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मीना कुमारी : एक स्थगित आत्मस्वीकृति

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प्रियंवद का यह लेख पाखी में छपा था। चवन्‍नी के पाठकों के लिए यहां पोस्‍ट कर रहा हूं।मीना कुमारी को थोड़े अलग तरीके से देखा है उन्‍होंने।  -प्रियंवद


बी. ए. में अंग्रेजी साहित्य पढ़ते हुए तीन या चार साल बड़ी और बेहद सुंदर अध्यापिका ने प्रेम के विभिन्न स्तरों को व्यक्त करने वाले तीन शब्दों का महीन फर्क और सर्तक प्रयोग सिखाया था। ‘लव’, ‘डोट’ और ‘एडोर’। जीवन में ‘एडोर’ का प्रयोग अब तक एक ही बार किया था।

संभवतः सत्तर के दशक के शुरुआती सालों के दिन थे। हमारे हाथ एक नया एल.पी. (बड़ा रिकार्ड) लगा था, ‘आइ राइट आइ रिसाइट’। इसमें मीना कुमारी की गजलें और नज्में उनकी अपनी ही आवाज में थीं। इसे सुनने की तैयारी की गई। तैयारी मामूली नहीं थी। न ही उत्तेजना और उत्सुकता। रिकार्ड प्लेयर का इंतजाम किया गया। रात गिरने तक सारे काम खत्म कर लिए गए थे। एक छोटे कमरे की बाहर की तीन सीढि़यों पर हम बैठे थे। मैं, मित्र और उसकी तीन बहनें। बारिश खत्म ही हुई थी। नींबू के पेड़ की गंध अभी बची हुई थी। हममें से कुछ सीढि़यों पर थे, कुछ बाहर की खुली जगह पर। कमरे के अंदर रिकार्ड प्लेयर रखा …