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ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती हैं करण जौहर की फिल्में

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-अजय ब्रह्मात्‍मज युवा फिल्मकारों में करण जौहर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि चेहरे हैं। अपने व्यक्तित्व और फिल्मों से उन्होंने खास जगह हासिल की है। हिंदी फिल्मों की शैलीगत विशेषताओं को अपनाते हुए उसमें नए लोकप्रिय तत्व जोडने का काम उन्होंने बहुत खूबसूरती से किया है। वे एक साथ शर्मीले और मुखर हैं, संकोची और बेधडक हैं। स्पष्ट और गूढ हैं। खुशमिजाज और गंभीर हैं। विरोधी गुणों और पहलुओं के कारण वे एक ही समय में जटिल और सरल नजर आते हैं। व्यक्तित्व के इस द्वैत की वजह से उनमें अद्भुत आकर्षण है। वे यूथ आइकन हैं। वे देश के एकमात्र लोकप्रिय निर्देशक हैं, जिनकी लोकप्रियता और स्वीकृति किसी स्टार से कम नहीं है। सुरक्षित माहौल की परवरिश लोकप्रियता और स्वीकृति के इस मुकाम तक पहुंचने में करण जौहर की लंबी यात्रा रही है। यह यात्रा सिर्फ उम्र की नहीं है, बल्कि अनुभवों की सघनता सामान्य व्यक्ति को सलेब्रिटी बनाती है। करण जौहर ने खुद को गमले में लगे सुंदर पौधे की तरह ढाला है, जो धरती और मिट्टी से जुडे बिना भी हरा-भरा और खिला रहता है। महानगरों के सुरक्षित माहौल में पले-बढे सलेब्रिटी की आम समस्या है कि वे

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : गढ़ते-बढ़ते अनुराग कश्‍यप

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-अजय ब्रह्मात्‍मज फिल्मों से संबंधित सारे बौद्धिक और कमर्शियल इवेंट में एक युवा चेहरा इन दिनों हर जगह दिखाई देता है। मोटे फ्रेम का चश्मा, बेतरतीब बाल, हल्की-घनी दाढी, टी-शर्ट और जींस में इस युवक को हर इवेंट में अपनी ठस्स के साथ देखा जा सकता है। मैं अनुराग कश्यप की बात कर रहा हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस मुखर, वाचाल, निर्भीक और साहसी लेखक-निर्देशक ने अपनी फिल्मों और गतिविधियों से साबित कर दिया है कि चमक-दमक से भरी इस दुनिया में भी धैर्य और कार्य से अपनी जगह बनाई जा सकती है। बाहर से आकर भी अपना सिक्का जमाया जा सकता है। लंबे तिरस्कार, अपमान व संघर्ष से गुजर चुके अनुराग कश्यप में एक रचनात्मक आक्रामकता है। उनका एक हाथ मुक्के की तरह गलीज फिल्म इंडस्ट्री के ध्वंस के लिए तना है तो दूसरे हाथ की कसी मुट्ठी में अनेक कहानियां व सपने फिल्म की शक्ल लेने के लिए अंकुरा रहे होते हैं। अनुराग ने युवा निर्देशकों को राह दिखाई है। मंजिल की तलाश में वाया दिल्ली बनारस से मुंबई निहत्था पहुंचा यह युवक आज पथ प्रदर्शक बन चुका है और अब वह हथियारों से लैस है। जख्म हरे हैं अब तक इस तैयारी में अनुराग ने मुंबई में

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन :आधुनिक स्त्री की पहचान हैं करीना कपूर

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बेबो ही नाम है उनका। घर में सभी उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक प्रकार से उनके घर का विस्तार है, इसलिए इंडस्ट्री उन्हें प्यार से बेबो बुलाती है। सार्वजनिक स्थानों पर औपचारिकता में भले ही फिल्म बिरादरी उन्हें करीना नाम से संबोधित करती हो, लेकिन मंच से उतरते ही, कैमरा ऑफ होते ही और झुंड में शामिल होते ही वह सभी के लिए बेबो हो जाती हैं। तोडी हैं कई दीवारें करीना कपूर का अपने सहयोगी स्टारों से अनोखा रिश्ता है। खान त्रयी (आमिर, सलमान और शाहरुख) के अलावा अजय देवगन उन्हें आज भी करिश्मा कपूर की छोटी बहन के तौर पर देखते हैं। मतलब उन्हें इंडस्ट्री में सभी का प्यार, स्नेह और संरक्षण मिलता है। अपने सहयोगी के छोटे भाई-बहन से हमारा जो स्नेहपूर्ण रिश्ता बनता है, वही रिश्ता करीना को हासिल है। मजेदार तथ्य है कि इस अतिरिक्त संबंध के बावजूद उनकी स्वतंत्र पहचान है। वह सभी के साथ आत्मीय और अंतरंग हैं। पर्दे पर सीनियर, जूनियर व समकालीन सभी के साथ उनकी अद्भुत इलेक्ट्रिक केमिस्ट्री दिखाई पडती है। आमिर से इमरान तक उनके हीरोज की लंबी फेहरिस्त है। हिंदी फिल्मों की अघोषित खेमेबाजी छिपी नहीं

औन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : पुरजोर वाहवाही नहीं मिली रानी मुखर्जी को

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बॉर्डर पर तैनात सैनिकों से मिलकर लौट रही मीरा हवाई जहाज से अपनी सीट पर खुद को व्यवस्थित कर रही है, तभी एक प्रशंसक ऊल-जलूल सवाल करता है। मीरा उसे आडे हाथों लेती है और जवाब में जो बोलती है, उससे न केवल वह व्यक्ति, बल्कि सिनेमा घर में बैठे दर्शक भी अवाक रह जाते हैं। एक बहस चलती है कि क्या ऐसे संवाद की जरूरत थी? रानी मुखर्जी ने तब कहा था कि उस किरदार के लिए ऐसा करना जरूरी था। मुझे लगता है कि यह संवाद स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं रहा होगा। शूटिंग के दौरान राजकुमार गुप्ता ने रानी मुखर्जी के व्यवहार और अंदाज को नोटिस किया होगा। उन्होंने यह संवाद तत्काल जोडा होगा और रानी ने इसे बोलने में कोई आनाकानी नहीं की होगी। रानी मुखर्जी किसी सोते या फव्वारे की तरह अचानक फूटती हैं। उनके चेहरे पर आ रहे भावों में व्यतिक्रम होना एक विशेषता है। अनौपचारिक बातचीत में भी वह विराम लेकर एकदम से नई बात कह देती हैं और फिर वहीं टिकी नहीं रहतीं। संभव है आप भौंचक रह जाएं। छोटी सी बात का फसाना बन जाता है आप कभी मिले हैं रानी मुखर्जी से? गांव-घर में ऐसी लडकियों को मुंहफट कहते हैं। उम्र के साथ वह अब थोडी शालीन और औपचारिक हो ग

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : बहुरुपिया का माडर्न अवतार आमिर खान

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चाचा नासिर खान ने पूत के पांव पालने में ही देख लिए होंगे, तभी तो यादों की बारात में उन्होंने अपने बेटे मंसूर खान के बजाय आमिर खान को पर्दे पर पेश किया। बाद में उसी आमिर को उन्होंने कयामत से कयामत तक में बतौर हीरो हिंदी दर्शकों को भेंट किया। इस फिल्म के डायरेक्टर मंसूर खान थे। पहली फिल्म के लिए चुने जाने का भी एक किस्सा है। आमिर कॉलेज में थे। शौक था कि नाटकों में काम करें, लेकिन किसी भी डायरेक्टर को वे इस योग्य नहीं लगते थे। विफलता की कसक आखिरकार महेन्द्र जोशी ने उन्हें मराठी नाटक के एक समूह दृश्य के लिए चुना और मिन्नत करने पर एक पंक्ति का संवाद भी दे दिया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं दोस्तों के साथ सबसे पहले रिहर्सल पर पहुंचता था और सबके जाने के बाद निकलता था। हम रोज रिहर्सल करते थे। इसी बीच शिव सेना ने एक दिन मुंबई बंद का आह्वान किया। अम्मी ने उस दिन घर से निकलने नहीं दिया। अगले दिन रिहर्सल पर जवाबतलब हुआ। मेरे जवाब से असंतुष्ट होकर महेन्द्र जोशी ने मुझे नाटक से निकाल दिया। मैं रोनी सूरत लिए बाहर आ गया। बाहर बैठा बिसूर रहा था कि मेरा दोस्त निरंजन थाडे आया। उसने पूछा, क्या कर रहे

ऑन स्‍क्रीन,ऑफ स्‍क्रीन : एक्टिंग की दीवानी प्रियंका चोपड़ा

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-अजय ब्रह्मात्‍मज साल 2002.. मुंबई का फिल्मालय स्टूडियो.. सेट की तेज रोशनी और हडबडी-गडबडी के बीच चमकते दो नर्वस चेहरे.. मिस व‌र्ल्ड प्रियंका चोपडा और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता..। सुनील दर्शन ने सत्र 2000 की सौंदर्य प्रतियोगिताओं की तीन में से दो विनर्स को हीरोइन के तौर पर साइन कर लिया था। उस दोपहर प्रियंका का साहस बढाने के लिए सेट पर मां मधु और पिता अशोक चोपडा थे। मां के सपनों को बेटी साकार कर रही थी। वह फिल्म की हीरोइन थी। मां-पिता के लिए बेटी की उपलब्धि मिस व‌र्ल्ड से भी बडी थी। समझदारी भरे निर्णय मां का सपना और विश्वास ही था कि वह अपना मेडिकल प्रोफेशन छोडकर बेटी के कारण मुंबई आ गई। बेटी ने भी उन्हें निराश नहीं किया। वह छलांगें मारती गई। राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी प्रियंका लोकप्रियता और गंभीरता के बीच संतुलन बना कर चल रही हैं। वह जानती हैं कि समय के हिसाब से चलना जरूरी है। किसी ऐक्टर की अस्वीकृत फिल्मों की जानकारी हो तो उसके करियर का आकलन किया जा सकता है। एक उदाहरण दूं। प्रियंका ने अभिषेक बच्चन के साथ ब्लफ मास्टर की, उमराव जान छोड दी, फिर द्रोण की। मधुर

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : कामयाबी के साथ अभिषेक बच्चन की कदमताल नहीं बैठ पाई है

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-अजय ब्रह्मात्‍मज रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम की सीमित कामयाबी ने अभिषेक बच्चन की लोकप्रियता का दम उखडने से बचा लिया। फिल्म ट्रेड में कहा जा रहा था कि यदि फिल्म न चली तो अभिषेक का करियर ग्राफ गिरेगा। हर शुक्रवार को फिल्म रिलीज होने के साथ ही सितारों के लिए जरूरी होता है कि वे लगातार या थोडे-थोडे अंतराल पर अपनी सफलता से साबित करते रहें कि वे दर्शकों की पसंद पर अभी बने हुए हैं। दर्शकों की पसंद मापने का कोई अचूक पैमाना नहीं है। लेकिन माना जाता है कि जब किसी सितारे की मांग घटती है तो उसकी फिल्मों व विज्ञापनों की संख्या भी कम होने लगती है। इस लिहाज से अभिषेक अभी बाजार के पॉपुलर उत्पाद हैं। आए दिन उनके विज्ञापनों के नए संस्करण टीवी पर नजर आते हैं। पत्र-पत्रिकाओं के कवर पर उनकी तस्वीरें छपती हैं। अभी वे प्लेयर्स की शूटिंग के लिए रूस गए हैं। वहां से लौटने के बाद रोहित शेट्टी के निर्देशन में बन रही फिल्म बोल बचन शुरू होगी। इसमें उनके साथ अजय देवगन होंगे। फिर धूम-3 की अभी से चर्चा है, क्योंकि एसीपी जय दीक्षित को इस बार धूम-3 में आमिर खान को पकडना है। मुमकिन है कि अभिषेक के करियर की श्रद्धां

कुछ तो बात है इस खान में

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-अजय ब्रह्मात्‍मज अपनी हर फिल्म में दोनों हाथों को फैलाकर जब शाहरुख खान जुंबिश लेते हैं तो लगता है कि वे पूरी दुनिया को अपने अंकवार में भर लेना चाहते हैं। उनकी यह अदा सभी को भाती है। शाहरुख को भी पता है कि दर्शक उनकी इस भावमुद्रा का इंतजार करते हैं और उनके हाथों के फैलने के साथ सिनेमाघर सीटियों और सिसकारियों से गूंजने लगते हैं। यही कारण है कि हर विधा, विषय, भाव और पीरियड की फिल्मों में शाहरुख इसे दोहराने से नहीं हिचकते। ऐसी भावमुद्राओं की वजह से ही उनके आलोचक कहते हैं कि शाहरुख अपनी हर फिल्म में शाहरुख ही रहते हैं। मजेदार तथ्य यह है कि वे आलोचकों के इस आरोप से इत्तफाक रखते हैं। वे कहते हैं, मेरे प्रशंसक मेरी फिल्मों में मुझे देखने आते हैं। मैं उन्हें किसी और रूप और अंदाज से निराश नहीं कर सकता। इस तर्क के साथ वे यह जोडना नहीं भूलते कि मैंने फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, अशोक, स्वदेस, पहेली और चक दे जैसी फिल्में भी की हैं। इन सारी फिल्मों में मैं बिलकुल अलग था। छोटे पर्दे का फौजी अलग तो हैं शाहरुख। दूरदर्शन के दिनों में फौजी और सर्कस जैसे धारावाहिकों से ही उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिल गई थी।