Posts

Showing posts with the label मंजीत ठाकुर

बदलता दौर, बदलते नायक-मंजीत ठाकुर

भारत में सिनेमा जब शुरु हुआ, तो फिल्में मूल रुप से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हुआ करती थीं। लिहाजा, हमारे नायक भी मूल रुप से हरिश्चंद्र, राम या बिष्णु के किरदारों में आते थे।पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ (1931) के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश परिपाटियाँतय हो चुकी थीं, लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तोअभिनेताओं के चेहरोंऔर देह-भाषा के साथ अभिनय में गले और स्वर की अहमियत बढ़ गई।1940 का दशक हिंदी सिनेमा काएक संक्रमण-युग था। वह सहगल, पृथ्वीराज कपूर,सोहराब मोदी, जयराज, प्रेम अदीब, किशोर साहू, मोतीलाल, अशोक कुमारसरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकोंका ज़माना था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार और भारत भूषण जैसे नए लोग दस्तक दे रहे थे।पारसीऔर बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीयशैलियां बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं,उधरबरुआ ने बांग्ला ‘देवदास’ में नायक की परिभाषा को बदल दिया।अचानक सहगलऔरसोहराब मोदी

हिंदी सिनेमा में खलनायक-मंजीत ठाकुर

मंजीत ठाकुरहिंदी फिल्मों का एक सच है कि अगर नायक की को बड़ा बनाना हो तो खलनायक को मजबूत बनाओ। उसे नायक जैसा बना दो। यह साबित करता है कि रामायण और महाभारत केवल राम और कृष्ण की वजह से ही नहीं, रावण और दुर्योधन की वजह से भी असरदार हैं।हिंदुस्तानी सिनेमा के पहले दशक में धार्मिक कथाओं और किंवदंतियों पर सारी फ़िल्में बनीं। इन कथाओं के नायक देव थे और खलनायक राक्षसगण।हिंदुस्तानी सिनेमा में गांधी जी असर बेहद खास था और शायद इसी वजह से पहले चार दशक तक खलनायक बर्बर नहीं थे और उनके चरित्र भी सुपरिभाषित नहीं थे। उस दौर में प्रेम या अच्छाई का विरोध करने वाले सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वासग्रस्त लोग थे।‘अछूत कन्या’ में प्रेम-कथा के विरोध करने वाले जाति प्रथा में सचमुच विश्वास करते थे। इसीतरह महबूब खान की ‘नज़मा’ में पारंपरिक मूल्य वाला मुसलिम ससुर परदा प्रथा नामंजूर करने वाली डॉक्टर बहू का विरोध करता है और 1937 में ‘दुनिया ना माने’ का वृद्ध विधुर युवा कन्या से शादी को अपना अधिकार ही मानता है।पचास और साठ के दशक में साहूकार के साथ दो और खलनायक जुड़े-डाकू और जमींदार। खलनायक का ये चरित्र ‘साहूकारी पाश’ …

समाज का अक्स है सिनेमा - मंजीत ठाकुर

हिंदी सिनेमा पर मंजीत ठाकुर ने यह सिरीज आरंभ की है। भाग-1
सिनेमा, जिसके भविष्य के बारे में इसकेआविष्कारक लुमियर बंधु भी बहुत आश्वस्त नहीं थे, आज भारतीय जीवन का जरूरी हिस्साबना हुआ है। 7 जुलाई 1896, जब भारत में पहली बार किसी फिल्म का प्रदर्शन हुआ था, तबसे आज तक सिनेमा की गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है। हम अपने निजी औरसामाजिक जीवनकी भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम हीदिखेगा।सिनेमाने समाज के सच को एक दस्तावेज़कीतरहसंजो रखाहै।चाहे वह 1930 मेंआर एस डी चौधरीकी बनाईव्रतहो, जिसमेंमुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखता था और इसी वजह से ब्रितानी सरकार ने इस फिल्मको बैन भी कर दिया था, चाहे 1937 में वी शांताराम कीदुनिया न माने। बेमेलविवाह पर बनी इस फिल्म को सामाजिक समस्या पर बनी कालजयी फिल्मों में शुमार किया जासकता है।जिस दौरमेंपाकिस्तान