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Sunday, April 9, 2017

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का - सुभाष कपूर

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का
-सुभाष कपूर
सबसे पहले तो मैं अक्षय कुमार को बधाई दूंगा। उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलना खुशी की बात है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अक्षय कुमार ऐसे अभिनेता रहे हैं,जो बार-बार राइट ऑफ किए जाते रहे हैं। फिल्‍मी पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी घोषणाएं होती रही हैं। समय-समय पर कथित एक्‍सपर्ट उनके अंत की भविष्‍यवाणियां करते रहे हैं। उनके करिअर की श्रद्धांजलि लिखी गई है। अक्षय कुमार अपनी बातचीत में इसका जिक्र करते हैं। इन बातों को याद रखते हुए वे आगे बढ़ते रहे हैं।
अच्‍छा है कि एक मेहनती और अच्‍छे अभिनेता की प्रतिभा को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार ने रेखांकित किया है। अभी वे जैसी फिल्‍में कर रहे हैं,जैसे किरदार चुन रहे हैं,जैसे नए विषयों पर ध्‍यान दे रहे हैं,वैसे समय में उनको यह पुरस्‍कार मिलना बहुत मानी रखता है।
अक्षय कुमार बहुत ही सरल अभिनेता हैं। वे मेथड नहीं अपनाते। वे नैचुरल और नैसर्गिक अभिनेता हैं। जॉली एलएलबी 2 के अनुभव से कह सकता हूं कि वे किरदार और फिल्‍म पर लंबे विचार-विमर्श में नहीं फंसते। अपने किरदार को देखने-समझने की उनकी आम लोगो की शैली है। मुझे ऐसा लगता है कि उसकी कॉमन मैन अप्रोच से वे फिल्‍म करने ना करने का फैसला लेते हैं।
अक्षय कुमार सौ फीसदी निर्देशक के अभिनेता हैं। वे सेट पर अधिक सवाल नहीं पूछते। वे अपने अनुभव या अभिव्‍यंजना को किरदार में जबरन नहीं डालते। डायरेक्‍टर की बात सुनते हैं। उसके निर्देशों का पालन करते हैं। मेरी फिल्‍म में उनके साथ कई प्रशिक्षित अभिनेता थे। वे उनकी बहुत इज्‍जत करते हैं। वे अक्‍सर कहते हैं कि प्रशिक्षित अभिनेताओं के सामने उनकी कोई काबिलियत नहीं है। फिर भी मैं कहूंगा कि कई बार वे चौंकाते हैं।
मेरी फिल्‍म में हीना सिद्दीकी के साथ के उनके सीन बहुत पावरफुल हैं। उन सीन में अक्षय कुमार ने पूर्ण समर्पण किया। उन्‍होंने सामने के कनाकार को पूरा मौका दिया। वे उन सीन में कुछ भी नहीं कर रहे हें। जाहिर सी बात है कि सीन में कैरेक्‍टर के महत्‍व को समझते हुए वे हीरोगिरी करने से बचते हैं। ऐसा ही एक सीन सौरभ शुक्‍ला और अन्‍नू कपूर के धरने पर बैठने का है। वहां जॉली चुपचाप रहता है। अक्षय कुमार का यह फेवरिट सीन है।
मुझे नहीं लगता कि किसी योजना के तहत अक्षय कुमार इस मुकाम पर आए हैं। सब कुछ होता गया और उस प्रवाह में दम साधे अक्षय कुमार बढ़ते रहे। लोकरुचि बदल रही है,वक्‍त बदल रहा है,इसका उन्‍हें भरपूर एहसास है। अपनी बातों में वे बताते हैं कि दर्शक कैसे बदल रहे हैं? वे कलाकारों और निर्देशकों से अपनी सोच में बदलाव लाने पर जोर देते हैं। खुद को उसी के अनुरूप वे बदलते गए। बदलते वक्‍त की समझ रखते हैं अक्षय कुमार। यह उनके काम की वैरायटी में साफ नजर आता है। वे निजी बातचीत में बगैर जुमलों के अपने विचार रखते हैं।
यह उनकी विनम्रता है कि वे स्‍वयं को फिल्‍म इंडस्‍ट्री का सबसे टैलेटेड या खूबसूरत एक्‍टर नहीं मानते। वे अपनी कड़ी मेहनत और अनुशासन का जरूर उल्‍लेख करते हैं। काम और प्रोफेशन के प्रति समर्पण को वे सर्वोपरि मानते हैं1 हां,एक बात जरूर कहूंगा कि उन्‍हें कैरा और लेंस की बहुत अच्‍छी समझ है। वे अपने परफारमेंस की बारीकी और निर्देशक की जरूरत समझते हैं।
अमिताभ बच्‍चन और विनोद खन्‍ना उनके आदर्श और प्रिय अभिनेता हैं।
( राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित सुभाष कपूर जॉली एलएलबी 2 के निर्देशक हैं। फिलहाल वे अक्षय कुमार के साथ मुगल की तैयारी कर रहे हैं।)

Saturday, February 11, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जॉली एलएलबी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
सहज और प्रभावपूर्ण
जॉली एलएलबी 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज

सुभाष कपूर लौटे हैं। इस बार वे फिर से जॉली के साथ आए हैं। यहां जगदीश त्‍यागी नहीं,जगदीश्‍वर मिश्रा हैं। व्‍यक्ति बदलने से जॉली के मिजाज और व्‍यवहार में अधिक फर्क नहीं आया है। लखनऊ में वकालत कर रहे जगदीश्‍वर मिश्रा उर्फ जॉली असफल वकील हैं। मुंशी के बेटे जगदीश्‍वर मिश्रा शहर के नामी वकील रिजवी के पंद्रहवें सहायक हैं। हां,उनके इरादों में कमी नहीं है। वे जल्‍दी से जल्‍दी अपना एक चैंबर चाहते हैं। और चाहते हैं कि उन्‍हें भी कोई केस मिले। अपनी तरकीबों में विफल हो रहे जगदीश्‍वर मिश्रा की जिंदगी में आखिर एक मौका आता है। पिछली फिल्‍म की तरह ही उसी एक मौके से जॉली के करिअर में परिवर्तन आता है। अपनी सादगी,ईमानदारी और जिद के साथ देश और समाज के हित वह मुकदमा जीतने के साथ एक मिसाल पेश करते हैं। जॉली एक तरह से देश का वह आम नागरिक है,जो वक्‍त पड़ने पर असाधारण क्षमताओं का परिचय देकर उदाहरण बनता है। हमारा नायक बन जाता है।
सुभाष कपूर की संरचना सरल और सहज है। उन्‍होंने हमारे समय की आवश्‍यक कहानी को अपने पक्ष और सोच के साथ रखा है। पात्रों के चयन,उनके चित्रण और प्रसंगों के चुनाव में सुभाष कपूर की राजनीतिक स्‍पष्‍टता दिखती है। उन्‍होंने घटनाओं को चुस्‍त तरीके से बुना है। फिल्‍म आम जिंदगी और ख्‍वाहिशों की गली से गुजरते हुए जल्‍दी ही उस मुकाम पर आ जाती है,जहां जगदीश्‍वर मिश्रा कोर्ट में शहर के संपन्‍न और सफल वकील प्रमोद माथुर के सामने खड़े मिलते हैं। मुकाबला ताकतवर और कमजोर के बीच है। अच्‍छी बात है कि फिल्‍म में इस मोड़ के आने तक जगदीश्‍वर मिश्रा हमारी हमदर्दी ले चुके होते हैं।
लोकप्रिय अभिनेता अक्षय कुमार ने जगदीश्‍वर मिश्रा की पर्सनैलिटी और एटीट्यूड को आत्‍मसात किया है। उन्‍होंने लखनऊ में वकालत कर रहे कनपुरिया वकील की लैंगवेज और बॉडी लैंग्‍वेज पर मेहनत की है। वे किसी भी दृश्‍य में निराश नहीं करते। लेखक और निर्देशक सुभाष कपूर ने लोकप्रिय अभिनेता की खूबियों को निखारा और विस्‍तार दिया है। अभिनेता अक्षय कुमार को जॉली एलएलबी2 में देखा जा सकता है। निश्चित ही यह फिल्‍म उनकी बेहतरीन फिल्‍मों में शुमार होगी। प्रतिद्वंद्वी वकील के रूप में अन्‍नू कपूर का योगदान सराहनीय है। इस फिल्‍म में कलाकारों के चुनाव और उनके किरदारों के चित्रण में खूबसूरत संतुलन रखा गया है। थिएटर के कलाकारों ने फिल्‍म के कथ्‍य को मजबूती दी है। चंद दृश्‍यों और छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार भी कुछ न कुछ जोड़ते हैं। जलगदीश्‍वर के सहयोगी बीरबल की भूमिका में राजीव गुप्‍ता याद रह जाते हैं। हां,ऊपरी तौर पर पुष्‍पा पांडे(जगदीश्‍वर की पत्‍नी) की कोई खास भूमिका नहीं दियती,लेकिन वह जगदीश्‍वर की जिंदगी की खामोश उत्‍प्रेरक है। ऐन मौके पर वह उन्‍हें प्रेरित करती है और साथ में खड़ी रहती है। हुमा कुरैशी ने अपने किरदार को पूरी तल्‍लीनता से निभाया है। जज के रूप में सौरभ श्‍ुक्‍लाा पिछली फिल्‍म की तरह फिर से प्रभावित करते हैं। वे हंसाने के साथ न्‍याय के पक्ष में दिखते हैं। हिना की भूमिका में सयानी गुप्‍ता असर छोड़ती हैं। उनकी आंखें दर्द बयान करती हैं।
जॉली एलएलबी2 चरमरा चुकी देश की न्‍याय प्रणाली की तरफ संकेत करने के साथ लोकतंत्र में उसकी जरूरत और जिम्‍मेदारी को भी रेखांकित किया है। सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी2 में हाई पिच ड्रामा नहीं है और न ही लोक लुभावन डॉयलॉग हैं। सरल शब्‍दों और सहज दृश्‍यों में कथ्‍य और भाव की गंभीरता व्‍यक्‍त की गई है। यह फिल्‍म सोच और समझ के स्‍तर पर प्रांसगिक और उपयोगी बातें करती है। अंतिम जिरह में जगदीश्‍वर मिश्रा जोरदार शब्‍दों में कहता है कि हमें इकबाल कादरी और सूर्यवीर सिंह दोनों ही नहीं चाहिए। दोनों ही देश और मानवता के दुश्‍मन हैं। अब जज को फैसला करना है कि दोनों जायज हैं कि दोनों ही नाजायज हैं।
जॉली एलएलबी2 में गानों की गुजाइश नहीं थी। ऐसा लगता है कि लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों के दबाव और फिल्‍म के प्रचार के लिए ही उन्‍हें रखा गया है। ठीक ही है कि निर्देशक ने उन्‍हें फिल्‍म में अधिक स्‍पेस नहीं दिया है।
अवधि- 136 मिनट
चार स्‍टार

Tuesday, February 7, 2017

मजेदार किरदार है जगदीश्‍वर मिश्रा- अक्षय कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
मंगलवार को जगदीश्‍वर मिश्रा फिल्‍मसिटी में द कपिल शर्मा शो की शूटिंग कर रहे थे। लखनऊ के जगदीश्‍वर मिश्रा वकील की वेशभूषा में ही थे। कपिल शर्मा को भी पहली बार समझ में आया कि किसी वकील से मजाकिया जिरह करने में भी पसीने छूट सकते हैं। यह अलग बात है कि कपिल शर्मा की मेहनत का यह पसीना छोटे पर्दे पर हंसी बन कर बिखरेगा। शो से निकलत ही जगदीश्‍वर मिश्रा प्रशंकों से घिर गए। जो पास में थे,वे सेल्‍फी लेने लगे और जो दूर थे वे उनकी तस्‍वीरें उतारने लगे। जगदीश्‍वर मिश्रा की पैनी निगाहों से कोई बचा नहीं रहा। वे सभी का अभिनंदन कर रहे थे। इस बीच चलते-चलते ड्रेसमैन ने उनका काला कोट उतार दिया। जगदीश्‍वर मिश्रा ने कमीज ढीली की और परिचित मुस्‍कराहट के साथ अक्षय कुमार में तब्‍दील हो गए। आप सभी को पता ही है कि सुभाष कपूर की नर्द फिल्‍म जॉली एलएलबी2 में अक्षय कूमार वकील जगदीश्‍वर मिश्रा की भूमिका निभा रहे हैं। वे पहली बार वकील का किरदार निभा रहे हैं।
अनुशासित और समय के पाबंद अक्षय कुमार फिल्‍मों की रिलीज के पहले कुछ ज्‍यादा व्‍यस्‍त हो जाते हैं। उन्‍होंने इंटरव्‍यू के लिए समय निकाला तो यह आग्रह किया कि फिल्‍मसिटी ही आ जाएं। यहां से जुहू लौटते समय रास्‍ते में बातचीत कर लेंगे। फिल्‍मसिटी से जुहू लौटने के 14 किलोमीटर के सफर में यह बातचीत उनकी गाड़ी में ही हुई। मुंबई में कुछ फिल्‍म स्‍टार ट्रेफिक का यह उपयोगी इस्‍तेमाल करते हैं। हमारी बातचीत मुख्‍य रूप से जॉली एलएलबी2 को ही लेकर हुई। फिल्‍मसिटी से निकलते ही अक्षय कुमार के नजर सामने पेड़ की डालियों पर उछलते-कूदते बंदर पर पड़ी और वे गाड़ी रोक कर बंदर देखने-दिखाने लगे।
अक्षय कुमार अपनी फिल्‍मों को लकर बहुत चूजी हैं। जॉली एलएलबी2 के चुनाव की वजह क्‍या रही? सुभाष कपूर,स्क्रिप्‍ट या फिर प्रोडक्‍शन बैनर? अक्षय बताते हैं,मैंने स्क्रिप्‍ट चुना। मुझे पार्ट 1 अच्‍छी लगी थी। मैंने स्क्रिप्‍ट के साथ आए सुभाष कपूर को भी चुना और प्‍लस मैंने फॉक्‍स स्‍टार के साथ पहले कोई फिल्‍म नहीं की थी। तो एक के बाद एक तीनों बातें हो गई,लेकिन पहली वजह स्क्रिप्‍ट ही रही। वास्‍तविक घटनाओं को लेकर लिखी गई यह स्क्रिप्‍ट मुझे बहुत अच्‍छी लगी।डिटेल में कुछ और बताने के आग्रह पर वे आगे कहते हैं, मैंने कभी वकील का रोल किया ही नहीं था। मैं अपनी फिल्‍मों के लिए नए किरदारों की तलाश में रहता हूं। उनके माध्‍यम से ही कुछ नया करने का मौका मिलता है। मुझे जगदीश्‍वर मिश्रा मजेदार किरदार लगा। यह सच होने के साथ एंटटेनिंग है। हमारी फिल्‍म न्‍यायपालिका की दिक्‍कतों की भी बात करती है। हमारे पास कम जज हैं। यही कारण है कि मुकदमों के फैसले में वक्‍त लगता है। अब आप ही बताएं न 21 हजार जज साढ़तीन करोड़ मुकदमों का फैसला कितनी जल्‍दी सुना पाएंगे?’क्‍या जगदीश्‍वर मिश्रा के बारे में भी कुछ बता सकेंगे? अक्षय मना कर देते हैं,वह बताऊंगा तो कहानी जाहिर हो जाएगी। एक हफ्ते के बाद आप खुद ही देख लेना न...
फिर भी उत्‍तर भारत के इस किरदार को निभाने और लखनऊ-बनारस में जाकर शूटिंग करने का अलग उत्‍साह तो रहा होगा। कैसा रहा अनुभव? अक्षय कुमार के लिए निर्देशक सुभाष कपूर ने जमीनी तैयारी कर दी थी। वे कहते हैं, मेरा आधा से ज्‍यादा होमवर्क सुभाष ने ही कर दिया था। वे मुझे गाइड करते रहे। इस फिल्‍म के कारण पहली बार बनारस गया और उफनती गंगा में डुबकी मारी। मैंने सोचा कि डुबकी लगा लो मेरे पाप भी धुल जाएंगे। पाप तो हो ही जाते हैं,बड़े हों या छोटे। बनारस के खान और पान का स्‍वाद लिया। मैं खाने का शौकीन हूं। मैं तो सभी से कहता हूं कि दिन में एक-डेढ़ घंटे कसरत करो और शाम में साढ़े छह बजे तक खा लो। फिर न तो कोई बीमारी होगी और न तकलीफ होगी। बनारस और लखनऊ के लोग प्‍यार और इज्‍जत देना जानते हैं। उनके मिजाज में थोड़ी मस्‍ती रहती है,लेकिन वही तो जिंदगी का मजा है।
जॉली एलएलबी2 में अक्षय कुमार के साथ हुमा कुरैशी हैं। अक्षय के पास उनकी तारीफ में बताने के लिए बहुत कुछ है,हुमा बेहतरीन एक्‍ट्रेस हैं। उन्‍होंने राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित फिल्‍मों में काम किया है। उन्‍हें भी अच्‍छा किरदार मिला है। पहली बार पर्दे पर दिखेगा कि हीरो घर में रोटियां सेंकता है।सब्जियां बनाता है। हुमा ने तो एक इंटरव्‍यू में कहा कि मुझे रियल लाइफ में ऐसा ही पति चाहिए। हुमा इस फिल्‍म में मुझे संभालती और नैतिक बल देती हैं। वह मुझे हिम्‍म्‍ती बनाती है।
अक्षय बताते हैं कि सुभाष कपूर ने पहले भी किसी के जरिए इस फिल्‍म के लिए मुझे अप्रोच किया था। तब बात नहीं बन सकी थी। बाद में मुलाकात हुई तो सब तय हो गया। हर फिल्‍म का वक्‍त होता है। अक्षय कुमार सुभाष कपूर को एकदम नया फिल्‍मकार नहीं मानते। वे कहते हैं,वैसे भी मेरे साथ नए फिल्‍मकारों ने ही काम किया है। यह कुछ संयोग है। मुझे लगता है कि नए फिल्‍मकार ज्‍यादा जोश  के साथ काम करते हैं। वे नई सोच और उम्‍मीद ले आते हैं। वे कुछ कर दिखाना चाहते हैं। सुभाष कपूर फिल्‍मों में आने के पहले जर्नलिस्‍ट रहे हैं। समाज मनोरंजन के साथ कहते हैं। उनकी समझ पैनी है और फिर वे कुछ बड़ी बात मनोरंजन के साथ करते हैं। उनकी फिल्‍मों का हास्‍य हंसाने के के साथ कचोटता भी है। जॉली एलएलबी2 को रेगुलर कॉमेडी फिल्‍म नहीं समझें। यह फिल्‍म जगदीश्‍वर मिश्रा के बहाने बहुत कुछ कहती है।

Sunday, June 14, 2015

मामूली लोग होते हैं मेरे किरदार -सुभाष कपूर


-अजय ब्रह्मात्‍मज
मैंने फंस गए रे ओबामा खत्‍म करने के समय ही गुड्डू रंगीला की स्क्रिप्‍ट लिखनी शुरू कर दी थी। बात ढंग से आगे नहीं बढ़ रही थी तो मैंने उसे छोड़ दिया और जॉली एलएलबी पर काम शुरू कर दिया था। उस फिल्‍म को पूरी करने के दौरान ही मुझे गुड्डू रंगीला का वैचारिक धरातल मिल गया। उसके बाद तो उसे पूरा करने में देर नहीं लगी। मैं स्क्रिप्‍ट जल्‍दी लिखता हूं। पत्रकारिता की मेरी अच्‍छी ट्रेनिंग रही है। समय पर स्‍टोरी हो जाती है। ग़ुड्डू रंगीला के निर्माण में अमित साध के एक्‍सीडेंट की वजह से थोड़ी अड़चन आई,लेकिन फिल्‍म अब पूरी हो गई है। मुझे खुशी है कि मैं अपने काम से संतुष्‍ट हूं।
जरूरी है वैचारिक धरातल
मेरे लिए फिल्‍म का वैचारिक धरातल होना जरूरी है। आप मेरी फिल्‍मों में देखेंगे कि कोई न कोई विचार जरूर रहता है। मैं किसी घटना या समाचार से प्रेरित होता हूं। उसके बाद ही मेरे किरदार आते हैं। गुड्डू रंगीला की शुरूआत के समय मेरे विचार स्‍पष्‍ट नहीं थे। यह तो तय था कि हरियाणा की पृष्‍ठभूमि रहेगी और उसमें खाप पंचायत की भी उल्‍लेख रहेगा। अटकने के बाद मैंने आधी-अधूरी स्क्रिप्‍ट छोड़ दी थी। जॉली एलएलबी पूरी होने के बाद मैंने स्क्रिप्‍ट फिर से पढ़ी। मुझे ऐसा लगा कि नई घटना को इसके साथ जोड़ दें तो स्क्रिप्‍ट रोचक हो जाएगी। आप को याद होगा कि हरियाणा में मनोज-बबली का मामला बहुत मशहूर हुआ था। दोनों एक ही गोत्र के थे और शादी करना वाहते थे। खाप पंचायत ने उन पर रोक लगाने के साथ आदेश नहीं मानने पर बुरे परिणाम की चेतावनी दी थी। तब मामला सरकार और संसद तक पहुंचा था। सरकारी तंत्र से उनकी सुरक्षा की घोषणा भी की गई थी,लेकिन वे बच नहीं सके थे। उस घटना ने मुझे झकझोर दिया। मैंने वहीं से प्रेरणा ली। मेरी फिल्‍म में वह घटना नहीं है,लेकिन खाप पंचायत और उनके आदेशों का जिक्र है। संक्षेप में मेरी फिल्‍म में खाप भी है और आप(दर्शक) भी हैं।

आसपास मिलती हैं कहानिय़ां
मैंने हमेशा अपनी जिंदगी के अनुभवों से ही कहानियां ली हैं। मैं प्रोजेक्‍ट नहीं बना सकता,जिसमें स्‍टार हों और सारे मसाले हों। मैंने जो देख,सुना और जिया है,उन्‍हें ही पेश करता हूं। मुझे अपने आसपास की विसंगतियों और विरोधाभासों में कहानियां मिलती हैं। मेरे किरदार मामूली लोग होते हैं। वे निजी स्‍तर पर माहौल से जूझ रहे होते हें। वे हंसाने या रुलाने के नहीं गढ़े जाते। उनकी स्थितियां ऐसी होती हैं कि दर्शक हंसते और भावुक होते हैं। गुड्डू और रंगीला ऐसे ही दो किरदार हैं। वे एक बैंड चलाते हैं और स्‍थानीय मौकों पर गाने-वाने गाते हैं। रंगीता नाम का ही रंगीला है। वह गंभीर स्‍वभाव का है। गुड्डू मस्‍तीखोर और आशिकमिजाज है। वह सभी का खुश करना और अपना काम निकालना जानता है। संयोग से दोनों ऐसी स्थितियों में फंसते हैं कि उनकी मुसीबत बढ़ जाती है।

कलाकारी दिखेगी फिल्म में
मेरी सभी फिल्‍मों में कलाकारों के अभिनय की तारीफ होती है। इस बार भी दर्शक संतुष्‍ट होंगे। अरशद वारसी उम्‍दा कलाकार हैं। वे विरोधाभासी किरदारों को बहुत अच्‍छी तरह निभाते हैं। अमित साध ने जबरदस्‍त काम किया है। उन्‍हें देख कर आप दंग रह जाएंगे। रोनित राय का किरदार और अभिनय दोनों ही प्रभावशाली है। उन्‍हें दर्शक याद रखेंगे। मेरी फिल्‍मों में महिला करदारों के लिए अधिक स्‍पेस नहीं रहता था। इस बार ऐसी शिकायत नहीं होगी। अदिति राय हैदरी गुड्डू रंगीला की प्रमुख किरदार होने के साथ सूत्रधार भी हैं।

फेसबुक पर माता का बुलावा
कल रात माता का मुझे ईमेल आया है,माता ने मुझ को फेसबुक पर बुलाया है गीत की प्रेरणा मुझे अपने बचपन से मिली। मेरी मां माता की भक्‍त हैं। घर में तब कैसेट बजा करते थे। नरेन्‍द्र चंचल जी के गाए माता के गीत सुबह से बजने लगते थे। तभी एक गीत सुना था,जिसमें माता जी का टेलीफोन आता है। मुझे लगा कि अगर तब माता के टेलीफोन की कल्‍पना की जा सकती है तो अभी फेसबुक और ईमेल के सहारे उनकी बात की जानी चाहिए। मेरे किरदार गुड्डू और रंगीला जिस तबके के हैं,वे ऐसे ही गीत गा सकते हैं। प्रोमो में इस गीत की पंक्तियों का लोगों ने काफी पसंद किया है। 

रहा हूं जल्दबाजी में
भविष्‍य की फिल्‍मों के बारे में अभी ठोस ढंग से कुछ नहीं कह सकता। दोतीन स्क्रिप्‍ट तैयार हैं। जॉली एलएलबी के सीक्‍वल की बात है। पहले ऐसा कोई इरादा नहीं था। गुड्डू रंगीला की शूटिंग के दरम्‍यान अरशद वारसी से मिलने आए प्रशंसकों में से अधिकांश ने कहा कि सीक्‍वल आना चाहिए। उसके बाद ही मैंने विचार किया और सीक्‍वल की प्‍लानिंग हो गई। कुछ लोगों को लगता है कि मैं लोकप्रिय सितारों के बगैर ही फिल्‍में बनाने में यकीन रखता हूं। अभी तक मैं जल्‍दबाजी में रहा हूं। ऐसी स्थिमि में सितारों के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता। अभी सोच रहा हूं कि उन्‍हें स्क्रिप्‍ट सुना कर फायनल कर लूं। जब उनकी तारीख मिलेगी,तब मैं तैयार रहूंगा। अभी कुछ और फिल्‍में कर लूंगा। मैं जिन सितारों के साथ अभी तक काम करता रहा हूं,उनसे पूरा समर्थन मिलता है। वे मेरी स्क्रिप्‍ट के प्रति समर्पित रहते हैं। और मैं अपनी बात भी कह लेता हूं।

मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि मैं कमर्शियल ढांचे में सुकून महसूस करता हूं। मेरी प्रिय फिल्‍मों में शोले और दो बीधा जमीन जैसी फिल्‍में हैं। मैं कमर्शियल मसाले या फार्मूले में यकीन नहीं रखता,लेकिन मानता हूं कि हिंदी कमर्शियल सिनेमा की कुछ विशेषताएं हैं। उन्‍होंने दशकों से देश के दर्शकों का मनोरंजन किया है। ग्‍लोबल होने के चक्‍कर में हम उन्‍हें खारिज न करें।

Thursday, April 17, 2014

राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों में युवा प्रतिभाएं छाईं

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फिल्मों के नेशनल अवार्ड के लिए इस साल ‘शाहिद’, ‘जॉली एलएलबी’, ‘थिप ऑफ थीसियस’ और ‘काफल’ के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘धूम 3’ ‘कृष 3’ जैसी फिल्में भी विचारार्थ थीं। सईद अख्तर मिर्जा के नेतृत्व में गठित निर्णायक मंडल ने हिंदी फिल्मों की उपधारा की फिल्मों को गुणवत्ता और कलात्मकता की दृष्टि से पुरस्कारों के योग्य समझा। यही वजह है कि ‘शाहिद’,‘जॉली एल एल बी’ और  ‘शिप ऑफ थिसियस’ और को दो-दो पुरस्कार मिले। पुरस्कारों की भीड़ में आज भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म फेस्टिवल निदेशालय के अधीन जरी नेशनल अवार्ड का महत्व बना हुआ है। देश भर के फिल्म कलारों और तकनीशियनों को इसकी प्रतीक्षा रहती है। इस बार युवा और योग्य फिल्मकारों, कलाकारों और तकनीशियनों को पुरस्कृत किया है।
    सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए पुरस्कृत ‘शाहिद’ के निर्देशक हंसल मेहता अपने पुरस्कार का श्रेय शाहिद आजमी को देते हैं। वे कहते हैं, ‘शाहिद आजमी के दृढ़ संघर्ष और जीवट ने मुझे इस फिल्म के लिए प्रेरित किया। भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे सामाजिक और सरकारी अत्याचार में शाहिद निहत्थे आरोपियों के साथ खड़े रहे। इसी के लिए उनकी जान गई। मैं यह पुरस्कार उनकी लड़ाई और यादों को समर्पित करता हूं। मेरे लिए अतिरिक्त खुशी की बात यह है कि मुझे उसी साल निर्देशन का पुरस्कार मिल रहा है, जिस साल मेरे गुरू और पथ निर्देशक गुलजार को दादा साहेब फालके पुरस्कार मिल रहा है। मैं उनके पांव छू कर पुरस्कार ग्रहण करने जाऊंगा।’ ‘शाहिद’ क लिए राजकुमार राव को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। वे यह पुरस्कार मलयाली फिल्म ‘पेरारियत्वर’  के अभिनेता सूरज वंजारा मूडु के साथ शेयर करेंगे। राजकुमार राव ‘शाहिद’ की भूमिका के लिए पहले ही प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुके हैं। नेशनल अवार्ड मिलने की खुशी जाहिर करते हुए वे कहते हैं, ‘मैं हंसल का शुक्रगुजार हूं। उन्होंने मुझे शाहिद आजमी की बायोपिक में मुख्य किरदार निभाने का मौका दिया। पुरस्कार तो सभी की तरह मैं भी चाहता हूं, लेकिन मैंने इसकी अपेक्षा नहीं की थी। यही कहूंगा कि काम के प्रति ईमानदारी बनी रहे। मैं कभी बेईमानी ना करूं। मैंने पुरस्कार की सूचना सबसे पहले ‘डॉली के डॉली’ के निर्माता अरबाज खान और निर्देशक अभिषेक डोगरा को दी। परिवार में मां और बहनों से बातें हुईं।’
    इस साल सुभाष कपूर की व्यंग्यात्मक फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित हुई। इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का पुरस्कार सौरभ शुक्ला को मिला है। सौरभ कहते हैं, ‘यह मेरा पहला नेशनल अवार्ड है। इसकी अलग महत्ता है। मुझे खुद से ज्यादा खुशी ‘जॉली एलएलबी’ के लिए है। उसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिला है। ‘जॉली एलएलबी’ के निर्देशक सुभाष कपूर अभी ‘गुड्डू रंगीला’ की शूटिंग कर रहे हैं। फोन पर वे बताते हैं। ‘मैं अपनी टीम और निर्माता के लिए खुश हूं। उन्होंने मुझ पर भरोसा किया और ऐसी फिल्म में मदद की। अच्छी बात है कि मेरी फिल्म को दर्शकों ने भी सराहा और अब यह फिल्म पुरस्कृत हो रही है। मेरा जोश और विश्वास बढ़ गया है।’
    नेशनल फिल्म अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का पुरस्कार राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘भाग मिल्खा भाग’ को मिला है। सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म बतुल मुख्तियार की ‘काफल’ है, जिसका निर्माण चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी ने किया है। हिंदी में बनी कमल स्वरूप की ‘रंगभूमि’ को सर्वश्रेष्ठ गैरफीचर फिल्म का पुरस्कार मिला। इस फिल्म में दादा साहेब फालके के जीवन के संघर्ष और विजय का चित्रण है। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार ‘लायर्स डाइस’ की गीतांजलि थापा को मिला है।
    पुरस्कारों की सूची से यह भान होता है कि निर्णायक मंडल ने सभी भाषाओं में नई प्रतिभाओं की फिल्मों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने भारतीय सिनेमा में कथ्य और शिल्प में हो रहे परिवत्र्तनों को महत्व देते हुए दिग्गजों की मुख्यधारा की फिल्मों को दरकिनार किया। फिर भी ‘द लंचबॉक्स’ को किसी पुरस्कार के योग्य न समझना असमंजस पैदा करता है। यह फिल्म देश-विदेश में दर्शकों और समीक्षकों द्वारा अत्यंत सराही गई।

Monday, August 5, 2013

संग-संग : सुभाष कपूर-डिंपल खरबंदा



हमसफर
-अजय ब्रह्मात्मज

जॉली एलएलबी के निर्देशक सुभाष कपूर ने पत्रकारिता से करिअर आरंभ किया। उन्हीं दिनों डिंपल से उनेी मुलाकात हुई। दोनों पहले दोस्त,फिर प्रेमी और आखिरकार पति-पत्नी बन गए। उनके सुखी दांपत्य का सीधा रहस्य है परस्पर विश्वास और एक-दूसरे की क्षमताओं को बढ़ावा देना। दोनों दिल्ली से मुंबई आ गए हैं।
मुलाकात और परिचय
सुभाष कपूर - पहली मुलाकात हमारी होम टीवी में हुई। जहां ये पहले से काम कर रही थीं। मुझे तारीख तक याद है। 2 जनवरी 1995 को हम मिले थे। करण थापर के साथ ऑफिस में मेरा पहला दिन था। पहले दिन जिन चार-पांच लोगों से मिला उनमें से एक डिंपल भी थीं। मुझे एक चीज बहुत स्ट्राइकिंग लगी थी। इनके टेबल पर जेम्स बांड की फिल्म ‘टुमोरो नेवर डाइज’ का दीवार से उखाड़ा पोस्टर लगा हुआ था। इन्होंने जिंस और जैकेट-टी शर्ट वगैरह पहन रखा था। गोरी-चिट्टी छोटे बालों की सुंदर लडक़ी को देख कर मैं दंग रह गया था। मैं तो हिंदी मीडियम से पढ़ कर आया था। ऐसी लड़कियां कहां देखता?
डिंपल - मैं करनाल की हूं। मेरा परिवार पहले वहीं था। बाद में हमलोग दिल्ली चले आए। तकरीबन 14 साल की उम्र में दिल्ली आए। एलएसआर कॉलेज में मैंने पढ़ाई की। शुरू से ही मुझे मीडिया में जाने का मन था। जर्नलिज्म की पढ़ाई कर मैंने पहले प्लस चैनल और होम टीवी में काम किया। मुझे याद है हमारी एक प्रोडयूसर मेखला देवा ने सुभाष से मिलवाया था। ये स्क्रिप्ट रायटर के तौर पर आए थे। मुझे इनकी पतली-दुबली कद-काठी याद है। गले में मफलर, घनी मूंछें और कुछ सोचती गहरी आंखें। मुझे लगा कि यह कोई गहरी सोच का हिंदीभाषी व्यक्ति है।
जब मुझे पता चला कि ये नुसरत फतह अली से मिलने जा रहे हैं तो मुझे बहुत गुस्सा आया। कल के छोकरे को यह मौका मिल रहा है।
सुभाष कपूर - हम नुसरत साहब से होटल में मिलने गए। वे गोश्त के बहुत शौकीन थे। मटन बिरियानी मंगवाई थी। मैंने भी छक कर खाया ।
डिंपल - फिर इन्होंने मिर्जा गालिब के घर पर एक स्टोरी की। मैं वह खुशनसीब थी, जिसे इन्होंने पहले वह स्टोरी दिखाई। वह बहुत ही अच्छी स्टोरी थी। होम टीवी की बेस्ट फीचर स्टोरी मानी गई थी। मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी।
सुभाष - डिंपल की स्टोरी विजुअली बहुत स्ट्रांग मानी जाती थी। वह रेफरेंस पाइंट होती थी। अगर आप फीचर कर रहे हैं तो उसका लुक और सीन डिंपल की स्टोरी की तरह होना चाहिए। इनका विजुअलाइजेशन और कटिंग पैटर्न बहुत अच्छा हुआ करता था। वह मेरी पहली क्रिएटिव स्टोरी थी। मुझे भी लग रहा था कि अ'छा काम हुआ है।
डिंपल - बाद में तो ये बहुत मशहूर हो गए। करण थापर तक बात पहुंची। उन दिनों तकरीबन हर शो की स्क्रिप्ट सुभाष ही लिखने लग गए थे। मैं भी चकित थी कि यह लडक़ा बड़ी तेजी से ऊपर जा रहा है। थोड़ी सी ईष्र्या भी होती थी।
रफ्ता रफ्ता आए करीब
डिंपल - होम टीवी के दिनों में ही सुभाष ने मुझे अपने दिल टूटने की कहानी सुनाई थी।
सुभाष - हां, मेरा दिल टूटा था। कहीं तो गुबार निकालना था। आज कल 24 साल के बच्चे बहुत बड़े हो जाते हैं। हम तो नौसीखिए थे। उस उम्र में दिल टूटने का दर्द बयान करने में बड़ा मजा आता है। आओ,प्यार के दो बोल बोलो। आओ,सहानुभूति जताओ।  डिंपल से काफी बातें होती थी।  हमने साथ में ज्यादा काम नहीं किए। हमारे बीच एक तार जुड़ चुका था। इनके सामने मैंने दिल के नाले खूब बहाए।
डिंपल - मेरे मन में इनके दिल टूटने को लेकर ज्यादा सहानुभूति नहीं थे। अगर इस उम्र में मोहब्बत करोगे तो दिल तो टूटेगा। अभी करिअर पर ध्यान देना चाहिए।
सुभाष - 23-24 साल का लडक़ा इश्क नहीं करेगा तो कब करेगा?
डिंपल - तब मुझे लगता था कि 27-28 की उम्र तक तो करिअर पर ही ध्यान देना चाहिए। सुभाष जितनी पॉलिटिक्स की बातें करते थे उससे मुझे लगता था कि ये किसी आईएस ऑफिसर के बेटे होंगे। इन्हें देश की राजनीति, छात्र राजनीति और बाकी चीजें मालूम थी। मुझे यह भी लग रहा था कि सुभाष पॉलिटिक्स में जाएंगे।
विचार-विमर्श
डिंपल-बाद में पता चला कि इनका संबंध माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से था। उस समय मेरा ब्रेनवॉश होना शुरू हुआ। ये सुहैल हाशमी के साथ मिलकर मेरे दिमाग की धुलाई करने लगे। सुहैल हम दोनों के शुभचिंतक, गाइड और फिलॉस्फर हैं। सुहैल के घर जाते थे हम लोग। डिनर और बहसें होती थी। इन दोनों ने मिल कर मुझ कांग्रेसी को कम्युनिस्ट बनाने की मुहिम शुरू कर दी।
सुभाष - लेफ्ट से मेरा संबंध कॉलेज के दिनों में बना। मैं तो कहूंगा कि अच्छा संयोग था वर्ना किसी कपड़े की दुकान पर ल_ा काट रहा होता। 1989 में मैंने कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज जाने के दूसरे या तीसरे दिन ही जन नाट्य मंच का एक स्ट्रीट थिएटर हो रहा था। सफदर हाशमी थे। मैंने उसके पहले कभी स्ट्रीट थिएटर नहीं देखा था। मैंने महाराणा प्रताप, शिवाजी और भगत सिंह के नाटक देखे थे। किसी समाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर नाटक की कल्पना ही नहीं कर सकता था। सफदर ने ‘राजा का बाजा’ का मंचन किया था। उसे देख कर मेरी तो हवा उड़ गई। नाटक के बाद हम लोग सफदर से मिले। 15-20 मिनट में हम लोग ने साथ में चाय पी और बातें की। हमारी इच्छा देख कर सफदर ने नाटक करने के लिए बुला लिया। वहां से हमारा सफर शुरू हुआ।
डिंपल - मेरे लिए तो एक लाइन की खबर थी कि सफदर की हत्या हो गई है। सुभाष ने मुझे सफदर के बारे में बताया। सुहैल के वे बड़े भाई थे और सुभाष उन्हें गुरू मानते थे। धीरे-धीरे मैं इनकी सोच की हो गई। सच्चाई यह है कि मैं फिल्ममेकिंग के कोर्स के लिए कनाडा जाने वाली थी। मैंने किसी और भावना को मन में जन्म नहीं लेने दिया था। तब तक सुभाष मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो गए थे। मेरी हर समस्या का निदान सुभाष थे। कुछ भी होने पर मैं पहला फोन सुभाष को ही करती थी। सुभाष बड़े ही तार्किक व्यक्ति हैं। किसी भी समस्या को वे तर्क से समझाते थे। मुझे ये बड़े संतुलित इंसान लगे। बाद में हमने टीवीआई की नौकरी की। उन दिनों साथ-साथ मंडी हाउस जाया करते थे। साथ में नाटक देखे, त्रिवेणी में बैठे। प्रदर्शनी देखी और अंत में इन्हें एसएफआई के ऑफिस में छोडक़र मैं घर चली जाती थी। इनकी दुनिया मुझे आकर्षित करती थी। किसी और के लिए लडऩे के लिए हमेशा तैयार। मैं तो ‘मी माई सेल्फ’ कल्चर की लडक़ी थी। इनके विचारों और भावनाओं ने असर दिखाना शुरू किया।
हुआ एहसास जब
सुभाष - शुरू में तो ऐसी कोई फीलिंग नहीं थी। दो-तीन सालों के दोस्ती के बाद यह लगने लगा था कि डिंपल को लेकर मैं सीरियस हूं। साथ ही यह भी पता था कि मेरा एहसास एकतरफा है। डिंपल कोई भाव दे नहीं रही थीं। फिर भी अच्छी दोस्ती थी और मैं यह दोस्ती खोना नहीं चाहता था। कुछ समय ऐसे भी कटे जब मैं तो इमोशनल हो चुका था, लेकिन इनके प्रति श्योर नहीं था। एक कशमकश सी रही। वजह यह थी कि डिंपल बहुत ही महत्वाकांक्षी लडक़ी थीं। कनाडा जाकर फिल्म मेकिंग सीखना चाहती थीं। वल्र्ड सिनेमा का इनका एक्सपोजर हम सब से ज्यादा था। उनकी सोच थी कि अभी करिअर बनाओ,बाद में इश्क-मोहब्बत के बारे में सोचो। डिंपल का फोकस हमेशा क्लियर रहा और मैं हमेशा आउट ऑफ फोकस रहता था। मोहब्बत बताने की मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी।
डिंपल - शुरू में तो मैं दोस्ती ही समझती रही। बाद में जरूर मैंने भी महसूस किया। मेरे आस-पास के लोग बोलने लगे थे कि तुम दोनों बहुत समय एक साथ बिताते हो। क्या चल रहा है? मैं मजाक में टाल देती थी। मैं उन्हें कहती थी कि मैं तो वैनकोवर जा रही हूं। एक दो करीबी दोस्त कभी तंज मारते थे। मैं समझ नहीं पा रही थी कि लोग ऐसा क्यों सोच रहे हैं। एक बार तो लगा कि जरूर सुभाष ने कुछ बोला होगा। उन्हीं दिनों टीवीआई बंद हो गया और हम सभी तारा पंजाबी में साथ काम करने लगे थे। बाद में सुभाष का कोई झगड़ा हो गया और वह छोड़ कर चले गए। उन्होंने कुछ बताया नहीं। मुझे गुस्सा आया कि मैं लेकर आई थी और मुझे ही नहीं बताया। मैंने सुभाष को फोन पर बहुत डांटा। तब बहुत इमोशनल और नाराज हो गई थी। फिर बाद में सोचा कि मैं क्यों इमोशनल हो रही हूं? फिर मुझे एहसास हुआ कि हमारे बीच दोस्ती से ज्यादा कुछ हो चुका है।
करिअर और कशमकश
डिंपल-मैंने सुभाष को बताया कि मेरा एफटीआईआई में एडमिशन हो गया है। मैं टॉप 5 में चली गई थी। सुभाष ने तब यही कहा था कि फिल्में तो मैं वैसे ही बना लेंगे। तुम एफटीआईआई जाकर क्या करोगी? जिंदगी के चार साल और गुजर जाएंगे। फिल्में कब बनाओगी? फिर समझाया हम सभी मिलकर मुंबई चलेंगे। सुभाष मुझे सपना दिखाते रहे। सुभाष ने मुझे कंवेंश कर दिया। दिल्ली में एक और कंपनी मैंने ज्वॉइन की। वहां भी सुभाष को बुलाया। उन्हीं दिनों सुभाष ‘रामलीला’ नाम की डाक्यूमेंट्री कर रहे थे। उस शो के दौरान ही हम दोनों ज्यादा करीब आए। एक दिन इनकी बीमार होने के बावजूद मैंने लगभग आदेश देते हुए ऑफिस में बुलाया। मुझे बाद में एहसास हुआ कि मैंने कुछ ज्यादती कर दी। 103 बुखार में इन्हें देख कर मुझे तिलमिलाहट हुई। मेरी एक दोस्त ने कहा भी कि तू झूठ-मूठ का कंफ्यूजन क्रिएट कर रही है। सच्ची बात नहीं बता रही है।
सुभाष - आखिरकार मैंने पहल की और इंडिया गेट पर टहलने के दौरान अपनी दिल की बात कह दी। ढाई सालों से जो बात अंदर कुलबुला रही थी वह आखिर फूट ही पड़ी। इंडिया गेट के सामने मैदान में टहलते-टहलते मैंने कह ही दिया आप बुरा मत मानिएगा मैं यह बात कहना चाहता हूं कि ‘आई एम इन लव विद यू।’ यह सन 2000 की बात है। 20 अप्रैल 2001 को हमारी शादी हुई। उस दौर में प्रेमी-प्रेमिका के चुनाव में हम यह नहीं देखते थे। हम उसका बैकग्राउंड, करिअर  और फ्यूचर के बारे में अधिक नहीं सोचते थे। हम लोगों के कई साथियों ने शादी करते समय ऐसा नहीं सोचा। तब मोहब्बत में शर्तें नहीं हुआ करती थीं। डिंपल अपर मिडिल क्लास की थी। मैं लोअर मिडिल क्लास से आता था। लेकिन कभी इस तरह की बातें नहीं हुईं।
डिंपल - हम दोनों पहले ही बहुत अच्छे दोस्त हो गए। मुझे सुभाष के परिवार के बारे में पहले से मालूम था। ज्यादातर चीजें मालूम थीं। मैं सारा श्रेय अपने पिता को देना चाहूंगी। मुझे एक क्षण को नहीं लगा कि मेरे पापा क्या कहेंगे? उनकी तरफ से मुझे हमेशा आजादी मिली हुई थी। वे मेरे फैसलों पर भरोसा करते थे। मैं निश्चित थी कि पापा से बात करूंगी तो समर्थन ही मिलेगा। करीबी दोस्तों से शेयर किया कि हमलोग ऐसा सोच रहे हैं। सभी ने समर्थन किया। मुझे थोड़ी-बहुत चिंता मां की थी। मैंने तय कर लिया था कि मुझे इसी माहौल में सुभाष के साथ रहना है। सुभाष ने जब बताया कि इनका बैंक बैलेंस 80 हजार रुपए है तो मैं चकित रह गई।
सुभाष - इनको यकीन ही नहीं हुआ। शादी की बात पक्की हो गई। डिंपल ने यों ही एक बार पूछा कि शादी तो हो जाएगी, लेकिन पैसे-वैसे हैं क्या? फिर मैंने बताया कि मेरे पास तो 85 हजार रुपए हैं। ये सोच रही थी कि दसेक हजार ही होगी। मैंने अपने शादी के लिए इक_े कर रखे थे।
डिंपल - जब मैंने पिताजी को बताया तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि यह तो मैं सोच ही रहा था। शादी ही करनी है तो सुभाष क्यों नहीं? वे एक अलग जोन में थे।
विवाह और परस्पर विश्वास
सुभाष - हम दोनों शादी की संस्था में यकीन करते थे। तब भी यह सवाल उठा था कि शादी क्यों? मैं पलट कर पूछता था कि शादी क्यों नहीं? कभी यह ख्याल नहीं आया कि लिवइन या ट्रायआउट किया जाए। हमलोग 1996 में मिले और शादी 2001 में किए तो 6 साल हमलोग मिलते रहे थे। हम दोनों एक दूसरे का बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे। डिंपल को हमारी जिंदगी और आयडॉलॉजी पसंद आ गई थी। किसी होड़ से बाहर की जिंदगी उन्हें पसंद थी। मेरे नजदीकी लोगों में डिंपल पहली लडक़ी थी जिन्होंने मुझे एहसास दिलाया कि तुम कुछ कर सकते हो। अपने काम में मैं सफल था। लोग तारीफ करते थे, लेकिन डिंपल ने स्पेशल होने का एहसास दिलाया। मेरे जीवन,करिअर और काम को लेकर फोकस इनकी वजह से आया। मैं स्पष्ट था कि इस संबंध से मुझे क्या मिलेगा? डिंपल ने ही बताया था कि मैं फिल्म भी लिख सकता हूं। मैंने सोचा नहीं था कि ‘मिर्जा गालिब’ और ‘रामलीला’ पर स्टोरी बनाऊंगा। डिंपल ने मुझे गाइड करने के साथ आत्मविश्वास दिया।
डिंपल - हम दोनों कुछ करना चाहते थे। एक दूसरे से हिम्मत मिल रही थी। मैंने शादी से तीन महीने पहले नौकरी छोड़ दी। उस समय अच्छे-खासे पैसे मिल रहे थे।
सुभाष - तब इनकी सैलरी 45 हजार थी। मैं तो 20 हजार रुपया कमाता था।
डिंपल - शादी के बाद हमने दिल्ली में अपना कारोबार शुरू किया।
सुभाष - 2001 में ‘रामलीला’ बनी थी। मैं उसे अपनी शादी का तोहफा मानता हूं। उस फिल्म ने कुछ अवॉर्ड जीते। मुझे भरोसा हुआ और डिंपल ने उसे गहरा किया। सिनेमा में फ्यूचर हो सकता था। तब मैं आज तक में नौकरी की कोशिश कर रहा था। तब तक शादी हो चुकी थी। डिंपल नौकरी छोड़ चुकी थी। एक असमंजस चल रहा था कि क्या किया जाए? प्रोडक्शन कंपनी खोल ली थी और थोड़ा-बहुत काम कर रहे थे। उन दिनों सभी कोई नौकरी छोड़ कर अपना काम शुरू कर रहे थे।
अहम फैसला
डिंपल - उस दौरान सुभाष ने एक स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू किया। किसी दोस्त के लिए यह काम कर रहे थे। मैं उसे पढ़ती जा रही थी। मैं कहती भी थी कि तुम कमाल लिख रहे हो। बिल्कुल फिल्म है। मैं शब्दों को चित्रों में देख सकती हूं। किसी समय मैं फिल्म मेकिंग का कोर्स करना चाहती थी। सुभाष ने जब आधी स्क्रिप्ट लिखी। इसी प्रकार  एक और स्क्रिप्ट की पंद्रह-सोलह सीन लिखे। फिर मुझे लगा कि कितना अच्छा लिख रहे हैं सुभाष। मैंने ही कहा कि तुम तो स्क्रिप्ट लिख सकते हो।
सुभाष - रायटर तो मैं पहले से ही अच्छा माना जाता था। यह एहसास नहीं था कि फिल्म भी लिख सकता हूं। डिंपल अप्रत्यक्ष रूप से मेरा इरादा मजबूत कर रही थी।
डिंपल - 2004 में हमारा बेटा हुआ। तब इनकी अच्छी कमाई चल रही थी। इन्हें लग रहा था कि जीवन बहुत अच्छा चल रहा है। हमने एक बड़ा सा घर ले लिया था। बेटा हो चुका था। सुभाष ने कहा भी कि फिलहाल मुंबई नहीं जाते हैं। यहां अच्छा चल रहा है इसी को मजबूत करते हैं। मुझे याद है सुभाष किचन के स्लैब पर बैठे हुए थे और मैं कुछ काम कर रही थी। मुझे अपने शब्द याद है मैंने कहा था - सुभाष तुम इस साल बहुत भाग्यशाली रहे। हो सकता है अगले साल तुम्हारे हाथ कोई प्रोजेक्ट न आए। बाद में अफसोस करोगे कि मुंबई भी नहीं गए और यहां भी काम बंद हो गए। अब तुम्हें मुंबई जाना चाहिए।
सुभाष - तब बेटा छोटा था। मैं सोच रहा था कि थोड़ा दिल्ली और थोड़ा मुंबई करते हैं। एक बार जब सब कुछ ठीक हो जाए तो शिफ्ट कर जाएंगे। यह भी दिमाग में था कि गुलाल थोड़ा बड़ा हो जाए तो चले जाएंगे।
डिंपल - गुलाल के पौने दो साल के होने पर हम मुंबई चले आए। सुभाष ने पहली फिल्म ‘से सलाम इंडिया’ साइन कर ली। तब हम चले। हम लोग सोच-समझ कर आए,फिर भी एक दांव तो था ही। ख्याल था कि कोई स्क्रिप्ट मिल जाए या संवाद लेखन मिल जाए, कॉरपोरेट करने का भी इरादा था। दिल्ली में एक प्रोजेक्ट मिलते-मिलते रह गया। थोड़ी निराशा भी थी। अभी लगता है कि हमें दिल्ली नहीं रुकना था,इसीलिए हमें वह काम नहीं मिला। अगर वह काम मिल जाता तो दो साल तक हिलते ही नहीं।
सुभाष - कहीं से भी यह योजना नहीं थी कि मुझे डायरेक्टर बनना है। बनना चाहता था,लेकिन प्लानिंग नहीं थी। मैंने क्रिकेट पर एक स्क्रिप्ट लिखी। डिंपल ने स्क्रिप्ट को अच्छी तरह समझाने के लिए उसका एवी प्रजेंटेशन तैयार किया। मैं उसे पिच कर रहा था। सभी उसे देख कर दंग रह जाते थे। बाद में धीरे-धीरे लोगों ने कहना शुरू किया कि आप ही क्यों नहीं डायरेक्ट कर लेते। डिंपल ने दिल्ली में एक कॉरपोरेट को दिखाया। उन्हें बहुत पसंद आई। वे रिबॉक और दूसरे स्पॉन्सर की बात करने लगे। डिंपल ने यह बात बताई तो यहां मैंने निर्माताओं को बताया। वे खुश हो गए। उनके हौसले बढ़े। वे निर्माण के लिए तैयार हो गए और मैं डायरेक्टर बन गया। मेरे डायरेक्टर बनने में डिंपल के पांच मिनट के एवी का बहुत बड़ा रोल है। मुझे नहीं लगता कि मैंने बहुत ज्यादा स्ट्रगल किया है।
डिंपल - दो-ढाई साल की अनिश्चितता जरूरी रही। पता नहीं था कि क्या होने वाला है। ‘फंस गए रे ओबामा’  के आने के पहले कुछ भी स्पष्ट नहीं था। उस दो साल में मैं काम कर रही थी। मैं बीएजी फिल्म्स में नौकरी की। तब सुभाष ‘जॉली एलएलबी’ लिख रहे थे।
अनिश्चय में भी अटल
सुभाष - ‘से सलाम इंडिया’ फ्लॉप होने के बाद मुंबई में टिके रहना एक मुश्किल फैसला था। तब दिल्ली वापस नहीं जा सकते थे। लगता था कि ऐसे कैसे चले जाएंगे? उन दिनों डिंपल का काम करना मुझे बुरा भी लग रहा था। हमलोग दिल्ली छोड़ कर आए थे तब दस-बारह लोग हमारे लिए काम कर रहे थे। यही तय हुआ कि डिंपल नौकरी करेगी और मैं स्क्रिप्ट लिखूंगा और डायरेक्शन की कोशिश करूंगा। बच्चा छोटा था। उसे डेकेअर में छोडऩा पड़ता था। कई बार हम दोनों को देर हो जाती थी। वह अकेला महसूस करता था। तब लगता था इस बिचारे का क्या कसूर है? ऐसे पलों में थोड़े कमजोर भी हुए हमलोग।
डिंपल - एक समय तो सुभाष ने भी बॉयोडाटा बनाना शुरू कर दिया था।
सुभाष - उस दौर में एक अच्छी बात हुई कि गहन निराशा में भी मैं किसी और रास्ते नहीं गया। उस दौरान मैंने तीन फिल्में लिखीं। मेरे लेखन का पहला बाउंसिंग बोर्ड डिंपल होती हैं। कई बार रात को दो बजे उन्हें जगा कर मैं अपनी स्क्रिप्ट सुनाता हूं। मैं अकेला लिखता हूं। अपनी स्क्रिप्ट ढेर सारे लोगों को नहीं सुनाता हूं। सही या गलत यह मेरा तरीका है। मेरी पहली श्रोता और दर्शक डिंपल होती हैं। डिंपल कभी खुश करने के लिए कुछ नहीं कहती हैं।

नियामक हैं डिंपल
सुभाष - प्रोडक्शन कंपनी खोलने का विचार डिंपल का था। सारे जरूरी फैसले डिंपल ने ही लिए हैं।
डिंपल - अपनी महत्वाकांक्षा को किनारे करने का कोई अफसोस नहीं है मुझे। फिल्म इंडस्ट्री के रवैए से मैं परिचित हूं। यहां एक औरत को काम मिलना बहुत मुश्किल है। पुरुषों को फिर भी काम मिल जाता है। पंद्रह साल की उम्र से मैं फिल्म इंडस्ट्री को फॉलो कर रही हूं। मेरा परिवार फिल्मप्रेमी है। मुझे लग रहा था कि सुभाष को जो मौका मिल रहा है उसका सही इस्तेमाल होना चाहिए। उस समय मैंने सोचा कि अपनी महत्वाकांक्षा बाद में कभी पूरी कर लूंगी। मैं पृष्ठभूमि में रह कर बहुत खुश हूं। सुभाष के हर काम को मैं अपनी संयुक्त पहचान मानती हूं। सुभाष की स्क्रिप्ट पर फीडबैक दे कर मैं खुश रहती हूं। ‘फंस गए रे ओबामा’ और ‘जॉली एलएलबी’ में मैंने कुछ सुझाव दिए थे। सुभाष ने उन्हें माना था। अपनी इस योगदान से मैं खुश हूं। कल के बारे में कौन जानता है।
सुभाष - कल की खिडक़ी हमेशा खुली रहेगी। इस बारे में हम बात नहीं करते हैं, लेकिन हम यह देख रहे हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो कल डिंपल भी कुछ लेकर आ सकती है। बच्चे की जिम्मेदारी थोड़ी कम हो जाए। बाकी चीजें जम जाएं। पिछले चार सालों में डिंपल ने मुझे पूरी आजादी और मदद दी है। मेरी जिंदगी के सारे अहम फैसले डिंपल ही करती हैं। मैं उस पर अमल करता हूं।
परिवार और सामंजस्य
सुभाष - हमारा बड़ा मजेदार रिश्ता है। डिंपल के परिवार में मैं ज्यादा प्रिय हूं। और मेरे परिवार में डिंपल को बहुत पसंद किया जाता है। मेरे जीवन के नियमित और महत्वपूर्ण फैसले डिंपल ही लेती हैं। विचार भी यही ले आती हैं। हम दोनों को बीच-बीच में भगवान तंग करता है।
डिंपल - सुभाष नास्तिक हैं। ईश्वर में विश्वास नहीं करते। मेरी परवरिश अलग है। मैं कहती हूं कि गुलाल को अभी हर तरह की जानकारी दो। बाद में वह तय करेगा कि उसे आस्तिक होना है या नास्तिक। मैं बहुत आध्यात्मिक किस्म की हूं। मैं उसे मंदिर और गुरुद्वारे सभी जगह ले जाती हूं। बाद में वह तय करेगा। मैं बताऊं कि सुभाष को जितने मंत्र याद हैं, उतने किसी धार्मिक व्यक्ति को भी याद नहीं होगा।
सुभाष - मतभेद के छोटे-मोटे मुद्दे होते हैं। कोई बड़ी लड़ाई नहीं होती है।
डिंपल - आखिरी लड़ाई डेढ़ महीने पहले हुई थी। मेरा मूड ऑफ हो गया था।
सुभाष - हारने और मनाने का काम मेरा होता है।
डिंपल - ऐसी बात नहीं है। कई बार मैं भी मान लेती हूं। मैं थोड़ी तुनक मिजाज हूं। किशोर उम्र से ही मेरा यह स्वभाव बन गया है। परिवार में बुजुर्गों की कही बातें नहीं मानती थी। हमेशा से नियम तोड़ती आई हूं। ऐसा नहीं करती तो कहीं और होती। ऑफिस में भी लोग डरते थे।
सुभाष - बिल्कुल सही। किसी से भी जरा सी भी गलती हो जाए तो उसकी पैंट उतर जाती थी।
डिंपल - हां, मैं काम को लेकर थोड़ी ज्यादा अग्रेसिव रहती थी। अभी भी उस मूड में आ जाती हूं। कई बार परिवार और क्रिएटिव मुद्दों पर सुभाष को डांट देती हूं। पांच-पांच फ्रेम के लिए लड़ती हूं।
सुभाष - अच्छी बात है कि डिंपल की एक ओपिनियन रहती है। उस पर बहस होती है।
खूबियां एक-दूसरे की
सुभाष - डिंपल नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करती हैं। डिंपल दूसरों की ताकत पहचान लेती हैं। इनमें देने की जबरदस्त ताकत है। नाते-रिश्तेदारों के साथ बहुत अ'छी तरह निभाती हैं। मुझ में यह क्वालिटी नहीं है। मैं आत्मकेंद्रित व्यक्ति हूं।
डिंपल - सुभाष बेहद तार्किक और संतुलित व्यक्ति हैं। किसी भी स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं। सरलता इनके स्वभाव में अंतर्निहित हैं। ये एकाग्र भाव से कोई काम कर सकते हैं। अभी बेटे की परवरिश में काफी मदद करते हैं। हर पिता को ऐसा होना चाहिए। मुश्किल स्थितियों से उबरना इन्हें आता है।
सुझाव
डिंपल - मैं युवा लडक़े-लड़कियों से यही कहूंगी कि सबसे पहले तो शादी की संस्था में यकीन करना चाहिए। शादी के साथ दाम्पत्य में कुछ मूल्य आते हैं। उसे अपनाना चाहिए। शादी के दिखावे पर न जाएं।
सुभाष - शादी करने पर एक-दूसरे के साथ और ढंग से चलना पड़ता है। इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मैं मानता हूं कि किसी भी दाम्पत्य में दोनों समान नहीं होते। किसी एक का ज्यादा योगदान होता है।  मेरे संदर्भ में वह योगदान डिंपल का है। हर चीज बराबर-बराबर हो यह किताबी बात लगती है। दो लोगों के साथ रहने में सबसे पहले यह मालूम होना चाहिए कि दूसरे के साथ क्या खुशी मिलती है? दूसरे को भी पता होना चाहिए कि उसे मैं क्यों अच्छा लगता हूं? जब तक लेना-देना नहीं होगा तब तक सब कुछ ठीक नहीं होगा। परस्पर लेन-देन बहुत महत्वपूर्ण है।
डिंपल - लड़कियों को देखना चाहिए कि उसका प्रेमी अच्छा इंसान हो। यह बात पुरानी लग सकती है। पहली डेटिंग में ही आप देख लें कि वह बैरा से किस तरह बात कर रहा है। यकीन करें भविष्य में वह आपसे भी वैसा ही बात करेगा। आपके परिवार के सभी सदस्यों के प्रति उसकी हमदर्दी हो। वह मेरे मां-बाप को आदर दे।












Thursday, May 2, 2013

21वीं सदी का सिनेमा



-अजय ब्रह्मात्मज

            समय के साथ समाज बदलता है। समाज बदलने के साथ सभी कलारूपों के कथ्य और प्रस्तुति में अंतर आता है। हम सिनेमा की बात करें तो पिछले सौ सालों के इतिहास में सिनेमा में समाज के समान ही गुणात्मक बदलाव आया है। 1913 से 2013 तक के सफर में भारतीय सिनेमा खास कर हिंदी सिनेमा ने कई बदलावों को देखा। बदलाव की यह प्रक्रिया पारस्परिक है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव से समाज में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन से सिनेमा समेत सभी कलाएं प्रभावित होती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हिंदी सिनेमा को देखें तो अनेक स्पष्ट परिवर्तन दिखते हैं। कथ्य,श्ल्पि और प्रस्तुति के साथ बिजनेस में भी इन बदलावों को देखा जा सकता है। हिंदी सिनेमा के अतीत के परिवर्तनों और मुख्य प्रवृत्तियों से सभी परिचित हैं। मैं यहां सदी बदलने के साथ आए परिवर्तनों के बारे में बातें करूंगा। 21वीं सदी में सिनेमा किस रूप और ढंग में विकसित हो रहा है?
            सदी के करवट लेने के पहले के कुछ सालों में लौटें तो हमें निर्माण और निर्देशन में फिल्म बिरादरी का स्पष्ट वर्चस्व दिखता है। समाज के सभी क्षेत्रों की तरह फिल्मों में भी परिवारवाद चलता है। कहा जाता है कि फिल्म बिरादरी एक दूसरे की मदद करने में आगे रहती है, लेकिन जब भी कोई बाहरी प्रतिभा इस बिरादरी में शामिल होना चाहती है तो एक अनकहा प्रतिरोध होता है। बाहर से आई प्रतिभाओं को दोगुनी-तिगुनी मेहनत करनी पड़ती है। अपनी जगह और पहचान बनाने में उन्हें तिरस्कार और अपमान भी झेलने पड़ते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के गलियारे में जाने कहां-कहां से चले आते हैं?’  की झुंझलाहट भरी प्रतिध्वनि अक्सरहां सुनाई पड़ती है।
            21वीं सदी के पहले सूरज बडज़ात्या, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर की तिगड़ी ने हिंदी सिनेमा को खास ढंग से विकसित किया। उन्होंने इसे संभ्रांत और आभिजात्य वर्ग के सिनेमा के रूप में बढ़ाया। भव्य चमकदार सेट और उनसे भी भव्य भाव भंगिमा के किरदारों के साथ उन्होंने ऐसा फील गुडसिनेमा रचा, जिसका आम दर्शक से सीधा ताल्लुक नहीं था। अपने ही देश के दर्शकों से कटा यह सिनेमा मुख्य रूप से आप्रवासी भारतवंशियों के मनोरंजन के लिए तैयार किया जा रहा था। ध्येय के अनुरूप इन फिल्मों का बिजनेस भी हो रहा था। कुछ इतिहासकारों ने इस सिनेमा को डॉलर सिनेमाया एनआरआई सिनेमाका भी नाम दिया। इस ससिनेमा ने देसी दर्शकों को रिक्त और बहिष्कृत कर दिया। कुछ फिल्मकार तो दंभी के साथ कहने लगे थे कि हम चवन्नी छाप या हिंदी प्रदेश के दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाते। गौर करें तो यह वही दौर था जब हिंदी सिनेमा के मुख्य दर्शकों ने मनोरंजन के विकल्प के रूप में भोजपुरी सिनेमा को चुना। हम ने देखा कि भोजपुरी सिनेमा में तेजी से उभार आया। इसी दौर में मल्टीप्लेक्स संस्कृति की वजह से हिंदी सिनेमा का अखिल भारतीय स्वरूप खंडित हुआ। फिलमें पूरे भारत में सफल होनी बंद हो गईं। माना गया कि मल्टीप्लेक्स के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है और पारंपरिक सिंगल स्क्रीन के दर्शकों का सिनेमा अलग होता है। सिनेमा की समझ के इस विभाजन से वास्तव में हिंदी फिल्मों का भारी नुकसान किया।
            दूसरी तरफ हिंदी फिल्मों में आ रही जड़ता और एकरसता को कुछ फिल्मकार महसूस कर रहे थे। वजह यह भी थी कि ग्लोबल गांव के दौर में आम दर्शक भी घिसी पिटी और फाूर्मला फिल्मों से ऊब चुका था। कॉमेडी और एक्शन के नाम पर परोसी जा रही फूहड़ फिल्मों से मनोरंजन की उसकी भूख नहीं मिट रही थी। वह चालू किस्म की फिल्मों को लगातार रिजेक्ट कर रहा था। संक्रांति के इस  पल में आमिर खान ने पहल की। अपने मित्र आशुतोष गोवारीकर की नायाब स्क्रिप्ट पसंद करने के साथ उसके निर्माण का भी उन्होंने फैसला लिया। आमिर खान अभिनीत लगानहिंदी फिल्मों के इतिहास में मील का स्तंभ कही जा सकती है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों की दशा, दिशा और राह बदल दी। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में व्याप्त आलस्य और भ्रष्टाचार खत्म हुआ। निर्माता और अभिनेता एक शेड्यूल में फिल्म पूरी करने के लिए जागृत हुए। इस परिवर्तन से फिल्म निर्माण के साथ उसकी मार्केटिंग भी बदली। अंग्रेजों के अत्याचार से दबी जनता की इस फिल्म में चित्रित लड़ाई और जीत ने दर्शकों को आनंदित किया। इन दिनों दो घंटे से अधिक अवधि की फिल्म को लंबी फिल्म कहा जाता है। कहा जाता है कि दर्शक ऊब जाते हैं, जबकि लगानपौने चार घंटे की फिल्म थी। लगानका हीरो भुवन अकेले नहीं लड़ता। वह एक समूह का नेतृत्व करता है। यह समूह ही टीम भावना के साथ खेल के मैदान में डटती और जीत हासिल करती है।
             पिछले 13 सालों में फिल्म इंडस्ट्री में देश के सुदूर इलाकों से अनेक निर्देशकों और तकनीशियनों ने सफलता पाई है। पहले के दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ। हां, आजादी के बाद जब मुंबई हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का केन्द्र बनी तो अवश्य कोलकाता, लाहौर और दक्षिण से अनेक लेखकों और निर्देशकों ने मुंबई का रुख किया। उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक भिन्नता ने ही हिंदी फिल्मों को समृद्ध किया। इस दौर में लेखन,निर्देशन,गीत-संगीत सभी क्षेत्रों में सृजनात्मक निनिधता और कलात्मकता दिखाई और सुनाई पड़ती है। आज हम उस दौर को हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के नाम से जानते हैं।
         बाहर से आई प्रतिभाओं का वैसा ही योगदान पिछले डेढ़ दशकों में दिखा है। बाजार की भाषा में इसे धोनी प्रभाव कहा जा रहा है। धोनी प्रभाव का सीधा तात्पर्य है कि अब किसी भी क्षेत्र में अवसर बड़े शहरों के नागरिकों तक ही सिमटे नहीं रह सकते। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने समाज को इस रूप में विकसित किया है कि छोटे और मझोले शहरों की प्रतिभाएं अपने क्षेत्रों में हक से जगह बना रही हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिभाओं के इस प्रवाह ने परविारवाद के बांध को तोड़ दिया है। पिछले कुछ सालों में आई फिल्मों को ही देख लें तो पाएंगे कि फिल्म इंडस्ट्री से आए फिल्मकार ज्यादातर रीमेक और सीक्वल फिल्में बना रहे हैं, जब कि बाहर से आए निर्देशक नई कहानियों से फिल्मों का खजाना भर रहे हैं।
            राजकुमार हिरानी से लेकर व्रिक्रमादित्य मोटवाणी तक ऐसी प्रतिभाओं की लंबी सूची है। इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, अनुराग बसु, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया, सुजीत सरकार, हबीब फैजल, सुजॉय घोष आदि ने हिंदी फिल्मों का कंटेंट बदल दिया है। इन सभी की फिल्मों में जिंदगी के ताजा और विविध अनुभव हैं, जबकि फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित फिल्मकारों की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के ही रेफरेंस पाइंट मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि इन फिल्मकारों को एक दो सालों में यह सफलता और पहचान नहीं मिली है। उनकी इस पहचान के पीछे लंबा संघर्ष और कामयाब होने की जिद है। आज दमक रही इन प्रतिभाओं के बायोडाटा को ही पढ़ लें तो पाएंगे कि सभी ने इस मुकाम तक पहुंचने में कम से कम दस साल बिताए। आरंभिक असफलताओं और तिरस्कार से उन्होंने हार नहीं मानी। इन प्रतिभाओं के संघर्ष की प्रतिनिधि कथा अनुराग कश्यप के प्रयास से समझी जा सकती है। टीवी लेखन से उनका करिअर आरंभ हुआ। पहला बड़ा मौका राम गोपाल वर्मा की सत्यामें मिला। उसके बाद उन्होंने पांचनिर्देशित की तो उसे अनेक कारणों से रिलीज नहीं मिल सकी। हताशा के उन सालों में भी अनुराग अपने दोस्तों के साथ सक्रिय रहे। उन्हें देव डीऔर गुलालसे पहचान मिली, जबकि ब्लैक फ्रायडेवह काफी पहले बना चुके थे।
        कमोबेश सभी युवा निर्देशकों को अनुराग कश्यप जैसा ही संघर्ष करना पड़ा। केवल राजकुमार हिरानी ही इस समूह के अकेले सफल फिल्मकार है, जिनकी पहली फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएसको कामयाबी और सराहना मिली। पिछले साल की सफल और प्रशंसित फिल्मों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उन्हें ही नेशनल अवार्ड मिले हैं। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमरएक मिसाल है। वगैर लोकप्रिय स्टार के बनी इस फिल्म का नायक एक धावक था, जो सामाजिक अत्याचार और प्रशासन की उदासीनता से डकैत बन गया। कैसी विडंबना है कि जिस पान सिंह तोमर की समाज ने उपेक्षा की थी, उसी के जीवन पर मिली फिल्म को समाज ने सराहा और पुरस्कृत किया। सुजॉय घोष की कहानीकी एक अलग कहानी है। इस फिल्म को विद्या बालन ने अपने कंधों पर खींचा और बाक्स आफिस पर सफलता दिलाई। विद्या बालन की कामयाबी समाज में हुए नारी उत्थान का ही प्रतिफल  और रेखांकन है। हिंदी फिल्मों की कामयाबी का श्रेय पूरा हीरो को मिलता रहा है, लेकिन विद्या बालन की कामयाबी सोच और समाज में आए बदलाव का संकेत देती है। पिछले साल ही सुजीत सरकार की विकी डोनरभी आई थी। इस फिल्म की नवीनता ने दर्शकों को चौंकाया। नए कलाकार थे। फिल्म के हीरो आयुष्मान खुराना की गायकी और अदयगी का जलवा हम सभी ने देखा और सुना।
             स साल सुभाष कपूर की जॉली एलएलबीकी सफलता और साजिद खान की हिम्मतवालाकी असफलता दर्शकों की बदलती रुचि और रुझान को स्पष्ट कर देती है। भारी प्रचार और स्टारों के बावजूद हिम्मतवालाको दर्शक नकार देते हैं,जबकि सीमित बजट की देसी फिल्म जॉली एलएलबीको वे हाथोंहाथ लेते हैं। यह अनोखा संयोग है कि जॉली एलएलबीके जज त्रिपाठी के पर्दे पर लिए जागरूक फैसले के बाद वास्तविक जिंदगी में सालों से अटके मामलों के फैसले आने लगे हैं। 



Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : जॉली एलएलबी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
तेजिन्दर राजपाल - फुटपाथ पर सोएंगे तो मरने का रिस्क तो है।
जगदीश त्यागी उर्फ जॉली - फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते।
सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' में ये परस्पर संवाद नहीं हैं। मतलब तालियां बटोरने के लिए की गई डॉयलॉगबाजी नहीं है। अलग-अलग दृश्यों में फिल्मों के मुख्य किरदार इन वाक्यों को बोलते हैं। इस वाक्यों में ही 'जॉली एलएलबी' का मर्म है। एक और प्रसंग है, जब थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक बुजुर्ग अपने परिवार के साथ नमूदार होते हैं। वे कहते हैं साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे सोने की जगह है। फिल्म की कहानी इस दृश्य से एक टर्न लेती है। यह टर्न पर्दे पर स्पष्ट दिखता है और हॉल के अंदर मौजूद दर्शकों के बीच भी कुछ हिलता है। हां, अगर आप मर्सिडीज, बीएमडब्लू या ऐसी ही किसी महंगी कार की सवारी करते हैं तो यह दृश्य बेतुका लग सकता है। वास्तव में 'जॉली एलएलबी' 'ऑनेस्ट ब्लडी इंडियन' (साले ईमानदार भारतीय) की कहानी है। अगर आप के अंदर ईमानदारी नहीं बची है तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' आप के लिए नहीं है। यह फिल्म मनोरंजक है। फिल्म में आए किरदारों की सच्चाई और बेईमानी हमारे समय के भारत को जस का तस रख देती है। मर्जी आप की ़ ़ ़ आप हंसे, रोएं या तिलमिलाएं।
हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर हास्य इस कदर हावी है कि हम व्यंग्य को व्यर्थ समझने लगे हैं। सुभाष कपूर ने किसी भी प्रसंग या दृश्य में सायास चुटीले संवाद नहीं भरे हैं। कुछ आम किरदार हैं, जो बोलते हैं तो सच छींट देते हैं। कई बार यह सच चुभता है। सच की किरचें सीने को छेदती है। गला रुंध जाता है। 'जॉली एलएलबी' गैरइरादतन ही समाज में मौजूद अमीर और गरीब की सोच-समझ और सपनों के फर्क की परतें खोल देती है। 'फुटपाथ पर क्यों आते हैं लोग?' जॉली के इस सवाल की गूंज पर्दे पर चल रहे कोर्टरूम ड्रामा से निकलकर झकझोरती है। हिंदी फिल्मों से सुन्न हो रही हमारी संवेदनाओं को यह फिल्म फिर से जगा देती है। सुभाष कपूर की तकनीकी दक्षता और फिल्म की भव्यता में कमी हो सकती है, लेकिन इस फिल्म की सादगी दमकती है।
'जॉली एलएलबी' में अरशद वारसी की टीशर्ट पर अंग्रेजी में लिखे वाक्य का शब्दार्थ है, 'शायद मैं दिन में न चमकूं, लेकिन रात में दमकता हूं'। जॉली का किरदार के लिय यह सटीक वाक्य है। मेरठ का मुफस्सिल वकील जगदीश त्यागी उर्फ जॉली बड़े नाम और रसूख के लिए दिल्ली आता है। तेजिन्दर राजपाल की तरह वह भी नाम-काम चाहता है। वह राजपाल के जीते एक मुकदमे के सिलसिले में जनहित याचिका दायर करता है। सीधे राजपाल से उसकी टक्कर होती है। इस टक्कर के बीच में जज त्रिपाठी भी हैं। निचली अदालत के तौर-तरीके और स्थिति को दर्शाती यह फिल्म अचानक दो व्यक्तियों की भिड़ंत से बढ़कर दो सोच की टकराहट में तब्दील हो जाती है। जज त्रिपाठी का जमीर जागता है। वह कहता भी है, 'कानून अंधा होता है। जज नहीं, उसे सब दिखता है।'
सुभाष कपूर ने सभी किरदारों के लिए समुचित कास्टिंग की है। बनी इमेज के मुताबिक अगर अरशद वारसी और बमन ईरानी किसी फिल्म में हों तो हमें उम्मीद रहती है कि हंसने के मौके मिलेंगे। 'जॉली एलएलबी' हंसाती है, लेकिन हंसी तक नहीं ठहरती। उससे आगे बढ़ जाती है। अरशद वारसी, बमन ईरानी और सौरभ शुक्ला ने अपने किरदारों को सही गति, भाव और ठहराव दिए हैं। तीनों किरदारों के परफारमेंस में परस्पर निर्भरता और सहयोग है। कोई भी बाजी मारने की फिक्र में परफारमेंस का छल नहीं करता। छोटे से दृश्य में आए राम गोपाल वर्मा (संजय मिश्रा) भी अभिनय और दृश्य की तीक्ष्णता की वजह से याद रह जाते हैं। फिल्म की नायिका संध्या (अमृता राव) से नाचने-गाने का काम भी लिया गया है, लेकिन वह जॉली को विवेक देती है। उसे झकझोरती है। हिंदी फिल्मों की आम नायिकाओं से अलग वह अपनी सीमित जरूरतों पर जोर देती है। वह कामकाजी भी है।
सुभाष कपूर ने 'जॉली एलएलबी' के जरिए हिंदी फिल्मों में खो चुकी व्यंग्य की धारा को फिर से जागृत किया है। लंबे समय के बाद कुंदन शाह और सई परांजपे की परंपरा में एक और निर्देशक उभरा है, जो राजकुमार हिरानी की तरह मनोरंजन के साथ कचोट भी देता है। धन्यवाद सुभाष कपूर।

Thursday, March 14, 2013

व्यंग्य निर्देशक सुभाष कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
    बाहर से आए निर्देशक के लिए यह बड़ी छलांग है। खबर है कि सुभाष कपूर विधू विनोद चोपड़ा और राज कुमार हिरानी की ‘मुन्नाभाई  ... ’ सीरिज की अगली कड़ी का निर्देशन करेंगे। पिछले हफ्ते आई इस खबर ने सभी को चौंका दिया। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ और ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के बाद ‘मुन्नाभाई चले अमेरिका’ की घोषणा हो चुकी थी। उसके फोटो शूट भी जारी कर दिए गए थे। राजकुमार हिरानी उस फिल्म को शुरू नहीं कर सके। स्क्रिप्ट नहीं होने से फिल्म अटकी रह गई। इस बीच राजकुमार हिरानी ने ‘3 इडियट’ पूरी कर ली। उसकी अपार और रिकार्ड सफलता के बाद वे फिर से आमिर खान के साथ ‘पीके’ बनाने में जुट गए हैं। इसी दरम्यान सुभाष कपूर को ‘मुन्नाभाई ....’ सीरिज सौंपने की खबर आ गई।
    सुभाष कपूर और विधु विनोद चोपड़ा के नजदीकी सूत्रों की मानें तो यह फैसला अचानक नहीं हुआ है। राजकुमार हिरानी की व्यस्तता को देखते हुए यह जरूरी फैसला लेना ही था। ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज में दो फिल्में कर लेने के बाद राजकुमार हिरानी अन्यमनस्क से थे। शायद वे इस सीरिज से ऊब गए हों या नए विषयों का हिलोर उन्हें बहा ले जाता हो। ‘मुन्नाभाई ...’ के मुन्ना और सर्किट की जोड़ी को दर्शक नई स्थितियों और परिवेश में देखने के लिए लालायित हैं। संजय दत्त के पास अभी कोई बेहतर फिल्म भी नहीं है। ‘जिला गाजियाबाद’ जैसी फिल्म में हम ने संजय दत्त और अरशद वारसी को एक साथ देखा, लेकिन उनके बीच मुन्ना-सर्किट की केमिस्ट्री नहीं दिखी। स्पष्ट है कि दोनों ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज में ही जमते हैं।
    सुभाष कपूर के चुने जाने की बात कर रहा था। विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी दोनों चाहते थे कि फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी किसी को दी जाए। इस सिलसिले में वे पहले हबीब फैजल से मिले। उन्हें लगा था कि युवा निर्देशक ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज के साथ न्याय कर सकेंगे। बातचीत और विमर्श में उनसे संतुष्ट नहीं होने पर फिर ‘फरारी की सवारी’ के निर्देशक राजेश मापुसकर के बारे में सोचा गया। राजेश मापुसकर पहले राजकुमार हिरानी के सहयोगी थे और उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा के लिए ही ‘फरारी की सवारी’ बनाई थी। उन पर भी सहमति नहीं बनी। तभी फिल्म पत्रकार और समीक्षक अनुपमा चोपड़ा ने सुभाष कपूर का नाम सुझाया। अनुपमा चोपड़ा के पति हैं विधु विनोद चोपड़ा। अनुपमा को ‘फंस गया रे ओबामा’ अच्छी लगी थी। उन्होंने यह भी बताया कि सुभाष कपूर की ‘जॉली एलएलबी’ आ रही है। अनुपमा के सुझाव पर चोपड़ा और हिरानी ने पहले ‘फंस गया रे ओबामा’ और फिर अप्रदर्शित ‘जॉली एलएलबी’ देखी। उन्हें सुभाष कपूर की शैली और व्यंग्य की धार पसंद आई। उन्होंने तय कर लिया कि सुभाष कपूर को ही लेंगे।
    सुभाष कपूर ने हिंदी से एमए किया है। हिंदी से एम ए का विशेष उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि आम तौर पर हिंदी पढ़े व्यक्ति की एक रूढि़वादी और पिछड़ी छवि है। माना जाता है कि जो विद्यार्थी किसी और विषय में प्रवीण नहीं होते वे मजबूरी में हिंदी और मराठी चुनते हैं। सुभाष कपूर ने पढ़ाई के दिनों में छात्र आंदोलन और थिएटर गतिविधियों में हिस्सा लिया। वे वामपंथी रुझान के व्यक्ति हैं। टीवी और प्रिंट की पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया। इरादा था कि हिंदी में फिल्में बनाएंगे। उनकी पहली फिल्म ‘से सलाम इंडिया’ क्रिकेट के विषय पर थी। वह आई और चली गई, फिर भी इंडस्ट्री में उन्हें नोटिस किया गया। अगली फिल्म ‘फंस गया रे ओबामा’ थी। इस फिल्म के लिए कलाकार जुटाने में सुभाष कपूर को भारी मशक्कत करनी पड़ी। संजय मिश्र को केंद्रीय भूमिका में लेकर फिल्म बनी। यह फिल्म चली और खूब पसंद की गई। अगली फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ 15 मार्च को रिलीज हो रही है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक असफल वकील जॉली की कहानी है। समाज और सत्ता पर एक साथ चोट करती सुभाष कपूर की फिल्में सीधे तौर पर कोई उद्घोष या नारा नहीं लगातीं। उनकी फिल्मों में आम जीवन के प्रसंगों का मनोरंजन रहता है। हमारे आसपास के किरदार हमारी ही भाषा में चुटीली बातें करते हैं और हमें घायल कर देते हैं।
    उम्मीद है कि सुभाष कपूर अपनी धार बनाए रखेंगे और ‘मुन्नाभाई  ...’ सीरिज को मनोरंजक मजबूती के सथ आगे बढ़ाएंगे।

Friday, December 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : फंस गए रे ओबामा

अमेरिकी मंदी पर करारा व्यंग्य-अजय ब्रह्मात्‍मज

बेहतरीन फिल्में सतह पर मजा देती हैं और अगर गहरे उतरें तो ज्यादा मजा देती हैं। फंस गए रे ओबामा देखते हुए आप सतह पर सहज ही हंस सकते हैं, लेकिन गहरे उतरे तो इसके व्यंग्य को भी समझ कर ज्यादा हंस सकते हैं। इसमें अमेरिका और ओबामा का मजाक नहीं उड़ाया गया है। वास्तव में दोनों रूपक हैं, जिनके माध्यम से मंदी की मार का विश्वव्यापी असर दिखाया गया है।

अमेरिकी ओम शास्त्री से लेकर देसी भाई साहब तक इस मंदी से दुखी और परेशान हैं। सुभाष कपूर ने सीमित बजट में उपलब्ध कलाकारों के सहयोग से अमेरिकी सब्जबाग पर करारा व्यंग्य किया है। अगर आप समझ सकें तो ठीक वर्ना हंसिए कि भाई साहब के पास थ्रेटनिंग कॉल के भी पैसे नहीं हैं।

सच कहते हैं कि कहानियां तो हमारे आसपास बिखरी पड़ी हैं। बारीक नजर और स्वस्थ दिमाग हो तो कई फिल्में लिखी जा सकती हैं। प्रेरणा और शूटिंग के लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं है। महंगे स्टार, आलीशान सेट और नयनाभिरामी लोकेशन नहीं जुटा सके तो क्या.. अगर आपके पास एक मारक कहानी है तो वह अपनी गरीबी में भी दिल को भेदती हैं। क्या सुभाष कपूर को ज्यादा बजट मिलता और कथित स्टार मिल जाते तो फंस गए रे ओबामा का मनोरंजन स्तर बढ़ जाता? इसका जवाब सुभाष कपूर दे सकते हैं। दर्शक के तौर पर हमें फंस गए रे ओबामा अपनी सादगी, गरीबी और सीमा में ही तीक्ष्ण मनोरंजन दे रही है।

सिंपल सी कहानी है। आप्रवासी ओम शास्त्री गण कृत्वा, घृतम पीवेत की आधुनिक अमेरिकी कंज्यूमर जीवन शैली के आदी हो चुके हैं। मंदी की मार में अचानक सब बिखरता है तो उन्हें अपनी पैतृक संपत्ति का खयाल आता है। वे भारत पहुंचते हैं। यहां मंदी के मारे बेचारे छोटे अपराधी उन्हें मोटा मुर्गा समझ कर उठा लेते हैं। बाद में पता चलता है ओम शास्त्री की अंटी में तो धेला भी नहीं है। यहीं से मजेदार चक्कर शुरू होता है और हम एक-एक कर दूसरे अपराधियों से मिलते जाते हैं। हर अगला अपराधी पहले से ज्यादा शातिर और चालाक है, लेकिन उन सभी से अधिक स्मार्ट निकलते हैं ओम शास्त्री। वे खुद पर अपराधियों के ही दांव चलते हैं और अपना उल्लू सीधा करते जाते हैं।

फंस गए रे ओबामा उत्तर भारत के अपराध जगत के स्ट्रक्चर में नेताओं की मिलीभगत को भी जाहिर कर देती है। यह कोरी कल्पना नहीं है। यही वास्तविकता है। सुभाष कपूर बधाई के पात्र हैं कि वे अर्थहीन हो रही कामेडी के इस दौर में नोकदार बात कहने में सफल रहे। इसमें निश्चित ही उनके लेखन की मूल भूमिका है। उनके किरदारों को संजय मिश्र, रजत कपूर, मनु ऋषि, अमोल गुप्ते, सुमित निझावन और नेहा धूपिया ने अच्छी तरह से निभाया है। संजय मिश्र, मनु ऋषि और रजत कपूर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। तीनों ने अपने किरदारों को अभिनय से अतिरिक्त आयाम दिया है।

खयाल ही नहीं आया कि फिल्म में गाने नहीं हैं।

**** चार स्टार