Posts

Showing posts with the label प्रकाश झा

फिल्‍म समीक्षा : जय गंगाजल

Image
देसी मिजाज और भाषा
-अजय ब्रह्मात्‍मज हिदी सिनेमा के फिल्‍मकार अभी ऐसी चुनौतियों के दौर में फिल्‍में बना रहे हैं कि उन्‍हें अब काल्‍पनिक कहानियों में भी शहरों और किरदारों के नामों की कल्‍पना करनी पड़ेगी। यह सावधानी बरतनी होगी कि निगेटिव छवि के किरदार और शहरों के नाम किसी वास्‍तविक नाम से ना मिलते हों। ‘जय गंगाजल’ में बांकीपुर को लेकर विवाद रहा कि इस नाम का बिहार में विधान सभा क्षेत्र है। चूंकि फिल्‍म के विधायक बांकीपुर के हैं,इसलिए दर्शकों में संदेश जाएगा कि वहां के वर्त्‍तमान विधायक भी भ्रष्‍ट हैं। कल को फिल्‍म के किरदार भोलानाथ सिंह यानी बीएन सिंह नाम का कोई पुलिस अधिकारी भी आपत्ति जता सकता है कि इस फिल्‍म से मेरी बदनामी होगी। भविष्‍य अब खल और निगेटिव किरदारों के नाम दूधिया कुमार और बर्तन सिंह होंगे। शहरों के नाम भागलगढ़ और पतलूनपुर होंगे। ताकि कोई विवाद न हो। बहरहाल,प्रकाश झा की ‘जय गंगाजल’ मघ्‍य प्रांत के एक क्षेत्र की कहानी है,जहां आईपीएस अधिकारी आभा माथुर की नियुक्ति होती है। मुख्‍यमंत्री की पसंद से उन्‍हें वहां भेजा जाता है। आभा माथुर को मालूम है कि उनके क्षेत्र में सब कुछ ठीक नही…

एक्टिंग का अपना अलग मजा है - प्रकाश झा

Image

छोटी फिल्में भी देती हैं बिजनेस : प्रकाश झा

Image
-अजय ब्रह्मात्‍मज  प्रकाश झा इन दिनों छोटी फिल्मों के मजबूत पैराकार हैं। उनके बैनर  की ‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’ आ रही है। कुछ और फिल्में निर्माणाधीन हैं।
-‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’ को अपने बैनर की छांव प्रदान करने को हम आप की तीसरी इनिंग कहें? पहली बार आप ने फिल्में बनाईं, फिर बिहार गए। वापस आकर फिर ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ जैसी बड़ी फिल्में बनाईं, जो दूसरी इनिंग थी। अब नए जमाने के संग कदम मिलाकर आप ‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’ जैसी फिल्मों को सपोर्ट कर रहे हैं?
तीसरी इनिंग तो नहीं, यह मेरा एडिशनल वर्क है, क्योंकि अभी दूसरी इनिंग तो खत्म नहीं हुई। ‘गंगाजल’ या ‘सत्याग्रह’ जैसी फिल्में तो बन ही रही हैं। पॉलिटिकल टॉपिक को टच करना तो मुझे भाता ही है।  नया सब्जेक्ट ‘सत्संग’ है। उस पर भी काम चल रहा है, लेकिन मुझे लगा कि जिस तरह से हमारी फिल्मों का विस्तार हुआ है और जिस तरह हमारी ऑडिएंस निकल कर सिनेमा देखने आने लगी है। उसका खयाल रखना चाहिए। उससे भी बड़ी बात है कि यंग, नया टैलेंट चाहे एक्टिंग में हो, रायटिंग में हो, हर जगह उनकी बड़ी खेप आ रही है। उन्हें महत्व दिया जाना चाहिए। पांच-सात साल पहले ऐसा नहीं था। …

यूट्यूब हिंदी टाकीज पर सत्‍याग्रह का रिव्‍यू

Image
सत्‍याग्रह का रिव्‍यू द हिंदी टाकीज पर...

फिल्‍म समीक्षा : सत्‍याग्रह

Image
-अजय ब्रह्मात्‍मज                    इस फिल्म के शीर्षक गीत में स्वर और ध्वनि के मेल से उच्चारित 'सत्याग्रह' का प्रभाव फिल्म के चित्रण में भी उतर जाता तो यह 2013 की उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक फिल्म हो जाती। प्रकाश झा की फिल्मों में सामाजिक संदर्भ दूसरे फिल्मकारों से बेहतर और सटीक होता है। इस बार उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है। प्रशासन के भ्रष्टाचार के खिलाफ द्वारिका आनंद की मुहिम इस फिल्म के धुरी है। बाकी किरदार इसी धुरी से परिचालित होते हैं।               द्वारिका आनंद ईमानदार व्यक्ति हैं। अध्यापन से सेवानिवृत हो चुके द्वारिका आनंद का बेटा भी ईमानदार इंजीनियर है। बेटे का दोस्त मानव देश में आई आर्थिक उदारता के बाद का उद्यमी है। अपने बिजनेस के विस्तार के लिए वह कोई भी तरकीब अपना सकता है। द्वारिका और मानव के बीच झड़प भी होती है। फिल्म की कहानी द्वारिका आनंद के बेटे की मृत्यु से आरंभ होती है। उनकी मृत्यु पर राज्य के गृहमंत्री द्वारा 25 लाख रुपए के मुआवजे की रकम हासिल करने में हुई दिक्कतों से द्वारिका प्रशासन को थप्पड़ मारते हैं। इस अपराध में …

हमें भी महत्ता मिले-मनोज बाजपेयी

Image
-अजय ब्रह्मात्मज

-‘सत्या’ से लेकर ‘सत्याग्रह’ तक के सफर में अभिनेता मनोज बाजपेयी के क्या आग्रह रहे?
0 सत्य और न्याय का आग्रह ही करता रहा हूं। हमलोगों की...मेरी हो चाहे इरफान की हो या नसीर की हो, ओमपुरी की हो हम सब की लड़ाई एक ही रही है। अभिनय में प्रशिक्षित अभिनेताओं को बराबर मौका मिले। अपने काम के जरिए हमलोगों ने यही कोशिश की है। लगातार कोशिशों के बावजूद अभी भी सेकेंड क्लास सीटिजन हंै हम सभी। अनुराग, दिबाकर, तिग्मांशु के आने के बाद हमरा महत्व बढ़ा है, लेकिन अभी भी मुझे लगता है कि दूर से आए लोगों की महत्ता या थिएटर से आए लोगों की महत्ता पर जोर देना चाहिए। अगर कमर्शियल हिट्स भी  सबसे हमारे हिस्से में आ रहे हैं तो महत्व देने में क्या जाता है? उचित स्थान देने में क्या जाता है? यही आग्रह हमेशा से रहा है। यह आग्रह हम अपने काम के जरिए करते रहे हैं।
- उचित श्रेय नहीं मिल पाने के लिए कौन जिम्मेदार है? इंडस्ट्री, मीडिया और दर्शक तीनों में कौन ज्यादा जिम्मेदार है?
0 सब जिम्मेदार हैं। थोड़े-थोड़े सब जिम्मेदार हैं। इंडस्ट्री पुराने पैमाने से ही जांचती है।
- इंडस्ट्री आपको इनसाइडर मानती है या आउटसाइड…

‘सत्याग्रह’ में पॉलिटिकल जर्नलिस्ट हूं मैं-करीना कपूर

Image
-अजय ब्रह्मात्मज
    आम धारणा है कि शादी के बाद फिल्म अभिनेत्रियों को नई फिल्मों के ऑफर नहीं मिलते। उन्हें घर पर रहना पड़ता है। कुछ सालों पहले की इस सच्चाई को हाल-फिलहाल में शादीशुदा हुई अभिनेत्रियों ने झुठला दिया है। विद्या बालन ‘घनचक्कर’ पूरी करने के बाद ‘शादी के साइड इफेक्टस’ की शूटिंग कर रही हैं। हाल ही में निर्णायक मंडल के सदस्य के तौर पर उन्होंने कान फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लिया। करीना कपूर भी व्यस्त हैं। उन्होंने प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ की शूटिंग पूरी कर ली है। फिलहाल वह धर्मा प्रोडक्शन की ‘गोरी तेरे प्यार में’ की शूटिंग कर रही हैं। कमर्शियल के साथ-साथ उद्देश्यपरक और सामाजिक फिल्मों में करीना कपूर की मौजूदगी से हम परिचित हैं। उन्होंने ‘चमेली’, ‘देव’, ‘ओमकारा’ और ‘हीराइन’ जैसी फिल्मों में काम किया है। प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ इसी तरह की उनकी अगली फिल्म है। इस फिल्म में वह एक बार फिर अजय देवगन के साथ दिखेंगी। - प्रकाश झा के साथ काम करने का कैसा अनुभव रहा? 0 अच्छा रहा। मैंने सभी एक्टिव डायरेक्टर के साथ काम किया है। कुछ ऐसा संयोग रहा कि प्रकाश झा के साथ कभी काम करने का मौका नह…

फिल्‍म रिव्‍यू : चक्रव्‍यूह

Image
-अजय ब्रह्मात्मज  पैरेलल सिनेमा से उभरे फिल्मकारों में कुछ चूक गए और कुछ छूट गए। अभी तक सक्रिय चंद फिल्मकारों में एक प्रकाश झा हैं। अपनी दूसरी पारी शुरू करते समय 'बंदिश' और 'मृत्युदंड' से उन्हें ऐसे सबक मिले कि उन्होंने राह बदल ली। सामाजिकता, यथार्थ और मुद्दों से उन्होंने मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने शैली और नैरेटिव में बदलाव किया। अपनी कहानी के लिए उन्होंने लोकप्रिय स्टारों को चुना। अजय देवगन के साथ 'गंगाजल' और 'अपहरण' बनाने तक वे गंभीर समीक्षकों के प्रिय बने रहे, क्योंकि अजय देवगन कथित लोकप्रिय स्टार नहीं थे। फिर आई 'राजनीति.' इसमें रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और कट्रीना कैफ के शामिल होते ही उनके प्रति नजरिया बदला। 'आरक्षण' ने बदले नजरिए को और मजबूत किया। स्वयं प्रकाश झा भी पैरेलल सिनेमा और उसके कथ्य पर बातें करने में अधिक रुचि नहीं लेते। अब आई है 'चक्रव्यूह'। 'चक्रव्यूह' में देश में तेजी से बढ़ रहे अदम्य राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन नक्सलवाद पृष्ठभूमि में है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में कुछ किरदार रचे गए हैं। उन क…

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह

Image
- दुर्गेश सिंह

निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत:


अभय देओल
मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से अलग हो जात…

आरक्षण की दुधारी तलवार-प्रकाश झा

Image
यह लेख आज दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्‍ठ पर प्रकाशित हुआ है।आप इस पर प्रतिक्रया करें और अपनी राय दें।फिल्‍म देखने के पहले या बाद में...जैसी आप की मर्जी....
एक अरब से अधिक आबादी वाले देश भारत में विश्व के किसी भी देश से अधिक नौजवान हैं। लगता तो ऐसा है जैसे हम देश के भविष्य के बारे में नहीं सोच रहे हैं। युवा ही देश का भविष्य हैं। अगर हम युवाओं को शिक्षित नहीं करेंगे तो हम देश का भविष्य बर्बाद कर देंगे। इसके अलावा, नौकरियों को लेकर अंधी दौड़ जारी है। उत्साहवर्धक बात यह है कि अब रोजगार पाने के लिए प्रोफेशनल कोर्सो पर ध्यान दिया जा रहा है, किंतु इसके बावजूद स्

आरक्षण ने बदल दिया है ताना-बाना-प्रकाश झा

Image
सामाजिक मुद्दों पर राजनीतिक फिल्म बनाने के लिए विख्यात प्रकाश झा की नई फिल्म 'आरक्षण' 12 अगस्त को रिलीज होगी। उनसे बातचीत के अंश..आरक्षण के बारे में क्या कहेंगे, खासकर फिल्म के संदर्भ में.. देश में इस मुद्दे पर बहस चलती रही है और पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं?यह एक सत्य है, जिसे समाज को पूरी संवेदना के साथ अंगीकार करना होगा। 20वीं सदी के आखिरी दो दशकों में आरक्षित समाज के प्रभाव से देश के सामाजिक समीकरण और राजनीति में बदलाव आया है। इस दौर में एक तरफ देश विकसित हो रहा था और दूसरी तरफ शिक्षा का व्यवसायीकरण आरंभ हो चुका था।शिक्षा के व्यवसायीकरण को आरक्षण से जोड़ना क्या उचित है?नौकरी से पहले शिक्षण संस्थानों में ही आरक्षण का असर हुआ है। अब लोग वैकल्पिक शिक्षा पर इसलिए ध्यान दे रहे हैं कि उन्हें ऐसी नौकरियों के लिए कोशिश ही न करनी पड़े, जिसमें आरक्षण की मुश्किल आए। पूरे देश में मैनेजमेंट स्कूल खुल रहे हैं। आईआईएम से लेकर छोटे शहरों तक में मैनेजमेंट स्कूल चल रहे है। शिक्षा जगत से गुरु-शिष्य की परंपरा खत्म हो चुकी है। अब शिष्य क्लाइंट है और गुरु सर्विस प्रोवाइडर।आरक्षण के प्र…