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Wednesday, June 27, 2018

छोटी फिल्मों में कैरेक्टर मिलते हैं,बड़ी फिल्मों से पैसे - संजय मिश्रा


छोटी फिल्मों में कैरेक्टर मिलते हैं - संजय मिश्रा 
-अजय ब्रह्मात्मज
संजय मिश्रा कीअंग्रेजी में कहते हैं' हाल ही में दर्शकों को पसंद आई.सीमित बजट की  यह फिल्म सफल रही है.ऐसी फिल्मों में लीड भूमिका निभाने के साथ ही संजय मिश्रा मुख्यधारा की फिल्मों के भी चहेते कलाकार हैं.

-आप जैसे कलाकारों पर फिल्म इंडस्ट्री की निर्भरता बढ़ी है.आप इसे कैसे लेते हैं?
0 मैं इसे फिल्म इंडस्ट्री की निर्भरता नहीं कहूंगा. हां,स्वतंत्र निर्माता हमें चुन रहे हैं. हालाँकि वे भी फिल्मों में आ जाते हैं तो फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हो जाते हैं. इनके पास फिल्म बनाने की तमन्ना रहती है. इनके पास 40-50 करोड़ नहीं होत, इसलिए ये छोटी फिल्मों में निवेश करते हैं.ये लोग दो से चार करोड़ रुपए में फिल्में बनाना चाहते हैं.मसानऔरआखिन देख फिल्मों से इन्हें प्रेरणा मिलती है. मुझे यह अच्छा लगता है कि स्वतंत्र निर्माता आ रहे हैं. कॉर्पोरेट तो एक ही विचार को लेकर चलते हैं कि उन्हें फायदा चाहिए. स्वंतंत्र निर्माता अलग-अलग विषयों और विचारों को लेकर आते हैं.


-मुख्य धारा की फिल्मों में भी आप लोगों की पहचान और जरूरत बड़ी है मुझे याद हैदिलवाले' में दर्शक आपके आने का इंतजार करते थे, जबकि उस फिल्म में आकर्षण के कई स्टार और कारण थे…
0 हां, यह तो हुआ है. मुझे लगता है कि ऐसा शुरू से था. कभी महमूद और जॉनी वाकर हुआ करते थे. रहमान साहब थे और भी कलाकार थे. सभी जानते हैं कि रोमांस और डांस तो संजय मिश्रा से नहीं मिलेगा, लेकिन दूसरे मजे जरुर मिलेंगे. यह निर्भरता हम जैसे कलाकारों के लिए मान की बात है.


-यह तो दिख रहा है?
अगर ऐसा सोचा जा रहा है तो यह किसी भी कलाकार के लिए सम्मान की बात है. उसे पहचान और वाहवाही मिल रही है. एक कलाकार तो यही चाहता है. हम घरेलू(हाउस होल्ड) नाम बन जायें. यही देखकर छोटी फिल्मों के सीमित पूंजी वाले निर्माता हमारे पास आते हैं और हमें नायक की भूमिका सौंप जाते हैं. ऐसे निर्माता पैसे तो नहीं देते हैं लेकिन कैरेक्टर देते हैं. मुख्यधारा की फिल्मों में कैरेक्टर नहीं मिलते, लेकिन पैसे अच्छे मिलते हैं तो वह भी चाहिए. एक एक्टर के तौर पर मुख्यधारा की फ़िल्में मेरे लिए बड़ी  चुनौती होती हैं. अभी मैं इंदर कुमार की फिल्मटोटल धमालकर रहा हूं. शॉट से पहले कांपता रहता हूं. उन किरदारों मेंअकड़ और एटीट्यूड चाहिए होता है. फिर आपको दूसरे कलाकारों के मेल में होना चाहिए. आपनेदिलवाले' का जिक्र किया. उस फिल्म में शॉट से पहले मैं डरा रहता था. यह डर हम एक्टरों के लिए बहुत अच्छा है. अच्छा काम होता है


-मैं देख रहा हूं कि केवल प्रशिक्षित अभिनेताओं पर ही ऐसा भरोसा किया जा रहा है. क्या यह महज संयोग है कि वैसे कलाकारों को फिल्में मिल रही हैं?
0 बिल्कुल, क्योंकि वे प्रशिक्षित हैं. यह बात निकल कर आ रही है कि प्रशिक्षण ही काम देता है. ज़िन्दगी के हर फील्ड में ऐसा होता है. हर जगह ट्रेनिंग काम आती है.


-मेरा तो मानना है कि प्रशिक्षित अभिनेताओं ने हिंदी फिल्मों में अभिनय का स्वरुप बदल दिया है इस पर अलग से कभी लिखा जाना चाहिए.
0प्रशिक्षित कलाकारों ने इसे साधा है. थिएटर और रंगमंच से आए अभिनेता फिल्मों के हिसाब से एक्टिंग में बारीकी से परिवर्तन ले आते हैं. थिएटर और सिनेमा की एक्टिंग अलग होती है. सिनेमा में लेंस का सामना करना पड़ता है. ऐसा लेंस जो सिर्फ आपकी पलकों को दिखा सकता है. मैं तो इसमें जोडूंगा कि प्रशिक्षित अभिनेताओं के साथ अब शिक्षित दर्शक भी आ रहे हैं. कहने का मतलब कि दर्शक हमारे काम को पसंद कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि ऐसी फिल्मों के प्रति दर्शकों की भूख थी. उन्हें पहले ऐसी फिल्में नहीं मिल पा रही थीं. अब मिल रही हैं तो वे उसे स्वीकार कर रहे हैं. सिनेमाघरों में देख रहे हैं. बीच में ऐसी फिल्में बनने बंद हो गई थीं. अब शुरुआत हुई है. दर्शकों की संख्या बढ़ रही है. यह बहुत ही अच्छा संकेत है.

-
यह परिवर्तन किस दिशा में जा रहा है?
0अब हमें ऐसी कंटेंट प्रधान फिल्मों का इंतजार रहता है, जो कुछ कहे, इंटरटेनमेंट का मतलब सिर्फ हंसाना नहीं है, वह किसी भी प्रकार से गुदगुदा जाए. फिल्मों में कंटेंट लौट रहा है. हम पुरानी फिल्मों की परंपरा अपना रहे हैं. आज विचित्र स्थिति हो गई है. नया भारत बन रहा है और पुरानी बातें की जा रही है. बदलाव के लिए चीजें बेवजह बदली जा रही हैं.  बनारस का एक उदाहरण दूं तो मणिकर्णिका घाट तक गाड़ी ले जाने की जरूरत नहीं है. बनारस में हम पीढ़ियों से ऐसे ही जिंदगी जीते आ रहे हैं. सुना है कि वहां मकान तोड़े जा रहे हैं. घाट तक गाड़ियां ले जाएंगे. नए दर्शक को भीमसान; का बाप और बच्चा अपना लगता है.

Friday, May 18, 2018

फिल्म समीक्षा : अंग्रेजी में कहते हैं

फिल्म समीक्षा
बत्रा साहब की प्रेमकहानी
अंग्रेजी में कहते हैं 
- अजय ब्रह्मात्मज 

हरीश व्यास की बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी 'अंग्रेजी में कहते हैं' संजय मिश्रा की अदाकारी के लिए देखी जानी चाहिए। अभिनेता संजय मिश्रा के दो रूप हैं। एक रूप में वे मुख्यधारा की मसाला फिल्मों में हंसाने के काम आते हैं।  इन फिल्मों में का हीरो कोई भी हो,दर्शकों को संजय मिश्रा का इंतज़ार रहता है। दूसरे रूप में वे तथाकथित छोटी फिल्मों में दर्शकों को रुलाते हैं। यूँ कहें कि आम दर्शकों के दर्द को परदे पर बखूबी उतारते हैं। 'अंग्रेजी में कहते हैं' में वे पोस्टल डिपार्टमेंट के मामूली कर्मचारी हैं। इस फिल्म में उनका नाम यशवंत बत्रा है। अगर बत्रा की जगह वे व्यास,मिश्रा या पांडेय होते या श्रीवास्तव,सिंह या चौधरी भी होते तो तो फिल्म बनारस का सही प्रतिनिधित्व करती है। तात्पर्य यह की हिंदी फिल्मों के निर्देशकों पर पंजाबी किरदारों का इतना दवाब रहता है की 'अंग्रेजी में कहते हैं' जैसी फिल्मों के नायक का सरनेम वे नहीं बदल पाते। मनो नायक बनने और इश्क़ करने का हक़ केवल पंजाबियों को है। 
उनका सरनेम भले ही बत्रा हो।  बाकि मिजाज और व्यवहार में वह बनारसी हैं। बत्रा निवास उनके पूर्वजों ने बनवाया। उनका बचपन उसी घर में गुजरा है। घर की दीवारें भी उन्हें जानती हैं। यशवंत बत्रा उत्तर भारत के उस पुरुष के प्रतिनिधि हैं,जो कर्तव्य निर्वाह में ही ज़िन्दगी गुजार देता है। वह दफ्तर आएं-जाएँ और बीवी घर संभालें। ऐसे पतियों को अपनी बीवी का ख्याल नहीं रहता। उनके लिए घर की यही व्यवस्था प्यार का पर्याय है। यशवंत को ही किरण का कहाँ ख्याल रहता है।  उनकी रुटीन ज़िंदगी में बेटी प्रीती के प्यार से खलल पड़ता है। बेट-बाप के संवादों से यह बात निकलती है कि उन्होंने बीवी की भावनाओं को समझने की कोशिश ही नहीं की। इसके साथ ही वह हीं ग्रंथि के भी शिकार हैं,क्योंकि ससुराल में अनचाहे ही उनका मजाक हो जाया करता है।  उनकी आर्थिक दिक्कतों का ज़िक्र होता है। 
यशवंत एक समय के बाद रोमांस और प्यार के आभाव के अहसास से गुजरते हैं तो उन्हें श रुख खान बनने का ख्याल आता है। वह अपनी किरण को मोहित करने असफल प्रयास में जुट जाते हैं। इस प्रक्रिया में दो उत्पेरक हैं। एक तो उनकी बेटी प्रीती और उसका प्रेमी/पति जुगनू और दुसरे फ़िरोज़ और सुमन की जोड़ी।  दोनों जोड़ियों ने फिल्म को आगे बढ़ने और संजय मिश्रा की अदाकारी को सांद्र बनाने में महती योगदान किया है। चर्चित पंकज त्रिपाठी कुछ दृश्यों में ही मोहक अंदाज से प्रभावित करते हैं। प्रीति (शिवांगी रघुवंशी) और जुगनू(अंशुमान झा) अपनी भूमिकाओं का बेहतर निर्वाह करते हैं। 
किरण बानी एकावली खन्ना को लेखक का समर्थन नहीं था,फिर भी वह अपनी मौजूदगी और अभिनय से याद रहती हैं। बगैर मेलोड्रामा के ही वह अपने जज़्बात जाहिर करती हैं। हाँ,ब्रजेन्द्र कला का ज़िक्र करना ही होगा। उनकी उपस्थिति ही दृश्य में रूचि बढ़ा देती है। 
फिल्म के किरदारों की तरह फिल्म का परिवेश और निर्माण भी आर्थिक तंगी का शिकार लगता है। इस फिल्म में और भी संभावनाएं थीं। संवादों में चुटीला बनारसीपन आ सकता था। 
अवधि - 108 मिनट 
*** तीन स्टार

Friday, March 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा - अनारकली ऑफ आरा



फिल्‍म रिव्‍यू
मर्दों की मनमर्जी की उड़े धज्जी
अनारकली ऑफ आरा
    -अमित कर्ण
21 वीं सदी में आज भी बहू, बेटियां और बहन घरेलू हिंसा, बलात संभोग व एसिड एटैक के घने काले साये में जीने को मजबूर हैं। घर की चारदीवारी हो या स्‍कूल-कॉलेज व दफ्तर चहुंओर मर्दों की बेकाबू लिप्‍सा और मनमर्जी औरतों के जिस्‍म को नोच खाने को आतुर रहती है। ऐसी फितरत वाले बिहार के आरा से लेकर अमेरिका के एरिजोना तक पसरे हुए हैं। लेखक-निर्देशक अविनाश दास ने उन जैसों की सोच वालों पर करारा प्रहार किया है। उन्‍होंने आम से लेकर कथित नीचमाने जाने वाले तबके तक को भी इज्‍जत से जीने का हक देने की पैरोकारी की है। इसे बयान करने को उन्‍होंने तंज की राह पकड़ी है।
इस काम में उन्हें कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों व डीओपी का पूरा सहयोग मिला है। उनकी नज़र नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से फिल्‍म को लैस करती है। अविनाश दास ने अपने दिलचस्‍प किरदारों अनारकली, उसकी मां, रंगीला, हीरामन, धर्मेंद्र चौहान, बुलबुल पांडे व अनवर से कहानी में एजेंडापरक जहान गढा है। हरेक की ख्‍वाहिशें, महत्‍वाकांक्षाएं व लालसा हैं।
फिल्‍म का आगाज दुष्‍यंत कुमार की लाइन से होता है- ‘’ये सारा जिस्‍म बोझ से झुक कर दोहरा हुआ होगा।। मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा।।‘’ आरा जैसे इलाके में आज भी मनोरंजन का साधन बाइयों के नाच-गाने हैं। शादी-विवाह के मौके पर उन्हें नचवाना व गवाना शान का विषय है। एक वैसे ही समारोह में अनारकली की मां नाच- गा रही है। वह रायफल की दुनाली से पैसे निकाल रही होती है कि गलती से गोली चलती है और वह वहीं ढेर। पर हमारे कथित सभ्‍य समाज का उसूल देखिए उस गाने वाली के जान की कीमत कुछ नहीं। कोई आवाज नहीं उठाता। कहानी 12 साल आगे बढ़ती है। अनारकली इलाके की मशहूर गायिका है। उसके कार्यक्रम के आयोजन का ठेका रंगीला के पास है। एक वैसे ही कार्यक्रम में वाइस चांसलर धर्मेंद्र चौहान नशे में जबरन अनारकली से छेड़छाड़ करता है। अनारकली आजिज आ उसे थप्‍पड़ जड़ती है। बात आगे चलकर उसकी अस्मिता की सुरक्षा के आंदोलन में तब्‍दील हो जाती है। इस मुहिम में व्‍यावहारिकरंगीला तो साथ छुड़ा चला जाता है। साथ देते हैं अनवर और हीरामन तिवारी, जो अनारकली को नि:स्‍वार्थ भाव से प्रेम व आदर करते हैं। हीरामन यहां तीसरी कसमवाले हीरामन की आधुनिक विवेचना है।
सभी किरदार रोचक हैं। उन्‍हें बड़ी खूबी से निभाया भी गया है। स्‍वरा भास्‍कर पूरी फिल्‍म में अनारकली के किरदार में डूबी नजर आती हैं। यह उनका करियर बेस्ट परफॉरमेंस है। साहस से भरा हुआ। क्‍लाइमेक्‍स में नार देख के लारगाने पर उनका तांडव नृत्‍य प्रभावी फिल्‍म को अप्रतिम ऊंचाइयों पर ले जाता है। उन्होंने कहीं भी किरदार की ऊर्जा प्रभावित नहीं होने दी है। फिल्‍म में छह गाने हैं। उन्हें रविंदर रंधावा, डा सागर जेएनयू, रामकुमार सिंह और अविनाश दास ने लिखा है। सब में हार्टलैंड व कहानी के मिजाज की सौंधी खुशबू है। सब हकीकत के बड़े करीब। रोहित शर्मा के सुरबद्ध ये गाने फिल्‍म को आवश्‍यक गति प्रदान करते हैं। गीत-संगीत फिल्‍म का प्रभावी किरदार बन कर उभरा है। वह कहीं कहानी पर हावी नहीं होता।
रंगीला अनारकली के काम का प्रबंधन करता है। शादीशुदा है, पर अनारकली के साथ भी उसके संबंध हैं। पंकज त्रिपाठी ने इसे पुरजोर विस्‍तार दिया है। धर्मेंद्र चौहान के अवतार में संजय मिश्रा चौंकाते हैं। ठरकी व खूंखार अवतार वाले शख्‍स से उनकी अदायगी की एक और खूबी जाहिर हुई है। इंस्‍पेक्‍टर बुलबुल पांडे की भूमिका में विजय कुमार व हीरामन तिवारी के रोल में इश्तियाक खान थिएटर जगत के लोगों की कुव्‍वत जाहिर करते हैं। इन जैसों को अंडररेट करना ग्‍लैमर जगत का दुर्भाग्‍य है। अनवर के रोल में मयूर मोरे किरदार में स्‍थायी अनुशासन व समर्पण के साथ रहे हैं। इन कलाकारों को खोजने वाले जीतेंद्र नाथ जीतू का काम उल्‍लेखनीय है।
बिहार के आरा की असल कायनात क्या होनी चाहिए, इसे एनएच10’ फेम अरविंद कन्‍नबिरन ने बखूबी पेश‍ किया। उजड़ी हुई गलियां, अनारकली व बाकी किरदारों के भाव सब को उन्होंने रॉ रूप में कैप्‍चर किया है। जबिन मर्चेंट ने इसकी उम्‍दा एडीटिंग की है। तेज गति से बदलते घटनाक्रम ने फिल्‍म को सधा हुआ बनाया है। आज की फिल्‍मों में ठेठ हिदी बेल्‍ट गायब रहे हैं। उसकी फील यहां जर्रे-जर्रे में है। वह किरदारों की भाषा, व्‍यवहार और परिवेश में बिना किसी अपराधबोध के भाव से मौजूद है।

अवधि- 113 मिनट  पांच सेकंड
स्टार- चार स्टार  

Wednesday, May 25, 2016

तारणहार बनते कैरेक्‍टर कलाकार




-अमित कर्ण
हाल की कुछ फिल्‍मों पर नजर डालते हैं। खासकर बजरंगी भाईजान, दिलवाले, ‘मसान’, बदलापुर, मांझी- द माउंटेनमैन, हंटर, पर। उक्‍त फिल्‍मों में एक कॉमन पैटर्न है। वह यह कि उन्‍हें लोकप्रिय करने में जितनी अहम भूमिका नामी सितारों की थी, उससे कम उन फिल्‍मों के ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट‘ की नहीं थी। बजरंगी भाईजान और बदलापुर से नवाजुद्यीन सिद्यीकी का काम गौण कर दें तो वे फिल्‍में उस प्रतिष्‍ठा को हासिल नहीं कर पाती, जहां वे आज हैं। ‘मसान’ के किरदार आध्‍यात्मिक सफर की ओर ले जा रहे होते हैं कि बीच में पंकज त्रिपाठी आते हैं। शांत और सौम्‍य चित्‍त इंसान के किरदार में दिल को छू जाते हैं।
दिलवाले में शाह रुख-काजोल की मौजूदगी के बावजूद दर्शक बड़ी बेसब्री से संजय मिश्रा का इंतजार कर रहे होते हैं। थोड़ा और पीछे चलें तो ‘नो वन किल्‍ड जेसिका’ में सिस्‍टम के हाथों मजबूर जांच अधिकारी और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ में दत्‍तों के भाई बने राजेश शर्मा की अदाकारी अाज भी लोगों के जहन में है। ‘विकी डोनर’ की बिंदास दादी कमलेश गिल और सिंगल मदर बनी डॉली अहलूवालिया को कौन भूल सकता है भला। मांझी – द माउंटेनमैन और हंटर में तो कमाल ही हो गया। कथित कैरेक्‍टर कलाकारों की टोली दोनों फिल्‍मों के मेन लीड बन जाते हैं। दोनों फिल्‍में चर्चा व कलेक्‍शन दोनों हाथों से बटोर ले जाते हैं। सार यह है कि अब सितारों व कमर्शियल फिल्‍में बनाने वाले भी कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की अहमियत भली’-भांति समझ चुके हैं। वे जान चुके हैं कि फिल्‍मों को वीकेंड की सीमा से बाहर निकाल अगले हफ्ते तक ले जाने की अहम भूमिका कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट ही करते हैं। सौभाग्‍य से अब पुराने दिनों जैसी बात भी नहीं है, जब कैरेक्‍टर रोल के लिए अधिकांश फिल्‍मों में किरदार विशेष के लिए कलाकार विशेष ही रिपीट किए जाते थे।
मसलन, सातवें दशक में इंस्‍पेक्‍टर के रोल के लिए इफ्तेकार, जगदीश राज लगातार रिपीट होते थे। खडूस पिता या बॉस के लिए उत्‍पल दत्त और चाचा के लिए नासिर हुसैन और मजबूर पिता के लिए एके हंगल कास्‍ट कर लिए जाते थे। नरमदिल मामा, नाना व दादू के लिए डेविड इब्राहिम होते थे और काइंया पुलिस अधिकारी के लिए ओम शिवपुरी। आठवें व नौंवे दशक में वह विरासत अनुपम खेर, कादर खान, आलोक नाथ, श्रीराम लागू व उन जैसे अन्‍य कलाकारों ने आगे बढ़ाई। नतीजतन दोहराव की अति हुई और दर्शकों का उन कलाकारों से मोहभंग हो गया। अब ऐसे हालात नहीं हैं। हमारे पास समर्थ कलाकारों की अच्‍छी-खासी खेप है। उनका यथोचित सम्‍मान सितारा व निर्माता दोनों बिरादरी करती है। अब वे महज ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट’ भर नहीं रहे।  
मौजूदा बदलाव पर पंकज त्रिपाठी कहते हैं, ‘ सितारे ओपनिंग दिलाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है, मगर दर्शक संडे के बाद आगे देखने तब जाते हैं, जब उसमें उन्‍हें कोई जानदार परफारमेंस दिखे। वह जानदार परफारमेंस यकीनन नवाज भाई, केके मेनन, दीपक डोबरियाल व अन्‍य कलाकारों का होता है। उन सबका काम लोगों को अलग अनुभूति व संतुष्टि प्रदान करता है। यह बात हमारे निर्माता समझ चुके हैं। तभी अपनी फिल्‍मों में वे कथित कैरेक्‍टर कलाकारों का चयन भी पूरी सावधानी से करते हैं। फिल्‍म में सितारों से कम अहमियत नहीं देते।‘
    पंकज त्रिपाठी की बातों में दम है। यही वजह है, जो सुल्‍तान और रईस की कॉमन धुरी नवाजुद्यीन सिद्यीकी हैं। वे उन चंद चर्चित कलाकारों में शुमार हो गए हैं, जिन्‍होंने खानत्रयी के संग काम कर लिया है। उनके मौजूदा कद का अंदाजा इसी बात से लगता है कि सुल्‍तान में जहां उनकी आवाज का इस्‍तेमाल फिल्‍म के सर्वप्रथम टीजर के लिए हुआ, वहीं रईस में वे शाह रुख खान के किरदार के मंसूबों का सबसे बड़े रोड़े बने हैं। ‘
सिने इतिहासकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, ‘अब यदि फिल्‍मों में समर्थ कलाकार होंगे तो बजट छोटा हो या बड़ा दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे घरों से निकल सिनेमाघर यकीनन जाएंगे। नवाज और उन जैसे कलाकारों की नस्‍ल मोतीलाला, बलराज साहनी, संजीव कुमार और ओमपुरी की परंपरा से वास्‍ता रखते हैं। जिस काल खंड में देव साहब और राज कपूर की तूती बोली जाती थी, मोतीलाल भी उस दौर में मशहूर थे। संजीव कुमार भी अपने समकालीन सितारों को बराबर टक्‍क्‍र देते थे। अब वह काम नवाज वगैरह बाकी कलाकार कर रहे हैं। ‘
तभी आने वाला समय कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट के लिए पलक-पांवड़े बिछा कर बैठा हुआ है। नए साल में एयरलिफ़ट, जय गंगाजल, जुगनी,फितूर,वजीर, मोहनजो दाड़ो जैसी बड़े बजट की फिल्‍में कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से गुलजार हैं।
     ऐसा अचानक क्‍या हुआ कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट इतने डिमांडिंग हो गए। वजीर में यजाद कुरेशी बने मानव कौल कारण जाहिर करते हैं, डिजिटल क्रांति ने दर्शकों को क्‍वॉलिटी फिल्‍मों का स्‍वाद चखाया है। औसत काम खारिज होने लगे हैं। अब वरायटी परफॉर्मर की डिमांड बढ़ चुकी है। वजीर में मेरे काम की भी सराहना हो रही है। उसके तुरंत बाद बिजॉय नांबियार ने मुझे एक रॉम’-कॉम ऑफर की है। वहां मैं हीरो हूं। ‘
सिने जानकार इस बदलाव की वजह कास्टिंग डायरेक्‍टर और युवा फिल्‍मकारों को भी मानते हैं। ‘शाहिद’, ‘दम लगा के हईसा’, ‘मसान’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘काय पो छे’, ‘फिल्मिस्‍तान’ में नायाब कलाकार ढूंढकर लाए गए। उनकी परफारमेंस से फिल्‍म में चार चांद लग गए। ‘दम लगा के हईसा’ में शीबा चड्ढा ने बुआ की रोचक भूमिका निभाई। ‘काय पो छे’ में सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव और अमित साध को एक साथ ला उनकी केमिस्‍ट्री से फिल्‍म निखर गई। मानव कौल उस फिल्‍म की खोज बने, जबकि ‘हैदर’ में शाहिद कपूर के पिता बने नरेंद्र झा को चौतरफा तारीफ मिली। फिल्‍म के प्रमोशन में उनका वॉयस ओवर जमकर इस्‍तेमाल हुआ। इस साल वे ‘मोहनजो दाड़ो’ व ‘घायल वंस अगेन’ में मेन विलेन हैं।
कास्टिंग डायरेक्‍टर के अलावा युवा फिल्‍मकारों ने भी पूरा सिनेरियो बदल दिया है। पहले पैसे वाले ही फिल्‍म बनाते थे। वे सिनेमा को मनी मेकिंग मशीन मानते थे। अब वह चलन बदला है।   मानव कौल कहते हैं, ‘25 साल के चैतन्‍य तम्‍हाणे कोर्ट बना उसे ऑस्‍कर तक ले जाते हैं। वह भी तब, जब उससे पहले उनके पास कोई सिनेमाई अनुभव नहीं था। उस फिल्‍म में कथित नामी चेहरे नहीं थे। उसके बावजूद वह अपील कर गई। यही अच्‍छी ही बात है। सितारों पर से हमारी निर्भरता कम होती जा रही है।      
एयरलिफ्ट में कुवैती आर्मी अफसर बने इनामुल हक के मुताबिक, सिने लिटरेसी में खासा इजाफा हुआ है। ईरानी फिल्‍मकार माजिद मजीदी व जफर पनाही जैसों ने भी यहां के फिल्‍मकारों को प्रेरित किया। उन्‍हें बात समझ में आ गई कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की मौजूदगी से एक तो किफायत में फिल्‍म बन जाएगी, दूसरा हर इलाके व तबके की कहानियां लोगों के पास आएंगी। वे दिल को छूने के अलावा रोमांचक और प्रेरक रहेंगी।
लब्‍बोलुआब यह कि अब अब सितारों व कलाकारों के बीच को-एग्‍जिस्‍टेंस का मामला बन चुका है। सलमान खान जैसे सितारे भी अपने उन सहकलाकारों की मदद करने लगे हैं। लोगों को याद होगा कि  उन्‍होंने ट्वीट कर अपने प्रशंसकों व जनता-जनार्दन से मांझी- द माउंटेनमैन देखने की अपील की। यह ट्रेंड हाल के बरसों की ही उपज है। किरण राव शिप ऑफ थीसियस के सपोर्ट में खड़ी होती हैं और कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से सजी फिल्‍म को बड़ा फलक मिलक जाता है। यह उम्‍दा सिनेमा व कलाकारों को स्‍थापित करने के लिए शुभ संकेत हैं।

Friday, December 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दिलवाले

कार और किरदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज

        रोहित शेट्टी की दिलवाले और आदित्‍य चोपड़ा की दिवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे में दिलवाले के अलावा एक संवाद की समानता है-बड़े-बड़ शहरों में एसी छोटी-छोटी बाते होती रहती है सैनोरीटा। इसे बोलते हुए शाह रुख खान दर्शकों को हंसी के साथ वह हसीन सिनेमाई याद भी देते हें,जो शाह रुख खान और काजोल की जोड़ी के साथ जुड़ी हुई है। ऐसा कहा और लिखा जाता है कि पिछले 20 सालों में ऐसी हॉट जोड़ी हिंदी फिल्‍मों में नहीं आई। निश्चित ही इस फिल्‍म के खयाल में भी यह जोड़ी रही होगी। ज्‍यादातर एक्‍शन और कॉमेडी से लबरेज फिल्‍में बनाने में माहिर रोहित शेट्टी ने इसी जोड़ी की उपयोगिता के लिए फिल्‍म में उनके रोमांटिक सीन और गाने रखे हैं। तकनीकी प्रभावो से वे शाह रुख और काजोल को जवान भी दिखाते हैं। हमें अच्‍छा लगता है। हिंदी स्‍क्रीन के दो प्रमियों को फिर से प्रेम करते,गाने गाते और नफरत करते देखने का आनंद अलग होता है।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कार भी किरदार के तौर पर आती हैं। कारें उछलती हैं,नाचती हैं,टकराती हैं,उड़ती है,कलाबाजियां खाती हैं,और चींSSSSS की आवाज के साथ रुक जती हैं। रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कारों के करतब हैरान करते हैं। यही इनका रोमांच और आनंद है। दिलवाले में कारों की संख्‍या बढ़ी है और वे मंहगी भी हो गई हैं। उनकी चकम-दमक बढ़ी है। साथ ही उन्‍हें विदेश की सड़के मिली हैं। रोहित शेट्टी ने कारों की कीमत का खयाल रखते हुए फिल्‍म में उनकी भूमिका बढ़ा दी है। उल्‍लेखनीय है कि रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सिर्फ कार ही नहीं,किरदार भी होते हैं।
    इस बार राज/काली,मीरा,वीर,ईशिता,सिद्धू,मनी और ऑस्‍कर जैसे किरदार हैं। रोहित की फिल्‍मों में मुख्‍य किरदार भी कार्टून किरदारों की तरह आते हैं। इस बार शाह रुख और काजोल की वजह से थोड़ा बदलाव हुआ है,लेकिन उनकी वजह से फिल्‍म में शुरू के हिस्‍से में अनेक स्‍पीड ब्रेकर आ जाते हैं। रोहित रोमांस के अनजान रास्‍ते से होकर कॉमेडी और एक्‍शन के परिचित हाईवे पर आते हैं। हाईवे पर आने के पहले यह फिल्‍म झटके देती है। इन झटकों के बाद फिल्‍म सुगम और मनोरंजक स्‍पीड में आती है। उसके बाद का सफर आनंददायक और झटकारहित हो जाता है। शाह रुख और काजोल के रोमांस और नफरत के सीन अच्‍छे हैं। इस बार दोनों रोमांटिक सीन से ज्‍यादा अच्‍छे झगड़े औौर नाराजगी के सीन में दिखे हैं। फिल्‍म में 15 सालों के बाद दाढ़ी में आने पर शाह रुख ज्‍यादा कूल और आकर्षक लगते हैं। रोहित शेट्टी ने काजोल को भी पूरा महत्‍व दिया है। वे उनके किरदार को नया डायमेंशन देकर उन्‍हें अपनी क्षमता दिखाने का भी मौका देते हैं। निस्‍संदेह काजोल अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हैं।
    इस फिल्‍म में वरुण धवन और कृति सैनन की जोड़ी शाह रुख और काजोल की जोड़ी के साए में रह गई है। उन्‍हें गानों और यंग रोमांस के लिए रखा गया है। वे इसे पूरा भी करते हैं,लेकिन कुछ दृश्‍यों में वे भाव-मनोभाव में कंफ्यूज दिखते हें। दरअसल,उन्‍हें ढंग से गढ़ा नहीं गया है या वे दो लोकप्रिय कलाकारों के साथ घबराहट में रहे हैं। अनेक दृश्‍यों के बहाव में वरुण तैरने के बजाए बहने लगते हैं। एक दिक्‍कत रही है कि वे अपने परफारमेंस पर काबू नहीं रख सके हैं। कृति सैनन छरहरी और खूबसूरत हैं। वह किसी और अभिनेत्री सरीखी दिखने की कोशिश में अपनी मौलिकता छोड़ देती हैं। उन्‍हें अपने सिग्‍नेचर पर ध्‍यान देना चाहिए।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सहयोगी कलाकारों का खास योगदान रहता है। इस बार भी संजय मिश्रा,बोमन ईरानी,जॉनी लीवर,मुकेश तिवारी,वरुण शर्मा और पंकज त्रिपाठी के रूप में वे मौजूद हैं। इन सभी को अच्‍छे वनलाइनर मिले हें। खास कर संजय मिश्रा ब्रांड और प्रोडक्‍ट के नामों के तुक मिलाकर संवाद बोलते हैं तो हंसी आती है। संजय मिश्रा अपने करिअर के उस मुकाम पर हैं,जहां उनकी कैसी भी हरकत दर्शक स्‍वी‍कार करने के मूड में हैं। उनकी स्‍वीकृति बढ़ गई है। यह मौका है कि वे इसका सदुपयोग करें। इस बार बोमन ने निराश किया।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में रंगों की छटा देखते ही बनती है। इस बार तो आसमान भी सतरंगी हो गया है और कई बार इंद्रधनुष उभरा है। उनकी फिल्‍मों में वस्‍तुओं और कपड़ों के रंग चटखदार,सांद्र और आकर्षक होते हैं। रंगों के इस्‍तेमाल में पूरी सोच रहती है। रोहित शेट्टी इस पीढ़ी के अलहदा फिल्‍मकार हैं,जिनकी शैली दर्शकों को पसंद आती है। दर्शकों की इस पसंद में वे बंधते जा रहे हें। सफलता के हिसाब से यह सही हो सकता है,लेकिन सृजनात्‍मकता तो प्रभावित होने के साथ सीमित हो रही है।
अवधि-163 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार