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Friday, June 6, 2014

फिल्‍म समीक्षा : फिल्मिस्‍तान

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
 2012 में 'फिल्मिस्तान' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। कायदे से यह फिल्म काफी पहले आ जानी चाहिए थी। अभी चर्चित फिल्मी हस्तियां 'फिल्मिस्तान' के गुणगान में लगी हैं। पिछले एक साल तक ये सहृदय समर्थक कहां थे? 'फिल्मिस्तान' नितिन कक्कड़ की शानदार फिल्म है। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की घिसी-पिटी कथाओं और घटनाओं में नहीं जाती। नए तरीके से दोनों देशों की समानता को रेखांकित करती 'फिल्मिस्तान' में भावनाओं का उद्रेक होता है और घृणा थोड़ी कम होती है। इस फिल्म में नितिन कक्कड़ ने अनोखे अंदाज में दोनों पड़ोसी देशों को करीब दिखाने की सार्थक कोशिश की है।
सनी अरोड़ा एक्टर बनना चाहता है। एक्टिंग में सही मौका नहीं मिलने पर वह कुछ समय के लिए एक अमेरिकी फिल्म मंडली का सहायक बन जाता है। राजस्थान के सीमांत पर शूटिंग के दरम्यान सनी का अपहरण हो जाता है। पाकिस्तानी आतंकवादी उसे अमेरिकी समझ कर उठा ले जाते हैं। गलती का एहसास होने पर सही समय के इंतजार में वे उसे बंदी बना लेते हैं। इस दौरान सनी की मुलाकात आफताब से हो जाती है। आफताब हिंदी फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी का धंधा करता है। हिंदी फिल्मों के दीवाने आफताब और सनी के बीच दोस्ती होती है। हिंदी फिल्मों के स्टार, संवाद और संगत में दोनों की दोस्ती गाढ़ी होती है। सनी अपने बेफिक्र और निर्भीक मासूमियत से आतंकवादी सरगना महमूद को छेड़ता रहता है। वे फिल्मों की इस दीवानगी और समानता से असमंजस में रहते हैं।
शारिब हाशमी (सनी अरोड़ा) और इनामुल हक (आफताब) ने अपने किरदारों को सादगी और ईमानदारी के साथ पेश किया है। अभिनय की यह स्वच्छता अब हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई पड़ती। दोनों नए कलाकार हैं, लेकिन कैमरे के आगे दृश्यों में इनकी रवानी देखते ही बनती है। आतंकवादी सरगना महमूद बने कुमुद मिश्रा की आंखें, भौं और होंठ बोलते हैं। वे अपने लुक से ही नफरत जाहिर कर देते हैं। अन्य सहयोगी कलाकार भी अपनी भूमिकाओं को जिम्मेदारी से निभाते हैं।
'फिल्मिस्तान' भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को अघोषित तरीके से मजबूत करती हिंदी फिल्मों को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है। वास्तव में यह फिल्म दोनों देशों की समानता को अनेक स्तरों पर उद्घाटित करती है। बोली, स्वाद, रुचि आदि तो एक जैसी हैं, लेकिन कुछ गुमराह आतंकवादी फर्क बढ़ाने की मुहिम में लगे रहते हैं। 'फिल्मिस्तान' दोनों देशों की दोस्ती का भी नारा नहीं देती। फिर भी दोनों देशों के दो सामान्य नागरिकों की आकस्मिक मुलाकात और एहसास से 'फिल्मिस्तान' कुछ जरूरी बातें कह जाती है।
'फिल्मिस्तान' देखी जानी चाहिए। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के बीच मौजूद नफरत कम करने के साथ दोस्ती बढ़ाती है। उससे भी अधिक यह मानवीय भावनाओं की सरल फिल्म है।
अवधि-117 मिनट
**** चार स्‍टार 

Tuesday, March 26, 2013

नसीम बानो के साथ होली - मंटो




सआदत हसन मंटो के मीना बाजार से होली का एक प्रसंग। यह प्रसंग परी चेहरा नसीम बानो से लिया गया है। यहां नसीम के बहाने मंटो ने होली का जिक्र किया है। फिल्‍मों पर होली पर लिखते समय हम सभी राज कपूर की आर के स्‍टूडियो से ही आरंभ करते हैं। उम्‍मीद है अगली होली में फिल्मिस्‍तान और एस. मुकर्जी का भी उल्‍लेख होगा।
.......
      यह हंगामा होली का हंगामा था। जिस तरह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक ट्रेडीशनबरखा के आगाज पर मूड पार्टीहै। उसी तरह बम्बे टॉकीज की एक ट्रेडीशन होली की रंग पार्टी थी। चूंकि फिल्मिस्तान के करीब-करीब तमाम कारकुन बाम्बे टॉकीज के महाजिर थे। इसलिए यह ट्रेडीशन यहां भी कायम रही।
      एस. मुकर्जी उस रंग पार्टी के रिंग लीडर थे। औरतों की कमान उनकी मोटी और हंसमुख बीवी (अशोक की बहन) के सिपुर्द थी। मैं शाहिद लतीफ के यहां बैठा था। शाहिद की बीवी इस्मत (चुगताई) और मेरी बीवी (सफिया) दोनों खुदा मालूम क्या बातें कर रही थीं। एकदम शोर बरपा हुआ। इस्मत चिल्लाई। लो सफिया वह आ गये...लेकिन मैं भी...
      इस्मत इस बात पर अड़ गयी कि वह किसी को अपने ऊपर रंग फेंकने नहीं देगी। मुझे डर था कि उसकी यह जिद कहीं दूसरा रंग इख्तियार न कर ले। क्योंकि रंग पार्टी वाले सब होली के मूड  में थे। खुदा का शुक्र है कि इस्मत का मूड खुद बखुद बदल गया और वह चन्द लम्हात ही में रंगों में लत पत भुतनी बन कर दूसरी भुतनियों में शामिल हो गयी। मेरा और शाहिद तलीफ का हुलिया भी वही था, जो होली के दूसरे भुतनों का था।
      पार्टी में जब कुछ और लोग शामिल हुए तो शाहिद लतीफ ने बा आवाज-ए-बुलन्द कहा, ‘चलो परी चेहरा नसीम के घर रुख करो।
      रंगों से मुसल्लह गिरोह घोड़ बन्दर रोड की ऊंची-नीची तारकोल लगी सतह पर बेढंगे बेल-बूटे बनाता और शोर मचाता नसीम के बंगले की तरफ रवाना हुआ। चन्द मिनटों ही में हम सब वहां थे। शोर सुन कर नसीम और एहसान बाहर निकले। नसीम हल्के रंग की जारजट की साड़ी में मलबूस मेकअप की नोक पलक निकाले, जब हुजूम के सामने बरामदे में नमूदार हुई, तो शाहिद ने बिजन का हुक्म दिया। मगर मैंने उसे रोका, ‘ठहरो! पहले इनसे कहा कपड़े बदल आयें।
नसीम से कपड़े तब्दील करने के लिए कहा गया तो वह एक अदा के साथ मुस्कराई, ‘यही ठीक है।
      अभी यह अल्फाज उसके मुंह ही में थे कि होली की पिचकारियां बरस पड़ीं।  चन्द लम्हात ही में परी चेहरा नसीम बानो एक अजीब-ओ-गरीब किस्म की खौफनाक चुड़ैल में तब्दील हो गयी। नीले-पीले रंगों को तहों में से जब उसके सफेद और चमकीले दांत और बड़ी-बड़ी आंखें नजर आतीं तो ऐसा मालूम होता कि बहुजाद और मानी की मुसव्वरी पर किसी बच्चे ने स्याही उड़ेल दी है।
      रंगबाजी खत्म होने पर कबड्डी शुरू हुई। पहले मर्दों का मैच शुरू हुआ फिर औरतों का। यह बहु़त दिलचस्प था। मिस्टर मुकर्जी की फरबा बीवी जब भी गिरती कहकहों का तूफान-बरपा हो जाता। मेरी बीवी ऐनक-पोश थी। शीशे रंग-आलूद होने के बायस उसे बहुत कम नजर आता था। चुनांचे वह अक्सर गलत सिम्त दौडऩे लगती। नसीम से भगा नहीं जाता था या वह यह जाहिर करना चाहती थी कि वह उस मशक्कत की आदी नहीं। बहरहाल वह बराबर खेल में दिलचस्पी लेती रही।