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Thursday, February 16, 2017

फिल्‍म समीक्षा - इरादा



फिल्‍म रिव्‍यू
उम्‍दा अभिनय,जरूरी कथ्‍य
इरादा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म के कलाकारों में नसीरूद्दीन शाह,अरशद वारसी और दिव्‍या दत्‍त हों तो फिल्‍म देखने की सहज इच्‍छा होगी। साथ ही यह उम्‍मीद भी बनेगी कि कुछ ढंग का और बेहतरीन देखने को मिलेगा। इरादा  कथ्‍य और मुद्दे के हिसाब से बेहतरीन और उल्‍लेखनीय फिल्‍म है। इधर हिंदी फिल्‍मों के कथ्‍य और कथाभूमि में विस्‍तार की वजह से विविधता आ रही है। केमिकल की रिवर्स बोरिंग के कारण पंजाब की जमीन जहरीली हो गई है। पानी संक्रमित हो चुका है। उसकी वजह से खास इलाके में कैंसर तेजी से फैला है। इंडस्ट्रियल माफिया और राजनीतिक दल की मिलीभगत से चल रहे षडयंत्र के शिकार आम नागरिक विवश और लाचार हैं।
कहानी पंजाब के एक इलाके की है। रिया(रुमाना मोल्‍ला) अपने पिता परमजीत वालिया(नसीरूद्दीन शाह) के साथ रहती है। आर्मी से रिटायर परमजीत अपनी बेटी का दम-खम बढ़ाने के लिए जी-तोड़ अथ्‍यास करवाते हैं। वह सीडीएस परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। पिता और बेटी के रिश्‍ते को निर्देशक ने बहुत खूबसूरती से चित्रित और स्‍थापित किया है। उनका रिश्‍ता ही फिल्‍म का आधार है। परमजीत एक मिशन पर निकलते और आखिरकार कामयाब होते हैं। हालांकि कहानी बाद में बड़े फलक पर आकर फैल जाती है और उसमें कई किरदार सक्रिय हो उठते हैं।
हमें प्रदेश की भ्रष्‍ट,वाचाल और बदतमीज मुख्‍यमंत्री रमनदीप(दिव्‍या दत्‍ता) मिलती है। प्रदेश के इंडस्ट्रियलिस्‍ट पैडी(शरद केलकर) से उसका खास संबंध है। पैडी के कुकर्मो में शामिल उसके गुर्गे हैं। पैडी की फैक्‍ट्री में हुए ब्‍लास्‍ट की तहकीकात करने एनआईए अधिकारी अर्जुन(अरशद वारसी) आते हैं तो कहानी अलग धरातल पर पहुंचती है। पत्रकार सिमी(सागरिका घटगे) की विशेष भूमिका है। वह इस षडयंत्र को उजागर करने में लगी है। सभी किरदार अपने दांव खेल रहे हैं। नागरिकों के जीवन और स्‍वास्‍थ्‍य जुड़ा एक बड़ा मुद्दा धीरे-धीरे उद्घाटित होता है। उसकी भयावहता डराती है। वही भयावहता अर्जुन को सच जानने के लिए प्रेरित करती है। ढुलमुल और लापरवाह अर्जुन की संजीदगी जाहिर होती है। वह बेखौफ होकर षढयंत्र का पर्दाफाश करता है।
लेखक-निर्देशक जनहित के एक बड़े मुद्दे पर फिल्‍म बनाने की कोशिश की है। अपने इरादे में वे ईमानदार है। फिल्‍मी रूपातंरण में वे तथ्‍यों को रोचक तरीके से नहीं रख पाए हैं। ऐसी घटनाओं पर बनी फिल्‍मों में किरदार कथ्‍य के संवाहक बनते हैं तो फिल्‍म बांधती है। इरादा में तारतम्‍यता की कमी है। ऐसा लगता है कि किरदार आपस में जुड़ नहीं पा रहे हैं। कुछ अवांतर प्रसंग भी आ गए हैं। इरादा में मुख्‍य किरदारों की पर्सनल स्‍टोरी के झलक भर है। लेखक उनके विस्‍तार में नहीं जा सके हैं। अर्जुन और उसके बेटे की फोन पर चलने वाली बातचीत और कैंसर पीडि़ता की सलाह पर अर्जुन का रेल का सफर,मुख्‍यमंत्री रमनदीप का परिवार,सिमी और उसके दोस्‍त का साथ,परमजीत और बेटी का रिश्‍ता... निर्देशक संक्षेप में ही उनके बारे में बता पाती है।
नसीरूद्दीन शाह और अरशद वारसी पर्दे पर साथ होते हैं तो उनकी अदा और मुद्राएं स्क्रिप्‍ट में लिखी पंक्तियों के भाव भी दर्शाती हैं। दोनों ने बेहतरीन अभिनय किया है। दिव्‍या दत्‍ता अपने किरदार को नाटकीय बनाने में ओवर द टॉप चली गई हैं। शरद केलकर संयमित और किरदार के करीब हैं। बेअी रिया की भूमिका में रुमाना मोल्‍ला आकर्षित करने के साथ याद रहती है। पिता के सामने उसकी चीख बीइंग गुड इज ए बिग स्‍कैम बहुत कुछ कह जाती है।
अवधि- 110 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार   

Friday, May 29, 2015

फिल्‍म समीक्षा - वेलकम टू कराची

-अजय ब्रह्मात्‍मज
भारत और पाकिस्तावन के बीच पल रहे दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों को तोड़ती कुछ फिल्मों की कड़ी में ‘वेलकम 2 कराची’ को भी रखा जा सकता है। दोनों देशों के बीच किरदारों के मेल-मिलाप, हंसी-मजाक और हास्यास्पद प्रसंगों से मौजूद तनाव को कम करने के साथ समझदारी भी बढ़ सकती है। ‘फिल्मिस्तान’ ने यह काम बहुत खूबसूरती के साथ किया था। अफसोस कि ‘वेलकम 2 कराची’ का विचार तो नेक, कटाक्ष और मजाक का था, लेकिन लेखक-निर्देशक की लापरवाही से फिल्म फूहड़ और कमजोर हो गई। कई बार फिल्में पन्नों से पर्दे तक आने में बिगड़ जाती हैं। 
                                      याद करें तो कभी इस फिल्मं में इरफान खान थे। अभी जो भूमिका जैकी भगनानी ने निभाई है, उसी भूमिका को इरफान निभा रहे थे। क्या उन्होंने इसी स्क्रिप्ट के लिए हां की थी या जैकी के आने के बाद स्क्रिप्ट बदली गई और उसका यह हाल हो गया? सोचने की बात है कि हर कलाकार किसी और का विकल्पय नहीं हो सकता। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बेपरवाह रवैए की ओर भी यह फिल्म इंगित करती है। कैसे स्वार्थ और लोभ में विचारों की हत्या हो जाती है? कई बार सफल निर्माता की सोच मूल विचार पर थोपी जाती है तो उसका नतीजा ‘वेलकम 2 कराची’ के रूप में सामने आता है। हर फिल्म के निर्माण में पैसा, मेहनत और समय लगता है। ऐसी कोशिशों में सब व्येर्थ हो जाता है।
                                  दो लूजर शम्मीर और केदार एक दुर्घटना की वजह से अनजाने ही कराची पहुंच जाते हैं। उन्हें भारतीय जासूस व आतंकवादी समझा जाता है। दोनों अलग-अलग किस्म के संगठनों के हाथों इस्तेमाल किए जाते हैं। उनसे कुछ ऐसा हो जाता है कि उन्हें पाकिस्तान पहचान भी मिलती है। गलतफहमी की इस निर्दोष यात्रा में हंसी के पल आते हैं। दोनों किरदारों की टिपपणियों में कटाक्ष भी रहता है, लेकिन निर्देशक उसे बढ़ाते या गहराते नहीं हैं। वे तुरंत किसी फूहड़ एवं हास्यास्पाद स्थिति का सृजन कर जबरन हंसाने की कोशिश करते हैं। फिल्म में मोड़ से अधिक मरोड़ हैं, जो एक समय के बाद तकलीफदेह हो जाते हैं।
                      अरशद वारसी अपनी काबिलियत से भी फिल्म का नहीं बचा पाते। दरअसल, उन्हें एक कमजोर कलाकार के साथ नाथ दिया गया है, इसलिए कॉमेडी की गाड़ी ढंग से चल ही नहीं पाती। केदार को गुजराती लहजा देने का आइडिया अच्छा था, लेकिन कलाकार को भी मेहनत करनी चाहिए थी। ‘यंगिस्तान’ से जैकी भगनानी ने उम्मीए जगाई थी। इस फिल्म से वह उम्मीद धुल गई। अभिनेत्री और सहयोगी कलाकारों के लिए न तो पर्याप्त संवाद थे और न दृश्य। सही सोच और कल्प्ना न हो तो वीएफएक्सर बुरा हो जाता है। ‘वेलकम 2 कराची’ उसका भी नमूना है।
 अवधि : 131 मिनट
स्‍टार : ** दो स्‍टार

Friday, January 10, 2014

फिल्‍म रिव्‍यू : डेढ़ इश्किया

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
नवाब तो नहीं रहे। रह गई हैं उनकी बेगम और बांदी। दोनों हमजान और हमजिंस हैं। खंडहर हो रही हवेली में बच गई बेगम और बांदी के लिए शराब और लौंडेबाजी में बर्बाद हुए नवाब कर्ज और उधार छोड़ गए हैं। बेगम और बांदी को शान-ओ-शौकत के साथ रसूख भी बचाए रखना है। कोशिश यह भी करनी है कि उनकी परस्पर वफादारी और निर्भरता को भी आंच न आए। वे एक युक्ति रचती हैं। दिलफेंक खालू बेगम पारा की युक्ति के झांसे में आ जाते हैं। उन्हें इश्क की गलतफहमी हो गई है। उधर बेगम को लगता है कि शायर बने खालू के पास अच्छी-खासी जायदाद भी होगी। फैसले के पहले भेद खुल जाता है तो उनकी मोहब्बत की अकीदत भी बदल जाती है। और फिर साजिश, अपहरण, धोखेबाजी,भागदौड़ और चुहलबाजी चलती है।
अभिषेक चौबे की 'डेढ़ इश्किया' उनकी पिछली फिल्म 'इश्किया' के थ्रिल और श्रिल का डेढ़ा और थोड़ा टेढ़ा विस्तार है। कैसे? यह बताने में फिल्म का जायका बिगड़ जाएगा। अभिषेक चौबे ने अपने उस्ताद विशाल भारद्वाज के साथ मिल कर मुजफ्फर अली की 'उमराव जान' के जमाने की दुनिया रची है, लेकिन उसमें अमेरिकी बर्गर, नूडल और आई फोन 5 जैसे 21वीं सदी के शहरी लब्ज ला दिए हैं। महमूदाबाद की ठहरी हुई दुनिया में ज्यों आज का इलाहाबाद घुस आया हो। यहां मोटर है, मोबाइल है, मोहब्बत है, मुशायरा है और मोहरा है। खालू इफ्तखार और बब्बन हैं। 'डेढ़ इश्किया' पतनशील नवाबी का नमूना है, जिसमें आधुनिक समाज के भ्रष्ट आचरण और व्यवहार भी शामिल हो गए हैं।
विशाल भारद्वाज की देखरेख में अभिषेक चौबे की 'डेढ़ इश्किया' हिंदी फिल्मों की नवाबी परंपरा से जुड़ने के बावजूद कथित मुस्लिम सोशल फिल्म नहीं है। यह शायरी, नजाकत, रक्स और खालिस उर्दू जैसी सांस्कृतिक विशेषताएं हैं तो छल-प्रपंच और झूठ-फरेब की आधुनिक विसंगतियां भी हैं। दो वक्त आकर 157 मिनट की फिल्म उसी कदर ठहर गए हैं, जैसे 'डेढ़ इश्किया' क्लाइमेक्स पर निर्जन स्टेशन पर ठहर जाती है। ऐसा लगता है कि बाहरी समाज इस दुनिया में कोई आमदरफ्त नहीं है,एक पुलिस के अलावा। यकीनन यह मायावती और मुलायम के शासन काल का महमूदाबाद नहीं है। अभिषेक चौबे ने अपनी फिल्म के लिए एक फंतासी रची है और उसकी जुबान भी गुजरे जमाने से निकाल कर चस्पां कर दी है। जमाने बाद ऐसी खालिस उर्दू फिल्म में सुनाई पड़ी है। शुक्रिया विशाल भारद्वाज और अभिषेक चौबे। हां, आप उर्दू समझते-बूझते न हों तो किसी उर्दू जानकार को अवश्य साथ ले जाएं, क्योंकि ऊिल्म के संवादों में फिल्मी गीतों यी मेंहदी हसन-गुलाम अली की गजलों में लगातार सुनाई पड़ने वाली उर्दू की जानकारी नाकाफी होगी। यह कोई दीवान या किताब नहीं है कि पन्ने मोड़ कर आप मुश्किल लब्जों के मानी खोज लें।
बेगम पारा की भूमिका में माधुरी दीक्षित और मुनिया बनी हुमा कुरेशी फिल्म की जान हैं। दोनों की खूबसूरती और अदाएं फिल्म में छटा बिखेरती हैं। माधुरी के नृत्य कौशल और चपलता का निर्देशक ने सुंदर इस्तेमाल किया है। उनके लिबास और लुक में कसर रह गया है। हुमा कुरेशी मुनिया के रूप में बराबर का साथ देती हैं। मौका मिलते ही वे अपने जलवे भी बिखेर देती हैं। सचमुच सधे निर्देशन और सुलझी स्क्रिप्ट से अदाकारी निखर जाती है। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी पर यह बात सौ फीसदी सही ठहरती है। हाल-फिलहाल में हम दोनों उम्दा अभिनेताओं की साधारण फिल्में देख चुके हैं। खालू इफ्तखार की भूमिका में नसीरुद्दीन शाह पूरी शालीनता और लहजे के साथ मौजूद हैं। वहीं अरशद वारसी की बेफिक्री पसंद आती है। इन दोनों के साथ नकली नवाब की भूमिका में आए विजय राज ध्यान खींचते हैं। विजय राज की चंद उल्लेखनीय फिल्मों में 'डेढ़ इश्किया' शामिल होगी। मनोज पाहवा छोटी भूमिका में भी प्रभावित करते हैं।
'डेढ़ इश्किया' हिदुस्तान की हिंदी-उर्दू तहजीब को ट्रिब्यूट है। लेखक-निर्देशक ने शास्त्रीय परंपराओं का समुचित उपयोग किया है। कई सारी महत्वपूर्ण चीजें रेफरेंस में आती हैं। अगर उनसे आप की वाकिफियत नहीं है तो भी आप मिस नहीं करेंगे, लेकिन जानकार होंगे तो ज्यादा मजा आएगा। 'डेढ़ इश्किया' दर्शकों से बारीक और सटीक नजर की अपेक्षा रखती हैं। यूं तो फिल्म इंडस्ट्री में हैं फिल्मकार हैं कई अच्छे, कहते हैं कि विशाल का है अंदाज-ए-बयां और ़ ़ ़ जी हां, विशाल भारद्वाज और अभिषेक चौबे की वाहिद फिल्मकारी के लिए 'डेढ़ इश्किया' अवश्य देखें। 
**** चार स्‍टार
अवधि-157 मिनट

Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : जॉली एलएलबी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
तेजिन्दर राजपाल - फुटपाथ पर सोएंगे तो मरने का रिस्क तो है।
जगदीश त्यागी उर्फ जॉली - फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते।
सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' में ये परस्पर संवाद नहीं हैं। मतलब तालियां बटोरने के लिए की गई डॉयलॉगबाजी नहीं है। अलग-अलग दृश्यों में फिल्मों के मुख्य किरदार इन वाक्यों को बोलते हैं। इस वाक्यों में ही 'जॉली एलएलबी' का मर्म है। एक और प्रसंग है, जब थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक बुजुर्ग अपने परिवार के साथ नमूदार होते हैं। वे कहते हैं साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे सोने की जगह है। फिल्म की कहानी इस दृश्य से एक टर्न लेती है। यह टर्न पर्दे पर स्पष्ट दिखता है और हॉल के अंदर मौजूद दर्शकों के बीच भी कुछ हिलता है। हां, अगर आप मर्सिडीज, बीएमडब्लू या ऐसी ही किसी महंगी कार की सवारी करते हैं तो यह दृश्य बेतुका लग सकता है। वास्तव में 'जॉली एलएलबी' 'ऑनेस्ट ब्लडी इंडियन' (साले ईमानदार भारतीय) की कहानी है। अगर आप के अंदर ईमानदारी नहीं बची है तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' आप के लिए नहीं है। यह फिल्म मनोरंजक है। फिल्म में आए किरदारों की सच्चाई और बेईमानी हमारे समय के भारत को जस का तस रख देती है। मर्जी आप की ़ ़ ़ आप हंसे, रोएं या तिलमिलाएं।
हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर हास्य इस कदर हावी है कि हम व्यंग्य को व्यर्थ समझने लगे हैं। सुभाष कपूर ने किसी भी प्रसंग या दृश्य में सायास चुटीले संवाद नहीं भरे हैं। कुछ आम किरदार हैं, जो बोलते हैं तो सच छींट देते हैं। कई बार यह सच चुभता है। सच की किरचें सीने को छेदती है। गला रुंध जाता है। 'जॉली एलएलबी' गैरइरादतन ही समाज में मौजूद अमीर और गरीब की सोच-समझ और सपनों के फर्क की परतें खोल देती है। 'फुटपाथ पर क्यों आते हैं लोग?' जॉली के इस सवाल की गूंज पर्दे पर चल रहे कोर्टरूम ड्रामा से निकलकर झकझोरती है। हिंदी फिल्मों से सुन्न हो रही हमारी संवेदनाओं को यह फिल्म फिर से जगा देती है। सुभाष कपूर की तकनीकी दक्षता और फिल्म की भव्यता में कमी हो सकती है, लेकिन इस फिल्म की सादगी दमकती है।
'जॉली एलएलबी' में अरशद वारसी की टीशर्ट पर अंग्रेजी में लिखे वाक्य का शब्दार्थ है, 'शायद मैं दिन में न चमकूं, लेकिन रात में दमकता हूं'। जॉली का किरदार के लिय यह सटीक वाक्य है। मेरठ का मुफस्सिल वकील जगदीश त्यागी उर्फ जॉली बड़े नाम और रसूख के लिए दिल्ली आता है। तेजिन्दर राजपाल की तरह वह भी नाम-काम चाहता है। वह राजपाल के जीते एक मुकदमे के सिलसिले में जनहित याचिका दायर करता है। सीधे राजपाल से उसकी टक्कर होती है। इस टक्कर के बीच में जज त्रिपाठी भी हैं। निचली अदालत के तौर-तरीके और स्थिति को दर्शाती यह फिल्म अचानक दो व्यक्तियों की भिड़ंत से बढ़कर दो सोच की टकराहट में तब्दील हो जाती है। जज त्रिपाठी का जमीर जागता है। वह कहता भी है, 'कानून अंधा होता है। जज नहीं, उसे सब दिखता है।'
सुभाष कपूर ने सभी किरदारों के लिए समुचित कास्टिंग की है। बनी इमेज के मुताबिक अगर अरशद वारसी और बमन ईरानी किसी फिल्म में हों तो हमें उम्मीद रहती है कि हंसने के मौके मिलेंगे। 'जॉली एलएलबी' हंसाती है, लेकिन हंसी तक नहीं ठहरती। उससे आगे बढ़ जाती है। अरशद वारसी, बमन ईरानी और सौरभ शुक्ला ने अपने किरदारों को सही गति, भाव और ठहराव दिए हैं। तीनों किरदारों के परफारमेंस में परस्पर निर्भरता और सहयोग है। कोई भी बाजी मारने की फिक्र में परफारमेंस का छल नहीं करता। छोटे से दृश्य में आए राम गोपाल वर्मा (संजय मिश्रा) भी अभिनय और दृश्य की तीक्ष्णता की वजह से याद रह जाते हैं। फिल्म की नायिका संध्या (अमृता राव) से नाचने-गाने का काम भी लिया गया है, लेकिन वह जॉली को विवेक देती है। उसे झकझोरती है। हिंदी फिल्मों की आम नायिकाओं से अलग वह अपनी सीमित जरूरतों पर जोर देती है। वह कामकाजी भी है।
सुभाष कपूर ने 'जॉली एलएलबी' के जरिए हिंदी फिल्मों में खो चुकी व्यंग्य की धारा को फिर से जागृत किया है। लंबे समय के बाद कुंदन शाह और सई परांजपे की परंपरा में एक और निर्देशक उभरा है, जो राजकुमार हिरानी की तरह मनोरंजन के साथ कचोट भी देता है। धन्यवाद सुभाष कपूर।

Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : जिला गाजियाबाद

Movie review zila ghaziabad-अजय ब्रह्मात्मज
इसी हफ्ते रिलीज हुई 'काय पो चे' से ठीक उलट है 'जिला गाजियाबाद'। सब कुछ बासी, इतना बासी की अब न तो उसमें स्वाद रहा और न उबाल आता है। हाल-फिलहाल में हिट हुई सभी मसाला फिल्मों के मसाले लेकर बनाई गई एक बेस्वाद फिल्म ़ ़ ़ कोई टेस्ट नहीं, कोई एस्थेटिक नहीं। बस धूम-धड़ाका और गोलियों की बौछार। बीच-बीच में गालियां भी।
निर्माता विनोद बच्चन और निर्देशक आनंद कुमार ने मानो तय कर लिया था कि अधपकी कहानी की इस फिल्म में वे हाल-फिलहाल में पॉपुलर हुई फिल्मों के सारे मसाले डाल देंगे। दर्शकों को कुछ तो भा जाए। एक्शन, आयटम नंबर, गाली-गलौज, बेड सीन, गोलीबारी, एक्शन दृश्यों में हवा में ठहरते और कुलांचे मारते लोग, मोटरसायकिल की छलांग, एक बुजुर्ग एक्टर का एक्शन, कॉलर डांस ़ ़ ़ 'जिला गाजियाबाद' में निर्माता-निर्देशक ने कुछ भी नहीं छोड़ा है। हालांकि उनके पास तीन उम्दा एक्टर थे - विवेक ओबेराय, अरशद वारसी और रवि किशन, लेकिन तीनों के किरदार को उन्होंने एक्शन में ऐसा लपेटा है कि उनके टैलेंट का कचूमर निकल गया है। तीनों ही कलाकार कुछ दृश्यों में शानदार परफारमेंस देते हैं, फिर भी वे फिल्म में कुछ भी जोड़ नहीं पाते। यह उनकी सीमा नहीं है। पटकथा ऐसी बेतरतीब है कि वह न तो कहीं से चलती है और न कहीं पहुंचती है। इस कथ्यहीन फिल्म में संजय दत्त की कद्दावर मौजूदगी भी फिसड्डी रही है। संजय दत्त का आकर्षण ऐसी फिल्मों की वजह से तेजी से खत्म हो रहा है। इस फिल्म में अरशद वारसी और रवि किशन ने संजीदगी से अपने किरदारों को चरित्र दिया है। उनकी मेहनत पर पानी फिर गया है।
निर्माता-निर्देशक को लगता है कि उनकी फिल्म देश के आम दर्शक पसंद करेंगे। ऐसा नहीं है। आम दर्शकों के पापुलर टेस्ट का भी एक सलीका है। 'जिला गाजियाबाद' उनमें अरुचि ही पैदा करेगी।
-डेढ़ स्टार

Friday, July 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा: शार्टकट


-अजय ब्रह्मात्मज


शार्टकट की मूल मलयालम फिल्म बहुत अच्छी बनी थी। उस फिल्म में मोहन लाल को दर्शकों ने खूब पंसद किया था। लेकिन हिंदी में बनी शार्टकट उसके पासंग में भी नहीं ठहरती। सवाल उठता है कि मलयालम फिल्म पर आधारित फिल्म के लेखक के तौर पर अनीस बज्मी का नाम कैसे जा सकता है? क्यों नहीं जा सकता? उन्होंने मूल फिल्म देखकर उसे हिंदी में लिखा है। इस प्रक्रिया में भले ही मूल की चूल हिल गई हो।
इस फिल्म से यह भी पता चलता है कि फिल्मों की टाप हीरोइनें या तो आइटम सांग करती हैं या फिर गुंडों से जान बचाने की कोशिश करती हैं। फिल्म के हीरो निहायत मूर्ख होते हैं। किसी प्रकार पापुलर हो जाने के बाद वे अपनी मूर्खताओं को ही अपनी विशेषता समझ बैठते हैं। निर्देशक नीरज वोरा के पास फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि और उसके किरदार थे। वे इनके सही उपयोग से रोचक और हास्यपूर्ण फिल्म बना सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस फिल्म को वे संभाल नहीं सके।
शार्टकट में अस्पष्टता है। फिल्म का प्रमुख किरदार शेखर है या राजू या अनवर? फिल्म की हीरोइन शेखर को मिलती है, इसलिए उसे हीरो समझ सकते हैं। लेकिन फिल्म की प्रमुख घटनाएं राजू और अनवर से जुड़ी हैं। निश्चित ही यह कंफ्यूजन शूटिंग शुरू होने के बाद का है, जो पर्दे पर आ गया है। यही वजह है कि अक्षय खन्ना, अरशद वारसी, अमृता राव और बकुल ठक्कर की कोशिशों के बावजूद फिल्म प्रभावित नहीं करती। हां, अमृता राव ने आयटम सांग और पहनावे से यह साबित किया कि आप उन्हें केवल छुईमुई और घरेलू किस्म की हीरोइन न समझें। फिर भी इन दृश्यों में उनकी झिझक चेहरे और बाडी लैंग्वेज में कई बार दिख जाती है।
रेटिंग : *1/2