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फिल्‍म समीक्षा : घनचक्‍कर

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-अजय ब्रह्मात्मज                      जब भी कोई निर्देशक अपनी बनाई लीक से ही अलग चलने की कोशिश में नई विधा की राह चुनता है तो हम पहले से ही सवाल करने लगते हैं-क्या जरूरत थी? हमारी आदत है न तो हम खुद देखी हुई राह छोड़ते हैं और न अपने प्रिय फिल्मकारों की सोच, शैली और विषय में कोई परिव‌र्त्तन चाहते हैं। राजकुमार गुप्ता की 'घनचक्कर' ऐसी ही शंकाओं से घिरी है। उन्होंने साहसी कदम उठाया है और अपने दो पुराने मौलिक प्रयासों की तरह इस बार भी सफल कोशिश की है? कॉमेडी का मतलब हमने बेमतलब की हंसी या फिर स्थितियों में फंसी कहानी ही समझ रखा है। 'घनचक्कर' 21वीं सदी की न्यू एज कामेडी है। किरदार, स्थितियों, निर्वाह और निरूपण में परंपरा से अलग और समकालीन 'घनचक्कर' से राजकुमार गुप्ता ने दर्शाया है कि हिंदी सिनेमा नए विस्तार की ओर अग्रसर है।                         सामान्य सी कहानी है। मराठी संजय आत्रेय (इमरान हाशमी) और नीतू (विद्या बालन ) पति-पत्‍‌नी हैं। दोनों की असमान्य शादी है। उसकी वजह से उनमें अनबन बनी रहती है। दोनों एक-दूसरे की ज्यादतियों को बर्दाश्त करते हुए दांपत…

है सुकून विद्या बालन की जिंदगी में

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-अजय ब्रह्मात्मज

    विद्या बालन की शादी हो चुकी है। वह अपने पति सिद्धार्थ राय कपूर के साथ जुहू में समुद्र किनारे के एक अपार्टमेंट में रहती हैं। घर बसाने के बाद वह घर सजा रही हैं। यह उनका अपना बसेरा है। इस बसेरे में सुकून है। अब वह यहीं रहती है। शादी के बाद जिंदगी बदल रही है। रूटीन बदल रहा है। मां-बहन की सिखायी सुनायी बातों के अर्थ अब खुल रहे हैं। किसी और के साथ होने से सोच बदलती है। और उसी के साथ रहने से बहुत कुछ बदल जाता है। आचार, व्यवहार, सोना, जागना, खाना-पीना और भी बहुत कुछ। अभी तक भारतीय समाज में लड़कियां ही अपना घर छोड़ती हैं। एक नए परिवार के साथ रिश्ते बनाती हैं। अगर नवदंपति ने स्वतंत्र और परिवार से अलग रिहाइश रखी तो भी लडक़े के परिवार से अधिक करीबी और भागीदारी होती है। धीरे-धीरे मायका छूट जाता है। लडक़ी एक नए परिवार में प्रत्यारोपित हो जाती है। आरंभिक उलझनों और सामंजस्य के बाद जीवन का नया अध्याय आरंभ होता है।
    विद्या बालन के जीवन का नया अध्याय आरंभ हो चुका है। अब वह नए बसेरे से ही शूटिंग, इवेंट और मेलजोल के लिए निकलती हैं और फिर लौट कर यहीं आती हैं। कुंवारी जिंदगी बंद कमरे क…