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Friday, March 6, 2015

चवन्‍नी पर होली

होली पर चवन्‍नी के आर्काइव से तीन लेखत्र इस साल शबना आजमी और अनुराग कश्‍यप ने दोस्‍तों के साथ होली को सार्वजनिक रंग दिया। कभी इस फिल्‍म इंडस्‍ट्री में रंगों की फुहार और ढोलक की थाप पर सभी सितारे ठुमकते और सराबोर होते थे। अग फिॅल्‍म इंडस्‍ट्री की होली सराबोर से घट कर बोर हो गई है। न रहा रांग, न रहे रंग। होली हो गई निस्‍संग।

Friday, March 21, 2008

खेमों में बंटी फ़िल्म इंडस्ट्री, अब नहीं मनती होली

हां, यहां यह याद दिलाना आवश्यक होगा कि सेटेलाइट चैनलों के आगमन और सीरियल के बढ़ते प्रसार के दिनों में सीरियल निर्माताओं ने अपनी यूनिट के लिए होली का आयोजन आरंभ किया। इस प्रकार की होली चुपके से होली के पहले ही होली के दृश्य जोड़ने के काम आने लगी। होली ने कृत्रिम रूप ले लिया। अभी फिल्म इंडस्ट्री घोषित-अघोषित तरीके से इतने खेमों में बंट गई है कि किसी ऐसी होली के आयोजन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती, जहां सभी एकत्रित हों और बगैर किसी वैमनस्य के होली के रंगों में सराबोर हो सकें! 

Sunday, March 4, 2012

हाय वो होली हवा हुई

पोज बना कर होली
फिल्मी इवेंट के पेशेवर फोटोग्राफर कई सालों से परेशान हैं कि उन्हें होली के उत्सव और उमंग की नैचुरल तस्वीरें नहीं मिल पा रही हैं। सब कुछ बनावटी हो गया है। रंग-गुलाल लगाकर एक्टर पोज देते हैं और ऐसी होली होलिकादहन के पहले ही खेल ली जाती है। मामला फिल्मी है तो होली का त्योहार भी फिल्मी हो गया है। हवा की फगुनाहट से थोड़े ही मतलब है। स्विमिंग पूल में बच्चों के लिए बने पौंड में रंग घोल दिया जाता है या किसी सेटनुमा हॉल में होली मिलन का नाटक रच दिया जाता है।

Tuesday, March 26, 2013

नसीम बानो के साथ होली - मंटो

पार्टी में जब कुछ और लोग शामिल हुए तो शाहिद लतीफ ने बा आवाज-ए-बुलन्द कहा, ‘चलो परी चेहरा नसीम के घर रुख करो।

      रंगों से मुसल्लह गिरोह घोड़ बन्दर रोड की ऊंची-नीची तारकोल लगी सतह पर बेढंगे बेल-बूटे बनाता और शोर मचाता नसीम के बंगले की तरफ रवाना हुआ। चन्द मिनटों ही में हम सब वहां थे। शोर सुन कर नसीम और एहसान बाहर निकले। नसीम हल्के रंग की जारजट की साड़ी में मलबूस मेकअप की नोक पलक निकाले, जब हुजूम के सामने बरामदे में नमूदार हुई, तो शाहिद ने बिजन का हुक्म दिया। मगर मैंने उसे रोका, ‘ठहरो! पहले इनसे कहा कपड़े बदल आयें।
नसीम से कपड़े तब्दील करने के लिए कहा गया तो वह एक अदा के साथ मुस्कराई, ‘यही ठीक है।

 

 

Tuesday, March 26, 2013

नसीम बानो के साथ होली - मंटो




सआदत हसन मंटो के मीना बाजार से होली का एक प्रसंग। यह प्रसंग परी चेहरा नसीम बानो से लिया गया है। यहां नसीम के बहाने मंटो ने होली का जिक्र किया है। फिल्‍मों पर होली पर लिखते समय हम सभी राज कपूर की आर के स्‍टूडियो से ही आरंभ करते हैं। उम्‍मीद है अगली होली में फिल्मिस्‍तान और एस. मुकर्जी का भी उल्‍लेख होगा।
.......
      यह हंगामा होली का हंगामा था। जिस तरह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक ट्रेडीशनबरखा के आगाज पर मूड पार्टीहै। उसी तरह बम्बे टॉकीज की एक ट्रेडीशन होली की रंग पार्टी थी। चूंकि फिल्मिस्तान के करीब-करीब तमाम कारकुन बाम्बे टॉकीज के महाजिर थे। इसलिए यह ट्रेडीशन यहां भी कायम रही।
      एस. मुकर्जी उस रंग पार्टी के रिंग लीडर थे। औरतों की कमान उनकी मोटी और हंसमुख बीवी (अशोक की बहन) के सिपुर्द थी। मैं शाहिद लतीफ के यहां बैठा था। शाहिद की बीवी इस्मत (चुगताई) और मेरी बीवी (सफिया) दोनों खुदा मालूम क्या बातें कर रही थीं। एकदम शोर बरपा हुआ। इस्मत चिल्लाई। लो सफिया वह आ गये...लेकिन मैं भी...
      इस्मत इस बात पर अड़ गयी कि वह किसी को अपने ऊपर रंग फेंकने नहीं देगी। मुझे डर था कि उसकी यह जिद कहीं दूसरा रंग इख्तियार न कर ले। क्योंकि रंग पार्टी वाले सब होली के मूड  में थे। खुदा का शुक्र है कि इस्मत का मूड खुद बखुद बदल गया और वह चन्द लम्हात ही में रंगों में लत पत भुतनी बन कर दूसरी भुतनियों में शामिल हो गयी। मेरा और शाहिद तलीफ का हुलिया भी वही था, जो होली के दूसरे भुतनों का था।
      पार्टी में जब कुछ और लोग शामिल हुए तो शाहिद लतीफ ने बा आवाज-ए-बुलन्द कहा, ‘चलो परी चेहरा नसीम के घर रुख करो।
      रंगों से मुसल्लह गिरोह घोड़ बन्दर रोड की ऊंची-नीची तारकोल लगी सतह पर बेढंगे बेल-बूटे बनाता और शोर मचाता नसीम के बंगले की तरफ रवाना हुआ। चन्द मिनटों ही में हम सब वहां थे। शोर सुन कर नसीम और एहसान बाहर निकले। नसीम हल्के रंग की जारजट की साड़ी में मलबूस मेकअप की नोक पलक निकाले, जब हुजूम के सामने बरामदे में नमूदार हुई, तो शाहिद ने बिजन का हुक्म दिया। मगर मैंने उसे रोका, ‘ठहरो! पहले इनसे कहा कपड़े बदल आयें।
नसीम से कपड़े तब्दील करने के लिए कहा गया तो वह एक अदा के साथ मुस्कराई, ‘यही ठीक है।
      अभी यह अल्फाज उसके मुंह ही में थे कि होली की पिचकारियां बरस पड़ीं।  चन्द लम्हात ही में परी चेहरा नसीम बानो एक अजीब-ओ-गरीब किस्म की खौफनाक चुड़ैल में तब्दील हो गयी। नीले-पीले रंगों को तहों में से जब उसके सफेद और चमकीले दांत और बड़ी-बड़ी आंखें नजर आतीं तो ऐसा मालूम होता कि बहुजाद और मानी की मुसव्वरी पर किसी बच्चे ने स्याही उड़ेल दी है।
      रंगबाजी खत्म होने पर कबड्डी शुरू हुई। पहले मर्दों का मैच शुरू हुआ फिर औरतों का। यह बहु़त दिलचस्प था। मिस्टर मुकर्जी की फरबा बीवी जब भी गिरती कहकहों का तूफान-बरपा हो जाता। मेरी बीवी ऐनक-पोश थी। शीशे रंग-आलूद होने के बायस उसे बहुत कम नजर आता था। चुनांचे वह अक्सर गलत सिम्त दौडऩे लगती। नसीम से भगा नहीं जाता था या वह यह जाहिर करना चाहती थी कि वह उस मशक्कत की आदी नहीं। बहरहाल वह बराबर खेल में दिलचस्पी लेती रही।

Sunday, March 4, 2012

हाय वो होली हवा हुई

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दो साल पूर्व होली से 10-12 दिनों पहले एक उभरते स्टार के पीआर का फोन आया। बाद में उक्त स्टार से भी बात हुई। उन्होंने अपनी तरफ से ऑफर किया कि अगर दैनिक जागरण में अच्छी कवरेज मिले तो वे अपनी प्रेमिका के साथ होली खेलने की एक्सक्लूसिव तस्वीरें और बातचीत मुहैया करवा सकते हैं। होली के मौके पर पाठकों को कुछ अंतरंग तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ भरी बातचीत भी मिल जाएगी। जागरण में स्टार की इच्छा पूरी नहीं हो सकी, लेकिन सुना कि उनकी चाहत किसी और अखबार ने पूरी कर दी।

पोज बना कर होली

फिल्मी इवेंट के पेशेवर फोटोग्राफर कई सालों से परेशान हैं कि उन्हें होली के उत्सव और उमंग की नैचुरल तस्वीरें नहीं मिल पा रही हैं। सब कुछ बनावटी हो गया है। रंग-गुलाल लगाकर एक्टर पोज देते हैं और ऐसी होली होलिकादहन के पहले ही खेल ली जाती है। मामला फिल्मी है तो होली का त्योहार भी फिल्मी हो गया है। हवा की फगुनाहट से थोड़े ही मतलब है। स्विमिंग पूल में बच्चों के लिए बने पौंड में रंग घोल दिया जाता है या किसी सेटनुमा हॉल में होली मिलन का नाटक रच दिया जाता है।

मुमकिन है मेगा इवेंट

मुमकिन है कुछ सालों में कोई कारपोरेट या इवेंट मैनेजमेंट कंपनी होली के इवेंट का आयोजन करे। उस होली में शामिल होने के लिए लाखों-करोड़ों रूपए स्टार को दिए जाएं और बाद में किसी चैनल से उसका प्रसारण कर करोड़ों का मुनाफा बटोरा जाए। होली के रंग-गुलाल, त्योहार की मौज-मस्ती और उसमें फिल्म स्टारों के ठुमकों और मौजूदगी से पूरा कार्यक्रम रंगारंग हो जाएगा। ऐसे इवेंट के लिए अमिताभ बच्चन को 'रंग बरसे' परफार्म करने के लिए विशेष ऑफर दिया जा सकता है या रणबीर कपूर को लेकर आरके की होली रीक्रिएट की जा सकती है।

गजब था आरके का रंग

पिछली सदी तक ऐसी स्थिति नहीं थी। सदी के करवट लेने के बाद भी कुछ सालों तक फिल्म इंडस्ट्री में रंगों की पिचकारियां चलती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे उमंग और उत्साह ठंडा पड़ता गया। आज भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में होली की बात चलते ही सबसे पहले आरके की होली याद की जाती है। उन होलियों में शरीक रहे लोगों से बातें करें तो अनेक मजेदार किस्से सुनने को मिलते हैं। राज कपूर अपनी देखरेख में सारी व्यवस्था करते थे। होली के लिए एक स्थायी हौज आरके में बना हुआ था। उसमें रंग घुला रहता था। मस्ती तो माहौल में रहती थी। बताते हैं कि सुबह ग्यारह बजे से अपराह्न चार बजे तक होली चलती थी। राज कपूर खुद ढोलक लेकर बैठ जाते थे। शंकर जयकिशन अपने बैंड के साथ मौजूद रहते थे। होली के फिल्मी और लोकगीतों से समां बंधा रहता था। राज कपूर को सितारा देवी का नृत्य बहुत पसंद था। कभी गोपीकृष्ण भी आ जाते थे। फिर तो शास्त्रीय नृत्य और बोलों की थाप से गुंजायमान आरके में उपस्थित सभी जन थिरकने लगते थे।

कहा तो यह भी जाता है कि यश चोपड़ा को 'रंग बरसे' का क्लासिक आइडिया यहीं से मिला था, जिसमें दो प्रेमी होली के बहाने अपने मन की भावनाओं को सार्वजनिक करने से नहीं हिचकते। एक और जानकारी मिली कि कपूर परिवार में बहुओं के आने के पहले तक अभिनेत्रियों को भी रंगों के हौज में डुबकी दिलवाई जाती थी। बेटों की शादी के बाद यह सिलसिला थम गया। लाज-लिहाज की वजह से राज कपूर भी थोड़ी कम मस्ती करने लगे थे। यह भ्रम है कि आरके की होली में खूब खानपान होता था। आरके की होली खेल चुके लोग बताते हैं कि चेंबूर के प्रसिद्ध मिष्ठान भंडार झामा से जलेबी, गुलाब जामुन और समोसे आते थे। झामा के गुलाब जामुन की खासियत थी कि अमिताभ बच्चन रहते तो जुहू में थे, लेकिन गुलाब जामुन चेंबूर के झामा से मंगवाते थे।

बिग बी की निराली होली

राज कपूर अस्वस्थ रहने लगे तो उन्होंने होली का आयोजन बंद कर दिया। इस बीच फिल्म इंडस्ट्री का केंद्र भी बदल चुका था। अमिताभ बच्चन की 'प्रतीक्षा' में होली की हुल्लड़ होने लगी। इंडस्ट्री के तमाम लोग प्रतीक्षा में निमंत्रित किए जाने की आस लगाए रहते थे। इरफान ने एक बार बताया था कि जब उन्हें प्रतीक्षा का निमंत्रण मिला था तो वे फूले नहीं समाए थे। यह हाल छोटे-बड़े सभी स्टारों का था। होली के इस आयोजन में अमिताभ बच्चन बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और उनकी मंडली की जमात जमी रहती थी। प्रतीक्षा की होली में पहला गैप मुंबई बम धमाकों के साल आया था। दूसरी बार सारी तैयारियां हो गई थीं कि पिता बच्चन को हर्ट अटैक हुआ और वे ब्रीच कैंडी अस्पताल में भरती हो गए।

खेमेबंदी का दौर

हालांकि इस दरम्यान नए शोमैन सुभाष घई और यश चोपड़ा ने भी होली का आयोजन किया, लेकिन वे आरके या प्रतीक्षा की मस्ती नहीं अपना या दोहरा सके। उनके आयोजन में निरंतरता भी नहीं रही। जोश में दो-तीन बार शाहरूख खान ने भी होली का आयोजन किया, लेकिन किंग खान की बादशाहत होली नहीं जमा सकी। यही वह दौर था जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गुट और ग्रुप तेजी से बन रहे थे। गिले-शिकवे भूल कर दुश्मनों को गले लगाने की बात तो दूर रही..अब तो दोस्तों से भी सुरक्षित दूरी बनाए रखने का रिवाज चल पड़ा था।

दशकों से फिल्म इंडस्ट्री के करीबी और यहां की गतिविधियों के जानकार तरण आदर्श के मुताबिक, ''इन दिनों ग्रुप बन गए हैं। पहले जैसा भाईचारा नहीं रहा। दूसरे मुझे लगता है कि सुरक्षा कारणों से भी होली जैसे सार्वजनिक आयोजन बंद हो गए। एक डर का माहौल समाज में है। उसका असर इंडस्ट्री में भी दिखता है।'' डर और अलगाव ने ही होली की सामाजिकता नहीं रहने दी। सभी अलग-थलग और निजी कामों में ज्यादा व्यस्त रहने लगे हैं। अब ग्रुप जमा भी होते हैं तो देर रात की पब पार्टियों के लिए। यहां तेज संगीत के साथ मदिरा छलकती है। पिछले दशक की बात करें तो एक तथ्य और नजर आता है कि फिल्म इंडस्ट्री को कोई सर्वमान्य स्टार नहीं रहा। खानों का त्रिकोण फिल्म इंडस्ट्री को कई खेमों में बांट चुका है।

रंगों की रस्म अदायगी

अमिताभ बच्चन ने पिता हरिवंश राय बच्चन की मृत्यु के बाद कभी होली का आयोजन नहीं किया। इस साल वे स्वयं बीमार हैं। होली के आयोजन आज भी छिटपुट रूप से होते हैं, लेकिन उनमें वह रंग, चमक, उल्लास और धमक नहीं है। उम्मीद है कि इस साल भी जावेद अख्तर और शबाना आजमी होली का प्रतीकात्मक आयोजन करेंगे। टीवी निर्माता अपने होली एपीसोड के लिए होली का रस्मी आयोजन कर लेते हैं। और फिल्म इंडस्ट्री की क्या बात करें ़ ़ ़अब तो फिल्मों से भी होली गायब हो गई है। पिछली बार विपुल शाह की फिल्म 'एक्शन रिप्ले' में ऐश्वर्या राय होली खेलती नजर आई थीं।

Friday, March 21, 2008

खेमों में बंटी फ़िल्म इंडस्ट्री, अब नहीं मनती होली

-अजय ब्रह्मात्मज
हर साल होली के मौके पर मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मिथक बन चुकी आरके स्टूडियो की होली याद की जाती है। उस जमाने में बच्चे रहे अनिल कपूर, ऋषि कपूर, रणधीर कपूर से बातें करें, तो आज भी उनकी आंखों में होली के रंगीन नजारे और धमाल दिखाई देने लगते हैं। कहते हैं, होली के दिन तब सारी फिल्म इंडस्ट्री सुबह से शाम तक आरके स्टूडियो में बैठी रहती थी। सुबह से शुरू हुए आयोजन में शाम तक रंग और भंग का दौर चलता रहता था। विविध प्रकार के व्यंजन भी बनते थे। वहां आर्टिस्ट के साथ तकनीशियन भी आते थे। कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। उस दिन की मौज-मस्ती में सभी बराबर के भागीदार होते थे। एक ओर शंकर-जयकिशन का लाइव बैंड रहता था, तो दूसरी ओर सितारा देवी और गोपी कृष्ण के शास्त्रीय नृत्य के साथ बाकी सितारों के फिल्मी ठुमके भी लगते थे। सभी दिल खोल कर नाचते-गाते थे। स्वयं राजकपूर होली के रंग और उमंग की व्यवस्था करते थे। दरअसल, हिंदी सिनेमा के पहले शोमैन राजकपूर जब तक ऐक्टिव रहे, तब तक आरके स्टूडियो की होली ही फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रंगीन और हसीन होली बनी रही। उन दिनों स्टार के रूप में दिलीप कुमार और देव आनंद भी राजकपूर की तरह ही पॉपुलर थे और फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें वैसा ही सम्मान प्राप्त था, लेकिन वे दोनों राजकपूर की तरह सामाजिक और दोस्तबाज नहीं थे। यही कारण था कि राजकपूर इंडस्ट्री की सोशल गतिविधियों का केंद्र हमेशा बने रहे। उन्होंने अपनी इस हैसियत को खूब एंज्वॉय भी किया।
राजकपूर के निधन के बाद उनके बेटों ने कुछ वर्षो तक होली की वह परंपरा जरूर बनाए रखी, लेकिन धीरे-धीरे आरके आरके स्टूडियो की होली में फिल्म इंडस्ट्री के लोगों की संख्या कम होने लगी। दरअसल, महसूस यह किया गया कि होली तो होती है, लेकिन राजकपूर वाली गर्मजोशी और स्नेह नदारद रहती है। फिर यश चोपड़ा और सुभाष घई सरीखे स्वघोषित शोमैन अपनी फिल्मों की कामयाबी के साथ होली का आयोजन करने जैसे शगूफे भी जरूरी मान बैठे। यश चोपड़ा और सुभाष घई भी होली का आयोजन करने लगे। चढ़ते सूरज को प्रणाम करने में यकीन रखनेवाली इंडस्ट्री ने रुख बदल लिया। अब उन्हें अचानक आरके स्टूडियो काफी दूर लगने लगा!
इसी बीच अमिताभ बच्चन एक बड़े स्टार के रूप में उभरे। उनका संबंध इलाहाबाद से था और उनकी फिल्म का एक गीत रंग बरसे भीगे चुनरवाली.. काफी चर्चित और लोकप्रिय होली गीत हो चुका था। यही वजह है कि होली का संबंध सहज ही अमिताभ बच्चन से जुड़ गया। अमिताभ बच्चन के आवास प्रतीक्षा में होली के दिन भीड़ बढ़ने लगी। एक दौर ऐसा भी आया, जब देखा जाने लगा कि इस बार किस-किस को बच्चन जी ने बुलाया है! अगर निमंत्रण नहीं मिला है, तो यह मान लिया जाता था कि अभी आप इंडस्ट्री में किसी मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं या फिर आपका वक्त निकल गया। ऐसे ही कयासों और उपेक्षाओं से खेमेबाजी आरंभ हुई। जाहिर-सी बात थी कि जिन्हें प्रतीक्षा से निमंत्रण नहीं मिलता था, वैसे लोगों का खेमा धीरे-धीरे ऐक्टिव हो गया। हालांकि और किसी की होली में न तो भीड़ जुटती थी और न ही कोई खबर बन पाती थी, क्योंकि सारे स्टारों की जमघट प्रतीक्षा में ही लगती थी। इस तरह लंबे समय तक प्रतीक्षा में होली की रंगीन फुहारें और गीतों की गूंज छाई रही, लेकिन यह सिलसिला अमिताभ बच्चन के पिता कवि हरिवंश राय बच्चन के निधन के साथ टूट गया। उसके बाद से बच्चन परिवार अभी तक खुद को संभाल नहीं पाया है। पिछले साल उनकी माता तेजी बच्चन के निधन होने की वजह से होली के आयोजन का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि बीच में एक बार शाहरुख खान ने अवश्य अपने पुराने बंगले के टेरेस पर होली का आयोजन किया, तो लोगों ने यह मान लिया था कि अब होली का नया सेंटर शाहरुख खान का बंगला होगा, लेकिन उन्होंने अगले साल आयोजन नहीं किया और खुद दूसरों की होली में दिखे। हां, यहां यह याद दिलाना आवश्यक होगा कि सेटेलाइट चैनलों के आगमन और सीरियल के बढ़ते प्रसार के दिनों में सीरियल निर्माताओं ने अपनी यूनिट के लिए होली का आयोजन आरंभ किया। इस प्रकार की होली चुपके से होली के पहले ही होली के दृश्य जोड़ने के काम आने लगी। होली ने कृत्रिम रूप ले लिया। अभी फिल्म इंडस्ट्री घोषित-अघोषित तरीके से इतने खेमों में बंट गई है कि किसी ऐसी होली के आयोजन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती, जहां सभी एकत्रित हों और बगैर किसी वैमनस्य के होली के रंगों में सराबोर हो सकें!