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Friday, August 15, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिंघम रिटर्न्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
            रोहित शेट्टी एक बार फिर एक्शन ड्रामा लेकर आ गए हैं। तीन सालों के बाद वे 'सिंघम रिटर्न्‍स' में बाजीराव सिंघम को लेकर आए हैं। इस बीच बाजीराव सिंघम मुंबई आ गया है। उसकी पदोन्नति हो गई है। अब वह डीसीपी है, लेकिन उसका गुस्सा, तेवर और समाज को दुरुस्त करने का अभिक्रम कम नहीं हुआ है। वह मुंबई पुलिस की चौकसी, दक्षता और तत्परता का उदाहरण है। प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वच्छ राजनीति के गुरु दोनों उस पर भरोसा करते हैं। इस बार उसके सामने धर्म की आड़ में काले धंधों में लिप्त स्वामी जी हैं। वह उनसे सीधे टकराता है। पुलिस और सरकार उसकी मदद करते हैं। हिंदी फिल्मों का नायक हर हाल में विजयी होता है। बाजीराव सिंघम भी अपना लक्ष्य हासिल करता है।

             रोहित शेट्टी की एक्शन फिल्मों में उनकी कामेडी फिल्मों से अलग कोशिश रहती है। वे इन फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को पिरोने की कोशिश करते हैं। उनकी पटकथा वास्तविक घटनाओं और समाचारों से प्रभावित होती है। लोकेशन और पृष्ठभूमि भी वास्तविक धरातल पर रहती है। उनके किरदार समाज का हिस्सा होने के साथ लार्जर दैन लाइफ और फिल्मी होते हैं। बाजीराव सिंघम की ईमानदारी सिर चढ़ कर बोलती है। रोहित शेट्टी की खास शैली है, जो हिंदी फिल्मों के पारंपरिक ढांचे में थोड़ी फेरबदल से नवीनता ला देती है। पूरा ध्यान नायक पर रहता है। बाकी किरदार उसी के सपोर्ट या विरोध में खड़े रहते हैं। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में खलनायक बदल गए हैं। इस बार धर्म, काला धन और मौकापरस्त राजनीति एवं ढोंगी साधु के गठजोड़ से समाज में फैल रहे भ्रष्टाचार से बाजीराव सिंघम का माथा सटकता है। वह जांबाज पुलिस अधिकारी है। अपनी युक्ति से वह इस गठजोड़ की तह तक पहुंचता है, लेकिन उसे सतह पर लाने में नाकामयाब होने पर वह कानून के दायरे से बाहर निकलने में संकोच नहीं करता, जबकि कुछ समय पहले वह मीडिया को सलाह दे रहा होता है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों से पहले वे फैसले नहीं दें।

          हिंदी फिल्मों की यह बड़ी समस्या है कि वे मनोरंजन के नाम पर हर तर्क को गर्क कर देती हैं। दर्शकों को रोमांच और आनंद तो मिलता है, लेकिन तृप्ति नहीं होती। कुछ समय के बाद हम ऐसी फिल्मों को भूल जाते हैं। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में आम दर्शकों की पसंद और लोकप्रियता का पूरा खयाल रखा गया है। हालांकि इसी कोशिश में जबरन गाने भी डाले गए हैं, जो फिल्म की गति को रोकते हैं। हीरो है तो हीरोइन भी होनी चाहिए और फिर उन दोनों का रोमैंटिक ट्रैक भी होना चाहिए। इस अनिवार्यता से फिल्म का प्रभाव कम होता है। बाजीराव सिंघम और अवनी की प्रेमकहानी का ओर-छोर समझ में नहीं आता। राजनीति की सही समझ नहीं होने से सालों पुरानी धारणा के सहारे किरदार गढऩे पर किरदार कैरीकेचर लगने लगते हैं। स्वामी जी और राव के चरित्रों पर अधिक मेहनत नहीं की गई है।

         'सिंघम रिटर्न्‍स' में बाजीराव सिंघम मुंबई पुलिस का अधिकारी है। उसके बहाने पुलिस की छवि को बेहतर परिप्रेक्ष्य दिया गया है। सिर्फ 47 हजार पुलिसकर्मी शहर के सवा करोड़ नागरिकों की सुरक्षा के लिए भागदौड़ करते हैं। उनकी जिंदगी नारकीय हो चुकी है। यह फिल्म सिस्टम पर भी सवाल करती है, लेकिन उनमें उलझती नहीं है। बाजीराव सिंघम के निशाने पर कुछ इंडिविजुअल हैं। हर अराजक नायक की तरह उसे भी लगता है कि इन्हें समाप्त करने से कुरीतियां खत्म हो जाएंगी। फिल्म में सामूहिकता सिर्फ दिखावे के लिए है, क्योंकि बाजीराव सिंघम अंतिम फैसले में किसी की सलाह नहीं लेता।
          अजय देवगन के लिखी और रची गई 'सिंघम रिटर्न्‍स' उनकी छवि और खूबियों का इस्तेमाल करती है। अपनी गर्जना, एक्शन और द्वंद्व जाहिर करने में वे सफल रहे हैं। अमोल गुप्ते और जाकिर हुसैन के किरदारों की सीमाएं हैं। फिर भी वे निराश नहीं करते। करीना कपूर के हिस्से जो आया है, उसे उन्होंने ईमानदारी से निभा दिया है। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में मारधाड़ और गोलीबारी ज्यादा है। खासकर उनकी आवाज ज्यादा और ऊंची है।

अवधि-142 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार 

Monday, March 4, 2013

क्या करीना और विद्या की लोकप्रियता बनी रहेगी?

शादी के साइड इफेक्ट्स

-अजय ब्रह्मात्मज
    करीना कपूर और विद्या बालन की शादी के बाद उनके प्रशंसकों के मन को यह प्रश्न मथ रहा होगा कि क्या दोनों पहले की तरह फिल्मों में काम करती रहेंगी? अगर उनका फैसला हुआ तो क्या उन्हें पहले की तरह दमदार और केंद्रीय भूमिकाएं मिलती रहेंगी? सच कहें तो दर्शकों के स्वीकार-अस्वीकार के पहले फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता-निर्देशक ही शादीशुदा अभिनेत्रियों से कन्नी काटने लगते हैं। सीधे व्यावसायिक कारण हैं। पहला, शादी के बाद न जाने कब ये अभिनेत्रियां मां बन जाएंगी और उनकी फिल्में कुछ महीनों के लिए अटक जाएंगी। दूसरा, शादी के बाद उनके पति (फिल्मी और गैरफिल्मी दोनों) उनकी दिनचर्या और प्राथमिकता को प्रभावित करेंगे। परिवार और पति की जिम्मेदारियों की वजह से वे शूटिंग में अनियमित हो जाएंगी। तीसरा, कहा जाता है कि शादीशुदा अभिनेत्रियों में दर्शकों की रुचि खत्म हो जाती है। वे अपने सपनों में शादीशुदा अभिनेत्रियों को नहीं चाहते। उनकी चाहत खत्म होने से निर्माता शादीशुदा अभिनेत्रियों को फिल्में देने से बचते हैं।
    तीनों कारणों की जड़ में जाएं तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद पुरुष वर्चस्व, प्रधानता और मानसिकता है। अभिनेता की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। वह शादी के बाद पापा, दादा और नाना बन जाने पर भी फिल्मों में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है, लेकिन अभिनेत्रियां शादी के बाद ही अवांछनीय हो जाती हैं। किंचित अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास गवाह है कि उसने शादीशुदा अभिनेत्रियों को तरजीह नहीं दी। या तो उन्होंने घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से संन्यास ले लिया या फिर उनके पास ऑफर आने कम और खत्म हो गए। जिन अभिनेत्रियों ने गैरफिल्मी पति चुने, उन्हें पारिवारिक और सामाजिक दबाव में अभिनय का लोभ छोडऩा पड़ा। फिल्मी पति अगर लेखक, निर्माता या निर्देशक हुआ तो भी शादी के बाद हदें तय होने के साथ पाबंदियों का शिकंजा बढ़ता जाता है। एक दिन परेशान होकर अभिनेत्री स्वेच्छा से फिल्मों को टाटा-बाय-बाय कर देती है। आश्चर्य होता है कि अभिनेता पति भी अभिनेत्री पत्नियों की अभिनय आकांक्षाओं को महत्व नहीं देते। अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, अजय देवगन आदि के सहमति, असहमति और निर्णय की सही जानकारी मिले तो पता चलेगा कि जया बच्चन, नीतू सिंह और काजोल के जीवन में निष्क्रिय होने के समय कैसी उथल-पुथल रही। हम लगातार देख रहे हैं कि शादीशुदा अभिनेत्रियां पहले हाशिए पर जाती हैं और फिर पन्ना पलट जाता है। शादी न हो तो भी बहुत कम अभिनेत्रियां अपनी पीढ़ी के आगे-पीछे की पीढिय़ों के अभिनेताओं के साथ काम कर पाती हैं, जबकि श्रीदेवी से लेकर सोनाक्षी सिन्हा तक की लगभग चार पीढिय़ों की अभिनेत्रियों के साथ पिछले 25 वर्षों में सलमान खान काम कर चुके हैं।
    पिछले कुछ महीनों में करीना कपूर और विद्या बालन की शादियां हुई हैं। 32 वर्षीय करीना कपूर और 34 वर्षीया विद्या बालन अभी अपने करिअर की ऊंचाई पर हैं। दोनों की मांग बनी हुई है। करीना कपूर कमर्शियल सिनेमा और कंज्यूमर प्रोडक्ट की चहेती अभिनेत्री हैं। विद्या बालन ने आउट ऑफ बॉक्स सिनेमा के जरिए यह ऊंचाई हासिल की है। करीना कपूर अपने जीरो साइज की वजह से विख्यात रहीं तो विद्या बालन के गदराए बदन पर दर्शकों का एक समूह फिदा है। दोनों ही अभिनेत्रियों ने लगातार अपनी फिल्मों से साबित किया है कि उन्हें सही फिल्में और निर्देशक मिले तो अकेले अपने दम पर ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक ला सकती हैं। उनकी फिल्में चर्चित और लाभप्रद रही है। किंतु यह सब शादी के पहले की बात है। अब देखना है कि शादी के बाद उनकी फिल्मों का क्या हश्र होता है। करीना कपूर ने प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’ के लिए हां कह रखा है। उस फिल्म में उनके साथ अमिताभ बच्चन और अजय देवगन होंगे। उसके अलावा कुछ फिल्मों की घोषणा जल्दी होगी। उधर विद्या बालन शादी के पहले से राज कुमार गुप्ता की ‘घनचक्कर’ की शूटिंग कर रही हैं। इमरान हाशमी के साथ उनकी यह फिल्म शादी के बाद पहली रिलीज होगी।
    हालांकि दोनों अभिनेत्रियां फिलहाल दावा कर रही हैं कि शादी से उनके करिअर में फर्क नहीं पड़ेगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदले माहौल और वर्क कल्चर में यह उम्मीद बनती है कि प्रोडक्शन हाउस, निर्माता और निर्देशक उन्हें फिल्में ऑफर करते रहेंगे। इन उम्मीदों का वर्तमान भविष्य में नजर आएगा। अगर पिछले उदाहरण देखें तो काजोल की चाहत और मौजूदगी के बावजूद उनकी फिल्में कम हो रही हैं। करिश्मा कपूर ने शादी के बाद वापसी तो की, लेकिन उनका आधे मन से भी स्वागत नहीं हुआ। अन्य शादीशुदा अभिनेत्रियां फिल्मों के दूसरे क्षेत्रों में व्यस्त हो गईं हैं या किसी अन्य कारोबार में खुद को साध रही हैं।
    सवाल उठता है कि क्या शादी के बाद भारतीय समाज में महिलाओं की आकांक्षाओं का स्वरूप बदल जाता है? दरअसल,बचपन से उन्हें त्याग की ऐसी घुट्टी पिला दी जाती है कि करिअर में आए संकुचन को वे अपना फैसला मान बैठती हैं। पति, परिवार और संतान के नाम पर वे अपनी प्रतिभाओं का गला घोंट देती है। मजे की बात है कि इसमें उनके पति और परिवार को भी असंतुष्टि नहीं होती। विरले ही ऐसे पति और परिवार मिलेंगे जो शादी के बाद घर आई बहू की कामयाबी से खुश हों और उसे बढावा दें। आखिरकार अभी तक हम एक पुरुष प्रधान देश में ही तो हैं, जहां नारी को अपने अधिकारों के लिए दलितों और अल्पसंख्यकों की तरह जूझना पड़ता है। फिर अभिनेत्रियां अपवाद कैसे हो जाएंगी?


Friday, September 21, 2012

फिल्‍म समीक्षा : हीरोइन


Film review: Heroin-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल तक हीरोइन की हर तरफ चर्चा थी। निर्माण के पहले हीरोइनों की अदला-बदली से विवादों में आ जाने की वजह से फिल्म के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ गई थी। और फिर करीना कपूर जिस तरह से जी-जान से फिल्म के प्रचार में जुटी थीं, उस से तो यही लग रहा था कि उन्होंने भी कुछ भांप लिया है। रिलीज के बाद से सारी जिज्ञासाएं काफूर हो गई हैं। मधुर भंडारकर की हीरोइन साधारण और औसत फिल्म निकली। हीरोइन उनकी पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर और एकांगी है। मधुर भंडारकर के विषय भले ही अलग हों,पर उनकी विशेषता ही अब उनकी सीमा बन गई है। वे अपनी बनाई रुढि़यों में ही फस गए हैं। सतही और ऊपरी तौर पर हीरोइन में भी रोमांच और आकर्षण है,लेकिन लेखक-निर्देशक ने गहरे पैठने की कोशिश नहीं की है। हीरोइनों से संबंधित छिटपुट सच्चाईयां हम अन्य फिल्मों में भी देखते रहे हैं। यह फिल्म हीरोइन पर एकाग्र होने के बावजूद हमें उनसे ज्यादा कुछ नहीं बता या दिखा पाती।
हीरोइन कामयाब स्टार माही अरोड़ा की कहानी है। माही मशहूर हैं। शोहरत, ग्लैमर और फिल्मों से भरपूर माही की जिंदगी में कायदे से उलझनें नहीं होनी चाहिए। हमें एक फिल्म पत्रकार बताती है कि टूटे परिवार से आने की वजह से माही बायपोलर सिंड्रम की शिकार है। वह असुरक्षित और संबंधों में अस्थिर है। ऊपर से मां का दबाव..वह अपनी जिंदगी जी ही नहीं पाती। उसके साथी उसके कंफ्यूजन और अस्थिरता को और बढ़ाते हैं। उसके पास किसी दोस्त या रिश्तेदार का ऐसा कंधा नहीं है,जहां वह दो आंसू बहा सके। सिगरेट, शराब और गोलियों में वह अप्राप्य शांति खोजती है। वह रिश्तों को पहचान भी नहीं पाती। अपने करिआ और ग्लैमर की फिक्र में वह सच्चा प्यार भी खो देती है। कहने को वह इंडेपेंडेंट लड़की है, लेकिन अपनी दुरुहताओं में ऐसी घिरी है कि न तो उसे चैन है और सुकून। मधुर भंडारकर की हीरोइन भावनाओं के उद्वेग में लरजती-कांपती कमजोर लड़की है। शंका और अनिर्णय से अपनी पोजीशन बनाए रखने की उसकी हर कोशिश असफल होती है। यह करीना कपूर की अभिनय क्षमता का कमाल है कि वह इस कमजोर किरदार में भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं। हीरोइन सिर्फ करीना कपूर की भाव-भंगिमाओं और अदाओं के लिए देखी जा सकती है। करीना ने अपनी पिछली फिल्मों की तुलना में अधिक एक्सपोज किया है। फिल्म में ऐसे एक्सपोजर की खास जरूरत नहीं थी।
सिर्फ माही ही नहीं, हीरोइन के अधिकतर किरदार अधूरे, कंफ्यूज और भटकाव के शिकार हैं। मधुर भंडारकर की फिल्मों में प्रबल ग्रंथिपूर्ण मध्यवर्गीय दृष्टिकोण रहता है,जो सफल और उच्चवर्गीय समूह की जिंदगी को हिकारत की नजर से पेश करता है। ऐसे समूह और समाज के अंधेरों को मधुर मध्यवर्गीय चश्मे से देखते हैं। मध्यवर्गीय मानसिकता के दर्शकों को उनकी फिल्में अच्छी लगती हैं। ऐसे दर्शकों को हीरोइन भी अच्छी लग सकती है। मधुर ने पत्र-पत्रिकाओं में आए दिन छपते किस्सों को ही दृश्य बना दिया है। उन किस्सों की परतों और पृष्ठभूमि में वे नहीं जाते। उनकी पहले की फिल्मों में भी यथार्थ का टच भर रहा है। हीरोइन में यह टच पूर्वाग्रहों और धारणाओं को ही लेकर चलता है। यही कारण है कि माही का द्वंद्व हमें झकझोर नहीं पाता। उसे हमारी हमदर्दी नहीं मिल पाती। हीरोइन में करीना कपूर के अलावा दिव्या दत्ता ने अपने हिस्से के दृश्यों को संजीदगी से निभाया है। माही के सेक्रेटरी बने रशीद भाई की भूमिका में गोविंद नामदेव सटीक अभिनय किया है। अर्जुन रामपाल अपने किरदार की तरह ही बिखरे रहे। रणदीप हुडा छोटी भूमिकाओं में माहिर होते जा रहे हैं। यह फिल्मों के लिए अच्छा है,लेकिन उनके करिअर को आगे नहीं बढ़ाता। हीरोइन फिल्म इंडस्ट्री की अंदरुनी झलक नहीं देती। इंडस्ट्री के इस रूप और रंग-ढंग से फिल्मों के शौकीन दर्शक वाकिफ हैं। मधुर फिल्म पत्रकारों की हमेशा अजीब सी झलक देते हैं।
हीरोइन में सबसे ज्यादा निराश इसके सवादों और गीतों ने किया। टायटल सौंग सारगर्भित हो सकता था,जो हीरोइन की सही तस्वीर पेश करता। इसी प्रकार हलकट जवानी के बोल चालू होने के चक्कर में स्तरहीन हो गए हैं। एक-दो संवादों पर तालियां बज सकती हैं,लेकिन भावों के अनुरूप संवादों की कमी खलती है। ऐसा लगता है कि संवाद पहले अंगे्रजी में लिखे गए हों और फिर उनका हिंदी अनुवाद कर दिया गया हों। संवादों में हिंदी की रवानी नहीं है।
रेटिंग- ** 1/2 ढाई स्टार

Thursday, April 19, 2012

एक विरासत,दो बहनें

-अजय ब्रह्मात्‍मज
एक अंतराल के बाद करिश्मा कपूर बड़े पर्दे पर लौट रही हैं। विक्रम भट्ट की 3डी फिल्म डेंजरस इश्क से उनकी वापसी हो रही है। इस बीच उनकी शादी हुई। बच्चे हुए। पति संजय कपूर से अनबन और मनमुटाव की खबरें आती रहती हैं। उनका ज्यादातर समय मुंबई में गुजरता है। फिल्मों में दूसरी पारी शुरू करने के पहले वे एंडोर्समेंट और इवेंट में दिखने लगी थीं। सार्वजनिक मौजूदगी में प्रशंसकों, समर्थकों और मीडिया से मिल रही निरंतर तारीफों और जिज्ञासाओं ने ही उन्हें फिल्मों में लौटने के लिए प्रेरित किया। हिम्मत बंधाई।
पिछले दिनों डेंजरस इश्क के फ‌र्स्ट लुक इवेंट में उन्हें सुनते हुए पुराने दिन याद आ गए। श्याम बेनेगल की फिल्म जुबैदा की शूटिंग के समय जयपुर में मैंने कुछ समय सेट पर गुजारा था। करिश्मा से अनौपचारिक बातें हुई थीं और फिर फिल्मों की रिलीज के समय इंटरव्यू का सिलसिला चला था। तब अभिषेक बच्चन के साथ उनका प्रेम चल रहा था। बच्चन और कपूर परिवार फिर से करीब आ रहे थे।
रिफ्यूजी की लॉन्चिंग करिश्मा कपूर के लिए बड़ी घटना थी। एक तरफ यह उनके प्रेमी अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म थी तो दूसरी तरफ बहन करीना कपूर की भी। करिश्मा कपूर ने चाहा था कि हिंदी में करीना कपूर का पहला इंटरव्यू मैं करूं। पहले इंटरव्यू में करीना के अनगढ़ जवाबों में करिश्मा कपूर की सलाहों की झलक थी। छोटी बहन फिल्मों में प्रवेश कर रही थी और बड़ी बहन ने शादी करने का फैसला कर लिया था। और फिर अचानक किसी बात पर अभिषेक बच्चन और करिश्मा कपूर की सगाई टूट गई थी। निश्चित ही करिश्मा कपूर के लिए वे दुख और संताप भरे दिन थे। करिश्मा ने अज्ञातवास ले लिया। बाद में दिल्ली के संजय कपूर से शादी की।
फिल्मों का जबर्दस्त खिंचाव अभिनेता-अभिनेत्रियों को फिल्मों में लौटने के लिए उकसाता रहता है। करिश्मा के साथ भी यही बात हुई है। उन्होंने अपने करियर के प्राइम में फिल्मों से अवकाश ले लिया था। कायदे से अभी उनके करियर का द एंड नहीं हुआ था। उनके अभिनय में संजीदगी आई थी। वह चुनौतियां स्वीकार कर रही थीं। दर्शक और प्रशंसक सराहना कर रहे थे। तभी उनके करियर में अल्पविराम आ गया। निश्चित ही पर्सनल वजहों से वे नेपथ्य में चली गई और छोटी बहन ने मंच संभाल लिया।
दोनों बहनों के करियर और कपूर खानदान की विरासत पर रोचक किताब लिखी जा सकती है। सभी जानते हैं कि कपूर खानदान में लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थीं। यहां तक कि अभिनेत्री रह चुकी बहुओं को भी शादी के बाद फिल्मों का परित्याग करना पड़ा। इस परिप्रेक्ष्य में बबीता की जिद से करिश्मा कपूर का फिल्मों में आना किसी बड़ी घटना से कम नहीं था। चूंकि कपूर खानदान का सपोर्ट नहीं था, इसलिए भव्य और जबर्दस्त लॉन्चिंग नहीं हुई। दक्षिण के अभिनेता हरीश के साथ उनकी पहली फिल्म प्रेम कैदी आई। करियर के आरंभ में उन्होंने बी ग्रेड फिल्में भी कीं। गोविंदा के साथ कॉमेडी फिल्मों में उनकी जोड़ी खूब चली। अनुभव और अभ्यास से अभिनय में पारंगत होने के बाद करिश्मा कपूर ने अपनी जगह बनाई। उनके संघर्ष का मीठा फल करीना कपूर को मिला।
करीना कपूर के लिए उन्होंने जमीन तैयार कर दी थी। फिल्मों और निर्देशकों के चुनाव में करिश्मा के अनुभव और सलाह से मदद मिली। साथ ही फिल्म इंडस्ट्री में टिके और बने रहने की युक्ति भी करीना ने करिश्मा से सीखी। बड़ी बहन की तमाम दिक्कतों के साथ लांछन और अपमान भी सहने पड़े। छोटी बहन फिल्मों में प्रवेश करने की क्रूर प्रक्रिया से बच गई।
सही मुकाम हासिल करने के लिए निश्चित ही करीना कपूर को संघर्ष करना पड़ा और इसमें उनका टैलेंट काम आया, फिर भी करीना कपूर के करियर में करिश्मा के योगदान को नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
एक विरासत,दो बहनें