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Friday, September 9, 2016

फिल्‍म समीक्षा : बार बार देखो




पल पल में दशकों की यात्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नित्‍या मेहरा की फिल्‍म बार बार देखो के निर्माता करण जौहर और रितेश सिधवानी-फरहान अख्‍तर हैं। कामयाब निर्माताओं ने कुछ सोच-समझ कर ही नित्‍या मेहरा की इस फिल्‍म को हरी झंडी दी होगी। कभी इन निर्माताओं से भी बात होनी चाहिए कि उन्‍होंने क्‍या सोचा था? क्‍या फिल्‍म उनकी उम्‍मीदों पर खरी उतरी? पल पल में दशकों की यात्रा करती यह फिल्‍म धीमी गति के बावजूद झटके देती है। 2016 से 2047 तक के सफर में हम किरदारों के इमोशन और रिएक्‍शन में अधिक बदलाव नहीं देखते। हां,यह पता चलता है कि तब स्‍मार्ट फोन कैसे होंगे और गाडि़यां कैसी होंगी? दुनिया के डिजिटाइज होने के साथ सारी चीजें कैसे बदल जाएंगी? यह भविष्‍य के भारत की झलक भी देती है। इसके अलावा फिल्‍म में कलाकार,परिवेश,मकान,गाडि़यों समेत सभी चीजें साफ और खूबसूरत हैं। उनमें चमक भी है।
जय और दीया एक ही दिन पैदा होते हैं। आठ साल में दोनों की दोस्‍ती होती है। पढ़ाकू जय और कलाकार दीया अच्‍छे दोस्‍त हैं। दीया ज्‍यादा व्‍यावहारिक है। जय पढ़ाई और रिसर्च की सनक में रहता है। बड़े होने पर जय मैथ का प्रोफेसर बन जाता है और दीया आर्टिस्‍ट। दोनों के जीवन में तब मोड़ आता है,जब दीया प्रोपोज करती है। शादी के प्रस्‍ताव से घबराया जय कोई जवाब दे,इसके पहले ही उसकी चट मंगनी हो जाती है। पट शादी नहीं हो पाती...शादी के पहले जय और दीया के बीच मनमुटाव होता है। दीया कभी नहीं लौटने की बात कह चली जाती है। जय हिंदी फिल्‍मों का हीरो है। उसे शैंपेन की बोतल मिल जाती है। नशे में लुढ़कने के बाद वह सपने में भी लुढ़कता है और फिर उसकी काल्‍पनिक यात्राएं शुरू होती हैं। इन यात्राओं में ही उसके संबंधों के बिगड़ने के खयाल और मंजर हैं।
फिल्‍म अच्‍छे नोट पर आरंभ होती है। ऐसा लगता है कि नित्‍या मेहरा आज के युवा समूह में प्रचलित कमिटमेंट की समस्‍या उठाने जा रही हैं। प्रेम और दोस्‍ती को शादी तक ले जाने और उसके साथ जुड़े समर्पण से भागने की कशमकश जय और दीया के साथ भी है। जय अपने करिअर पर ध्‍यान देना चाहता है। दीया भी करिअर चाहती है,लेकिन उसकी अपनी सोच है,जिसमें घर-परिवार और पारंपरिक मर्यादाएं हैं। दिक्‍कत यह है कि लेखक-निर्देशक परस्‍पर रिश्‍तों के पहलू दिखाने में अपना पक्ष स्‍पष्‍ट तरीके से नहीं रख पाते। नतीजतन हमें जय कंफ्युज दिखता है। दीया घरेलू और पारंपरिक दायरे में नजर आती है। यह अलग बात है कि फिल्‍म के गाने गाते समय वह कट्रीन कैफ में ढल जाती है। ठ़ुमके लगाने लगती है। शारीरिक सौंदर्य दिखाने लगती है।
यकीनन,सिद्धार्थ मल्‍होत्रा और कट्रीना कैफ को फिल्‍म का कांसेप्‍ट पसंद आया होगा। इस फिल्‍म में दोनों को उम्र के अनेक पड़ाव मिलते हैं। कलाकारों को ज्‍यादा और कम उम्र की भूमिकाएं निभाने में आनंद आता है। उन्‍हें भी आया होगा,लेकिन दोनों ने बाल और मेकअप के अलावा उम्र की जरूरत के मुताबिक चाल-ढाल पर ध्‍यान नहीं दिया है। सिद्धार्थ अपने किरदार के 45 की उम्र में यों दौड़ते हैं जैसे 22 के हों। कट्रीना कैफ के बाल और उसकी गुंथाई पर मेहनत है,लेकिन बॉडी लैंग्‍वेज में कोई फर्क नहीं आता। यह दोनों कलाकारों की सीमा के साथ निर्देशक की चूक है।
यह फिल्‍म एक स्‍तर पर स्‍त्री-पुरुष के नजरियों को भी टच करती है। नायिका प्रोपोज करने की पहल करने के बावजूद सोच के स्‍तर पर पिछड़ी है। पति से उसकी उम्‍मीदें किसी घरेलू औरत जैसी ही है। पति-पत्‍नी दोनों में किसी एक की व्‍यस्‍तता और दूसरे की उम्‍मीदों में तालमेल न‍हीं बैठता तो उसका असर दांपत्‍य पर पड़ता है। भारतीय समाज में ज्‍यादातर पत्नियों को समझौते करने पड़ते हैं,लेकिन पति भी दबाव में रहते हैं। बार बार देखो जैसी फिल्‍में कुछ नया बताने की जगह बार-बार पुराने तौर-तरीकों में ले जाती हैं।
फिल्‍म के आखिर में आया काला चश्‍मा गहन प्रचार के बावजूद कुछ जोड़ नहीं पाता।
अवधि- 145 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

Friday, February 12, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फितूर



सजावट सुंदर,बुनावट कमजोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिषेक कपूर की फितूर चार्ल्‍स डिकेंस के एक सदी से पुराने उपन्‍यास ग्रेट एक्‍पेक्‍टेशंस का हिंदी फिल्‍मी रूपांतरण है। दुनिया भर में इस उपन्‍यास पर अनेक फिल्‍में बनी हैं। कहानी का सार हिंदी फिल्‍मों की अपनी कहानियों के मेल में है। एक अमीर लड़की,एक गरीब लड़का। बचपन में दोनों की मुलाकात। लड़की की अमीर हमदर्दी,लड़के की गरीब मोहब्‍बत। दोनों का बिछुड़ना। लड़की का अपनी दुनिया में रमना। लड़के की तड़प। और फिर मोहब्‍बत हासिल करने की कोशिश में दोनों की दीवानगी। समाज और दुनिया की पैदा की मुश्किलें। अभिषेक कपूर ने ऐसी कहानी को कश्‍मीर के बैकड्राप में रखा है। प्रमुख किरदारों में कट्रीना कैफ,आदित्‍य रॉय कपूर,तब्‍बू और राहुल भट्ट हैं। एक विशेष भूमिका में अजय देवगन भी हैं।
अभिषेक कपूर ने कश्‍मीर की खूबसूरत वादियों का भरपूर इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने इसे ज्‍यादातर कोहरे और नीम रोशनी में फिल्‍मांकित किया है। परिवेश के समान चरित्र भी अच्‍छी तरह प्रकाशित नहीं हैं। अभिषेक कपूर की रंग योजना में कश्‍मीर के चिनार के लाल रंग का प्रतीकात्‍मक उपयोग किया गया है। पतझड़ में कश्‍मीर के चिनार लाल हो जाते हैं। अभिषेक कपूर ने अपने किरदारों को चिनार के पत्‍तों का लाल रंग देने के साथ पतझड़ का मौसम भी दिया है। इस परिवेश और हालात में कोई भी खुश नहीं है। पूरी फिल्‍म में एक उदासी पसरी हुई है। यही वजह है कि खूबसूरत दिखने के बावजूद फिल्‍म में स्‍पंदन और सुगंध नहीं है।
अभिषेक कपूर ने फिरदौस की भूमिका कट्रीना कैफ को सौंप दी है। अपनी खूबसूरती और अपीयरेंस से वह नाच-गानों और चाल में तो भाती हैं,लेकिन जब संवाद अदायगी और भावों को व्‍यक्‍त करने की बात आती है तो वह हमेशा फिसल जाती हैं। उनकी मां हजरत की की भूमिका में तब्‍बू हैं। उनकी भाषा साफ है और भावों की अदायगी में आकर्षण है। हालांकि फिल्‍म में यह बताया जाता है कि वह बचपन में ही पढ़ाई के लिए लंदन चली गई थी,फिर भी लहते और अदायगी में कशिश तो होनी चाहिए थी। तबबू और कट्रीना कैफ के साथ के दृश्‍यों में यह फर्क और रूपष्‍ट हो जाता है। आदित्‍य रॉय कपूर नूर की भूमिका में ढलने की पूरी कोशिश करते हैं,लेकिन उनके व्‍यक्तित्‍व का शहरी मिजाज आड़े आता है। कश्‍मीरी सलाहियत नहीं है उनकी चाल-ढाल में। प्रचार किया गया था कि इस फिल्‍म के लिए वर्कशॉप किए गए थे। फिर ये कलाकार क्‍यों नहीं निखर पाए? नायक और नायिका दोनों निराश करते हैं।
दरअसल, यह फिल्‍म ठहरी झील में बंधे शिकारे की तरह प्रकृति का नयनाभिरामी रूप तो दिखाती है,लेकिन जीवन में गति और लय नहीं है। कश्‍मीर की राजनीति और स्थिति सिर्फ धमाकों से जाहिर होती है। ऐसा लगता है कि किरदारों के जीवन हालात से अप्रभावित हैं। फिल्‍म के एक डॉयर्लाग में कलाकार,समाज और राजनीति के संबंधों की बात कही भर जाती है। वास्‍तविकता में फिल्‍म उससे परहेज करती है। आतंकवादी के रूप में आए अजय देवगन अचानक गायब होते हैं और फिर नमदार होते हैं तो नूर की जिंदगी में उनकी भूमिका का इतना ही औचित्‍य समझ में आता है कि बानक नूर ने उन्‍हें कभी खाना खिलाया था।
अभिषेक कपूर ने कहानी आगे बढ़ाने में घटनाएं जोड़ने की पूरी आजादी ली है। वे उन्‍हें जोड़ने और कार्य-कारण संबंध बिठाने पर अधिक ध्‍यान नहीं देते। नतीजतन फिल्‍म बिखरी हुई लगती है। कथा के घागे उलझे हुए हैं और किरदारों के संबंध भी स्‍पष्‍ट नहीं हैं। श्रीनगर,दिल्‍ली,पाकिस्‍तान और लंदन के बीच ये चरित्र आते-जाते रहते हैं। उनके आवागमन पर भी सावधानी नहीं बरती गई है।
फिल्‍म के गीत-संगीत पर काफी मेहनत की गई है। वह बेहतरीन भी है। स्‍वानंद किरकिरे और अमित त्रिवेदी ने स्‍थानीय खूबियों को गीत-संगीत में तरजीह दी है।
अभिषेक कपूर की फितूर की सजावट आकर्षक और सुंदर है,लेकिन उसकी बनावट में कमी रह गई है। यह फिल्‍म आंखों को अच्‍छी लगती है। प्रोडक्‍शन बेहतरीन है।
अवधि- 132 मिनट
स्‍टार ढाई स्‍टार

Wednesday, January 20, 2016

हर जिंदगी में है प्रेम का फितूर - अभिेषेक कपूर

फितूर की कहानी चार्ल्‍स डिकेंस के उपन्यास ग्रेट एक्सपेक्टेशंस पर आधारित है। सोचें कि यह उपन्यास क्लासिक क्यों है? क्‍योंकि यह मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है। दुनिया में हर आदमी इमोशन के साथ जुड़ जाता है। जब दिल टूटता है तो आदमी अपना संतुलन खो बैठता है। अलग संसार में चला जाता है। पागल हो जाता है। मुझे लगा कि इस कहानी से दर्शक जुड़ जाएंगे। हम ने उपन्‍यास से सार लेकर उसे अपनी दुनिया में अपने तरीके से बनाया है। इस फिल्‍म में व्‍यक्तियों और हालात से बदलते उनके रिश्‍तों की कहानी है।

यह फिल्म केवल प्रेम कहानी नहीं है। यह कहानी प्यार के बारे में है। प्यार और दिल टूटने की भावनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कोई भी इंसान ऐसे मुकामों से गुजरे है तो थोड़ा हिल जाए। आप किसी से प्यार करते हैं तो अपने अंदर किसी मासूम कोने में उसे जगह देते हो। वहां पर वह आकर आपको अंदर से तहस-नहस करने लगता है। वहां पर आपको बचाने के लिए कोई नहीं होता है। वह प्यार आपको इस कदर तोड़ देता है कि आपका खुद पर कंट्रोल नहीं रह जाता। यह दो सौ साल पहले हुआ और दो सौ साल बाद भी होगा । केवलसाल बदलते हैं। मानवीय आचरण नहीं बदलते हैं।

फितूर में कश्‍मीर
कश्मीर को हमने राजनीतिक बैकड्राप की तरह नहीं रखा है। ट्रेलर में जो डॉयलाग आता है,उसके अलावा फिल्म में कुछ राजनीतिक नहीं है। कश्मीर का इस्तेमाल हमने खूबसूरती के लिए किया है। कश्मीर के चिनार के पेड़ हर साल नवंबर में पतझड़ से पहले लाल हो जाते हैं। मेरे लिए उससे खूबसूरत कुछ नहीं है।
जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने देखा कि फिल्‍मों में खूबसूरती के लिए कश्मीर का ही इस्तेमाल होता है। यह मेरी चाह थी कि मैं कश्मीर को अपनी फिल्म में दिखाऊं। हमने श्रीनगर के बाहर की शूटिंग नहीं की है। श्रीनगर में निशात बाग है और डल लेक भी है। इन दोनों लोकेशन के बीच फिल्म का फर्स्ट एक्ट है।

तकलीफ होती है कश्‍मीरियों को देख कर
कश्मीर भारत का हिस्सा जरूर है। वहां के लोग मुझे बहुत तकलीफ में नजर आए। वहां के लोग हर दिन संघर्ष करते हैं। यह मेरी निजी राय है। हम सब हमेशा कश्मीर की खूबसूरती की बात करते हैं। वहां पर हमेशा सेना तैनात रहती है। कितनी तकलीफ होती है। आपके घर के बाहर सेना की लाइन लगी हुई है। आपकी जांच होती रहती है। मैं समझता हूं कि सुरक्षा के लिहाज से यह जरूरी है। कुल मिलाकर तकलीफ कश्मीरी को ही हो रही है। देश एक हैं। केबल टीवी के जरिए वे देखते हैं कि बाकी देश और देशों में क्या हो रहा है। पूरे देश में फिल्में लगती हैं,लेकिन वहां थिएटर नहीं है। यह सब देख के मुझे बहुत दुख होता है।

फिल्‍म की कहानी
इंसान जब पैदा होता है तो वह खाली ब्लैकबोर्ड की तरह होता है। उसके अनुभव और आस पास का माहौल उसे शख्सियत देते हैं। कोई आदमी पैदा होते ही अच्छा या बुरा नहीं होता है। अनुभव उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। उनमें से ही एक अनुभव प्यार है। कुछ लोगों के प्यार का अनुभव अच्छा होता है,जो उन्हें और बेहतर इंसान बनाता है। अगर किसी इंसान का दिल टूटता है तो उसके व्यक्तित्व में खरोंच आ जाती है। उस खरोंच से इंसान निगेटिव बन जाता है। वह हर चीज में शक करने लगता है। प्यार की एनर्जी ही ऐसी है। सही चैनल से आए तो आपको कमाल का इंसान बना देती है। अगर उसने आपको गलत तरीके से टच कर लिया तो सब कुछ निगेटिव हो जाता है। यह निगेटिविटी संक्रामक होती है। फैलती है।

कट्रीना कैफ का चुनाव
फिल्म देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरा फैसला सही है। मैं उनके चुनाव के कारण नहीं देना चाहता। मेरे बताने से धारणा बदलने वाली नहीं है। यह तो देख कर ही हो सकता है। कुछ लोगों में अलग तरह की खूबी होती है। खासकर फिल्म में मेरे किरदार की है,जिसे कट्रीना निभा रही हैं। किरदार और कट्रीना की छवि में थोड़ी समानता है। यह जरूरी है कि हम एक्टरों को मौका दें। पहली बार वह भी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आई हैं। एक बार किसी को मौका देकर देखना चाहिए। वह कर सकता है या नहीं। यह पहले देखना चाहिए। मैंने देखा है कि कट्रीना के उच्चारण की आलोचना होती है,लेकिन एक्टर केवल अपने उच्चारण से नहीं जाना जाता है। एक्टर अपनी पूरी ऊर्जा के लिए पहचाना जाता है। मुझे उच्चारण इतना आवश्यक नहीं लगता है। एक हद के बाद भाषा भी महत्व नहीं रखती है। अगर आप के इमोशन सही हैं तो भाषा बाधक नहीं बनती है। आप जो महसूस कर रहे हैं,वह सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचना जरूरी है। कट्रीना में वह काबिलियत है। इस फिल्म में वह अपनी आलोचनाओं को खत्म करती नजर आएंगी।

तब्‍बू का चुनाव
सच कहूं तो फिल्‍म लिखते समय सबसे पहले मेरे दिमाग में तब्बू ही थी। मैंने तब्बू को २०१३ में एक मैसेज भेजा था कि मैं एक कहानी पर काम कर रहा हूं। आप उस किरदार के लिए परफेक्ट हैं। एक आइडिया भेजा था। हमने एक दूसरे के कुछ मैसेज भी किए थे। फिर जैसे कहानी बनती गई। किरदार बनते गए। फिर रेखा जी आ गईं। मुझे तीन किरदारों के माहौल के लिए वह सही लगा। फिर से बदलाव हुआ और  अंत में तब्बू ही फिल्म कर रही हैं। वह तीन दिनों में मेरे पास आ गईं। वह सीधे सेट पर ही आ गई। मुझे उनके साथ तैयारी का मौका ही नहीं मिला। ऐसे किरदार के लिए एक्‍टर तीन महीने तैयारी में लगाते हैं। ऐसे किरदार परतें होती हैं। यह फिल्म मेरे लिए कठिन रही। यह फिल्म ज्‍यादातर बिटवीन द लाइन है। किरदारों को भी उसी तरह तैयार करना था।

आदित्य राय कपूर
उनमें मासूमियत है। उन्होंने ज्यादा काम नहीं किया है। उसका मजा ही कुछ और है। जब ऐसा कोई एक्टर आता है तो वह खुले दिमाग से आता है। वह किरदार में अलग-अलग तरीके से ढलने की कोशिश करता है। हम उसका हाथ पकड़ के बातचीत करते थे। खूब चर्चा करते थे। इस फिल्म से उसकी ग्रोथ होगी। उसे भी नया अनोखा अनुभव मिला है। यह आगे उसके काम आएगा। उसकी अंदरूनी मासूमियत मुझे सबसे खास लगती है।

लव स्‍टोरी बनाने की ख्‍वाहिश
मैंने कुल तीन फिल्में बनायी है। यह चौथी फिल्म है। मुझे हमेशा से था कि लव स्टोरी बनाऊंगा। लव स्टोरी में मुझे रॉमकॉम नहीं बनाना था। वह हल्की होती है। ऐसी कहानियों में मेरा पेट नहीं भरता। मैं अपनी फिल्मों में जान लगा देना चाहता हूं। ऐसा न लगे कि टेबल टेनिस बॉल के साथ फुटबाल खेल रहे हैं। मुझे फुटबाल खेलने का शौक है। मुझे चाहिए कि कहानी में जान हो, जिसे बनाने में संघर्ष करना पड़े। मैं हमेशा यादगार फिल्में बनाना चाहता हूं। मेरी कोशिश यही रहती है। यह फिल्म प्यार के संघर्ष की कहानी है। खासकर दिल टूटने की। यह कहानी १९८० से लेकर अब तक की है। हम फिल्म में फ्लैश बैक से वर्तमान में जाते हैं। थोड़ी एपिक की तरह दिखेगी।

सोच-समझ में ग्‍लोबल,फिल्‍में लोकल
भारत जैसा कोई देश नहीं है। हॉलीवुड सारी दुनिया को टेक ओवर कर चुका है। दुनिया में कही पर फिल्म इंडस्ट्री खड़ी नहीं हो पा रही,हर देश में हॉलीवुड अपनी जगह बना चुका है भारत के आलावा। भारत पर अभी हॉलीवुड का जादू नहीं चल रहा है। यहां पर स्टार वॉर जैसी फिल्में आती हैं। मगर दिलवाले और बाजीराव मस्तानी उसे टक्कर देती हैं। और जीत जाती हैं। यह इसलिए नहीं कि हमारी फिल्में बहुत कमाल की है। हमारे देशवासी ही ऐसे ही हैं। वे अपनी सभ्यता-संस्‍कृति देखने के लिए हिंदी फिल्मों का चुनाव करते हैं। इसमें ही वे बहुत खुश है। हमारी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री अपने बलबूते पर चल रही है। यह सब मजाक नहीं है। हमारी फिल्में समाज का आईना है। हम जैसी भी फिल्में परोसें,दर्शक अपने लिए कुछ ना कुछ निकाल ही लेते हैं। वे अपनी पसंद की फिल्में देखते हैं। राजकपूर और बिमल रॉय कमाल की फिल्में बनाते थे। उनमें कहानियां होती थी। भारतीयता होती थी। उन फिल्मों को बनाने में वक्त लगता था। साल में एक या दो फिल्में आती थीं। मैं भी भारतीय फिल्में ही बनाना चाहता हूं। मैं हॉलीवुड की फिल्में नहीं बनाना चाहता। मुझे वहां की सभ्यता ही नहीं पसंद है। 


फिल्‍म का संगीत
अमित त्रिवेदी ने संगीत दिया है। वह काइ पो छे में भी मेरे साथ थे। वह प्रतिभाशाली हैं। इस फिल्म का संगीत कहानी से ही निकला है। हमने अलग से नहीं सोचा था। हमने कोई स्टाइल के बारे में नहीं सोचा था। फिल्म तय करती है। हम तो गुलाम है। फिल्म ही बताती है कि कपड़े और खूबसूरती क्या होनी चाहिए। किरदार और संगीत कैसे होने चाहिए।



Tuesday, February 3, 2015

कट्रीना कैफ का चुंबन

अभिषेक कपूर की फिल्‍म फितूर की शूटिंग चल रही है। सबसे पहली खबर और तस्‍वीर कट्रीना कैफ के चुबन की आई है। हिंदी फिल्‍मों में चुंबन की चर्चाएं होती रहती हैं। यहां दो तस्‍वीरे हैं। पहली हिंदी फिल्‍मों के आरंभिक चुबन की और दूसरी कट्रीना कैफ और आदित्‍य कपूर की 'फितूर' से ....


Friday, October 3, 2014

फिल्‍म समीक्षा : बैंग बैंग

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हॉलीवुड की फिल्म 'नाइट एंड डे' का अधिकार लेकर हिंदी में बनाई गई 'बैंग बैंग' पर आरोप नहीं लग सकता कि यह किसी विदेशी फिल्म की नकल है। हिंदी फिल्मों में मौलिकता के अभाव के इस दौर में विदेशी और देसी फिल्मों की रीमेक का फैशन सा चल पड़ा है। हिंदी फिल्मों के मिजाज के अनुसार यह थोड़ी सी तब्दीली कर ली जाती है। संवाद हिंदी में लिख दिए जाते हैं। दर्शकों को भी गुरेज नहीं होता। वे ऐसी फिल्मों का आनंद उठाते हैं। सिद्धार्थ आनंद की 'बैंग बैंग' इसी फैशन में बनी ताजा फिल्म है।
इस फिल्म के केंद्र में देश के लिए काम कर रहे सपूत राजवीर की कहानी है। हर प्रकार से दक्ष और योग्य राजवीर एक मिशन पर है। हरलीन के साथ आने से लव और रोमांस के मौके निकल आते हैं। बाकी फिल्म में हाई स्पीड और हाई वोल्टेज एक्शन है। पूरी फिल्म एक के बाद एक हैरतअंगेज एक्शन दृश्यों से भरी है, जिनमें रितिक रोशन विश्वसनीय दिखते हैं। उनमें एक्शन दृश्यों के लिए अपेक्षित चुस्ती-फुर्ती है। उनके साथ कट्रीना कैफ भी कुछ एक्शन दृश्यों में जोर आजमाती है। वैसे उनका मुख्य काम सुंदर दिखना और अपनी मोहब्बत से राजवीर का हौसला बनाए रखना है। वह इस जिम्मेदारी को पिछली फिल्मों की तरह ही कुशलता से निभाती हैं।
'बैंग बैंग' रितिक रोशन के प्रशंसकों के लिए है। उन्होंने इस अवतार में रितिक रोशन को नहीं देखा होगा। हालांकि रितिक रोशन 'धूम' सीरिज कर चुके हैं, फिर भी 'बैंग बैंग' को 'धूम' सीरिज की ही एक और फिल्म कहा जा सकता है। इस फिल्म के एक्शन दृश्यों की गति और स्फूर्ति के लिए रितिक रोशन को बधाई देनी होगी। थोड़ी कहानी होती और बाकी किरदारों को स्पेस मिला होता तो फिल्म रोमांचक होने के साथ रोचक भी हो जाती। बीच समुद्र के एक्शन दृश्यों में रितिक रोशन की चपलता देखते ही बनती है।
अवधि-156 मिनट 
**1/2 ढाई स्‍टार

Monday, June 2, 2014

‘फितूर’ में साथ आएंगी रेखा और कट्रीना


-अजय ब्रह्मात्मज
    रेखा, कट्रीना कैफ और आदित्य राय कपूर ़ ़ ़ अभिषेक कपूर की आगामी फिल्म ‘फितूर’ के तीनों कलाकारों के इस संयोग का कमाल पर्दे पर अगले साल दिखेगा। स्वयं अभिषेक कपूर इस कमाल के प्रति उत्सुक और उत्साही हैं। ‘सच कहूं तो अपनी ड्रीम कास्टिंग के बावजूद मैं अभी नहीं बता सकता कि पर्दे पर तीनों का साथ आना कैसा जादू बिखेरेगा? मेरी फिल्म ‘फितूर’ आम हिंदी फिल्म नहीं है। सभी जानते हैं कि यह चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्पेक्टेशंस’ पर आधारित है। लेकिन मेरी फिल्म मूल उपन्यास के पन्नों से निकल कर भारतीय माहौल में बनेगी तो किसी और रूप में नजर आएगी,’ कहते हैं अभिषेक कपूर।
    ‘फितूर’ में रेखा और कट्रीना कैफ का साथ आना  हिंदी फिल्मों की एक बड़ी घटना है। 1970 में ‘सावन भादो’ से शुरुआत कर अंतिम फिल्म ‘कृष 3’ 2014 तक के सफर में रेखा ने अपनी प्रतिभा की विविधता का परिचय दिया है। लंबे समय तक नायिका की भूमिका में विभिन्न किरदारों को जीने के बाद निजी जिंदगी में वह रहस्य की मूर्ति बन गई हैं। अन्य अभिनेत्रियों की तरह आए दिन उनकी खबरें नहीं छपतीं। वह दिखती भी नहीं हैं। कभी-कभार किसी समारोह में अपनी मौजूदगी भर से वह सभी का ध्यान खींच लेती हैं। कांजीवरम साडिय़ों में उनकी आकर्षक भाव-भंगिमाओं को देख कर लगता है कि उम्र भी उन्हें छूने से डरती है। इधर एक-दो अवार्ड समारोहों में उन्होंने जब नए लोकप्रिय सितारों के साथ ठुमके लगाए तो दर्शकों से ज्यादा वे सितारे ही पुलकित नजर आए। रेखा का रहस्य सम्मोहित करता है। उनके बारे में जिज्ञासु बनाता है।
    ‘फितूर’ के लिए अभिषेक कपूर ने जब रेखा से संपर्क साधा तो उन्हें अनुमान नहीं था कि रहस्यमयी रेखा खुले दिल से उनका स्वागत करेंगी। एक तो फिल्मों से बनी उनकी इमेज और दूसरे रहस्य में लिपटी उनकी निजी जिंदगी ़ ़ ़ अभिषेक कपूर बताते हैं, ‘रेखा जी से संपर्क करना अधिक मुश्किल नहीं था। वह तैयार हो गईं तो मैं स्क्रिप्ट सुनाने की तैयारियों में लग गया। चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस ’ के बारे में वह जानती थीं। मेरी स्क्रिप्ट में मूल किरदार का नाम और परिवेश अलग है। स्क्रिप्ट सुनाते समय मुझे लगा कि वह मेरा पक्ष समझ रही हैं। वह अपने किरदार को समझ सकीं। मेरी कहानी के लिए वह सहज ही तैयार हो गईं। उन्हें कहानी सुनाना, उनके व्यक्तित्व को समझना और जानना मेरे लिए रोचक अनुभव रहा। उनके व्यक्तित्व में एक मिस्ट्री तो है ही, लेकिन जब वह हंसते हुए रिएक्ट करती हैं तो एहसास होता है कि गहरे रहस्य से पर्दा उठ रहा है। हम सभी उनकी फिल्में देखते हुए बड़े हुए हैं। फिल्मों के साथ उनका व्यक्तित्व कद्दावर हुआ है। मुझे पूरा यकीन है कि उनके साथ काम करने से मेरा स्तर बढेगा। मैं बतौर निर्देशक समृद्ध हो जाऊंगा।’
    रेखा की प्रतिभा असंदिग्ध है। यही बात कट्रीना कैफ के बारे में नहीं कही जा सकती। पिछले कुछ सालों में कट्रीना कैफ की लोकप्रियता बढ़ती गई है। वह समकालीन अभिनेत्रियों की अगली कतार में हैं। रणबीर कपूर के साथ उनके प्रेम संबंधों की चर्चा ने उन्हें इन दिनों सुर्खियों में बदल दिया है। इसके बावजूद क्या वह रेखा के साथ एक ही फ्रेम में उनके समकक्ष या समतुल्य अभिनय कर सकेंगी? लोकप्रियता के बावजूद बतौर अभिनेत्री कट्रीना ने अभी ऐसी कोई यादगार फिल्म नहीं की है। ‘फितूर’ के निर्देशक अभिषेक कपूर इन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर देते हैं। वे अपना पक्ष रखते हैं, ‘किसी भी कलाकार को भांपना या आंकना उचित नहीं है। ‘रॉक आन’ में जब मैंने अर्जुन रामपाल को चुना था, तब भी ऐसे सवाल उठे थे। मुझे खुशी है कि ‘रॉक ऑन’ के लिए अर्जुन रामपाल को नेशनल अवार्ड मिला था। मुझे यकीन है कि ‘फितूर’ से कट्रीना की छवि बदल जाएगी। फिल्म डायरेक्टर का माध्यम है। डायरेक्टर और एक्टर के परस्पर सहयोग से किरदार गढ़ता और संवरता है। कट्रीना की स्क्रीन प्रेजेंस चमत्कारी है। दर्शक या पत्रकार हर कलाकार को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं। हम निर्देशकों के लिए कलाकारों का कांबीनेशन महत्वपूर्ण होता है। हम फिल्म में उनके लिए माहौल क्रिएट कर देते हैं। फिर उनकी एनर्जी का इक्वेशन काम करता है। उनके बीच की केमिस्ट्री वर्क करती है। हर फिल्म में कलाकारों के सम्मिलित प्रयास से ही कहानी उभरती है। इस बार मुझे रेखा और कट्रीना का साथ आना इंटरेस्टिंग लग रहा है। अब देखना है कि परफारमेंस किस रूप में निकल कर आता है और क्या जादू बिखेरता है? मुझे रेखा और कट्रीना में समर्पित कलाकार मिले हैं। मुझे अपनी स्टाइल में उन्हें पेश करना है।’
    ‘फितूर’ में रेखा बेगम साहिबा की भूमिका में हैं। कट्रीना कैफ फिल्म में फिरदौस के रूप में दिखेंगी तो नूर की के रोल में आदित्य राय कपूर नजर आएंगे। फिल्म का मूल कथ्य प्रेम है। प्रेम और उसके प्रभाव से तीनों किरदार प्रभावित होते हैं। यह फिल्म उन किरदारों की जर्नी में आए बदलावों का भी चित्रण करती है। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बन रही इस फिल्म की शूटिंग मुंबई, दिल्ली, कश्मीर और लंदन में होगी। अभिषेक कपूर की कोशिश है कि फिल्म में मौसम भी किरदार के रूप में नजर आए। शूटिंग पर जाने के पहले ‘फितूर’ के कलाकार रेखा, कट्रीना कैफ और आदित्य राय कपूर सम्मिलित रीडिंग और वर्कशॉप में शामिल होंगे। उनके इस वर्कशॉप का संचालन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा करेंगे। अभिषेक कपूर वर्कशॉप का महत्व बताते हैं, ‘इस वर्कशॉप से कलाकार एक-दूसरे के अप्रोच और स्टाइल से परिचित होंगे। चूंकि तीनों पहली बार साथ आ रहे हैं, इसलिए इस वर्कशॉप से अपरिचय के रुखड़े किनारे चिकने हो जाएंगे। वे एक-दूसरे को नहीं चुभेंगे। वर्कशॉप कर लेने से शूटिंग में आसानी हो जाती है।’


Friday, December 20, 2013

फिल्‍म समीक्षा : धूम 3

डांस,बाइक और चेज 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
'धूम' सीरिज की महत्वपूर्ण कड़ी हैं जय और अली। इस बार वे चोर को पकड़ने के लिए शिकागो जाते हैं। चूंकिचोर चोरी करने के बाद हिंदी में संदेश छोड़ता है 'बैंक वाले तेरी ऐसी की तैसी', शायद इसलिए भारत से जय और अली को उन्हें पकड़ने के लिए बुलाया गया है। मजेदार तथ्य है कि 'विशेष दायित्व' निभाते समय वे चोर को पकड़ने में असफल रहते हैं। फिर बाकी हिंदी फिल्मों की तरह दायित्व से मुक्त होने के बाद उनका दिमाग तेज चलता है और वे चोर को घेर लेते हैं। लेकिन इस बार भी चोर उन्हें चकमा देकर निकल जाता है। कैसे? फिल्म देखें।
जय और अली के रूप में अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा हैं। तारीफ करनी होगी कि पहली 'धूम' से लेकर अभी तक उनकी समनुरूपता बनी हुई है। वे जरा भी नहीं बदले हैं। 'धूम' सीरिज में चोर को ज्यादा स्मार्ट और रोचक बनाने के लिए उनको भोंदू दिखाना जरूरी होता है। इस बार स्मार्ट चोर आमिर खान हैं। जॉन अब्राहम और रितिक रोशन के बाद 'धूम 3' में आए आमिर खान को छबीली कट्रीना कैफ के साथ मिला है। दोनों के बीच स्टेज पर केमिस्ट्री दिखती है। खास कर डांस और सर्कस के करतबों में उनकी जोड़ी प्रभावशाली है। करतब और डांस में निर्देशकऔर संबंधित तकनीशियनों ने भी काफी मेहनत की है। आमिर खान और कट्रीना कैफ भी अपनी तरफ से कसर नहीं रहने देते। इसकेअलावा आमिर खान की हैरतअंगेज बाइक ड्रायविंग है।
बाइकऔर चेज 'धूम' सीरिज का खास बात है। 'धूम 3' में भी इनका भरपूर इस्तेमाल हुआ है। मुख्य रूप से तीन चेज हैं, जिनमें हमेशा की तरह चोर कामयाब रहता है। चोर बने साहिर के पास अत्याधुनिक बाइक है, जो हवा में कुलांचे भरती है और जरूरत पड़ने पर मोटरबोट भी बन जाती है। 'धूम 3' तकनीकी स्तर पर प्रभावित करती है। एक्शन भी जोरदार है। लंबे समय के बाद आमिर खान एक्शन दृश्यों में आए हैं। जॉन अब्राहम और रितिक रोशन की तरह उन्हें भी देहयष्टि दिखानी पड़ी है। आमिर ने मेहनत की है, लेकिन उनके पास उनके जैसा आर्कषक शरीर सौष्ठव नहीं है। इमोशनल दृश्यों को आमिर खान अच्छी तरह निभा ले जाते हैं। कट्रीना कैफ की चपलता आकर्षक है। उनकेडांस में स्फूर्ति, गति और लयात्मकता है। उनसे नजर नहीं हटती। भाव प्रदर्शन और संवाद अदायगी में वह पिछड़ जाती हैं। 'धूम 3' में भी यही हुआ है। जब तक वह डांस और करतब करती हैं, तब तक बहुत प्रभावशाली लगती हैं। बाकी दृश्यों में वह आमिर खान का साथ नहीं दे पातीं। वैसे लेखक-निर्देशक ने कम नाटकीय दृश्य देकर उनकी कमी छिपाने की अच्छी कोशिश की है। विजय कृष्ण आचार्य ने 'धूम3' के दृश्य लंबे रखे हैं। फिल्म भी थोड़ी लंबी हो गई है।
शिकागो शहर का सिटीस्कोप इस फिल्म में दिखाई देता है। शहर की खूबसूरती और भव्यता भी फिल्म में प्रभाव में सहायक बनती है। सर्कस के करतब और डांस परफारमेंस के लिए बने सेट आकर्षक हैं। टैप डांस में आमिर खान का कौशल नजर आता है। पता चलता है किअभ्यास और एकाग्रता से कलाकार नए कौशल सीख सकते हैं।
'धूम' सीरिज अपने गीत-संगीत के लिए भी लोकप्रिय है। 'धूम 3' का गीत-संगीत उसी प्रवाह में है। कुछ गीतों का फिल्मांकन नयनाभिरामी है, लेकिन कुछ गीत अनावश्यक भी लगते हैं। सुदीप चटर्जी के खूबसूरत छायांकन से दृश्य-परिदृश्य सुहावने लगे हैं।
अवधि-172मिनट
 *** 1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, August 15, 2013

दरअसल : महज शुरुआत है यह


-अजय ब्रह्मात्मज
    कट्रीना कैफ ने पिछले दिनों मीडिया के नाम एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने हाल में छपी अपनी तस्वीरों पर दुख और निराशा जाहिर की। उन्हें लग रहा है कि मीडिया ने उनकी जिंदगी में घुसपैठ की है। बड़ी सफाई से उन्होंने फिल्म पत्रकारिता में ऐसे नस्ल का जिक्र किया है, जो फिल्मी हस्तियों के शिकार की हर बुरी कोशिश करते हैं। वे निजता और शिष्टता की हर लक्ष्मण रेखा पार कर जाते हैं। मामला इतना भर है कि कट्रीना कैफ अपने नए प्रेमी रणबीर कपूर के साथ स्पेन के किसी समुद्रतट पर छुट्टियां मना रही थीं। वहां किसी ने उन दोनों की तस्वीर उतारी और उसे भारत की एक फिल्मी पत्रिका के पास भेज दिया। उस पत्रिका में तस्वीर छपते ही सभी पत्र-पत्रिकाओं और वेब साइटों पर यही खबर थी कि रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ एक साथ देखे गए। चूंकि खुद फिल्म इंडस्ट्री बिकिनी को प्रचार की वस्तु बनाती है, इसलिए इस खबर में इस पर भी जारे था कि वह बिकिनी में थीं।
    लगभग एक दशक से हिंदी फिल्मों में सक्रिय कट्रीना कैफ ने धीरे-धीरे केन्द्र में जगह बनाई है। अभी वह देश की सफल अभिनेत्रियों की पहली कतार में हैं। यहां तक पहुंचने में सलमान से उनकी नजदीकी एक बड़ा कारण रही है। दोनों ने कभी मीडिया के सामने संयुक्त या व्यक्तिगत रूप में कमिटमेंट की बात नहीं की। सलमान तो हमेशा मजाक उड़ाते और हंसी में टालते रहे। कट्रीना कैफ की तरफ से भी स्वीकारोक्ति नहीं मिली। उन सारे इंटरव्यू को गौर से देखें तो इस सवाल से कट्रीना की वितृष्णा साफ झलकती है। फिल्म इंडस्ट्री में सभी कहते हैं कि कट्रीना कैफ ने सलमान खान के रसूख का इस्तेमाल किया। यह दोनों के बीच की बात है। इस से किसी और को क्या फर्क पड़ेगा? कट्रीना कैफ अपने करिअर के मामले में स्पष्ट रहीं और आज सफल हैं। हालांकि पिछले एक साल से प्रेम और भावना की अस्थिरता और तलाश में उनका करिअर डगमगा गया है। वह पिछड़ भी गई हैं।
    बहरहाल, मुद्दा फिल्मी हस्तियों की प्रायवेसी का है। इस संदर्भ में अमिताभ बच्चन हमेशा अपने ब्लॉग और ट्विट पर लिखते रहे हैं कि हम ने अपनी मर्जी से यह पेशा चुना है। इस पेशे में निहित है निजता की अवहेलना ...हमें तैयार रहना चाहिए। कट्रीना कैफ को अच्छी तरह समझना चाहिए कि किसी सार्वजनिक स्थान पर उतारी गई किसी फिल्मी हस्ती की तस्वीर उसकी निजता का हनन नही है। अपनी निजता का एहसास फिल्मी हस्तियों को उन क्षणों में होता है, जब उनके अनचाहे कोई तस्वीर आ जाती है। अगर निजता की ऐसी ही चिंता है तो उन्हें प्रायवेट समुद्रतट पर सुरक्षा इंतजाम के बीच मौज-मस्ती करनी चाहिए। ऐसे भी चार-छह बाउंसर तो हमेशा साथ में रहते हैं। ये तस्वीरें किसी ने उनके कमरे में जाकर नहीं उतारी है और न ही उनके अंतरंग पलों को उजागर किया है। ...
    फिल्मी हस्तियों का रहस्य खत्म होता जा रहा है। अगर फिल्मी हस्तियां मीडिया से वैर भाव रखेंगी तो मीडिया उनके प्रति अधिक आक्रामक होगा। यह अत्यंत स्वाभाविक है। रणबीर कपूर से अपनी दोस्ती की कट्रीना कैफ सार्वजनिक कर दें तो किसी को उनके पीछे पडऩे की जरूरत ही नहीं होगी। और यह भी तो सवाल उठता है कि क्या इन तस्वीरों से सिर्फ कट्रीना कैफ की प्रायवेसी में घुसपैठ हुई? उस तस्वीर में रणबीर कपूर भी थे। उन्हें तो काई फर्क नहीं पड़ा। वे श्रीलंका में अनुराग कश्यप के साथ ‘बांबे वेलवेट’ की शूटिंग कर रहे हैं। खबर तो यह भी थी कि कट्रीना कैफ श्रीलंका पहुंची थीं।
    वह समय गया, जब दुनिया से छिपने की जरूरत थी। अब तो आलिंगन और चुंबन के दृश्यों को भी पर्दे पर दिखाया जाता है। फूल नहीं टकराते। फिर वास्तविक जिंदगी में कैसा दुराव-छिपाव। और अभी तो मीडिया हाथ धोकर पीछे नहीं पड़ा है। फिल्मी हस्तियां मीडिया से संपर्क और रिश्ते में पश्चिम का अनुप्रयोग कर रही है तो उन्हें भविष्य में पापैराजी के लिए भी तैयार रहना होगा। यह तो महज शुरुआत है।



Wednesday, August 15, 2012

फिल्‍म समीक्षा : एक था टाइगर

फार्मूलाबद्ध फिल्म है एक था टाइगर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारत,आयरलैंड,तुर्की,क्यूबा और थाईलैंड से घूमती-घुमाती एक था टाइगर तुर्की में खत्म होती है। माशाल्लाह गाना तुर्की में ही फिल्माया गया है। यह गाना फिल्म के अंत में कास्टिंग रोल के साथ आता है। यशराज फिल्म्स ने यह अच्छा प्रयोग किया है कि कास्ट रोल स्क्रीन को छेंकते हुए नीचे से ऊपर जाने के बजाए दाएं से बाएं जाता है।
हम सलमान खान और कट्रीना कैफ को नाचते-गाते देख पाते हैं। इसके अलावा फिल्म में ठूंस-ठूंस कर एक्शन भरा गया है। हाल-फिलहाल में में दक्षिण भारतीय फिल्मों से आयातित रॉ एक्शन देखते-देखते अघा चुके दर्शकों को एक था टाइगर के एक्शन में ताजगी दिखेगी। इस फिल्म में हीरोइन के भी एक्शन सीन हैं। कॉनरेड पाल्मिसैनो की सलाह से किए गए एक्शन में स्फूर्ति नजर आती है और वह मुमकिन सा लगता है। वैसे इस फिल्म में भी हीरो का निशाना कभी खाली नहीं जाता, जबकि दुश्मनों को शायद गोली चलाने ही नहीं आता। फिल्में हिंदी की हों या किसी और भाषा की। हीरो हमेशा अक्षत रहता है।
कबीर खान निर्देशित एक था टाइगर जासूसी टाइप की फिल्म है। मिशन पर निकला हीरो दुश्मनों की एजेंट बनी हीरोइन से प्यार कर बैठता है। यहां एक फर्क है कि दोनों देशों के खुफिया एजेंसी उनके पीछे पड़ जाती है। फिल्म खत्म होने तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां हीरो-हीरोइन को पकड़ने में नाकामयाब रही हैं। लेखक-निर्देशक ने तर्क दिया है कि लगातार ठिकाना बदल रहे हीरो के पास उसके वेतन के 23 लाख रूपए हैं, जो उसने 12 सालों में जमा किए हैं। यह भी बताया गया है कि हीरो हमेशा मिशन पर सरकारी खर्चे पर रहता है। सचमुच हमारे रॉ एजेंट कितनी कम सैलरी में जान जोखिम में डाल रहे हैं। शायद हीरोइन के पास भी कुछ पैसे हैं। सलमान खान की फिल्म में तर्क,अभिनय और संजीदगी खोजने में कोई तुक नहीं है। यहा सिर्फ भावनाएं रहती हैं। ज्यादातर प्यार की भावना।
एक था टाइगर में फर्ज और मोहब्बत के बीच दहाड़ता हीरो है,जो मोहब्बत का दामन थाम लेता है। फिल्म के शुरू में हीरो के बॉस ने बताया है कि मोहब्बत के बजाए फर्ज निभाने की कचोट से वे उबर नहीं पाए हैं। हमारा हीरो अपने सीनियर की तरह प्यार के विषाद में नहीं जीना चाहता। हिंदी फिल्मों में वैसे भी प्यार सबसे बड़ा धर्म होता है। एक था टाइगर में यह मोहब्बत देशों के बीच की दीवार तोड़ देती है। यश चोपड़ा की वीर जारा में भी ऐसा ही कुछ हुआ था,उसकी पूष्ठभूमि अलग थी।
यह फिल्म सलमान खान के प्रशंसको को ध्यान में रख कर बनायी गई है। उसकी वजह से कबीर खान ने पिछली दो फिल्मों में जो उम्मीद दिखाई थी,वह बुझती नजर आती है। कहानी से ज्यादा सलमान खान और कट्रीना कैफ के सिक्वेंस पर मेहनत की गई है। फिल्म के ओपनिंग और इंट्रो सीन में लगता है कि हम अलग लेवल की फिल्म देखने जा रहे हैं। पर्दे पर सलमान खान के किरदार के उजागर होने और कट्रीना कैफ की हाजिरी के बाद जाहिर हो जाता है कि एक था टाइगर का लेवल आम मसाला हिंदी फिल्मों से अलग या ऊपर नहीं है। वही प्रेम कहानी। हीरो-हीरोइन के प्रेम का विरोध। यहां विरोध के लिए परिवार नहीं देश हैं। विरोधी के तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का नाम लेते ही लेखक-निर्देशक को पुश्तैनी दुश्मनी दिखाने का शॉर्टकट मिल जाता है। एक था टाइगर फार्मूलाबद्ध फिल्म है।
कलाकारों में पहले कट्रीना कैफ की बात करें। निर्देशक ने उन पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया है। उन्हें सिर्फ सुंदर दिखाने की हद से आगे जाकर एक्शन और इमोशन के सीन दे दिए हैं। एक्शन सीन में तो फिर भी डुप्लीकेट या कंप्यूटर इमेजेज के सहारे वह प्रभावित करती हैं, लेकिन इमोशनल सीन में अपने गिने-चुने एक्सप्रेशन से वह निराश करती हैं। और हां,कोई कट्रीना कैफ को बताए कि दर्शक उनका लेफ्ट प्रोफाइल देख-देख का ऊब चुके हैं। वह जैसे ही पर्दे पर स्थिर होती है। उनका बायां प्रोफाइल साने आ जाता है। सलमान खान ने कसर नहीं छोड़ी है। पहले सिक्वेंस से अखिरी सिक्वेंस तक उनकी भागीदारी स्पष्ट है। एक्शन दूश्यों में वे दक्ष हो चुके हैं। फिल्म के चेज सिक्वेंस में उनकी फुर्ती रोमांचक आनंद देती है। खूब सीटियां बजेंगी। वे रोल के मुताबिक फिट और स्मार्ट हैं। उन्हें कुछ वन लाइनर भी मिले हैं, जिन पर तालियां भी बजेंगी। आजादी की 66 वीं वर्षगांठ और ईद के मौके पर सतमान खान ने अपने प्रशंसकों और आम दर्शकों को मनोरंजक तोहफा दिया है। अन्य कलाकार सामान्य हैं। गिरीश कर्नाड और रणवीर शौरी के लिए अधिक गुंजाइश ही नहीं थी।
कैमरामैन असीम मिश्रा ने सभी देशों और शहरों को खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। गानों का फिल्मांकन सुंदर और आकर्षक है। गीत-संगीत सामान्य है। एक माशाल्लाह गीत ही याद रह पाता है। पाश्‌र्र्व संगीत अवश्य प्रभावशाली है। दृश्यों के रोमांचक प्रभाव में उससे मदद मिली है।
अवधि-132 मिनट
*** तीन स्टार

Sunday, June 10, 2012

दो तस्‍वीरें : कट्रीना कैफ

सलमान खान और शाहरुख खान...दोनों के साथ अलग-अलग फिल्‍मों में आ रही कट्रीना कैफ की चर्चा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों में किस के साथ कट्रीना की फिल्‍म बड़ी हिट होगी। आप क्‍या सोचते हैं, बताएं !!!

Wednesday, November 30, 2011

कट्रीना से बहुत आगे है करीना

-अजय ब्रह्मात्मज

अभी भी खबर केवल यह आई है कि रोहित शेट्टी ने शाहरुख खान के साथ के लिए कट्रीना कैफ को अप्रोच किया है।

शाहरुख खान लंबे समय से रोहित शेट्टी को घेर रहे थे कि वे उनके साथ एक फिल्म करें। पहले आइडिया था कि अजय देवगन के साथ अपनी कॉमेडी फिल्मों से मशहूर हुए रोहित शेट्टी उनके लिए एक कॉमेडी फिल्म बनाएंगे। किसी पुरानी मशहूर कॉमेडी फिल्म के रीमेक के बारे में सोचा जा रहा था। इसी बीच अजय देवगन के साथ आई उनकी सिंघम हिट हो गई तो शाहरुख खान ने तय किया कि वे अब रोहित के साथ ऐक्शन फिल्म ही करेंगे। एक्शन हो या कॉमेडी। फिलहाल खबर यह है कि इस फिल्म में कट्रीना कैफ भी होंगी और इस खबर केसाथ स्थापित किया जा रहा है कि कट्रीना अपने प्रतिद्वंद्वी करीना से आगे निकल रही हैं।

सही है कि कट्रीना कैफ लगातार सफल फिल्मों का हिस्सा रही हैं। अपनी खूबसूरती के दम पर उन्होंने एक अलग किस्म का मुकाम हासिल कर लिया है, लेकिन अभिनय की बात करें तो अभी उन्हें प्रूव करना है।

उनकी कोई भी फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय नहीं है। अपनी सफल फिल्मों में वे नाचती-गाती गुडि़या से अधिक नहीं होतीं। निर्देशक भी उनकी सीमाओं से वाकिफ हैं, इसलिए उनके लिए नाटकीय दृश्य लिखते ही नहीं। वे महज उनकी खूबसूरती और चंचल अदाओं को भुनाते हैं।

फिर भी चर्चा है कि कट्रीना कैफ लोकप्रियता और स्टारडम के मामले में करीना कपूर के लिए चुनौती बन चुकी हैं। जल्दी ही वे नंबर वन के सिंहासन पर होंगी। गौर करें तो यह उनके शुभचिंतक प्रचारक की जल्दबाजी लगती है। कट्रीना कैफ अपनी लोकप्रियता और फिल्मों की सफलता के बावजूद करीना कपूर से मीलों पीछे हैं। अभी उन्हें करीना जैसी उपलब्धियां हासिल करनी हैं।

तीनों खानों के साथ उनके काम करने के उदाहरण से बताया जा रहा है कि कट्रीना आगे निकल रही हैं। क्या याद दिलाने की जरूरत है कि करीना कपूर ने बहुत पहले ही तीनों खानों के साथ फिल्में कर ली हैं। बाकी दो खान (सैफ और इमरान) के साथ भी उनकी फिल्में जल्दी ही आ रही हैं। जल्दबाजी में कट्रीना के समर्थक यह तथ्य भी भूल गए हैं कि फिलहाल चर्चा में आए 100 करोड़ के क्लब में करीना कपूर की चार फिल्में हैं। जिन चार सुपरस्टारों की फिल्म इन क्लब में पहुंची हैं, उनकी एक-एक फिल्म में करीना ही रही हैं। इस लिहाज से वे अकेली ऐसी अभिनेत्री हैं, जिनकी फिल्मों ने 100 करोड़ से अधिक का बिजनेस किया है। अफसोस है कि हिंदी फिल्मों के बिजनेस का चार्ट हीरोइनों के नाम से नहीं तैयार होता।

करीना कपूर अपनी पीढ़ी की अभिनेत्रियों में सबसे सक्षम और सफल हैं। अभिनय के लिहाज से उनकी ओमकारा, चमेली और जब वी मेट का बार-बार नाम लिया जाता है। इस स्तर की एक भी फिल्म कट्रीना के खाते में नहीं है। करीना कपूर घोर कॉमर्शियल फिल्मों में भी अपनी छाप छोड़ती हैं। सिर्फ नाचने-गाने वाली फिल्मों में भी उनका सानी नहीं है। अपनी लापरवाही में वे खुद ही अपने विकास के आड़े आ गई हैं। दरअसल, उनके सामने कोई हीरोइन चुनौती के रूप में खड़ी भी तो नहीं है। किसी जमाने में अमिताभ बच्चन की जो स्थिति थी, लगभग वैसी ही स्थिति में आज करीना कपूर हैं।

मधुर भंडारकर के निर्देशन में आ रही फिल्म हीरोइन से करीना कपूर का दर्जा कुछ और ऊंचा हो जाएगा। बिजनेस और एक्टिंग दोनों ही दृष्टिकोण से हीरोइन करीना की उल्लेखनीय फिल्म होगी। बाकी हीरोइनें अभी हीरोइन बनने का ख्वाब ही देख सकती हैं..

Friday, September 9, 2011

फिल्‍म समीक्षा : मेरे ब्रदर की दुल्‍हन


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पंजाब की पृष्ठभूमि से बाहर निकलने की यशराज फिल्म्स की नई कोशिश मेरे ब्रदर की दुल्हन है। इसके पहले बैंड बाजा बारात में उन्होंने दिल्ली की कहानी सफल तरीके से पेश की थी। वही सफलता उन्हें देहरादून के लव-कुश की कहानी में नहीं मिल सकी है। लव-कुश छोटे शहरों से निकले युवक हैं। ने नए इंडिया के यूथ हैं। लव लंदन पहुंच चुका है और कुश मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आ गया है। उल्लेखनीय है कि दोनों का दिल अपने छोटे शहर की लड़कियों पर नहीं आया है। क्राइसिस यह है कि बड़े भाई लव का ब्रेकअप हो गया है और वह एकबारगी चाहता है कि उसे कोई मॉडर्न इंडियन लड़की ही चाहिए। बड़े भाई को यकीन है कि छोटे भाई की पसंद उससे मिलती-जुलती होगी, क्योंकि दोनों को माधुरी दीक्षित पसंद थीं।

किसी युवक की जिंदगी की यह क्राइसिस सच्ची होने के साथ फिल्मी और नकली भी लगती है। बचे होंगे कुछ लव-कुश, जिन पर लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर की नजर पड़ी होगी और जिनका प्रोफाइल यशराज फिल्म्स के आदित्य चोपड़ा को पसंद आया होगा। इस क्राइसिस का आइडिया रोचक लगता है, लेकिन कहानी रचने और चित्रित करने में अली अब्बास जफर ढीले पड़ गए हैं। कहानी की रोचकता बनाए रखने के लिए उनके पास वजह और घटनाएं नहीं थीं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि हम टीवी पर चल रहा कोई कामेडी शो देख रहे हैं। इंटरवल के आगे-पीछे कहानी अटक सी गई है। लव-कुश और डिंपल के पिताओं की बकझक और सहमति फिल्म के प्रभाव को और गिराती है।

स्क्रिप्ट में चुस्ती रहती और घटनाएं तेजी से घटतीं तो मेरे ब्रदर की दुल्हन इंटरेस्टिंग रोमांटिक कामेडी हो सकती थी। इस फिल्म की दूसरी बड़ी बाधा इमरान खान हैं। अपनी कोशिशों के बावजूद वह अपने किरदार में केवल मेहनत करते ही नजर आते हैं। कभी संवाद है तो भाव नहीं और कभी भाव के नाम पर अजीबोगरीब मुद्राएं हैं। इमरान खान की सबसे बड़ी समस्या संवाद अदायगी है। उन्हें अपनी भाषा के साथ ही भाव पर ध्यान देना चाहिए। कट्रीना कैफ डिंपल के किरदार में सहज दिखी हैं। वह चुहलबाजी और मस्ती करती हुई अच्छी लगती हैं। उनमें सुधार आया है। अली जफर ने फिर एक बार साबित किया कि वे नैचुरल एक्टर हैं। कुश के दोनों दोस्तों में वह प्रभावित करता है, जिसे दो-चार संवाद मिले हैं।

फिल्म में भरपूर नाच-गाना और मस्ती है। टुकड़ों में यह एंटरटेन भी करती है, लेकिन पूरी फिल्म का प्रभाव ढीला हो गया है। फिल्म फिसल गई है। फिर भी अली अब्बास जफर अपनी संभावनाओं से आश्वस्त करते हैं।

*** तीन स्टार

Friday, March 25, 2011

आइटम के दम पर

आइटम के दम पर-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह सच है कि मुन्नी और शीला के क्रेज ने फिल्मों में आइटम गीतों की मांग बढ़ा दी है। निस्संदेह दबंग के हिट होने में मलाइका अरोड़ा और सलमान खान पर फिल्माए गीत मुन्नी बदनाम.. का बड़ा योगदान रहा। इस एक गीत की पॉपुलैरिटी ने दबंग के दर्शक तैयार किए। फराह खान की तीस मार खान ने रिलीज के पहले शीला की जवानी.. से ऐसा समां बांधा कि दर्शकों ने वीकएंड की एडवांस बुकिंग करवा ली। हालांकि तीस मार खान को दबंग जैसे दर्शक नहीं मिले, लेकिन जो भी दर्शक मिले, वे इसी गीत की वजह से मिले। फिल्म देखकर निकलते दर्शकों की जुबान पर एक ही बात थी कि फिल्म में शीला.. के अलावा कुछ था ही नहीं। दोनों फिल्मों की कामयाबी से हिंदी फिल्मों में आइटम गीतों की मांग सुनिश्चित हुई। यही वजह है कि दम मारो दम, रेडी और रा वन के आइटम गीतों की चर्चा की जा रही है। कहा जा रहा है कि अभी कुछ समय तक आइटम गीतों का जोर रहेगा।

हिंदी फिल्मों में आइटम गीतों का होना कोई नई बात नहीं है। पहले इन गीतों का फिल्म की कहानी से तालमेल बिठाया जाता था। राज कपूर और गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में ऐसे गीतों को फिल्म का हिस्सा बना कर पेश किया। फिर एक दौर ऐसा आया, जब हर फिल्म में हेलन एक फड़कता आइटम गीत पेश करती थीं। उनके साथ और बाद में ऐसी डांसरों को काफी काम मिला। मुमताज, जीनत अमान और परवीन बॉबी के दौर में हीरोइनें खुद ही आइटम गीत करने लगीं। उनकी प्रस्तुति बदली और हीरोइनों का अंदाज बदला। माधुरी दीक्षित ने तेजाब में एक दो तीन.. और बेटा में दिल धक धक करने लगा.. उसी परंपरा में गाया। थोड़ा पलटकर देखें, तो चाइना गेट के छम्मा छम्मा.. और दिल से के चल छैंयां-छैंयां.. गीत से आज के आइटम गीत की धमाकेदार शुरुआत होती है।

आइटम गीत वास्तव में एक ऐसा गीत है, जिसमें कोई अदाकारा भड़कीले या कम कपडे़े पहनकर मादक अंदाज में स्क्रीन पर आती है। उसके भाव और गीत का फिल्म से सीधा ताल्लुक नहीं होता। फिल्म की कहानी में किसी सपनीली परी जैसा उसका अवतरण होता है। अपने गीत के बाद वह फिर से गायब हो जाती है। ऐसे गीतों के बोलों में सेक्सुअल सबटेक्स्ट रहता है। निर्माता फिल्म के प्रचार में इसका जबरदस्त उपयोग करता है। कहा जाता है कि यौन दमित समाज में आइटम गीत कुंठित दर्शकों की यौन उत्कंठा बढ़ाते हैं और उन्हें सिनेमाघरों में खींच लाते हैं। मुझे याद है कि मेरे कस्बे में रिक्शे पर सिनेमा प्रचार करने वाला खुलेआम घोषणा करता था कि इस फिल्म में हेलन का डांस दो बार दिखाया जाएगा। यकीन करें, हेलन का डांस दो बार देखने के लालच में उस फिल्म के दर्शक बढ़ जाते थे। आज भी आइटम गीत दर्शक बढ़ाते हैं। कस्बों से लकर मेट्रो के सिनेमाघरों तक में इसका असर देखा जा सकता है।

दम मारो दम में दीपिका पादुकोण का अंदाज किसी मायने में आइटम गीत के डांसरों Mallika Sherawat

से कम नहीं है। सुना है कि मल्लिका सहरावत रेडी में आइटम गीत पेश करेंगी। चलो दिल्ली में याना गुप्ता फिर से जलवा बिखेरेंगी, तो भिंडी बाजार में कटरीना लोपेज तान के सीना हो जा कमीना.. गाती नजर आएंगी। मुन्नी और शीला के बाद आइटम गीतों का बहाव रुक ही नहीं रहा है। कॉमर्शियल फिल्मों के निर्देशकों को यह कामयाबी का आसान तरीका लग रहा है, जबकि सच्चाई के उदाहरण भी मुन्नी और शीला से लिए जा सकते हैं। अगर फिल्म की कहानी बेदम होगी, तो सिर्फ आइटम सांग के दम पर बड़ी कामयाबी नहीं हासिल की जा सकती।

Thursday, December 9, 2010

देसी मुन्नी, शहरी शीला

देसी मुन्नी, शहरी शीला-अजय ब्रह्मात्‍मज

धुआंधार प्रचार से शीला की जवानी.. की पंक्तियां लोग गुनगुनाने लगे हैं, लेकिन शीला..शीला.. शीला की जवानी.. के बाद तेरे हाथ नहीं आनी.. ही सुनाई पड़ता है। बीच के शब्द स्पष्ट नहीं हैं। धमाधम संगीत और अंग्रेजी शब्द कानों में ठहरते ही नहीं। धप से गिरते हैं, थोड़ा झंकृत करते हैं और फिर बगैर छाप छोड़े गायब हो जाते हैं। यही वजह है कि आइटम सांग ऑफ द ईयर के स्वघोषित दावे के बावजूद शीला की जवानी.. का असर मुन्नी बदनाम हुई.. के जैसा नहीं होगा। मुन्नी.. को कोई दावा नहीं करना पड़ा। उसे दर्शकों ने आइटम सांग ऑफ द ईयर बना दिया है।

दबंग में आइटम सांग की जरूरत सलमान खान ने महसूस की थी। उन्होंने इसके लिए मुन्नी बदनाम हुई.. पसंद किया और पर्दे पर असहज स्थितियों और दृश्यों की संभावना के बावजूद अपनी छोटी भाभी मलाइका अरोड़ा को थिरकने के लिए आमंत्रित किया। सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया के लिए अजीब कहलाने वाले सलमान खान अपने परिवार में कितने शालीन बने रहते हैं। मुन्नी बदनाम हुई.. ने कमाल किया। देखते ही देखते वह दबंग की कामयाबी का एक कारण बन गया।

मुन्नी बदनाम हुई.. वास्तव में लौंडा बदनाम हुआ.. का फिल्मी और थोड़ा श्लील रूपांतरण है। ओरिजनल गीत में लौंडे और नसीबन की रति क्रियाओं का वर्णन है। मुन्नी बदनाम हुई.. में मुन्नी के सार्वजनिक और सर्वसुलभ होने का वर्णन है। दबंग में मुन्नी नितंब के झटकों के साथ प्रवेश करती है। उसकी अदाओं में देहाती उम्फ है, जिसके सभी दीवाने हैं। चुलबुल पांडे उसके दर्शन में ही पूरी बोतल का नशा.. पाकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है। वह उसे सिनेमा हॉल तक की संज्ञा दे देता है। वर्तमान भारतीय समाज में सिनेमा हॉल से अधिक सार्वजनिक और मनोरंजक जगह नहीं हो सकती।

मुन्नी का गंवईपन आकर्षित करता है। मुन्नी के कपड़े लाल और हरे हैं। उसने ट्रेडिशनल प्रिंट का चोली और घाघरा पहन रखा है। इसके बरक्स शीला के कपड़े डिजाइनर हैं। चमक-दमक के साथ उसमें शहरी संस्कार है। शीला एक गाने में इतनी बार कपड़े बदलती है कि वह नकली लगने लगती है। शीला के ठुमकों में देसीपन नहीं है। मुन्नी साइड से रिझाती है, तो शीला सामने से बुलाती है। वास्तव में यह संस्कृति का फर्क है। मुन्नी देसी है तो शीला शहरी। शीला के डांस की पृष्ठभूमि में स्पेशल इफेक्ट और सेट पर फाइबर और क्रिस्टल की सिंथेटिक चमक है, जबकि मुन्नी का माहौल धूसर और गेरुआ है। ये रंग हमारे मानस में बचपन से बैठे हैं। इसके अलावा मुन्नी अपने गाने की हर पंक्ति में खुद को सार्वजनिक करती जाती है। वह बताती है कि उसका आम उपयोग या उपभोग किया जा सकता है। इसके विपरीत शीला दावा करती है आई एम टू सेक्सी फॉर यू.. और तेरे हाथ नहीं आनी..। उसके इस उद्गार में टच मी नॉट का भाव है। शीला अहंकारी है और मुन्नी बदनाम होने पर भी न्योछावर होने के लिए तैयार है। मुन्नी के जादुई प्रभाव का सोंधापन हर उम्र, तबके और क्षेत्र के दर्शकों को भा चुका है। उसका असर प्राकृतिक है, जबकि शीला किसी विज्ञापन की तरह आक्रामक है। वह अपनी जरूरत पैदा करने की कोशिश में है, जबकि मुन्नी जरूरत बनी हुई है। निश्चित ही दोनों गानों के पीछे इतनी बातें नहीं सोची गई होंगी, लेकिन हर रचना के पीछे सक्रिय दिमाग की अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि होती है। उसी से प्रेरित होकर वह सायास या अनायास कुछ रचता है। गौर करें, तो मुन्नी भारत का गीत है, तो शीला इंडिया का।

Sunday, April 18, 2010

जोखिम से मिलेगी जीत

-अजय ब्रह्मात्‍मज

मध्य प्रदेश, कश्मीर, महाराष्ट्र और केरल के दूर-दराज इलाकों में फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त इन हीरोइनों के पास न तो मुंबई के स्टूडियो का सुरक्षित माहौल है और न वे सारी सुविधाएं हैं, जिनकी उन्हें आदत पड़ चुकी है। सभी हर प्रकार से जोखिम के लिए तैयार हैं। ग्लैमर व‌र्ल्ड की चकाचौंध से दूर प्राकृतिक वातावरण में धूल-मिट्टी, हवा, जंगल और बगीचे में फिल्म की जरूरत के मुताबिक परिधान पहने इन हीरोइनों को देखकर एकबारगी यकीन नहीं होता कि अभी कुछ दिनों और घंटों पहले तक वे रोशनी में नहाती और कमर मटकाती हीरो के चारों ओर चक्कर लगा रही थीं।

साफ दिख रहा है कि हिंदी फिल्मों की कहानी बदल रही है और उसी के साथ बदल रही है फिल्मों में हीरोइनों की स्थिति और भूमिका। फार्मूलाबद्ध कामर्शियल सिनेमा में आयटम गर्ल और ग्लैमर डॉल की इमेज तक सीमित हिंदी फिल्मों की हीरोइनों के बारे में कहा जाता रहा है कि वे नाच-गाने के अलावा कुछ नहीं जानतीं। ऐसे पूर्वाग्रही भी चारों सीनों में क्रमश: कट्रीना, प्रियंका, दीपिका और ऐश्वर्या की मौजूदगी से महसूस करेंगे कि हीरोइनों ने कुछ नया करने की ठान ली है। कुछ भी कर गुजरने को तैयार गंभीर हीरो की तर्ज पर अब वे 'शी-हीरो' या मैरियम वेबस्टर डिक्शनरी का सहारा लें तो 'शीरो' बन रही हैं। उन्हें निर्देशकों का सहयोग मिल रहा है। उन पर भरोसा किया जा रहा है और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं लिखी जा रही हैं।

जी हाँ, इस साल आप हीरोइनों को गंभीर किस्म की विविध भूमिकाओं में देखेंगे। पिछले दिनों एक निर्देशक ने शिकायत की थी कि आज नरगिस, मधुबाला, मीना कुमारी, वहीदा रहमान और नूतन जैसी अभिनेत्रियां नहीं हैं, इसलिए फिल्मों में हीरोइनों के लिए ठोस भूमिकाएं नहीं लिखी जातीं। निश्चित ही उक्त निर्देशक राजनीति में कट्रीना, सात खून माफ में प्रियंका, खेले हम जी जान से में दीपिका और रावण में ऐश्वर्या को देखने के बाद अपनी राय बदलेंगे। इन चारों के साथ करीना कपूर, विद्या बालन, कोंकणा सेनशर्मा, लारा दत्ता और बिपाशा बसु भी कुछ नया और जोरदार करने के प्रयास में हैं। सभी को लगने लगा है कि अगर लंबी पारी खेलनी है और दर्शकों के बीच स्थायी जगह के साथ इतिहास में दर्ज होना है तो ठोस और यादगार भूमिकाएं करनी होंगी। देश के अनुभवी निर्देशकों का विश्वास जीतना होगा। अपनी क्षमता से उन्हें प्रेरित करना होगा कि वे हीरोइनों की दमदार भूमिका वाली कहानियां चुनें। फिल्म की शूटिंग में सुविधाओं और नखरों को भुलाकर हर किस्म का समर्थन और सहयोग देना होगा। पूर्ण समर्पण के बाद ही उन्हें प्रतिष्ठित हीरोइनों के समूह में शामिल किया जाएगा। निश्चित ही इसमें दर्शकों का भी योगदान है। उनकी स्वीकृति ने ही हीरोइनों को ऐसी भूमिकाओं को चुनने का साहस दिया है। यह एक प्रकार का जोखिम है, लेकिन इस जोखिम में जीत की संभावना है। आखिरकार सफलता संभावनाओं की जोखिम भरी छलांग ही तो है!

[सीन-1]

भोपाल में हजारों की भीड़ के बीच अपनी साड़ी के पल्लू से बेपरवाह दोनों हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन करती बिंदु सेक्सरिया को देख कर यकीन नहीं होता कि कट्रीना कैफ किसी रोल में इतने आत्मविश्वास से भरी नजर आ सकती हैं। अपने रूप, यौवन और मादक अदाओं से हिंदी फिल्मों के दर्शकों की फेवरिट बन चुकी कट्रीना को समीक्षकों ने अभी तक सीरियस भूमिकाओं के योग्य नहीं माना। विदेश से भारत आई इस अदाकारा ने प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में एक जुझारू राजनीतिज्ञ की भूमिका में सभी को चौंका दिया है। माना जा रहा है कि इस फिल्म में कट्रीना अपने बारे में बनी सारी धारणाओं को तोड़ एक नई छवि के साथ उभरेंगी।

[सीन-2]

राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने और खतरों के खिलाड़ी के अगले सीजन की होस्ट की खबरों से सुर्खियों में छाई प्रियंका चोपड़ा ने ट्वीट किया कि वह विशाल भारद्वाज की फिल्म सात खून माफ की शूटिंग के लिए उत्तर भारत के एक अनजान शहर में जा रही हैं। उन्होंने शहर का नाम गुप्त रखा, लेकिन प्रशसकों ने अगले ही दिन बुरका पहन कर जाती प्रियंका चोपड़ा की तस्वीर ऑनलाइन कर फिल्म की लोकेशन और लुक जाहिर कर दी। वह काश्मीर के एक बाग में बुरका पहने नजर आई। ह्वाट्स योर राशि? में वह बारह रूपों में दिखी थीं तो सात खून माफ में उनके सामने नसीरूद्दीन शाह और इरफान खान समेत सात अभिनेता होंगे। उन सभी के साथ प्रियंका चोपड़ा को अपना दम-खम दिखाना पड़ेगा और यह साबित करना होगा कि वह किसी से कम नहीं हैं।

[सीन-3]

गोवा के करीब महाराष्ट्र के छोटे शहर सावंतवाड़ी में रात के तीन बजे हैं। खेत और बगीचों से आ रही झिंगुरों की आवाजें रात की खामोशी का संगीत सुना रही हैं। अंधेरी रात के इस सन्नाटे में सावंतवाड़ी के पास के गांव में पूरी हलचल है। लाइट, कैमरा, साउंड के बाद आशुतोष गोवारिकर के एक्शन कहते ही बंदूक दागने की 'धांय' सुनाई पड़ती है। मानीटर पर हम देखते हैं कि बंगाली स्टाइल में साड़ी पहने दीपिका पादुकोन और अभिषेक बच्चन खिड़कियों से बाहर झांक रहे हैं। यह आशुतोष गोवारिकर की फिल्म खेलें हम जी जान से का एक महत्वपूर्ण सीन है। आजादी की लड़ाई के दिनों में चिटगांव के विद्रोह पर आधारित इस फिल्म में दीपिका पादुकोन क्रांतिकारी कल्पना दत्ता की भूमिका निभा रही हैं।

[सीन-4]

शहरी सभ्यता से दूर केरल के जंगलों में ऐश्वर्या राय को डर है कि कहीं उनके शरीर से जोंक न चिपक जाए। इस खौफ के बावजूद वह पति अभिषेक बच्चन के साथ अस्थायी कैंप में डटी हुई हैं। आधुनिक सुविधाओं से वंचित ऐश्वर्या राय की एक ही चिंता है कि मणिरत्नम को उनका वांछित शॉट मिल जाए। हर सीन को हिंदी में शूट करने के बाद तमिल में शूट किया जा रहा है। डबल मेहनत हो रही है। फिर भी न चेहरे पर शिकन है और न जुबान पर उफ्फ। वह मणिरत्नम की फिल्म रावण में सीता की भूमिका निभा रही हैं। हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में बन रही इस फिल्म में वह कलात्मक चुनौतियों से जूझ रही हैं। कोशिश है कि दर्शकों को उर्जा से भरपूर उनकी भंगिमा दिखे।

[क्या सोचते हैं निर्देशक]

''दीपिका में एक ठहराव है। वह क्लासिकल ब्यूटी है। कल्पना का कैरेक्टर बहुत स्ट्रांग है और दीपिका इस कैरेक्टर को सही प्रभाव के साथ निभा रही है। हिंदी की कामर्शियल फिल्मों में हीरोइनें ज्यादातर गानों और रोमांस के लिए रहती हैं। मेरी कोशिश रहती है कि ऐसा न हो। मैं कहानी लिखते समय हीरोइनों की ठोस मौजूदगी सुनिश्चित करता हूं। फिल्मों में हीरोइनों के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना चाहिए।''

[आशुतोष गोवारिकर]

''पहली फिल्म इरूवर से रावण तक में ऐश्वर्या राय के कमिटमेंट में फर्क नहीं आया है। अभी वह ज्यादा रिफाइंड और मैच्योर हो गई हैं। उम्मीद करता हूं कि वह इसी समर्पण के साथ आगे भी काम करती रहेंगी।''

[मणिरत्नम]

''नयी उम्र की हीरोइनों में प्रियंका चोपड़ा जैसी विविधता कम है। कमीने में उन्होंने मराठी लड़की की भूमिका को जीवंत किया। सात खून माफ में उनकी भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण है। अच्छी बात है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को समझती हैं और पूरा सहयोग देती हैं। उन्हें सेट से जाने की जल्दबाजी नहीं रहती। फिल्म के लिए आवश्यक वर्कशॉप में वह सभी के साथ भाग लेती हैं। मैंने हमेशा उन्हें एक हीरो की तरह ही पाया है।''

[विशाल भारद्वाज]

''कट्रीना जैसी समर्पित, विनम्र और लगनशील अभिनेत्री हाल-फिलहाल कोई और नहीं दिखी। वह अपना काम करेक्ट और परफेक्ट करने की कोशिश में रहती हैं। एक दिन वह गलतफहमी में किसी और सीन की तैयारी कर आ गई थी, जबकि हमें शपथ ग्रहण का सीन करना था। कट्रीना ने माफी मांगी। पूरी शपथ को याद किया और अगले दिन एक टेक में शूट किया। मुझे कभी कट्रीना की वजह से दूसरा टेक नहीं लेना पड़ा।''

[प्रकाश झा]

Saturday, November 28, 2009

फिल्‍म समीक्षा : दे दना दन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रियदर्शन अपनी फिल्मों का निर्देशन नहीं करते। वे फिल्मांकन करते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने एक्टरों को स्क्रिप्ट समझाने के बाद छोड़ देते हैं। कैमरा ऑन होने के बाद एक्टर अपने हिसाब से दिए गए किरदारों को निभाने की कोशिश करते हैं। उनकी फिल्मों के अंत में जो कंफ्यूजन रहता है, उसमें सीन की बागडोर एक्टरों के हाथों में ही रहती है। अन्यथा दे दना दन के क्लाइमेक्स सीन को कैसे निर्देशित किया जा सकता है? दे दना दन प्रियदर्शन की अन्य कामेडी फिल्मों के ही समान है। शिल्प, प्रस्तुति और निर्वाह में भिन्नता नहीं के बराबर है। हां, इस बार किरदारों की संख्या बढ़ गई है।

फिल्म के हीरो अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी हैं। उनकी हीरोइनें कट्रीना कैफ और समीरा रेड्डी है। इन चारों के अलावा लगभग दो दर्जन कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं। यह एक तरह से कैरेक्टर आर्टिस्टों की फिल्म है। वे कंफ्यूजन बढ़ाते हैं और उस कंफ्यूजन में खुद उलझते जाते हैं। फिल्म नितिन बंकर और राम मिश्रा की गरीबी, फटेहाली और गधा मजदूरी से शुरू होती है। दोनों अमीर होने की बचकानी कोशिश में एक होटल में ठहरते हैं, जहां पहले से ही कुछ लोग आकर ठहरे हैं। इंटरवल तक आते-आते सारे किरदार आपस में इस कदर उलझ जाते हैं कि कहानी का सिरा गायब हो जाता है। लेखक-निर्देशक चाहते भी नहीं कि दर्शकों के दिमाग में कोई कहानी या उसकी उम्मीद बची रहे। इंटरवल के बाद हीरो-हीरोइन और कैरेक्टर आर्टिस्ट एक लेवल पर गड्डमड्ड हो जाते हैं। सब बराबर हो जाते हैं।

सुस्त चाल में आरंभ हुई फिल्म इंटरवल के बाद रफ्तार पकड़ती है। रफ्तार पकड़ते ही गलतफहमी, छीनाझपटी, छींटाकशी, मसखरी, साजिश, बेवकूफी और बेसिर-पैर की हरकतें आरंभ हो जाती हैं। बीच-बीच में कुछ प्रचलित मुहावरे संवाद के तौर पर सुनाई पड़ते हैं। हम किरदारों की चीखों से खीझते हैं, लेकिन फिर उनकी नादानी और परेशानी पर हमें हंसी आती है। फिल्म हंसाती है और कुछ दृश्यों में कुछ ज्यादा ही हंसाती है। गलती से आप अपनी हंसी की वजह सोचने लगे तो एहसास होता है कि आप प्रियदर्शन की फूहड़ता में शामिल हो चुके हैं। लतीफेबाजों की महफिल में बैठ चुके हैं, जहां हंसना स्वाभाविक धर्म है। हम इसलिए हंस रहे हैं कि लोग हंस रहे हैं। लोग इसलिए हंस रहे हैं कि हम हंस रहे हैं।

दे दना दन में नारी और पैसों को लेकर जबरदस्त कंफ्यूजन है। प्रियदर्शन की कामेडी फिल्में मर्दवादी होती हैं और खुलेआम औरतों का मखौल उड़ाती हैं। परफार्मेस की बात करें तो इस फिल्म को राजपाल यादव, जानी लीवर और असरानी ने संभाला है। चौथा नाम अर्चना पूरण का लिया जा सकता है। कट्रीना कैफ, समीरा रेड्डी और नेहा धूपिया का चुनाव परफार्मेस के लिए नहीं, बल्कि प्रदर्शन के लिए किया गया है। अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी हीरों हैं, क्योंकि वे हीरोइनों के साथ गाने गाते हैं। दे दना दन बताती है कि हम कामेडी फिल्मों को लेकर कितने कैजुअल हो चुके हैं। एक सवाल है कि क्या बगैर चीखे-चिल्लाए कामेडी फिल्मों के संवाद नहीं बोले जा सकते?

**1/2 ढाई स्टार


Thursday, November 12, 2009

दरअसल: फिल्म की रिलीज और रोमांस की खबरें


-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों हर फिल्म की रिलीज के पंद्रह-बीस दिन पहले फिल्म के मुख्य कलाकारों के रोमांस की खबरें अखबारों में छपने और चैनलों में दिखने लगती हैं। पिछले दिनों रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ की अजब प्रेम की गजब कहानी आई। रिलीज के पहले खबरें दिखने लगीं कि रणबीर-कैट्रीना की केमिस्ट्री गजब की है। वास्तव में दोनों के बीच रोमांस चल रहा है, इसलिए उनके प्रेमी खिन्न हैं। दोनों के संबंध अपने-अपने पे्रमियों से खत्म हो चुके हैं। अखबार और चैनलों पर यही खबर थी।
अगर फिल्मों और उसके प्रचार के इतिहास से लोग वाकिफ हों या थोड़े भी सचेत ढंग से इन खबरों पर नजर रखते हों, तो उन्हें याद होगा कि यह सिलसिला पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना के समय से चला आ रहा है। एक प्रचारक ने नियोजित तरीके से हर फिल्म की हीरोइन के साथ राजेश खन्ना के प्यार की किस्से बनाए। कभी फिल्म की युगल तस्वीरें तो कभी किसी पार्टी की अंतरंग तस्वीरों से उसने इन खबरों को पुख्ता किया। राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्मों को ऐसे प्रचार से फायदा हुआ। बाद में इस तरकीब को दूसरों ने अपनाया और कमोबेश उनकी फिल्मों को भी लाभ हुआ।
मीडिया विस्फोट और समाचार चैनलों की होड़ में रोमांस की ऐसी अधपकी खबरों और कयासों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसी खबरों की तिल भर सच्चाई में अपनी तरफ से कुछ-कुछ जोड़कर मीडिया ही ताड़ बनाता है। कह सकते हैं कि हम सभी प्रचारकों की रणनीति का हथियार बनते हैं, इस्तेमाल होते हैं और फिर खुद के खड़े किए ताड़ के गिर जाने पर मन मसोस कर कहते हैं -हमें तो लग रहा था कि खबर झूठी है, लेकिन सभी दिखा और बता रहे थे, तो हम क्या करते? हम नहीं करते तो हमारी नौकरी चली जाती। मीडिया में ऐसी असुरक्षा फैल गई है कि सभी झूठी खबर फैलाने में आगे निकलना चाहते हैं।
रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ का ही मामला लें। रणबीर और दीपिका पादुकोण घोषित प्रेमी युगल हैं। दोनों विभिन्न अवसरों पर साथ दिखते हैं और एक-दूसरे की दोस्ती की दुहाई भी देते हैं। अचानक खबर आई कि दोनों के बीच सब कुछ खत्म हो गया है। ऐसा हो भी सकता है। जब वर्षो के शादीशुदा युगल अलग हो सकते हैं, तो प्रेमियों के अलग होने में कैसा आश्चर्य? लेकिन जब उसी के साथ यह खबर भी आती है कि रणबीर का चक्कर इन दिनों कट्रीना के साथ चल रहा है, जो उनकी ताजा फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी की हीरोइन हैं। फिर शक होता है। कहा जाता है कि प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में भी दोनों साथ आ रहे हैं। इस तरह दो फिल्मों का साथ रोमांस की खबर के लिए काफी है। इसके साथ यह बात भी फैलाई जाती है कि सलमान खान और कट्रीना के बीच अब पुरानी गर्मजोशी नहीं रही। वे अब उस रिश्ते को नहीं ढोना चाहतीं। फिर से कहूं, तो कट्रीना के लिए यह मुमकिन है, लेकिन ठीक रिलीज के पहले इस खबर पर भरोसा नहीं होता।
फिल्म के प्रचार के लिए स्टारों की यह मिलीभगत हो सकती है। फिल्म के हीरो-हीरोइन ऑन स्क्रीन रोमांस कर सकते हैं, तो ऑफ स्क्रीन अंतरंगता का नाटक करने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी होगी। अगर उनकी ऐसी हरकत से फिल्म को फायदा होता है, तो वे सहज ही रोमांस के अभिनय के लिए तैयार हो जाते हैं। पूछने पर कहेंगे भी कि आप अफवाहों पर यकीन न करें या यह हमारा निजी मामला है या इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है। उनकी कोई भी प्रतिक्रिया ऐसी खबर को भड़काने के काम आती है। पिछले दिनों कट्रीना ने स्पष्ट कहा, मुझे फिल्म के प्रचार का यह तरीका पसंद नहीं है। फिर भी मीडिया उनसे रणबीर से रोमांस के बारे में पूछता रहा। वे कभी दुखी, कभी परेशान और कभी हंसते हुए जवाब देती रहीं।

Saturday, November 7, 2009

फिल्‍म समीक्षा : अजब प्रेम की गजब कहानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

यह फिल्म प्रेम यानी रणबीर कपूर की है। वह जेनी का पे्रमी है। जेनी उसे बहुत पसंद करती है। आखिरकार उसे महसूस होता है कि उसका असली प्रेमी तो प्रेम ही है। वह उसके साथ घर बसाती है।

फिल्म को देखते हुए साफ तौर पर लगता है कि राजकुमार संतोषी ने रणबीर और कैटरीना के चुनाव के बाद फिल्म की कथा बुनी है, क्योंकि हर दृश्य की शुरुआत और समाप्ति दोनों में से किसी एक कलाकार से ही होती है। इसे निर्देशक की सीमा कह सकते हैं या हिंदी फिल्मों के बदलते परिदृश्य में स्टारों का केंद्रीय महत्व मान सकते हैं।

फिल्म का उद्देश्य हंसाना है, इसलिए शुरू से आखिर तक ऐसे दृश्यों की परिकल्पना की गई है जो दर्शकों को गुदगुदा सके। यह एक सामान्य कामेडी फिल्म है, और यह कहा जा सकता है कि राजकुमार संतोषी की ही एक अन्य फिल्म अंदाज अपना अपना से इसकी कामेडी कमजोर है। यह फिल्म मुख्य तौर पर रणबीर कपूर पर निर्भर है हालांकि वह दर्शकों को निराश भी नहीं करते। प्रेम के किरदार में उनके अभिनय का आत्मविश्वास निखार पर दिखाई देता है। वह हर अंदाज में प्यारे लगते हैं, क्योंकि उन्होंने पूरे मनोयोग और विश्वास से अपने किरदार को निभाया है। उन्होंने एक प्रसंग में शम्मी कपूर की तरह खूब सिर हिलाया है।

डांस सिक्वेंस में उनकी अदाएं आकर्षक हैं। निश्चित ही रणबीर कपूर युवा पीढ़ी के अग्रणी और समर्थ स्टारों में से एक हैं। इस फिल्म में वह साबित करते हैं कि हास्य प्रधान फिल्मों में भी वह कमाल कर सकते हैं। यह फिल्म मुख्य रूप से रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ पर केंद्रित है, इसलिए बाकी किरदारों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला है। केवल प्रेम के पिता के रूप में दर्शन जरीवाला अपने कद्दावर व्यक्तित्व के कारण ध्यान खींचते हैं। अन्यथा गोविंद नामदेव, जाकिर हुसैन, प्रेम के चारों दोस्त और कैटरीना का मंगेतर सभी कैरी केचर हो गए हैं। जाकिर हुसैन जैसे समर्थ अभिनेता को जानी लीवर की शैली अपनानी पड़ी है। यह निर्देशक का ही दबाव होगा। अंतिम दृश्य की लंबी झड़प में कार्टून बनते किरदारों को देख कर हंसी आती है, लेकिन यह हंसी सुने गए लतीफे को फिर से सुनने की हंसी है। उससे ज्यादा और गहरा प्रभाव नहीं बन पाता।

रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की केमिस्ट्री की काफी चर्चा थी। इतनी केमिस्ट्री तो हर फिल्म के नायक-नायिका के बीच दिखती है। दोनों की जोड़ी सिल्वर स्क्रीन पर विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाई। अलबत्ता, यह जरूर कहा जा सकता है कि कैटरीना कैफ खूबसूरत गुडि़या के सांचे से बाहर निकलती दिखाई पड़ी हैं। राजकुमार संतोषी ने उनसे अभिनय करवाने की कोशिश की है।

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