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Tuesday, January 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा - काबिल



फिल्म रिव्‍यू
काबिल
इमोशन के साथ फुल एक्शन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    राकेश रोशन बदले की कहानियां फिल्मों में लाते रहे हैं। खून भरी मांग और करण-अर्जुन में उन्होंने इस फॉर्मूले को सफलता से अपनाया था। उनकी फिल्मों में विलेन और हीरो की टक्कर और अंत में हीरो की जीत सुनिश्वित होती है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बड़ा समूह ऐसी फिल्में खूब पसंद करता है, जिसमें हीरो अपने साथ हुए अन्याय का बदला ले। चूंकि भारतीय समाज में पुलिस और प्रशासन की पंगुता स्पष्‍ट है, इसलिए असंभव होते हुए भी पर्दे पर हीरो की जीत अच्छी लगती है। राकेश रोशन की नयी फिल्म काबिल इसी परंपरा की फॉर्मूला फिल्म है, जिसका निर्देशन संजय गुप्ता ने किया है। फिल्म में रितिक रोशन हीरो की भूमिका में हैं।
    रितिक रोशन को हम ने हर किस्म की भूमिका में देखा और पसंद किया है। उनकी कुछ फिल्में असफल रहीं, लेकिन उन फिल्मों में भी रितिक रोशन के प्रयास और प्रयोग को सराहना मिली। 21वीं सदी के आरंभ में आए इस अभिनेता ने अपनी विविधता से दर्शकों और प्रशंसकों को खुश और संतुष्‍ट किया है। रितिक रोशन को काबिल लोकप्रियता के नए स्तर पर ले जाएगी। उनके दर्शकों का दायरा बढ़ाएगी। काबिल में रितिक रोशन ने हिंदी फिल्मों के पॉपुलर हीरो के गुणों और मैनेरिज्म को आत्‍मसात किया है और उन्हें अपने अंदाज में पेश किया है। वे रोमांटिक हीरो, डांसर और फाइटर के रूप में आकर्षक और एग्रेसिव तीनों हैं। संजय गुप्ता ने अकल्‍पनीय एक्शन सीन नहीं दिए हैं। सभी घटनाओं और एक्शन में विश्‍वसनीय कल्‍पना है।
    बदले की कहानियों में पहले परिवार(पिता, भाई-बहन आदि) की वजह से फिल्म का हीरो समाज और कानून की मदद न मिलने पर मजबूर होकर खुद ही बदले के लिए निकलता था। एंग्री यंग मैन की कहानियों का यही मुख्‍य आधार था। इधर हीरो अपनी बीवी या प्रेमिका के साथ हुए अन्याय या व्‍यभिचार के बाद बदले की भावना से प्रेरित होता है। अभी के विलेन को किसी न किसी प्रकार से पुलिस व प्रशासन का भी सहयोग मिल रहा होता है। पहले दो-चार ईमानदार सहयोगी किरदार मिल जाते थे। अभी ज्यादातर भ्रष्‍ट और विलेन से मिले होते हैं, इसलिए हीरो की लड़ाई ज्यादा व्‍यक्तिगत और निजी हो जाती है। कथ्‍य की इस सीमा को लेखक और निर्देशक लांघ पाते हैं। उनकी फिल्में ज्यादा दर्शक पसंद करते हैं। आम दर्शक पसंद करते हैं। हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का यह तत्‍व अभी तक सफल और कामयाब है। काबिल में भी यह तत्‍व है।
    रोहन डबिंग आर्टिस्ट है। वह अंधा है। हमदर्द मुखर्जी आंटी उसकी मुलाकात सुप्रिया से करवाती हैं। सुप्रिया भी अंधी है। पहली ही मुलाकात में रोहन अपनी बातों से सुप्रिया को रिझा लेता है। जल्द ही दोनों की शादी हो जाती है। एक दर्शक के तौर पर उनकी सुखी और प्रेमपूर्ण जीवन की संभावना से खुश होते हैं। फिल्म के इस हिस्से में लेखक-निर्देशक ने रोमांस और डांस के सुंदर पल जुटाए हैं। उनमें रितिक रोशन और यामी गौतम की जोड़ी प्रिय लगती है। रोहन की बस्ती में ही शेलार बंधु का परिवार रहता है। सत्ता के मद में चूर बदतमीज छोटे भाई की बेजा हरकत से मुश्किल पैदा होती है। उसे बड़े भाई की शह मिली हुई है। शुरू में रोहन को उम्मीद रहती है कि उसे पुलिस की मदद मिलेगी। वहां से निराश होने के बाद वह पुलिस अधिकारी को खुली चुनौती देता है कि अब वह खुद कुछ करेगा। वह पुलिस अधिकारी से कहता है, आप की आंखें खुली रहेंगी, लेकिन आप देख नहीं पाएंगे। आप के कान खुले रहेंगे, पर आप सुन नहीं पाएंगे। आप का मुंह खुला रहेगा, पर आप कुछ बोल नहीं पाएंगे। सबसे बड़ी बात सर, आप सब कुछ समझेंगे, पर किसी को समझा नहीं पाएंगे।
    इंटरवल के ठीक पहले आए रोहन की इस चुनौती के बाद जिज्ञासा बढ़ जाती है कि एक अकेला और अंधा रोहन कैसे सिस्टम के समर्थन से बचे गुनहगारों से निपटेगा। रितिक रोशन ने रोहन के आत्‍मविश्‍वास को स्‍वाभाविक रूप से पर्दे पर उतारा है। रितिक रोशन अभिनय और अभिव्‍यक्ति की नई ऊंचाई काबिल में छूते हैं। हां, उन्होंने आम दर्शकों को रिझाया है। उन्होंने रोहन के किरदार को सटीक रंग और ढंग्र दिया है। फिल्म की शुरूआत में उंगली और पांव की मुद्राओं से उन्होंने अपने अंधे चरित्र को स्थापित किया है। यहां तक कि डांस के सीक्वेंस में कोरियोग्राफर अहमद खान ने उन्हें ऐसे डांसिंग स्टेप दिए हैं कि रोहन दृष्टिबाधित चरित्र जाहिर हो। दर्शकों से तादातम्य बैठ जाने के बाद यह ख्‍याल ही नहीं आता कि कैसे अंधा रोहन सुगमता से एक्शन कर रहा है। एक्शन डायरेक्टर शाम कौशल का यह योगदान है।
    इस फिल्म की विशेषता संजय मासूम के संवाद हैं। उन्होंने छोटे वाक्य और आज के शब्दों में भाव को बहुत अच्छी तरह व्यक्‍त किया है। ऐसा नहीं लगता कि संवाद बोले जा रहे हैं। डायलॉगबाजी हो रही है। संवाद चुटीले, मारक, अर्थपूर्ण और प्रसंगानुकूल हैं।
    यह फिल्म रितिक रोशन की है। फिल्म के अधिकांश दृश्‍यों में वे अकेले हैं। सहयोगी कलाकारों में रोनित रॉय और रोहित रॉय सगे भाइयों की कास्टिंग जबरदस्त है। दोनों ने अपने किरदारों का ग्रे शेड अच्छी तरह पेश किया है। पुलिस अधिकारी चौबे की भूमिका में नरेंद्र झा याद रह जाते हैं। उन्हें अपने किरदार को अच्छी तरह अंडरप्ले किया है।
**** चार स्टार
अवधि 139 मिनट

Friday, November 1, 2013

इंडियन और वेस्टर्न टेेस्ट का मिश्रण है ‘कृष 3’- रितिक रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
-‘कृष 3’ के निर्माण की प्रक्रिया पिछले कई सालों से चल रही थी। वह कौन सी चीज मिली कि आप ने वह फिल्म बना दी?
0 मेरे ख्याल से कोई चीज बननी होती है तो वह पांच दिन में बन जाती है। नहीं बननी होती है तो उसमें सालों लग जाते हैं और नहीं बनती है। ‘कृष’ के अगले दो-तीन साल तक तो कोई ढंग की स्क्रिप्ट हाथ में नहीं आई। फिर एक स्क्रिप्ट आई। दूसरी आई। तीसरी हमने ट्राई की। इत्तफाकन जो हम सोच रहे थे, उन पर तो हॉलीवुड में फिल्में बन भी गईं। हमें हर बार नयी स्क्रिप्ट तैयार करनी पडी।
-क्या  आप शेयर करना चाहेंगे वे आइडियाज और कौन सी फिल्में बन गईं?
 0जी हां, हमने सोचा था कि हमारा विलेन एलियन होगा। वह रबडऩुमा होगा। किसी के शरीर में प्रवेश कर लेगा। कुछ वैसा ही ‘स्पाइडरमैन 3’ में दिखा।  काला एलियन किसी के शरीर में प्रवेश कर उस पर हावी हो जाता था। अपनी फिल्म के लिए भी हमने वही सोचा था। एक एलियन आएगा, कृष के शरीर में समाएगा। फिर कृष अपने स्याह पहलू को निकालने के लिए उससे लड़ेगा। दुर्भाग्य से जब ‘स्पाइडरमैन 3’ आई तो हम भौंचक्के रह गए। हम पांच लोग जानते थे अपने विलेन के बारे में। हम सब एक-दूसरे का चेहरा देख पूछ रहे थे कि कहीं तूने तो आइडिया लीक नहीं किया था न। तो ऐसा भी हुआ। तीन साल निकल गए। फिर मुझे याद है ‘दबंग’ रिलीज हुई। हिंदुस्तानी फिल्म एकदम। हिंदुस्तानी एक्शन। और पता नहीं उसका असर हुआ कि नहीं हम उससे पहले पश्चिमी सभ्यता की सोच से प्रभावित लोगों के लिए फिल्म बना व प्लान कर रहे थे। पर ‘दबंग’ के आते ही पापा ने छह दिनों में ‘कृष 3’ की स्क्रिप्ट व स्क्रिनप्ले पूरी लिख दी। ‘दबंग’ के बाद पापा को एहसास हुआ कि वे हिंदुस्तानी हैं। यहां लोगों को उसी मिजाज की फिल्में पसंद पड़ेंगी। लिखने के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई थी। पापा मेरे पास हर रोज आते और कहते कि हम यह फिल्म क्यों बना रहे हैं? इतनी महंगी है। तुम्हें कुछ फायदा नहीं होने को है। मुझे कोई कमाई नहीं होने वाली। मुझे याद है, मैंने उनसे कहा कि आप को प्रेरणा मिली और आपने स्क्रिनप्ले लिख दी। माइंडब्लोइंग स्क्रिनप्ले है वह। एक महान फिल्म का एहसास हो रहा है। अब यह आप की जिम्मेदारी बन चुकी है कि आप उसे लोगों तक पहुंचाओ। अब हमें उस पर काम शुरू करना है। अगर हम यह बोलेंगे कि कौन बनाएगा? तो फिर इसे कौन बनाएगा? कौन रिस्क लेगा? हमारे पास बाप-बेटे और चाचा की इतनी अच्छी टीम है। मेरी बातों का असर पापा पर होने लगा, वरना वे तो अपनी एक पुरानी फिल्म की रीमेक करना चाहते थे। मैंने उनसे कहा, छोटी फिल्म तो बन जाएगी, पर एक बड़ी फिल्म का जो असर होगा, उसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इस वक्त हमें जो रेस्पोंस मिल रहा है, वह अगर छोटी फिल्म होती तो कहां मिलता? अगर 40-50 दिनों में शूट की हुई कोई छोटी लव स्टोरी कर रहे होते और वह रिलीज हो रही होती तो क्या लोगों के बीच इस किस्म की गहमागहमी होती? मैंने पापा को दो महीने तक कन्वींस करते-करते उन्हें मना ही लिया।
-पूरे देश के ऑडिएंस को कैसे संतुष्ट करेंगे और इस फिल्म के साथ आप क्या नया देंगे?
0 इस फिल्म में ऐसी-ऐसी चीजें हैं, जिन्हें अब तक किसी ने कभी ट्राई नहीं किया है। यहीं क्यों, मैंने तो हॉलीवुड फिल्म में भी ऐसा कॉम्बिनेशन नहीं देखा है। सबसे बड़ी बात तो यह कि एक सुपरहीरो है। एक सुपरविलेन। म्यूटैंट (मानवर) हैं। उनके बीच एक बाप और बेटे की कहानी है। रोमांस है। गाने हैं। लब्बोलुआब यह कि एक इंडियन और वेस्टर्न टेस्ट का जो मिश्रण है, वह शायद ही कहीं देखने को मिलेगा। रोहित फिल्म का हीरो है। उसके इमोशंस और कृष्णा के सुपरपावर को दिखाना, बहुत बड़ा चैलेंज था। काया के किरदार में कंगना रनोट ने तो कमाल का काम किया है। उनका जो फ्लो है फिल्म में, वह काबिलेतारीफ है।
-टेक्निीकली क्या नईं चीजें हैं?
0 उस लिहाज से तो कुछ ट्राई ही नहीं किया गया है। टेक्निीकली फिल्म की कहानी से लेकर विजुअल इफ्ेक्ट्स तक देसी हैं। 
-मेरे पहले के जवाब में क्या कहना चाहेंगे? कई लोगों का कहना है कि विवेक का कैरेक्टर मैग्नेटो से प्रेरित है?
0 प्रेरित वाले सवाल का कोई जवाब नहीं है, क्योंकि अगर आपने यह तय कर ही लिया है कि फलां फिल्म वैसी ही होगी तो आप को लाख समझाने के बावजूद कुछ नहीं किया जा सकता। जिन लोगों को लगता है कि विवेक का कैरेक्टर मैग्नेटो से प्रेरित है तो उस लिहाज से तो हर फिल्म में मैग्नेटो के विभिन्न रूप हैं तो क्या हर फिल्म किसी की कॉपी है। आप के पहले सवाल के जवाब में कहूंगा कि ‘आयरन मैन 3’ और ‘अवेंजर्स’ के आने से हमें बहुत नुकसान हुआ है, क्योंकि हमने तीन साल पहले इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की थी। उस वक्त हम संतुष्ट थे कि हमने वक्त से आगे की स्क्रिप्ट लिखी है, पर ‘अवेंजर्स’ और ‘आयरन मैन 3’ ने तो हमारे होश ही उड़ा दिए। उसके बाद हम लोगों के पास दो ही च्वाइस थी। एक कि चलो यहां के लोग समझ जाएंगे कि हम इंडियन हैं। तकनीक के मामले में थोड़ा पीछे ही रह लेंगे या तो वो जो हम कर सकते थे, हमने किया। हमने अपने आर्टिस्ट से बताया कि हॉलीवुड की फिल्में डब होकर भी आ रही हैं। अब छिपने की कोई जगह नहीं है। अब यह जानने का समय आ गया है कि हममें कितनी काबिलियत है? मैं यह नहीं सुनने वाला हूं कि हमने भी कोशिश की। हम उनसे बेहतर कर के दिखाएंगे। मैं कह रहा हूं आप को और सभी को हम उनसे बेहतर कर दिखाएंगे।
-रोहित के किरदार पर थोड़ी रोशनी डालना चाहेंगे। कितना चैलेंजिंग रहा इस बार और किस किस्म की तैयारियां करनी पड़ी रोहित के साथ, क्योंकि उसमें बचपना होने के साथ-साथ एक बाप की गंभीरता है। पिछली बार मुझे याद है, जब आपने बताया था कि रोहित की तरह सोचने के लिए कैसे आपने खुद को कई दिनों तक एक कमरे में बंद रखा था?
0 सही कहा आपने। पिछली बार रोहित का रोल प्ले करना आसान था। इस बार रोहित के दोनों इमोशन मुझे दिखाने थे। वह मैं करता कैसे? अगर वह अपने बेटे के सर पर हाथ रखकर उसे कन्सोल करना चाहेगा तो वह एक बच्चे की तरह कैसे बोलेगा? सबने काफी सिर खपाया, चूंकि रोहित का बचपन मेरे बचपन के काफी करीब था तो मेरे दिमाग में एक बात कौंधी कि अगर रोहित बड़ा होकर बाप बनता तो कैसे बिहेव करता? वहां से मुझे जवाब मिलना शुरू हो गया और फिर रोहित को निभाने में मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं हुई। हां शूटिंग के वक्त प्रॉब्लम बस होती कि कृष का जैकेट निकाल कर रोहित के गेटअप में आना, लंबी प्रक्रिया होती थी। मुंबई की गर्मी में, फिल्मसिटी के अंधेरे में छह-छह घंटे एक्शन कर हम पूरी तरह थक जाते थे। उसके बाद बैठकर रोहित के प्रोस्थैटिक मेकअप में तीन-चार घंटे जाया होते थे। वापस रोहित के इमोशन लाना बहुत लंबी प्रक्रिया होती थी। अब उसी सीन में रोहित-कृष्णा साथ-साथ हैं। ऐसे में समय बचाने की खातिर हम पहले कृष के सारे संवाद शूट कर लेते थे, फिर रोहित के सारे संवाद शूट करते थे। इमोशन लाना बहुत टफ था, क्योंकि मेरे सामने तो कोई है नहीं। मैं ही हूं। तो रोहित के संवाद बयां करते वक्त कृष्णा के सभी संवाद याद रखना, उसकी टाइमिंग का ख्याल रखना बहुत मुश्किल था, क्योंकि अदाकारी पूरी तरह टाइमिंग का खेल है। मैं रोहित के लिए इस बार सिंक-साउंड चाहता था, क्योंकि पिछली मर्तबा रोहित की आवाज डब करने में मुझे ढाई महीने लगे थे। इस बार भी रोहित की आवाज डब ही करनी पड़ रही है।



Friday, October 25, 2013

बच्चों काे पसंद आएगी ‘कृष 3’-राकेश रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
- ‘कृष 3’ आने में थोड़ी ज्यादा देर हो गई? क्या वजह रही?
0 ‘कृष 3’ की स्क्रिप्ट बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। मैं खुश नहीं था। उसे ड्रॉप करने के बाद नई स्क्रिप्ट शुरू हुई। उसका भी 70 प्रतिशत काम हो गया तो वह भी नहीं जंचा। ऐसा लग रहा था कि हम जबरदस्ती कोई कहानी बुन रहे हैं। बहाव नहीं आ रहा था। भारत के सुपरहीरो फिल्म में गानों की गुंजाइश रहनी चाहिए। इमोशन और फैमिली ड्रामा भी पिरोना चाहिए। मुझे पहले फैमिली और बच्चों को पसंद आने लायक कहानी चुननी थी। उसके बाद ही सुपरहीरो और सुपरविलेन लाना था। फिर लगा कि चार साल हो गए। अब तो ‘कृष 3’ नहीं बन पाएगी। आखिरकार तीन महीने में कहानी लिखी गई, जो पसंद आई। 2010 के मध्य से 2011 के दिसंबर तक हमने प्री-प्रोडक्शन किया।
- प्री-प्रोडक्शन में इतना वक्त देना जरूरी था क्या?
0 उसके बगैर फिल्म बन ही नहीं सकती थी। हम ने सब कुछ पहले सोच-विचार कर फायनल कर लिया। पूरी फिल्म को रफ एनीमेशन में तैयार करवाया। कह लें कि एनीमेटेड स्टोरी बोर्ड तैयार हुआ। अपने बजट में रखने के लिए  सब कुछ परफेक्ट करना जरूरी था। मेरे पास हालीवुड की तरह 300 मिलियन डॉलर तो है नहीं। स्ट्रांग कहानी और कंटेंट को फिल्माने के लिए सही स्ट्रक्चर जरूरी था। कृष इस फिल्म में मनुष्यों से नहीं लड़ता। उसकी लड़ाई मानवरों (म्यूटैंट््स) से होती है। वे मानवर तैयार करने पड़े। इतनी तैयारियों मे बाद भी मैं डरा हुआ था। रितिक से भी मैंने कहा कि इसे बंद करते हैं। उसने मुझे प्रेरित किया। जब विवेक का मैंने पहला शॉट ले लिया तो कंफीडेंस आया। 6 महीने में शूटिंग खत्म कर वीएफएक्स के पास भेज दिया गया।
- पोस्ट-प्रोडक्शन भी तो टफ रहा होगा? वीएफएक्स का इतना काम है?
0 शूटिंग खत्म होने के बाद मुझे पोस्ट प्रोडक्शन में लगना पड़ा। स्टूडियो में जाकर वीएफएक्स टीम के साथ बैठना पड़ा। सात-आठ करेक्शन के बाद अपनी कल्पना पर्दे पर उतरती थी। कल्पना को कम्युनिकेट करना मुश्किल काम होता है। मैंने फैसला लिया था कि विदेश नहीं जाऊंगा। मेरी राय में अपने देश के टेक्नीशियन काबिल हैं। हालीवुड की फिल्मों का वीएफएक्स काम भी भारत में होता है। हमारी समस्या है कि हम अपने टेक्नीशियन पर भरोसा नहीं करते और पर्याप्त समय नहीं देते। काम थोपने की हमारी चाहत और आदत भी बन गई है।
- ‘कृष 3’ जैसी फिल्म के लिए तकनीकी और साइंटिफिक जानकारी भी जरूरत पड़ी होगी?
0 टेकनीक और साइंस से ज्यादा कॉमन सेंस की जरूरत पड़ती है। बस थोड़ा सा दिमाग लगाना पड़ता है। ज्यादातर लोग वही बनाते और दिखाते हैं,जो वे देख चुके हैं। उसमें नवीनता नहीं रहती।
- आप पर भी तो 100 करोड़ क्लब का दबाव होगा? इस ट्रेंड के बारे में क्या कहेंगे्र
0 यह अच्छा नहीं है। 100 करोड़ तो बी क्लास फिल्मों का टारगेट है। भारत जैसे देश में ए क्लास फिल्म को ढाई सौ करोड़ का कारोबार करना चाहिए। इतने थिएटर और दर्शक हैं। ‘3 इडियट’ ने कम थिएटर के जमाने में उतना बिजनेस किया। वह ए क्लास फिल्म थी। मैं किसी दबाव में नहीं हूं। अभी एक दिन का अच्छा बिजनेस हो तो 40 करोड़ कलेक्ट हो सकता है। मैं तो आश्वस्त हूं। यूट््यूब पर ट्रेलर देखने वालों की संख्या को संकेत मानें तो पूरी उम्मीद बनी है।
- फिल्म के किरदारों के बारे में कुछ बताएं?
0 रोहित और कृष के बीच काफी सीन है। बाप-बेटे की कहानी चलेगी। कृष कहीं टिक कर नौकरी नहीं कर पाता। जब भी उसे कहीं से आवाज आती है तो वह बचाने निकल पड़ता है। बीवी भी उससे नाराज रहती है। वास्तव में यह एक परिवार की कहानी है। इस परिवार में सुपरविलेन आता है। उसके बाद कहानी खुलती जाती है।
- सुपरविलेन के लिए विवेक ओबेराय को कैसे राजी किया?
0 वह रोल इतना अच्छा है कि रितिक खुद करना चाहता था। मैंने उसे डांटा कि रोहित, कृष्ण और सुपरविलेन तीनों तुम ही करोगे तो मैं शूटिंग कितने दिनों में करूंगा? स्क्रिप्ट लिखे जाने के बाद विवेक ओबेराय और कंगना रनोट ही हमारे दिमाग में थे। विवेक बहुत अच्छे एक्टर हैं। उन्हें सही पिक्चर नहीं मिल रही है। वे कैरेक्टर रोल में जंचते हैं। कंगना रनोट में खास स्टायल है। वह रूप बदलने में माहिर है।
- रितिक के बारे में क्या कहेंगे?
0 वह मेरा बेटा जरूर है, लेकिन बहुत ही पावरफुल एक्टर है। वह हर रोल में जंच जाता है। ‘गुजारिश’ का बीमार लगता है तो ‘कृष 3’ का हीरो भी लगता है। ‘कोई ़ ़ ़ मिल गया’ में बच्चे के रूप में भी जंचा था। ‘जोधा अकबर’ में वह बादशाह भी लगा। इतनी वैरायटी उसके समकालीनों में किसी और में नहीं दिखती। ‘कृष 3’ में बाप-बेटे का सीन देखिएगा। आप चकित रह जाएंगे।


Friday, August 24, 2012

निर्देशन में राकेश रोशन के 25 साल

निर्देशन में राकेश रोशन के 25 साल-अजय ब्रह्मात्‍मज 
राकेश रोशन का पूरा नाम राकेश रोशनलाल नागरथ है। संगीतकार पिता रोशन के पुत्र राकेश को छोटी उम्र से घर की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। पिता की मौत के वक्त उनकी उम्र मात्र 17 साल थी। वयस्क होने से पहले ही पारिवारिक स्थितियों ने उन्हें जिंदगी के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने या पूना फिल्म इंस्टीट्यूट जाने की अपनी इच्छा का गला घोंट दिया और एस एस रवेल के सहायक निर्देशक बन गए। उन दिनों एच एस रवेल दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के साथ संघर्ष बना रहे थे। रवेल के आरंभिक प्रशिक्षण के बाद राकेश रोशन ने निर्देशक मोहन कुमार के साथ काम किया। मोहन कुमार के साथ उन्होंने अनजाना और आप आए बहार आई फिल्में कीं। राकेश रोशन की इच्छा कैमरे के सामने आने की थी। उन्हें टी प्रकाश राव के निर्देशन में बनी घर घर की कहानी में बतौर हीरो अवसर मिला। सीमा, पराया धन और मन मंदिर से उन्हें पहचान तो मिली, लेकिन हिंदी फिल्मों के कामयाब हीरो का रुतबा उन्हें नहीं मिला। वे फिल्में करते रहे। बीच में उन्होंने निगेटिव शेड के किरदार भी निभाए। बेहतरीन अवसर न मिलने से निराश होकर वे खुद फिल्मों के निर्माण में उतर आए। इस प्रयोग में भी उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। अंत में निर्देशन में उतरने का फैसला किया। सन 1987 में आई खुदगर्ज उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी।
खुदगर्ज के साथ निर्देशन में उतर कर राकेश रोशन ने करियर का बड़ा दांव खेला था। फिल्म नहीं चलती, तो उनका बेड़ा गर्क हो जाता। एक्टिंग के दिनों में भी राकेश रोशन फिल्म के प्रोडक्शन और डायरेक्शन की बारीकियों पर नजर रखते थे। चूंकि एक्टिंग में ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाने का अंदेशा उन्हें पहले से था, इसलिए करियर विकल्प के रूप में उन्होंने निर्देशन में हाथ आजमाने का मन बना रखा था। मेहनत काम आई। दोस्ती और रिश्ते पर आधारित खुदगर्ज खूब चली। राकेश रोशन चाहते, तो अपनी कामयाबी को फार्मूले के तौर पर अगली फिल्मों में दूह सकते थे, लेकिन उनकी अगली ही फिल्म खून भरी मांग थी। यह हीरोइन प्रधान फिल्म थी। राकेश रोशन कमर्शियल फिल्मों के कामयाब डायरेक्टर हैं। कमर्शियल ढांचे में वे प्रयोग करने से नहीं हिचकते। यही वजह है कि उनकी हर फिल्म पिछली फिल्म से अलग होती है। अपनी कामयाबी के बावजूद उन्होंने क्वालिटी को हमेशा प्राथमिकता दी। पचीस सालों के डायरेक्शन करियर में अभी तक उन्होंने केवल 12 फिल्में ही निर्देशित की हैं। कोई और सफल डायरेक्टर होता तो फिल्मों की झड़ी लगा देता। भले ही उनमें कुछ असफल रहतीं।
राकेश रोशन ने हमेशा अपनी प्रतिष्ठा का खयाल रखा। उन्होंने कुछ अद्भुत प्रयोग भी किए। हिंदी फिल्मों एलियन और सुपरहीरो पर केंद्रित फिल्में बनाने वाले वे पहले डायरेक्टर हैं। उनकी हर फिल्म सभी उम्र और तबके के दर्शकों को पसंद आती है। कोई मिल गया के बाद उन्होंने बच्चों को भी आकर्षित करना शुरू कर दिया है। उनके समर्पित दर्शकों में बच्चों की अच्छी तादाद है। राकेश रोशन ने कभी दावा नहीं किया कि वे कोई नई या गंभीर फिल्में बनाते हैं। वे मानते हैं कि दर्शकों के मनोरंजन के साथ वे फैमिली एंटरटेनमेंट की वैल्यू का ध्यान रखते हैं। उन्होंने आम दर्शकों के लिए फिल्में बनाई। उनकी फिल्मों का कैनवास बड़ा होता है और उसका प्रोडक्शन वैल्यू हाई क्वालिटी का रहता है। वे कहते हैं कि मैं अपनी तरह से इंटरनेशनल सिनेमा के स्तर की फिल्में बनाता हूं।
उनकी नई चुनौती कृष 3 है। इस फिल्म की शुरुआत के समय भी वे पहली फिल्म की तरह नर्वस थे। उन्हें हमेशा अगली फिल्म का निर्देशन मुश्किल काम लगता है। उन्होंने एक बार बताया था, प्लानिंग से लेकर रिलीज तक मेरी फिल्म में दो साल लग जाते हैं। मुझे दो साल बाद के दर्शकों की पसंद की फिल्म आज ही सोचनी पड़ती है। अच्छा है कि मैंने युवा सहायकों की टीम रखी है। वे मुझे हमेशा अलर्ट करते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि मैं भी उनकी सोच से तालमेल बिठा सकूं। अभी उन्हें रितिक रोशन से भरपूर मदद मिलती है। पिता-पुत्र की जोड़ी अभी तक कामयाब रही है। उम्मीद है कि वे आगे भी इसी तरह मनोरंजक फिल्में लाते रहेंगे।

Sunday, May 2, 2010

प्यार की उड़ान है काइट्स-राकेश रोशन

-अजय ब्रह्मात्‍मज


उनकी फिल्मों का टाइटल अंग्रेजी अक्षर 'के' से शुरू होता है और वे बॉक्स ऑफिस पर करती हैं कमाल। रिलीज से पहले ही सुर्खियां बटोर रही नई फिल्म काइट्स के पीछे क्या है कहानी, पढि़ए राकेश रोशन के इस स्पेशल इंटरव्यू में-

[इस बार आपकी फिल्म का शीर्षक अंग्रेजी में है?]

2007 में अपनी अगली फिल्म के बारे में सोचते समय मैंने पाया कि आसपास अंग्रेजी का व्यवहार बढ़ चुका है। घर बाहर, होटल, ट्रांसपोर्ट; हर जगह लोग धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे हैं। लगा कि मेरी नई फिल्म आने तक यह और बढ़ेगा। ग्लोबलाइजेशन में सब कुछ बदल रहा है। अब पाजामा और धोती पहने कम लोग दिखते हैं। सभी जींस-टीशर्ट में आ गए हैं और अंग्रेजी बोलने लगे हैं। यहीं से काइट्स का खयाल आया। एक ऐसी फिल्म का विचार आया कि लड़का तो भारतीय हो, लेकिन लड़की पश्चिम की हो। उन दोनों की प्रेमकहानी भाषा एवं देश से परे हो।

]यह प्रेम कहानी भाषा से परे है, तो दर्शक समझेंगे कैसे?]

पहले सोचा था कि भारतीय एक्ट्रेस लेंगे और उसे मैक्सिकन दिखाएंगे। बताएंगे कि वह बचपन से वहां रहती है, इसलिए उसे हिंदी नहीं आती। फिर लगा कि यह गलत होगा। यह सब सोच कर विदेशी लड़की ली और फिल्म की शूटिंग भी विदेश में की। हमारी फिल्म का हीरो जय है। वह इस लड़की के साथ टूटी-फूटी भाषा में कम्युनिकेट करता है। इस फिल्म में जबरदस्ती हिंदी संवाद नहीं रखे गए। अंग्रेजी संवादों को एक्सप्लेन भी नहीं किया गया है हिंदी में। लड़की स्पेनिश बोलती है और उसे हमारा हीरो समझ लेता है तो निश्चित ही दर्शक भी समझ लेंगे। प्यार किसी भाषा, मजहब और देश से बंध कर नहीं रहता। यह दो ऐसे प्रेमियों की कहानी है, जो एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते। ऐसे प्यार की मुसीबतें हो सकती हैं और फिर हम ने दिखाया कि दोनों प्यार के लिए किस हद तक जा सकते हैं? उन्हें अपने प्यार के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?

[काइट्स की थीम क्या है? किस तरह की प्रेमकथा है यह?]

रितिक ने मेरे साथ कहो ना ़ ़ ़ प्यार है की थी। काइट्स एक अलग लवस्टोरी है। इसमें हीरो-हीरोइन किसी और उद्देश्य से निकलते हैं, लेकिन रास्ते में कोई और चीज मिल जाती है। फिर उन्हें दुविधा होती है कि इस रास्ते जाएं या उस रास्ते ़ ़ ़ दूसरा रास्ता चुनते ही उनमें प्यार होता है। उसके साथ मुसीबतें भी बढ़ती है, फिर भी वे अपने प्यार का झंडा गाड़ते हैं। काइट्स यानी पतंगों की तरह वे हवा के खिलाफ उड़ते हैं। प्यार के आकाश में मिलते हैं। जितनी तेज हवा होगी, पतंग की उड़ान उतनी ऊंची होती है। काइट्स का सिंबोलिक इस्तेमाल किया गया है टायटल में।

[प्रयोग तो अच्छा है, पर क्या सबको पसंद आएगा?]

अभी कोई भी नहीं कह सकता कि काइट्स कितनी चलेगी, पर टेक्नीकली और मेकिंग के लिहाज से हमने व‌र्ल्ड स्टैंडर्ड के टेक्नीशियन और नो हाऊ का इस्तेमाल किया है। फोटोग्राफी, बैकग्राउंड, लोकेशन, परफार्मेस किसी भी फील्ड में आप काइट्स की तुलना दुनिया की अच्छी फिल्मों से कर सकते हैं। काइट्स के लिए मैंने 58 कारें खरीदी थी। एक एकड़ जमीन किराए पर लेकर गैराज बनाया था। वहां 16 मैकेनिक रोजाना काम करते थे। उन कारों को विशेष गाड़ियों से उठाकर शूटिंग के लिए ले जाया जाता था, क्योंकि बगैर रजिस्टर्ड नंबर प्लेट के आप कार सड़क पर नहीं चला सकते थे। हम हाईवे किराए पर लेकर अपनी शूटिंग करते थे। जो गाड़ियां ठुक जाती थीं, उन्हें रिपेयर किया जाता था। अभी तक हिंदी फिल्में इस पैमाने पर शूट ही नहीं की गई हैं।

[निर्देशन के लिए अनुराग बसु का नाम कैसे फाइनल हुआ? इस पर रितिक का रिस्पांस क्या रहा?]

डायरेक्टर अनुराग बसु के बारे में मैंने बाद में पता किया। पहले तो उस साल के सभी अवार्ड समारोह में कृष, मुन्नाभाई, रंग दे बसंती के साथ गैंगस्टर का नाम सुन कर मैं चौंक रहा था। मैंने गैंगस्टर मंगा कर देखी। मुझे अनुराग बसु का काम पसंद आया। मैंने अनुराग को बुलाया और पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई कहानी है? उसके ना कहने पर मैंने काइट्स की कहानी दी। उसे झिझक थी। उसने कहा भी कि,''मैं तो छोटे बजट की फिल्में लिखता और बनाता हूं, फिर रितिक के बारे में कैसे सोच सकता हूं।'' खैर, मैंने कहानी देकर कहा कि अगर तुम्हारे दिल को यह कहानी छुए तो इस पर काम शुरू करो। अनुराग ने एक महीने का समय मांगा। कुछ महीनों के बाद आकर अनुराग ने कहानी सुनाई। उसने कहानी का सुर पकड़ लिया था। उसका नैरेटिव मुझ से अलग था। मुझे उसकी कहानी पसंद आई। मैंने ग्रीन सिग्नल दिया तो भी अनुराग को विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से पूछा, ''आप सच्ची में मुझे रितिक दे रहे हैं?'' मैंने अनुराग को आश्वस्त किया कि सिर्फ रितिक ही नहीं दे रहा हूं। मैं भी तुम्हारे साथ हूं प्रोड्यूसर के तौर पर। तुम्हारे दिमाग में जो आता है लिखो और जितना उड़ सकते हो ़ ़ ़ उड़ो। फिर तो उसने ऐसी उड़ान भरी कि सभी को खुश कर दिया। पहली बार में ही रितिक मंत्रमुग्ध हो गया। उसका एक ही सवाल था कि कब शुरू करनी है फिल्म?

[आपको बॉलीवुड की चाल से हट कर काम करने वाला निर्माता माना जाता है। इतना रिस्क लेने से डर नहीं लगता?]

दरअसल..मैं एक तरह की फिल्में बना ही नहीं सकता। मैंने पिछली कामयाब फिल्म को कभी नहीं दोहराया। मैंने खुदगर्ज, खून भरी मांग, करण-अर्जुन, खेल, कहो ना ़ ़ ़ प्यार है, कोई ़ ़ ़ मिल गया और कृष जैसी फिल्म के बाद काइट्स का निर्माण किया। मैं हमेशा चैलेंजिंग विषय लेता हूं। शुरू में हमेशा लगता है कि इस बार फिल्म नहीं बन पाएगी, फिर चौकन्ना होकर काम करता हूं। मुझे यह सुनने का शौक है कि मेरी पिक्चर देखने के बाद लोग कहें कि वाह, क्या पिक्चर बनाई है?

Tuesday, April 1, 2008

मैसेज भी है क्रेजी 4 में: राकेश रोशन


राकेश रोशन ने अपनी फिल्म कंपनी फिल्मक्राफ्ट के तहत अब तक जितनी भी फिल्में बनाई हैं, सभी का निर्देशन उन्होंने खुद किया है, लेकिन क्रेजी-4 उनकी कंपनी की पहली ऐसी फिल्म है, जिसे दूसरे निर्देशक ने निर्देशित किया है। फिल्म में खास क्या है, बातचीत राकेश रोशन से।
अपनी कंपनी की फिल्म क्रेजी 4 आपने बाहर के निर्देशक जयदीप सेन को दी। वजह?
बात दरअसल यह थी कि कृष के बाद मैं बहुत थक गया था। इसलिए सोचा कि साल-डेढ़ साल तक कोई काम नहीं करूंगा, लेकिन छह महीने भी नहीं बीते कि बेचैनी होने लगी। एक आइडिया था, इसलिए मैंने सोचा कि यही बनाते हैं। मैंने जयदीप सेन से वादा किया था कि एक फिल्म निर्देशित करने के लिए दूंगा। इसलिए उनसे आइडिया शेयर किया। वह आइडिया सभी को पसंद आया और वही अब क्रेजी 4 के रूप में आ रही है। जयदीप के अलावा, अनुराग बसु भी मेरे लिए एक फिल्म निर्देशित कर रहे हैं। उनकी फिल्म गैंगस्टर से प्रभावित होकर मैंने रितिक रोशन और बारबरा मोरी की फिल्म काइट्स उन्हें दी है। मैं आगे भी नए और बाहर के निर्देशकों को फिल्में दूंगा। मेरे अंदर ऐसा गुरूर नहीं है कि अपने बैनर की सारी फिल्में मैं ही निर्देशित करूं।
आइडिया आपका था, लेकिन दूसरा निर्देशक उसे अपने हिसाब से रचेगा। क्या इस तरह की आजादी आप दे पाएंगे?
बिल्कुल आजादी देता हूं, लेकिन मुझे जंचना चाहिए। और हां, अगर मुझे कोई खामी दिखती है, तो मैं सुझाव जरूर देता हूं। मैं उनके साथ बैठता हूं। मेरी सहमति के बाद ही वे आगे बढ़ते हैं। दरअसल, वे मेरे अनुभव का लाभ उठाना चाहते हैं। अगर उनके अंदर अहं नहीं है और मेरे अंदर अहंकार नहीं है, तो बेहतर काम होगा ही। वैसे, एक सच्चाई यह भी है कि अगर कोई निर्देशक सुनने को तैयार नहीं हो, तो मैं उसके साथ काम ही नहीं करूंगा।
क्रेजी 4 किस तरह की फिल्म है और निर्देशक ने कैसी फिल्म बनाई है?
यह सोशल मैसेज देने वाली एक अच्छी फिल्म है और जयदीप ने संतोषजनक काम किया है। दरअसल, क्रेजी 4 में हम एंटरटेनिंग तरीके से सोशल मैसेज दे रहे हैं। इस फिल्म के माध्यम से हम यह बताना चाहते हैं कि लोग किसी को डांट कर या प्रवचन देकर नहीं समझा सकते। हां, अगर रोचक और मनोरंजक तरीके से कोई बात कही जाए, तो उसका असर ज्यादा होता है। यह फिल्म अरशद वारसी, राजपाल यादव, इरफान और सुरेश मेनन पर है। मैंने उन्हें बुलाकर कहा था कि यह फिल्म आप लोगों के कारण ही चलेगी, क्योंकि आपके कैरेक्टर और परफॉर्मेस की फिल्म है। आप एक-दूसरे पर हावी होने की कतई कोशिश मत करिएगा।
माना जाता है कि फिल्म चाहे जिस भी विधा की हो, उसमें लव स्टोरी होनी ही चाहिए?
यह कहानी मेरे पास पहले से थी और मुझे अभी का वक्त इसके लिए सही लगा। वैसे, मुझे उम्मीद है कि दर्शक इसे पसंद करेंगे। मेरी अन्य फिल्मों की तरह यह भी एंटरटेनिंग फिल्म ही होगी।
फिल्म का मैसेज क्या है?
फिल्म रोचक तरीके से यह सवाल हल करती है कि हम जिन्हें क्रेजी समझ रहे हैं, क्या वे सचमुच क्रेजी हैं या यह दुनिया क्रेजी है? चारों किरदारों के जरिए यह बात बहुत ही खूबसूरत अंदाज में कही गई है।
फिल्म में शाहरुख खान, रितिक रोशन और राखी सावंत को एक साथ लाने की वजह कहीं यह तो नहीं है कि फिल्म कमजोर पड़ रही थी?
बिल्कुल नहीं, ये सब फिल्म की जरूरत के हिसाब से आए हैं। शाहरुख और राखी नहीं होते, तो कोई और होता। मैंने उन दोनों से रिक्वेस्ट की और दोनों मान गए, तो फिर किसी और को लेने का सवाल ही नहीं था। रितिक फिल्मक्राफ्ट के निदेशक भी हैं। वे फिल्म में चारों किरदारों को इंट्रोड्यूस करते हैं।