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रोज़ाना : छठ की लोकप्रियता के बावजूद

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रोज़ाना छठ की लोकप्रियता के बावजूद -अजय ब्रह्मात्‍मज बिहार,झारखंड और पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में छठ एक सांस्‍कृतिक और सामाजिक त्‍योहार के रूप में मनाया जाता है। यह धार्मिक अनुष्‍टान से अधिक सांस्‍कृतिक और पारिवारिक अनुष्‍ठान है। इस आस्‍था पर्व की महिमा निराली है। इसमें किसी पुरोहित की जरूरत नहीं होती। अमीर-गरीब और समाज के सभी तबकों में समान रूप से प्रचलित इस त्‍योहार में घाट पर सभी बराबर होते हैं। कहावत है कि उगते सूर्य को सभी प्रणाम करते हैं। छठ में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्‍य चढ़ाया जाता है और फिर उगते सूर्य की पूजा के साथ यह पर्व समाप्‍त होता है। इधर इंटरनेट की सुविधा और प्रसार के बाद छठ के अवसर पर अनेक म्‍सूजिक वीडियों और गीत जारी किए गए हैं। इनमें नितिन चंद्रा और श्रुति वर्मा निर्देशित म्‍यूजिक वीडियो सुदर और भावपूर्ण हैं। उनमें एक कहानी भी है। हालांकि भोजपुरी गीतों में प्रचलित अश्‍लीलता से छठ गीत भी अछूते नहीं रह गए हैं,लेकिन आज भी विंध्‍यवासिनी देवी और शारदा सिन्‍हा के छठ गीतों का मान-सम्‍मान बना हुआ है। सभी घाटों पर इनके गीत बजते सुनाई पड़ते हैं। आश्‍चर्य ही है कि हिंदी फिल्‍मों में …

रोज़ाना : अलहदा हैं दर्शक बिहार-झारखंड के

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रोज़ाना अलहदा हैं दर्शक बिहार-झारखंड के -अजय ब्रह्मात्‍मज एक ट्रेड मैग्‍जीन की ताजा रिपोर्ट में पिछले नौ सालों में देश की भिन्‍न टेरिटरी में सर्वाधिक पॉपुलर फिल्‍म स्‍टारों की लिस्‍ट छपी है। यह लिस्‍ट अधिकतम बॉक्‍स आफिस कलेक्‍शन के आधार पर तैयार की गई है। इस लिस्‍ट में आमिर खान देश की सभी अैटिरी में नंबर वन हैं एक बिहार-झारखंड छोड़ कर। बिहार और झारखंड के दर्शकों की पसंद और सराहना अलहदा है। ट्रेड पंडित बताते हैं कि बिहार और झारखंड में आज भी सनी देओन,मिथुन चक्रवर्ती और सुनील शेट्टी की फिल्‍में दूसरे स्‍टारों की तुलना में ज्‍यादा पसंद की जाती हैं। छोटे शहरों और कस्‍बों के सिनेमाघरों में जब ताजा रिलीज सोमवार तक दम तोड़ने लगती हैं तो मैनेजर क्षेत्रीय वितरकों की मदद से किसी ऐसे स्‍टार की फिल्‍म रीरन में चला देते हैं। दो उदाहरण याद आ रहे हैं इस अलहदा रुचि के। अभी अक्षय कुमार देश के लोकप्रिय स्‍टारों की अगली कतार में हैं। उनकी हर फिल्‍म अच्‍छा व्‍यवसाय कर रही है। 1999 के पहले उनके करिअर में उतार आया था। तभी सुनील दर्शक के निर्देशन में उनकी फिल्‍म ‘जानवर’ आई थी। यह फिल्‍म तब बिहार में चली थी और खूब…

रोज़ाना : लौटी रौनक सिनेमाघरों में

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रोज़ाना लौटी रौनक सिनेमाघरों में -अजय ब्रह्मात्‍मज अपेक्षा के मुताबि‍क ‘गोलमाल अगेन’ देखने दर्शक सिनमाघरों में उमड़ रहे हैं। हालांकि फिल्‍म को अच्‍छा एडवासं नहीं लगा था,लेकिन पहले ही दिन सिनेमाघरों में 70 प्रतिशत दर्शकों का आना बताता है कि यह फिल्‍म चलेगी। दर्शक तो टूट पड़ते हैं। उन्‍हें मनोरंजन मिले तो वे परवाह नहीं करते कि फिल्‍म में कोई नया कलाकार है या बासी कढ़ी ही परोसी जा रही है। ‘गोलमान अगेन’ की तुलना में ‘सीक्रेट सुपरस्‍टार’ को अधिक दर्शक नहीं मिले हैं। 35-40 प्रतिशत दर्शकों के सहारे बड़ी उम्‍मीद नहीं की जा सकती। फिर भी ट्रेड पंडित मान रहे हैं कि ‘सीक्रेट सुपरस्‍टार’ का जिस तरह से समीक्षकों की तारीफ मिली है,उससे लगता है कि दर्शक भी आएंगे। ‘सीक्रेट सुपरस्‍टार’ अलग तरह की फिल्‍म है। बजट में छोटी है। 15 साल की लड़ी जायरा वसीम फिल्‍म की हीरोइन है। ट्रेड पंडित मानते हैं कि यह फिल्‍म सिनेमाघरों में टिकी रहेगी। दोनों के प्रति दर्शकों के उत्‍साह से सिनेमाघरों में रौनक और बाक्‍स आफिस पर खनक लौटी है। पारंपरिक तरीके से दीवाली से साल के अंत तक के शुक्रवार हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लिए फायदेम…

रोज़ाना : कुंदन शाह की याद

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रोज़ाना कुंदन शाह की याद -अजय ब्रह्मात्‍मज मुंबई में चल रहे मामी फिल्‍म फेस्टिवल में कुंदन शाह निर्देशित ‘जाने भी दो यारो’ का खास शो तय था। यह भी सोचा गया था कि इसे ओम पुरी की श्रद्धांजलि के तौर दिखाया जाएगा। फिल्‍म के बाद निर्देशक कुंदन शाह और फिल्‍म से जुड़े सुधीर मिश्रा,विधु विनोद चापेड़ा और सतीश कौशिक आदि ओम पुरी से जुड़ी यादें शेयर करेंगे। वे ‘जाने भी दो यारो’ के बारे में भी बातें करेंगे। इस बीच 7 अक्‍टूबर को कुंदन शाह का आकस्मिक निधन हो गया। तय कार्यक्रम के अनुसार शो हुआ। भीड़ उमड़ी। फिल्‍म के बाद का सेशन ओम पुरी के साथ कुंदन शाह को भी समर्पित किया गया। ज्‍यादातर बातचीत कुंदन शाह को ही लेकर हुई। एक ही रय थी कि कुंदन शाह मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कार्यप्रणाली में मिसफिट थे। वे जैसी फिल्‍में करना चाहते थे,उसके लिए उपयुक्‍त निर्माता खोज पाना असंभव हो गया है। कुछ बात तो है कि उनकी ‘जाने भी दो यारो’ 34 सालों के बाद आज भी प्रासंगिक लगती है। आज भी कहीं पुल टूटता है तो तरनेजा-आहूजा जैसे बिजनेसमैन और श्रीवास्‍तव जैसे अधिकारियों का नाम सामने आता है। और आज भी कोई सुधीर व विनोद बहल का बकरा …

रोज़ाना - पचहत्‍तर के अमिताभ बच्‍चन

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दरअसल... 75 के अमिताभबच्‍चन -अजय ब्रह्मात्‍मज अगले शुक्रवार से पहले अमिताभ बच्‍चन 75 के हो जाएंगे। उनका जन्‍म 11 अक्‍टूबर 1942 को हुआ था। दो दिनों पहले उभरते और पहचान बनाते एक्‍टर इश्‍त्‍याक खान से मुलाकात हुई। उन्‍होंने पिछले दिन अमिताभ बच्‍चन के साथ एक ऐड की शूटिंग की थी। जिज्ञासावश मैंने पूछा कि कैसा अनुभव रहा और उनके बारे में क्‍या कहना चाहेंगे? इश्‍त्‍याक ने तपाक से जवाब दिया,’ इस उम्र में इतना काम कर चुकने के बाद भी सेट पर उनकी तत्‍परता चकित करती है। उन्‍होंने क्‍या-क्‍या नहीं कर लिया है,लेकिन उस ऐड में भी उनकी संलग्‍नता से लग रहा था कि वह उनका पहला काम हो। वही उत्‍साह और समर्पण...हम जैसे एक्‍टर अनेक कारणों से अपनी एकाग्रता खो देते हैं। अमिताभ बच्‍चन 75 के उम्र में किसी प्रकार की चूक से बचना चाहते हैं।‘ अमिताभ बच्‍चन की इस खासियत को सभी दोहराते हैं। सेट पर वे खाने-पीने,आराम करने,मेकअप करने और जरूरी एक्‍सरसाइज करने के अलावा अपने वैन में नहीं बैठते। उनके हाथों में स्क्रिप्‍ट रहती है। वे अपनी पंक्तियों को दोहराते रहते हैं। कोएक्‍टर के साथ रिहर्सल करने में रुचि रखते हैं। निर्देशकों के न…

रोज़ाना : निर्देशक बनने की ललक

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रोज़ाना निर्देशक बनने की ललक -अजय ब्रह्मात्‍मज फिल्‍मों में निर्देशक को ‘कैप्‍टन ऑफ द शिप’ कहते हैं। निर्देशक की सोच को ही फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी विभागों के प्रधान अपनाते हैं। वे उसमें अपनी दक्षता और योग्‍यता के अनुसार जोड़ते हैं। उनकी सामूहिक मेहनत से ही निर्देशक की सोच साकार होकर फिल्‍म के रूप में सामने आती है। निर्देशक की सोच नियामक भूमिका निभाती है। फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी कलाकार और तकनीशियन एक न एक दिन निर्देशक बनने का सपना रखते हैं। उन सभी में यह ललक बनी रहती है। इन दिनों यह ललक कुछ ज्‍यादा ही दिख रही है। पहले ज्‍यादातर व्‍यक्तियों की दिशा और सीमा तय रहती थी। वे सभी अपनी फील्‍ड में महारथ हासिल कर उसके उस्‍ताद बने रहते थे। हां,तब भी कुछ क्रिएटिव निर्देशक बनते थे। गौर करे तो पाएंगे कि उन सभी को कुछ खास कहना होता था। कोई ऐसी फिल्‍म बनानी होती थी,जो चलन में ना हो। बाकी सभी अपनी फील्‍ड में ध्‍यान देते थे। पसंदीदा निर्देशक के साथ आजीवन काम करते रहते थे। महबूब खा,बिमल राय,राज कपूर और बीआर चोपड़ा जैसे दिग्‍गजों की टीम अंत-अंत तक साथ में का म करती रही। अभी किसी भी प्रोडक्‍शन हाउस म…

रोज़ाना : खलनायक बना प्रेमी

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रोज़ाना खलनायक बना प्रेमी -अजय ब्रह्मात्‍मज रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण का प्रेम छिपा नहीं है। दोनों फिल्‍मी पार्टियों और अंतरंग मित्रों के इवेंट में एक साथ नजर आते हैं। वे अपनी अंतरंगता जाहिर करने में भी नहीं झिझकते। दीपिका पादुकोण ऐसे अवसरों पर शांत और सौम्‍य दिखती हैं,जबकि रणवीर सिंह अपनी छवि के अनुरूप उत्‍कट और उत्‍साही प्रेमी के रूप में आकर्षित करते हैं। दोनों अपने करिअर के उठान पर हैं। वे सधी गति से आगे बढ़ रहे हैं। संजय लीला भंयसाली की ‘पद्मावती’ में वे तीसरी बार एक साथ नजर आएंगे। फर्क यह रहेगा कि इस बार प्रेमी के आवेश में होने के बावजूद वे खलनायक के रोल में रहेंगे। संजय लीला भंसाली की ही ‘रामलीला-गोलियां की रासलीला’ और ‘बाजीराव मस्‍तानी’ में हम उन्‍हें उद्दाम प्रेमी के रूप में देख चुके हैं। दोनों ही फिल्‍मों में उनकी जोड़ी पसंद की गई। देखा गया है कि पर्देपर नायक-नायिका की भूमिका निभा रहे निजी जीवन में एक-दूसरे के करीब या प्रेमी हों तो उनके बीच की केमिस्‍ट्री फिल्‍म के दृश्‍यों में बिखरी दिखती है। ऐसी अनेक जोडि़यों की फिल्‍मों के नाम गिनाए जा सकते हैं। निश्चित ही अभिनेता-अभिनेत्री…

रोज़ाना : वरुण धवन की भाषा और आवाज

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रोज़ाना वरुण धवन की भाषा और आवाज -अजय ब्रह्मात्‍मज फिलहाल अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में वरुण धवन सबसे आगे निकलते नजर आ रहे हैं। उनकी पिछली फिल्‍म ‘जुड़वां 2’ ने जबरदस्‍त बिजनेस किया है। सोमवार तक के चार दिनों में इस फिल्‍म ने 75 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर वरुण धवन के स्‍टारडम को ठोस आधार दे दिया है। 2012 में आई ‘स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर’ से अभी तक के पांच सालों में वरुण धवन ने वैरायटी फिल्‍में दी हैं। उनकी फिल्‍में सफल भी हो रही हैं। इसी पांच साल में उन्‍होंने एक फ्रेंचाइजी ‘....दुल्‍हनिया’ फिल्‍म भी कर ली है। जल्‍दी ही वे शुजित समरकार और सशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों में भी नजर आएंगे। कह सकते हैं कि वे इन दिनों बड़े बैनरों और बेहतरीन डायरेक्‍टर के साथ फिल्‍में कर रहे हैं। पिछले हफ्ते आई फिल्‍म में हम ने उन्‍हें सलमान खान और गोविंदा के मिक्‍स अवतार में देखा। गौर करें तो उनके पिता डेविड धवन ने गोविंदा और सलमान खान के साथ हिंदी फिलमों की कामेडी का नई दिशा दी थी। उसमें एक नयापन तो था। और फिर दोनों सिद्धहस्‍त कलाकारों की कॉमिक टाइमिंग और द्विअर्थी संवादों के खास दर्शक थे।वैस दर्शक आज भी मौजूद हैं। हा…

रोज़ाना : नसीरुद्दीन शाह का नजरिया

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रोज़ाना नसीरुद्दीन शाह का नजरिया -अजय ब्रह्मात्‍मज
कई बार नसीरूद्दीन शाह का इंटरव्‍यू पढ़ते और सुनते समय ऐसा लगता है कि एक असाधारण एक्‍टर औसत सी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में फंस गया है। वह बेमन से सारे काम कर रहा है। हिदी फिल्‍मों के साथ उनका रिश्‍ता सहज नहीं है। उन्‍हें फिल्‍म इंडस्‍ट्री की अधिकांश बातें और रवायतें अच्‍छी नहीं लगतीं। वे मौका मिलते ही शिकायती ल‍हजे में गलतियां गिनाने और कमियां बताने लगते हैं। उन्‍हें पढ़ते-सुनते समय एहसास जागता है कि आखि सब कुछ इतना गलत और कमतर है तो वे यहां क्‍यों फंसे हुए हैं? क्‍यों साधारणऔर कई बार घटिया भूमिकाओंकी फिल्‍में करते हैं?
आठवें दशक मेंश्‍याम बेनेगल केनेतृत्‍व में जारी और प्रशंसित पैरेलल सिनेमा हिंदी फिल्‍मों केइतिहास का उल्‍लेखनीयहिस्‍सा रहा है। इसदौर में अनके यथार्थवादी फिल्‍मकार आए,जिन्‍होंने मेनस्‍ट्रीम सिनेमा केकमर्शियल स्‍टारों के पैरेलल दमदार कलाकारों को लेकर भावपूर्ण और सारगर्भित फिल्‍में बनाईं। नसीरूद्दीन शाह,शबाना आजमी,स्मिता पाटिल और ओम पुरी उस दौर के प्रमुख कलाकार रहे। उनकी सफलता और पहचान ने थिएटर में सक्रिय कलाकारों को फिल्‍मों मेंआने …

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज

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रोज़ाना मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुं…

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी

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रोज़ाना मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुं…

रोज़ाना : संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी

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रोज़ाना संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी -अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में यह पुराना चलन है। कोई भी लोकप्रिय स्‍टार किसी वजह से कुछ सालों के लिए सक्रिय न रहे तो उसकी वापसी का इंतजार होने लगता है। अभिनेत्रियों के मामले में उनकी शादी के बाद की फिल्‍म का इंतजार रहता है। मामला करीना कपूर का हो तो उनके प्रसव की बाद की फिल्‍म से वापसी की चर्चा चल रही है। सभी को उनकी ‘वीरे दी वेडिंग’ का इंतजार है। इस इंतजार में फिल्‍म से जुड़ी सोनम कपूर गौण हो गई हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभिनेताओं की उम्र लंबी होती है। उनके करिअर में एक अंतराल आता है,जब वे अपने करिअर की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हीरो के तौर पर नापसंद किए जाने लगते हैं तो उनकी वापसी  वे किरदार बदल कर लौटते हैं। अमिताभ बच्‍चन के साथ ऐसा हो चुका है। एक समय था जब बतौर हीरो दर्शक्‍उन्‍हें स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे। लेखक और निर्देशक उनके लिए उपयुक्‍त फिल्‍म लिख और सोच नहीं पा रहे थे। उस संक्रांति दौर से निकलने के बाद आज अमिताभ बच्‍चन के लिए खास स्‍पेस बन चुका है। उनके लिए अलग से फिल्‍में लिखी जा रही है। ऐसा सौभाग्‍य और सुअवसर सभी अभिनेताओं को …

रोज़ाना : जितनी बची है,बचा लो विरासत

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रोज़ाना जितनी बची है,बचा लो विरासत -अजय ब्रह्मात्‍मज पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आरके स्‍टूडियो में भीषण आग लगी। अभी तक कोई ठोस और आधिकारिक विवरण नहीं आया है कि इस आग में क्‍या-क्‍या स्‍वाहा हो गया? स्‍वयं ऋषि कपूर ने जो ट्वीट किया,उससे यही लगता है कि राज कपूर की फिल्‍मों से जुड़ी यादें आग की चपेट में आ गईं। उन्‍होंने ट्वीट किया था कि स्‍टूडियो तो फिर से बन जाएगा,लेकिन आरके फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों से जुड़ी स्‍मृतियों और कॉस्‍ट्यूम की क्षति पूरी नहीं की जा सकती। ऋषि कपूर बिल्‍कुल ने सही लिखा। कमी यही है कि कपूर परिवार के वारिसों ने स्‍मृतियों के रख-रखाव का पुख्‍ता इंतजाम नहीं किया था। एक कमरे में सारे कॉस्‍ट्यूम आलमारियों में यों ठूंस कर रखे गए थे,ज्‍यों किसभ्‍ कस्‍बे के ड्राय क्लिनर्स की दुकान हो। हैंगर पर लदे हैंगर और उनसे लटकते कॉस्‍ट्यूम। पूछने पर तब के ज्म्म्ेिदार व्‍यक्ति ने कहा था कि कहां रखें? जगह भी तो होनी चाहिए। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री अपनी विरासत के प्रति शुरू से लापरवाह रही है। निर्माता और अभिनेता भी अपनी फिल्‍मों के दस्‍तावेज सहेजने में रुचि नहीं रखते। फिल्‍म निर्माता सक्रिय ह…

रोज़ाना - एक दूसरे के पूरक,फिर भी मायानगरी में 'पांच' हो गया 'पान्‍च'

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रोजाना
‘पांच’ हो गया ‘पान्‍च’
- अजय ब्रह्मात्मज
हिंदीदिवस के अवसर पर हिंदी सिनेमा में हिंदी की बात करना उचित है। देश में कहीं न कहीं दस पर परिचर्चा या बहस चल रही होगी। हिंदी सिनेमामें हिंदी के उपयोग,प्रयोग और दुरुपयोग पर लोगों की राय भिन्न हो सकती है,लेकिनइस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी कीबड़ी भूमिका रही है। कभी इसे हिंदुस्‍तानी कहा गया,कभी उर्दू मिश्रित हिंदी तो कभी कुछ और। इसके साथ यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हिंदी केप्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का उल्लेखनीय योगदान है। देश के अंदर औरविदेशों में हिंदी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने बोलचाल कीव्‍यावहारिक हिंदी सीखी है। हालांकि कोई भी हिंदी फिल्म यह सोचकर नहीं नहीं बनाई गई कि उससेहिंदी भाषा का प्रचार किया जाएगा, फिर भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहांअहिंदीभाषी दर्शकों ने हिंदी फिल्मों से अपनी हिंदी परिमार्जितकी। विदेशी विश्वविद्यालयों में नई पीढ़ी के शिक्षक विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने के लिए हिंदी फिल्मों का टूल के रूप मेंइस्तेमाल करते हैं। कहते हैं इससे विद्यार्थी तेजी से हिंदी सीखते हैं।
इधर हिं…

रोज़ाना : दर्शकों के दो छोर

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रोज़ाना दर्शकों के दो छोर -अजय ब्रह्मात्‍मज पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘शुभ मंगल सावधान’ और ‘बादशाहो’ के कलेक्‍शन पवर गौर करने के साथ देश के दर्शकों के दो छोरों को भी समझने की जरूरत है। पहली फिल्‍म बिल्‍कुल नए विषय पर है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे विषय वर्जित माने जाते हैं। पुरुषों के ‘जेंट्स प्राब्‍लम’ पर आनंद एल राय और आर एस प्रसन्‍ना ने खूबसूरत और प्रेरक फिल्‍म बनाई। उम्‍मीद के बावजूद निर्माता-निर्देशक आश्‍वस्‍त नहीं थे कि उनकी फिल्‍में दर्शकों के बीच स्‍वीकृत होगी। फिल्‍म चली। सीमित बजट की सीमाओं में अच्‍छी चली। खुद निर्माता-निर्देशक हैरान हैं कि उन्‍होंने ऐसे प्रतिसाद के बारे में नहीं सोचा था। उन्‍हें और दूसरे निर्माताओं को हिम्‍मत मिली है कि वे आगे अपने साहस का विस्‍तार करें। दूसरी तरफ ‘बादशाहो’ है। आठनें दशक की थीम पर लगभग उसी समय की शैली में बनी इस फिल्‍म के प्रति निर्देशक और कलाकार निश्चित थे। उन्‍हें पूरा यकीन था कि ‘बादशाहो’ दर्शकों को अच्‍छी लगेगी। समीक्षकों की भिन्‍न राय थी। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों के घिसे-पिटे फामूले का इस्‍तेमाल किया गया था। नए दौर की फिल्‍मों में दृश्‍यों मे…

रोज़ाना : मुनाफे का परसेप्‍शन

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रोज़ाना मुनाफे का परसेप्‍शन -अजय ब्रह्मात्‍मज ’बाहुबली’ या ‘दंगल’ के निर्माताओं ने तो कभी प्रेस विज्ञप्ति भेजी और न रिलीज के दिन से ढिंढोरा पीटना शुरु किया कि उनकी फिल्‍म मुनाफे में है। गौर करें तो देखेंगे कि लचर और कमजोर फिलमों के लिए निर्माता ऐसी कोशिशें करते हैं। वे रिलीज के पहले से बताने लगते हैं कि हमारी फिल्‍म फायदे में आ चुकी है। फिल्‍म के टेड सर्किल में यह सभी जानते हैं कि जैसे ही किसी निर्माता का ऐसा एसएमएस आता है,वह इस बात की गारंटी होता है कि स्‍वयं निर्माता को भी उम्‍मीद नहीं है। वे आश्‍वस्‍त हो जाते हैं कि फिल्‍म नहीं चलेगी। फेस सेविंग और अपनी धाक बनाए रखने के लिए वे फिल्‍म की लागत और उसके प्रचार और विज्ञापन में हुए खर्च को जोड़ कर एक आंकड़ा देते हैं और फिर बताते हैं कि इस-अस मद(सैटेलाइट,संगीत,ओवरसीज आदि) से इतने पैसे आ गए हैं। अब अगर पांच-दस करोड़ का भी कलेक्‍शन बाक्‍स आफिस से आ गया तो फिल्‍म फायदे में आ जाएगी। मजेदार तथ्‍य यह है कि ऐसी फिल्‍मों के कलेक्‍शन और कमाई की सचचाई जानने के बावजूद मीडिया और खुद फिल्‍म सर्किल के लोग इस झूठ को स्‍वीकार कर लेते हें। जिसकी फिल्‍म होती ह…