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Saturday, July 29, 2017

फिल्‍म समीक्षा : इंदु सरकार



फिल्‍म रिव्‍यू
इंदु सरकार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाह कमीशन की रिपोर्ट और भारत सरकार के तमाम विभागों के सहयोग और इनपुट के साथ बनी मधुर भंडारकर की इंदु सरकार देश आपात्‍काल के समय और दुष्‍परिणामों को नहीं पेश कर पाती। फिल्‍म में लंबा डिसक्‍लेमर है कि फिल्‍म में दिखाए सभी पात्र और घटनाएं पूरी तरह से काल्‍पनिक हैं,वास्‍तविकता से कोई समानता होती है,तो वह मात्र एक संयोग होगा। कोई भी समानता,चाहे वह किसी व्‍यक्ति (मृत या जीवित),पात्र या इतिहास से हो,पूरी तरह काल्‍पनिक है। इस डिसक्‍लेमर के बाद कुछ किरदारों का संजय गांधी,इंदिरा गांधी,कमलनाथ,जगदीश टाइटलर की तरह दिखना कांग्रेस के शासन में लगे आपातकाल का संकेत तो देता है,लेकिन बगैर नाम के आए इन चेहरों से फिल्‍म का प्रभाव पतला हो जाता है। संदर्भ और विषय की गंभीरता नहीं बनी रहती। हालांकि फिल्‍म में किशोर कुमार,तुर्कमान गेट और नसबंदी जैसे वास्‍तविक आपातकालीन प्रसंग आते हैं। 20 सूत्री कार्यक्रम और पांच सूत्री कार्यक्रम का जिक्र आता है,फिर भी फिल्‍म आपातकाल के दौर में घुसने से बचती है। यह फिल्‍म आपातकाल के हादसों और फैसलों से रोंगटे नहीं खड़ी करती,क्‍योंकि फिल्‍मकार गतिविधियों को किनारे से देखते हैं।
इंदु सरकार ऊपरी तौर पर अनाथ इंदु की कहानी है। आत्‍मविश्‍वास की कमी से ग्रस्‍त और बोलने में हकलाने वाली संवेदनशील इंदु की मुलाकात नवीन से होती है। उसकी जिंदगी पटरी पर आती लगती है कि पति और पत्‍नी की सोच का वैचारिक फर्क उन्‍हें अलग कर देता है। सिस्‍टम के मामली पुर्जे नवीन सरकार और संवेदनशील कव‍यित्री इंदु सरकार के बीच की दूरियों और समझ के दरम्‍यान में ही आपात्‍काल को समेटने की कोशिश में मधुर भंडारकर विषय के साथ न्‍याय नहीं कर पाते। फिल्‍म छोटी हो जाती है। यह इंदु की साधारण लड़ाई बन कर रह जाती है,जिसकी पृष्‍ठभूमि में आपातकाल है। इंदु सरकार अंतर्आत्‍मा की आवाज सुनती है और शोषितों व दमितों के साथ आ खड़ी होती है। वह सिस्‍टम की ज्‍यादतियों के खिलाफ खड़ी होती है। पर्चे बांटती है। जेल जाती है और पुलिस अत्‍याचार का शिकार होती है। आपातकाल के संगठित विरोध के लिए सक्रिय संगठनों में मधुर भंडारकर को वंदे मातरम बोलते राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता मात्र दिखते हैं। छात्र युवा वाहिनी,जेपी और अन्‍य नेताओं का पुरजोर उल्‍लेख नहीं होता। केवल नाना जी सक्रिय दिखते हैं। यहां मधुर की सोच एकांगी हो जाती है। फिल्‍म भी पंक्‍चर होती है।
यों,अभिव्‍यक्ति की आजादी और सत्‍ता के दमन के मसलों का छूती यह फिल्‍म आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। इस फिल्‍म का सामयिक संदर्भ भी बनता है। कला और सृजन में यह खूबी होती है वह ध्‍येय से इतर भावों को भी व्‍यक्‍त करती है। संजय छेल के अनेक संवाद आज के संदर्भ में उपयुक्‍त लगते हैं। अभी जिस तरह से सत्‍तारूढ़ पार्टी के प्रभाव में एक सोच,वाद और विचार पर सभी को अमल करने के लिए बाध्‍य किया जा रहा है,वह भी अघोषित आपातकाल ही है। मधुर भंडारकर की राजनीतिक निकटता से सभी परिचित हैं। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि इंदु सरकार सत्‍ता और जनता के बीच के रिश्‍ते को वस्‍तुनिष्‍ठ तरीके से समझने की कोशिश करती है। हां,वे आपातकाल की पृष्‍ठभूमि पर एक सार्थक फिल्‍म बनाने से चूक गए। या यों कहें कि वर्तमान समाज के दबावों के कारण वे खुल कर अपनी बात और राय नहीं रख सके। फिल्‍मकारों के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वे नाम और प्रसंग के उल्‍लेखों के बिना कैसे समसामयिक विषयों पर फिल्‍में बनाएं। सिर्फ सीबीण्‍फसी ही नहीं है। देश में किसी को भी ठेस लग सकती है। कोई भी आहत हो सकता है।
इंदु सरकार की शीर्षक भूमिका में कीर्ति कुल्‍हाड़ी ने संजीदा काम किया है। उन्‍होंले किरदार की परेशानियों को बखूबी पर्दे पर जिय है। नवीन सरकार के रूप में तोता राय चौधरी का योगदान सराहनीय है। बगैर नाम लिए संजय गांधी के रूप में नील नितिन मुकेश ने व्‍यक्ति की आक्रामकता को पकड़ा है। मधुर भंडारकर की अन्‍य फिल्‍मों की तरह इंदु सरकार भी एक गंभी और जरूरी मुद्दे का टच करती है। वह उससे टकराती और उलझती नहीं है।
अवधि-139 मिनट
*** तीन स्‍टार   

Saturday, June 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : शॉर्टकट रोमियो

21_06_2013-romeo -अजय ब्रह्मात्‍मज 
सुसी गणेश ने अपनी तमिल फिल्म 'थिरूट्टु पायले' को हिंदी में 'शॉर्टकट रोमिया' टायटल के साथ पेश किया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने फिल्म में कुछ नए दृश्य जोड़े हैं और इसका स्केल बढ़ा दिया है। फिल्म की कहानी केन्या जाती है और वहां के वन्यजीवों का भी दर्शन कराती है। तमिल में यह फिल्म हिट रही थी, मगर हिंदी में इसे दर्शकों की पसंद बनने के आसार कम हैं।
एक तो फिल्म के सारे किरदार निगेटिव शेड के हैं। फिल्म के नायक सूरज के मामा के अलावा किसी में भी अच्छाई नजर नहीं आती। सभी किसी न किसी प्रपंच में लगे हुए हैं। शांतचित्त दिखने वाला किरदार तक अंत मे खूंखार नजर आता है। जल्दी से अमीर बनने की ख्वाहिश के साथ सूरज ब्लैकमेलिंग की दुनिया में घुस जाता है। सूरज (नील नितिन मुकेश) और मोनिका (अमीषा पटेल) के बीच एक-दूसरे को मात देने की चालें चली जाती हैं। सूरज शातिर और बदमाश है। वह प्रेम और रिश्तों में यकीन नहीं करता। अपनी चालबाजी के दौरान ही उसकी मुलाकात शेरी उर्फ राधिका से हो जाती है। राधिका का एक चुंबन उसे सच्चे प्रेम का एहसास दिला देता है। राधिका की शर्त पर वह सब कुछ छोड़ कर सामान्य जिंदगी में प्रवेश करना चाहता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती। हिंदी फिल्मों ने हमें बताया है कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है। हम सूरज को ऐसे ही बुरे नतीजे का शिकार होते देखते हैं।
फिल्म में दृश्यों और एक्शन के दोहराव हैं। फिल्म ऊब पैदा करने तक दृश्यों को बढ़ाती चलती है। पता नहीं चलता कि यह निर्देशक की अयोग्यता है या उनका चरम विश्वास..लेकिन फिल्म के प्रति रुचि नहीं बनी रहती। नील नितिन मुकेश फिल्म के केंद्र में हैं। उन्हें पर्याप्त दृश्य मिले हैं एक्शन और इमोशन के..जिन्हें वे स्टायल की बलि चढ़ा देते हैं। कुछ अभिनेता स्टायल को ही एक्टिंग समझने की गलती कर बैठते हैं। पर अभिनेता से अधिक दोषी लेखक और निर्देशक है, जो शूटिंग के समय उन्हें सचेत नहीं करते।
'शॉर्टकट रोमियो' एक ऊबाऊ फिल्म है। अमीषा पटेल, नील नितिन मुकेश, बंटी ग्रेटाल और राजेश श्रृंगारपुरे चारों मुख्य अभिनेताओं ने निराश किया है। पूजा गुप्ता ठीक हैं, मगर उन्हें सीमित दृश्य ही मिले हैं। फिल्म अनावश्यक रूप से लंबी है। एक्शन दृश्यों की डिटेलिंग से कानों में हथौड़े चलने लगते हैं। पता नहीं चलता, लेकिन फिल्म के प्रति बेरूखी बढ़ती जाती है। आखिरकार हम ठगे महसूस करते हैं।
अवधि-147 मिनट
** दो स्टार

Saturday, February 2, 2013

फिल्‍म समीक्षा : डेविड


film review : something is there with the name of the film david

नाम में कुछ रखा है

-अजय ब्रह्मात्मज
लंदन - 1975
मुंबई - 1999
गोवा - 2010

अलग-अलग देशकाल में तीन डेविड हैं। इन तीनों की अलहदा कहानियों को बिजॉय नांबियार ने एक साथ 'डेविड' में परोसा है। फिल्म की इस शैली की जरूरत स्पष्ट नहीं है, फिर भी इसमें एक नयापन है। लगता है नाम में ही कुछ रखा है। लेखक-निर्देशक चाहते तो तीनों डेविड की कहानियों पर तीन फिल्में बना सकते थे, लेकिन शायद उन्हें तीनों किरदारों की जिंदगी में पूरी फिल्म के लायक घटनाक्रम नहीं नजर आए। बहरहाल, बिजॉय एक स्टायलिस्ट फिल्ममेकर के तौर पर उभरे हैं और उनकी यह खूबी 'डेविड' में निखर कर आई है।
लंदन के डेविड की दुविधा है कि वह इकबाल घनी के संरक्षण में पला-बढ़ा है। घनी उसे अपने बेटे से ज्यादा प्यार करता है। डेविड को एक प्रसंग में अपने जीवन का रहस्य घनी के प्यार का कारण पता चलता है तो उसकी दुविधा बढ़ जाती है। गैंगस्टर डेविड अपने संरक्षक घनी की हत्या की साजिश में शामिल होता है, लेकिन ऐन वक्त पर वह उसकी रक्षा करने की कोशिश में मारा जाता है।
मुंबई के डेविड की ख्वाहिश संगीतज्ञ बनने की है। वह अपने पादरी पिता की करुणा और व्यवहार से सहमत नहीं है। एक विशेष अवसर के ठीक पहले उसके पिता विषम परिस्थिति के शिकार होते हैं। डेविड अपने पिता के प्रति सावधान होता है और फिर उसकी जिंदगी बदल जाती है।
गोवा के डेविड के जीवन में प्रेम नहीं है। उसकी होने वाली बीवी उसे छोड़ चुकी है। लड़कियों से दूर रहने वाला डेविड आखिरकार रोमा से प्रेम करने लगता है, लेकिन वहां उसके प्रतिद्वंद्वी के रूप में पीटर दिखता है। तीनों डेविड की जिंदगी खास परिस्थितियों में नया मोड़ ले लेती है। विभिन्न कालखंड और देशकाल में होने के बावजूद तीनों की नियति में अधूरापन है। लंदन के डेविड के रूप में नील नितिन मुकेश को भरपूर स्टायलिश किरदार मिला है। वे अपने किरदार में जंचते हैं। मुंबई के डेविड की भूमिका में अपेक्षाकृत नए विनय विरमानी हैं। उन्होंने अपने किरदार को निभाने की अच्छी कोशिश की है। गोवा के डेविड के रूप में विक्रम का अभिनय उम्दा और शानदार है, लेकिन उस किरदार पर लेखक ने अधिक मेहनत नहीं की है। अभिनेत्रियों में तब्बू और मोनिका डोगरा उभर कर आती हैं। लंबे समय के बाद दिखी तब्बू ने मामूली किरदार को भी अपनी अदाकारी से खास बना दिया है।
'डेविड' में विभिन्न दशकों के परिवेश और लुक पर मेहनत की गई है। भाषा की विविधता भी रखी गई है। बिजॉय नांबियार इस फिल्म में एक सधे निर्देशक के रूप में नजर आते हैं। तीन कहानियों की वजह से फिल्म अंतिम प्रभाव में थोड़ी बिखर जाती है।
अवधि - 160 मिनट
ढाई स्टार

Thursday, December 22, 2011

टपोरी का किरदार होता है मजेदार-नील नितिन मुकेश

अमित कर्ण

अपनी अगली फिल्म 'प्लेयर्स' में मैं निभा रहा हूं एक हैकर की भूमिका। दरअसल टपोरी टाइप के किरदार मुझे पसद हैं क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं

जॉनी गद्दार फिल्म से कॅरियर का शानदार आगाज करने वाले नील नितिन मुकेश इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'प्लेयर्स' के प्रमोशन में व्यस्त हैं। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश :

'प्लेयर्स' में आपका क्या किरदार है?

इसमें मेरा स्पाइडर का किरदार है, जो एक हैकर है। वह इंटरनेट का जाल बुनता और काटता है। यह 'इटैलियन जॉब' की आधिकारिक रूप से रीमेक मूवी है। दर्शकों के मनोरंजन के लिए इसमें हर किस्म के मसाले हैं। कॅरियर के आरंभ से ही मेरी तमन्ना थी कि कभी अब्बास-मस्तान के साथ काम करूं। यह सपना अब पूरा हो चुका है। अब मैं गर्व और दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं उन दोनों के परिवार का हिस्सा हूं।

कंप्यूटर हैकर्स अपराधी होते हैं। ऐसे में इस फिल्म में आपको कानून से सजा मिलती है..?

हैकर्स तो वाकई अपराधी होते हैं। इस फिल्म में हैकर को सजा मिलती है या नहीं? इसके लिए दर्शकों को पहले यह मूवी देखनी होगी।

'जॉनी गद्दार' से लेकर अब तक कई फिल्मों में आपने टपोरी का किरदार निभाया है। ऐसे रोल आपको ज्यादा भाते हैं क्या?

जी हा। ऐसे किरदार मुझे पसद हैं, क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं। ऐसा इंसान हर पल एक अलग किस्म के मूड में होता है। वह कभी रो सकता है, कभी हंस सकता है। कभी किसी पर गुस्सा उतार सकता है। लिहाजा वह एक ही समय कई किरदारों को जी रहा होता है।

यानी टपोरी इंसान बुरे नहीं होते हैं?

इंसान अच्छे या बुरे नहीं होते। उनके हालात उन्हें अच्छा या बुरा बनाते हैं। हम कभी यह सोचकर पैदा नहीं होते कि हमें आगे चलकर अपराधी या फिर समाज सुधारक बनना है।

आपका ड्रीम रोल और ड्रीम डायरेक्टर कौन हैं?

ड्रीम रोल के बारे में तो अभी नहीं सोचा है, पर हा ड्रीम डायरेक्टर कई हैं। दिली ख्वाहिश है कि यश जी, राजकुमार हिरानी और नीरज पाडे के साथ काम करूं।

क्या आप रिएलिटी शो भी करने वाले हैं?

नहीं, इस वक्त तो ऐसा कुछ भी नहीं है। वैसे ऑफर तो ढेर सारे हैं। हाल ही में एक म्यूजिक रिएलिटी शो का ऑफर आया था। मुझे अपने परिवार से सगीत विरासत में मिला है। ऐसे में चद रुपयों के लिए कोई ऐसा सतही काम नहीं करूंगा जिसके लिए मन इजाजत न दे।

आपकी नजर में बेहतरीन अभिनेत्रिया कौन हैं और सबसे सेक्सी ड्रेस आप किसे मानते हैं?

पुराने जमाने की अभिनेत्रियों में परवीन बॉबी, वहीदा रहमान, नूतन, दिव्या भारती मेरी फेवरेट हैं। आज की बात करूं तो रिमी सेन, प्रियका चोपड़ा सहित मेरी अन्य सभी को-स्टार पसंद है। जहा तक सबसे सेक्सी ड्रेस का सवाल है तो एक हिंदुस्तानी औरत साड़ी में सबसे ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं। मैं अपनी बीवी को हमेशा साड़ी में देखना पसद करूंगा। इसमें अपील और शालीनता दोनों का मिश्रण है।

Friday, August 20, 2010

फिल्‍म समीक्षा लफंगे परिंदे


गढ़ी प्रेमकहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

एक नंदू है और एक पिंकी। दोनों मुंबई की एक ही वाड़ी में रहते हैं। निम्न मध्यवर्गीय परिवार की इस वाड़ी में पिंकी का परिवार तो दिखता है, लेकिन नंदू के परिवार का कोई सदस्य नहीं दिखता। उसके तीन और लफंगे दोस्त हैं। बॉक्सिंग का शौकीन नंदू वन शॉट नंदू के नाम से मशहूर हो जाता है। दूसरी तरफ पिंकी स्केटिंग डांस के जरिए इस वाड़ी से निकलने का सपना देखती है। इन दोनों के बीच उस्मान भाई आ जाते हैं। अनचाहे ही उनकी करतूत से दोनों की जिंदगी प्रभावित होती है। और फिर एक प्रेमकहानी गढ़ी जाती है। परिणीता के निर्देशक प्रदीप सरकार की लफंगे परिंदे लुक और अप्रोच में मॉडर्न होने के बावजूद प्रभावित नहीं कर पाती।
लफंगे परिंदे के किरदार, लैंग्वेज, पहनावे और माहौल में मुंबई की स्लम लाइफ दिखाने में लेखक-निर्देशक असफल रहे हैं, क्योंकि सोच और दृष्टि का आभिजात्य हावी रहा है। फिल्म की जमीन स्लम की है, लेकिन उसकी प्रस्तुति यशराज की किसी और फिल्म से कम चमकीली नहीं है। फिल्म के नायक-नायिका अपने मैनरिज्म और लैंग्वेज में निरंतरता नहीं रख पाए हैं। कभी भाषा सुसंस्कृत हो जाती है तो कभी चाल-ढाल। इस वजह से लफंगे परिंदे वास्तविकता और फंतासी के बीच फड़फड़ाती रह जाती है। नील नितिन मुकेश और दीपिका पादुकोन अपनी मेहनत के बावजूद किरदारों को निभा नहीं पाते। अंधी दीपिका कुछ ज्यादा ही निराश करती हैं। अंधे होने के बाद भी उनके बोलने और चलने-फिरने में कोई फर्क ही नहीं आता। पीयूष मिश्रा तक अप्रभावी रहे, बाकी की क्या बात की जाए? प्रेमकहानी का द्वंद्व कमजोर है, इसलिए क्लाइमेक्स प्रभावशाली नहीं बन पाया है।
क्या वजह है कि यशराज फिल्म्स की हाल-फिलहाल की अधिकांश फिल्मों की कहानियां स्पोर्ट्स, डांस और कंपीटिशन से संबंधित हो गई हैं। किरदार बदलते हैं, लेकिन कथ्य लगभग एकजैसा रहता है। एक बड़े बैनर की फिल्मों में यह दोहराव चिंतनीय है।

Friday, November 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा : जेल

***1/2
उदास सच की तल्खी
-अजय ब्रह्मात्मज
मधुर भंडारकर की फिल्मों की अलग तरह की खास शैली है। वह अपनी फिल्मों में सामाजिक जीवन में घटित हो रही घटनाओं में से ही किसी विषय को चुनते हैं। उसमें अपने नायक को स्थापित करने के साथ वे उसके इर्द-गिर्द किरदारों को गढ़ते हैं। इसके बाद उस क्षेत्र विशेष की सुनी-समझी सूचनाओं के आधार पर कहानी बुनते हैं। इस लिहाज से उनकी फिल्मों में जीवन के यथार्थ को बेहद नजदीकी से महसूस किया जा सकता है।
चांदनी बार से लेकर फैशन तक मधुर भंडारकर ने इस विशेष शैली में सफलता हासिल की है। जेल भी उसी शैली की फिल्म है जिसमें उन्होंने नए आयामों को छुआ है।
फिल्म की शुरुआत के चंद सामान्य दृश्यों के बाद फिल्म का नायक पराग दीक्षित जेल पहुंच जाता है। फिर अंतिम कुछ दृश्यों में वह जेल के बाहर दिखता है। शक के आधार पर पुलिस कस्टडी में बंद पराग दीक्षित को दो सालों के बाद सजा मिलती है। सजा मिलने के बाद आजादी की उसकी उम्मीद टूट जाती है और वह बाहर निकलने के लिए शार्टकट अपनाता है। वह जेल से निकलने की कोशिश करता है, लेकिन वार्डर नवाब की नसीहत और भरोसे के दबाव में वह फिर से जेल लौट आता है। आखिरकार एक अच्छा वकील उसे सजा से बरी करवाता है। इस दरम्यान हम जेल की अंदरूनी जिंदगी और जेल के बाहर की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ होते हैं। फिल्म के उदास सच की तल्खी दर्शक को सुन्न कर देती है।
मधुर भंडारकर की फिल्मों के किरदार आम जिंदगी के होते हैं, इसलिए वे घिसे-पिटे और देखे-सुने जान पड़ते हैं। उन चरित्रों के बात-व्यवहार में काल्पनिकता नहीं के बराबर होती है। इसलिए उनकी फिल्मों को देखते हुए यह एहसास होता है कि हम उन किरदारों को पहचानते हैं और उनकी बातें पहले सुन चुके हैं। मधुर की यही विशेषता उन्हें बाकी फिल्मकारों से अलग कर देती है। वे सामाजिक जीवन के क्षेत्र विशेष के अंतर्विरोधों, डिंबनाओं और मुश्किलों को प्रसंगों के माध्यम से जोड़ते हैं। उनकी फिल्मों के नैरेटिव में कहानी बहुत मजबूत नहीं रहती। वे इस पर जोर भी नहीं देते। कुछ घटनाओं और प्रसंगों का तानाबाना बुनकर मधुर अपनी फिल्म पूरी करते हैं।
जेल मधुर भंडारकर के साहसिक प्रयास का अगला कदम है। इस बार वह अधिक सधे हुए हैं। पिछली फिल्मों में कथ्य की प्रासंगिकता के बावजूद सिनेमाई भाषा और तकनीक में वे थोड़े कमजोर रहे हैं। जेल में उनकी प्रतिभा और शैली परिष्कृत रूप में नजर आती है। हालांकि इस फिल्म में भी आइटम एवं रोमांटिक गीत और लता मंगेशकर के गाए भजन जैसी चिप्पियां हैं, इसके बावजूद फिल्म में एक नीम उदासी बनी रहती है। जेल हिंदी फिल्मों की मनोरंजन की सीमाओं को तोड़कर एक नया आयाम विकसित करती है। यह प्रबोधन के स्तर पर जाती है। मधुर अपनी फिल्मों में कभी अंतर्विरोधों के निदान और समाधान तक नहीं पहुंचते। वह रुपहले पर्दे पर समाज के कुछ प्रसंगों को जिंदगी के एक टुकड़े के तौर पर रख देते हैं।
जेल की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी रोमांटिक दबाव में नहीं आती। मुग्धा गोडसे के होने के बावजूद मधुर भंडारकर ने संयम से काम लिया है। नील नितिन मुकेश और मनोज बाजपेयी के बीच के कुछ अनबोले दृश्य फिल्म की खासियत हैं। नील संयत अभिनेता हैं। वे किरदारों को अंडरप्ले करते हैं। इस फिल्म में पराग दीक्षित के सदमे को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर जिया है। मनोज बाजपेयी निस्संदेह उत्तम अभिनेता हैं। ऐसी फिल्मों में उनकी प्रतिभा उद्घाटित होती है। मधुर ने सहयोगी किरदारों के लिए भी आर्य बब्बर, राहुल सिंह और चेतन पंडित के रूप में बेहतरीन कलाकार चुने हैं। मुग्धा गोडसे को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन समर्पित और दृढ़ प्रेमिका के रूप में वह अच्छी लगी हैं।

Wednesday, July 1, 2009

मैं खुद को जागरुक मानती हूं:कटरीना कैफ



मैं खुद को जागरुक मानती हूं: कैटरीना डांसिंग डॉल और ग्लैमर गर्ल के नाम से मशहूर कैटरीना कैफ कबीर खान निर्देशित न्यूयॉर्क में माया का किरदार निभा रही हैं। यह भूमिका उनकी अभी तक निभायी गयी भूमिकाओं से इस मायने में अलग है कि फिल्म की कहानी सच को छूती हुई गुजरती है। उनके किरदार में भी वास्तविकता की छुअन है। बूम से हिंदी फिल्मों में आई कैटरीना कैफ ने अनी सुंदरता और अदाओं से खास पहचान बनायी है। वे पॉपुलर स्टार हैं, लेकिन अभी तक गंभीर और संवेदनशील भूमिकाएं उनसे दूर रही हैं। ऐसा लग रहा है कि न्यूयार्क की शुरूआत उन्हें नयी पहचान देगी।
आप फिल्म के किरदार माया से किस रूप और अर्थ में जुड़ाव महसूस करती हैं?
इस फिल्म का ऑफर मुझे कबीर खान ने दिया। उन्होंने मुझसे कहा कि अभी तक मैंने सभी फिल्मों में ग्लैमरस रोल निभाए हैं। मेरे सारे किरदार आम दर्शकों की पहुंच से बाहर रहे हैं किसी सपने की तरह। मैं माया के रूप में आपको ऐसी भूमिका दे रहा हूं जो दर्शकों के अड़ोस-पड़ोस की लड़की हो सकती है। उससे सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। हो सकता है कालेज में आप ऐसी लड़की से मिली हों। एक ऐसी लड़की, तो अपनी सी लगे।
क्या आपने निजी जीवन में कभी आतंकवाद के प्रभाव को महसूस किया है?
नहीं, सीधे तो नहीं। ऐसी बहसों में शामिल रही हूं, जहां आतंकवाद की चर्चा चल रही हो। मुसलमानों को लेकर बात चल रही हो। अमेरिका में 9/11 के बाद मुसलमानों को लेकर जो आम धारणा बन गयी है। मेरे लिए मुसलमानों के प्रति बनी यह धारणा 9/11 ट्रेजडी से कम नहीं है। सही जानकारी नहंीं होने से यह धारणा बनी है।
क्या आप 9/11 के पहले और बाद की दुनिया में फर्क महसूस करती हैं?
पूरी दुनिया में तो नहीं, लेकिन अमेरिका में फर्क दिखता है। मैं तो वहां के राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के चुनाव को उस फर्क का ही परिणाम मानती हूं। अमेरिका में अश्वेत राष्ट्रपति का चुनाव बड़ी घटना है। मुझे लगता है कि अमेरिका के नागरिक आतंकवादियों या कथित आतंकवादियों के प्रति अमेरिकी रवैए को समझते हैं।
क्या अमेरिका की यात्राओं में आप ने कभी एशियाई मूल के लोगों के प्रति मौजूद भेदभाव महसूस किया है?
नहीं ़ ़ ़व्यक्तिगत तौर पर नहीं। इसकी वजह यह हो सकती हैं कि मैं जवान लड़की हूं। मैं सिक्यूरिटी गार्ड को किसी पुरूष की तरह संभावित खतरा नहीं लगती होऊं।
आप हांगकांग में पैदा हुई। अमेरिका और लंदन में पली-बढ़ीं और अब भारत में काम कर रही हैं। क्या आप स्वयं को किसी विश्व नागरिक के रूप में देखती हैं?
इसके अलावा काम के सिलसिले में मैंने बीस से अधिक देशों की यात्राएं की हैं। उन देशों में लंबे समय तक रही हूं। मैं खुद को विश्व नागरिक कह सकती हूं। लेकिन एक बात कहूंगी कि मैं भारत आने पर महसूस करती हूं कि मैं यहीं की हूं। मैं सच कहती हूं, ब्रिटेन में रहते हुए मैंने खुद को वहां का महसूस नहीं किया। मुझे एशियाई ही समझा जाता रहा। मुझे लंदन में सौ प्रतिशत स्वीकृति नहीं मिली।
क्या आपके पास भारत का पासपोर्ट है?
इस बातचीत में यह सवाल गैरजरूरी है।
कोई बात नहीं। आप न्यूयॉर्क के डायरेक्टर कबीर खान के बारे में बताएं?
उन्हें अपनी पहली फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड मिला। मैं उन्हें अत्यंत प्रतिभाशाली और संवेदनशील डायरेक्टर मानती हूं। वह मुसलमान समुदाय और इस्लाम के बारे में इतना जानते हैं। फिल्म शुरू करते समय मैंने उनसे पूछा था कि कहीं डाक्यूमेंट्री शैली में तो वे फिल्म नही बना रहे हैं। अगर ऐसा होगा तो मैं वैसी फिल्मों में यकीन नहीं करती। उन्होंने कहा कि इस फिल्म से सभी जुड़ाव महसूस करेंगे। इस फिल्म की प्रेम कहानी, इमोशन और ड्रामा में दर्शक रुचि लेंगे। इमोशन में हर जवान दर्शक को अपनी कहानी लगेगी, क्योंकि उनके भी दिल टूटे होंगे या उन्हें अपने प्यार का सिला नहीं मिला होगा। इंटरवल के बाद फिल्म की स्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन वहां भी व्यक्त भावनात्मक तनाव परिचित लगेगा।
क्या आपने पिछले साल बनी खुदा के लिए देखी थी? न्यूयॉर्क उसी लाइन की फिल्म लगती है।
हां, मैंने वह फिल्म देखी है। बहुत अच्छी फिल्म है। न्यूयार्क उससे अलग है। यह प्यार, रिश्ते और दोस्ती की फिल्म है। 9/11 इसकी पृष्ठभूमि में है।
आप प्रकाश झा की राजनीति भी कर रही हैं। लगता है कि आप सीरियस फिल्मों की तरफ मुड़ रहीं हैं?
राजनीति सीरियस फिल्म नहीं है। उसमें नाटकीयता है ़ ़ ़ड्रामा है। पूरा मनोरंजन है उसमें। वह आज का महाभारत है। रिश्ते और मूल्यों की बातें हैं। जरूरी तो नहीं कि हर फिल्म फन फिल्म हो।
उस फिल्म में आपका किरदार देश की मशहूर नेता से मिलता-जुलता है। पहली बार आप साड़ी में दिखीं और आप के बाल पीछे की तरफ कर के काढ़े गए हैं। अपनी पापुलर छवि से अलग दिखीं हैं आप?
फिल्म में और भी बहुत कुछ है। आपने जो तस्वीरें देखीं, वे कुछ खास प्रसंगों की हैं। उस समय मैं राजनीति में आ चुकी हूं। अभी उस फिल्म के बारे में ज्यादा बातें करना सही नहीं होगा।
अपने छोटे से करिअर में आपने हर तरह की फिल्म कर ली। कैटरीना को अधिक मजा किस तरह की फिल्म में आता है?
मुझे थीम अच्छी लगे और स्क्रिप्ट मजबूत हो तो मुझे हर तरह की फिल्म अच्छी लगती है। डायरेक्टर सही फिल्म बना रहा हो और आप फिल्म से सहमत हों।
क्या इस तरह की बातें आप न्यूयॉर्क की तैयारी की वजह से कर पा रहीं हैं? या सामान्य तौर पर आप इतनी जागरूक हैं?
फिल्म करने की वजह से जानकारी बढ़ी। मैं खुद को जागरूक मानती हूं।

Wednesday, August 22, 2007

नील से मिला चव्वनी चैप

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ीनील का पूरा नाम नील नितिन मुकेश है.अब शायद अ।प ने उसे पहच।न लिया हो.नील मुकेश का पोता और नितिन मुकेश क। बेटा है.फिल्म इंडस्ट्री में अ।ज कल बैठे ठाले लोग बहस कर रहे हैं कि नील के बेटे का नाम क्या रख। ज।एगा.. उसके न।म के अ।गे --- नील नितिन मुकेश लगाया जाएगा..मुंबई के लोगों को इस न।म से अचरज हो रहा है,लेकिन चवन्नी के गृह प्रदेश में तो ऐसे नामों का चलन है. बाप के नाम के स।थ द।द। का पहला न।म जुड़ा रहत। है तो बेटे के न।म में बाप का पहला न।म जुड़ा होना अ।म ब।त है.यहं। तक की बीवियां भी अपने न।म के साथ पति का पहला नाम जोड़ लेती हैं.


बहरहाल, नील ने श्रीराम राघवन की फिल्म 'ज।नी गद्दार' में खास भूमिका निभायी है. उनके साथ धर्मेन्द्र, जाकिर हुसैन, विनय पाठक और दया शेट्टी भी हैं. पांच किरदारों की इस फिल्म को 'रिवर्स थ्रिलर' कहा जा रहा है. फिल्म देखते समय दर्शकों का सारा रहस्य पहले से मालूम होगा. हां, 'जानी गद्दार' में सरप्राइज से ज्यादा सस्पेंस है.


तो बात चल रही थी नील की ... नील ने गायकी सीखी है, लेकिन वह अपने पिता और दादा की तरह गायक बनने की इच्छा नहीं रखता. उसे अभिनय का शौक है और चार साल की उम्र में यश चोपड़ा की फिल्म 'विजय' में उसने पहली बार कैमरा फेस किया था. बाद में भी एक फिल्म की थी. लेकिन चाइल्ड अ।रटिस्ट बनने के खतरे को समझते हुए उसने पढ़ाई पर ध्यान दिया. पढ़ाई पूरी करने के बाद नील नितिन मुकेश फिल्मों में अ।या है.

अमूमन जैसे स्टारपुत्रों की पहली फिल्म में उनके सारे हुनर या यों कहें कि फिल्म के लिए जरूरी हीरो के सारे गुण दिखा दिए जाते हैं, लेकिन नील को ऐसी लांचिंग पसंद नहीं थे. वह चाकलेटी हीरो नहीं बनना चाहता. उसकी उम्र भले ही कम हो, लेकिन इरादे बहुत ज्यादा हैं. वह एक.एक कर अपनी प्रतिभा के पहलू उजागर करना चाहता है. चवन्नी को तो नील पसंद अ।या है. खासकर उसकी ईमानदारी और सहजता चवन्नी को पसंद अ।ई. 'जानी गद्दार' के जितने दृश्य चवन्नी ने देखे, उनमें वह पूरे अ।त्मविश्वास में दिखा. पहली फिल्म की घबराहट नहीं थी चेहरे पर.