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Monday, September 5, 2016

लैंडमार्क धारावाहिक है ‘चाण्‍ाक्‍य’



-अजय ब्रह्मात्‍मज
दूरदर्शन से प्रसारित धारावाहिकों में चाण्‍क्‍य अपनी गुणवत्‍ता और वैचारिक आस्‍वादन के लिए आज भी याद किया जाता है। पच्‍चीस साल पहले 8 सितंबर,1991 को इसका प्रसारण आरंभ हुआ था। दूरदर्शन का यह धारावाहिक प्रसारण के समय विवादित और चर्चित भी रहा। 47 वें एपीसोड के प्रसारण के बाद इसे रोक दिया गया था। लेखक-निर्देशक अपनी कथा के अंत तक नहीं पहुंच पाए थे। वह अधूरापन आज भी महसूस किया जाता है। चर्चा चलती रहती है कि चाणक्‍य के जीवन पर फिल्‍म बननी चाहिए। चाणक्‍या के लेखक,निर्देशक और शीर्षक अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी थे। उन्‍होंने उसके बाद पिंजर,मोहल्‍ला अस्‍सी और जेड प्‍लस फिल्‍में निर्देशित कीं। इनमें मोहल्‍ला अस्‍सी अभी रिलीज नहीं हुई है। प्रसारण की पच्‍चीसवीं वर्षगांठ पर डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी साझा कर रहे हैं अपनी यादें झंकार के साथ....
नए मापदंड का धारावाहिक
चाण्‍क्‍य के प्रसारण के पच्‍चीस साल हो गए। यों मैंने 7 अप्रैल 1986 को चाणक्‍य पर काम करना शुरू किया था। मैंने दूरदर्शन को कांसेप्‍ट भेजा था,जिसे रिजेक्‍ट कर दिया गया था। फिर मैंने लंबी तैयारी की। 19 फरवरी 1989 को फिर से प्रस्‍ताव मांगा गया। इस बीच और भी निर्माता-निर्देशकों ने कोशिशें कीं। कई लोगों की कोशिशों से दूरदर्शन के अधिकारियों को लगा कि चाणक्‍य में कोई खास बात है। उसी साल अक्‍टूबर हमलोगों ने पायलट शूट किया। पायलट बनाने के समय ही लग गया था कि यह सबसे महंगा और नए मापदंड का धारावाहिक होगा। मैंने डेढ़ साल का समय मांगा। ऐसे भी दबाव आए कि किसी और निर्देशक को धारावाहिक दे दिया जाए। दूरदर्शन के किसी अधिकारी की सुबुद्धि से चाणक्‍य मेरे पास ही रहा।
रिसर्च पर हुई बहस
प्रसारण के बाद यह आम राय बनी कि यह बहुत शोधपूर्ण है। इसे इतिहासकारों ने भी माना। विरोधियों ने इसे छद्म इतिहास कहा। आलोचकों ने कहा कि साक्ष्‍यों के आधार पर मैंने छद्म इतिहास रचा। चाण्‍क्‍य अकेला धारावाहिक है,जिस पर एकेडेमिक बहस हुई। तमाम बहसें हुईं। उसकी वजह से मैं चर्चा के केंद्र में रहा। सवाल उठा कि क्‍या एक धारावाहिक के लिए इतने शोध की जरूरत है ? तब मैं हां कहता था। सभी मानते हैं गंभीरता का यह धरातल किसी और धारावाहिक में नहीं मिलता। अब लगता है कि इतने शोध की जरूरत नहीं होगी। अब अगर किसी धारावाहिक में शोध,अध्‍ययन और गंभीरता है तो दर्शक उसे खारिज कर देंगे। टीवी महज मनोरंजन का माध्‍यम बन कर रह गया है। अभी इतने सारे ऐतिहासिक धारावाहिक आ रहे हें। दर्शक देख रहे हैं,लेकिन कोई बात नहीं कर रहा है। उस पैमाने का मुझे कोई और धारावाहिक नहीं दिखा।
चाण्‍क्‍य ने दीं नई प्रतिभाएं
मुझे सगसे बड़ा सपोर्ट नीतीश रॉय से मिला। आर्ट डायरेक्‍शन में उनका सानील नहीं था। उन्‍होंने डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया और तमस के बाद चाणक्‍य का काम किया। नितिन देसाई उनके सहायक थे। बाद में स्‍वतंत्र आर्ट डायरेक्‍टर बने और अभी एनडी स्‍टूडियो तब पहुंचे। शाम कौशल ने एक्‍शन किया था। चाण्‍क्‍य उनका पहला काम था। आज वे देश के श्रेष्‍ठ एक्‍शन डायरेक्‍टर हैं। राजीव खंडेलवाल हमारे एडीटर थे। अभी वे सिनेमा का म्‍यूजियम बनाने जा रहे हैं। अभिनेताओं में संजय मिश्रा,इरफान और दूसरे कई अभिनेताओं की शुरूआत चाणक्‍य से हुई। चाणक्‍य से कई प्रतिभाएं निकलीं।
सच हुई भविष्‍यवाणी
मुझे याद है कि भोपाल के एक सेमिनार में राजनेता श्‍यामाचरण शुक्‍ल ने कहा था कि चाणक्‍य का मूल्‍यांकन पच्‍चीस सालों के बाद होगा। यह सही है कि चाणक्‍य ने प्रसारण के बाद भी भारतीय मनीषा को आलोडि़त किया। चाणक्‍य पर किताबें लिखी गईं। वे पब्लिक डिस्‍कोर्स में आए। रेल्‍वे बुक स्‍टॉल पर चाणक्‍य नीति जैसी किताबों की बाढ़ आ गई। मुझे अहसास है कि यह धारावाहिक गंभीर दर्शकों और अध्‍येताओं के बीच पल्‍लवित होता रहा है। अनेक देशों और भाषाओं में इसका प्रसारण हो चुका है। चाणक्‍य पर शोध हुए। कई शोधार्थियों ने पीएचडी की। कहीं भी राष्‍ट्र और राष्‍ट्रवाद की बात होती है तो चाणक्‍य याद किया जाता है। पच्‍चीस वर्षों तक चाणक्‍य का प्रासंगिक बने रहना ही इसके महत्‍व को दर्शाता है।
मेरे लिए सुखद आश्‍चर्य है कि चाणक्‍य को लैंडमार्क और गेमचेंजर धारावाहिक माना जाता है। मैं इसका श्रेय श्‍याम बेनेगल,गोविंद निहलानी और नीतीश रॉय को दूंगा। पहले दो से मैं प्रेरित हुआ और तीसरे ने मुझे दिशा दी। ऐतिहासिक तथ्‍यों और साक्ष्‍यों को विजुअल में बदल देना बड़ी चुनौती थी।

Wednesday, August 24, 2016

समकालीन सिनेमा(5) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी




इन दिनों मैं कोई विदेशी सिनेमा देखता हूं या सीरियल देखता हूं तो कतई नहीं लगता है कि मैं कोई विदेशी सिनेमा देख रहा हूं, क्योंकि अब वह मेरे परिवेश का हिस्सा हो गया है। अब एडर्वटाइजमेंट देखता हूं तो उसमें विदेशी मॉडल है, टेलीविजन  देखता हूं तो उसमें विदेशी मॉडल है। अब मैं अखबार खोलता हूं तो वहां पर विदेशी ¸ ¸ ¸ अब मैं जहां से दिन शुरू करता हूं,सभी विदेशी दिखते हैं। देशी-विदेशी का अंतर भी मिटता जा रहा है। बाजार उनके हाथ में जा रहा है। इस दौर में अगर हम भारत के सिनेमा की पहचान बना कर रख सकें तो अच्छा होगा। चाहने वाली बात है। यह मुमकिन है। ऐसा होगा कि नहीं होगा ऐसा कहना आज मुश्किल है। 
मुझे लगता है कि पिंजर बनाते समय मैं बाजार को इतना समझ नहीं रहा था। इसलिए वह भावना से प्रेरित फिल्‍म थी। उस समय मल्टीप्लेक्स की शुरूआत हुई थी। आज मल्टीप्लेक्स का चरम है। सितारे बहुत बड़े नहीं थे, कास्ट नहीं थी। अब कहीं न कहीं आपको सितार और कॉस्ट के तालमेल को बैठाना होगा। मेरे साथ समस्‍या रही है कि मेरा कैनवास बड़ा रहा है,कैरेक्टर और एक्‍टर से परे। उस कैनवास को छोटा करना बड़ा मुश्किल होता है। मोहल्‍ला अस्‍सी में मुझे अच्छा लगा कि इसका कैनवास बहुत बड़ा है,लेकिन लागत कम है। 
यह आपको अजीब बात लग सकती है कि ऐसा किस तरह हो सकता है? बनारस का कैनवास बहुत बड़ा है। मेरी जो क्रिएटिविटी एक्सप्रेशन रहती हैं, मेरी जो आकांक्षा होती है कि मेरे पास विशाल पृष्ठभूमि हो,जिसके सामने मैं अपने चरित्रों को प्रस्‍तुत कर सकूं। मेरे पास गंगा है। गंगा के घाट है। मेरे पास वे दृश्य हैं,जो भारतीयों के लिए लगभग अंजान हैं। जो बनारस नहीं गया है,वह इय विशालता को नहीं समझ सकता। जब तक मैं बनारस नहीं गया था,तब तक मैं गंगा की विशालता को, उसके घाटों की विशालता को, जिसको बाहरी अलंग कहते हैं उसकी विशालता या विविधता का मुंबई में अनुमान भी नहीं लगा सकता था। वहां अतीत और वर्तमान साथ में है। पुरातन और नवीन साथ में है। संस्कृति और बदलता हुआ भारत दोनों आप देख सकते हैं। कभी पांच हजार साल पहले का भारत दिख जाएगा। कभी 2010 का भी भारत आपको दिख जाएगा। 
मुझे बहुत अच्छा लगता है कि मैं ऐसे  भारत में काम कर सकूं। ये मेरा क्रिएटिव एक्सप्रेशन है। आकर्षण है। पूरा का पूरा बैकड्रॉप मुझे बनारस दे रहा है। और उसके अपनी चुनौतियां भी हैं। चुनौतियां ऐसी हैं कि बनारस तीर्थ स्थल और पर्यटन स्थल है,इसलिए बहुत भीड़ रहती है। अगर वहां कुछ सितारे मैं ले जाता हूं तो उन्‍हें देखने की आकांक्षा में सैकड़ों लोग वहां पर जमा हो जाते हैं। पूरे भारत में दर्शकों का दबाव आप पर बना रहता है। एक ओर कुछ लाभ है तो कुछ नुकसान भी है। मैं अपनी फिल्‍मों में कैनवास ढूंढता हूं। पिंजर में बड़ा कैनवास था। मोहल्‍ला अस्सी में भी बड़ा कैनवास है। कैनवास मेरी जरूरत है। मैं विजुअल चरित्र ढूंढ़ रहा होता हूं। मैं कथा ढूंढ़ रहा होता हूं और वह कथा जिसका सीधा संबंध भारत से हो। पिंजर का सीधा संबंध भारत से है। उसके चरित्र असाधारण थे। मोहल्‍ला अस्सी में भी असाधारण कथा है, लेकिन उसमें आज का भारत है। दस वर्ष बाद, बीस वर्ष वाद, तीस वर्ष बाद ¸ ¸ ¸ जैसे आज पिंजर में, एक काल खंड का इतिहास दिखता है,जबकि इतिहास रचने की कोशिश नहीं हुई। फिर भी फिल्म में तत्‍कालीन समाज है। उसी तरह जब मोहल्‍ला अस्सी कोई देखेगा तो उसे 1986 से 2000 तक का बनारस की, मनीषा और कथा समझ में आ जाएगी। अत्‍यंत रोचक कहानी जो काशीनाथ सिंह ने लिखी थी। पिंजर  में यह सब नहीं था। पिंजर मूलत: एक गंभीर विषय था। यह विषय भी गंभीर है,लेकिन जिस तरह से काशीनाथ सिंह जी ने कहा है,वह मुझे बहुत ही रोचक लगा। मेरे लिए भी वह एक नया जॉनर है। जिसको मैं सटायर कहूंगा। यह कॉमेडी के पास है और कॉमेडी से दूर भी है और सार्थक है। सबसे बड़ी बात सार्थक है। विषय बहुत मौजूं है। इतनी सारी बात एक फिल्म में आ जाए तो इसको मैं अपना भाग्य मानता हूं और काशीनाथ जी ने कॉपी राइट दिया भी। इसको हमलोगों ने डेढ़-दो सालों में लिखा।
एक चीज मैंने सीखा कि कैनवास ढूंढ़ते समय ये ध्यान रखा जाए कि जो आप रिस्क लेने जा रहे हैं उसमें बहुत बड़े कलाकार न भी मिल पाएं, मध्य श्रेणी के कलाकार भी आएं तो कैनवास और उन दोनों की लागत में तालमेल बैठ जाए। दूसरा जो दृश्य न जरूरी हो, वह बिल्कुल न लिखा जाए। एक दिन भी एक्स्ट्रा शूटिंग न हो। फिल्म की लेंग्‍थ जितनी छोटी होगी, संभावना रहेगी कि आपको उतने ज्‍यादा दर्शक मिलें। पिंजर की सबसे बड़ी कमजोरी मुझे उस समय भी समझ आ गई थी कि उसकी लेंग्‍थ है। कई वर्षो के बाद मुझे समझ में आया कि मुझे कहां से काटना चाहिए। इसलिए मैंने मोहल्‍ला अस्सी को मैंने बहुत छोटा रखा। दूसरे मुझे यह भी ध्यान में रखना था कि हर दशक में दर्शकों की अभिरुचि बदलती रहती है। आपको अपडेट रहना पड़ेगा।

Sunday, August 21, 2016

समकालीन सिनेमा(4) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी



डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी
कमर्शियल सिनेमा रहा है। शुरू से रहा है। दादा साहेब फालके की पहली फिल्म राजा हरिश्चन्द्र अपने समय की व्यावसायिक फिल्म थी। आज हम उसे कला से जोड़ देते हैं। कलात्मकता से जोड़ देते हैं। मैं निश्चित तौर से कह सकता हूं कि आज कोई राजा हरिश्चन्द्र बनाना चाहे तो उसे समर्थन और निवेश नहीं मिलेगा।  अभी तो अतीत के प्रति सम्मान है और न उस प्रकार के विषय के लिए सम्मान है। उल्टा वह टैबू है। उसे दकियानूसी कहा जाएगा। कहा जाएगा कि यह क्या विषय हुआ? बात बिल्कुल तय है कि कमर्शियलाइजेशन बढ़ता जा रहा है और कमर्शियलाइजेशन में सबसे पहली चिंतन और कला की हत्‍या होती है। मैं फिर से कह सकता हूं कि सब कुछ होगा,आकर्षण के सारे सेक्टर मौजूद होंगे, लेकिन उसमें हिंदुस्तान की आत्मा नहीं होगी। मैं कतई गलत नहीं मानता कि आप विदेशों में जाकर क्‍यों शूट कर रहे हैं सिनेमा। पर देखिए कि धीरे-धीरे फिल्‍में न केवल अभारतीय हो रही हैं बल्कि वे धीरे-धीरे भारत की जमीन से हट कर भी शूट हो रही है। यह गलत है, मैं ऐसा नहीं मानता। मैं जिस वजह से बाहर जाते रहता हूं और शूट करते रहता हूं उसके ठोस कारण हैं। 
मोहल्‍ला अस्‍सी को काशी में शूट करने की इच्छा थी। उसका कारण यह था कि जिस बनारस को मैं आज देख रहा हूं, जिस अस्सी को आज देख रहा हूं,मैं यकीनन कह सकता हूं कि दस साल बाद मैं उस बनारस और अस्‍सी को नहीं देखूंगा। जिस तेजी से परिवर्तन हो रहा है, उसमें हमारी जितनी सांस्कृतिक धरोहर है, सांस्कृतिक अवधारणाएं हैं, सभी चीजें तेजी से बदलेगी। जिन-जिन वस्तुओं पर गौरव होता था,वह चाहे हमारी भाषा हो, चाहे वह संस्कृति हो, चाहे वह स्थान हो, चाहे वह इतिहास हो,वह सब जिस रफ्तार के साथ ऑडियो विजुअल में बदलेगा कि मूल के लिए कोई जगह नहीं होगी। अस्सी घाट जो आज आप देख रहे हैं या दशाश्‍वमेध जो आज देखते हैं, राजा घाट जो आज देखते हैं...वह सब...मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि सब के सब किसी मोबाइल फोन के, किसी फूड कॉर्नर,रेस्‍तरां और पित्‍जा के अड्डे होंगे। वे आज हमारे लिए सांस्कृतिक क्षेत्र हैं,कल वे हमारे लिए किसी मॉल में परिवर्तित हो जाएंगे। इसीलिए जैसे ही मुझे मौका मिला मैंने कहा कि मैं अस्‍सी पर शूटिंग करंगा।  
मोहल्‍ला अस्‍सी की शूटिंग से तीन वर्ष पहले मैं बनारस गया था तो बनारस में किसी नाव पर किसी मोबाइल फोन का नाम नहीं था। अब मैं काशी के फोटोग्राफी करने गया था तो मैं देखा कि अब सारे नौकाओं पर मोबाइल फोन के साइनेज पेंट किए जा चुके हैं। अब आपको गंगा नदी में नौकाएं नहीं दिखती हैं। अब आपको गंगा नदी में चलते-फिरते एडवर्टाइजमेंट दिखाई देते हैं। जहां पर पुरुष-स्त्रियां कपड़े बदलते हैं, जहां पर सिर्फ चारदीवारी हुआ करती थी,अब वहां पर किसी टेलीफोन, मोबाइल कंपनी का एडवर्टाइजमेंट लगा है। जहां भी आंखें जा सकती हैं, जहां भी हम देख सकते हैं, वे जितने सुंदर स्‍थान हों, तीर्थ स्थल हों, सांस्कृतिक स्थल हो... वे सब थोड़े दिनों में किसी एक कॉमोडिटी के,किसी एक वस्तु के प्रचार के केंद्र हो जाएंगे। क्या हम इसको रोक पाएंगे? उत्तर है नहीं। पर जिसके पहले ये बदलाव इन सारी चीजों को निगल जाएं मैं एक फिल्मकार के नाते उन्‍हें सुरक्षित रख सकता हूं,इसलिए मैं उन्‍हें सेल्यूलायड में रख लेना चाहता हूं। मैं भी सोचने लग गया हूं कि इंग्लैंड में शूटिंग करना ज्‍यादा आसान है। यदि मुझे मौका मिलता है तो जाऊंगा। वहां बेहतर सुविधाएं हैं, वहां जिंदगी की रेलमपेल नहीं है। जिस तरह से हमारा संसार सिमट गया है, उसमें अब दर्शक को कोई अंतर नहीं पड़ता है कि ये भारत का सिनेमा है कि नहीं है? क्योंकि वह लगातार इंटरनेशनल सिनेमा देख रहा है। एक ही चैनल पर एक साथ भारतीय और  विदेशी सिनेमा देख रहा है। धीरे-धीरे सीमाएं मिट रही हैं।

Tuesday, August 16, 2016

समकालीन सिनेमा(2) : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

-डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी


अभी जो लोग यह निर्णय कर रहे हैं कि फिल्म कौन सी बननी चाहिए, वे सौभाग्य या दुर्भाग्य जो भी कह लें,डीवीडी फिल्में देख कर ही निर्णय करते हैं। अभी तक हमारी फिल्में किसी और देश के सिनेमा पर आधारित हैं। कॉरपोरेट की बाढ़ आने से अधिकतर निर्देशकों को शुरू में यह विश्वास था कि नए सिरे कहानियों का मूल्यांकन शुरू होगा, जो बाद भ्रम साबित हुआ। उम्‍मीद थी कि नए सिरे से कथाओं का मूल्यांकन होगा और नए प्रयोगधर्मी  फिल्में बनेगी। आशा के विपरीत परिणाम दूसरा है। मैं कह सकता हूं कि इस प्रकार के निर्णय जो लोग लेते हैं, वे लोग बाबू किस्म के लोग होते हैं। उन्‍हें साल के अंत में एक निश्चित लाभ दिखाना होता है। इसलिए वे भी यही मानते और तर्क देते हैं कि बड़ा कलाकार, बड़ा निर्देशक और सफलता। वे उसके आगे-पीछे नहीं देख पा रहे हैं  ¸ ¸ ¸ 

 सबसे बड़ी बात हमारे पास लंबे समय से ऐसा कोई निकष नहीं रहा,जिसके आधार पर कह सकते हैं कि कॉरपोरेट के अधिकारी वास्तव में कथा के मूल्यांकन के योग्य भी है। हमारे यहां योग्यता का सीधा पर्याय सफलता है। जो सफल है,वही योग्य है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जो समर्थ है,वही योग्य है। यह दोषारोपण की बात नहीं है, यह विडंबना ही है कि इस देश में भाषा के स्तर पर, कला के स्तर पर, साहित्य के स्तर पर इतनी विविधता है,फिर भी इस देश में पिछले कुछ वर्षों में पुरस्कार के स्तर पर देख लें या तथाकथित ऑस्कर के लिए भेजी फिल्‍मों को देख लें, उनमें हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधित्व नहीं होता है। राष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा पुरस्‍कृत हो रहा है,वह हिंदी का सिनेमा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जो सिनेमा बाहर जा रहा है,वह भी हिंदी का सिनेमा नहीं है। कुल मिलाकर इस समय परिदृश्य ऐसा है कि हमारे यहां कथाओं में विविधता है ही नहीं। मैं तो कहूंगा कथाएं ही नहीं हैं हमारे पास। हम बिना कथा के कई कथाओं को जोड़ कर फिल्‍में बना रहे हैं। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा,भानुमति ने कुनबा जोड़ा के तर्ज पर मनोरंजक फिल्में बन रही हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह मनोरंजक फिल्म बनाए। कुछ लोग बना पाते हैं, कुछ नहीं बना पाते हैं। 

हमारे फिल्में साधारण और साधारण के नीचे की हैं। और मैं नहीं मानता कि यह दृश्य नहीं बदलेगा। फिलहाल मुझे नहीं दिखता कि भविष्य तुरंत बदलाव होने वाला है। आने वाले दिनों के सिनेमा का भी मापदंड यही रहने वाला है कि सफल निर्देशक और सफल कलाकार मिल जाएं तो सफलता संभावना और गारंटी हो जाती है।
  

Monday, August 15, 2016

समकालीन सिनेमा - डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी



समकालीन सिनेमा पर इस सीरिज की शुरूआत डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के लेख से हो रही है। अगली सात-आठ कडि़यों में यह लेख समाप्‍त होगा। इस सीरिज में अन्‍य निर्देशकों को भी पकड़ने की कोशिश रहेगी। अगर आप किसी निर्देशक से कुछ लिखवा या बात कर सकें तो स्‍वागत है। विषय है समकालीन सिनेमा.... 

डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी

       
हिंदी सिनेमा कहते ही मुझे हिंदी साहित्‍य और संस्‍कृति की ध्‍वनि नहीं सुनाई पड़ती। जैसे कन्नड़ का एक अपना सिनेमा है, बंगाल का अपना एक सिनेमा है, तमिल का अपना एक सिनेमा है। उन भाषाओं के सिनेमा में वहां का साहित्‍य और संस्‍कृति है। कन्नड़ में गिरीश कासरवल्ली लगभग पच्चीस फिल्में बनाईं। वे कम दाम की रहीं, कम बजट की रहीं। उनकी सारी फिल्में किसी न किसी कथा, लघुकथा या उपन्यास पर आधारित हैं। उन्होंने पूरी की पूरी प्रेरणा साहित्य से ली। दक्षिण के ऐसे कई निर्देशक रहे जो लगातार समांतर सिनेमा और वैकल्पिक सिनेमा को लेकर काम करते रहे। हमारे यहां लंबे समय तक श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी उस सिनेमा के प्रतिनिधि रहे। उसके बाद मैं जिनको देख सकता हूं जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक दोनों का अच्छा संयोग करने की कोशिश की वे हैं प्रकाश झा। 
अब अगर आप देखें तो हिंदी फिल्मों में सार्थक सिनेमा के लिए कम जगह बची है। उसके अपने व्यावसायिक कारण भी हैं। सच्चाई यह है कि हिंदी सिनेमा ने यह घोषणा कर दी है कि उसका साहित्य से या सार्थकता से उसका कोई संबंध नहीं है। जब तक सिनेमा सिर्फ मनोरंजन करता है, वह सार्थक नहीं है। उसमें कथा, नहीं है। उसमें चुटकुलेबाजी है, लतीफेबाजी है। यह सिनेमा नहीं है। अफसोस है कि दर्शक ने उसे स्वीकार कर लिया है। फिल्‍मकारों ने उसे स्वीकार कर लिया है। पहले ऐसा माना जाता था कि सिनेमा कला और व्यवसाय दोनों का योग है। अब सिनेमा कला है, इस पर अपने-आप प्रश्न चिह्न लग गया है। अगर यह कला है तो कला का उद्देश्य क्या हैं? कला का मापदंड क्या है? फिर आप पाएंगे कि कला वाली कोई बात रह नहीं गई है। कुल मिला कर बहुत ही संक्षेप में मैं यही कह सकता हूं कि हिंदी का सिनेमा धीरे-धीरे व्यवसायिक‍ लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। उसे व्‍यावसायिकता के गर्त में जाते देखा जा सकता है। इसीलिए हिंदी सिनेमा का मेनस्ट्रीम सिनेमा विषयों की ओर नहीं है। विषयों की ओर से मेरा कहने का मतलब है कि कथा और प्रयोग के स्तर पर कोई विविधता नहीं है। न ही हिंदी सिनेमा हमारे समाज का प्रतिनिधित्व करता है। न ही हिंदी सिनेमा भारत के अतीत का और न वर्तमान का प्रतिनिधित्व करता है। न ही हिंदी सिनेमा भारतीय समाज के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। 
कभी-कभार कुछ छिट-पुट कुछ घटनाएं हो जाती हैं जो बहुत योजनाबद्ध तरीके से नहीं हो रही है। कभी कोई अनुराग कश्यप कोई ऐसी फिल्म बना लेते हैं, जो प्रासंगिक हो जाती है। कभी कोई प्रकाश झा कोई ऐसी फिल्म बना लेते हैं, जो प्रासंगिक हो जाती है। कभी कोई श्याम बेनेगल ऐसी फिल्म बना लेते हैं,जो प्रासंगिक हो जाती है। परंतु उनके भी प्रयत्न संघर्ष ही हैं। इसलिए मैं इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि हिंदी सिनेमा एक ऐसे बिंदु पर आ गया है,जहां विषयों की तलाश हो। विविधता के साथ भारतीय पहचान की फिल्‍में नहीं बन रही हैं। हिंदी सिनेमा मूलत: कुछ चेहरों की बदौलत बन रहा है। सफलतम कलाकार,जो स्‍टार हैं, ऐसे निर्देशक जो सफल हैं। उनके साथ में आने से बाजार के निवेशकों में विश्वास उत्पन्न होता है कि उनका संयुक्‍त करिश्मा किसी जादू की तरह दर्शकों को अपनी ओर खींचेगा। इसीलिए उनका लक्ष्‍य और उद्देश्य उस जादू चलने तक ही सीमित रहता है। 
हमारे यहां का निवेशक मान ही नहीं रहा है कि कहानी का अपना कोई जादू होता है। इसीलिए तमाम फिल्में, मैं कह सकता हूं कि 99 प्रतिशत फिल्में किसी एक सेलीब्रेटी पर टिकी या ड्रिवेन हैं। किसी एक नायक या महानायक के दम पर चल रही हैं। यह गलत हो रहा है, मैं ऐसा भी नहीं कहूंगा। निश्चित ही जो निवेशक है,उसे उसकी राशि मिलना चाहिए। उसका निवेश वापस आना चाहिए। अन्‍यथा वह दूसरी फिल्म भी नहीं बना पाएगा। मैं पहले भी कह चूका हूं क्रिएटिव माध्यमों में यह ऑडियो विजुअल सबसे महंगा माध्यम है और सबसे व्यापक माध्यम है। इसमें अभिरुचियां भी बहुत अलग-अलग है। जिस प्रकार का प्रयोग हम पश्चिम के सिनेमा में या ईरान के सिनेमा में या साउथ-ईस्ट के सिनेमा में हम देख लेते हैं उनसे हम कोसों दूर हैं।

Thursday, June 18, 2015

मोहल्‍ला अस्‍सी के निर्देशक ने कथित ट्रेलर को बताया फर्जी

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ‘मोहल्ला अस्सी’ के अनधिकृत वीडियो फुटेज पर चल रही टिप्पणियों और छींटाकशी के बीच अपनी फिल्म की असामयिक और असंगत चर्चा से फिल्म के निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी व्यथित हैं। उन्हें लगातार हेट मेल, एसएमएस और सवाल मिल रहे हैं, जिनमें सभी की जिज्ञासा है कि असली माजरा क्या है? ज्यादातर लोग इसे अधिकृत ट्रेलर समझ कर उत्तेहजित हो रहे हैं। डॉ. द्विवेदी ने इस फिल्म की शूटिंग 2011 में पूरी कर ली थी। पोस्ट प्रोडक्शेन और डबिंग की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। वीडियो फुटेज को लेकर चल रहे शोरगुल के बीच अजय ब्रह्मात्मज ने फिल्म के निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की प्रतिक्रिया ली। 
 सोशल मीडिया पर चल रहे ‘मोहल्ला अस्सी’ के वीडियो फुटेज से उत्तेजना फैली हुई है। आप को इसकी जानकारी कब मिली और आप क्या कहना चाहेंगे? 
सबसे पहले तो यह ‘मोहल्ला अस्सी’ का ट्रेलर नहीं है। यह उस फिल्म का अनधिकृत फुटेज है, जिसे किसी शातिर और विकृत व्यक्ति ने कहीं से प्राप्त किया है। उसने उत्तेजना और विरोध का वातावरण बनाने के लिए इसे अपलोड कर दिया है। मैं जानना चाहूंगा कि यह कहां से और कब अपलोड हुआ है और इसके पीछे कौन लोग हैं? मैं रात में दस बजे काम कर रहा था, तभी किसी का फोन आया कि ऐसा एक वीडियो नागपुर से लोड हुआ है। मैंने अगले दिन एफडब्लूआईसीई में शिकायत की। ‘मोहल्ला अस्सी’ का पूरा मामला उनके पास है। मैंने उनसे आग्रह किया कि इस गलत वीडियो को तुरंत रोका जाना चाहिए।
 ऐसी खबर है कि पहली बार रोक लगने के बाद यह फिर से अपलोड हुआ है? 
 दूसरी बार अपलोड होने से स्पष्ट है कि इसके पीछे कुछ लोग व्यवस्थित रूप से लगे हुए हैं। उन लोगों को सामने लाने की जरूरत है। 
 फुटेज से ऐसा लगता है कि फिल्म में केवल गालियां ही हैं। क्या फिल्म के बारे में कुछ बताएंगे? 
 इस अनधिकृत वीडियो फुटेज में कहीं भी फिल्म की कथा नहीं आती। क्यों ऐसा हुआ? ‘मोहल्ला अस्सी’ काशीनाथ सिंह के प्रसिद्ध उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ के ‘पांडे कौन कुमति तोहे लागी’ चैप्टर पर आधारित है। हिंदी जगत में इस उपन्यात की चर्चा रही है। इस पर नाटक भी हो चुका है। फिल्म की कहानी वेदांत और संस्कृत के शिक्षक धर्मनाथ पांडे की कहानी है। यह बनारस और देश के बदलते परिवेश की कहानी है। संस्कृत और संस्कृति की चुनौतियों की कहानी है। इन चुनौतियों के बीच पांडे का आत्मसंघर्ष है। इस कहानी की पृष्ठभूमि में राम जन्मभूमि का आंदोलन है। फुटेज में इसकी कोई झलक नहीं है। यह सांस्कृतिक प्रदूषण और गंगा को लेकर सचेत पांडे के प्रयत्नों और संकट की कहानी है। उनके साथ घाट के दूसरे चरित्र भी आते हैं, जिनमें टूरिस्ट गाइड, नाई और बहुरुपिया भी हैं। धर्म और संस्कृति पर चलने के कारण पिछड़ रहे और ठगी से सफल हो रहे लोगों की भी कहानी है यह। मैंने फिल्म बनाई ही इसलिए थी कि वेदांत और संस्कृत दोनों का नाश हो रहा है। काशी तो इसमें रूपक है। 
वीडियो फुटेज को उतारने की कोशिश आप के या निर्माता की तरफ से नहीं हुई? 
मैंने इसकी शिकायत अपने संगठन में की थी। यह संगठन ‘मोहल्ला अस्सी’ का पूरा मसला देख रहा है। 2012 के बाद मैं इस फिल्म को पूरा करने के लिए निरंतर जूझ रहा हूं। निर्माता की तरफ से निष्क्रियता रही है। मुझे संबंधित व्यक्तियों की ओर से आवश्यक गंभीरता और सक्रियता नहीं दिख रही है। मैं जानना चाहता हूं कि यह फुटेज कहां से लीक हुई है?
 फिल्म की रिलीज की क्या संभावनाएं हैं? 
 फिल्म अभी पूरी ही नहीं हुई है। फिल्म मे सनी देओल की आधी डबिंग बाकी है। फिल्म रिलीज तो तब होगी, जब पूरी होगी। 
 विवाद क्या है? उत्तेजना क्यों है फिर?  
फुटेज में सुनाई पड़ रही गालियां और शिव के एक रूप से उत्तेजना है। फिल्म शिव जी के एक रूप की अभिव्यिक्ति है। मैं स्पेष्ट कर दूं कि वे महादेव नहीं हैं। फिल्म में एक बहुरूपिया शिव का वेष धारण कर पर्यटकों का मनोरंजन कर अपनी रोजी-रोटी चलाता है। धर्मनाथ पांडे उसका विरोध भी करते हैं। वे समझाते भी हैं कि कोई और रूप बना लो। शिव का रूप धारण करना छोड़ दो। फुटेज देख रहे लोगों की नाराजगी सही है। वे शिव को देख रहे हैं। सच यह है कि वह बहुरूपिया है। 
 इस वीडियो फुटेज से आप की छवि भी धूमिल हुई है? 
  मुझे अपनी छवि की ज्यादा चिंता नहीं है। जिस व्यक्ति ने भी यह किया है, मैं उसकी घोर निंदा करता हूं। मैं यही कहूंगा कि आप धैर्य रखें। इस प्रकार के दुष्प्रचार के प्रभाव में नहीं आएं। मैंने कभी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश नहीं की है। इस फिल्म से जुड़े काशीनाथ सिंह और सनी देओल भी सस्ती लोकप्रियता में यकीन नहीं रखते। ‘मोहल्ला अस्सी’ वास्तव में देश से शिव और शिवत्व को विस्थापित करने के प्रयास पर प्रहार करती है। वह बनारस और देश कैसा होगा, जब शिव और शिवत्व नहीं होंगे? यह फिल्म संस्कृत और संस्कृति बचाए रखने के ऊपर है।

यह पहली बार जागरण्‍ा में प्रकाशित हुआ।

Wednesday, November 5, 2014

'जेड प्लस' के लेखक रामकुमार सिंह से एक बातचीत

रामकुमार सिंह का यह इंटरव्यू चवन्‍नी के पाठकों के लिए जानकी पुल से लिया गया है।
21 नवम्बर की 'चाणक्य' और 'पिंजर' फेम निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'जेड प्लस' रिलीज हो रही है. यह फिल्म हिंदी लेखक रामकुमार सिंह की मूल कहानी पर आधारित है. यह हमारे लिए ख़ुशी की बात है कि एक लेखक ने फिल्म लेखन में दिलचस्पी दिखाई और एक कायदे का निर्देशक मिला जिसने उसकी कहानी की संवेदनाओं को समझा. हम अपने इस प्यारे लेखक की कामयाबी को सेलेब्रेट कर रहे हैं, एक ऐसा लेखक जो फिल्म लिखने को रोजी रोटी की मजबूरी नहीं मानता है न ही फ़िल्मी लेखन को अपने पतन से जोड़ता है, बल्कि वह अपने फ़िल्मी लेखन को सेलेब्रेट कर रहा है. आइये हम भी इस लेखक की कामयाबी को सेलेब्रेट करते हैं. लेखक रामकुमार सिंह से जानकी पुल की एक बातचीत- मॉडरेटर.
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आपकी नजर में जेड प्‍लस की कहानी क्‍या है?
यह एक आम आदमी और प्रधानमंत्री के मिलने की कहानी है। सबसे मामूली आदमी के देश के सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण आदमी से मिलने की कहानी। असल में प्रधानमंत्री से हमारी व्‍यवस्‍था में आम आदमी कहां मिल सकता है। हर वीआइपी मूवमेंट के समय उसको जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी में रहने वाले प्रधानमंत्री के काफिले से दूर ही रोक दिया जाता है। जिस आदमी के वोट से प्रधानमंत्री यह रूतबा और ताकत हासिल करता है, उसी आम आदमी को यह मान लिया जाता है कि वह उसकी हत्‍या कर सकता है। मुझे इस निरीह आम आदमी से सहानुभूति है। लिहाजा मुझे लगा कि इसकी मुलाकात प्रधानमंत्री से होनी चाहिए। वह कौन होगा, तब मुझे खयाल आया कि यह एक पंचर वाला होना चाहिए। असलम पंचरवाला। लिहाजा कहानी में वह प्रधानमंत्री से मिलता है और प्रधानमंत्री से जो कहता है, उसके एवज में उसे जेड सुरक्षा मिल जाती है। आप सोचिए, वह अब भी स्‍कूटर पर चलता है। पंचर बनाता है। अपने शहर फतेहपुर में घूमता है लेकिन उसे जेड सिक्‍योरिटी मिली हुई है। आप हंसते हुए लोट पोट हो जाएंगे और जब तक फिल्‍म पूरी होगी तो आपको पता चलेगा कि यार, यह असलम पंचर वाला तो मैं ही था, और इतनी देर से मैं खुद पर ही हंस रहा था।
यह कहानी दिमाग में कैसे आई?
यह एक कॉमेडी फिल्‍म है या उससे भी आगे व्‍यंग्‍य फिल्‍म है। यह दर्शक के लिए है। मेरे लिए यह गुस्‍से की कहानी है। मुझे रोक दिया जाता है, किसी भी चौराहे पर कि आप तब तक इस सर्दी, गर्मी, बारिश में रुके रहिए जब तक कि वह आदमी गुजर नहीं जाता है जिसको सिक्‍योरिटी मिली हुई है। यह मेरे मूल अधिकार का हनन है। आप मुझे मेरे ही देश में, मेरी ही जमीन पर सिर्फ इसलिए रोक रहे हैं कि  वीआइपी गुजरेगा? क्‍यों भाई? यह कैसी डेमोक्रेसी है? कौन मारेगा इन लोगों को और क्‍या सिक्‍योरिटी के बीच भी हमारे एक प्रधानमंत्री को नहीं मार दिया गया? एक मुख्‍यमंत्री की हत्‍या हो गई। तो यह जेड प्‍लस एक छलावा है। जिसने आपको मारना तय कर‍ लिया है तो आपको कैसे छोड़ेगालिहाजा मैं उसे चौराहे पर खड़े आदमी की तरफ था। मेरे भीतर गुस्‍सा था और इसी गुस्‍से से यह व्‍यंग्‍य निकला। मैं शुक्रगुजार हूं, डॉ द्विवेदी का कि उन्‍होंने इस बात को समझा। हास्‍य के पीछे छिपे मेरे मंतव्‍य को समझा और कहा कि मैं यह फिल्‍म बनाउंगा।
कहानी डॉ चंद्रप्रकाश द्विेवेदी तक कैसे पहुंची?
मैं फिल्‍म समीक्षक रहा हूं और कहानियां लिखता रहा हूं। राजस्‍थानी में भी मेरी एक कहानी पर फिल्‍म बनी और हमारा एक मित्रों का नया सर्कल बना। मेरे मित्र हैं अजय ब्रह्मात्‍मज और अविनाश दास। इन लोगों में दिल्ली में सिनेमा पर बहसतलब के आयोजन में मुझे बुलाया। मेरी डॉ साहब से वहीं पहली मुलाकात हुई। वे एक बौद्धिक आदमी है और उनका अब तक का काम ऐसा है कि आपको हमेशा एक छवि से ही डर लगता है। एक संकोच होता है कि आप इतने समझदार आदमी के साथ चुटकुले बाजी में बातचीत नहीं कर सकते। मैं उनसे डरते डरते खुला उन्‍होंने जयपुर के अपने दो चार मित्रों के बारे में पूछा मैं संयोग से उन सबको जानता था। देखते ही देखते उन दो दिनों में हममें सहज आत्‍मीयता विकसित हो गई। मेरा मुंबई आना जाना रहता ही है। मैं हर बार जाते ही उनको एसएमएस करता और उनका तुरंत फोन आता कि शाम को खाना साथ खाएंगे। यूं मानिए कि यह ऐसी ही शाम थी मुंबई की और मैंने कहानी लिख ली थी। कहानी फिल्‍मी थी लेकिन मैं पहले इसे उपन्‍यास बनाना चाहता था और फिर सोचता था कि किसी को फिल्‍म के लिए अप्रोच करूंगा। लेकिन ज्‍योंही कहानी सुनानी शुरू की, डॉ साहब जैसे गंभीर आदमी हंसते हुए बोले, अब ठहर जा। पूरी कहानी मेल करो और अगर मुझे अच्‍छी लगी तो मैं फिल्‍म बनाउंगा वरना तुम्‍हें स्‍वतंत्र कर दूंगा और समय भी नहीं लूंगा। मैंने कहानी भेजी और आज नतीजा आपके सामने है।
आपको क्‍या यह नहीं लगा कि आपके प्रशंसक हिंदी पाठकों तक इस कहानी को पहले जाना चाहिए था?
मुझे तो यह भी नहीं पता कि हिंदी पाठकों में मेरे प्रशंसक भी हैं। अगर हैं तो मैं बहुत खुश हूं और वे इस फिल्‍म को देखकर बेहद खुश होंगे। मूल कहानी अभी मेरे पास ही है और कोई प्रकाशक दिलचस्‍पी दिखाएगा तो इंशाअल्‍लाह वो भी पाठकों तक पहुंचेगा।
हिंदी कथाकार और फिल्‍म लेखक रामकुमार सिंह में क्‍या अंतर है?
मन के भीतर मुझे कोई अंतर महसूस नहीं होता लेकिन हां, व्‍यावहारिक रूप से दोनों चीजें अलग है। पटकथा मैंने डॉ साब के साथ मिलकर लिखी है और वहां आपका कहानी कहने का क्राफ्ट एकदम बदल जाता है। आपको पर्दे के लिए विजुअल में सोचना है। डॉ. साहब निष्‍णात पटकथा लेखक हैं और वे सोचते ही विजुअली हैं। यहां तक कि वे लिखते हुए अभिनय करते हुए दृश्‍य रचते हैं कि यह पर्दे पर कैसा लगेगा। उनके साथ काम करने का मेरा यह विलक्षण अनुभव था। कहानी की आत्‍मा को बचाते हुए दृश्‍य रचना एक पटकथा लेखक के लिए बड़ी चुनौती लगती हैं। कम से कम शब्‍दों में आपको सबसे असरदार दृश्‍य रचने होते हैं।

हिन्दी साहित्य के लेखक सिनेमा को छूआछूत की नज़र से देखते है, जैसे फिल्मों के लिए लिखना लेखक का पतन है!
हिंदी के कई नए कथाकार इस समय सिनेमा को एक नई संभावना की तरह देख रहे हैं। वे सब मेरे हम्उम्र हैं और कुछ दोस्‍त भी। सिनेमा के उस दौर को याद करिए जब हमारे उम्‍दा किस्‍म के शायर फिल्‍मों के गीतकार हुए और बेहतरीन अमर गाने रचे। यह नए दौर का सिनेमा हैं इसमें सौ दो सौ करोड़ का मसाला सिनेमा तो है लेकिन बहुत से उम्‍दा विचारों पर फिल्‍में बन रही हैं। वापस कहानी की मांग होने लगी है और अगर हिंदी का नया लेखक वहां संभावना ढूंढ रहा है तो इसे पतन कैसे कह सकते हैं।

हिन्दी  कथाकार की संवेदना और सरोकारों को जेड प्लस में बचा पाए हैं?

मैं तो फिल्‍म देख चुका हूं। अपनी ही फिल्‍म की तारीफ करूंगा तो लोग इसे प्रचार समझेंगे लेकिन मैं कह रहा हूं, 21 नवम्‍बर से हिंदी सिनेमा के दर्शकों के अच्‍छे दिन वाले हैं। यह फिल्‍म आपको हंसाती है और आंखें भी नम करती है। यह एक दुर्लभ संयोग है। यह हम सबकी कहानी है। इसलिए हमारी संवदेनाओं के सबसे करीब होगी। ऐसा नहीं है कि यह किसी डॉन, डकैत, माफिया, चोर की कहानी है जिसे हम नायक बनाकर दिखा रहे हैं। इस कहानी के हीरो हम सब लोग हैं भारत के लोग।
मंजिलें अभी और भी हैं?

कुछ और कहानियों पर काम कर रहा हूं। ऐसे ही आम लोगों की कहानियां, जिन सबमें नायकत्‍व कूट कूट कर भरा है। खास लोगों की कहानियां हमेशा आसान होती हैं। उनके बारे में अखबार, टीवी, सेलेब्रिटी मैगजीन्‍स सब कुछ छापती हैं। आम लोग नायक होते हुए भी उपेक्षित रह जाते हैं। मेरी नजर उन्‍हीं लोगों पर है और उम्‍मीद भी करता हूं कि यह नजर फिरे नहीं।

Monday, December 2, 2013

पीरियड फिल्‍म : डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी





डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी का एक महत्‍वपूर्ण आलेख। उनका यह आलेख हिंदी फिल्‍मों में पीरियड फिल्‍मों की पड़ताल करता है। अपने धारावाहिक और फिल्‍म से उन्‍होंने साबित किया है कि पीरियड को पर्दे पर मूर्त्‍त रूप देने मेंवे माहिर हैं। इतिहास,संस्‍कृति और कला परंपरा की समुचित समझ के कारण वे समकालीन पीढ़ी के विशेष निर्देशक हैं। यह आलेख भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित भारतीय सिनेमा का सफरनामा में संकलित है। 

-डॉ.चंद्रप्रकाश द्विेवेदी
 
भारतीय सिनेमा ने अपने इतिहास का प्रारंभ राजा हरिश्चन्द्र से किया था.

कारण था दादा साहेब फालके का भारत के मिथकीय, पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों में विश्वास.साथ ही यह विश्वास की भारत को पौराणिक आख्यानों से प्रेरणा मिल सकती है। उन्होंने अपनी और भारत की पहली फिल्म के लिए पौराणिक आख्यान चुना और उसके पश्चात भी अपनी रचना की यात्रा में भी उन्होंने कई फिल्मों के लिए पौराणिक एवं ऐतिहासिक आख्यानों को अपने चल चित्र की कथा के केंद्र में रखा।

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि क्या भारतीय फिल्मों के पितामह दादा साहेब फाल्के के सामने भी वही आदर्श था जो नाट्यशास्त्र के रचयिता भारत मुनि के सामने था कि लोक रंजन के लिए समाज में बहुश्रुत, लोकप्रिय और प्रचलित कथा को नाट्य के केन्द्र में रखा जाये.

क्या दादा साहेब फाल्के ने स्वतंत्रता के पूर्व भारत की विलुप्त संस्कृत नाट्य परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जो अपनी चेतना और कथ्य में भारत के पुराणों को सुरक्षित रखे हुए थी ?

या यह महज एक संयोग था कि दादा साहेब ने अपनी पहली फिल्म के लिए एक पौराणिक आख्यान या कथा का प्रयोग किया.

क्या दादा साहेब भारतीय समाज में कथाकथन की उस खोयी हुई कड़ी को फिर से ढूंढ लाये थे पर अब एक नए माध्यम में – जिसे हम सिनेमा कहते हैं ?

सच चाहे जो भी रहा हो,भारत की स्वतंत्रता के साथ हमारे फिल्मकारों ने एक नए उत्साह के साथ भारत के सांस्कृतिक मूल्यों और उसकी धरोहर को चित्रांकित करने का प्रयास प्रारंभ किया.वे भूली बिसरी कहानियों को फिर से समाज के बीच में ले आए। सैकड़ों वर्षों की विदेशी आक्रांताओं की दासता के कारण हमारी संस्कृत और लोक नाट्य की परंपरा लुप्त हो गई थी।

अतीत का गौरव विस्मृत हो गया था.अतीत और वर्तमान के बीच की कड़ियाँ उध्वस्त हो गयी थी.

कई विदेशी और भारतीय विद्वानों ने भारत के इतिहास को ढूँढने का प्रयत्न किया.उसके परिणाम स्वरुप कुछ संस्कृत नाटक फिर से प्रकाश में आये पर मोटे तौर पर वह लोक जीवन का हिस्सा नहीं था.

अतीत और वर्तमान, भूत और भविष्य, को जोडनेवाली विस्मृत “स्मृतियों” को पुनर्जीवित करने के प्रयास में भारतीय सिनेमा ने भी अपना हाथ बंटाया.

भारत की स्वंतंत्रता के बाद कई सिनेमा के शिल्पकार नए संकल्प के साथ उभरे और देश ने कई पौराणिक और ऐतिहासिक चल चित्र देखे.  

इनमे रामायण,महाभारत जैसे महाकाव्य भी थे.तो झाँसी की रानी,सिकंदर, मुगले आज़म,आम्रपाली जैसी फ़िल्में जो इतिहास में अपनी ज़मीन तलाश कर रही थी.

महाकाव्यों की कथा भूमि से कई अलग अलग फ़िल्में भी बनी.भारतीय जन मानस की इन महाकाव्यों के चरित्रों में आस्था भी थी और सिनेमा के जादुई माध्यम में आकर्षण भी था. भारतीय समाज में सैकड़ों वर्षों से होती आ रही राम लीला अब नए रूप में परदे पर आयी.वैसे की कृष्ण लीला भी सिनेमा के नए रूप में दर्शकों के सामने आयी.इनमे से कई फ़िल्में लोकप्रिय भी हुई.

यहाँ स्मरण कराना आवश्यक समझता हूँ महाकाव्यों के आख्यान या इतिहास का सिनेमा में सृजन सिर्फ उत्तर भारत में ही नहीं हो रहा था बल्कि दक्षिण भारत में उसका आवेग उत्तर भारत की अपेक्षा ज्यादा था.एम्.जी.रामचंद्रन,एन.टी.रामाराव,अक्किनेकी नागेश्वर राव की अभिनय और सृजन की यात्रा में पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्मों का बड़ा योग दान था.

इसी तरह शोहराब मोदी ने ऐतिहासिक चरित्रों के माध्यम से हिंदी फिल्म जगत में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया.

हिंदी फिल्मों में मुगले आज़म ने सिंहनाद किया.अपार लोकप्रियता ने मुगले आज़म को मील का पत्थर बना दिया.भारतीय और हिंदी सिने जगत के दो महान कलाकारों को इसने विशेष पहचान दी.ये थे पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार.मुगले आज़म इतिहास में अपनी कहानी की ज़मीन ढूँढने वाले के लिए चुनौती बन गयी.

मैंने कुछ वर्षों पहले ही मुगले आज़म का रंगीन संस्करण देखा.उसकी भव्यता कल्पना का वितान और विस्तार अतुलनीय है.

मेरी व्यक्तिगत दृष्टि में मुगले आज़म एक ऐतिहासिक काल में,कतिपय ऐतिहासिक महानायकों और चरित्रों के साथ अविस्मरणीय कल्पना का सृजन है.अनारकली की ऐतिहासिकता पर प्रश्न चिन्ह है.पर मुगले आज़म का अधिकतर कार्य व्यापार सलीम और अनारकली के प्रेम के संघर्ष,असफलता,त्याग और अनारकली के उत्सर्ग की कथा की काल्पनिक उड़ान है.

मुगले आज़म में पिता और पुत्र का संघर्ष है पर कथा में तत्कालीन समाज की स्थिति और उसका संघर्ष लुप्त है.देश की जिस दुर्दशा का वर्णन तुलसी के साहित्य में मिलता है उसका प्रतिबिम्ब फिल्म में नहीं है.कारण साफ़ है कथा कि भावभूमि प्रेम है,प्रेम की मीठी कल्पना है,इतिहास नहीं.

अपनी तमाम श्रेष्ठताओं के बावजूद यह फिल्म अपने समाज के इतिहास का लेखा जोखा नहीं हो पाती.क्यों कि कथा के मूल में चरित्रों का संघर्ष है.समाज का नहीं.

महान स्वप्नद्रष्टा और सफल निर्देशक के.आसिफ की कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता, कौशल और उनके महान संघर्ष की गाथा है मुगले आज़म.पर यही हिंदी सिनेमा की इतिहास बोध की ओर इशारा भी करती है.

ऐतिहासिक कही जाने वाली फिल्मों में इतिहास कम और कल्पना का विस्तार ज्यादा रहा है.मुगले आज़म की इतिहास बोध की पृष्ठ भूमि में जब मैं आशुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर, संतोष सिवन की अशोक और केतन मेहता की “द राईजिंग –मंगल पांडे” को देखता हूँ तो यही पाता हूँ कि ऐतिहासिक कही जाने वाली इन फिल्मों में प्रेम की संभावना को तो जरुर टटोला गया पर समाज की पीड़ा,उत्पीडन,आशा,आकांक्षा,समाज में हो रहे सामाजिक,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिवर्तन को अनदेखा कर दिया गया.कारण साफ़ है जोधा अकबर में भी सांप्रदायिक सौहार्द के नाम पर एक प्रेम कथा का विकास,अशोक में भी महान कहे जाने देवनाम प्रिय और प्रियदर्शी अशोक की अनसुनी,अनकही प्रेम कथा का सृजन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक मंगल पांडे के जीवन में भी प्रेम के एक सूत्र को ढूँढने का प्रयास.मुगले आज़म से मंगल पांडे तक हमारे फिल्मकारों को प्रेम की भाव भूमि अधिक आकर्षित करती है बनिस्पत समाज के संघर्ष के.और यही वह ज़मीन है जहाँ इतिहास पीड़ित हो उठता है.हालाँकि ये सभी फ़िल्में सिनेमा के शिल्प के किसी न किसी पक्ष में उत्कृष्टता के नए मापदंड गढ़ रही थीं.जोधा अकबर अपनी भव्यता,सुंदरता,कला निर्देशन में उत्कृष्ट थी तो अशोक में संतोष सिवन अनदेखे बिम्बों के साथ प्रयोग कर रहे थे.अति सीमित साधनों में काल के निर्वाह करने का उन्होंने नया प्रयोग किया.वहीं मंगल पांडे भी अपनी विशालता और काल को जीवित करने के कौशल के लिए सराहनीय थी.

इसके ठीक विपरीत काल्पनिक कही जा सकने वाली ऐसी कई फ़िल्में रही हैं जिन्होंने अपने काल के समाज का इतिहास प्रस्तुत किया है.अपने समाज के संघर्ष को मुखरित किया है.मदर इंडिया और दो बीघा ज़मीन इसके उत्कृष्ट उदहारण हैं.

ऐसी भी कई फ़िल्में रही जिसने इतिहास के किसी काल खंड को अपनी कथा कहने के लिए चुना पर वे ऐतिहासिक फ़िल्में नहीं थी न ही इतिहास की रचना उनका उद्देश्य. आशुतोष गोवारिकर की “लगान” इस श्रेणी की एक अति लोकप्रिय और सफल फिल्म थी.

शहीद भगत सिंह पर अलग अलग निर्देशकों द्वारा कई फ़िल्में बनी.इनमें कुछ स्तरीय फ़िल्में थी.पर सफलता के मापदंड पर कई फ़िल्में असफल रही.

भारत पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठ भूमि को लेकर भी कई फ़िल्में बनी.अनिल शर्मा की ग़दर एक अत्यंत सफल फिल्म थी जो विभाजन के इतिहास की पड़ताल तो नहीं करती पर उसके परिणाम की एक मार्मिक और साहसिक कथा कह जाती है.ग़दर ने सफलता का इतिहास रचा.मेरी दृष्टि ने ग़दर में उत्कृष्टता की ओर लक्ष्य करने वाली सभी संभावनाएं थी, पर संभवतः उसका स्वर और शैली अतिरंजना की शिकार हो गयी.

विभाजन के बाद के परिणामों से जूझते भारत के मुस्लिम समुदाय की त्रासदी और उनके सामने खड़ी चुनौतियों और उससे सामना करने के उनके संकल्प को दिखाने वाली एम्.एस.सथ्यू की “गर्म हवा” को कौन भुला सकता है. गर्म हवा मील का पत्थर है.पर यह फिल्म भी कुछ हद तक दूसरे हिंदी सिनेमा की तरह प्रेम के प्रहार से न बच सकी.

विभाजन की ही पृष्ठ भूमि पर बनी गोविन्द निहलानी की “तमस” (छः भागों में) तत्कालीन राजनीति,सामाजिक परिस्थितियां और विभाजन की त्रासदी से जूझते व्यक्ति और समाज का उत्कृष्ट लेखा जोखा है.भीष्म साहनी के उपन्यास पर बनी यह फिल्म अविस्मरणीय है.इसके अतिरिक्त कला निर्देशन,छायांकन,और अभिनय के मापदंडों पर तमस को मैं विभाजन की पर बनी फिल्मों में सबसे अग्रणी स्थान दूंगा.

इसके अतिरिक्त “ट्रेन तो पाकिस्तान” दीपा मेहता की “अर्थ” और चन्द्रप्रकाश द्विवेदी की “पिंजर” विभाजन की त्रासदी को अलग अलग रूपों में अभिव्यक्त करती हैं.

हाल ही में बनी राकेश ओमप्रकाश मेहरा की “भाग मिल्खा भाग” एक अति उल्लेखनीय फिल्म है जो अपनी कथा में एक खिलाडी के संकल्प,साहस,सफलता और पीड़ा की महान गाथा कहती है.यह खिलाडी है भारत के फ्लाईंग सिक्ख मिल्खा सिंह.अपने काल बोध के निरूपण की यह उत्कृष्ट फिल्म है.जिसमें विभाजन की पीड़ा और एक खिलाडी के अंतस पर उसके प्रभाव को जिस प्रकार से निर्देशक ने प्रस्तुत किया है वह अविस्मरणीय है.फरहान अख्तर के उत्कृष्ट अभिनय और पुरुषार्थ के लिए भी यह फिल्म लंबे समय तक याद की जायेगी. “भाग मिल्खा भाग” में भी प्रेम का तडका हिंदी फिल्मों की विवशता की ओर संकेत करती है.यहाँ यह उल्लेख करना भी उचित रहेगा की की अपनी अत्यंत सफल फिल्म “रंग दे बसंती” में राकेश ओमप्रकश मेहरा ने अतीत और वर्तमान के बीच की यात्रा कर दोंनों कालों का सुन्दर संगम किया है.

संजय लीला भंसाली की देवदास,ब्लेक,हम दिल दे चुके सनम,सांवरिया - ये सभी फ़िल्में उनके कौशल और उनके सौंदर्य बोध के कारण उल्लेखनीय हैं.इन सभी फिल्मों का कथ्य ऐतिहासिक नहीं है पर ये सभी किसी न किसी काल के बोध का आभास देती है.संजय लीला भंसाली का चित्र फलक इतना व्यापक होता है कि वे काव्यात्मकता के साथ चाहे न चाहे,किसी काल्पनिक ही सही - काल को ओढ़ लेती हैं. प्रेम और श्रृंगार उनकी अधिकतर फिल्मों की प्रेरणा रहा है.और वे अपने सौंदर्य बोध में अपना सानी नहीं रखते.

यहाँ मैं उन चार फिल्मों का उल्लेख करना आवश्यक समझाता हूँ जिन्होंने हिंदी सिनेमा को रेखांकित किया है.वे हैं कमल अमरोही की पाकीज़ा,गिरीश कर्नाड की उत्सव,मुज़फ्फर अली की “उमराव जान” और श्याम बेनेगल की जुनून.इन सभी फिल्मों में एक विशिष्ट काल का सृजन है.सभी कला के मापदंडों पर श्रेष्ठता के लिए स्पर्धा करते हैं.किसी में काव्यात्मकता,किसी में भव्यता,सभी में उत्कृष्ट अभिनय और निर्देशकीय कौशल. चारों फ़िल्में “पीरियड ड्रामा” के अनुपम उदहारण.

इतिहास के साथ उसका काल निश्चित होता है पर कालखंड में ऐतिहासिक कथा या चरित्र हो यह आवश्यक नहीं.योगानुयोग इन सभी फिल्मों में “प्रेम की भूमि” भी है.

मेरी दृष्टि में भविष्य के उन सिनेमाकारों के लिए इतिहास एक बड़ी चुनौती है जो इतिहास में अपनी कथा ढूंढ रहे हैं.ऐसी कथा जिसमे महानायक हो,और उसके समक्ष महान सामाजिक,राजनैतिक चुनौतियाँ भी हो.ऐसे ऐतिहासिक चरित्र जिन्होंने अपने महान पराक्रम से देश और समाज की दिशा बदल दी हो.इतिहास को नया मोड दे दिया हो.

यह भी संभव है कि महान संघर्ष और चुनौती भरे देश के काल खंड में काल्पनिक चरित्रों द्वारा समाज और देश की आशा अभिलाषा और उनके संघर्ष को वाणी दी जाये.

इतिहास सिर्फ ऐतिहासिक घटनाओं की तारीख और महानायकों की जय पराजय,उनके जन्म मृत्यु का उल्लेख नहीं है बल्कि उन अपरिलक्षित कारणों की विवेचना है जो जय पराजय,सफलता असफलता,उत्थान पतन, विकास विनाश,सृजन और ध्वंस् के मूल कारण में हैं.

समाज और देश को आईना दिखाता है इतिहास.समाज और सभ्यता के विकास या विनाश की कहानी है इतिहास.और जो दिखाई नहीं दे रहा वहीं कल्पना की आँखों से रचनाकार देखने का प्रयत्न करता है.और जो उसने देखा है उसी से वह अतीत को वर्तमान से जोडने की कोशिश करता है.काल के,इतिहास की उस न दिखाई देने वाली कड़ी को ढूँढने का प्रयास ही इतिहास में अपनी ज़मीन ढूँढने वाले फिल्मकारों के लिए चुनौती है.इसलिए जहाँ इतिहास चुप है वहीं साहित्यकार,फिल्मकार मुखर है.

क्या कारण है कि जिस भारतीय सिनेमा का प्रारंभ राजा हरिश्चंद्र से होता है उसी सिनेमा जगत में पुराण,इतिहास और प्राचीन भारतीय साहित्य पर वर्तमान में सिनेमा का अभाव है.यह प्रश्न इसलिए भी प्रासंगिक है कि यदि एक दर्शक के रूप में हम सिनेमा में वर्चस्व रखने वाले पश्चिम की ओर देखें और खास कर अमेरीका की ओर तो हम पाते हैं कि उनके सिनेमा में अतीत की कथा,ऐतिहासिक या पौराणिक कथा या कल्पना लोक में विचरण करने वाले सिनेमा का अभाव नहीं है.रहस्य,रोमांच,शौर्य,दर्शन,प्रेम,युद्ध,उत्पीडन,मनुष्यता का शांति के लिए सतत संघर्ष,रंग भेद के विरुद्ध उस समाज का विद्रोह,जैसे कई विषयों पर वह समाज सिनेमा बनाता आ रहा है.द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी को लेकर लगातार सिनेमा बन रहा है और वह सफल भी है.

क्या वहाँ का दर्शक हमारे यहाँ के दर्शक से भिन्न है ?

क्या हमारा सिनेमा किसी एक बिंदु पर आकर ठहर गया है ?

क्या हम प्रयोग से डर रहे हैं ?
क्या भारतीय सिने निर्देशक अतीत को वर्तमान से जोडने में असफल हो रहे हैं ?

या हम आत्म विस्मृत समाज है जो अतीत को दकियानुसी समझता है.या हम आत्म और अतीत की प्रताडना से ग्रस्त हैं.या भारत की मिटटी में हम अपनी जड़ें और पहचान नहीं ढूंढ रहे.

जिस देश के पास हजारों वर्षों का इतिहास और जिसके राष्ट्र जीवन में परंपरा और संस्कृति का अनवरत प्रवाह बह रहा है वह इस संकट से कैसे जूझ रहा है कि भारतीय इतिहास के कई महानायकों की कथा कहने में हमारा बाज़ार असमर्थ है.

विचित्र तथ्य यह है की भारतीय टेलीविज़न पर तो इतिहास और मिथक को लेकर कई प्रयोग हुए पर भारतीय सिनेमा वह साहस नहीं दिखा सका.

क्या भारतीय सिनेमा का लोकप्रिय “फोर्मुला” इसमें बाधा है.या हिंदी सिनेमा में प्रणय, प्रेम,और युवाओं की मांग और मानसिकता के अनुकूल सिनेमा ही हमारा सिनेमा है.क्या पलायनवादी सिनेमा ही हमारे सिनेमा का भविष्य है ?

कहीं ऐसा तो नहीं है कि दर्शकों की ऐतिहासिक और पौराणिक चल चित्रों से अपेक्षा के मापदंड पर हम खरे नहीं उतर रहे ?

आज विश्व के श्रेष्ठ चलचित्र हमारे रसिक दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं.दर्शक का कला बोध और अभिरुचि निरंतर बदल रही है.तकनीक के निरंतर विकास ने चित्रों का रूप बदल दिया है.असंभव लगने वाले बिम्बों का सृजन हो रहा है.ईश्पेशियल इफेक्टस् ने सपनों को नई उड़ान और आकाश दिया है.

विश्व सिनेमा में निरंतर हो रहे परिवर्तन और प्रयोग की पृष्ठभूमि अथवा परिदृश्य में भारतीय सिनेमा कहाँ है ?

मैंने अपने ऐतिहासिक सिनेमा बनाने के कुछ असफल प्रयत्नों में पाया कि न हमारा बाज़ार अभी भी ऐतिहासिक सिनेमा के लिए तैयार नहीं है.न ही लोकप्रिय कलाकार इतिहास और मिथक को लेकर उत्साहित हैं.जहाँ एक बड़ा कारण लागत है, वहीं दूसरा कारण मुझे पौराणिक या ऐतिहासिक बिम्बों,चरित्रों और समाज के चित्रण में समय के साथ विकास का अभाव दिख रहा है.

दूसरे शब्दों में लोकप्रिय कलाकार “केलेंडर आर्ट” का हिस्सा या दीवार पर लटके केलेंडर नहीं बनना चाहते.

क्या है यह केलेंडर आर्ट ?

केलेंडर आर्ट के जनक राजा रवि वर्मा ने अपने चित्रों के लिए पौराणिक चरित्रों या मिथकीय स्त्री पुरुषों का चुनाव किया.उन्होंने अपनी कल्पना से एक पौराणिक पात्रों और सृष्टि की रचना अपने सुन्दर चित्रों में की.

हमारे देवी,देवताओं,महाकाव्यों के पात्रों और प्राचीन भारत के कई ऐतिहासिक स्त्री पुरुषों की कल्पना को राजा रवि वर्मा ने अपने रंगों और कूची से की.भारतीय जन मानस पर उसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे चित्र आज भारतीय जनमानस की चेतना का हिस्सा हो गए हैं.राजा रवि वर्मा के बिम्बों का आधार “टेम्पल आर्ट” या मंदिरों के शिल्प रहे हैं.कुल मिलकर राजा रवि वर्मा ने प्राचीन भारतीय शिल्प कला को ही अपने चित्रों का आधार बनाया.इसके अतिरिक्त कुछ चित्रों में उन्होंने अपने समाज की लोक संस्कृति/सभ्यता को भी जोड़ दिया.यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ मुग़ल कालीन चित्रों में हम कृष्ण को मुग़ल कालीन वेशभूषा में देखते हैं.

पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर  काम करने वाले हमारे आरंभिक निर्देशकों ने राज रवि वर्मा की चित्र सृष्टि ( केलेंडर आर्ट ) और मंदिरों की दीवारों पर उकेरे गए शिल्पों से ही प्रेरणा ली.

इसमें संदेह नहीं कि मूर्ति कला में दिखाई देने वाली सभ्यता या लोक जीवन अपने काल का प्रतिनिधित्व करता है.भरहुत,साँची,खजुराहो,कोणार्क के मंदिर और दूसरे प्राचीन स्मारक अपने काल के जन जीवन की झांकी प्रस्तुत करते हैं.उस काल का साहित्य या वांग्मय भी उसका समर्थन करता है.परन्तु मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि मंदिरों के शिल्प, स्तूपों पर उकेरी गयी आकृतियाँ उस काल के जीवन को अपनी सम्पूर्णता के साथ अंकित नहीं करती.

महाकाव्यों के समाज,दर्शन,तत्त्व ज्ञान,शिक्षा,उद्योग,और राजनीति को समझने के लिए महाकाव्यों में वर्णित जीवन में भी झांकने की भी जरूरत है.उसी प्रकार किसी भी काल खंड के जीवन को समझने के लिए उस काल में लिखी गयी रचना,साहित्य,धर्मं ग्रन्थ इत्यादि की पड़ताल करना भी जरुरी है.

हमारे सिनेमाकारों ने केलेंडर आर्ट या टेम्पल आर्ट से बिम्ब तो ले लिए पर जीवन की सच्चाइयों (social realities) पर बहुत कम ही उनका ध्यान गया.

हमने वेदों में वर्णित देवताओं को तो चित्रों में अंकित कर दिया पर वैदिक समाज की वास्तविक स्थिति,उनका संघर्ष,उनकी समाज  व्यवस्था,उनका दर्शन,उनके उद्योग,आवागमन उनका दैनंदिन जीवन पीछे छूट गया.रामायण और महाभारत के पात्रों को हमने चित्रों में गढ़ लिया पर महाकाव्यों में ही दर्शाये गए जीवन को हम पूरी प्रमाणिकता के साथ अंकित नहीं कर पाए.

प्राचीन भारत के इतिहास को समझने के लिए अनेक शोध हुए.कला और जीवन के प्रत्येक अंग से सम्बंधित इतिहास और साहित्य का विकास हुआ.भवन कला,पुरातत्व शास्त्र,वेश भूषा,लिपि,प्राचीन बौद्ध,जैन और विदेशी ग्रंथों में वर्णित भारत को ढूँढा गया.
इतिहास की पुस्तकें बढती गयी, इतिहास का साहित्य में फिर से सृजन होता गया,इतिहास का उत्खनन होता गया पर प्राचीन भारत के बिम्ब राजा रवि वर्मा के चित्रों या मंदिर कला के शिल्पों में स्थिर हो गए.

उन चित्रों में दिखाए गए संसार का नयी खोजों के प्रकाश में में परिवर्तन नहीं हुआ,उसका विकास नहीं हुआ.उन बिम्बों पर बहस नहीं हुई,उन्हें चुनौती देना तो दूर रहा.

संक्षेप में मेरी व्यक्तिगत राय में हमारे सिनेमा के पौराणिक या ऐतिहासिक कहे जाने वाले प्राचीन भारत के बिम्ब अभी भी राजा रवि वर्मा के ही हैं.हमारी कल्पना या काल की तथाकथित वास्तविकता राजा रवि वर्मा के चित्रों सी जड़ हो गयी है.

यह जडता नए सिनेमाकारों के लिए बड़ी चुनौती है.

हमारे पास वैदिक काल के बिम्ब के सन्दर्भ उपलब्ध नहीं है पर वैदिक साहित्य में जीवन का हर रूप वर्णित है.नए फिल्मकारों को उन्हें अब सिनेमा में उकेरना है.हमारे पास रामायण और महाभारत के बिम्ब उपलब्ध नहीं है पर दोंनों ही महाकाव्यों में वर्णित जीवन और इन महाकाव्यों पर लिखे गए साहित्य, प्रबंध,निबंध इत्यादि हमें सच्चाई के नजदीक ले जाने में मदद कर सकते हैं.

बुद्ध के काल का सजीव वर्णन हमें बौद्ध ग्रंथों में मिलता है.इसी प्रकार प्राचीन भारत के जन जीवन का वर्णन हमें प्राचीन साहित्य में मिलता है.

जब से बुद्ध और बुद्ध कथा पाषाणों में उकेरी जाने लगी तब से हमें तत्कालीन जीवन की झांकी का एक पहलू मिल जाता है.समकालीन साहित्य और समकालीन शिल्प कला के बीच सामंजस्य स्थापित कर हमारे नए सिनेमाकार नए बिम्ब गढ़ सकते हैं.

हमारे पास मुग़ल कालीन स्थापत्य भी है,चित्र कला भी है और मुग़ल कालीन साहित्य भी है.

आज़ादी के पहले और बाद के इतिहास का लेखा जोखा पन्नों में भी है और कुछ चित्रों में भी है.

आवश्यकता है कि हम चरित्रों के उसके समाज और देश का भी चित्र प्रस्तुत करें.और आज हमारे पास जन जीवन के इतिहास को समझने के लिए प्रचुर शोध सामग्री उपलब्ध है.जरुरत है शिल्प कला,चित्र कला के सौंदर्य बोध और फिल्म कला के सौदर्य बोध में सामंजस्य बैठाने की.

आज के सिनेमा के राजा रवि वर्मा के पास शोध के स्तर वह सब कुछ उपलब्ध है जो महान चित्रकार और कलाशिल्पी राजा रवि वर्मा के पास नहीं था.आज हमारे साथ कला इतिहासकार,पुरातत्व शास्त्री,लिपि शास्त्री,और डिजिटल पेंटर भी हैं.









आज हम प्राचीन पाटलिपुत्र या राजगृह के काल विशेष को प्रमाणिकता के साथ फिल्म में निरुपित कर सकते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अतिरिक्त, विदेशी यात्रियों के यात्रा वृतांत,समकालीन साहित्य और अब पुरातत्व के अवशेष हमारी सहायता कर सकते हैं.

अब आवश्यकता है कि हम कहानी के साथ पार्श्व भूमि के शिल्पों पर भी काम करें. पश्चिम का फिल्मकार अपने पौराणिक आख्यानों पर काम करते समय दोनों विशेषताओं पर ध्यान देते हैं। उदहारण के लिए हम टेन कमांडमेंट्सया “बेनहर”  देखें। दशकों पुरानी ये फिल्में आज भी नवीन लगती हैं। किसी भी दृष्टि से हम आज भी इन दो फिल्मों के स्तर को नहीं छू पा रहे हैं। उन्होंने देश, काल और परिस्थिति में अपने पौराणिक कथानक को इस तरह बाँध दिया है कि अब उसमें बहुत बड़े परिवर्तन की कल्पना नहीं की जा सकती.क्लियोपेट्राके चरित्र को लेकर पश्चिम में दो फिल्में और एक लघु धारावाहिक बन चुका है। तीनों को क्रमशः देखें तो हर रचना पहले से बेहतर और नए अनुसन्धान के साथ प्रस्तुत की गयी है है। ज़ाहिर है कि यह निरंतर अभ्यास का परिणाम है और नया सिनेमाकार पिछली रचना को चुनौती देता दिखाई पडता है.  रोम और रोमन साम्राज्य को केंद्र में रखकर कई फ़िल्में और लघु धारावाहिक बने हैं और जितनी बार हम रोम को देखते हैं, हर बार एक नया अध्याय जुड़ता जाता है।

क्या हम कभी हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ को इतिहास में स्थापित कर पाएंगे ? 

किसी भी राज्य का आधार अर्थ होता है। अर्थ कहां से आता होगा ?  क्या हम कभी महाभारत या किसी पौराणिक फिल्म में उद्योग, व्यवसाय और  कृषि से अर्थ का आवागमन देख पाएंगे ? क्या हम किसी भी फिल्म में कृषि और कर की व्यवस्था को भी देख पाएंगे ? क्या हम कभी युद्धिष्ठिर या दुर्योधन को खेतों के बीच देख पाएंगे ? क्या यातायात के माध्यम से “कर” के तौर पर अनाज किसी छोटे से ग्राम से राजधानी तक कैसे पहुंचता होगा, देख पाएंगे ?

क्यों भागवत में मथुरा और गोकुल के बीच में निरंतर प्रवास हो रहा है ?  क्यों गोकुल से दूध,दही और गोधन मथुरा जा रहा है?  अर्थ उपार्जन के साधन, व्यवसाय,उद्योग,उत्तरापथ और दक्षिणापथ पर फ़ैल रहा उद्योग और साम्राज्य,और  समाज सिनेमा से नदारद है.

मुझे लगता है कि अभी भी हमारा पौराणिक और ऐतिहासिक कहा जा सकने वाला सिनेमा कुछ अपवादों को छोड़कर,वास्तविकता और प्रमाणिकता से  दूर है।

प्रश्न है इतिहास क्यों बनता है?

इतिहास बनने के अनेक कारण होते हैं.असामान्य अथवा भीषण सामाजिक परिस्थितियां, समाज के सामने बड़ी चुनौतियां, महान संघर्ष जो पूरी सभ्यता से अपने प्रश्नों के उत्तर और बड़े परिवर्तन की मांग रहा हो और ऐसे वातावरण जब एक महानायक पैदा होता है, जो महान श्रम और महान पराक्रम करता है। महान स्थितियों और महान व्यक्तित्वों के योग से इतिहास रचा जाता है.
बुद्ध को ही लीजिए.
बुद्ध के आने के पहले वैदिक व्यवस्था से किस तरह से समाज में निराशा है। समाज परिवर्तन की मांग कर रहा है। बुद्ध के समकालीन कई विचारक हैं। एक ओर आत्मा का दर्शन ले याज्ञवलक्य खड़ा है तो दूसरी ओर  मक्कली गोशाल भी अपना मत प्रवर्तन कर रहा है.लोकायत भी है.चार्वाक दर्शन भी है.महावीर का भी दर्शन भी प्रचलित हो रहा है  और ऐसे बौद्धिक मंथन के युग में बुद्ध भी आते हैं.वे “धम्म” को लेकर आगे बढ़ते हैं। विचारों में जितनी विविधता है और जो परस्पर संघर्ष है। क्या वह हमारे सिनेमा में अभिव्यक्त हुआ?

भारत की बौद्धिक परंपरा की एक झलक भी हमारे सिनेमा में नहीं आयी.हमारा सिनेमा बड़ा होता जा रहा है.सफल होता जा रहा है पर क्या वह गहरा हो रहा है ?

हाल का ही उदाहरण दूंगा। लाइफ ऑफ पाईनाम की एक फिल्म आती है.यह एक  असाधारण परिस्थियों में समुद्र में फंसे एक युवक की कहानी है। 272 दिन एक व्यक्ति अथाह समुद्र के बीच में है। समुद्र में जीने के लिए उसका संघर्ष.प्रकृति और उसके(मनुष्य ) बीच क्या संबंध है? प्रकृति में विश्वास और उसके प्रति समर्पण - को लेकर कितना बड़ा दर्शन लेकर निर्देशक एंग ली दर्शकों के सामने आते हैं.ऐसा दर्शन जो पूरी मनुष्यता के लिए,सर्वकालिक और मेरी दृष्टि में पूरी तरह से भारतीय भी.

क्या हमारे सौ साल के इतिहास में ऐसी फिल्म है ?

मैं कहना चाहूँगा कि,जो देश दर्शन के लिए जाना जाता है उसके पास ऐसी कोई दार्शनिक फिल्म नहीं है. हमने दर्शन,विचार,समाज के संघर्ष,संघर्ष से विकास की यात्रा को कभी सिनेमा का विषय नहीं माना.

भारत की भूमि में विषयों और व्यक्तियों की कमी नहीं है। वैदिक युग में न संघर्ष, न कथा, न विचार और न दर्शन का अभाव है.वहाँ प्रेम का हर कोण भी है.विचित्र संयोग है कि लाइट ऑफ एशियानामक फिल्म ब्लैक एंड ह्वाइट के युग में बनती है। आजादी के 66 साल बाद भी हम बुद्ध पर एक फिल्म बनाने में असमर्थ है.जब कि बुद्ध आज पहले से ज्यादा प्रासंगिक और वैश्विक हैं.

 इतिहास के पन्नों में महान नायकों का अभाव नहीं है.

क्या चाणक्य,चंद्रगुप्त,पाणिनि,पतंजलि,प्रियदर्शी अशोक, धर्म विवर्धन कुणाल, हर्षवर्धन  कनिष्क,समुद्रगुप्त,गुप्तकालीन चन्द्रगुप्त को हम भारतीय सिनेमा में देख पाएंगे ?
कब हमें याज्ञवल्क्य,शंकाराचार्य, मंडन मिश्र,बाण भट्ट,नागार्जुन,नागसेन,कालिदास,भास,भवभूति,वात्स्यायन आकर्षित करेंगे ?

क्या दक्षिण भारत में संगम काल में रचित महाकाव्य सिनेमा का विषय नहीं होंगे ?

तक्षशिला, मोहन जोदाड़ो,नालंदा,विक्रमशिला,ने भारत का चरम देखा है.कई कहानियां उनके इतिहास के गर्भ में छिपी हुई हैं. भारत के विभिन्न ऐतिहासिक काल जिन्होंने विकास और विनाश दोंनों देखें हैं में भी काल्पनिक कहानियों के माध्यम से सभ्यता,संस्कृति,और दर्शन का उद्घाटन हो सकता है.न आख्यानों की कमी है,न ग्रंथो की. कथा सरित्सागर, वृहद्कथा मंजरी, जातक कथाएं,कल्हण की राजतरंगिणी में समाज के इतिहास और मनोरंजक कहानियों का अभाव नहीं है.

भारत में आये चीनी यात्रियों के यात्रा वृतांत भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं.किस तरह से बौद्ध दर्शन और योग दर्शन/सूत्र भारत से बाहर गया। किस तरह से भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। आज हम बोरोबदुर और बाली के हृदय में बसे भारत की बात करते हैं। विश्व का सबसे बड़ा मंदिर हमें बाली में दिखता है। क्या उसका निर्माण रातों-रात हो गया?  ज़ाहिर है भारत और उनके बीच में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक बृहत् परंपरा रही होगी। पर यह सब हमारे सिनेमा का हिस्सा अभी तक नहीं बना है.अजंता एलोरा, महाबलिपुरम,विजय नगर साम्राज्य के के भग्नावशेषों, में कोणार्क के सूर्य मंदिर  और खजुराहो के मंदिरों के मिथुन शिल्पों में रोमांच से भर देने वाली  कई रोचक कहानियां दबी हुई हैं.  

अब ज़रा विश्व सिनेमा में इजिप्त को लेकर जिज्ञासा को ही देख लीजिए.पिरामिड और ममी को लेकर कई फ़िल्में पश्चिम में बन चुकी हैं पर जिस देश के कण-कण में इतिहास है वह अपने इतिहास के प्रति उदासीन है.एक पर्वत को काट कर कैलाश मंदिर बनाया जाता है। हम उसकी काल्पनिक कथा भी कहें तब भी हमारे पास कितना कुछ है। खजुराहो के मंदिर तीन सौ वर्षों में बनते हैं। उनके निर्माण के पार्श्व में कौन सा दर्शन है.कैसा है वह समाज जो मिथुन मूर्तियों को मंदिरों की दीवारों पर स्वीकार करता है. उसके पीछे का कौन सा साम्राज्य है?  कौन हैं वे लोग हैं?  कौन हैं हाथ हैं,जो उसकी रचना कर रहे है.भारत के पास विश्व को देने के लिए महान कहानियां हैं, अद्भुत कहानियां हैं।   

भारत ऐसा देश है जिसमें लोग मन के पार भी जा चुके हैं। वह क्या विद्या है?  क्या है वह कला- जहां व्यक्ति सुख-दुख से परे जा सकता है। मेरी राय में भारत का सिनेमा मोटे तौर पर अभी भी भारतीय दर्शक की मनोरंजन की मांग को ही पूरा करा रहा है.वह कला के रूप में विकसित नहीं हुआ है.

इतिहास,मिथक,पौराणिक कथाएं आधुनिक समाज,युवाओं और बाज़ार को आकर्षित नहीं करती की हमारी धारणा को अमेरिका झूठलाता रहता है।  

महात्मा गाँधी पर हमें महान फिल्म अमेरीका ही तो देता है.