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Showing posts from January, 2016

फिल्‍म समीक्षा : साला खड़ूस

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खेल और ख्‍वाब का मैलोड्रामा -अजय ब्रह्मात्‍मज हर विधा में कुछ फिल्‍में प्रस्‍थान बिंदु होती हैं। खेल की फिल्‍मों के संदर्भ में हर नई फिल्‍म के समय हमें प्रकाश झा की ‘हिप हिप हुर्रे’ और शिमित अमीन की ‘चक दे इंडिया’ की याद आती है। हम तुलना करने लगते हैं। सुधा कोंगरे की फिल्‍म ‘साला खड़ूस’ के साथ भी ऐसा होना स्‍वाभाविक है। गौर करें तो यह खेल की अलग दुनिया है। सुधा ने बाक्सिंग की पृष्‍ठभूमि में कोच मदी(आर माधवन) और बॉक्‍सर(रितिका सिंह) की कहानी ली है। कहानी के मोड़ और उतार-चढ़ाव में दूसरी फिल्‍मों से समानताएं दिख सकती हैं,लेकिन भावनाओं की जमीन और परफारमेंस की तीव्रता भिन्‍न और सराहनीय है। आदि के साथ देव(जाकिर हुसैन) ने धोखा किया है। चैंपियन बॉक्‍सर होने के बावजूद आदि को सही मौके नहीं मिले। कोच बनने के बाद भी देव उसे सताने और तंग करने से बाज नहीं आता। देव की खुन्‍नस और आदि की ईमानदारी ने ही उसे खड़ूस बना दिया है। अभी कर्तव्‍यनिष्‍ठ और ईमानदार व्‍यक्ति ही घर,समाज और दफ्तर में खड़ूस माना जाता है। देव बदले की भावना से आदि का ट्रांसफर चेन्‍नई करवा देता है। चेन्‍नई में आदि की भिड़ंत मदी से होती है…

फिल्‍म समीक्षा : मस्‍तीजादे

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बड़े पर्दे पर लतीफेबाजी -अजय ब्रह्मात्‍मज
मिलाप झावेरी की ‘मस्‍तीजादे’ एडल्‍ट कामेडी है। हिंदी फिल्‍मों में एडल्‍ट कामेडी का सीधा मतलब सेक्‍स और असंगत यौनाचार है। कभी सी ग्रेड समझी और मानी जाने वाली ये फिल्‍में इस सदी में मुख्‍यधारा की एक धारा बन चुकी हैं। इन फिल्‍मों को लेकर नैतिकतावादी अप्रोच यह हो सकता है कि हम इन्‍हें सिरे से खारिज कर दें और विमर्श न करें,लेकिन यह सच्‍चाई है कि सेक्‍स के भूखे देश में फिल्‍म निर्माता दशकों से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तरीके से इसका इस्‍तेमाल करते रहे हैं। इसके दर्शक बन रहे हैं। पहले कहा जाता था कि फ्रंट स्‍टाल के चवन्‍नी छाप दर्शक ही ऐसी फिल्‍में पसंद करते हैं। अब ऐसी फिल्‍में मल्‍टीप्‍लेक्‍श में दिख रही हैं। उनके अच्‍छे-खासे दर्शक हैं। और इस बार सनी लियोन के एक विवादित टीवी इंटरव्‍यू को जिस तरीके से परिप्रेक्ष्‍य बदल कर पेश किया गया,उससे छवि,संदर्भ और प्रासंगिकता का घालमेल हो गया। बहरहाल,’मस्‍तीजादे’ ह्वाट्स ऐप के घिसे-पिटे लतीफों को सीन बना कर पेश करती है। इसमें सेक्‍स एडिक्‍ट और समलैंगिक किरदार हंसी और कामेडी करने के लिए रखे गए हैं। एडल्‍ट कामेडी में …

दरअसल : मोबाइल पर मूवी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज

    स्‍मार्ट फोन के आने और प्रचलन से हिंदी सिनेमा का भारी नुकसान हुआ है। अभी लोग फोन में डाटा कार्ड लगाते हैं। उस डाटा कार्ड में पसंद की फिल्‍में लोड कर ली जाती हैं। लाेग आराम से फिल्‍में देखते हैं। पिछले दिनों दीपिका पादुकोण ने अपनी उड़ान में किसी सहयात्री को मोबाइल पर ‘बाजीराव मस्‍तानी’ देखते हुए देखा। उन्‍होंने आपत्‍त‍ि भी की। यह आम बात है। मुंबई के लोकल ट्रेनों और बसों में आए दिन यात्री फिल्‍म रिलीज के दिन ही अपने मोबाइल पर फिल्‍में देखते नजर आते हैं।
मोबाइल फोन के स्‍क्रीन दो इंच से लेकर आठ इंच तक के होते हें। साधारण स्‍मार्ट फोन भी अब ऑडियो-वीडियो के लिए उपयुक्‍त हो गए हैं। मैंने तो देखा है कि सामान्‍य मोबाइलधारी अपने छोटे मोबाइल के छोटे स्‍क्रीन पर भी फिल्‍में देखते रहते हैं। उन्‍हें कोई परेशानी नहीं होती। फिल्‍म पत्रकारिता से जुड़े मेरे साथी नई फिल्‍मों के ट्रेलर और लुक पहली बार अपने स्‍मार्ट फोन पर ही देखते हैं। बेसिक जानकारी मिल जाने पर घर या दफ्तर पहुंच कर वे तसल्‍ली से पुन: देखते हैं। तात्‍पर्य यह है कि मोबाइल का स्‍क्रीन अब इस योग्‍य हो चुका है कि वह कंटे…

गीत-संगीत में पिरोए हैं कश्‍मीरी अहसास - स्‍वानंद किरकिरे

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-अजय ब्रह्मात्‍मज     पशमीना घागों से कोई ख्‍वाब बुने तो उसके अहसास की नजुकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कच्‍चे और अनगढ़ मोहब्‍बत के खयालों की शब्‍दों में कसीदाकारी में माहिर स्‍वानंद किरकिरे ‘फितूर’ के गीतों से यह विश्‍वास जाहिर होता है कि सुदर और कामेल भवनाओं की खूबसूरत बयानी के लिए घिसे-पिटे लब्‍जों की जरूरत नहीं होती। स्‍वानंद किरकिरे ने अमित त्रिवेदी के साथ मिल कर ‘फितूर’ का गीत-संगीत रख है। उनकी ‘साला खड़ूस’ भी आ रही है। शब्‍दों के शिल्‍पकार स्‍वानंद किरकिरे से हुई बातचीत के अंश...        स्‍वानंद किरकिरे बताते हैं,’ अभिषेक कपूर और अमित त्रिवेदी के साथ मैाने ‘काय पो छे’ की थी। उस फिल्‍म के गीत-संगीत को सभी ने पसंद किया था। ‘फितूर’ में एक बार फिर हम तीनों साथ आए हैं। ’फितूर’ का मिजाज बड़ा रोमानी है। ऊपर से काश्‍मीर की पृष्‍ठभूमि की प्रेमकह कहानी है। उसका रंग दिखाई देगा। उसमें एक रुहानी और सूफियाना आलम है। ‘फितूर’ इंटेंस लव स्‍टोरी है,इसलिए बोलों में गहराई रखी गई है। गानों के रंग में भी फिल्‍म की थीम का असर दिखेगा। मैंने शब्‍दों को बुनते समय कश्‍मीरी अहसास के लिए वहां के लब्‍ज डाले …

फिल्‍म समीक्षा : जुगनी

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प्रेमसंगीत -अजय ब्रह्मात्‍मज शेफाली भूषण की फिल्‍म ‘जुगनी’ में बीबी सरूप को देखते हुए लखनऊ की जरीना बेगम की याद आ गई। कुछ महीनों पहले हुई मुलाकात में उनकी म्‍यूजिकल तरक्‍की और खस्‍ताहाल से एक साथ वाकिफ हुआ था। फिल्‍म में विभावरी के लौटते समय वह जिस कातर भाव से पैसे मांगती है,वह द्रवित और उद्वेलित करता है। पारंपरिक संगीत के धनी साधकों के प्रति समाज के तौर पर हमारा रवैया बहुत ही निराशाजनक है। मां के हाल से वाकिफ मस्‍ताना ने जुगनी के साथ किडनी का तुक मिलाना सीख लिया है। आजीविका के लिए बदलते मिजाज के श्रोताओं से तालमेल बिठाना जरूरी है। फिर भी मस्‍ताना का मन ठेठ लोकगीतों में लगता है। मौका मिलते ही वह अपनी गायकी और धुनों से विभावरी को मोहित करता है। मस्‍ताना की निश्‍छलता और जीवन जीने की उत्‍कट लालसा से भी विभावरी सम्‍मोहित होती है। ’जुगनी’ के एक कहानी तो यह है कि विभावरी मुंबई में फिल्‍म संगीतकार बनना चाहती है। उसे एक फिल्‍म मिली है,जिसके लिए मूल और देसी संगीत की तलाश में वह पंजाब के गांव जाती है। वहीं बीबी सरूप से मिलने की कोशिश में उसकी मुलाकात पहले उनके बेटे मस्‍ताना से हो जाती है। यह ऊपरी …

फिल्‍म समीक्षा : क्‍या कूल हैं हम 3

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फूहड़ता की अति -अजय ब्रह्मात्‍मज कुछ फिल्‍में मस्‍ती और एडल्‍ट कामेडी के नाम पर जब संवेदनाएं कुंद करती हैं तो दर्शक के मुह से निकलता है- -क्‍या फूल हैं हम? फूल यहां अंग्रेजी का शब्‍द है,जिसका अर्थ मूर्ख ही होता है। उमेश घडगे निर्देशित ‘क्‍या कूल हैं हम’‘एडल्‍ट कामेडी’ के संदर्भ में भी निराश करती है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के परिचित नाम मुश्‍ताक शेख और मिलाप झवेरी इसके लेखन से जुड़े हैं। अभी अगले हफ्ते फिर से मिलाप झावेरी एक और एडल्‍ट कामेडी लेकर आएंगे,जिसका लेखन के साथ निर्देशन भी उन्‍होंने किया है। ‘क्‍या कूल हैं हम’ की तीसरी कड़ी के रूप में आई इस फिल्‍म में इस बार रितेश देशमुख की जगह आफताब शिवदासानी आ गए हैं। फिल्‍म की फूहड़ता बढ़ाने में उनका पूरा सहयोग रहा है। कन्‍हैया और रॉकी लूजर किस्‍म के युवक हैं। जिंदगी में असफल रहे दोनों दोस्‍तों को उनके तीसरे दोस्‍त मिकी से थाईलैंड आने का ऑफर मिलता है। मिकी वहां पॉपुलर हिंदी फिल्‍मों के सीन लेकर सेक्‍स स्‍पूफ तैयार करते हैं। पोर्न फिल्‍मों के दर्शक एक वीडियो से वाकिफ होंगे। मिकी का तर्क है कि वह ऐसी फिल्‍मों से हुई कमाई का उपयोग सोमालिया के भू…

फिल्‍म समीक्षा : एयरलिफ्ट

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मानवीय संवेदना से भरपूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज हिंदी फिल्‍में आम तौर फंतासी प्रेम कहानियां ही दिखाती और सुनातीं हैं। कभी समाज और देश की तरफ मुड़ती हैं तो अत्‍याचार,अन्‍याय और विसंगतियों में उलझ जाती हैं। सच्‍ची घटनाओं पर जोशपूर्ण फिल्‍मों की कमी रही है। राजा कृष्‍ण मेनन की ‘एयरलिफ्ट’ इस संदर्भ में साहसिक और सार्थक प्रयास है। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों को थोड़ी कमियां दिख सकती हैं,पर यह फिल्‍म से अधिक उनकी सोच और समझ की कमी है। फिल्‍में मनोरंजन का माध्‍यम हैं और मनोरंजन के कई प्रकार होते हैं। ‘एयरलिफ्ट’ जैसी फिल्‍में वास्‍तविक होने के साथ मानवीय संवेदना और भावनाओं की सुंदर अभिव्‍यक्ति हैं। ’एयरलिफ्ट’ 1990 में ईराक-कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 भारतीयों की असुरक्षा और निकासी की सच्‍ची कहानी है। (संक्षेप में 1990 मेंअमेरिकी कर्ज में डूबे ईराक के सद्दाम हुसैन चाहते थे कि कुवैत तेल उत्‍पादन कम करे। उससे तेल की कीमत बढ़ने पर ईराक ज्‍यादा लाभ कमा सके। ऐसा न होने पर उनकी सेना ने कुवैत पर आक्रमण किया और लूटपाट के साथ जानमान को भारी नुकसान पहुंचाया। कुवैत में काम कर रहे 1,70,000 भारतीय अचानक बेघर और बिन पै…

दरअसल : पुरस्‍कारों का है मौसम

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-अजय ब्रह्मात्‍मज हिंदी फिल्‍मों के पुरस्‍कारों का मौसम चल रहा है। समारोहों का आयोजन हो रहा है। कुछ हो चुके और कुछ अगले महीनों में होंगे। यह सिलसिला मई-जून तक चलता है। उसके बाद राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों की घोषणा होती है। राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार के साथ ग्‍लैमर और चमक-दमक नहीं जुड़ा हुआ है,इसलिए मीडिया कवरेज में उस पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया जाता। बाकी पुरस्‍कारों में परफारमेंस,नाच-गाने और हंसी-मजाक से मनोरंजक माहौल बना दिया जाता है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के अनेक सितारों की मौजूदगी पूरे माहौल में चकाचौाध लगाती है। इन समारोहों और आयोजनों को स्‍पांसर मिलते हैं। इसकी वजह से ये आयोजन बड़े पैमाने पर भव्‍य तरीके से डिजायन किए जाते हैं। इन अवार्ड समारोहों के टीवी पार्टनर होते हैं। वे कुछ समय के बाद इसका टीवी प्रसारण करते हैं और विज्ञापनों से पैसे कमाते हैं। दरअसल,स्‍पांसर और विज्ञापनों से मिल रहे पैसों पर ही आयोजकों की नजर रहती है। सभी अपने अवार्ड समारोह की अच्‍छी पैकेजिंग करते हैं। इस पैकेजिंग के लिए पुरस्‍कार और विजेता तय किए जाते हैं। कभी पुरस्‍कार समारोहों के टीवी प्रसारण देखें तो आयोजकों की मंशा …

हर जिंदगी में है प्रेम का फितूर - अभिेषेक कपूर

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फितूर की कहानी चार्ल्‍स डिकेंस के उपन्यास ग्रेट एक्सपेक्टेशंस पर आधारित है। सोचें कि यह उपन्यास क्लासिक क्यों है? क्‍योंकि यह मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है। दुनिया में हर आदमी इमोशन के साथ जुड़ जाता है। जब दिल टूटता है तो आदमी अपना संतुलन खो बैठता है। अलग संसार में चला जाता है। पागल हो जाता है। मुझे लगा कि इस कहानी से दर्शक जुड़ जाएंगे। हम ने उपन्‍यास से सार लेकर उसे अपनी दुनिया में अपने तरीके से बनाया है। इस फिल्‍म में व्‍यक्तियों और हालात से बदलते उनके रिश्‍तों की कहानी है।
यह फिल्म केवल प्रेम कहानी नहीं है। यह कहानी प्यार के बारे में है। प्यार और दिल टूटने की भावनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कोई भी इंसान ऐसे मुकामों से गुजरे है तो थोड़ा हिल जाए। आप किसी से प्यार करते हैं तो अपने अंदर किसी मासूम कोने में उसे जगह देते हो। वहां पर वह आकर आपको अंदर से तहस-नहस करने लगता है। वहां पर आपको बचाने के लिए कोई नहीं होता है। वह प्यार आपको इस कदर तोड़ देता है कि आपका खुद पर कंट्रोल नहीं रह जाता। यह दो सौ साल पहले हुआ और दो सौ साल बाद भी होगा । केवलसाल बदलते हैं। मानवीय आचरण नहीं बदलते हैं।
फितूर में…

मिसाल है मंटो की जिंदगी - नंदिता दास

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अभिनेत्री नंदिता दास ने 2008 में फिराक का निर्देशन किया था। इस साल वह सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित एक बॉयोपिक फिल्म की तैयारी में हैं। उनकी यह फिल्म मंटो के जीवन के उथल-पुथल से भरे उन सात सालों पर केंद्रित है,जब वे भारत से पाकिस्तान गए थे। नंदिता फिलहाल रिसर्च कर रही हैं। वह इस सिलसिले में पाकिस्तान गई थीं और आगे भी जाएंगी।

 - मंटो के सात साल का समय कब से कब तक का है?
0 यह 1945 से लेकर तकरीबन 1952 का समय है। इस समय पर मैैंने ज्यादा काम किया। उनके जीवन का यह समय दिलचस्प है। हमें पता चलता है कि वे कैसी मुश्किलों और अंतर्विरोधों से गुजर रहे थे।

- यही समय क्यों दिलचस्प लगा आप को?
0 वे बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के साथ थे। प्रोग्रेसिव रायटर मूवमेंट का हिस्सा थे। इस बीच हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए थे। उस माहौल का उन पर क्या असर पड़ा? उन्होंने कैसे उस माहौल के अपनी कहानी में ढाला। वे क्यों बॉम्बे छोड़ कर चले गए,जब कि वे बॉम्बे से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि मुझे कोई घर मिला तो वह बम्बई था। यह अलग बात है कि उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। वे दिन उनके लिए मुश्किल थे। बम्बई में …

अच्‍छा लगा अक्षय का साथ - निम्रत कौर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज निम्रत कौर ने ‘लंचबाक्‍स’ के बाद कोई फिल्‍म साइन नहीं की। इस बीच में उन्‍होंने अमेरिकी पॉलिटिकल थ्रिलर ‘होमलैंड’ में काम किया। हिंदी में वह मनपसंद फिल्‍म के इंतजार में रही। आखिरकार उन्‍हें ‘एयरलिफ्ट’ मिली। उसके बाद ‘अजहर’ की भी बात चली,लेकिन किसी वजह से वह उस फिल्‍म से अलग हो गईं। ‘एयरलिफ्ट’ में वह अक्षय कुमार के साथ हैं। इस फिल्‍म के लिए उनके चुनाव में दैनिक जागरण की अप्रत्‍यक्ष भूमिका है। दरअसल 2014 के पांचवें जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में अक्षय कुमार और निम्रत कौर की पहली मुलाकात हुई थी। अक्षय ने कहा था कि हम साथ काम करेंगे,जबकि निम्रत ने समझा था कि यह महज औपचारिक आश्‍वासन होगा। अभी दोनों की फिल्‍म ‘एयरलिफ्ट’ रिलीज हो रही है।
-कैसे आई ‘एयरलिफ्ट’ आपके पास? 0 एयरलिफ्ट मेरे पास 2014 के अंत में आई थी।निखिल आडवाणी ने मुझे कॉल किया। उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट बताई। उन्होंने एक और दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि मेरे दिमाग में एक पोस्टर है। उसमें अक्षय और निमरत साथ में हैं। मैं तुम दोनों को लेकर उत्साहित हूं। मुझे आप दोनों के बीच खास केमिस्ट्री दिख रही है। मुझ…

फिल्‍म समीक्षा : चॉक एन डस्‍टर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
जयंत गिलटकर की फिल्‍म ‘चॉक एन डस्‍टर’ में शबाना आजमी और जूही चावला हैं। उन दोनों की वजह से फिल्‍म देखने की इच्‍छा हो सकती है। फिल्‍म सरल और भावुक है। नैतिकता का पाठ देने की कोशिश में यह फिल्‍म अनेक दृश्‍यों में कमजोर हो जाती है। लेखक-निर्देशक की सीमा रही है कि सीधे तौर पर अपनी बात रखने के लिए रोचक शिल्‍प नहीं गढ़ा है। इस वजह से ‘चॉक एन डस्‍टर’ नेक उद्देश्‍यों के बावजूद सपाट हो गई है। ‘चॉक एन डस्‍टर’ शिक्षा के व्‍यवसायीकरण पर पर बुनी गई कहानी है। कांता बेन स्‍कूल के शिक्षक मुख्‍य किरदार हैं। इनमें ही विद्या,मनजीत,ज्‍योति और चतुर्वेदी सर हैं। वार्षिक समारोह की तैयारी से शुरूआत होती है। जन्‍दी ही हम कामिनी गुप्‍ता(दिव्‍या दत्‍ता) से मिलते हैं। वह मैनेजमेंट के साथ मिल कर वर्त्‍तमान शिक्षकों के खिलाफ साजिश रचने में धीरे-धीरे कामयाब होती हैं। मामला तब बिगड़ता है,जब वह पहले विद्या और फिर ज्‍योति को बेवजह हटाती हैं। प्रतिद्वंद्वी स्‍कूल के निदेशक इस मौके का फायदा उठाते हैं। बात मीडिया तक पहुंचती है और अभियान आरंभ हो जाता है। इस अभियान में विद्या के पुराने छात्रों समेत दूसरे छा…

दरअसल : सेंसर की दिक्‍कतें

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-अजय ब्रह्मात्‍मज हाल ही में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने श्‍याम बेनेगल के नेतृत्‍न में एक समिति का गठन किया है,जो सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के कामकाज और नियमों की समीक्षा कर सुझाव देगी। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के विजन के अनुसार यह समिति कार्य करेगी। उसके सुझावों के क्रियान्‍वयन से उम्‍मीद रहेगी कि सेंसर को लेकर चल रहे विवादों पर विराम लगेगा। सबसे पहले तो यह स्‍पष्‍ट कर लें कि 1 जून 1983 तक प्रचलित सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सेंसर का नाम बदल कर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन कर दिया गया था,लेकिन अभी तक सभी इसे सेंसर बोर्ड ही कहते और लिखते हैं। यहीं से भ्रम पैदा होता है। सीबीएफसी के अध्‍यक्ष,सदस्‍य और अधिकारी सेंसर यानी कट पर ज्‍यादा जोर देते हैं। वे स्‍वयं को सेंसर अधिकार ही मानते हैं। अभी के नियमों के मुताबिक भी सीबीएफसी का काम केवल प्रमाण पत्र देना है। फिल्‍म के कंटेंट के मुताबिक यह तय किया जाता है कि उसे यू,यूए,ए या एस प्रमाण पत्र दिया जाए। ताजा विवाद पिछले साल जनवरी में सीबीएफसी के अध्‍यक्ष पहलाज निलानी की नियुक्ति से आरंभ होता है।केंद्र म…