गए हैं आप?अभी क्या-क्या काम चल रहा है?
0 अभी राजश्री की फिल्म ‘सम्राट एंड कंपनी’ खत्म की। उसकी शूटिंग शुरू हुई है। साथ ही यूटीवी की एक फिल्म है। कुणाल देशमुख उसके डायरेक्टर हैं। उसमें इमरान हाशमी और परेश रावल हैं। इसी महीने उसके डायलॉग खत्म किए हैं। वह अक्टूबर के एंड फ्लोर पर जा रही है। उसके बाद दो फिल्मों की रायटिंग शुरू करनी है। एक प्रवीण निश्चल और ई ़ निवास की फिल्म है। उसके बाद एक और इमरान हाशमी की फिल्म है। उसकी रायटिंग करनी है। पांच-छह जगहों में बातचीत चल रही है।
- ज्यादातर डायलॉग रायटिंग ही चलती है या स्क्रिप्ट रायटिंग, कहानी  ... 0 अभी तक संवादों पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन अब धीरे-धीरे सोच रहा हूं कि लेखन को थोड़ा सा विस्तार दिया जाए। हालांकि स्क्रीनप्ले लिखने की पहले भी कोशिश की है। डायलॉग में एक पहचान मिल गई है तो लोग डायलॉग की बात कर…

फिल्‍म समीक्षा : मर्डर 3

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लव की मिस्ट्री-अजय ब्रह्मात्मजफिल्मकार इन दिनों लोभ और दबाव में हर फिल्म का ओपन एंड रख रहे हैं। अभी तक हिंदी फिल्में एक इंटरवल के साथ बनती थीं। अब पर्दे पर फिल्म समाप्त होने के बाद भी एक इंटरवल होने लगा है। यह इंटरवल महीनों और सालों का होता है, जबकि फिल्म का इंटरवल चंद मिनटों में खत्म हो जाता है। तात्पर्य यह कि सीक्वल की संभावना में लेखक-निर्देशक फिल्मों को 'द एंड' तक नहीं पहुंचा रहे हैं। विशेष भट्ट की 'मर्डर 3' भी इसी लोभ का शिकार है। पूरी हो जाने के बाद भी फिल्म अधूरी रहती है। लगता है कि क्लाइमेक्स अभी बाकी है। भट्ट परिवार के वारिस विशेष भट्ट ने फिल्म निर्माण के अनुभवों के बाद निर्देशन की जिम्मेदारी ली है। भट्ट कैंप में फिल्मों के 'असेंबल लाइन' प्रोडक्शन में डायरेक्टर के लिए अधिक गुंजाइश नहीं रहती है। महेश भट्ट की छत्रछाया और स्पर्श से हर फिल्म परिचित सांचे में ढल जाती है। दावा था कि विशेष भट्ट ने भट्ट कैंप की शैली में परिष्कार किया है। दृश्य संरचना में ऊपरी नवीनता दिखती है, लेकिन दृश्यों का आंतरिक भावात्मक तनाव पुराने सूत्रों पर ही चलता है। इस …

सीक्वल एक्सपर्ट संजय मासूम

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