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Friday, October 25, 2013

बच्चों काे पसंद आएगी ‘कृष 3’-राकेश रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
- ‘कृष 3’ आने में थोड़ी ज्यादा देर हो गई? क्या वजह रही?
0 ‘कृष 3’ की स्क्रिप्ट बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। मैं खुश नहीं था। उसे ड्रॉप करने के बाद नई स्क्रिप्ट शुरू हुई। उसका भी 70 प्रतिशत काम हो गया तो वह भी नहीं जंचा। ऐसा लग रहा था कि हम जबरदस्ती कोई कहानी बुन रहे हैं। बहाव नहीं आ रहा था। भारत के सुपरहीरो फिल्म में गानों की गुंजाइश रहनी चाहिए। इमोशन और फैमिली ड्रामा भी पिरोना चाहिए। मुझे पहले फैमिली और बच्चों को पसंद आने लायक कहानी चुननी थी। उसके बाद ही सुपरहीरो और सुपरविलेन लाना था। फिर लगा कि चार साल हो गए। अब तो ‘कृष 3’ नहीं बन पाएगी। आखिरकार तीन महीने में कहानी लिखी गई, जो पसंद आई। 2010 के मध्य से 2011 के दिसंबर तक हमने प्री-प्रोडक्शन किया।
- प्री-प्रोडक्शन में इतना वक्त देना जरूरी था क्या?
0 उसके बगैर फिल्म बन ही नहीं सकती थी। हम ने सब कुछ पहले सोच-विचार कर फायनल कर लिया। पूरी फिल्म को रफ एनीमेशन में तैयार करवाया। कह लें कि एनीमेटेड स्टोरी बोर्ड तैयार हुआ। अपने बजट में रखने के लिए  सब कुछ परफेक्ट करना जरूरी था। मेरे पास हालीवुड की तरह 300 मिलियन डॉलर तो है नहीं। स्ट्रांग कहानी और कंटेंट को फिल्माने के लिए सही स्ट्रक्चर जरूरी था। कृष इस फिल्म में मनुष्यों से नहीं लड़ता। उसकी लड़ाई मानवरों (म्यूटैंट््स) से होती है। वे मानवर तैयार करने पड़े। इतनी तैयारियों मे बाद भी मैं डरा हुआ था। रितिक से भी मैंने कहा कि इसे बंद करते हैं। उसने मुझे प्रेरित किया। जब विवेक का मैंने पहला शॉट ले लिया तो कंफीडेंस आया। 6 महीने में शूटिंग खत्म कर वीएफएक्स के पास भेज दिया गया।
- पोस्ट-प्रोडक्शन भी तो टफ रहा होगा? वीएफएक्स का इतना काम है?
0 शूटिंग खत्म होने के बाद मुझे पोस्ट प्रोडक्शन में लगना पड़ा। स्टूडियो में जाकर वीएफएक्स टीम के साथ बैठना पड़ा। सात-आठ करेक्शन के बाद अपनी कल्पना पर्दे पर उतरती थी। कल्पना को कम्युनिकेट करना मुश्किल काम होता है। मैंने फैसला लिया था कि विदेश नहीं जाऊंगा। मेरी राय में अपने देश के टेक्नीशियन काबिल हैं। हालीवुड की फिल्मों का वीएफएक्स काम भी भारत में होता है। हमारी समस्या है कि हम अपने टेक्नीशियन पर भरोसा नहीं करते और पर्याप्त समय नहीं देते। काम थोपने की हमारी चाहत और आदत भी बन गई है।
- ‘कृष 3’ जैसी फिल्म के लिए तकनीकी और साइंटिफिक जानकारी भी जरूरत पड़ी होगी?
0 टेकनीक और साइंस से ज्यादा कॉमन सेंस की जरूरत पड़ती है। बस थोड़ा सा दिमाग लगाना पड़ता है। ज्यादातर लोग वही बनाते और दिखाते हैं,जो वे देख चुके हैं। उसमें नवीनता नहीं रहती।
- आप पर भी तो 100 करोड़ क्लब का दबाव होगा? इस ट्रेंड के बारे में क्या कहेंगे्र
0 यह अच्छा नहीं है। 100 करोड़ तो बी क्लास फिल्मों का टारगेट है। भारत जैसे देश में ए क्लास फिल्म को ढाई सौ करोड़ का कारोबार करना चाहिए। इतने थिएटर और दर्शक हैं। ‘3 इडियट’ ने कम थिएटर के जमाने में उतना बिजनेस किया। वह ए क्लास फिल्म थी। मैं किसी दबाव में नहीं हूं। अभी एक दिन का अच्छा बिजनेस हो तो 40 करोड़ कलेक्ट हो सकता है। मैं तो आश्वस्त हूं। यूट््यूब पर ट्रेलर देखने वालों की संख्या को संकेत मानें तो पूरी उम्मीद बनी है।
- फिल्म के किरदारों के बारे में कुछ बताएं?
0 रोहित और कृष के बीच काफी सीन है। बाप-बेटे की कहानी चलेगी। कृष कहीं टिक कर नौकरी नहीं कर पाता। जब भी उसे कहीं से आवाज आती है तो वह बचाने निकल पड़ता है। बीवी भी उससे नाराज रहती है। वास्तव में यह एक परिवार की कहानी है। इस परिवार में सुपरविलेन आता है। उसके बाद कहानी खुलती जाती है।
- सुपरविलेन के लिए विवेक ओबेराय को कैसे राजी किया?
0 वह रोल इतना अच्छा है कि रितिक खुद करना चाहता था। मैंने उसे डांटा कि रोहित, कृष्ण और सुपरविलेन तीनों तुम ही करोगे तो मैं शूटिंग कितने दिनों में करूंगा? स्क्रिप्ट लिखे जाने के बाद विवेक ओबेराय और कंगना रनोट ही हमारे दिमाग में थे। विवेक बहुत अच्छे एक्टर हैं। उन्हें सही पिक्चर नहीं मिल रही है। वे कैरेक्टर रोल में जंचते हैं। कंगना रनोट में खास स्टायल है। वह रूप बदलने में माहिर है।
- रितिक के बारे में क्या कहेंगे?
0 वह मेरा बेटा जरूर है, लेकिन बहुत ही पावरफुल एक्टर है। वह हर रोल में जंच जाता है। ‘गुजारिश’ का बीमार लगता है तो ‘कृष 3’ का हीरो भी लगता है। ‘कोई ़ ़ ़ मिल गया’ में बच्चे के रूप में भी जंचा था। ‘जोधा अकबर’ में वह बादशाह भी लगा। इतनी वैरायटी उसके समकालीनों में किसी और में नहीं दिखती। ‘कृष 3’ में बाप-बेटे का सीन देखिएगा। आप चकित रह जाएंगे।


Friday, September 13, 2013

फिल्‍म समीक्षा : ग्रैंड मस्‍ती

Grand Mastiसस्‍ती मस्‍ती 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
वर्तमान दौर में एडल्ट कॉमेडी के प्रति नाक-भौं सिकोड़ने की जरूरत नहीं रह गई है। इंद्र कुमार निर्देशित 'ग्रैंड मस्ती' इसी रूप में प्रचारित की गई है। पहले से मालूम है कि फिल्म में क्या परोसा जाएगा? सामान्य जिंदगी में हर तबके के स्त्री-पुरुष खास अवसरों और पलों में अश्लील और एडल्ट लतीफों का आनंद लेते हैं। इस फिल्म को हम सिपल एडल्ट कॉमेडी की तरह ही देखें।
एडल्ट कॉमेडी फिल्मों में सेक्स संबंधी हरकतें, प्रसंग और पहलू होते हैं। फिल्म के लेखक मिलाप झावेरी और तुषार हीरानंदानी ने पुरानी 'मस्ती' की स्टोरी लाइन को ही अपनाया है। उसे ही ग्रैंड करने की असफल कोशिश की है। चूंकि कहने या दिखाने के लिए लेखक-निर्देशक के पास ज्यादा कुछ नहीं है, इसलिए वे हंसाने के लिए बार-बार फूहड़ तरकीबें अपनाते हैं। सामान्य फिल्मों में ऐसे दृश्य और व्यवहार देखे जा चुके हैं।
मुख्य रूप से रीतेश देशमुख, विवेक ओबरॉय और आफताब शिवदसानी पर यह फिल्म टिकी है। तीनों कलाकारों से निर्देशक लगातार ओछी, फूहड़ और निम्नस्तरीय हरकतें करवाते हैं। फिल्म में ऐसी हरकतों के उपादान के लिए छह लड़कियां हैं। अमूमन ऐसी फिल्में पुरुषों के दृष्टिकोण से बनती है, इसलिए उपयोग-दुरुपयोग औरतों का ही होता है। उनकी सेक्सुएलिटी का दोहन किया जाता है।
इंद्र कुमार की 'ग्रैंड मस्ती' कहीं से भी ग्रैंड नहीं हो पाई है। दरअसल यह ब्रांड मस्ती का दोहराती सी है। नवीनता और मौलिकता की कमी से यह एडल्ट कॉमेडी ढंग से गुदगुदा भी नहीं पाती।
अवधि - 135 मिनट

Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : जिला गाजियाबाद

Movie review zila ghaziabad-अजय ब्रह्मात्मज
इसी हफ्ते रिलीज हुई 'काय पो चे' से ठीक उलट है 'जिला गाजियाबाद'। सब कुछ बासी, इतना बासी की अब न तो उसमें स्वाद रहा और न उबाल आता है। हाल-फिलहाल में हिट हुई सभी मसाला फिल्मों के मसाले लेकर बनाई गई एक बेस्वाद फिल्म ़ ़ ़ कोई टेस्ट नहीं, कोई एस्थेटिक नहीं। बस धूम-धड़ाका और गोलियों की बौछार। बीच-बीच में गालियां भी।
निर्माता विनोद बच्चन और निर्देशक आनंद कुमार ने मानो तय कर लिया था कि अधपकी कहानी की इस फिल्म में वे हाल-फिलहाल में पॉपुलर हुई फिल्मों के सारे मसाले डाल देंगे। दर्शकों को कुछ तो भा जाए। एक्शन, आयटम नंबर, गाली-गलौज, बेड सीन, गोलीबारी, एक्शन दृश्यों में हवा में ठहरते और कुलांचे मारते लोग, मोटरसायकिल की छलांग, एक बुजुर्ग एक्टर का एक्शन, कॉलर डांस ़ ़ ़ 'जिला गाजियाबाद' में निर्माता-निर्देशक ने कुछ भी नहीं छोड़ा है। हालांकि उनके पास तीन उम्दा एक्टर थे - विवेक ओबेराय, अरशद वारसी और रवि किशन, लेकिन तीनों के किरदार को उन्होंने एक्शन में ऐसा लपेटा है कि उनके टैलेंट का कचूमर निकल गया है। तीनों ही कलाकार कुछ दृश्यों में शानदार परफारमेंस देते हैं, फिर भी वे फिल्म में कुछ भी जोड़ नहीं पाते। यह उनकी सीमा नहीं है। पटकथा ऐसी बेतरतीब है कि वह न तो कहीं से चलती है और न कहीं पहुंचती है। इस कथ्यहीन फिल्म में संजय दत्त की कद्दावर मौजूदगी भी फिसड्डी रही है। संजय दत्त का आकर्षण ऐसी फिल्मों की वजह से तेजी से खत्म हो रहा है। इस फिल्म में अरशद वारसी और रवि किशन ने संजीदगी से अपने किरदारों को चरित्र दिया है। उनकी मेहनत पर पानी फिर गया है।
निर्माता-निर्देशक को लगता है कि उनकी फिल्म देश के आम दर्शक पसंद करेंगे। ऐसा नहीं है। आम दर्शकों के पापुलर टेस्ट का भी एक सलीका है। 'जिला गाजियाबाद' उनमें अरुचि ही पैदा करेगी।
-डेढ़ स्टार

Saturday, February 16, 2013

फिल्‍म समीक्षा : जयंता भाई की लव स्‍टोरी

Jayanta bhai ki luv story movie review

प्यार में भाईगिरी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्मों में गैंगस्टर और आम लड़की की प्रेम कहानी हम देखते रहे हैं। ऐसी फिल्मों में ज्यादातर लव स्टोरी का एंगल भर होता है, क्योंकि फिल्म का मुख्य उद्देश्य गैंगस्टर के आपराधिक जीवन के रोमांच पर रहता है। निर्देशक विनिल मार्कन नए रोमांच के साथ रोमांस के भी पर्याप्त दृश्य गढ़े हैं। मुंबई के उपनगर रिहाइशी इलाके में संयोग से आमने-सामने पड़ोसी की तरह रह रहे जयंता और सिमरन की लव स्टोरी अवश्रि्वसनीय होने के बावजूद रोचक लगती है।
विवेक ओबेराय निस्संदेह योग्य और समर्थ अभिनेता हैं। निगेटिव इमेज की वजह से उनका काफी नुकसान हो चुका है। दर्शकों के बीच सी एक हिचक बनी हुई है। 'जयंताभाई की लव स्टोरी' देखते हुए विवेक ओबेराय की प्रतिभा की झलक मिलती है। रफ एवं रोमांटिक दोनों किस्म की भूमिकाओं में वे जंचते हैं। 'जयंताभाई की लव स्टोरी' में हम उन्हें स्पष्ट रूप से दो भूमिकाओं में देखते हैं। उन्होंने दोनों का ही सुंदर निर्वाह किया है। अगर सिमरन की भूमिका में कोई बेहतर अभिनेत्री रहती तो फिल्म अधिक प्रभावित करती। लेखक ने सिमरन के चरित्र पर मेहनत की है, लेकिन वही मेहनत नेहा शर्मा के परफारमेंस में नहीं है।
'जयंताभाई की लव स्टोरी' में नायक-नायिका के आकर्षण और प्रेम के कॉमिकल इवेंट एक सीमा के बाद बचकाने लगने लगते हैं। हालांकि लेखक-निर्देशक ने फिल्म के मध्य में इंटरेस्टिंग ट्विस्ट रखा है, फिर भी यह लव स्टोरी बार-बार ठहर जाती है। अपनी भूमिका निभाने में विवेक ओबेराय स्फूर्ति और गति लाते हैं, लेकिन नेहा शर्मा की शिथिलता दृश्यों को असंतुलित और कमजोर कर देती है। इस असंतुलन के कारण ही फिल्म अंतिम प्रभाव में कमजोर हो जाती है।
गैंगस्टर के रूप में विवेक ओबेराय को देखते हुए उनकी पहली फिल्म 'कंपनी' की याद आ सकती है। दरअसल, अधिकांश निगेटिव किरदारों की प्रतिक्रियाएं और मुद्राएं एक सी होती हैं। विवेक ओबेराय ने एक्शन और नाटकीय दृश्यों में कुछ नया करने की कोशिश की है। उन्हें जाकिर हुसैन का भरपूर सहयोग मिला है। ऐसी गौण भूमिकाओं में भी जाकिर हुसैन जान डाल देते हैं। निश्चित ही उन्हें बेहतर और बड़े किरदार मिलने चाहिए।
'जयंताभाई की लव स्टोरी' में जबरन गाने डाले गए हैं।
-अवधि-128 मिनट
-ढाई स्टार

Wednesday, December 5, 2012

संग-संग : विवेक ओबेराय-प्रियंका अल्‍वा ओबेराय

-अजय ब्रह्मात्मज 
फिल्म अभिनेता विवेक ओबेरॉय की पत्नी हैं प्रियंका अल्वा। दो साल पहले उनकी शादी हुई। प्रियंका गैरफिल्मी परिवार से हैं। दोनों की पहली मुलाकात में किसी फिल्मी संयोग की तरह रोमांस जगा और वह जल्दी ही शादी में परिणत हो गया। आरंभ में विवेक ओबेरॉय के प्रति प्रियंका थोड़ी सशंकित थीं कि फिल्म स्टार वास्तव में असली प्रेमी और पति के रूप में न जाने कैसा होगा? फिल्म सितारों के रोमांस और प्रेम के इतने किस्से गढ़े और पढ़े जाते हैं कि प्रियंका की आशंका को असहज नहीं माना जा सकता। इस मुलाकात में दोनों ने दिल खोलकर अपनी शादी, रोमांस और दांपत्य जीवन पर बातें की हैं।  
विवेक : अमेरिका के फ्लोरेंस में एक सेतु है। उसका नाम है सांटा ट्रीनीटा, जिसे सामान्य अंग्रेजी में होली ट्रीनीटी कहेंगे। हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है। वैसे ही वह एक पवित्र त्रिमूर्ति सेतु है। हम पहली बार वहां मिले। उस सेतु ने हमे जोड़ दिया। सूर्यास्त के पहले हम दोनों बातें करने बैठे। यही कोई साढ़े पांच बजे का समय रहा होगा। इन्हें आते देखकर मन में एक अहंकार जागा कि यार मम्मी-पापा ने कहां फंसा दिया। उन्होंने मुझे कहां भेज दिया। मैं पूरे नखरे के साथ टालने के अंदाज में इनसे मिलने गया था। इरादा था कि घंटे-दो घंटे बात करके मैं निकल जाऊंगा। यूं समझें कि हाजिरी लगाने चला गया था। प्रियंका आईं तो सबसे पहले इनकी सादगी को देखकर मैं चौंक गया। फ्लैट चप्पल,कोई मेकअप नहीं, बालों को पीछे बांध कर एक फूल खोंस लिया था। साधारण लिनेन के कपड़े पहने थे। ऐसे ही मिलने आ गइ थीं। कोई सज-धज नहीं। कोई कृत्रिमता नहीं। उस सादगी में गजब की खूबसूरती थी। मेरा मन कहने लगा कि यह लडक़ी अपनी सादगी में कितनी सहज और सुरक्षित है। इसे अहसास नहीं है कि एक फिल्म स्टार से मिलने जा रही है, जो कि उसका पति हो सकता है। जिसकी इतनी ग्लैमरस गर्लफ्रेंड्स रही हैं। मुझे उनकी सादगी में एक विजन दिखा। सूर्यास्त देखते हुए हमारी बातें शुरू हुईं। बातों में भी मजा आया। यहां तक कि बातों के बीच की खामोशी भी अच्छी लग रही थी। उस खामोशी में एक खूबसूरत लय थी। पहली मुलाकात का बहुत सुंदर अनुभव रहा। उस मुलाकात में ही घंटी बज गई- यही है। इसी का इंतजार था। वक्त किसी फंतासी समय की तरह बीता। जब हम परिवेश को लेकर सजग हुए तो पता चला कि आसपास सारी गतिविधियां रूक गई हैं। माहौल में सन्नाटा है। मैंने अपना मोबाइल निकाल कर ऑन किया और समय देखा तो रात के ढाई बज रहे थे। शायद नौ-दस घंटे हमने बातें की थीं। खामोशियों का आनंद लिया था। रात ढाई बजे इनकी मम्मी को फोन किया कि थोड़ी देर हो गई। उधर से जवाब आया- थोड़ी? कहां थे आप लोग? हम तो डर गए थे। पता है क्या वक्त हो रहा है? मैंने माफी मांगी और कहा कि बस आप के यहां ड्रॉप करता हूं। सडक़ पर कोई टैक्सी नहीं। बड़ी मुश्किल से किसी ने मदद की। वह एक बांग्लादेशी था। वह अपना फैन निकला। वह अपनी पिज्जा की दुकान बंद कर रहा था। मैंने उससे आग्रह किया कि भइया एक तो कुछ खिला दे और हमारे लिए एक टैक्सी का इंतजाम कर दे। उसने अपने किसी परिचित को फोन कर बुला दिया।  
प्रियंका : विवेक ने सब बात सच-सच कही। मैं भी अपनी मां के कहने पर इनसे मिलने के लिए राजी हो गई थी। इनमें सबसे निगेटिव प्वॉइंट यही था कि ये फिल्म स्टार थे। मैंने घरवालों को समझाया भी कि आप लोग पागल हो गए हो? कहां हिंदी फिल्मों का स्टार और कहां मैं.. हम लोग कहीं मिलते-जुड़ते नहीं हैं। हिंदी फिल्मों में मेरा इंटरेस्ट भी नहीं है। मैं ना कहने के लिए तो नहीं गई थी। मेरा एक जीवन दर्शन है कि किसी भी चीज के लिए ना नहीं कहो। एक अनुभव तो मिल ही जाता है। उस अनुभव के बाद ही हां या ना का निर्णय लेना चाहिए। कई बार समय का खेल होता है। हम बिल्कुल अपेक्षा नहीं रखते और कोई बड़ी बात हो जाती है। विवेक से पहली मुलाकात में ऐसा ही हुआ। पता ही नहीं चला कि कैसे हमलोग नौ-दस घंटे तक बातें करते रहें। अभी आप पूछें कि क्या बात हुई तो बता भी न पाएं कि क्या बात हुईं? यूं समझे कि मैंने अपने सारे सवाल इनके सामने रखे और इन्होंने अपनी बातें रखीं। विवेक ने सब कुछ सच-सच बता दिया। कुछ भी नहीं छिपाया। मेरे लिए वह खास बात है। हर संबंध की बुनियाद ईमानदारी होती है। उस मुलाकात से ही विवेक अच्छे लगने लगे। समय बीतने के साथ यह भाव बढ़ता गया।
 विवेक : हमें तो उसी क्षण पता चल गया था। मैंने तय कर लिया था कि शादी करूंगा तो प्रियंका से ही करूंगा। हिंदुस्तान में तब सुबह के सात-आठ बज रहे होंगे। प्रियंका पिज्जा खा रहीं थीं। मैंने मम्मी को फोन किया और बताया कि मुझे लग रहा है कि आप लोग सही थे। बड़ी मुश्किल होता है खुद को गलत मानना। मैंने मम्मी से पूछा कि एक दिन और रूक जाऊं क्या? उन्होंने हंसते हुए कहा, रह लो, रह लो। हमें तो पता ही था। बहरहाल, उस रात इन्हें लेकर घर पहुंचाने चला। रात के साढ़े तीन बज गए थे। मैंने इन्हें समझाया कि देखो चुपके से घर में चली जाना। मैं सुबह में माफी मांग लूंगा। मैं जैसे ही दरवाजे पर पहुंचा तो अचानक घर की सारी बत्तियां जल गईं और परिवार के सभी सत्रह सदस्य मिलने आ गए। उस रात मैंने सभी को एक-एक कर नमस्कार, प्रणाम और पैरी-पौना किया। चेहरे पर शर्म की लहर आ-जा रही थी। प्रियंका अपने परिवार की सबसे चहेती हैं। हमारी मुलाकात का परिणाम जानने के लिए बच्चे से बड़े तक सभी जगे हुए थे। सबसे विदा होकर लौटा और पांच घंटे के बाद फिर से गाड़ी लेकर हाजिर हो गया। घरवालों को बताया कि थोड़ी देर में घूमकर आते हैं। मन में एक ही बात घुमड़ रही थी कि कैसे इनसे कहूं कि आप ही के साथ शादी करनी है। एक ही दिन पहले तो मुलाकात हुई है। इन्हें यह भी न लगे कि मामला फिल्मी हो रहा है। हम तो हैं हीं फिल्मी। घूमते-फिरते एक विनियार्ड में गए। इनके चक्कर में मैं तीन दिन फ्लोरेंस में रूक गया। जब ये लोग वहां से निकलने लगे तो मेरे अंदर यह अहसास जागा कि कल प्रियंका नहीं मिलेंगी। मैंने यही कहा कि आप लोग अपना फैसला जब भी बताएं। मेरा तो यही कहना है कि जीवन में कभी शादी करूंगा तो इन्हीं से करूंगा। प्रियंका से मैंने कहा कि अगर आपसे शादी नहीं हुई तो शादी नहीं करूंगा। प्रियंका हंसने लगीं। फिर भी हां या ना नहीं कहा। मुझे लटकाए रखा काफी समय तक। 
 प्रियंका : लटकाने जैसी बात नहीं थी। विवेक जंच तो गए थे। मन में वे ठीक-ठीक लग रहे थे। बोलने में देरी हुई। मुझे आमतौर पर कोई भी निर्णय लेने में देर लगती है। हर चीज को अच्छी तरह देख-समझ कर ही फैसला लेती हूं। मैं हूं तो गैरफिल्मी, लेकिन मेरी मुलाकात, मेरी रजामंदी और फिर मेरी शादी सब कुछ फिल्मों की तरह नाटकीय हो गया। सभी हंसते हैं। तब से लगने लगा है कि नेवर से नेवर टू एनिथिंग। प्रियंका : मेरा फिल्मों से कोई संबंध नहीं रहा। ज्यादा फिल्में नहीं देखती थीं। मेरा बैकग्राउंड थोड़ा अलग रहा है। परिवार में रीयल एस्टेट का बिजनेस है। उसमें थोड़ा हाथ बंटाती थी। मेरा पैशन नॉन प्रॉफिट जॉब में था। मेरी एक संस्था है। वह क्लासिकल डांस और म्यूजिक के लिए काम करती है। हमारी संस्था लुप्त हो रही कलारूपों को बचाने का काम करती है। हम उनहें नए तरीके से नए पैकेज में लोगों के बीच ले जाते हैं। पर्यावरण के मुद्दों पर भी काम करती रही हूं।  
विवेक : इनके काम और पैशन से मैं बहुत प्रभावित हुआ। शादी के लिए राजी होने के बाद हम दोनों ने सबसे पहले अपने गुरूजी के सान्निध्य में एक-दूसरे को पति-पत्नी माना। फिर हमने कोर्ट मैरिज किया। बैंगलोर में इनका आलीशान मकान है, जिसके पास एक झील भी है। इनका मन था कि उस झील के किनारे हमारी शादी हो। वहां औपचारिक शादी हुई। फिर मुंबई लौटकर शानदार रिसेप्शन हुआ। बैंगलोर में प्रियंका का घर सिर्फ छह एकड़ में है, जिसमें नारियल और चमेली के पेड़ हैं। अपनी बात कहूं तो असली शादी हमारी गोकर्ण में गुरूजी के सान्निध्य में हुई। वहां कुछ ही करीबी लोग थे। तारीखों में बताऊं तो हम 4 जुलाई को मिले, 7 सितंबर को सगाई की और 29 अक्टूबर को शादी कर ली। कह सकते हैं कि हमारी चट मंगनी, पट शादी हुई। दरअसल, फ्लोरेंस से लौट कर आने के बाद पिताजी ने मेरी हालत देखते हुए पंद्रह दिनों के बाद इनकी मम्मी को फोन किया कि शादी की तारीख तय कर दें, नहीं तो मेरा बेटा बीमार हो जाएगा। पंडितों से मशविरा किया गया तो 2011 की तारीखें निकल रहीं थीं। मैंने साफ कहा, इतना इंतजार तो नहीं कर सकता मैं। शादी से पहले मौका मिलते ही मैं बैंगलोर पहुंच जाता था। तब मेरी जिंदगी वाया बैंगलोर चल रही थी। फोन पर लंबी बातें हो रहीं थीं। सब मिलाकर यही लगा कि जल्दी शादी कर लेनी चाहिए।  
प्रियंका : विवेक हालांकि फिल्मों में काम करते हैं और फिल्म स्टार हैं। कहा जाता है कि फिल्में फंतासी होती हैं, लेकिन विवेक बहुत ही रीयल व्यक्ति हैं। खुले दिल से बातें करते हैं। मुझे हमेशा लगा कि विवेक जजमेंटल नहीं हैं। मैं खुद को या इनको सही या गलत ठहराने के बजाय इस बात पर ज्यादा जोर देती रही कि दो व्यक्तियों का संबंध सहज ढंग से विकसित हो। इनसे मिलकर मुझे लगा कि जिंदगी की सर्च पूरी हो गई है। मुझे एहसास हुआ कि पर्सनल और प्रोफेशनल गोल पूरे किए जा सकते हैं। एक-दूसरे को लेकर हमारे बीच अच्छी समझदारी बनी और उसी से सम्मान भी जागा। मेरे ख्याल में शादी में यह बहुत जरूरी है कि पति-पत्नी की जिंदगी का रास्ता एक ही हो। शादी के बाद सब की तरह हमें भी थोड़ा वक्त लगा। सच कहूं तो मुझे फिल्में और मुंबई कभी पसंद नहीं थी। अब सब कुछ यहीं है। मैं तो इस बात के लिए मम्मी-पापा को धन्यवाद दूंगी। उन्होंने खुले दिल से मुझे स्वीकार किया और बेटी जैसा प्यार दिया। शादी की पारंपरिक और सामाजिक रूढिय़ों में एक सुंदरता है। अगर उनके पीछे के अर्थ देखें तो उनका खास महत्व है। शादी से पहले मैंने वेदों के एक विद्वान से बातचीत की थी। उन्होंने सात तरह की शादियों के बारे में बताया था, जिसमें वरमाला, पहली मुलाकात और अन्य तरीकों से करीब आने को शादी का नाम दिया गया था। सबकुछ जानने-समझने के बाद मुझे लगता है कि शादी एक कमिटमेंट है। अगर दो व्यक्ति पूरी ईमानदारी के साथ जिंदगी बिताने के लिए तैयार हो जाएं तो वह शादी है। 
 विवेक : मैं थोड़ा पारंपरिक हूं। शादी एक अलग किस्म का परस्पर समर्पण मांगती है। सभी जानते हैं कि शादी से पहले मेरे रिश्ते रहे हैं। शादी के बाद मैंने अपने आप में बदलाव महसूस किया। मुझ में स्थिरता आ गई। चित्त शांत हो गया। स्वभाव बदल गया। चीजों को देखने का तरीका बदल गया। पहले की महत्वपूर्ण चीजें बेमानी हो गईं और नई छोटी चीजों का महत्व बढ़ गया। मुझे लगता है कि शादी करते हैं तो इस संस्था में विश्वास करना चाहिए। चाहे वह रिचुअल से हुई हो। कोट मैरिज हो या फिर लिव-इन ही क्यों न हो। मेरे ख्याल से हर किस्म के रिश्ते में सम्मान होना बहुत जरूरी है। प्रियंका न सिर्फ मेरी पत्नी हैं, बल्कि मेरी दोस्त हैं। मेरे पापा-मम्मी की बहू हैं। इस घर की गृहिणी हैं। आज की तारीख में ये प्रोफेशनल नहीं हैं। मैं चाहूं तो इनसे कह सकता हूं कि मैं तो काम करता हूं, तुम क्या करती हो? लेकिन इनके प्रति मेरे दिल में अगाध सम्मान है। मम्मी और इनके बीच कमाल का तारतम्य है। दोनों इतनी आसानी से घर का सारा काम संभालती हैं कि मैं तो यह सब देखकर मैं और पापा दंग रह जाते हैं। इन्हें जो पसंद है, उसे सपोर्ट करना मेरा धर्म है। अपनी पत्नी की पसंद, सपने और विश्वास को सपोर्ट करना जरूरी है। आप उनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं। बाकी सच तो यह है कि इनसे मिलने के बाद मैं पहले से अधिक रोमांटिक हो गया हूं। इनके लिए लव नोट्स, कविताएं और गाने लिखता रहता हूं। प्रियंका से मिलने के बाद मेरी अभिरुचि में सुधार हुआ है। मैं थोड़ा क्लासी हो गया हूं। इनके आने के बाद सारी तकलीफें घर के बाहर ही छूट जाती हैं। मेरे कमरों की खिड़कियां काफी बड़ी हैं। सुबह की किरणें बिस्तर पर आती हैं। कभी जल्दी उठ गया तो इन्हें सोया देखकर मेरे होंठों पर जो मुस्कुराहट आती है, वह दिनभर चिपकी रहती है। समझ नहीं पाता कि इसकी वजह क्या है? बेवजह खुश रहता हूं। 
प्रियंका : शादी के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन तो यही आया है कि अब मुझे हिंदी फिल्में पसंद आने लगी हैं। हर फिल्म के पीछे एक बड़ी मेहनत होती है। पहले तो किसी भी फिल्म को झटके से रद्द कर देती थी। अब लगता है कि हर फिल्म कई लोगों की सामूहिक मेहनत का परिणाम होती है। कई बार दर्शक उस मेहनत को समझ नहीं पाते। बुरी फिल्म बनने में भी उतनी ही मेहनत लगती है। मैंने अभी भी विवेक की कुछ फिल्में नहीं देख रखी हैं। मुझे इनकी फिल्म ‘साथिया’ बहुत अच्छी लगती है। ‘युवा’ और ‘ओमकारा’ भी अच्छी लगी। इनकी पहली फिल्म ‘कंपनी’ मेरे सारे भाइयों की फेवरिट है। एक्टर के तौर पर मैं इनकी बड़ी इज्जत करती हूं। इनकी साधारण फिल्में मैंने नहीं देखी हैं।  
विवेक : नाम ले लें। मैंने कुछ बुरी और खराब फिल्में भी की हैं। मुझे मालूम है कि आप को साधारण काम पसंद ही नहीं आता। अब आप आ गई हैं। देखिए, मैं कितनी अच्छी फिल्में करता हूं। 
प्रियंका : शादी की शर्तें नहीं होती और न पति के चुनाव का कोई स्वीकृत नियम है। हर व्यक्ति और दंपति अलग होते हैं। मैं तो बस एक ही सलाह दूंगी कि कुछ भी प्रिटेंड न करें। हमें अपने पार्टनर के सामने खुल जाना चाहिए। अपना मूल स्व ही सामने रखना चाहिए। अपनी इच्छाओं, सपनों और सारी चीजों को शेयर करना चाहिए। अगर प्रिटेंड करेंगे तो वह शादी निश्चित रूप से टूट जाएगी।
विवेक : प्रियंका ने सही कहा कि संबंधों में सच्चाई सबसे अहम चीज है। मुझे लगता है कि संभावित पति या पत्नी से मिलते समय ही घंटी बजनी चाहिए। मिलने के साथ ही लगे कि यही है। मैं मानता हूं कि जोडिय़ां आसमानों में बनती हैं।      


Friday, October 22, 2010

फि‍ल्‍म समीक्षा : रक्‍त चरित्र

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बदले से प्रेरित हिंसा


रक्त चरित्र: बदले से प्रेरित हिंसा

लतीफेबाजी की तरह हिंसा भी ध्यान आकर्षित करती है। हम एकटक घटनाओं को घटते देखते हैं या उनके वृतांत सुनते हैं। हिंसा अगर बदले की भावना से प्रेरित हो तो हम वंचित, कमजोर और पीडि़त के साथ हो जाते हैं, फिर उसकी प्रतिहिंसा भी हमें जायज लगने लगती है। हिंदी फिल्मों में बदले और प्रतिहिंसा की भावना से प्रेरित फिल्मों की सफल परंपरा रही है। राम गोपाल वर्मा की रक्त चरित्र उसी भावना और परंपरा का निर्वाह करती है। राम गोपाल वर्मा ने आंध्रप्रदेश के तेलुगू देशम पार्टी के नेता परिताला रवि के जीवन की घटनाओं को अपने फिल्म के अनुसार चुना है। यह उनके जीवन पर बनी बायोपिक (बायोग्रैफिकल पिक्चर) फिल्म नहीं है।

कानूनी अड़चनों से बचने के लिए राम गोपाल वर्मा ने वास्तविक चरित्रों के नाम बदल दिए हैं। घटनाएं उनके जीवन से ली है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए परिताला रवि के उदय के राजनीतिक और वैचारिक कारणों को छोड़ दिया है। हिंदी फिल्म निर्देशकों की वैचारिक शून्यता का एक उदारहण रक्त चरित्र भी है। विचारहीन फिल्मों का महज तात्कालिक महत्व होता है। हालांकि यह फिल्म बांधती है और हमें फिल्म के नायक प्रताप रवि से जोड़े रखती है। अनायास हिंसा की गलियों में उसका उतरना और अपने प्रतिद्वंद्वियों से हिंसक बदला लेना उचित लगने लगता है। राम गोपाल वर्मा ने प्रताप रवि और उसके परिवार की सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता को रेखांकित नहीं किया है। ऐसा करने पर शायद फिल्म गंभीर हो जाती और दर्शकों का कथित मनोरंजन नहीं हो पाता।

फिल्म जिस रूप में हमारे सामने परोसी गई है, उसमें राम गोपाल वर्मा अपनी दक्षता और अनुभव का परिचय देते हैं। उन्होंने अपने नैरेशन में घटनाओं और हत्याओं पर अधिक जोर दिया है। केवल शिवाजी राव और प्रताप रवि के संसर्ग के दृश्यों में ड्रामा दिखता है। रक्त चरित्र एक्शन प्रधान फिल्म है। एक्शन के लिए देसी हथियारों कट्टा, कटार, हंसिया का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए पर्दे पर रक्त की उछलती बूंदे और धार दिखती हैं। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म में हिंसा को कथ्य में पिरोने से अधिक ध्यान उसके दृश्यांकन में दिया है। मुमकिन है कुछ दर्शकों को मितली आए या सिर चकराए। राम गोपाल वर्मा ने रक्त और खून के साथ सभी क्रियाओं, विशेषणों, समास, उपसर्गो और प्रत्ययों का उपयोग किया है। गनीमत है कि उनके लेखकने रक्त के पर्यायों का इस्तेमाल नहीं किया है। रक्त चरित्र को आज के भारत की महाभारत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश में उन्होंने अन्य भावनाओं को दरकिनार कर दिया है। इस फिल्म में पिता-पुत्र संबंध, परिवार के प्रति प्रेम, सत्ता की चाहत और वंचितों के उभार जैसी भावनाएं हैं। फिल्म वंचितों और समृद्धों के संघर्ष और अंतर्विरोध से आरंभ होती है, लेकिन कुछ दृश्यों केबाद ही व्यक्तिगत बदले की लकीर पीटने लगती है। प्रताप रवि कहता भी है कि बदला भी मेरा होगा। यह भाव ही फिल्म की सीमा बन जाता है और रक्त चरित्र हमारे समय के महाभारत के बजाए चंद व्यक्तियों के रक्तरंजित बदले की कहानी बन कर रह जाती है।

रक्त चरित्र विवेक ओबेराय और अभिमन्यु सिंह के अभिनय के लिए याद की जाएगी। विवेक ने अपनी पिछली फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने प्रताप के क्रोध और प्रतिहिंसा के भाव को चेहरे, भाव और चाल में अच्छी तरह उतारा है। अभिमन्यु सिंह के रूप में हमें एक गाढ़ा अभिनेता मिला है। इस चरित्र के रोम-रोम से क्रूरता फूटती है और अभिमन्यु ने किरदार की इस मनोदशा को खूंखार बना दिया है। अन्य कलाकारों में सुशांत सिंह, राजेन्द्र गुप्ता, शत्रुघ्न सिन्हा और कोटा श्रीनिवास राव का सहयोग सराहनीय है।

फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर में चल रहे संस्कृत के श्लोक स्पष्ट होते तो फिल्म का प्रभाव बढ़ता। राम गोपाल वर्मा की अन्य फिल्मों की तरह ही बैकग्राउंड स्कोर लाउड और ज्यादा है।

रेटिंग- तीन स्टार


Saturday, April 10, 2010

फिल्‍म समीक्षा : प्रिंस

एक्शन से भरपूर 

-अजय ब्रह्मात्‍मज  

हिंदी फिल्मों में प्रिंस की कहानी कई बार देखी जा चुकी है। एक तेज दिमाग लुटेरा, लुटेरे का प्रेम, प्रेम के बाद जिंदगी भी खूबसूरती का एहसास, फिर अपने आका से बगावत, साथ ही देशभक्ति की भावना और इन सभी के बीच लूट हथियाने के लिए मची भागदौड़ (चेज).. प्रिंस इसी पुराने फार्मूले को अपनाती है, लेकिन इसकी प्रस्तुति आज की है, इसलिए आज की बातें हैं। मेमोरी, चिप, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर आदि शब्दों का उपयोग संवादों और दृश्यों में ता है। यह फिल्म एक्शन प्रधान है। शुरू से आखिर तक निर्देशक कुकू गुलाटी ने एक्शन का रोमांच बनाए रखा है।

फिल्म की कहानी कुछ खास नहीं है। एक नया मोड़ यही है कि प्रिंस की याददाश्त किसी ने चुरा ली है। छह दिनों में उसकी याददाश्त नहीं लौटी तो रोजाना अपने दिमाग में लगे चिप के क्रैश होने से वह सातवें दिन जिंदा नहीं रह सकता। समस्या यह है कि याददाश्त खोने के साथ वह अपनी आखिरी लूट के बारे में भी भूल गया है। उस लूट की तलाश देश की सरकार, विदेशों से कारोबार कर रहे अंडरव‌र्ल्ड सरगना और स्वयं प्रिंस को भी है। इसी तलाश में जमीन, आसमान, नदी, पहाड़ और इमारतें नापी जाती हैं। मोटर सायिकल, कार, हेलीकॉप्टर, नदी में उलटी कार और मोटर बोट पर यह चेजिंग चलती है, जो साउंड इफेक्ट और कैमरे के करतब से हैरतअंगेज लगती है। फिल्म देखते समय रोमांच बना रहता है, जैसे कि किशोर उम्र में हम सभी घंटों वीडियो गेम खेलते नहीं थकते और रोमांचित रहते हैं।

इस फिल्म में कहानी और इमोशन न खोजें। हालांकि दो-चार प्रेम, आलिंगन और चुंबन के हैं, लेकिन उनसे कहानी नहीं बनती। याददाश्त खोने के बाद माया के रूप में आई तीन लड़कियों के साथ कहानी को इंटरेस्टिंग ट्विस्ट और टर्न दिया जा सकता था, लेकिन डायरेक्टर का लक्ष्य एक्शन था। उन्होंने उसी पर पूरा ध्यान दिया है।

एक्शन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म अच्छी लगेगी। विवेक ओबेराय और उनके साथ आए दूसरे कलाकारों ने पूरी मेहनत की है और रोमांच का लेवल फीका नहीं होने दिया है। खास कर विवेक ओबेराय टेकनीक सैवी एक्शन हीरो के रूप में जंचे हैं। उनकी भाव-भंगिमा और फुर्ती एक्शन दृश्यों में जमती है। एक्शन के दृश्यों में कई बार लाजिक को दरकिनार कर दिया जाता है। निर्देशक कुकू गुलाटी अपनी सुविधा के लिए प्रिंस में भी ऐसी लिबर्टी लेते हैं। तीनों लड़कियों में नंदना सेन और अरुणा शिल्ड के हिस्से ही कुछ सीन आए हैं। अरुणा रोमांटिक और एक्शन दृश्यों में निराश नहीं करतीं। फिल्म के गीत मधुर हैं। एक्शन फिल्म में रोमांटिक गीत की गुंजाइश निकाली है निर्देशक ने। सचिन गुप्ता का संगीत कर्णप्रिय है।

*** तीन स्टार

Saturday, November 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा : कु़र्बान


धुंधले विचार और जोशीले प्रेम की कहानी


-अजय ब्रह्मात्‍मज


रेंसिल डिसिल्वा की कुर्बान मुंबइया फिल्मों के बने-बनाए ढांचे में रहते हुए आतंकवाद के मुद्दे को छूती हुई निकलती है। गहराई में नहीं उतरती। यही वजह है कि रेंसिल आतंकवाद के निर्णायक दृश्यों और प्रसंगों में ठहरते नहीं हैं। बार-बार कुर्बान की प्रेमकहानी का ख्याल करते हुए हमारी फिल्मों के स्वीकृत फार्मूले की चपेट में आ जाते हैं।

आरंभ के दस-पंद्रह मिनटों के बाद ही कहानी स्पष्ट हो जाती है। रेंसिल किरदारों को स्थापित करने में ज्यादा वक्त नहीं लेते। अवंतिका और एहसान के मिलते ही जामा मस्जिद के ऊपर उड़ते कबूतर और शुक्रन अल्लाह के स्वर से जाहिर हो जाता है कि हम मुस्लिम परिवेश में प्रवेश कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों ने मुस्लिम परिवेश को प्रतीकों, स्टारों और चिह्नों में विभाजित कर रखा है। इन दिनों मुसलमान किरदार दिखते ही लगने लगता है कि उनके बहाने आतंकवाद पर बात होगी। क्या मुस्लिम किरदारों को नौकरी की चिंता नहीं रहती? क्या वे रोमांटिक नहीं होते? क्या वे पड़ोसियों से परेशान नहीं रहते? क्या वे आम सामाजिक प्राणी नहीं होते? कथित रूप से सेक्युलर हिंदी फिल्म उद्योग की इस सांप्रदायिकता पर ध्यान देने की जरूरत है। इस मायने में रेंसिल डिसिल्वा की कुर्बान अलग प्रतीत होती है, लेकिन अंदर से वैसी ही पारंपरिक और रूढि़वादी है।

अवंतिका न्यूयार्क से भारत आई है। वह एक कालेज में पढ़ा रही है। उसी कालेज में एहसान खान की अस्थायी नियुक्ति होती है। चंद मुलाकातों में दोनों शादी कर लेते हैं और फिर न्यूयार्क पहुंचते हैं। इसके बाद घटनाएं मोड़ लेती हैं। आतंकी साजिश में फंस चुकी अवंतिका अंत तक हिम्मत नहीं हारती। वह कोशिश करती है कि इन साजिशों के बारे में बता सके। रियाज मसूद उदारवादी मुस्लिम के तौर पर सामने आता है, लेकिन वह है बिल्कुल फिल्मी किरदार। वह सुरक्षा एजेंसियों की मदद लेने के बजाए खुद ही मामले को सुलझाना चाहता है, क्योंकि उसकी प्रेमिका आतंकवाद का निशाना बन चुकी है। आतंकवाद से लड़ने की इस बचकानी कोशिश पर हंसी आती है और पता चलता है कि कैसे हिंदी फिल्मों के लेखक-निर्देशक अपनी सीमाओं की जकड़ से निकलना नहीं चाहते। वैचारिक और सैद्धांतिक स्तर पर अवश्य ही कुर्बान में आतंकवाद के फैलाव के लिए अमेरिकी सामरिक और राजनयिक नीतियों को दोषपूर्ण माना गया है, लेकिन उन तर्को को सुनते हुए आतंकवादी गतिविधियां जायज लगने लगती हैं। एहसान और उसके साथियों की साजिशें उचित लगने लगती हैं। लेखक-निर्देशक सैद्धांतिक रूप से स्पष्ट नहीं है। यह ढुलमुलपन कुर्बान को आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी एक कमजोर फिल्म साबित करता है। हां, प्रेम कहानी के चित्रण में अवंतिका और एहसान के द्वंद्व, अविश्वास और प्रेम के चित्रण में निर्देशक का जोश दिखाई पड़ता है। सैफ और करीना के अंतरंग दृश्य शिष्ट और बेहतर हैं।

*** तीन स्टार