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Wednesday, July 8, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी-विनोद अनुपम


हिन्दी टाकीज-४२

हिन्दी फिल्मों के सुधि लेखक विनोद अनुपम ने आखिरकार चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह पोस्ट भेजी । विनोद अनुपम उदहारण हैं कि फिल्मों पर बेहतर लिखने के लिए मुंबई या दिल्ली में रहना ज़रूरी नहीं है। वे लगातार लिख रहे हैं और आम दर्शकों और पाठकों के बीच सिनेमा की समझ बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने परिचय में लिखा है...जब पहली ही कहानी सारिका में छपी तो सोचा भी नहीं था, कभी सिनेमा से इस कदर रिश्ता जुड़ सकेगा। हालांकि उस समय भी महत्वाकांक्षा प्रेमचंद बनने की नहीं थी, हां परसाई बनने की जरूर थी। इस क्रम में परसाई जी को खूब पढ़ा और खूब व्यंग्य भी लिखे। यदि मेरी भाषा में थोड़ी भी रवानी दिख रही हो तो निश्चय ही उसका श्रेय उन्हें ही जाता है। कहानियां काफी कम लिखीं, शायद साल में एक। शापितयक्ष (वर्तमान साहित्य), एक और अंगुलिमाल (इंडिया ठूडे) ट्यूलिप के फूल (उद्भावना), स्टेपनी (संडे इंडिया), आज भी अच्छी लग जाती है, लेकिन बाकी की दर्जन भर कहानियों के बारे में यही नहीं कह सकता। सिनेमा देखने की आदत ने, सिनेमा समझने की जिद दी, और इस जिद ने 85 से 90 के दौर में बिहार में काम कर रहे प्रकाश झा से जुड़ने का अवसर दिया। उन्हीं के सौजन्य से फिल्म अध्येता सतीश बहादुर से भी फिल्म ‘पढ़ने’ की शिक्षा ग्रहण की। और फिर प्रकाश जी ने ही फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स के लिए पुणे भेजने की भी पहल की। सिनेमा के बारे में जितनी ही दृष्टि खुलती गई, उतनी ही मेरे लेखन को एक दिशा मिलती गई। ‘उदभावना’ के संपादक अजय कुमार ने सिनेमा अंक के अतिथि संपादक के लिए मुझसे जमालपुर में संपर्क किया तो वाकई चकित रह गया, लेकिन सही दिशा में बढ़ने का विश्वास मिला। बाद में 2002 में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा ने भी कुछ ऐसे ही आश्चर्य में डाल दिया था। पटना से प्रकाशित ‘आज’ और ‘हिन्दुस्तान’ में छपी ‘सामान्य’ सी समीक्षाओं पर मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने खुशी तो दी लेकिन सिनेमा पर लेखन के प्रति चिन्ता भी। तब से मौके मिलने पर ही नहीं, मौके ढ़ूंढकर और मांगकर लिखे मैंने सिनेमा पर। आज संतोष होता है जब लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में सिनेमा पर नियमित स्तंभ दिखाई देते हैं। शायद न भी हो, लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं अपनी भूमिका मान मैं खुश होता रहता हूँ।

बात हाई स्कूल की है, पता नहीं क्लास कौन सा था, नौवां या दसवां। एक सहपाठी ने मेरे सिनेमा प्रेम पर मुझे काफी आत्मीयता से समझाते हुए कहा था, पता है ज्यादा सिनेमा देखने से आदमी सिनेमा में ही काम करने लगता है। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है भला कौन सिनेमा में काम नहीं करना चाहता? उसने मेरे उत्साह का शमन करते हुए समझाया, अरे बेवकूफ सिनेमा मतलब, सिनेमा हॉल, वो देखते हो न टार्च दिखाने वाला, गेट पर टिकट चेक करने वाला, वही सब। हालांकि उस समय मेरे लिए ये काम भी रश्क का विषय थे। हर घड़ी सिनेमा हॉल में रहने का उनका सुख सोचकर ही मैं गुदगुदा उठता था। फिर जिस तरह एक टिकट के लिए लोग गेट कीपर के पीछे आपाधापी मचाए रखते, मेरी नजर में उसका महत्ब बरकरार रखता। लेकिन उसके रहन-सहन से इतना अंदाजा तो हो ही जाता कि ये काम मजेदार जरूर है, बढ़िया नहीं। लेकिन जाहिर है सिनेमा में काम करने की बात से एक बार डर जरूर गया, लेकिन सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी। यह डर तब और घना हो गया जब मैट्रिक के इम्तेहान में उस मित्र को प्रथम श्रेणी मिली जबकि मैं चार नंबरों से रह गया। आज सोचता हूँ तो वाकई यह पागलपन ही लगता है कि अपने प्रथम श्रेणी की परम्परा वाले परिवार में आयी मेरी द्वितीय श्रेणी भी सिनेमा से मुझे दूर नहीं ले जा सकी। सिनेमा देखना जारी रहा और पढ़ाई भी। पता नहीं सिनेमा और पढ़ाई का मेरा संतुलन सायाश था अनायास, लेकिन यह जरूर हुआ कि एक प्रतियोगिता परीक्षा की सीढ़ी पार कर मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई में चला आया। फिर दूसरी प्रतियोगिता पार कर बिहार सरकार की नौकरी भी हासिल करली। साहित्य से शौक ने हिन्दी साहित्य से भी एम। ए. करवा दिया। सिनेमा देखने से अब इतना शउर आ गया था कि उस पर कुछ अपनी राय जाहिर कर सकता था, जिसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशन योग्य भी समझने लगी थी। एक दिन हतप्रभ रह गया जब दरवाजे पर मैंने उसी मित्र को खड़ा पाया, वर्षों बाद, मुझे क्षण भर लगा उसे पहचानने में। उसने बधाई दी। सिनेमा पर खूब लिख रहे हो, फिर कहा मैं भी कुछ करना चाहता हूँ, रास्ता बताओ। पता चला कई एक प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफलता के बाद वह घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा है। सिनेमा वह अब भी नहीं देखता, लेकिन यह जरूर है कि अब अपने बच्चों को सिनेमा देखने से नहीं रोकता।

सिनेमा खूब देखे मैंने, और सिनेमा देखकर खूब पिटाई भी खायी। कई पिटाई तो ऐतिहासिक थी। राजकपूर की ‘बॉबी’ के साथ कई रिकार्ड जुड़े हों, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा रिकार्ड तो यही है कि मेरे बड़े भाई साहब ने ‘बॉबी’ देखने के ‘अपराध’ में मुझे पहले कमरे में बंदकर अपने बेल्ट से पीटा, फिर बीच सड़क पर पीटते हुए स्कूल तक ले गये थे और उस लड़के को भी पीटा, जिसके साथ साईकिल पर सात किलोमीटर की सवारी कर मैं दूसरे शहर ‘बॉबी’ देखने गया था। उस समय मैं आठवीं में था, उम्र होगी बमुश्किल 14 साल। वास्तव में सिनेमा देखना उस समय भी मेरा सबसे बड़ा शगल था। दशहरा हो, दिवाली हो, रक्षा बंधन हो या सरस्वती पूजा’.... मेरे लिए इनका बड़ा महत्व यही था कि मैं सिनेमा देख सकता था। उस समय सिनेमा नून शो में चला नहीं करते थे। मैटनी शो में शाम छः बजे तक बाहर रहने की आजादी आम दिनों में मिलती नहीं थी। मिलती थी तो 4 बजे घर में हाजिरी देने के बाद। त्योहारों में घूमने के नाम पर यह छूट मिल जाती थी। ‘बॉबी’ भी सरस्वती पूजा विसर्जन के दिन देखी थी मैंने, और उसके ठीक एक दिन पहले ‘गद्दार’ भी देखली थी, प्राण, विनोद खन्ना और शायद पद्मा खन्ना....... लगातार दो दिन दो सिनेमा देखने का अक्षम्य अपराध में लगी उस पिटाई का विरोध सिर्फ मां ने किया था।

मां सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं, अच्छी खासी तनख्वाह। उनकी एक ही विलासिता थी, सिनेमा। होश आने के पहले भी और होश आने के बाद भी मां का सिनेमा देखना सदा मेरी याददाश्त से जुड़ा रहा। पिता जी सिनेमा नहीं देखते थे, बगैर किसी कारण। बस उन्हें सिनेमा हॉल का बंद वातावरण अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मां के सिनेमा देखने का उन्हें कभी विरोध करते भी नहीं देखा हमने। बल्कि अक्सर ऐसा होता कि मां सिनेमा देखकर बाहर आती तो पिता जी आॅफिस से लौटते हुए उन्हें साथ लेते आते। उस समय लेडिज क्लास का चलन था, लेडिस के लिए अलग काउंटर होते थे और सबसे कमाल यह कि सबसे कम टिकट दर भी उन्हीं का रहता था। महिलाओं के लिए सिनेमा देखना सुखद भले न हो, सुरक्षित अवश्य था। यूं आज के मल्टीप्लेक्स और कल के बॉलकनी को देखें तो स्पष्ट लगता है यह सुखद की सीमा हमेशा बदलते रही है।

जमालपुर (बिहार) में शायद आज भी सिनेमा के प्रचार का वही परंपरागत साधन है, जो बचपन में याने लगभग 30 साल पहले था। रिक्शे पर एक लाउडस्पीकर और माईक के साथ बैठा गेटकीपर। रिक्शे के पीछे प्लाई बोर्ड के टूकड़े पर एक मध्यम आकार का रंगीन पोस्टर चिपका रहता। अमूमन रिक्शा आने का समय शुक्रवार को 9 से 10 बजे का होता। फिल्म कोई भी हो, एनाउंस एक ही सुर में होता, अवन्तिका सिनेमा के रूपहले परदे पर आज से देखें, चुपके-चुपके धुंआधार मारपीट, नाचगाने, हंसी मजाक और सीन सिनहरी से भरपूर ‘चुपके-चुपके’ फिल्म के सितारे हैं, धरमिन्दर, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टाइगोर और जया भादुड़ी, पूरे परिवार के साथ देखें ‘चुपके-चुपके’। फिल्म का नाम बदलता जुमला जस का तस रहता, चाहे ‘दोराहा’ यदि मैं गलत नहीं तो राधा सलूजा इसकी नायिका थी और एडल्ट फिल्म होने के कारण एक तरह से बदनाम भी थी यह फिल्म, अफसोस यह फिल्म मैं आज तक नहीं देख सका हो या ‘कोशिश’ जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी दोनों ने गुंगे बहरे की भूमिका निभाई थी।

फिल्म और कलाकारों के प्रति उद्घोषक की उदासीनता रहती या सामाजिक पूर्वाग्रह का प्रभाव, अब याद करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि कभी संयोग से भी नायिका का नाम वह पहले नहीं लेता। उस फिल्म में जया भादुड़ी किसी नवोदित के साथ थी, शायद विक्रम या विजय अरोड़ा। लेकिन उदघोषक विक्रम के मुकाबले भी जया भादुड़ी को आगे करने की कोशिश नहीं करता। पुरूष सत्ता का प्रभाव हमारे मन को किस तरह अवचेतन में प्रभावित रखता है इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। यह बात आज मेरे समझ में आ रही है, लेकिन उस समय तो मेरे लिए यह उद्घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण रहती कि मैं मां को फिल्म बदलने की सूचना सबसे पहले देने से अपने आपको वंचित नहीं करना चाहता। शायद कोई समझदारी मेरी नहीं थी उस समय, मेरे लिए यह बस इसी लिए महत्वपूर्ण था कि अच्छी फिल्म की सूचना से मां को खुशी मिलती और वे फिल्म देखने की योजना बना सकती थी।

उस समय फिल्मों के चार सौ प्रिन्ट एक साथ रिलीज नहीं होते थे, न ही डिजीटल रिलीज की सुविधा थी। बस बक्से में फिल्म की रील आती, निश्चय ही छोटे शहरों तक आते-आते यह अवधि साल भी हो जाती कभी-कभी। फिर भी फिल्म देखने का उत्साह कम नहीं होता। बड़े शहरों से जैसे-जैसे फिल्म की सिल्वर जुबली याने 25 हते की सूचना आती, छोटे शहरों में फिल्म का क्रेज बनता। लेकिन तब तक फिल्म की रील घिस चुकी होती और उसके पोस्टर खत्म हो चुके होते थे। उस समय नई फिल्म के अधिकांश पोस्टर ट्रेडिल मशीन पर डेढ़ फीट बाय डेढ़ फीट के आकार में स्थानीय प्रेस में सिनेमा मालिकों द्वारा ही छपवाये जाते, आशुद्धियों से भरे इन पोस्टरों पर सिनेमा हॉल, सिनेमा के नाम के साथ सिर्फ कलाकारों के नाम होते थे। तस्वीरों वाले बड़े पोस्टर सिनेमा हॉल के अलावा शहर में सिर्फ एक जगह लगा करता था। अमूमन जिसे देखने के लिए हमलोग पहुंच ही जाया करते थे। शुक्रवार की दोपहर हमें प्रतीक्षा रहती मुंगेर के सिनेमा घरों की प्रचार गाड़ी की। अमूमन मुंगेर की प्रचार गाड़ी जीप पर बनायी जाती। तख्ते के क्यूब पर रंगीन पोस्टर चिपका कर उसे जीप पर रख दिया जाता। और साथ ही साथ माईक से एलाउंस भी होता रहता। सिनेमा और सिनेमा हॉल के नाम का तुक बिठाने में हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती। ‘हम किसी से कम नहीं’ सुनाई देता तो विजय टॉकीज गायब हो जात, विजय सुनाई देता तो ‘हम किसी से कम नहीं’। इस प्रचार गाड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण इसके साथ उड़ने वाले रंगीन पर्चे होते थे। पतले रंगीन कागज पर छपे ये परचे मिल जाना हमारी एक उपलब्धि होती थी। आज सोचता हूँ वाकई मजेदार लगता है, अजूबा तो उस समय भी लगता था। मुंगेर के बैधनाथ सिनेमा ने एक घोड़ा गाड़ी रखी थी, मतलब बग्घी। आगे जुते घोड़े और पीछे बक्से पर सिनेमा पोस्टर के क्यूब। बैधनाथ की एक और विशेषता थी, अपनी बालकनी को उसने दो भागों में बांट लिया था, आधा डी।सी. कहा जाता था, आधे में लेडीज। डी.सी. में मात्र 8 तीन लंबे गद्देदार स्पिंग वाले सोफे थे, जिसपर सिनेमा देखना वाकई सुखद लगता था। लेकिन मुश्किल लेडीज के साथ थी, उसके ठीक पीछे प्रोजेक्शन रूम था। अक्सर ही ऐसा होता कि नायक-नायिका के बीच किसी तीसरी स्त्री का जूड़ा या फिर रोते हुए बच्चों को खड़े होकर चुप कराती किसी महिला की छवि परदे तक पहुंच जाती और दर्शकों की जबरदस्त हाजिर जवाब चुटकियों से हॉल गुंज उठता था।

मेरे होशोहवाश में आने तक देश में बिजली संकट शुरू हो गया था। बिजली जाने लगी थी, लेकिन सिनेमा घरों में जेनरेटर का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। बिजली जाती तो घंटे-आधे घंटे तक दर्शकों को इन्तजार करना पड़ता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि आधी फिल्म में बिजली चली जाती और घंटे भर बाद घोषणा होती कि कल इसी टिकट पर आकर सिनेमा देख सकते हैं। यदि फिल्म आधी से भी कम चली होती और बिजली अनंत काल तक के लिए चली गई होती तो टिकट के पैसे वापस कर दिये जाते। हमारे लिए दुख से अधिक खुशी का अवसर होता यह, एक टिकट में दो खेल।

जमालपुर में उस समय दो सिनेमा घर थे, एक अवन्तिका और एक रेलवें, जिसे रेलवे ने अपने कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए बनवाया था। रेलवे में रेल कर्मचारियों को उस समय (1970-1980) मात्र 80 पैसे डी.सी. के लिए देने होते थे, जबकि आम दर्शकों को 1 रूपये 60 पैसे । बगल के जिला मुख्यालय मुंगेर में तीन सिनेमा घर थे। जब कोई बड़ी हिट या चर्चित फिल्म आती तो हमलोग मुंगेर जाते। याद है मुझे ‘जयसंतोषी मां’ देखने के लिए जाना था तो स्कूल से मुझे आधी छुटटी में बुला लिया गया था और स्कूल ड्रेस में ही मां के साथ सिनेमा देखने चला गया था। मुंगेर में सिनेमा देखने हमलोगों के लिए विलासिता ही थी, क्योंकि टैक्सी में बैठकर जाना होता और सिनेमा देखने के बाद रेस्टूरेंट में चाट और कुल्फी के लिए भी पिता जी ले जाते।

पता नहीं सिनेमा देखने की आदत की शुरूआत यहीं से हुई या इसकी नींव कहीं और पड़ी लेकिन इतना जरूर था कि सिनेमा मेरे परिवार में कभी त्याजय नहीं था, सिनेमा देखने - सिनेमा पर बातें करने पर कभी किसी को आपति नहीं होती, शर्त यह कि सिनेमा देखने की स्वीकृति घर में ले ली जाय। याद नहीं वह साल कौन सा था, लेकिन यह याद है कि वह फिल्म थी ‘गंगा तेरा पानी अमृत’, जिसे पहली बार अकेले देखने मैं गया था, मां से स्वीकृति और पैसे लेकर। लेकिन जैसे-जैसे मैं ऊपर के क्लास में चढ़ता गया, सिनेमा देखने की संख्या भी बढ़ती गई, जाहिर है उस अनुपात में घर से स्वीकृति संभव नहीं थी, सो चोरी-छिपे सिनेमा देखने की शुरूआत हुई। कुछ ऐसी भी फिल्में उस समय आने लगी, जिसके लिए घर से स्वीकृति मांगनी संभव भी नहीं थी, अब ‘गुप्तज्ञान’ देखने के लिए स्वीकृति मांगता भी कैसे? और नौवीं-दसवीं का समय ऐसा था, जब ऐसी फिल्में आकर्षित ज्यादा करती थी। जमालपुर में उस समय हरेक वर्ष नवम्बर-दिस्मबर में रामायण सम्मेलन आयोजित होते थे, देश भर से मानस विद्वान वहां उपस्थित होते थे और शाम 7 बजे से 12 रात्रि तक प्रत्येक दिन प्रवचन सुनने शहर के लोग इकट्ठा होते थे। हमे भी मानस सम्मेलन में जाने के लिए आसानी से स्वीकृति मिल जाती, जिसका उपयोग मैं अकसर अपने दोस्तों के साथ 9 से 12 बजे रात्रि शो में फिल्म देखने के लिए कर लेता। और तो याद नहीं लेकिन ‘तन्हाई’ मुझे अभी तक याद है जिसे मैंने 9 से 12 के ही शो में देखा था। शत्रुध्न सिन्हा और रेहाना सुल्तान के भी नाम याद हैं, और यह भी याद है कि उस फिल्म में कुछ ‘ऐसे’ दृश्य थे, जिसने मुझे कुछ गलत करने का अहसास दिलाया था, पता नहीं अब के बच्चों को सी-ग्रेड फिल्में देखकर भी अब यह अहसास होता है या नहीं?

आज भी सिनेमा देखने के लिए कोई आधार मैं नहीं मानता। काफी बाद में फिल्म भाषा और तकनीक पर आधारित एक कार्यशाला में वरिष्ठ फिल्म अध्येता गायत्री चटर्जी ने जब यह कहा कि यदि फिल्म के बारे में जानना हो तो खूब फिल्में देखनी चाहिए, तो मुझे समझ में आया कि शायद मैं गलत नहीं था। मैंने अच्छी-बुरी जब भी जैसी जो फिल्में मिली मैंने देखी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान दोस्तों के साथ कभी-कभी एक दिन में दो शो फिल्में भी देख डालीं।

सिनेमा आज भी देखता हूँ। लगातार, काफी कम फिल्में ऐसी होती है जिसे मैं नहीं देख पाता। सिनेमा हॉल में फिल्में देखना आज भी मेरी हॉबी है, 45 वर्ष की उम्र में। लेकिन सच कहूं वो उत्साह, वो सुख अब सिर्फ ख्यालों में ही आते हैं, जिसे हमने जमालपुर-मुंगेर के तंग से सिनेमा घरों में हासिल किया। क्यों? पता नहीं, शायद इसलिए कि वहां के गेटकीपर से लेकर सिनेमा की टूटी सीटों से एक अपनापन महसूस होता था, जो आतंकित करती मल्टीप्लेक्स की भव्यता से हासिल नहीं होती।

पसंद की फिल्में:-

1. मेरा नाम जोकर
2. ब्लैक
3. स्वदेश
4. आवारा
5. गाईड
6. वेलकम टू सजनपुर
7. लगे रहो मुन्ना भाई
8. दिलवाले दुल्हनियां ले जाऐंगे
9. गोलमान
10. विवाह
कृप्या क्रम पर गौर नहीं करें

विनोद अनुपम, बी-53, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20 मो. 9334406442


Monday, April 6, 2009

हिन्दी टाकीज:ज़िन्दगी में लहर फिल्मों ने दी-दीपांकर गिरी



हिन्दी टाकीज-३१


इस बार हैं दीपांकर गिरी। दीपांकर इन दिनों फिल्मों के लेखक बनने की तैयारी में हैं। साहित्य और सिनेमा का समान अध्ययन किया है उन्होंने। अपने परिचय में लिखते हैं...झारखंड के छोटे से चिमनी वाले शहर के एक साधारण घर में जन्म । लिखने पढने की बीमारी विरासत में मिली,जिसके कारण अंत में जामिया मिलिया में जाकर मास मीडिया में एडमिट हो गया। साहित्य ,कविता,कहानियों की दवाइयां लेकर वहां से निकला और दैनिक भास्कर,प्रभात खबर होते हुए मुंबई की राह पकड़ ली। टीवी सीरियलों ने कुछ दिन रोजी-रोटी चलाई। फिलहाल अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लेकर दफ्तर दर दफ्तर यायावरी,फिर भी बीमारी है कि कतमा होने का नाम नहीं लेती।


ज़िन्दगी में लहर फिल्मों ने दी
कल की ही बात है...
अधिक मौसम नहीं बीते हैं। लगता है जैसे कल की ही बात है और मैं झारखंड के एक छोटे से ऊंघते हुए शहर "चंदपुरा" के पपड़ियां उचटते सिनेमा हाल के बाहर लाइन में लगा हूं और डर इसका कि कहीं टिकट ख़त्म न हो जाए। तमाम धक्कामुक्की के बाद चार टिकट लेने की कामयाबी थोड़ी देर के लिए जिंदगी में खुशबू भर देती है। मल्टीप्लेक्स के कंप्यूटर से निकले टिकटों के इस दौर में भी आज गहरे गुलाबी रंग के उस पतले से टिकट की खुशबू उसी शिद्दत से सूंघ सकता हूं। वहां तब से लेकर आज तक सिर्फ एक ही हाल है और उसका नाम है विकास टाकीज। उसका विन्यास कुछ ऐसा है कि "वि" अलग लिखा है "का" अलग और "स" अलग। इस डिजाइन से अधिक नुकसान तो नहीं हुआ, बस "का" के मिट जाने पर अब वह दूर से "विस" लगता है। रोचक तथ्य यह है कि जब ये "विकास" दिखता था तब वह इस सिनेमा हाल के सुनहरे दिन थे। इसी सिनेमा हाल में मैने बचपन में "गंगा किनारे मोरा गांव" देखी थी और यहीं पर देखा था "पिया के गांव"। यहीं "दोस्ताना" देखी थी, "मर्द" देखी थी और यहीं पर "मिस्टर इंडिया" देखी थी। परिवार के साथ यहीं देखी थी "संयोग" और "बीस साल बाद" और भी न जाने कितनी जिनके नाम याद नहीं।तब सब जाते थे देखने और हम बच्चे भी खुशी में चहकते हुए।

पांच दिन लगातार 'दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे'
फिर हम बड़े हुए और परिवार के साथ जाने पर जैसे हमारा कद घट जाता था सो परिवार की जगह दोस्तों ने ले ली थी और जो पहली फिल्म दोस्तों के साथ देखी वो थी 'दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे'। ये वो दिन थे जब हम नये नये जवान हो रहे थे और अपनी जवानी पर बड़े इतराते थे पर इस फिल्म ने जिंदगी के आवारापने पर बड़ा कहर ढाया और हमें संजीदा बना दिया। इस फिल्म का ऐसा असर रहा कि रात भर सो न सके और अगले दिन फिर से जाकर काउंटर की लाइन में खड़े हो गए। टिकट के पैसे अगले हफ्ते लगने वाली फिल्म के लिए थी और एक ही फिल्म के लिए दो बार पैसे लुटाना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं था,लेकिन मन कहां माने राज और सिमरन के लिए हमारे दिल धड़कने लगे थे। दूसरे दिन फिल्म देखने के बाद भी हमारा जी नहीं भरा तो हमलोगों ने अपने चाय और समोसे कुर्बान कर दिये और अगले दो दिन भी फिल्म देख ली। चार दिन लगातार फिल्म देखने के बाद पांचवे दिन के लिए हमारी जेब ने हाथ खड़े कर दिये। कोई उपाय न देख पांचवे दिन हम सभी दोस्तों ने एक उपाय निकाला और अगले दिन हम सभी अपने अपने पंचर सायकल सड़कों में घसीटते हुए आखिरकार सिनेमा हाल की दीवार से टिका दी। झूठ को जितने तरीके से मरोड़ा जा सकता था हमने मरोड़ दिया। पांच दिन एक फिल्म को देखने के बाद भी हमारा जी नहीं भरा था और कोई रास्ता नहीं था फिर भी हमने अपने सायकल उधर मोड़ दिया और उस दिन जैसे चमत्कार हुआ और टॉर्च वाले को हम पर दया आ गई और हमें आगे की सीट पर बिठा दिया। हमारे संकट के समय में टॉर्च वाला देवदूत बनकर अवतरित हुआ था। ये तो थी हम पगलों की बात पर इस फिल्म ने जैसे हमारे शहर को भी एक धागे में बांध दिया था। टाउनशिप के डॉक्टर,इंजीनियर,हमारे टीचर,पापा और उनके दोस्त. मां और दीदी की मंडली सब ने मिलकर एक सुर में इस फिल्म को देखा और विकास टाकीज के कैंपस में दिन चटाखेदार धूप की तरह चमकने लगी थी और रातें शंघाई की तरह सजती थी। टाकीज के बाहर बाजार थे। सारा शहर सिनेमा के रंग में डूबा हुआ था। ये विकास टाकीज के सुनहरे दिन थे,जिसके मैनेजर को स्टेशन मास्टर और टीटी साहेब से अधिक सम्मान दिया जाता था और जिनका कद एसबीआई के बैंक मैनेजर से ज्यादा था। ये सिनेमा हाल हमारे टाउनशिप की संस्कृति बन चुका था। खुशी के हर मौके पर लोग परिवार सहित इस हाल में आते थे। लोग अपने रिश्तेदारों को लेकर आते थे और गर्व से यहां फिल्म दिखाते थे।
ये सिलसिला आगे के कई सालों तक चलता रहा,मगर धीरे धीरे धूप ढलने लगी और इन्ही में से किसी दिन "विकास" "विस" में बदल गया। और तभी इनके पोस्टर बदलने लगे थे। अब उस पर लगे पोस्टर या तो "गुंडा" जैसी फिल्मों की होतीं थी या मिथुन दा की "जल्लाद" और कभी-कभार "सर कटी लाश" तक भी बात पहुंच जाती थी ।

कालोनी की ज़िन्दगी और 'मोहरा'
कालोनी लाइफ की अपनी मजबूरियां होती हैं। यहां पर बच्चों और बच्चों के मां-बाप को पढ़ने और पढ़ाने की एक बीमारी होती है।सुबह चार बजे सब एक-दूसरे के घरों की तरफ देखते हैं कि किन की लाइट जल रही है। लाइट जलने का मतलब ये है कि मिश्रा जी का बेटा या बेटी पढ़ाई कर रहें हैं तो जब वो पढ़ाई कर रहें हैं तो हमे भी पढ़ाई करनी चाहिए। इस लोकप्रिय सिद्धांत के फलस्वरूप हमें सुबह कड़कडाती ठंड में पढ़ाई करने को मजबूर किया जाता था। शाम के वक़्त घरों में कुछ शब्द रोज-रोज सुनाई देते थे मसलन आई आई टी,मेडिकल,कोचिंग, फिजिक्स, कैलकुलस, brillient tutorials ... फलाने जी के लड़के का आइआइटी में हो गया। फलाने जी की लड़की का एम्स में हो गया है। तो घरों पर,चाय की दुकान पर,राशन की दुकान पर,जहां देखो यही बातचीत। हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए प्रभावी कोचिंग कराने की तैयारी में लगा हुआ है। और जब कालोनी के एकमात्र सिनेमा हाल में "गुंडा" जैसी फिल्में लगने लगें तो उधर का रुख करना आत्महत्या के बराबर था और अगर गलती से कोई फिल्म देख ली तो फिर खैर नहीं। अब "विकास" भरी दुपहरी में ऊंघता रहता और कोई भी उसके पास नहीं फटकता था। लेकिन मेरा मन नहीं मानता था। बचपन की आदत थी कैसे छूटे। एक घटना जो इस सिलसिले में याद आती है वो ये है कि एक साल जब छठ का आया तभी विकास टाकीज में "मोहरा" लगी हुई थी। उन दिनों हम अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी की एक्शन फिल्मों के दीवाने थे,लेकिन देखने का कोई सुनहरा मौका नजर नहीं आ रहा था। लेकिन "छठ" ने ये समस्या सुलझा दी थी इसलिए छठ के दिन जब सारा परिवार नदी किनारे छठ मनाने जा रहा था तो मैने तबियत खराब होने का दुनिया का सबसे पुराना बहाना बनाया,जिसमें पानी के पास फटकने से भी उस तबियत के लिए और भी खतरा उठाना था,इसलिए मुझे घर पर रहने की छूट मिल गई और मैने बड़े मिजाज से घर में ताला जड़ कर "मोहरा" देख डाली,लेकिन जब घर लौटा तो नजारा कुछ और ही था। ताजा खबर ये थी कि छठ के इस शुभावसर पर किसी नास्तिक चोर ने हमारे आंगन में सूख रहे कपड़े गायब कर दिए थे। मैने बहाना लगाने की कोशिश की कि मैं दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर सोया था,लेकिन फिर भी अपने हिस्से की डांट सुन ही ली. लेकिन अगले दो दिन तक जो अपने दोस्तों के बीच हीरो बनकर रहा,उसके सामने ये डांट तो कब का काफुर हो गया पता ही नहीं चला।

उम्र बढ़ी और बोकारो पहुंचे
लेकिन इसके बाद चंदपुरा में फिल्म देखना नामुमकिन हो गया। चंदपुरा काफी छोटी जगह है और इस छोटे जगह की समस्या ये है कि इसके पास न तो शहर जैसी आवाजाही और न भीड़भाड़ है है न ही गांव वाला "गंवईपन"। और गांव और शहर के बीच लटके इस टाऊनाशिप में लगभग पांच हजार लोग काम करते हैं इसलिए तकरीबन लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं। इसलिए ये चोरी-छिपे फिल्म देखने का मतलब एक दिन घर में बात पहुंच जानी थी।इसलिए हम सब दोस्तों ने यह मशविरा किया कि फिल्में चंदपुरा को बजाए अपने नजदीकी शहर बोकारो में देखी जाए। लेकिन वहां जाएं कब क्योंकि हफ्ते में छह दिन तो इंटरमीडएट की कक्षा ये थी। काफी सोच-विचार कर इस नतीजे पर पहुंचे कि शनिवार को कलासेस बंक कर बोकारो निकल जाया जाए।बस फिर क्या था अगले ही शनिवार से हम पढ़ाई के नाम पर बैग में एक टी शर्ट ... कुछ नाम की किताबें और लंच बॉक्स लेकर अपनी सायकल में हम युनिफोर्म पहने घर से निकल जाते थे और जिस तरह से "राग दरबारी" में शक्कर की बोरियों से लदा टक कोआपरोटिव की तरफ न मुड़ कर शहर की तरफ सीधी निकल गयी थी और वहीं से कोआपरेटिव में गबन शुरु हो गया था,उसी तरह हमारी सायकलें स्कूल की तरफ न मुड़ कर बायें में नदी और जंगलों के बीच मुड़ जाती थी,जहां से बोकारो जाने का कच्चा रास्ता बना था। बोकारो जाने को लिए नदी का रास्ता काफी खराब था टेढ़े मेढ़े पथरीले पठारी। एक रस्ते में जितनी खराबियां हो सकती है वो सब उसमें मौजूद थी। तिस पर नदी में कोई स्थायी पुल भी नहीं था। नदी को किनारे वाले गांव के लोगो ने अपने आने-जाने के लिए बांस का एक पुल बनाया था,जिसे पैदल पार करने का भाड़ा आठ आना था और सायकल ले जाने का एक रुपया। हमलोगो में से हर एक के पास बमुश्किल १० या १२ रुपये होते थे,जिसमें एक रुपये उसमें चले जाते थे।हां इतनी मुरव्वत ठेकेदार ने हमारे लिए जरूर कर दी थी कि हमें आने के पैसे नहीं देने होते थे। और लगभग हर मौसम में हमने ये नदी पार की। कई बार गिरे बारिश में फंसे। कीचड़ में कपड़े भी गंदे हुए लेकिन सिनेमा घर में बड़े से परदे का मोह नहीं छोड़ पाते और इस तरह नदियों,पहाड़ों और जंगलों से होकर हम चांदी की तरह चमचमाते बोकरो स्टील सिटी में इंटर करते थे।साफ सुथरी चौड़ी सड़कें । दिन का पहला शो १२ बजे शुरु होता था। और हम वहां लगभग ११ बजे पहुंच जाते थे।वहां पहुंचकर एक अठन्नी सायकल पार्किंग वाले को देना पड़ता था और टिकट आती थी लगभग सात रुपए की। हालांकि आगे की टिकट पांच रुपए की ही आती थी,लेकिन आगे कौन बैठे। इतना पहाड़ पर्वत लांघने के बाद गरदन ऊंची करके देखने के लिए आए हैं क्या? इसलिए हम बालकनी में बैठते थे। बचते थे तीन या चार रुपए। उसमें भी अगर सायकल पंक्चर हो गया तो दो रुपये उस में चले जाते थे। इस एक घंटे के समय में हम घर से मिले अपने अपने लंच बॉक्स साफ कर देते थे।बोकारो में तीन सिनेमा हाल हैं देवी,जीतेन्द्र और पाली प्लाजा। देवी थोडा महंगा था इसलिए हम या तो जीतेन्द्र में देखते थे या पाली पर.ज्यादातर फिल्में हमने पाली मे हीं देखी। यहां देखी जो महत्त्वपूर्ण फिल्में याद हैं,वे सब ९० के मध्य दशक के बाद रीलिज हुई फिल्में थीं,जिनमे अजय देवगन की "जंग" थी।

सटीक गानों से मिलती थी मदद
ये वो वक़्त था जब हमारा अक्षय कुमार से मोहभंग हो चुका था और हमारा नया एक्शन हीरो था अजय देवगन। इसलिए "जंग" देखने के बाद हमने जीतेन्द्र सिनेमा घर में हमने अगले हफ्ते "दिलजले" देखी। उस उस फिल्म में एक गाना था जिसने हमारे ऊपर बडा एहसान किया था। एहसान इस तरह से कि इंटरमीडिएट में हमारे साथ बहुत सारी नयी लडकियां आयीं और उनको खुद की तरफ खींचने के लिए ये गाना एकदम सटीक था और वो गीत था "जिसके आने से रंगों मे डूब गई है शाम सोच रहा हूं उससे पूछूं उस लड़की का नाम। और अगली लाइन में बड़े अच्छे लफ्जों का प्रयोग किया गया था। कहना न होगा कि इस गीत ने हमारा कितना काम किया। अगली फिल्म जो पाली में लगायी गयी वह थी सुपरहिट फिल्म "राजा हिन्दुस्तानी"। इस फिल्म के गाने पहले ही हिट हो चुके थे "परदेसी परदेसी" ने जो धमाल मचाया था,उससे पूरा माहौल "परदेसी परदेसी" हो गया था। जिनकी प्रेमिकाएं एक दिन के लिए भी शहर से बाहर अपने रिश्तेदारों के पास चली जाती थी उनके आशिकों के मुंह से अचानक "परदेसी परदेसी जाना नहीं " निकल जाता था और मुझे याद है शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां उन दिनों "राजा हिन्दुस्तानी " का आडियो कैसेट न हो। कई बार तो एक ही मोहल्ले से एक ही साथ कई घरों से "परदेसी परदेसी" की आवाजें आती थी। खैर इस फिल्म ने इतना उत्पात मचाया कि लोग "दिलवाले दुलहनियां " और "हम आपके हैं कौन" की अगली कड़ी के रुप में इस फिल्म को देखने लगे।

सनी देओल का जादू
हमारे दूसरे सुपरस्टार थे "सनी देऒल"। उस समय अचानक पाली में एक के बाद एक सनी देऒल की फिल्में लगने लगी थी।पोस्टर देखकर हम इत्मीनान कर लेते थे कि उसमें कीमती इबारतें जैसे "रोमांस और मारधाड़ एकशन से भरपूर" और
ये पढ़ने के बाद जब तक फिल्म देख नहीं लेते थे तब तक हमें चैन नहीं मिलता था। सडकों पर जब सनी साहब हीरोइन के लिए मारपीट करते थे तो हमें अनिर्वचनीय खुशी मिलती थी। उन दिनों हमने उनकी जो जो फिल्में देखीं वे थीं सबसे पहले 'बॉर्डर' फिर जैकी सनी मनीषा की "दुश्मनी"। उसके बाद देखी थी "घातक" और फिर "अजय"। "अजय" हमें खास प्रिय था क्योंकि उसमें एक गीत था "छम्मकछल्लो जरा धीरे चलो वरना जाऒगी फिसल जो कि फिर से हमारे बड़े काम का था। इस फिल्म का नशा किसी ने तोड़ा तो वो थी सनी देओल ,करिश्मा कपूर,सलमान अभिनीत "जीत" ने। इस फिल्म के पोस्टर पर लिखा था "एक वायलेंट लव स्टोरी "। ये लाइन हमें आकर्षित कर गई क्योंकि हम उन दिनों ऐसी अवसथा में थे,जहां हम अपनी प्रेमिकाओं के लिए किसी भी तरह का "वायलेंस" कर सकते थे। ये अलग बात थी कि उसके बाद भी वे हमें घास नहीं डालती थीं। सनी देऒल का भी हमारे ऊपर काफी गहरा असर था जिसके फलस्वरूप हमने कई स्थानों पर कुछ हुड़दंग और मारपीट तक कर दी थी। इसके लिए दो फिल्में जो हमें याद हैं जो हमने केवल देखने को लिए देख ली थी वे थी "अग्निसाक्षी " और "बाल ब्रह्मचारी " । "अग्निसाक्षी' हम नाना पाटेकर के लिए गए थे और "बाल ब्रह्मचारी " हम राजकुमार साहब को सुपुत्र का अभिनय देखने के लिए गए थे। उन दिनों हमें अभिनय कितना समझ में आता था इसका तो हमें अंदाजा नहीं,लेकिन जितना आता था वो भी हम उस फिल्म के साथ भूल गए। फिर शाहरुख खान की "करण अजुन" कहीं से लौटकर फिर से पाली में लगी। बस फिर क्या था। हम ममता कुलकर्णी को दीवाने हो गए जो अक्षय कुमार की "सबसे बडा खिलाड़ी " में जाकर चरम सीमा में पहुँच गई। उन दिनों हमारे सुपरस्टार अलग-अलग अवतारों जैसे शाहरुख लौट रहे थे "चाहत" से। माधुरी अंखियां मिलाते हुए लौटीं "राजा" से और अक्षय "सबसे बडा खिलाड़ी" से। और ये सब फिल्में हमने पाली में देख लीं।

टीटी की वैकेंसी और 'डर '
उन्हीं दिनों किसी दोस्त ने बताया कि शाहरुख की चर्चित फिल्म "डर" फिर से कतरास के लक्ष्मी टाकीज मे आयी है। हमने "करण अर्जुन " देख ली थी और "डर" के बारे में इतना सुन रखा था कि हम इस मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। हमारा "अनुसंधान" कहता था कि "डर" का फिलहाल पाली क्या बोकारो के किसी भी सिनेमाघर में लगना संभव नहीं है इसलिए इस फिल्म को कतरास में ही देखा जा सकता था। तो इस विषय पर हमारी टोली की एमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई और "डर" देखने की योजना पर गंभीर विचार विमर्श हुआ। तमाम तरह की संभावनाऒं को टटोलने के बाद हमें कोई सालिड बहाना नहीं मिल रहा था। तभी एक ऐसे मित्र ने जो हमारे गैंग में शामिल नहीं था और जो "पढाकुऒं" की श्रेणी में आता था उसने आकर पूछा कि रेलवे ने टीटी की वैकेंसी निकाली है और क्या तुम लोगों में से कोई जाना चाहता है क्या । पहले तो हमने उसे भगा दिया,लेकिन हममे से एक का ध्यान उस पर अटका रहा और उसने बाद में हमें चेताया कि वह पढ़ाकू हमें काम की बात बता गया है।हम सब का माथा ठनका और फामॆ चूँकि चंदपुरा जैसे छोटे जगह में मिलना मुश्किल था इसलिए हमने अपने घरों में ये कहा कि हम टीटी के लिए एप्लाई करना चाहते थे,इसलिए फामॆ लाने धनबाद जाना होगा । घरवाले आशचयॆचकित लेकिन थोडे खुश भी हुए। उनहें लगा कि हम कैरियर के पति काफी सचेत हो रहें हैं। लेकिन घर के बड़ों ने कहा कि फामॆ हम ला देते हैं तुम क्यों जा रहे हो? हमने जिस तरह से इस बात का प्रतिवाद किया उतना कभी पढाई को लेकर नहीं किया। मैंने कहा कि अब हम बड़े हो गए हैं अभी दुनिया नहीं देखेंगे तो कब देखेंगे और इस तरह के तमाम वाहियात से तकॆ दे दे कर मैंने घर से छुट्टी ले ली । कमोबेश ऐसी ही स्थिति का सामना बाकी दोस्तों ने भी किया लेकिन अंतत: सभी दोस्त इतवार की सुबह सुबह स्टेशन पर मिल ही गए और हम धनबाद जाने वाली ट्रेन में बैठ गए लेकिन हम धनबाद जाने के बजाए चुपके से कतरास उतर गए और वहां से सीधो लक्ष्मी टाकीज पहुंच गए। सिनेमा हाल अभी खुला भी नहीं था और लगभग दो घंटे इधर-उधर भटकने के बाद हाल खुला और हमने सबसे पहले लाइन में खड़े होकर टिकट ले लिया। वो हाल क्या था ज्यादातर दर्शकों का अनुमान था कि ये हाल नहीं गोदाम है। चूहे हमारे शरीर के ऊपर दौड़ रहे थे. परदे नीचे से फटा हुआ था। कुर्सियों में गद्दी नाम की थी पर एक बार फिल्म शुरु हो जाने के बाद इन सब बातों का खयाल कहां रहता है। "डर" देखकर जो आत्मा को शांति मिली थी,वह हमारी आत्मा ही जानती थी। लेकिन घर लौटते वक़्त सबके जेहन में एक ही सवाल था कि फामॆ का क्या बहाना बनाएंगे। खैर इस मुश्किल सवाल का एक सीधा-साधा जवाब ढूढ लिया गया और जो होगा सो देखा जाएगा के तजॆ पर घर में एंट्री मार दी। घरवालों ने पूछा तो आत्मविश्वास से भरकर कह दिया कि फामॆ ख़त्म हो गया अगले हफ्ते आएगा। इस जवाब के तह में जाने की किसे फुसॆत थी सो उस दिन बडी अचछी नींद आयी।

और फिर मैं "परदेसी" हो गया
इतना सब कुछ करते हुए कब इंटरमीडिएट की परीक्षाएं आ गईं पता ही नहीं चला। रिजलट आते आते हम सब दोसत ये समझ चुके थे कि अब हमारा यहां से आगे की पढाई के लिए रूखसत का वक़्त है। वो नदी,पहाड़, जंगल,फिल्में सब कुछ हम से छूट रहे था और मैं दिल्ली जाने वाली गाड़ी में बैठ चुका था। दिल्ली जाते वक़्त सारे सिनेमाई परदे मेरी आंखों के सामने से गुजरने लगे। एक पल के लिए लगा जैसे शायद ही फिर कभी लौटना होगा। उस वक़्त सचमुच लगा कि मैं "परदेसी" हो गया।


मेरी पसंद की फिल्में


मकबूल,जागते रहो,बैंडिट क्वीन,एक रुका हुआ फ़ैसला,इजाज़त,आंधी,ब्लैक फ़्राइडे.हासिल,अर्धसत्य,मम्मो