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Showing posts from June, 2017

रोज़ाना : शाह रूख खान की ईद

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रोज़ाना शाह रूख खान की ईद -अजय ब्रह्मात्‍मज ईद के मौके पर शाह रूख खान बुलाते हैं। वे मीडियाकर्मियों को ईद की दावत देते हैं। इस दावत में देर-सबेर वे शामिल होते हैं। मीडियाकर्मियों से जत्‍थे में मिलते हैं। उनसे अनौपचारिक बातें करते हैं। अफसोस कि ये अनौपचारिक बातें भी रिकार्ड होती हैं। अगले दिन सुर्खियां बनती हैं। अब न तो फिल्‍म स्‍टार के पास सब्र है और न पत्रकारों के पास धैर्य...स्‍टार की हर बात खबर होती है। वे खुद भी पीआर के प्रेशर में में हर मौके को खबर बनाने में सहमति देने लगे हैं। या कम से कम तस्‍वीरें तो अगले दिन आ ही जाती हैं। चैनलों पर फटेज चलते हैं। सभी के करोबार को फायदा होता है। हर साल ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्‍में रिलीज हो रही हैं और शाह रूख खान से ईद पर उनकी अगली फिल्‍मों की बातें होती हैं,जो दीवाली या क्रिसमस पर रिलीज के लिए तैयार हो रही होती हैं। वक्‍त ऐसा आ गया है कि पत्रकार हर मुलाकात को आर्टिकल बनाने की फिक्र में रहते हैं। उन पर संपादकों और सहयोगी प्रकाशनों का अप्रत्‍यक्ष दबाव रहता है। अघोषि प्रतियोगिता चल रही होती है। सभी दौड़ रहे होते हैं। इस दौड़ में सभी पहले पहुंच…

रोज़ाना : एयरपोर्ट लुक

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रोज़ाना एयरपोर्ट लुक -अजय ब्रह्मात्‍मज मिलीभगत है। ज्‍यादातर बार फोटोग्राफर को मालूम रहता है कि कब कौन सी सेलिब्रिटी कहां मौजूद रहेगी। उनकी पीआर मशीनरी सभी फोटोग्राफर और मीडियाकर्मियों को पूर्वसूचना दे देते हैं। विदेशों की तरह भारत में पापाराजी नहीं हैं। यहां दुर्लभ तस्‍वीरों और खबरों की भी सामान्‍य कीमत होती है। विदेशों में एक दुर्लभ तस्‍वीर के लिए फोटोग्राफर भारी खर्च करते हैं और धैर्य से घात लगाए रते हैं। यह बंसी डाल कर मछली पकड़ने से अधिक अनिश्चित और वक्‍तलेवा काम होता है। मुंबई में फिल्‍मी सितारों की निजी गतिविधियों की जानकारी छठे-छमाही ही तस्‍वीरों में कैद होकर आती है। बाकी सब पूर्वनियोजित है,जो खबरों की तरह परोसा जा रहा है। ऐसी ही पूर्वनियोजित खबरों व तस्‍वीरों में इन दिनों ‘एयरपोर्ट लुक’ का चलन बढ़ा है। ‘एयरपोर्ट लुक’ उस खास तस्‍वीर के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है,जो मुंबई से बाहर जाते-आते समय एयरपोर्ट के अराइवल और डिपार्चर के बाहर फिल्‍मी सितारों उतारी जाती हैं। गौर करेंगे कि कुछ फिल्‍मी हस्तियों की तस्‍वीरें बार-बार आती हैं। इसका चलन इतना ज्‍यादा बढ़ गया है कि उम्रदराज और कम लोकप्…

फिल्‍म समीक्षा : ट्यूबलाइट

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फिल्‍म रिव्‍यू यकीन पर टिकी ट्यूबलाइट -अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान और सलमान खान की तीसरी फिल्‍म ‘ट्यूबलाइट’ भारज-चीन की पृष्‍ठभूमि में गांधी के विचारों और यकीन की कहानी है। फिल्‍म में यकीन और भरोसा पर बहुत ज्‍यादा जोर है। फिल्‍म का नायक लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट मानता है कि यकीन हो तो चट्टान भी हिलाया जा सकता है। और यह यकीन दिल में होता है। लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट के शहर आए गांधी जी ने उसे समझाया था। बाद में लक्ष्‍मण के पितातुल्‍य बन्‍ने चाचा गांधी के विचारों पर चलने की सीख और पाठ देते हैं। फिल्‍म में गांधी दर्शन के साथ ही भारतीयता के सवाल को भी लेखक-निर्देशक ने छुआ है। संदर्भ 1962 का है,लेकिन उसकी प्रासंगिकता आज की है। यह प्रसंग फिल्‍म का एक मूल भाव है। भारत-चीन युद्ध छिड़ने के बाद अनेक चीनियों को शक की नजरों से देखा गया। फिल्‍म में ली लिन के पिता को कैद कर कोलकाता से राजस्‍थान भेज दिया जाता है। ली लिन कोलकाता के पड़ोसियों के लांछन और टिप्‍पणियों से बचने के लिए अपने बेटे के साथ कुमाऊं के जगतपुर आ जाती है। पश्चिम बंगाल से उत्‍तराखंड का ली लिन का यह प्रवास सिनेमाई छूट है। बहरहाल,जगतपुर में लक्ष्‍मण ह…

दरअसल : भारत में जू जू,चीन में आमिर खान

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दरअसल... भारत में जू जू,चीन में आमिर खान -अजय ब्रह्मात्‍मज कबीर खान निर्देशित ‘ट्यूबलाइट’ में चीन की अभिनेत्री जू जू दिखाई पड़ेंगी। यह पहला मौका होगा जब किसी हिंदी फिल्‍म में पड़ोसी देश की अभिनेत्री सलमान खान जैसे लोकप्रिय सितारे के साथ खास किरदार निभाएंगी। पिछले कुछ सालों से भारत और चीन के बीच फिल्‍मों के जरिए आदन-प्रदान बढ़ा है। कुछ फिल्‍मों का संयुक्‍त निर्माण हुआ है। कुछ निर्माणाधीन हैं। चीन में ‘दंगल’ की कामयाबी ने हमारी तरफ से दरवाजे पर चढ़ाई गई कुंडी खोल दी है। दरवाजा खुला है। अभी तक भारत में चीनी सामानों को दोयम दर्जे के सस्‍ते प्रोडक्‍ट का का माना और मखौल उड़ाया जाता है। चीन के राष्‍ट्रपति तक ने भारत के प्रधानमंत्री से ‘दंगल’ की तारीफ की। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ नारे की अनुगूंज अब कहीं नहीं सुनाई पड़ती। 21 वीं सदी में दोनों देशों की सिनेमाई दोस्‍ती नई लहर के तौर पर आई है। ‘हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई’ का नारा बुलंद किया जा सकता है। जू जू को हिंदी में झू झू और चू चू भी लिखा जा रहा है। हम दूसरे देशों की भाषा के शब्‍दों के प्रति लापरवाही की वजह से सही उच्‍चरित शब्‍द की खोज नहीं करते। हिंदी …

पवन श्रीवास्तव की 'लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट'

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