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Friday, October 7, 2016

फिल्‍म समीक्षा : मिर्जिया




दो युगों की दास्‍तान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की मिर्जिया दो कहानियों को साथ लेकर चलती है। एक कहानी पंजाब की लोककथा मिर्जा-साहिबा की है। दूसरी कहानी आज के राजस्‍थान के आदिल-सूची की है। दोनों कहानियों का अंत एक सा है। सदियों बाद भी प्रेम के प्रति परिवार और समाज का रवैया नहीं बदला है। मेहरा इस फिल्‍म में अपनी शैली के मुताबिक दो युगों में आते-जाते हैं। रंग दे बसंती उनकी इस शैली की कामयाब फिल्‍म थी। इस बार उनकी फिल्‍म दो कहानियों को नहीं थाम सकी है। दोनों कहानियों में तालमेल बिठाने में लेखक और निर्देशक दोनों फिसल गए हैं। अपारंपरिक तरीके से दो कहानियों का जोड़ने में वे रंग दे बसंती की तरह सफल नहीं हो पाए हैं।
गुलजार के शब्‍दों के चयन और संवादों में हमेशा की तरह लिरिकल खूबसूरती है। उन्‍हें राकेश ओमप्रकाश मेहरा आकर्षक विजुअल के साथ पेश करते हैं। फिल्‍म के नवोदित कलाकारो हर्षवर्धन कपूर और सैयमी खेर पर्दे पर उन्‍हें जीने की भरपूर कोशिश करते हैं। सभी की मेहनत के बावजूद कुछ छूट जाता है। फिल्‍म बांध नहीं पाती है। यह फिल्‍म टुकड़ों में अच्‍छी लगती है। द,श्‍य और दृश्‍यबंध नयनाभिरामी हैं। लोकेशन मनमोहक हैं। फिल्‍म के भावों से उनकी संगत भी बिठाई गई है। मेहरा ने फिल्‍म के शिल्‍प पर काफी काम किया है। कमी है तो कंटेंट की। अतीत और वर्तमान की प्रेमकहानियों का प्रवाह लगभग एक सा है। गुलजार ने प्रयोग किया है कि अतीत की कहानी में संवाद नहीं रखे हैं। कलाकारों के मूक अभिनय को आज के संवादों से अर्थ और अभिप्राय मिलते हैं।
फिल्‍म लोहारों की बस्‍ती से आरंभ होती है। लोहार बने ओम पुरी बतात है,लोहारों की गली है यह। यह गली है लोहारों की,हमेशा दहका करती है....यहां पर गरम लोहा जब पिघलता है,सुनहरी आग बहती हैकभी चिंगारियां उड़ती हैं भट्ठी से कि जैसे वक्‍त मुट्ठी खोल कर लमहे उड़ाता है। सवारी मिर्जा की मुड़ कर यहीं पर लौट आती है। लोहारों की बस्‍ती फिर किस्‍सा साहिबां का सुनाती है...सुना है दास्‍तां उनकी गुजरती एक गली से तो हमेशा टापों की आवाजें आती हैं... उसके बाद अतीत के मिर्जा-साहिबां की कहानी दलेर मेंहदी की बुलंद आवाज के साथ शुरू होती है। ये वादियां दूधिया कोहरे की... गीत की अनुगूंज पूरी फिल्‍म में है। राकेश ओप्रकाश मेहरा अपनी फिल्‍म म्‍यूजिकल अंदाज में पेश करते हैं। उन्‍होंने गुलजार के पंजाबी गीतों का समुचित इस्‍तेमाल किया है,लेकिन ठेठ पंजाबी शब्‍दों के प्रयोग से गीत के भाव समझने में दिक्‍कत होती है। हां,पंजाबीभाषी दर्शकों को विशेष आनंद आएगा ,लेकिन आम दर्शक गीत के अर्थ और भाव नहीं समझ पा एंगे। फिल्‍म के संप्रेषण में पंजाबी की बहुलता आड़े आएगी।
मिर्जिया हर्षवर्धन कपूर और सैयमी खेर की लांचिंग फिल्‍म है। लांचिंग फिल्‍म में नवोदित कलाकारों की क्षमता और योग्‍यता की परख होती है। इस लिहाज से हषवर्धन कपूर और सैयमी खेर निराश नहीं करते। दोनों एक तरह से डबल रोल में हैं। एक सदियों पहले के किरदार और दूसरे आज के किरदार...उन्‍हें दोनों युगों के अनुरूप पेश करने में फिल्‍म की तकनीकी टीम सफल रही है। बतौर कलाकार वे भी दिए गए चरित्रों को आत्‍मसात करते हैं। हर्षवर्धन कपूर हिंदी फिल्‍मों के रेगुलर हीरो नहीं लगते। इस फिल्‍म के कथ्‍य के मुताबिक उन्‍होंने रूप धारण किया है। सैयमी खेर में एक आकर्षण है। वह खूबसूरत हैं। उन्‍होंने अपने किरदारों की मनोदशा का सही तरीके से समझा और निर्देशक की सोच में ढलने की कोशिश की है।
निस्‍संदेह मिर्जिया भव्‍य और सुंदर है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने वीएफएक्‍स और दश्‍य संयोजन की कल्‍पना से उसे सम्‍मोहक बना दिया है। गुलजार पनी खासियत के बावजूद प्रभावित नहीं कर पाते। इस बार वक्‍त,लमहा और चांद नहीं रिझा पाते हैं। फिल्‍म का गीत-संगीत पंजाबीपन को गाढ़ा करता है।
अवधि-129 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार  

Thursday, October 6, 2016

कायम रहे हमेशा इश्‍क - हर्षवर्धन कपूर



-अजय ब्रह्मात्‍मज

अनिल कपूर के बेटे और सोनम कपूर के भाई हर्षवर्धन कपूर की पहली फिल्‍म मिर्जिया आ रही है। इसके निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा हैं। इस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट गुलजार ने लिखी है। 

-कितनी खुशी है और कितनी घबराहट है?
० बहुत ही यूनिक हालत हैं। यह बहुत ही अलग किस्म की फिल्म है। गुलजार साहब ने लिखी है। उनके लिखे को राकेश ओम प्रकाश मेहरा साहब ने पर्दे पर उतारा है। यह मिर्जा-साहिबा की प्रेम कहानी है। उनकी एक एक्सटर्नल लव स्टोरी है,जो यूनिवर्स में प्ले आउट होती है।  उनके बीच के रोमांस का यह आइडिया है कि वह हमेशा रहे। इसमें 2016 का राजस्‍थन भी है। आदिल औऱ सूचि आज की कहानी के पात्र है। फिल्‍म में गुलजार साहब ने एक लाइन लिखी है, मरता नहीं इश्क मिर्जिया सदिया साहिबा रहती हैं। देखें तो प्यार कभी मरता नहीं। वह इंटरनल सोल में रहता है। 

-मतलब एक सदी में आना है औऱ एक सदी से जाना है?
० जी बिल्कुल। यह बहुत पोएटिक है। गुलजार साहब बहुत ही सोच समझकर लिखते हैं। आप आज एक सीन पढ़ लें और दस महीने बाद उसे फिर से पढ़ें तो फिर अलग नजरिए से सोचने लगते हैं। यही गुलजार साहब के लेखन की खूबसूरती है। उनके लेखन को राकेश सर ने विजुअल आइडेंटिटी  दी है। मैं आज यहां बैठकर नहीं कह सकता हूं कि फिल्म चलेगी या नहीं? लेकिन मैं यह डेफिनेटली बोल सकता हूं कि आपने ऐसी फिल्म कभी देखी नहीं होगी। आप के दिल औऱ दिमाग में इस फिल्म के बारे में कुछ ना कुछ जरूर बैठ जाएगा। इसे देखने का अनुभव हर किसी के लिए अलग होगा। इस फिल्‍म के बारे में लंबे समय तक बात की जाएगी। 

-किस लिहाज से आप कह रहे हैं कि इस तरह की फिल्म नहीं बनी है?
०आपने इस फिल्म का ट्रेलर और सांग ट्रेलर देखा है। उसमें विजुअल अचीवमेंट है। हमारी फिल्म ज्यादा डायलॉग हैवी नहीं है। गुलजार साहब ने स्टोरी टेलिंग का यूनिक तरीका चुना है। मिर्जा-साहिबा और आदिल-सूची की कहानी को एक साथ ब्लेंड करना एक अलग तरह का प्रयोग है। दो पैरलल स्टोरी चलती रहेगी। अगर मिर्जा-साहिबा आज होते तो कैसा होता? इसे म्यूजिकली नरेट किया गया है।

-गुलजार साहब से आपकी मुलाकात हुई तो कैसे लगा?
० शूटिंग के दरम्‍यान नहीं हुई थी। मुझे लगता है राकेश मेहरा ने हमें जानबूझ कर नहीं मिलाया है। हम लोग फिल्‍म के म्‍यूजिक लांच के समय मिले। खूब बातें कीं। उनकी लिखी हुई फिल्म में काम करना मेरे लिए सम्मान की बात है। मिर्जा साहिबा की यह कहानी उन्होंने पंद्रह सालों के बाद लिखी है। उन्होंने हू तू तू के बाद कोई स्क्रिप्ट नहीं लिखी थी। मेरी पहली फिल्म गुलजार ने लिखी है,यह बात हमेशा मेरे साथ रहेगी। मैं इस सोच के साथ जिंदा रहूंगा।

- और फिर गुलजार और राकेश ओमप्रकाश मेहरा का कांबिनेशन?
जी बिल्कुल। इससे बेहतर हो भी नहीं सकता और सोच भी नहीं सकते। मिर्जा साहिबा की दुनिया में मैं उसमें अच्छी तरह से फिट बैठ जाता हूं। मेरे चेहरे की कटिंग मेल खाती है। मैं उस दुनिया में खुद को देख सकता हूं। इस फिल्म ने मेरा सपना पूरा कर दिया।

-मुझे आप में संकोच दिख रहा है ?
० मैं इन्ट्रोवट लड़का हूं।

- जी,वह दिख रहा है। फिर भी ऐसी फिल्‍म के साथ क्‍या संकोच और क्‍या डर?
० जी मेरा सबसे बड़ा डर प्रमोशन है। मुझे लगता है कि हम तीन-चार साल मेहनत करते हैं और फिर दर्शकों को रिझाते हैं। दर्शकों को फिल्‍म देखने के लिए तैयार करना मुश्किल काम है। अभी उनके पास कई ऑप्‍शन है। मैं चाहूंगा कि एक सच्ची फिल्म को सभी अनुभव करें। फिल्म बनाना एक अलग चीज है। उसको रिलीज करना अलग चीज है। आप एक अच्छी फिल्म बना सकते हो, लेकिन उसकी सही मार्केटिंग भी होनी चाहिए। हमें अब नए तरीके खोजने हैं। 

- मिर्जिया से आगे कहां?
 ० जी, मेरा मकसद स्टार बनना नहीं है। मैं पहले यह कहना चाहूंगा कि कोई भी एक्टर डायरेक्टर से बड़ा नहीं है। डायरेक्टर के दिमाग में एक फिल्म होती है। उसका विजन होता है। आप उस विजन में एक किरदार हो। आप को वह किरदार डायरेक्‍टर के विजन से निभाना है। सच्‍चाई से किरदार निभाने से ही कोई स्‍टार बनता है। आपकी आंखों में सच्चाई है तो आप लोगों को इमोशनली मूव करते हैं। दर्शक आपसे जुड़ने लगते हैं। लोग बोलते हैं कि मैंने उस एक्टर को महसूस किया है। मेरा यही इरादा है। मुझे भिन्न प्रकार के किरदार निभाने हैं। स्टारडम इसी प्रोसेस में स्‍टारडम आ सकता है। अगर मैं ओवरनाइट सेंसेशन नहीं बनूं तो ठीक है।

- कब ऐसा हुआ कि आपको लगा कि आपके घर के लोग फिल्मों से हैं। आपको कब वह महसूस हुआ कि आप स्टार किड हैं?
० बहुत जल्दी पता चल जाता है। आपके पिता को लोग देखते हैं। वह पता चल जाता है। मुझे कब पता चला उसकी कोई तारीख याद नहीं है। मैंने मां के साथ ज्यादा समय बिताया है। चौदह की उम्र में पापा के साथ मेरा रिश्ता अनब्रेकेबल हुआ।

- फिल्मों में आने का कब तय किया?
० छोटी उम्र से मुझे विश्व सिनेमा का एक्‍सपोजर था। पापा डीवीडी खरीदते थे। कैसेट खरीदते थे। मैं बैठकर देखता था। वहीं से मेरी सोच डेवलप हो गई है। सतरह-अठारह साल में मुझे लगा कि अब मुझे इस फील्ड में खुद को एडुकेट करना है। फिर इस सोच में उलझा रहा कि मैं पहले एक्टर बनूं या फिर राइटर बनने के बाद एक्टर बनूं। फिर मैंने ही तय किया कि एक्टिगं से शुरू करते हैं। 

-आपने कहीं से ट्रेनिंग भी ली?
० चार साल मैं अमेरिका में रहा। वहां पर मैंने स्क्रीन राइटिंग की डिग्री ली। थिएटर एक्टर आलोक उल्‍फत से एक्टिंग ट्रेनिंग ली। मुकेश छाबड़ा से भी सीखा। मेहरा ने साउथ अफ्रीका से एक्टिंग कोच टीना जॉनसन को बुलवाया था। उनके साथ छह महीने की ट्रेनिंग ली। वह मेरी लाइफ का सबसे बेहतरीन समय था।

- क्या सीखा आपने?
० एक्टिंग ही सीखी। हर किसी का तरीका अलग होता है। आलोक थिएटर बैंकग्राउंड से हैं। छाबड़ा कास्टिंग से हैं। टीना का अमेरिकन मैथड है। वे मिर्जिया के सीन लेते थे। उस सीन को ब्रेकडाउन करते थे। और फिर उसे एक्‍ट करते थे।  जैसे कोई बोलता है कि हैप्पी और सैड बनने की एक्टिंग करो। यह सही नहीं है। पहले यह सोचना पड़ता है कि आप क्या कहना चाहते हो? इमोशन के जरिए हैप्पी और सैड का एक्शन आएगा। यह सीखने को मिला।

-किसी भी एक्‍टर के लिए पहली फिल्‍म खास होती है...
0 जी,मेरा यही मानना है कि अगर आप सच्चाई से काम करते हैं तो दर्शक को आपकी आंखों में सच्चाई दिखती है। इमोशन आता है। भले ही फिल्म नहीं चले,लेकिन एक कनेक्शन बन जाता है। मुझे लगता है कि मि‍र्जिया दर्शकों के दिलों में घर बनाएगी। पहली फिल्म में कनेक्शन हो गया तो वह हमेशा रहेगा। जैसे रितिक के साथ कहो ना प्यार में हो गया था। वह आज तक है। रणवीर के साथ पहली बार नहीं हुआ,लेकिन दूसरी फिल्म से हो गया। उनमें प्रतिभा है। 

- मिर्जिया के किरदार के बारे में आपकी क्या राय है
० मिर्जा वारियर है। वह अपने प्यार के लिए लढ़ रहा है। उसे खुद पर विश्वास है। मिर्जा मैन है। आदिल लड़का है। चौबीस साल की उम्र में मुझे दोनों किरदार निभाने थे। मेरे लिए चैलेंजिग था। हमने आदिल की शूटिगं पहले की। नवंबर से लेकर फरवरी तक। हमने चार महीने का ब्रेक लिया। मैंने अपना शरीर बदला। घुडसवारी करने का अपना तरीका बदला। आदिल और मिर्जा दोनों फिल्म में हैं। उनकी बॉडी लैगवेज अलग है पीरियड और कपड़े के हिसाब से। लोकेशन और हेयर और कपड़े से आधा काम हो जाता है। बाकी का पचास प्रतिशत काम हमें करना होता है।
फिल्म में आप देखेंगे तो लगेगा कि दोनों किरदार अलग है। आदिल और मिर्जा एक दूसरे को नहीं जानते हैं। दो अलग कहानियां हैं। यह दो फिल्मों की तरह है। मुझे ऐसा लगता है कि राकेश जी के साथ मैंने दो फिल्में कर ली है। 

- मेहरा साहेब के बारे में क्या कहेंगे। इससे बेहतर डेब्यू आपके लिए क्या हो सकता है?
० उनकी तरफ से मुझे प्रस्ताव आया था। हम लोग दिल्ली 6 के सेट पर मिले थे। मैं तब 19 साल का था। उन्हें मेरी फेशियल लुक और पर्सनैलिटी मिर्जा की कहानी में फिट लगा। तब गुलजार कहानी लिख रहे थे। हमलोगों की बात चलती रही। शुरू मेा मैंने मना कर दिया। उन्होंने कहा भी कि गुलजार लिख रहे हैं। मैं डायरेक्ट कर रहा हूं। कोई और लड़का होता तो हां कह देता। दरअसल,मुझे अंदर से फील नहीं आया। तब मैं जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं था। पढा़ई खत्म करने के बाद लौटा तब मैंने उन्‍हें कहा कि अब मैं तैयार हूं। 

- इतना धैर्य और संयम रखा आपने?
० मैं बहुत धैर्य रखता हूं। अगर मैं किसी चीज से प्यार करता हूं तो दो साल लगा सकता हूं। अगर मुझे लगा कि जो बनेगा वह वसूल होगा। यादगार होगा। लोग उस फिल्म के बारे में बात करेंगे। फिर मैं किसी हद तक जा सकता हूं। 

-मां और बहन का कितना प्रभाव है?
० मां का बहुत है। पापा व्यस्त रहते थे। मां और बहने थीं। उस उम्र में जो आता है,आप लेते जाते हैं। महिलाओं से कैसे पेश आना है, अपने आपको कैसे कंडक्ट करना है? यह सब सीखा। 

- राइटिंग की पढ़ाई की है आप ने। क्‍या फिल्‍में लिखेंगे?
० राइटर बनना है। मुझे लिखना है,लेकिन पहले एक्टर के तौर पर सम्मान और सफलता चाहिए। बाद में मन का काम कर सकूं। 30 साल की उम्र तक पांच-छह फिल्में सफल हो जाएं तो ब्रेक लेकर लिख सकता हूं। अभी नहीं।

Friday, July 22, 2016

कल्‍पना से गढ़ी है कायनात - राकेश ओमप्रकाश मेहरा




- अजय ब्रह्मात्मज
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की अगली फिल्म ‘मिर्जिया’ है। इसमें उन्होंने दो नए चेहरों को लौंच किया है। हर्षवर्द्धन कपूर और सायमी खेर के रूप में। फिल्म की कहानी व गीत गुलजार ने लिखे हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा इससे पहले भी नए लोगों के संग काम करते रहे हैं। ‘रंग दे बसंती’ में मौका मिला था। शरमन थे, सिद्धार्थ थे, कुणाल था। सोहा थीं, एलिस थीं। जब ‘दिल्ली-6’ बनाई तो उस वक्त सोनम कपूर भी नई थीं। उनकी ‘सांवरिया’ रिलीज भी नहीं हुई थी, जब हमने काम शुरू कर दिया था। वे भी नवोदित थीं। ‘मिर्जिया’ इस मायने में अलग है कि यहां दोनों चेहरे नए हैं। हर्षवर्द्धन की खासियत उनकी खामोशी में हैं। अच्छी बात यह रही कि हम दोनों को एक-दूसरे को जानने के लिए 18 महीने का वक्त मिला। वह भी सेट पर जाने से पहले। हमने ढेर सारी वर्कशॉप और ट्रेनिंग की। उन्होंने घुड़सवारी भी सीखी। तीरंदाजी भी सीखी उन्होंने, क्योंकि मिर्जा के अवतार में वे दो-दो किरदार प्‍ले कर रहे हैं। लोककथाओं में मिर्जा का किरदार काल्‍पनिक दुनिया में है। मैंने एक प्लग वहां लगा दिया। दूसरी दुनिया आज के दौर की है। वह राजस्‍थान में है। वहां के जिप्सियों के बीच मिर्जा-साहिबा की कहानी मशहूर रही है। वह कहानी आज के परिप्रेक्ष्‍य में कैसी होगी, वह भी इस फिल्म में है। हम इसे पुरानी कथा नहीं कहेंगे। इसकी जगह मैं इसे टाइमलेस या इटरनल कहना चाहूंगा। वह इसलिए कि ऐसे किरदार आप की कल्पनाओं में होते हैं। उसका पास्ट है न प्रजेंट। जब मैंने पहली बार मिर्जा-साहिबा या हीर-रांझा व लैला-मजनू की कहानी सुनी थी तो उनका कोई रेफरेंस पॉइंट नहीं था। हम अपनी कल्पना के आधार पर उनकी कायनात गढ़ सकते हैं। हीरा-रांझा व लैला-मजनू की कहानी संगीत से आगे बढ़ी थी। ‘मिर्जिया’ के लिए जब मैं गुलजार भाई से मिला तो बातों ही बातों में बात निकली कि क्यों न इसे म्यूजिकल बनाया जाए। उनकी आंखों में एक चमक दिखी। उन्होंने कहा कि करते हैं। मजा आएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी बात है कि उनके साथ काम करने का मौका मिला। ‘मिर्जिया’ मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित होगा। गुलजार भाई से जुड़ने के बाद इसके मायने मेरे लिए बढ़ गए हैं।  
    ‘मिर्जिया’ का टीजर ट्रेलर मैड्रिड में लौंच करने की वजहें थीं। एक तो संयोग ऐसे बने कि इसका ट्रेलर उन्हीं दिनों बन कर तैयार हो रहा था, जब आईफा चल रहा था। वरना हमारी योजना इसे ‘सु्ल्तान’ के साथ लाने की थी, पर आईफा भी बउ़ा मंच था। इंडस्‍ट्री के सभी कद्दावरों को अपना काम दिखाने का मौका मिला। इससे भी बड़ी बात यह थी कि वहां पूरी दुनिया से मीडिया एकत्र हुई थी। ऊपर से स्‍पेन अपने आर्ट और कल्चर के लिए जाना जाता है। वहां के लोग उन्हें सहेज कर रखते हैं। लौंच पर सभी नए कलाकारों को शुभकामनाएं मिलीं। इससे बेहतर हम और क्या पेश कर पाते।        
पंजाब के प्रसिद्ध प्रेमी-युगल मिर्जा और साहिबा की प्रेम कहानी पर केंद्रित है। लिहाजा फिल्म की कथाभूमि पंजाब में है । राकेश कहते हैं, ‘ मेरी फिल्मों में पंजाब घूम कर आ ही जाता है। अब पता नहीं इसे इत्तफाक क्या कहूं या कुछ और। ‘रंग दे बसंती’ में भगत सिंह तो ‘भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह। यहां अब मिर्जा साहिब आ गए। लगता है कि पिछले जन्म में मैं शायद पंजाब की ही पैदाइश रहा हूं। रहा सवाल मेरा पंजाब, ‘उड़ता पंजाब’ और दूसरे लोगों के पंजाब की तो ‘मिर्जिया’ का पंजाब बिल्कुल अलग है। यहां का पंजाब टिपिकल पंजाब नहीं है। यहां उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब की बाते हैं। इसमें आवाजें भी देखेंगे तो दलेर मेंहदी, पाकिस्तानी लोक गायक साईं जहूर हैं। वे सब ऐसी आवाजें हैं, जो सूफी से भी ऊपर रूहानी सी फील रखते हैं। एक वैसा निचोड़ है। (हंसते हुए) हर्षवर्द्धन कपूर को फिल्म में इसलिए लिया, क्योंकि उनके पिता अनिल कपूर के साथ काम नहीं कर पाता हूं। उनको मेरा काम अच्छा लग जाए तो कर लूं। जबकि हर्ष के साथ काम कर रहा हूं। सोनम कपूर के साथ काम कर रहा हूं। उम्मीद है अब खुद अनिल कपूर साहब मुझे मौका देंगे।


Sunday, January 18, 2015

आज की प्रेमकहानी है ‘मिर्जिया’-राकेश ओमप्रकाश मेहरा


-अजय ब्रह्मात्मज
    राकेश ओमप्रकाश मेहरा इन दिनों जैसलमेर में हैं। जोधपुर और उदयपुर के बाद उन्होंने जैसलमेर को अपना ठिकाना बनाया है। वहां वे अपनी नई फिल्म ‘मिर्जिया’ की शूटिंग कर रहे हैं। यह फिल्म पंजाब के सुप्रसिद्ध प्रेमी युगल मिर्जा़-साहिबा के जीवन पर आधारित फिल्म है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा इसे किसी पीरियड फिल्म की तरह नहीं रच रहे हैं। उन्होंने लव लिजेंड की इस कहानी को आधार बनाया है। वे आज की प्रेमकहानी बना रहे हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा के लिए इसे गुलज़ार ने लिखा है। नाम भी ‘मिर्जिया’ रख दिया गया है। गुलज़ार साहब ने इसे म्यूजिकल टच दिया है। उन्होंने इस कहानी में अपने गीत भी पिरोए हैं,जिन्हें शंकर एहसान लॉय ने संगीत से सजाया है।
    कम लोगों को पता है कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘दिल्ली 6’ के बाद ही इसे बनाना चाहते थे,लेकिन तब ‘भाग मिल्खा भाग’ की कहानी मिली। उन्होंने पहले उसका निर्देशन किया। जोधपुर से जैसलमेर जाते समय हाईवे के सफर में राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह बातचीत की। उन्होंने बताया,‘अच्छा ही हुआ कि तीन सालों तक कहानी आहिस्ता-आहिस्ता पकती रही। गुलज़ार भाई इस पर काम करते रहे। यह पोएटिक तरीके से लिखी गई। मिर्जा़-साहिबा की कहानी मेरे जहन में रह गई थी। कॉलेज के दिनों में पढ़ी इस कहानी में कुछ खास बात थी। साहिबा ने मिर्जा़ के तीर तोड़ दिए थे। क्यों तोड़े? इसकी अलग-अलग व्याख्याएं है। गुलज़ार भाई ने अपने तरीके उसे लिखा है। मिर्जा़ का सूफियाना अंदाज था। बचपन से ही दोनों का रुहानी रिश्ता था,जो बड़े होने पर प्यार में बदला। दोनों के परिजन उनके प्रेम के खिलाफ थे। साहिबा बेहद खूबसूरत और भाइयों की लाडली थी। उसे मालूम था कि तीर तोडऩे पर मिर्जा़ अपनी और उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा। एक तरह से उसने अपने प्यार की कुर्बानी दे दी। ‘मिर्जिया’ में गुलज़ार भाई ने दोनों के प्रेम के रुहानी और सूफियाना भाव को आज के माहौल में रचा है। इन दिनों की फिल्मों में ऐसा ट्रीटमेंट नहीं मिलता।’
    राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह स्वीकार किया कि कंज्यूमर कल्चर में प्यार के मायने बदल गए हैं। अब प्रेम रुहानी नहीं रह गया है,लेकिन यही तो खोज है। क्या आज के दौर के प्रेमी भी मिर्जा़-साहिबा की तरह जज़्बाती हो सकते हैं? प्यार हो जाने के बाद क्या होता है? अतीत की सभी प्रेम कहानियां दुखांत रही हैं। उन्होंने समझाया, ‘जमाने के साथ हमारे आसपास की चीजें बदल जाती हैं। कम्युनिकेशन के तरीके बदल जाते हैं,लेकिन गौर करें तो प्रेम का अंदरूनी जज़्बा वैसे ही रहता है। भीतरी स्तर पर इमोशन की लहर वैसी ही रहती है। उसके लक्षण थोड़े अलग हो जाते हैं। अभी दिखता है कि सभी नाप-तौल के प्यार कर रहे हैं। जीवन साथी के चुनाव में कई भौतिक चीजें देखी जा रही हैं। शहरों में तो दोनों एक-दूसरे के आर्थिक पक्ष पर ध्यान देते हैं। हम अपने पार्टनर जेवर की तरह चुनते और खरीदते हैं। मैं थोड़ा ओल्ड फैशन लग सकता हूं,लेकिन मेरे लिए प्यार भौतिक सुरक्षा से बड़ी चीज है। हम प्रेम को जैसे जीते और देखते रहे हैं,उसे ही अपनी फिल्मों में ले आएंगे। इस फिल्म के प्रेमी किरदार आज के जमाने से जूझते हैं।’
    ' मिर्जिया’ का संगीत दो साल पहले तैयार हो गया था। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने जानकारी दी,‘इस फिल्म में गीत-संगीत शूटिंग स्क्रिप्ट का हिस्सा है,इसलिए हमलोगों ने संगीत तैयार कर लिया था। ‘भाग मिल्खा भाग’ के बैकग्राउंड के समय ही ‘मिजिऱ्या’ का संगीत तैयार कर लिया गया। गुलज़ार भाई ने स्क्रिप्ट के साथ ही गीत लिख कर दिए। पोएट्री इज द पार्ट ऑफ नैरेशन। उन्होंने इसे काव्यात्मक सुर दिया है। गायकी में नए पुराने टैलेंट का मिश्रण मिलेगा। नई-नई आवाजें सुनाई देंगी। लोकगीत और संगीत का मॉडर्न फ्यूजन असरदार हुआ है। ’
    सभी जाते हैं कि ‘मिर्जिया’ में मिर्जा़ का किरदार हर्षवर्द्धन कपूर निभा रहे हैं। उनके साथ सैयामी खेर हैं। कलकारों के चुनाव के बारे में पूछने पर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा,‘अनिल कपूर जी के घर पर मेरा आना-जाना रहा है। सोनम कपूर के साथ मैंने दो फिल्में की हैं। हर्ष से मेरी मुलाकातें रही हैं। मैंने उन्हें बहुत पहले चुन लिया था। वे खुद का तैयार नहीं पा रहे थे। उन्होंने मुझ से समय मांगा था। उनकी प्यारी आंखें हैं। सुंदर स्माइल है। दो साल पहले उनका मैसेज अया कि ‘आई एम फीलिंग रेडी’। मैंने उन्हें बुला कर ‘मिर्जिया’ की कहानी सुनाई। उन्होंने हां कहा। उसके बाद डेढ़ सालों तक हम रीडिंग और रिहर्सल किए। दिल्ली के दिलीप शंकर ने कोचिंग की। बाहर से टीना भी सिखाने के लिए आईं। हर्ष को घुडुसवारी भी सीखनी पड़ी। जब वे मंझ गए तो फिर हमलोग फ्लोर पर गए।  मेरे हाथों में कच्ची मिट्टी है। अब देखें कि उन्हें क्या रूप-रंग दे पाता हूं? मैंने अनुभवी अभिनेताओं और तकनीशियनों के साथ काम किया है। इनसे सीखा ही नए कलाकारों का सिखा रहा हूं। दरअसल,ऐसे ही चीजें आगे बढ़ती रहती हैं।’
    ‘मिर्जिया’ की टेक्नीकल टीम में कैमरामैन पावेल डैलेस पोलैंड से आए हैं। उनकी पूरी टीम वहीं से आई है। स्टंट और एक्शन के लिए आस्ट्रेलिया से डैनी आए हैं। उन्होंने टॉम क्रूज के साथ ‘द लास्ट समुराई’ की थी। फिल्म की जरूरत के मुताबिक नैचुरल रोशनी में शूटिंग की जा रही है। प्रकृति की लाइटिंग लाजवाब होती है। हां,हमें उसके साथ एडजस्ट करना पड़ता है। इस शेड्यूल के बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा लद्दाख और मुंबई की शूटिंग के साथ फिल्म पूरी करेंगे।

Friday, July 12, 2013

फिल्‍म समीक्षा : भाग मिल्‍खा भाग

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
नेहरु युग का युवक 
दर्शकों को लुभाने और थिएटर में लाने का दबाव इतना बढ़ गया है कि अधिकांश फिल्म अपनी फिल्म से अधिक उसके लुक, पोस्टर और प्रोमो पर ध्यान देने लगी हैं। इस ध्यान में निहित वह झांसा होता है, जो ओपनिंग और वीकएंड कलेक्शन केलिए दर्शकों को थिएटरों में खींचता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा पर भी दबाव रहा होगा,लेकिन अपनी पीढ़ी के एक ईमानदार फिल्म मेकर के तौर पर उन्होंने लुक से लेकर फिल्म तक ईमानदार सादगी बरती है।
स्पष्ट है कि यह फिल्म मिल्खा सिंह की आत्मकथा या जीवनी नहीं है। यह उस जोश और संकल्प की कहानी है, जो कड़ी मेहनत, इच्छा शक्ति और समर्पण से पूर्ण होती है। 'भाग मिल्खा भाग' प्रेरक फिल्म है। इसे सभी उम्र के दर्शक देखें और अपने अंदर के मिल्खा को जगाएं। मिल्खा सिंह को हम फ्लाइंग सिख के नाम से भी जानते हैं। उन्हें यह नाम पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने दिया था। किस्सा यह है कि बंटवारे के बाद के कलुष को धोने के साथ प्रेम और सौहा‌र्द्र बढ़ाने के उद्देश्य से जवाहरलाल नेहरू और अयूब खान ने दोनों देशों के बीच खेल स्पर्धा का आयोजन किया था। अतीत के दंश की वजह से मिल्खा सिंह ने पहले पाकिस्तान जाने से मना कर दिया था, लेकिन नेहरु के आग्रह पर वे पाकिस्तान गए। इस यात्रा में ही उनके मन का संताप कम हुआ। बचपन के दोस्त का यह कथन की इंसान नहीं, हालात बुरे होते हैं ़ ़ ़
मिल्खा के मन के विकार को धोता है। फिल्म की शुरुआत में ही हम देखते हैं कि अतीत के इसी दंश के कारण मिल्खा सिंह रोम ओलंपिक में पदक नहीं जीत पाए। हो सकता है कि यह मिल्खा सिंह के जहन में आया बाद का खयाल हो या राकेश ओमप्रकाश मेहरा और प्रसून जोशी उनकी हार को भी संगत बनाने की कोशिश कर रहे हों। बहरहाल, हम मिल्खा सिंह के जोश और जज्बे से प्रेरित होते हैं। गौर करें तो मिल्खा सिंह आजादी के बाद के उन युवकों के प्रतिनिधि हैं, जो नेहरू युग के सपनों के साथ अलक्षित लक्ष्य की तरफ बढ़ते हैं।
फिल्म के अनुसार पहले बीरो, फिर दूध और अंडे, उसके बाद इंडियन टीम के ब्लेजर के लिए मिल्खा सिंह अपनी जिंदगी के एक-एक पड़ाव को पार करते हैं। इस यात्रा में बहन इसरी ही हमेशा मौजूद है। मिल्खा सिंह की बहन इसरी का भावोद्रेक कई दृश्यों में आंखों को नम करता है। इसरी की बेचारगी और खुशी से हमारा भी गला रुंधता है। मिल्खा सिंह के फौजी जीवन में आए दोनों कोच और वह मु‌र्च्छला उस्ताद ़ ़ ़प्रकाशराज ने इस भूमिका में अभिनय के उस्ताद नजर आते हैं। दोनों कोच का मिल्खा के प्रति अद्भुत और नि:स्वार्थ समर्पण अनुकरणीय है। खिलाड़ी के पास सोच होती है, सोच ही उसे तपने और ढलने का सांचा देता है।
प्रसून जोशी ने बहुत खूबसूरती और प्रभावशाली तरीके से देश के बंटवारे को फिल्म में गूंथा है। धावक मिल्खा सिंह की दौड़ की जीत-हार के साथ-साथ जिंदगी भी चलती रहती है। प्रसून जोशी ने फ्लैशबैक और फिर उसमें फ्लैशबैक के शिल्प से कहानी को रोचक आयाम दिए हैं। मिल्खा के चरित्र में हमारी रुचि बनी रहती है। हम उसकी जीत की कामना करते हैं, लेकिन बाकी चीजें भी जानना चाहते हैं। लेखक-निर्देशक ने इन चाहतों को छोटे-छोटे दृश्यों, संबंधों और प्रतिक्रियाओं से पूरा किया है।
इस फिल्म के सहयोगी कलाकारों का जिक्र पहले करें। मिल्खा के जिंदगी के जरूरी किरदार बहन, दोनों कोच, बीरो और अन्य दोस्त आदि फिल्म के लिए भी जरूरी बन गए हैं। इन किरदारों को दिव्या दत्ता, पवन मल्होत्रा, योगीराज सिंह, प्रकाश राज आदि ने मू‌र्त्त कर दिया है। खास कर दिव्या दत्ता और पवन मल्होत्रा की संलग्नता दूरगामी प्रभाव डालती है। सचमुच दोनों अभिनेता किसी भी उम्र, मिजाज और समुदाय के चरित्र को जिंदगी दे देते हैं।
फरहान अख्तर ने इस फिल्म से अपनी पीढ़ी के कलाकारों के सामने नया मानदंड स्थापित कर दिया है। वास्तविक या काल्पनिक किरदारों के लिए कलाकार की मेहनत और समर्पण का यह नया बेंच मार्क है। फरहान अख्तर ने मिल्खा के बाह्य रूप के साथ आंतरिक कसावट को भी आत्मसात किया है। वे शुरु से आखिर तकमिल्खा सिंह बने रहे हैं। बाल मिल्खा बने कलाकार ने उनके लिए उचित जमीन तैयार की है।
'भाग मिल्खा भाग' मुख्य रूप से ट्रैक, स्टेडियम, दौड़ और खेल संबंधी अन्य दृश्यों की ही रचती है। कैमरामैन बिनोद प्रधान ने दृश्यों के कोण चुनते और उनके छायांकन में सृजनात्मक कल्पना का परिचय दिये है। हम विस्मित होते हैं कि कैमरे कैसे और कहां-कहां रखे जा सकते हैं। गीत-संगीत फिल्म के थीम के अनुरूप है। कुछ गीत यों सुनने में साधारण लग रहे थे, लेकिन दृश्यों के साथ आने पर वे उपयुक्त भाव जगाते हैं। मिल्खा के द्वंद्व और उत्साह को भी प्रसून जोशी ने प्रेरक शब्द दिए हैं।
'भाग मिल्खा भाग' नेहरू युग के एक महत्वाकांक्षी युवक के सामने सपने की दास्तान है, जिसे राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बखूबी उस दर्शक के परिवेश और समाज के साथ प्रस्तुत किया है। यह फिल्म किशोर और युवा दर्शकों को अवश्य देखनी-दिखानी चाहिए।
अवधि - 187
**** चार स्टार

Tuesday, April 12, 2011

खेल है विजन और वजन का-राकेश ओमप्रकाश मेहरा

हमलोगों ने डेढ़-दो साल पहले सोचा था कि अपने प्रोडक्शन में दूसरे डायरेक्टरों की फिल्मों का निर्माण करेंगे। मेरे पास कई युवा निर्देशक आते रहते थे। मुझे लगता था कि उन्हें सही प्लेटफार्म मिलना चाहिए। उसी दिशा में पहली कोशिश है 3 थे भाई।

कैसी फिल्म है यह?

यह तीन लड़ाके और लूजर भाइयों की कहानी है। हमने हल्के-फुल्के अंदाज में इसे पेश किया है। ओम पुरी, श्रेयस तलपडे और दीपक डोबरियल ने बहुत ही सुंदर काम किया है। इस फिल्म में मुझे अशोक मेहता, गुलजार, सुखविंदर सिंह और रंजीत बारोट के साथ काम करने में मजा आया। इंटरेस्टिंग फिल्म है।

इन दिनों ज्यादातर बड़े निर्माता-निर्देशक अपने प्रोडक्शन में छोटी फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं। आपका प्रयास कितना अलग है?

हम सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्में नहीं प्रोड्यूस कर रहे हैं। फिल्म को सिर्फ बिजनेस के तौर पर मैंने कभी नहीं देखा है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ छोटी फिल्में ही दूसरे निर्देशकों को मिलेंगी। बजट तो फिल्म के कंटेंट के आधार पर डिसाइड होगा। कल को हो सकता है कि बड़े बजट की एक फिल्म कोई और डायरेक्ट कर रहा हो।

किस आधार पर निर्देशकों को चुन रहे हैं या भविष्य में चुनेंगे?

कहानी पहली शर्त है। जो कहानी हमारे मन को भा गयी या लगा कि इसमें कोई इमोशनल तत्व है, उस पर हम फिल्म बनाएंगे। हम एक्टर और बजट के बारे में कभी नहीं पूछते। वह तो हमारा काम है। डायरेक्टर का विजन और कहानी का वजन समझ में आ जाए तो बाकी चीजें हम तय कर लेते हैं। अपनी फिल्मों के लिए जिन प्रक्रियाओं से गुजरता हूं, उसी से दूसरों के बारे में फैसले लेता हूं।

इन दिनों छोटी फिल्मों पर बड़ा जोर है। माना जा रहा है कि दर्शक ऐसी फिल्मों को हाथोंहाथ ले रहे हैं?

सीमित बजट में प्रयोग की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। फिल्मों को छोटी या बड़ी कैटेगरी में न देखें। हमें देखना चाहिए कि निर्देशक अपनी बात कह पाया कि नहीं? आइडिया छोटा या बड़ा होता है। जरूरी नहीं है कि सीमित बजट की फिल्म चल ही जाए। अगर ऐसा होने लगे तो हर कोई केवल छोटी फिल्में ही बनाने लगेगा।

निर्माता के तौर पर आपकी भूमिका कितनी भिन्न हो जाती है?

मैं तो शुरू से निर्माता रहा हूं। फर्क यही है कि पहले केवल अपनी फिल्म प्रोड्यूस कर रहा था और अब दूसरों के विजन को सामने ला रहा हूं। मैं एक्सपेरिमेंटल नेचर का हूं। अपना नेचर मैं बदल नहीं सकता। मेरी कंपनी का प्रारूप शुद्ध बिजनेस पर आधारित नहीं है। मैं यह देखता हूं कि क्या मैं खुद यह फिल्म निर्देशित करता? समय के साथ फिल्मों के विषय बदलते जाते हैं।

निर्माता बनने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

मेरे पास ढेर सारी कहानियां आती हैं। उनमें से कई अच्छी लगती हैं। मेरी अपनी सीमाएं हैं। मैं सारी कहानियों पर फिल्म नहीं बना सकता, इसलिए सोचा कि क्यों न किसी और के विजन को शेयर किया जाए। किसी अच्छी कहानी से जुड़ना बुरी बात नहीं है। कई बार मेरी टीम के सदस्यों को कोई कहानी अच्छी लग सकती है, जिसमें मुझे अपने लिए बड़ा चैलेंज न दिखे तो मैं उसे दूसरे डायरेक्टर को सौंप सकता हूं। कुल मिलाकर यही कोशिश है कि छोटी-बड़ी हर तरह की फिल्मों का मैं हिस्सा बनूं। यह मेरा क्रिएटिव लोभ है। कंपनी को चलाते रहने के लिए भी कई फिल्मों के निर्माण की जरूरत थी।

छोटे शहरों के उत्सुक युवा लेखक-निर्देशक आप को कैसे अप्रोच करें?

छोटे शहरों से कहानियां आनी चाहिए। मैं तकनीकी सपोर्ट के लिए तैयार हूं। अगर कोई मेरे पास अच्छी स्क्रिप्ट लेकर आता है तो मेरी टीम उसे ग्रीन लाइट देने के लिए तैयार है। संपर्क करने के लिए मेरे वेबसाइट पर जा सकते हैं या सीधे मिल सकते हैं। मेरी कोशिश है कि नए लोग आएं और नए काम लेकर सामने आएं। नई प्रतिभाएं बहुत अच्छा सोच रही हैं। उनके साथ काम कर मैं भी जवान हो रहा हूं।

क्या आप को नहीं लगता कि हिंदी फिल्मों का निर्माण मुंबई में सीमित नहीं रहना चाहिए। दूसरे शहरों में भी यह कोशिश आरंभ होनी चाहिए?

बिल्कुल ़ ़ ़ फिल्म निर्माण के लिए अब जरूरी नहीं है कि सभी मुंबई आएं। आप सही पूछ रहे हैं। मुंबई में फिल्मों के निर्माण को सीमित कर हमने नुकसान ही किया है। यहां आते ही हर क्रिएटिव व्यक्ति एक कुचक्र में फंस जाता है। मुझे भी लगता है इस दिशा में प्रयास होने चाहिए। मुंबई बहुत ही महंगा और व्यस्त शहर हो गया है। यह फिल्म निर्माण के लिए असुविधाजनक हो गया है। दूसरे शहरों में प्रोडक्शन हो तो लोकल प्रतिभाओं को वहीं मौके मिल सकते हैं!

Saturday, February 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दिल्ली ६


हम सब के अन्दर है काला बन्दर

-अजय ब्रह्मात्मज
ममदू, जलेबी, बाबा बंदरमार, गोबर, हाजी सुलेमान, इंस्पेक्टर रणविजय, पागल फकीर, कुमार, राजेश, रज्जो और कुमार आदि 'दिल्ली ६' के जीवंत और सक्रिय किरदार हैं। उनकी भागीदारी से रोशन मेहरा (अभिषेक बच्चन) और बिट्टू (सोनम कपूर) की अनोखी प्रेम कहानी परवान चढ़ती है। इस प्रेमकहानी के सामाजिक और सामयिक संदर्भ हैं। रोशन और बिट्टू हिंदी फिल्मों के आम प्रेमी नही हैं। उनके प्रेम में नकली आकुलता नहीं है। परिस्थितियां दोनों को करीब लाती हैं, जहां दोनों के बीच प्यार पनपता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बिल्कुल नयी शैली और मुहावरे में यह प्रेमकहानी रची है।
न्यूयार्क में दादी (वहीदा रहमान) की बीमारी के बाद डाक्टर उनके बेटे राजन मेहरा और बहू फातिमा को सलाह देता है कि वे दादी को खुश रखने की कोशिश करें, क्योंकि अब उनके दिन गिनती के बचे हैं। दादी इच्छा जाहिर करती हैं कि वह दिल्ली लौट जाएंगी। वह दिल्ली में ही मरना चाहती हैं। बेटा उनके इस फैसले पर नाराजगी जाहिर करता है तो पोता रोशन उन्हें दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी लेता है। भारत और दिल्ली-6 यानी चांदनी चौक पहुंचाने पर रोशन की आंखें फटी रह जाती हैं। दादी के प्रति पड़ोसियों और गली के लोगों के प्रेम, आदर और सेवा भाव को देखकर वह दंग रह जाता है। यहीं उसकी मुलाकात यों कहें कि झड़प बिट्टू (सोनम कपूर) से होती है। बिट्टू मध्यवर्गीय परिवार की बेटी है। वह पिता और परिवार को उचित सम्मान देती है, लेकिन उसके अपने भी सपने हैं। वह कुछ करना चाहती है। अपनी पहचान बनाना चाहती है। एक सामान्य सी कहानी चल रही होती है, जिसमें हम रिश्तों की गर्माहट और चांदनी चौक की गर्मजोशी महसूस करते हैं। शहर में खबर फैली हुई है कि एक काला बंदर रात को उत्पात मचाता है। उस काले बंदर को किसी ने नहीं देखा है, लेकिन रात के अंधेरे में कुछ घटनाएं घटती रहती हैं। न्यूज चैनल ब्रेकिंग न्यूज में काले बंदर से संबंधित कयास लगाते रहते हैं। स्थितियां बदलती हैं और एक खास प्रसंग के बाद कहानी नाटकीय मोड़ लेती हैं। कुछ दिनों पहले तक जिस चांदनी चौक में हिंदू-मुसलमान में फर्क करना मुश्किल था। वहां दंगे शुरू हो जाते हैं और दोनों समुदायों की आक्रामकता से हिंसा भडक़ती है। सामाजिक और धार्मिक तनाव के इस मौहाल के बीच बिट्टू अपने सपनों के लिए दुस्साहसिक कदम उठाती है। रोशन उसे बचाने की कोशिश में दोनों समुदायों का कॉमन शिकार बन जाता है। बाद में भेद खुलता है तो पता चला हे कि काले बंदर का अस्तित्व बाहर नहीं है। वह तो हम सभी के अंदर कोने में बैठा रहता है, जिसे स्वार्थी तत्व अपने फायदे के लिए जगा और उकसा देते हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपनी पिछली फिल्म 'रंग दे बसंती' से कई कदम आगे आते हैं। वे सांप्रदायिकता के सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे को नए नजरिए से पेश करते हैं। 'दिल्ली ६' सामयिक और महत्वपूर्ण फिल्म है। मजेदार तथ्य यह है कि यह मनोरंजन और मधुर संगीत की धुनों से सजा है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की कहानी को प्रसंगों और घटनाओं से जोड़ते हुए चांदनी चौक का सुंदर कोलाज तैयार किया है, जिसमें तमाम किरदार अपनी धडक़नों के साथ मौजूद हैं। 'दिल्ली ६' चांदनी चौक का सजीव चित्रण है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक फिल्मांकन की पारंपरिक शैली से अलग जाकर सफल प्रयोग किए हैं। उन्हें कैमरामैन विनोद प्रधान का सम्यक सहयोग मिला है। ए आर रहमान का संगीत फिल्म के भाव का प्रभाव बढ़ाता है। उन्होंने गीतों को धुनों से तराशा है।
कलाकारों में सोनम कपूर और अभिषेक बच्चन सहज एवं स्वाभाविक हैं। निर्देशक ने उन्हें नाटकीय नहीं होने दिया है। निर्देशक का अंकुश फिल्म के नायक-नायिका को बहकने नहीं देता है। फिल्म की खूबसूरती और ताकत सहयोगी चरित्रों से बढ़ी है। इन छोटे किरदारों को समर्थ कलाकारों ने निभाया है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है और जरूरत से एक रत्ती ज्यादा या कम योगदान नहीं किया है। फिल्म के अंत में कसावट थोड़ी कम हुई है। कुछ दृश्य फिल्म के यथार्थ से मेल नहीं खाते। 'दिल्ली ६' हिंदी सिनेमा के बदलती छवि पेश करती है। युवा निर्देशक परंपरा को आत्मसात कर हिंदी फिल्मों की विशेषताओं को अपना कर सार्थक प्रयोग कर रहे हैं। 'दिल्ली ६' इसी दिशा में नयी पहल है।
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