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Friday, August 31, 2018

फिल्म समीक्षा : स्त्री

 फिल्म रिव्यू
स्त्री
-अजय ब्रह्मात्मज

अमर कौशिक निर्देशित ‘स्त्री’ संवादो,किरदारों और चंदेरी शहर की फिल्म है. इन तीनों की वजह से यह फिल्म निखरी है. सुमित अरोड़ा, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना,अभिषेक बनर्जी और चंदेरी शहर की खूबियों का अमर कौशिक ने रोचक मिश्रण और उपयोग किया है. हिंदी फिल्में घिसी-पिटी लकीर से किसी भी नई पगडंडी पर निकलती है तो नजारा और आनंद अलग होता है. ‘स्त्री’ प्रचार हॉरर कॉमेडी फिल्म के तौर पर किया गया है. यह फिल्म हंसाती और थोड़ा डराती है. साथ-साथ टुकड़ों में ही सही लेकर बदल रहे छोटे शहरों की हलचल,जरूरत और मुश्किलों को भी छूती चलती है.

चंदेरी शहर की मध्यवर्गीय बस्ती के विकी .बिट्टू और जना जवान हो चुके हैं. विकी का मन पारिवारिक सिलाई के धंधे में नहीं लगता. बिट्टू रेडीमेड कपड़े की दुकान पर खुश नहीं है. जना पास कोई काम नहीं है. छोटे शहरों के ये जवान  बड़े शहरों के बयान से बदल रहे हैं. बातचीत में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर धौंस जमाते हैं.विकी तो ‘चंदेरी के मनीष मल्होत्रा’ के नाम से मशहूर है. उनकी ठहरी और सुस्त जिंदगी में तब भूचाल आता है, जब विकी की मुलाकात अचानक एक लड़की से हो जाती हैं. लड़की का नाम-पता विकी को भी नहीं मालूम.

शहर में चर्चा है पूजा के पहले चार दिनों मेंकोई स्त्री(चुड़ैल) आती है और मर्दों को उठा ले जाती है.वह  केवल उसके कपड़े फेंक जाती है. बिट्टू और जना को लगता है कि विकी के पीछे भी हो ना हो कोई ना कोई स्त्री है. चिंता के साथ ईर्ष्या की वजह से विकी को सावधान करते हैं. गांव के पुस्तक भंडार के मालिक रुद्र चुड़ैलों के विषय के ज्ञाता हैं.  अंदर से डरपोक लेकिन खुद को जानकार बताने वाले रूद्र इन तीनों को सलाह और मदद देते हैं. हास्य के पुट के साथ फिल्म रहस्य और डर भी रचती है. ‘ओ स्त्री कल आना’ का प्रसंग रोचक और कहानी में गुंथा हुआ है.

नई फिल्मों और नई भूमिकाओं के साथ राजकुमार राव के आयाम खुलते जा रहे हैं. इस फिल्म के सामान्य से किरदार को उन्हें शिद्दत और जरूरी भाव के साथ पर्दे पर निभाया है. छोटे शहर के युवकों की शेखी,शर्म और शरारत को वे अच्छी तरह अपनी चाल और भूल  बोलचाल के लहजे में ले आते हैं. उनके साथअपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी की तिगड़ी जमती है. तीनों ने बहुत खूबसूरती से छोटे शहरों के युवकों की मासूमियत और शोखी पकड़ी है. दृश्यों में पंकज त्रिपाठी के आते ही निखार आ जाता है. इस फिल्म के कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि कलाकार तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया और बातों से कुछ नया टांक देते हैं, जो उस दृश्य की खूबसूरती को बढ़ा देता है. सुमित अरोड़ा के संवादों का धागा तो उन्हें मिला ही हुआ है.कलाकारों में श्रद्धा कपूर इन सक्षम अभिनेताओं के साथ कदम नहीं मिला पातीं. सीमित भावों की श्रद्धा कपूर को यह सपोर्ट मिल गया है कि वह बाहर से आई लड़की हैं.

अवधी : 108 मिनट
***1/2

Friday, March 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा - अनारकली ऑफ आरा



फिल्‍म रिव्‍यू
मर्दों की मनमर्जी की उड़े धज्जी
अनारकली ऑफ आरा
    -अमित कर्ण
21 वीं सदी में आज भी बहू, बेटियां और बहन घरेलू हिंसा, बलात संभोग व एसिड एटैक के घने काले साये में जीने को मजबूर हैं। घर की चारदीवारी हो या स्‍कूल-कॉलेज व दफ्तर चहुंओर मर्दों की बेकाबू लिप्‍सा और मनमर्जी औरतों के जिस्‍म को नोच खाने को आतुर रहती है। ऐसी फितरत वाले बिहार के आरा से लेकर अमेरिका के एरिजोना तक पसरे हुए हैं। लेखक-निर्देशक अविनाश दास ने उन जैसों की सोच वालों पर करारा प्रहार किया है। उन्‍होंने आम से लेकर कथित नीचमाने जाने वाले तबके तक को भी इज्‍जत से जीने का हक देने की पैरोकारी की है। इसे बयान करने को उन्‍होंने तंज की राह पकड़ी है।
इस काम में उन्हें कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों व डीओपी का पूरा सहयोग मिला है। उनकी नज़र नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से फिल्‍म को लैस करती है। अविनाश दास ने अपने दिलचस्‍प किरदारों अनारकली, उसकी मां, रंगीला, हीरामन, धर्मेंद्र चौहान, बुलबुल पांडे व अनवर से कहानी में एजेंडापरक जहान गढा है। हरेक की ख्‍वाहिशें, महत्‍वाकांक्षाएं व लालसा हैं।
फिल्‍म का आगाज दुष्‍यंत कुमार की लाइन से होता है- ‘’ये सारा जिस्‍म बोझ से झुक कर दोहरा हुआ होगा।। मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा।।‘’ आरा जैसे इलाके में आज भी मनोरंजन का साधन बाइयों के नाच-गाने हैं। शादी-विवाह के मौके पर उन्हें नचवाना व गवाना शान का विषय है। एक वैसे ही समारोह में अनारकली की मां नाच- गा रही है। वह रायफल की दुनाली से पैसे निकाल रही होती है कि गलती से गोली चलती है और वह वहीं ढेर। पर हमारे कथित सभ्‍य समाज का उसूल देखिए उस गाने वाली के जान की कीमत कुछ नहीं। कोई आवाज नहीं उठाता। कहानी 12 साल आगे बढ़ती है। अनारकली इलाके की मशहूर गायिका है। उसके कार्यक्रम के आयोजन का ठेका रंगीला के पास है। एक वैसे ही कार्यक्रम में वाइस चांसलर धर्मेंद्र चौहान नशे में जबरन अनारकली से छेड़छाड़ करता है। अनारकली आजिज आ उसे थप्‍पड़ जड़ती है। बात आगे चलकर उसकी अस्मिता की सुरक्षा के आंदोलन में तब्‍दील हो जाती है। इस मुहिम में व्‍यावहारिकरंगीला तो साथ छुड़ा चला जाता है। साथ देते हैं अनवर और हीरामन तिवारी, जो अनारकली को नि:स्‍वार्थ भाव से प्रेम व आदर करते हैं। हीरामन यहां तीसरी कसमवाले हीरामन की आधुनिक विवेचना है।
सभी किरदार रोचक हैं। उन्‍हें बड़ी खूबी से निभाया भी गया है। स्‍वरा भास्‍कर पूरी फिल्‍म में अनारकली के किरदार में डूबी नजर आती हैं। यह उनका करियर बेस्ट परफॉरमेंस है। साहस से भरा हुआ। क्‍लाइमेक्‍स में नार देख के लारगाने पर उनका तांडव नृत्‍य प्रभावी फिल्‍म को अप्रतिम ऊंचाइयों पर ले जाता है। उन्होंने कहीं भी किरदार की ऊर्जा प्रभावित नहीं होने दी है। फिल्‍म में छह गाने हैं। उन्हें रविंदर रंधावा, डा सागर जेएनयू, रामकुमार सिंह और अविनाश दास ने लिखा है। सब में हार्टलैंड व कहानी के मिजाज की सौंधी खुशबू है। सब हकीकत के बड़े करीब। रोहित शर्मा के सुरबद्ध ये गाने फिल्‍म को आवश्‍यक गति प्रदान करते हैं। गीत-संगीत फिल्‍म का प्रभावी किरदार बन कर उभरा है। वह कहीं कहानी पर हावी नहीं होता।
रंगीला अनारकली के काम का प्रबंधन करता है। शादीशुदा है, पर अनारकली के साथ भी उसके संबंध हैं। पंकज त्रिपाठी ने इसे पुरजोर विस्‍तार दिया है। धर्मेंद्र चौहान के अवतार में संजय मिश्रा चौंकाते हैं। ठरकी व खूंखार अवतार वाले शख्‍स से उनकी अदायगी की एक और खूबी जाहिर हुई है। इंस्‍पेक्‍टर बुलबुल पांडे की भूमिका में विजय कुमार व हीरामन तिवारी के रोल में इश्तियाक खान थिएटर जगत के लोगों की कुव्‍वत जाहिर करते हैं। इन जैसों को अंडररेट करना ग्‍लैमर जगत का दुर्भाग्‍य है। अनवर के रोल में मयूर मोरे किरदार में स्‍थायी अनुशासन व समर्पण के साथ रहे हैं। इन कलाकारों को खोजने वाले जीतेंद्र नाथ जीतू का काम उल्‍लेखनीय है।
बिहार के आरा की असल कायनात क्या होनी चाहिए, इसे एनएच10’ फेम अरविंद कन्‍नबिरन ने बखूबी पेश‍ किया। उजड़ी हुई गलियां, अनारकली व बाकी किरदारों के भाव सब को उन्होंने रॉ रूप में कैप्‍चर किया है। जबिन मर्चेंट ने इसकी उम्‍दा एडीटिंग की है। तेज गति से बदलते घटनाक्रम ने फिल्‍म को सधा हुआ बनाया है। आज की फिल्‍मों में ठेठ हिदी बेल्‍ट गायब रहे हैं। उसकी फील यहां जर्रे-जर्रे में है। वह किरदारों की भाषा, व्‍यवहार और परिवेश में बिना किसी अपराधबोध के भाव से मौजूद है।

अवधि- 113 मिनट  पांच सेकंड
स्टार- चार स्टार  

Wednesday, May 25, 2016

तारणहार बनते कैरेक्‍टर कलाकार




-अमित कर्ण
हाल की कुछ फिल्‍मों पर नजर डालते हैं। खासकर बजरंगी भाईजान, दिलवाले, ‘मसान’, बदलापुर, मांझी- द माउंटेनमैन, हंटर, पर। उक्‍त फिल्‍मों में एक कॉमन पैटर्न है। वह यह कि उन्‍हें लोकप्रिय करने में जितनी अहम भूमिका नामी सितारों की थी, उससे कम उन फिल्‍मों के ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट‘ की नहीं थी। बजरंगी भाईजान और बदलापुर से नवाजुद्यीन सिद्यीकी का काम गौण कर दें तो वे फिल्‍में उस प्रतिष्‍ठा को हासिल नहीं कर पाती, जहां वे आज हैं। ‘मसान’ के किरदार आध्‍यात्मिक सफर की ओर ले जा रहे होते हैं कि बीच में पंकज त्रिपाठी आते हैं। शांत और सौम्‍य चित्‍त इंसान के किरदार में दिल को छू जाते हैं।
दिलवाले में शाह रुख-काजोल की मौजूदगी के बावजूद दर्शक बड़ी बेसब्री से संजय मिश्रा का इंतजार कर रहे होते हैं। थोड़ा और पीछे चलें तो ‘नो वन किल्‍ड जेसिका’ में सिस्‍टम के हाथों मजबूर जांच अधिकारी और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ में दत्‍तों के भाई बने राजेश शर्मा की अदाकारी अाज भी लोगों के जहन में है। ‘विकी डोनर’ की बिंदास दादी कमलेश गिल और सिंगल मदर बनी डॉली अहलूवालिया को कौन भूल सकता है भला। मांझी – द माउंटेनमैन और हंटर में तो कमाल ही हो गया। कथित कैरेक्‍टर कलाकारों की टोली दोनों फिल्‍मों के मेन लीड बन जाते हैं। दोनों फिल्‍में चर्चा व कलेक्‍शन दोनों हाथों से बटोर ले जाते हैं। सार यह है कि अब सितारों व कमर्शियल फिल्‍में बनाने वाले भी कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की अहमियत भली’-भांति समझ चुके हैं। वे जान चुके हैं कि फिल्‍मों को वीकेंड की सीमा से बाहर निकाल अगले हफ्ते तक ले जाने की अहम भूमिका कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट ही करते हैं। सौभाग्‍य से अब पुराने दिनों जैसी बात भी नहीं है, जब कैरेक्‍टर रोल के लिए अधिकांश फिल्‍मों में किरदार विशेष के लिए कलाकार विशेष ही रिपीट किए जाते थे।
मसलन, सातवें दशक में इंस्‍पेक्‍टर के रोल के लिए इफ्तेकार, जगदीश राज लगातार रिपीट होते थे। खडूस पिता या बॉस के लिए उत्‍पल दत्त और चाचा के लिए नासिर हुसैन और मजबूर पिता के लिए एके हंगल कास्‍ट कर लिए जाते थे। नरमदिल मामा, नाना व दादू के लिए डेविड इब्राहिम होते थे और काइंया पुलिस अधिकारी के लिए ओम शिवपुरी। आठवें व नौंवे दशक में वह विरासत अनुपम खेर, कादर खान, आलोक नाथ, श्रीराम लागू व उन जैसे अन्‍य कलाकारों ने आगे बढ़ाई। नतीजतन दोहराव की अति हुई और दर्शकों का उन कलाकारों से मोहभंग हो गया। अब ऐसे हालात नहीं हैं। हमारे पास समर्थ कलाकारों की अच्‍छी-खासी खेप है। उनका यथोचित सम्‍मान सितारा व निर्माता दोनों बिरादरी करती है। अब वे महज ‘कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट’ भर नहीं रहे।  
मौजूदा बदलाव पर पंकज त्रिपाठी कहते हैं, ‘ सितारे ओपनिंग दिलाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है, मगर दर्शक संडे के बाद आगे देखने तब जाते हैं, जब उसमें उन्‍हें कोई जानदार परफारमेंस दिखे। वह जानदार परफारमेंस यकीनन नवाज भाई, केके मेनन, दीपक डोबरियाल व अन्‍य कलाकारों का होता है। उन सबका काम लोगों को अलग अनुभूति व संतुष्टि प्रदान करता है। यह बात हमारे निर्माता समझ चुके हैं। तभी अपनी फिल्‍मों में वे कथित कैरेक्‍टर कलाकारों का चयन भी पूरी सावधानी से करते हैं। फिल्‍म में सितारों से कम अहमियत नहीं देते।‘
    पंकज त्रिपाठी की बातों में दम है। यही वजह है, जो सुल्‍तान और रईस की कॉमन धुरी नवाजुद्यीन सिद्यीकी हैं। वे उन चंद चर्चित कलाकारों में शुमार हो गए हैं, जिन्‍होंने खानत्रयी के संग काम कर लिया है। उनके मौजूदा कद का अंदाजा इसी बात से लगता है कि सुल्‍तान में जहां उनकी आवाज का इस्‍तेमाल फिल्‍म के सर्वप्रथम टीजर के लिए हुआ, वहीं रईस में वे शाह रुख खान के किरदार के मंसूबों का सबसे बड़े रोड़े बने हैं। ‘
सिने इतिहासकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, ‘अब यदि फिल्‍मों में समर्थ कलाकार होंगे तो बजट छोटा हो या बड़ा दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे घरों से निकल सिनेमाघर यकीनन जाएंगे। नवाज और उन जैसे कलाकारों की नस्‍ल मोतीलाला, बलराज साहनी, संजीव कुमार और ओमपुरी की परंपरा से वास्‍ता रखते हैं। जिस काल खंड में देव साहब और राज कपूर की तूती बोली जाती थी, मोतीलाल भी उस दौर में मशहूर थे। संजीव कुमार भी अपने समकालीन सितारों को बराबर टक्‍क्‍र देते थे। अब वह काम नवाज वगैरह बाकी कलाकार कर रहे हैं। ‘
तभी आने वाला समय कथित कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट के लिए पलक-पांवड़े बिछा कर बैठा हुआ है। नए साल में एयरलिफ़ट, जय गंगाजल, जुगनी,फितूर,वजीर, मोहनजो दाड़ो जैसी बड़े बजट की फिल्‍में कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से गुलजार हैं।
     ऐसा अचानक क्‍या हुआ कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट इतने डिमांडिंग हो गए। वजीर में यजाद कुरेशी बने मानव कौल कारण जाहिर करते हैं, डिजिटल क्रांति ने दर्शकों को क्‍वॉलिटी फिल्‍मों का स्‍वाद चखाया है। औसत काम खारिज होने लगे हैं। अब वरायटी परफॉर्मर की डिमांड बढ़ चुकी है। वजीर में मेरे काम की भी सराहना हो रही है। उसके तुरंत बाद बिजॉय नांबियार ने मुझे एक रॉम’-कॉम ऑफर की है। वहां मैं हीरो हूं। ‘
सिने जानकार इस बदलाव की वजह कास्टिंग डायरेक्‍टर और युवा फिल्‍मकारों को भी मानते हैं। ‘शाहिद’, ‘दम लगा के हईसा’, ‘मसान’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘काय पो छे’, ‘फिल्मिस्‍तान’ में नायाब कलाकार ढूंढकर लाए गए। उनकी परफारमेंस से फिल्‍म में चार चांद लग गए। ‘दम लगा के हईसा’ में शीबा चड्ढा ने बुआ की रोचक भूमिका निभाई। ‘काय पो छे’ में सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव और अमित साध को एक साथ ला उनकी केमिस्‍ट्री से फिल्‍म निखर गई। मानव कौल उस फिल्‍म की खोज बने, जबकि ‘हैदर’ में शाहिद कपूर के पिता बने नरेंद्र झा को चौतरफा तारीफ मिली। फिल्‍म के प्रमोशन में उनका वॉयस ओवर जमकर इस्‍तेमाल हुआ। इस साल वे ‘मोहनजो दाड़ो’ व ‘घायल वंस अगेन’ में मेन विलेन हैं।
कास्टिंग डायरेक्‍टर के अलावा युवा फिल्‍मकारों ने भी पूरा सिनेरियो बदल दिया है। पहले पैसे वाले ही फिल्‍म बनाते थे। वे सिनेमा को मनी मेकिंग मशीन मानते थे। अब वह चलन बदला है।   मानव कौल कहते हैं, ‘25 साल के चैतन्‍य तम्‍हाणे कोर्ट बना उसे ऑस्‍कर तक ले जाते हैं। वह भी तब, जब उससे पहले उनके पास कोई सिनेमाई अनुभव नहीं था। उस फिल्‍म में कथित नामी चेहरे नहीं थे। उसके बावजूद वह अपील कर गई। यही अच्‍छी ही बात है। सितारों पर से हमारी निर्भरता कम होती जा रही है।      
एयरलिफ्ट में कुवैती आर्मी अफसर बने इनामुल हक के मुताबिक, सिने लिटरेसी में खासा इजाफा हुआ है। ईरानी फिल्‍मकार माजिद मजीदी व जफर पनाही जैसों ने भी यहां के फिल्‍मकारों को प्रेरित किया। उन्‍हें बात समझ में आ गई कि कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट की मौजूदगी से एक तो किफायत में फिल्‍म बन जाएगी, दूसरा हर इलाके व तबके की कहानियां लोगों के पास आएंगी। वे दिल को छूने के अलावा रोमांचक और प्रेरक रहेंगी।
लब्‍बोलुआब यह कि अब अब सितारों व कलाकारों के बीच को-एग्‍जिस्‍टेंस का मामला बन चुका है। सलमान खान जैसे सितारे भी अपने उन सहकलाकारों की मदद करने लगे हैं। लोगों को याद होगा कि  उन्‍होंने ट्वीट कर अपने प्रशंसकों व जनता-जनार्दन से मांझी- द माउंटेनमैन देखने की अपील की। यह ट्रेंड हाल के बरसों की ही उपज है। किरण राव शिप ऑफ थीसियस के सपोर्ट में खड़ी होती हैं और कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट से सजी फिल्‍म को बड़ा फलक मिलक जाता है। यह उम्‍दा सिनेमा व कलाकारों को स्‍थापित करने के लिए शुभ संकेत हैं।

Friday, April 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : निल बटे सन्‍नाटा





मलिन बस्‍ती में उजास

-अजय ब्रह्मात्‍मज
स्‍वरा भास्‍कर अपनी पीढ़ी की साहसी अभिनेत्री हैं। दो कलाकारों में किसी प्रकार की तुलना नहीं करनी चाहिए। फिर भी कहा जा सकता है कि नवाजुद्दी सिद्दीकी की तरह उन्‍होंने मुख्‍यधारा और स्‍वतंत्र स्‍वभाव की फिल्‍मों में एक संतुलन बिठाया है। हम ने उन्‍हें हाल ही में प्रेम रतन धन पायो में देखा। निल बटे सन्‍नाटा में उन्‍होंने 15 साल की बेटी की मां की भूमिका निभाई है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में इमेज के प्रति अतिरिक्‍त सजगता के दौर में ऐसी भूमिका के लिए हां कहना और उसे पूरी संजीदगी और तैयारी के साथ निभाना उल्‍लेखनीय है।
आगरा की इस कहानी में ताजमहल के पीछे की मलिन बस्‍ती में रह रही चंदा सहाय बर्तन-बासन और खाना बनाने का काम करती है। उसकी एक ही ख्‍वाहिश है कि उसकी बेटी अपेक्षा पढ़-लिख जाए। मगर बेटी है कि उसका पढ़ाई में ज्‍यादा मन नहीं लगता। गणित में उसका डब्‍बा गोल है। बेटी की पढाई के लिए वह हाड़-तोड़ मेहनत करती है। बेटी है कि मां की कोशिशों से बिदक गई है। वह एक नहीं सुनती। उल्‍टा मां को दुखी करने की पूरी कोशिश करती है। कुछ उम्र का असर और कुछ मां से नाराजगी... उसे लगता है कि मां अपने सपने उसके ऊपर थोप रही है। चंदा के सपनों की हमराज हैं दीदी। दीदी के सुझाव पर वह ऐसा कदम उठाती है,जिससे बेटी और भी नाराज हो जाती है। इस कहानी में दीदी के साथ प्रिंसिपल श्रीवास्‍तव जी भी हैं। अपेक्षा के सहपाठियों की फिल्‍म में खास भूमिका है।
निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने निल बटे सन्‍नाटा को मां-बेटी के रिश्‍ते और पढ़ाई पर केंद्रित रखा है। उन्‍होंने इस फिल्‍म में उदासी और मलिनता नहीं आने दी है। मलिन बस्‍ती में अधिक देर तक कैमरा नहीं ठहरता। दुख दर्शाने की अतिरिक्‍त कोशिश नहीं है। उल्‍लास भी नहीं है,लेकिन मुख्‍य कलाकार में अदम्‍य उत्‍साह है। मुख्‍य किरदार की कोई बैक स्‍टोरी भी नहीं है,जिससे पता चले कि चंदा सहाय क्‍यों बर्तन-चौका का काम कर रही है? जो है से वर्तमान है और उस वर्तमान में बेहतर भविष्‍य के सपने और संघर्ष हैं। फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में उपदेशात्‍मक होती है,लेकिन प्रवचन पर नहीं टिकती। अगले ही दृश्‍य में सहज और विनोदी संवाद आ जाते हैं। निर्देशक ने दृश्‍य संरचना से कथ्‍य को बोझिल नहीं होने दिया है। भावनाओं का घनत्‍व गाढ़ा नहीं किया है। निर्देशक ने लेखकों की मदद से सरल शब्‍दों में गंभीर बातें की हैं। यह मलिन बस्‍ती के वंचित चरित्रों के सपनों और उजास की फिल्‍म है।
निल बटे सन्‍नाटा स्‍वरा भास्‍कर की उम्‍दा कोशिश है। चंदा सहाय को आत्‍मसात करने और उसे पर्दे पर उतारने में उन्‍होंने संवाद अदायगी से लेकर बॉडी लैंग्‍वेज तक पर मेहनत की है। अनुभव और जानकारी की कमी से कुछ चीजें छूट जाती है या खटकती हैं तो वह अकेले एक्‍टर का दोष नहीं है। स्‍वरा ने चंदा सहाय को पर्दे पर यथासंभव सही तरीके से उतारा है। अपेक्षा के दोस्‍त सहपाठी और गण्ति में मदद करने वाले कलाकार ने उम्‍दा काम किया है। सारे बच्‍चे नैचुरल और सहज हैं। दीदी की भूमिका में आई रत्‍ना पाठक शाह ने चंदा का मनोबल बढा़ने में पूरी मदद की है। उनकी सहायता से चंदा सहाय का किरदार निखरता है। निल बटे सन्‍नाटा में पंकज त्रिपाठी याद रह जाते हैं। उन्‍होंने खुशमिजाज टीचर की भूमिका को दमदार बना दिया है। वे आर्गेनिक एक्‍सप्रेशन के कलाकार हैं। उनकी अदाओं में हमेशा नवीनता रहती है। यों लगता है कि आसपास का कोई चरित्र उठ कर पर्दे पर चला गया हो।
निल बटे सन्‍नाटा। वैसी चंद फिल्‍मों में शुमार होगी,जिसमें हिंदी समाज और मिजाज है। हिंदी फिल्‍मों से गायब हो रहे हिंदी समाज की बहुत चार्चा होती है। निल बटे सन्‍नाटा भरोसा देती है कि उम्‍मीद कायम है। कलाकार और निर्देशक अपने तई कोशिश कर रहे हैं।
अवधि- 100 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन

Tuesday, April 19, 2016

हंसमुख है मेरा किरदार :पंकज त्रिपाठी



-अमित कर्ण
पंकज त्रिपाठी उन चंद कलाकारों में से एक हैं, जो कमर्शियल व ऑफबीट फिल्‍मों के बीच उम्‍दा संतुलन साध रहे हैं। मसलन हाल के दिनों में मसान और दिलवाले। अब उनकी निल बटे सन्‍नाटा आ रही है। वे इसमें स्‍कूल प्रिसिंपल बने हैं।
-फिल्‍म में आप लोग कहीं प्रौढ़ शिक्षा अभियान का प्रचार तो नहीं कर रहे हैं?
पहली नजर में मुझे भी यही लगा था, पर ऐसा नहीं है। यह आप को हंसा-रुला व प्रेरित कर घर भेजेगी। इसमें मनोरंजन करने के लिए किसी प्रकार के हथकंडों का इस्‍तेमाल नहीं है। बड़ी प्‍यारी व प्‍योर फिल्‍म है। इससे हर वे लोग जुड़ाव महसूस करेंगे, जो अपने दम पर मकबूल हुए हैं। मैं इसमें हंसमुख श्रीवास्‍तव की भूमिका में हूं। वह शिक्षक है।
-वह किस किस्‍म का शिक्षक है। खडूस या नाम के अनुरूप हंसमुख। साथ ही इसमें आप ने क्‍या रंग भरे हैं?
मैं निजी जीवन में जिन तीन-चार शिक्षकों का मुरीद रहा हूं, उनकी खूबियों-खामियों को मैंने इसमें समेटा है। एक लक्ष्‍मण प्रसाद थे। जगतकुमार जी थे। राम जी मास्‍टर साहब थे। गणित पढ़ाने वाले टीचर अमूमन बोरिंग होते हैं, मगर श्रीवास्‍तव जी ऐसा नहीं है। वह आशावादी है। वह कमजोर छात्रों को भी प्रखर बनाना चाहता है।
-कई बार वैसे लोग भी टीचर बन जाते हैं, जो कुछ और बनना चाहते थे, पर वह न हो सका। नतीजतन, उन्‍होंने बीएड की और बन गए शिक्षक। वे बड़े बेकार अध्‍यापक साबित होते हैं। वह कुंठा इस फिल्‍म में है?
उस मसले पर हम नहीं गए हैं। यहां संतोषम परम सुखम की बात है। किसी किरदार को भौतिक सुखों की लालसा नहीं है। वे अपनी-अपनी  जगहों से खुद की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे शिकायती नहीं हैं। लक्ष्‍य प्राप्ति को वे निरंतर लगे हुए हैं। वे अपने चाहने वालों का भरोसा नहीं तोड़ना चाहते। वह चीज सीखने योग्‍य है। मैंने सीख लेते हुए तय किया है कि मैंने अब तक जो फैन फोलोइंग अर्जित की है, उनका भरोसा न तोडूं। उन्‍हें पसंद पड़ने वाली फिल्‍में ही करता रहूं।
-जिन लोगों से आप कभी टकराए न हों, उस किस्‍म के किरदारों को कैसे क्रिएट करते हैं?
मैं किरदारों की बैक स्‍टोरी पर काफी काम करता हूं। मेरा मानना है कि दुनिया का कोई व्‍यक्ति पूरी तरह ब्‍लैक या ह्वाइट नहीं होता। हर कोई ग्रे है। उसके बाद मैं उसके कार्यकलापों के कारणों की तह में जाता हूं।
-इतनी डिटेलिंग स्क्रिप्‍ट में तो नहीं ही मिलती होगी?
जी। वह रूपरेखा तैयार करना तो कलाकारों की जिम्मेदारी है। मिली भूमिका के अतीत की कल्‍पना कर उसके मुताबिक अदाकारी करने से रोल जीवंत हो जाता है।
-‘…वासेपुर से लेकर दिलवाले तक आप अपने किरदारों को ठहराव व सुकून पसंद रखते रहे हैं। यह आप का सिग्‍नेचर टोन बनता जा रहा है?आप कह सकते हैं। दरअसल हम, आप या दूसरे किसी में गांधी भी है और हिटलर भी है। लिहाजा वैसी भूमिकाएं निभाते व्यक्ति विशेष के व्‍यक्तित्‍्व की आभा संबंधित रोल पर दिखेगी। हालांकि मैं पिछले किए गए काम को रिपीट न करने की पूरी कोशिश करता हूं।
- जो जिंदगी कभी जी न हो, उसे कैसे निभाना चाहिए? 
कल्‍पनाशक्ति। वह यथार्थ के मुकाबले कहीं ज्‍यादा अनूठी होती है। आप असल में कभी हवा में नहीं उड़ सकते, मगर कल्‍पना करें तो मिनटों में हवा से बातें करने लगेंगे। आप की भाव-भंगिमा बदल जाती है। हां आप को क्राफ्ट की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए। वे जितनी पुख्‍ता होंगी, आप की धारणा बचकानी नहीं लगेंगी। उन जानकारियों में कल्‍पना के रंग भरते रहें। आज उस जैसी कल्‍पनाशक्ति के आधार पर जंगल बुक, अवतार, इंटरस्‍टेलर जैसी फिल्‍म तक बन गई, जो कहीं से महज फंतासी नहीं लगती। ‘…वासेपुर में मैं कसाई सुल्‍तान कुरेशी बना था। उससे पहले मैं कभी किसी बूचड़खाने में नहीं गया था। शूटिंग दरअसल बूचड़खाने में ही हुई तो वहां चंद कसाइयों से कुछ देर बातें कर लीं। उसके बाद मैंने अपना सुल्‍तान कुरेशी गढ़ा।
-अमित कर्ण    

    
   

Tuesday, March 8, 2016

गाड़ी चल पड़ी - पंकज त्रिपाठी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
गैंग्‍स ऑफ वासेपुर के बाद पंकज त्रिपाठी पहचान में आए। धीरे-धीरे उन्‍होंने अपनी जगह और साख बना ली है। सीमित दृश्‍यों की छोटी भूमिकाओं से सीमित बजट की खास फिल्‍मों में अपनी मौजूदगी से वे दर्शकों को प्रभावित कर रहे हैं। उनकी कुछ फिल्‍में रिलीज के लिए तैयार हैं और कुछ की शूटिंग चल रही है। झंकार के पाठकों के लिए वे अजय ब्रह्मात्‍मज के साथ शेयर कर रहे हैं अपना सफर और अनुभव...


0 सिनेमा में आने का इरादा बिल्कुल नहीं था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह संभव होगा। सिनेमा के ग्लैमर का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं रहा। गांव में हमारे सिनेमा घऱ भी नहीं था। हम तो फिल्मों के बारे में जानते ही नहीं थे। हमारी शुरुआत रंगमंच से हुई। हमने इसे रोजगार बनाने का सोच लिया। रंगमंच की ट्रेनिंग के लिए हम एनएसडी पहुंच गए। एनएसडी के बाद मैंने सोचा नहीं था कि मुंबई जाऊंगा। हिंदी रंगमंच की जो दुर्दशा है कि रंगमंच पर अभिनेता गुजारा नहीं कर सकता। इसी वजह से मैं हिंदी सिनेमा की तरफ बढ़ा। एनएसडी से लौट कर मैं पटना गया। वहां पर मैंने सइया भए कोतवाल प्ले किया। वहां के पांच महीनों में मुझे अनुभव हुआ कि हिंदी रंगमंच में टिकना मुश्किल है। इस स्थिति मैं मुझे लगा कि क्या करें। तब तक शादी हो चुकी थी। प्रेम विवाह है मेरा। प्रेम विवाह करने पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है। लोग ताने मारते हैं कि दो रोटी जुटा नहीं सकते और प्रेम करने चले थे। फिर मुझे मुंबई आना पड़ा।

बचपन में नाटक

मेरे गांव में बड़ी पुरानी परंपरा थी,जो अब नहीं रहीं। मेरे निकलने के छह साल बाद वह बंद हो गया। हमारे गांव में छठ के दूसरे दिन गांव में नाटक होता था। छठ के समय शहर में काम करनेवाले निवासी गांव में आते थे। मेरे गांव के अधिक लोग कलकत्ता में काम करते थे। आज भी वहीं कमाई करते हैं। राघव तिवारी डायरेक्टर थे। वहीं हम मिलकर प्ले करते थे। मैं दसवीं में था। थे। हमारे यहां लड़की का किरदार पंडित परिवार के लोग नहीं करते थे। लड़की का किरदार लोअर कास्ट के लोग करते थे। मैं अपने गांव का पहला लड़का था,जिसने पंडित परिवार का होते हुए लड़की का  किरदार निभाया।

पटना प्रवास
पटना में बारहवीं क्लास के बाद मैं छात्र राजनीति से जुड़ गया था। मैं दक्षिणपंथी विचारधारा का कार्यकर्ता था। पटना आकर विद्यार्थी सभा से जुड़ने पर मैं छोटी सभाओं में जाने लगा। मुझे कभी–कभार बोला जाता था कि पकंज जी भीड़ जुटाए। कुछ बोलिए। मेरी कोशिश रहती थी कि कुछ ऐसा कह दूं कि पचास सौ लोग खड़े हो जाए। यह करते–करते मेरा काम भीड़ एकत्रित करने का हो गया। इसी बीच १९९३ में छात्रसंघ चुनाव हुआ। उस समय बिहार में आंदोलन हुआ। लालु प्रसाद यादव की सरकार थी। मैं गिरफ्तार हुआ। जेल चला गया। सात दिन जेल में रहा। जेल में सात दिन के दौरान अपनी विचारधारा के आलावा विपरीत विचार धारा के लोगों से बातचीत करने का मौका मिला । वहां मैंने देखा कि कुछ साथी पुस्तकालय में जाकर बैठा करते थे। हमें तब तक पता नहीं था कि साहित्य क्या होता है। मुझे एक साथी ने दो कविताएं औऱ कहानी पढ़ने के लिए दी। मैंने पढ़ा। मुझे अच्छी लगी। इससे पहले हम साहित्य से परे थे। वहां पर वे अपना दक्षिणपंथी साहित्य पढ़ने को देते थे। खैर, मुझे उसके बाद से किताबें कहानियां अच्छी लगने लगी। जेल में कुछ लोगों से दोस्ती बढ़ गई। बाहर आने के बाद वहीं लोग पटना में बोलें कि गांधी मैदान में लक्ष्मीनारायण का प्ले अंधा कुआं लगा है। वो देखने आ जाओं। मैं गया। उस प्ले को देखकर मैं चकित रह गया। परिणीता जायसवाल एक्टर उस प्ले में थी। मैं थिएटर में रोने लगा था। १९९६ में विजय कुमार एनएसडी से पटना आए। यहां पर वह एक्टर खोज रहे थे। मुझे दिलचस्पी थी। वह भीष्म साहनी के नाटक का मंचन करने वाले थे। उसी के लिए वह एक्टर की तलाश कर रहे थे। उस कहानी पर हमने १९९७ जनवरी में प्ले किया। तब से मेरा प्ले करने का सिलसिला शुरू हो गया। मुझे खुशी मिलने लगी। इससे मेरा समय छात्र राजनीति में कम होने लगा।

मुंबई के आरंभिक दिन
यहां पर मेरे दोस्त थे भानु उदय। वह भी एनएसडी से पढ़े हैं। मुझसे पहले वह यहां पर आ गए थे। वह मुझे मुबंई आने के लिए कहते थे। मुझसे कहते कि यहीं पर आ जा। तू सिनेमा के लिए बना हुआ है। मैं फिर मुंबई पहुंचा। लोगों से मिलने और फोटो देने के बाद रोल पाने के इंतजार का सिलसिला चला। एक दिन पता चला कि भावना तलवार धर्म फिल्म बना रही थी। वह फिल्म मिल गई। वह फिल्म यहां-वहां गई। मगर ज्यादा कुछ हो नहीं पाया। उसके बाद असली संघर्ष शुरू हुआ। विशाल भरद्वाज की ओमकारा फिल्म में थोड़ा काम मिला। वह पसंद किया गया। लोगों ने मुझे याद रखा। किसी को मेरी एक्टिंग अच्छी लगी। किसी को मैं स्क्रीन पर अच्छा लगा। उसके बाद मैंने चाय का प्रचार किया जागो रे। उससे कई लोगों ने मुझे पहचाना। लोग जानने लगें। इंडस्ट्री में लोग मुझे खोजने लगें। किसी को पता चला कि मैं एनएसडी से हूं। वहां एनएसडी में कुछ लोग फोन करने लगें। मेरे बारे में पता लगाने लगें। तीन –चार फिल्में नेता के रोल में मिल गई। इसमें से तीन फिल्में बंद हो गई। रिलीज ही नहीं हुई। उसके बाद ठीक था। मेरा जीवन चल रहा था। स्टारप्लस पर एक टीवी शो कर लिया। प्रकाश झा ने एक शो बनाया था। वह भी कर लिया। बाहुबली से उत्तर प्रदेश में सब जानने लगें। गैंग ऑफ़ वासेपुर  से इंडस्ट्री में मेरे प्रति लोगों का नजरिया

यहां से आगे कहां
मेरी बुनियादी लड़ाई खत्म हो गई है। मुझे अब लोगों को बताना नहीं पड़ता है कि मैं एक्टर हूं। पहले बार-बार बताना पड़ता था। अब सबको लगता है कि मैं अच्छा एक्टर हूं। मुझे भी यह बात पता नहीं थी। बाद मैं मुझे पता चला।
गैंग्‍स ऑफ़ वासेपुर के बाद पंद्रह फिल्में कर चुका हूं। अभी गाड़ी ठीक चल रही है?
हां ,सर ठीक चल रहा है।

Saturday, June 15, 2013

फिल्‍म समीक्षा : फुकरे

Fukrey-अजय ब्रह्मात्मज
मृगदीप सिंह लांबा की फिल्म 'फुकरे' अपने किरदारों की वजह से याद रहती है। फिल्म के चार मुख्य किरदार हैं-हनी (पुलकित सम्राट), चूचा (वरुण), बाली (मनजीत सिंह) और जफर (अली जफर)। इनके अलावा दो और पात्र हमारे संग थिएटर से निकाल आते हैं। कॉलेज के सिक्युरिटी इंचार्ज पंडित जी (पंकज त्रिपाठी) और भोली पंजाबन (रिचा चड्ढा)..ये दोनों 'फुकरे' के स्तंभ हैं। इनकी अदाकारी फिल्म को जरूरी मजबूती प्रदान करती है।
बेरोजगार युवकों की कहानी हिंदी फिल्मों के लिए नई नहीं रह गई है। पिछले कुछ सालों में अनेक फिल्मों में हम इन्हें देख चुके हैं। मृगदीप सिंह लांबा ने इस बार दिल्ली के चार युवकों को चुना है। निठल्ले, आवारा और असफल युवकों को दिल्ली में फुकरे कहते हैं। 'फुकरे' में चार फुकरे हैं। उनकी जिंदगी में कुछ हो नहीं रहा है। वे जैसे-तैसे कुछ कर लेना चाहते हैं। सफल और अमीर होने के लिए वे शॉर्टकट अपनाते हैं, लेकिन अपनी मुहिम में खुद ही फंस जाते हैं। उनकी मजबूरी और बेचारगी हंसाती है। पंडित जी की मक्कारी और भोली पंजाबन की तेजाबी चालाकी फुकरों की जिंदगी को और भी हास्यास्पद बना देती है।
फिल्म के दो किरदार लाली और जफर शुरू में अपनी कोशिशों में नाकामयाब होते हैं। उनके प्रति हमार सहानुभूति बनती है, लेकिन हनी और चूचा तो बेशर्म और चालाक हैं। उनकी बेवकूफियों पर तरस नहीं आता। मजेदार है कि फिल्म एक घटनाओं में चारों किरदारों के मिल जाने के बाद हमें चारों की कामयाबी जरूरी लगने लगती है। लेखकों ने बहुत खूबसूरती से इन चरित्रों को घटनाओं में डालकर हमारी संवेदना जागृत कर दी है। फिर उनका निकम्मापन भी हमें बुरा नहीं लगता। हम उन्हें सफल होते देखना चाहते हैं।
'फुकरे' एक सीधी सी कहानी पर नहीं चलती। इसमें घटनाओं और प्रसंगों की अद्भुत गति है। फिल्म के कई दृश्यों में जबरदस्त हंसी आती है। नए किस्म की यह कॉमेडी हिंदी फिल्मों को नया विस्तार और आयाम देती है। चारों अभिनेताओं ने अपने किरदारों को संयत तरीके से निभाया है। वरुण और मनजोत थोड़े ज्यादा अच्छे दिखते हैं। फिल्म को पंकज त्रिपाठी और रिचा चड़्ढा के अभिनय से मजबूती मिली है। दोनों ही कलाकार जबरदस्त फॉर्म में हैं। वे अपने परफारमेंस से फिल्म के प्रभाव को बढ़ाते हैं।
इस फिल्म का गीत-संगीत फुकरे टाइप का ही है। फिल्म में ही अच्छा लगता है।
अवधि-130 मिनट
*** तीन स्टार

Friday, January 27, 2012

फिल्‍म समीक्षा : अग्निपथ

अग्निपथ: मसालेदार मनोरंजन-अजय ब्रह्मात्‍मज

प्रचार और जोर रितिक रोशन और संजय दत्त का था, लेकिन प्रभावित कर गए ऋषि कपूर और प्रियंका चोपड़ा। अग्निपथ में ऋषि कपूर चौंकाते हैं। हमने उन्हें ज्यादातर रोमांटिक और पॉजीटिव किरदारों में देखा है। निरंतर सद्चरित्र में दिखे ऋषि कपूर अपने खल चरित्र से विस्मित करते हैं। प्रियंका चोपड़ा में अनदेखी संभावनाएं हैं। इस फिल्म के कुछ दृश्यों में वह अपने भाव और अभिनय से मुग्ध करती हैं। शादी से पहले के दृश्य में काली की मनोदशा (खुशी और आगत दुख) को एक साथ जाहिर करने में वह कामयाब रही हैं। कांचा का दाहिना हाथ बने सूर्या के किरदार में पंकज त्रिपाठी हकलाहट और बेफिक्र अंदाज से अपनी अभिनय क्षमता का परिचय देते हैं। दीनानाथ चौहान की भूमिका में चेतन पंडित सादगी और आदर्श के प्रतिरूप नजर आते हैं। इन किरदारों और कलाकारों के विशेष उल्लेख की वजह है। फिल्म के प्रोमोशन में इन्हें दरकिनार रखा गया है। स्टार रितिक रोशन और संजय दत्त की बात करें तो रितिक हमेशा की तरह अपने किरदार को परफेक्ट ढंग से चित्रित करते हैं। संजय दत्त के व्यक्तित्व का आकर्षण उनके परफारमेंस की कमी को ढक देता है। कांचा की खलनायकी एक आयामी है, जबकि रऊफ लाला जटिल और परतदार खलनायक है।

निर्माता करण जौहर और निर्देशक करण मल्होत्रा अग्निपथ को पुरानी फिल्म की रीमेक नहीं कहते। उन्होंने इसे फिर से रचा है। मूल कहानी कांचा और विजय के द्वंद्व की है, लेकिन पूरी संरचना नयी है। रिश्तों में भी थोड़ा बदलाव आया है। नयी अग्निपथ सिर्फ कांचा और विजय की कहानी नहीं रह गई हैं। इसमें नए किरदार आ गए हैं। पुराने किरदार छंट गए हैं। अग्निपथ हिंदी फिल्मों की परंपरा की घनघोर मसालेदार फिल्म है, जिसमें एक्शन, इमोशन और मेलोड्रामा है। नायक-खलनायक की व्यक्तिगत लड़ाई हो तो दर्शकों को ज्यादा मजा आता है। ऐसी फिल्मों को देखते समय खयाल नहीं रहता कि हम किस काल विशेष और समाज की फिल्म देख रहे हैं। लेखक निर्देशक अपनी मर्जी से दृश्य गढ़ते हैं। एक अलग दुनिया बना दी जाती है, जो समय, परिवेश और समाज से परे हो जाती है। तभी तो अग्निपथ में लड़कियों की नीलामी जैसे दृश्य भी असंगत नहीं लगते।

करण मल्होत्रा ने पुरानी कहानी, पुरानी शैली और घिसे-पिटे किरदारों को नयी तकनीक और प्रस्तुति दे दी है। उनका पूरा जोर फिल्म के कुछ प्रसंगों और घटनाओं को प्रभावपूर्ण बनाने पर रहा है। फिल्म का तारतम्य टूटता है। कहानी भी बिखरती है। इसके बावजूद इंतजार रहता है कि अगली मुलाकात और भिड़ंत में क्या होगा? लेखक-निर्देशक पूरी फिल्म में यह जिज्ञासा बनाए रखने में कामयाब होते हैं। मांडवा और मुंबई को अलग रंगों में दिखाकर निर्देशक ने एक कंट्रास्ट भी पैदा किया है।

फिल्म के प्रोमोशन और ट्रेलर में कांचा के हाथ में गीता दिखी थी। गीता यहां काली किताब में बदल गई है। फिर भी कांचा गीता के श्लोकों को दोहराता सुनाई पड़ता है। कांचा के मुंह से गीता के संदेश की तार्किकता समझ के परे हैं। ओम पुरी इस फिल्म में भी प्रभावहीन रहे हैं। वे इन दिनों फिल्म से असंपृक्त नजर आते हैं। फिल्म के एक महत्वपूर्ण इमोशनल दृश्य में मां के घर रितिक रोशन को थाली में खाना खाते दिखाया गया है। इस दृश्य में साफ नजर आता है कि क्या रितिक रोशन को कौर उठाने नहीं आता या उन्होंने इसे लापरवाही से निभा दिया है। वे चावल का कौर ऐसे उठाते हैं मानो भूंजा उठा रहे हो। परफेक्ट अभिनेता से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती।

रेटिंग- *** 1/2 साढ़े तीन स्टार