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Tuesday, February 18, 2020

सिनेमालोक : आरके स्टुडियो का संताप


सिनेमा स्टुडियो का संताप
-अजय ब्रह्मात्मज
69 की उम्र में मेरी चिता सज गई थी. उसके दो सालों के बाद मेरे वारिसों ने मुझे किसी और के हवाले कर दिया. इसके एवज में उन्हें कुछ पैसे मिल गए. देश और मुंबई शहर के एक बड़े बिल्डर ने मुझे खरीद लिया. अभी पिछले शनिवार यानी 15 फरवरी को उस बिल्डर ने एक विज्ञापन के जरिये मेरे बारे में आप सभी को बताया. मेरी सज-धज चल रही है. कायाकल्प हो गया है मेरा. कभी जहां राज कपूर,उनकी नायिकाएं, उनके दोस्तों और फिल्म बिरादरी के दूसरे सदस्यों के ठहाके गूंजा करते थे. बैठकी लगती थी. बोल लिखे जाते थे. धुनें सजती थीं. रात-रात भर शूटिंग होती थी. पार्टियाँ चलती थीं. फिल्मकारों के सपने साकार होते थे. जल्द ही वहां तीन-चार कमरों के आलीशान अपार्टमेंट रोशन हो जाएंगे. धड़कने वहां भी होंगी, लेकिन उनमें वे किस्से और कहकहे नहीं होंगे. आह नहीं होगी.वाह नहीं होगी.
जी आपने सही समझा मैं आर के स्टुडियो हूँ. मैं अपने बारे में आप सभी को बताना चाहता हूं. मैं राज कपूर का ख्वाब था. पहली फिल्म के निर्माण और निर्देशन के समय ही आप सभी के राजू ने मेरे बारे में सोचा था. अपनी पीढ़ी का वह अकेला नायक था,जो ऐसा कुछ सोच रहा था. उसके समकालीन दिलीप कुमार और देव आनंद ने मुझ जैसी इबारत के बारे में नहीं सोचा. मेरे आका राज कपूर की फिल्म ’बरसात’ की लोकप्रियता ने उन्हें इतना संपन्न किया कि उन्होंने मेरी ताबीर की. उन्होंने मुंबई शहर की गहमागहमी से दूर चेंबूर में मेरा ठिकाना बनाया. 2.2 एकड़ जमीन ली और अपना सुप्रसिद्ध कॉटेज बनाया. स्टुडियो फ्लोर बने और फिर शुरू हुआ सपनों के आकार लेने का सफर. नरगिस, वैजयंती माला, निम्मी, सिमी ग्रेवाल, जीनत अमान, डिंपल कपाड़िया, पद्मिनी कोल्हापुरे, मंदाकिनी और जेबा बख्तियार जैसी अभिनेत्रियों की चहचहाहट सुनी थी मैंने. उनकी हंसी मेरे पेड़ों, दीवारों और अहाते में पैबस्त थीं. अब भी वह हंसी बिखरी है अगर कोई सुन सके.
राज कपूर ने 1948 से मेरी स्थापना की. उसके बाद अपनी हर फिल्म की शूटिंग यहीं की. देव आनंद ने भी ‘नवकेतन’ कंपनी बनाई थी, लेकिन उनकी फिल्में मुंबई की सड़कों पर शूट होती थीं. एक तो उनकी जेब तंग थी और दूसरे उनकी फिल्मों की कहानियां ऐसी होती थीं. राज कपूर का ख्याल और ख्वाब सचमुच सपनीले थे. उन्हें सेट बनाकर ही फिल्मों में लाया जा सकता था. अजीब चितेरा था मेरा आरके. आपने मेरे आंगन में शूट किए गए उनकी फिल्मों के गाने देखे होंगे. यह उनकी और उनके कला निर्देशकों की कल्पना थी कि ऐसे गानों के बारे में सोचा गया. उन्होंने आठवें और नौवें दशक में आरके की फिल्मों का प्रोडक्शन कम होने पर दूसरे निर्माताओं को भी आरके स्टूडियो में शूटिंग का निमंत्रण दिया.
2017 में लगी आग एक तरह से मेरी चिता ही थी. उसमें सब कुछ स्वाहा हो गया. फ्लोरर जला. उस कमरे में आग लग गई, जहां राज कपूर की फिल्मों में इस्तेमाल की गई चीजें यादों के लिए रखी गई थीं. कहें कि यादें ही धू-धू हो गयीं.थी उनकी संतानों को फुर्सत नहीं थी कि पिता के सपनों के स्टूडियो को सुरक्षित और आबाद रखें. वे अपने कैरियर और परिवारों में उलझे रहे और मुझे दूहते रहें. उन्हें मुझसे हो रही कमाई से मतलब था. उन्होंने मेरी साफ-सफाई और रख-रखाव पर ध्यान दिया होता तो मैं आज भी धड़क रहा होता. फिल्मों की गतिविधियां भीबाद में  मुंबई शहर के पश्चिमी उपनगर में शिफ्ट हो गई थीं. कलाकार भी उधर रहने लगे थे तो कोई मुझसे मिलने नहीं आता था. कभी कोई भूला-भटका पहुंच जाता था तो मुझे चूमता और मेरे मालिक को याद करता था.
मेरे खरीदारों ने वादा किया है कि मेरी याद और शिनाख्त के लिए वे मुख्य द्वार को वैसे ही रखेंगे. ‘बरसात; फिल्म से प्रेरित लोगो बचा रहेगा, लेकिन आरके फिल्म्स एंड स्टुडियो से से सिर्फ स्टुडियो शब्द बचा रहेगा. यह स्टुडियो फिल्मों के लिए नहीं... उन लग्जरी अपार्टमेंट्स के लिए इस्तेमाल होगा जो अगले कुछ महीनों में यहाँ आबाद होगा. 20-25 सालों के बाद मेरे आंगन में जवान और प्रौढ़ हुए बच्चे बताएंगे कि वे जहां रहते हैं, वहां कभी फिल्मों का दीवाना और शोमैन राज कपूर रहा करता था. वह फिल्में बनाता था और गाता था ‘जीना यहां. मरना यहां. इसके सिवा जाना कहां?’ मुमकिन होगा तो रहिवासी और प्रेमी खोजेंगे  कि राज कपूर अब कहां हैं?


Tuesday, February 11, 2020

सिनेमालोक : कोरियाई सिनेमा के 100वें साल में पैरासाइट का रिकॉर्ड


सिनेमालोक
कोरियाई सिनेमा के 100वें साल में पैरासाइट का रिकॉर्ड 
-अजय ब्रह्मात्मज
कल 52 में एकेडमी का अवार्ड का सीधा प्रसारण था. दुनिया के सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित अवार्ड पर सभी फिल्मप्रेमियों की निगाहें लगी रहती हैं. एकेडमी अवार्ड मिलना गौरव की बात मानी जाती है. यह ऐसी पहचान है, जिसे विजेता तमगे की तरह पहनते और घर दफ्तर में सजाते हैं. इस अवार्ड के नामांकन सूची में आ जाना भी गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरना माना जाता है. मुख्य रूप से अमेरिका में बनी अंग्रेजी फ़िल्में ही पुरस्कारों की होड़ में रहती हैं. गैरअंग्रेज़ी फिल्मों के लिए विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी है. हॉलीवुड के नाम पर दुनिया भर में वितरित हो रही मसालेदार फिल्मों से अलग सिनेमाई गुणों से भरपूर ऐसी फिल्मों का स्वाद सुकून, शांति और विरेचन देता है. फिल्मप्रेमी एकेडमी अवार्ड से सम्मानित फिल्मों के फेस्टिवल करते हैं. टीवी चैनलों पर इनके विशेष प्रसारण होते हैं. ग्लोबल दुनिया में भारत के फिल्मप्रेमियों की जिज्ञासा भी ऑस्कर से जुड़ गई हैं.
इस साल कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ को चार ऑस्कर मिले हैं. सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म और सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा के लिए मिले पुरस्कारों के साथ ‘पैरासाइट’ ने एकेडमी अवार्ड का नया रिकॉर्ड स्थापित किया है. दक्षिण कोरिया की किसी फिल्म को पहली बार पुरस्कृत पहचान मिली है पिछले साल कान फिल्म फेस्टिवल में श्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिलने के बाद से ‘पैरासाइट’ देश-विदेश में अपने सीमित प्रदर्शनों से ही व्यापक चर्चा पा रही है. भारत में थियेटर में रिलीज हुई यह पहली कोरियाई फिल्म है. बड़े शहरों में अभी तक फिल्म के शो चल रहे हैं. भारत में ‘पैरासाइट’ के वितरक इंपैक्ट्स को चाहिए कि वे इसे कस्बों और छोटे शहरों तक ले जाएं.
‘पैरासाइट’ पूंजीवादी देश में असामान विकास से प्रभावित दो परिवारों की कहानी है. पार्क संपन्न परिवार है और किम विपन्न परिवार है. अगर मुंबई का उदाहरण लें तो कह सकते हैं कि किम परिवार धारावी जैसे इलाके में रहता है और पार्क परिवार कोलाबा या मालाबार हिल में.  दोनों परिवारों के घरों में बोंग जून हो का कैमरा प्रवेश करता है. एक ही शहर में आर्थिक भिन्नता की वजह से दो किस्मों और तरीके से जी रहे परिवारों की यह कहानी मिलती और टकराती है. इस मिलन और टकराहट में विसंगतियां उभर कर दिखती हैं. एक परिवार के लिए बारिश आनंद की चीज है तो दूसरे परिवार के लिए यह भारी तबाही लेकर आती है. देश के अनेक शहरों में मालदार और मलिन बस्तियों में मौसम के असर को हम देखते रहे हैं. बोंग जून हो ने कोरिया में सार्थक दृश्यबंधों,संवादों और चरित्रों के जरिए संपन्नता और विकास की विडंबना को उकेरा है.
इस साल ऑस्कर में 4 पुरस्कारों से के साथ बोंग जून हो ने कोरिया के लिए प्रतिष्ठित सम्मान हासिल किया है. यह साल कोरियाई सिनेमा का सौवां साल है. बोंग जून हो ने अपने इंटरव्यू में बार-बार कहा कि मेरे लिए यग सुंदर संयोग है कि मेरी फिल्म कोरियाई सिनेमा के सौवें साल के मौके पर इंटरनेशनल पहचान बना रही है. फिल्म लिखते और बनाते समय मेरे दिमाग में ऐसी कोई बात नहीं थी, लेकिन यह सुखद संयोग खुशी दे रहा है. आप गौर करेंगे कि बोंग जून हो अपने इंटरव्यू और इंटरेक्शन में मुख्य रूप से कोरियाई भाषा का प्रयोग करते हैं. वे अपनी बात रखने में सफल रहते हैं. भारतीय और खासकर हिंदी फिल्मकारों के लिए यह एक सबक हो सकता है. हम सभी जानते हैं कि विदेश तो क्या देश में ही हिंदी फिल्मकार हिंदी बोलने से परहेज करते हैं. उनकी फिल्मों के पोस्टर तक हिंदी में नहीं आते.
फिलहाल हम यह सपना संजो सकते हैं कि जल्दी ही कोई भारतीय फिल्मकार भी बोंग जून हो की तरह एकेडमी अवार्ड हासिल कर देश की फिल्म निर्माण की समृद्ध परंपरा को इंटरनेशनल पहचान दिलाएगा. भारतीय फिल्मकार 21वीं सदी में नए प्रयोग कर रहे हैं और क्रिएटिव आकाश का विस्तार कर रहे हैं.


Tuesday, February 4, 2020

सिनेमालोक : दिखता नहीं है सच


सिनेमालोक
दिखता नहीं है सच 
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों की राजधानी मुंबई से निकलने और देश के सुदूर शहरों के दर्शकों पाठकों से मिलने के रोचक अनुभव होते हैं. उनके सवाल जिज्ञासाओं अनुभवों को सुनना और समझना मजेदार होता है. जानकारी मिलती है कि वास्तव में दर्शक क्या देख, सोच और समझ रहे हैं? हिंदी फिल्मों की जानकारियां मुंबई में गढ़ी जाती हैं.मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए यह जानकारियां दर्शकों तक पहुंचती हैं और देखी पढ़ी-जाती हैं. उनसे ही सितारों के बारे में दर्शकों के धारणाएं बनती और बिगड़ती हैं.
पिछले दिनों गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में जाने का मौका मिला..एक छोटे से इंटरएक्टिव सेशन में फिल्म इंडस्ट्री की कार्यशैली और उन धारणाओं पर बातें हुईं. कुछ लोग मानते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और उसके सितारों के बारे में कायम रहस्य सोशल मीडिया और मीडिया के विस्फोट के दौर में टूटा है. फिल्मप्रेमी दर्शक और पाठक अपने सितारों के बारे में ज्यादा जानने लगे हैं. सच कहूं तो यह भ्रम है कि हम मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए सितारों के जीवन में झांकने लगे हैं. वास्तव में ऐसा नहीं है. एयरपोर्ट लुक से लेकर तमाम गतिविधियों की आ रही स्थिर और चलती-फिरती तस्वीरें सुनियोजित होती हैं. भारत में 'पापाराजी' भी साध लिए गए हैं. उन्हें पहले से बता दिया जाता है कि फलां समय पर फलां सितारा फलां जगह पर होगा. और फिर हमें एक ही किस्म की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती मिलती हैं.

हिंदी फिल्म सितारों की एक्सक्लूसिव और चौंकाने वाली तस्वीरें अमूमन विदेशों से आती रही हैं. वह भी किसी फैन की तस्वीर होती है. रणबीर कपूर और कट्री कैफ के समुद्र तट की तस्वीरें हों या रणबीर कपूर-माहिरा खान के धूम्रपान करती तस्वीरें.. प्रियंका चोपड़ा की ड्रेस सेंस की तस्वीरें विदेशों से टपकती रहती है. भारत में केवल वही तस्वीरें आती हैं, जो सितारों और उनके पीआर की रजामंदी से जारी की जाती हैं. अगर किसी फोटोग्राफर ने अनचाही तस्वीरें उतारीं तो उसे सावधान कर दिया जाता है. चेतावनी दी जाती है कि अगली बार से उसे किसी इवेंट और दूसरों पर नहीं बुलाया जाएगा.
रही बात इंस्टाग्राम और ट्विटर के जरिए मिल रही जानकारी की तो आप चंद सितारों को छोड़ के अलावा ज्यादातर एक पैटर्न में सक्रिय होते हैं. फिल्मों की रिलीज के समय या ऐसे ही किसी खास अवसर पर वे एक्टिव हो जाते हैं. दरअसल वे अपनी आगामी फिल्म के लिए दर्शक जुटा रहे होते हैं. शोर मचा रहे होते हैं. हां कुछ सितारे सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव हैं. इनकी दो श्रेणियां हैं. एक तो वे हैं, जो सोशल और पॉलिटिकल कंसर्न के तहत विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करते हैं. इनके अलावा कुछ सिर्फ अपने बारे में बता रहे होते हैं. उनका मूल प्रयास इमेज बिल्डिंग ही रहता है. अब जैसे कि आलिया भट्ट ने यूट्यूब चैनल आरंभ किया है. सितारे अपनी छुट्टियों और यात्राओं की तस्वीरें शेयर कर प्रशंसकों को खुश करते हैं.
.फिल्म पत्रकारिता का स्वरूप लगातार बदलता रहता है. अच्छे बुरे की बात ना करते हुए गौर करें तो अभी फिल्मों से अधिक सितारों की जीवनशैली, अपीयरेंस और लुक पर बातें होती हैं. केवल फिल्मों की रिलीज के समय फिल्मों पर रूटीन सवालों के जवाब देते समय वे फिल्म से संबंधित जानकारी देते हैं. सच्ची बात है कि फिल्म पत्रकारिता खुद के ही भंवरजाल में फंस चुकी है. सभी एक दूसरे की नकल कर रहे हैं और लगातार फिसल रहे हैं. संपादकों और मालिकों की तरफ से पत्रकारों को कुछ नया करने की छूट नहीं मिलती. अपवाद स्वरूप ही कभी-कभी किसी हिंदी अखबार में कुछ दिखता है. अंग्रेजी अखबारों में नए प्रयोग दिखते रहते हैं. हिंदी मीडिया अपनी ही बनाई लकीर को रौंदती रहती है. पारंपरिक मीडिया से इतर यूट्यूब और सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफार्म पर एक्टिव फिल्मप्रेमी अवश्य कुछ अलग और कभी-कभी बेहतरीन काम करते नजर आते हैं.
मीडिया के डिजिटल होने के साथ अभी तेजी से बिखराव दिख रहा है. इसी बिखराव से कुछ नया आकार लेगा और आने वाले सालों में फिल्म और सितारों के कवरेज का स्वरूप बदलेगा..