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Friday, March 16, 2018

फिल्‍म समीक्षा : रेड



फिल्‍म समीक्षा
हिंदी समाज की बुनावट के चरित्रों की कहानी
रेड
-अजय ब्रह्मात्‍मज
रितेश शाह की लिखी स्क्रिप्‍ट पर राज कुमार गुप्‍ता निर्देशित फिल्‍म ‘रेड’ के नायक अजय देवगन हैं। मुंबई में बन रही हिंदी फिल्‍मों में हिंदी समाज नदारद रहता है। रितेश और राज ने ‘रेड’ को लखनऊ की कथाभूमि दी है। उन्‍होंने लखनऊ के एक दबंग नेता के परिवार की हवेली में प्रवेश किया है। वहां की पारिवारिक सरंचना में परिवार के सदस्‍यों के परस्‍पर संबंधों के साथ उनकी समानांतर लालसा भी देखी जा सकती है। जब काला धन और छिपी संपत्ति उद्घाटित होती है तो उनके स्‍वार्थों का भेद खुलता है। पता चलता है कि संयुक्‍त परिवार की आड़ में सभी निजी संपत्ति बटोर रहे थे। घर के बेईमान मुखिया तक को खबर नहीं कि उसके घर में ही उसके दुश्‍मन और भेदी मौजूद हैं।
इस फिल्‍म के मुख्‍य द्वंद्व के बारे में कुछ लिखने के पहले यह गौर करना जरूरी है कि हिंदी फिल्‍मों में उत्‍तर भारत के खल चरित्रों को इस विस्‍तार और बारीकी के साथ कम ही पर्दे पर उतारा गया है। प्रकाश झा की फिल्‍मों में सामंती प्रवृति के ऐसे नेता दिखते हैं,जो राजनीति के शतरंज में हर चाल के अपने मोहरों के साथ मौजूद रहते हैं। डीएम,सीएम और पीएम तक उनकी डायरेक्‍ट पैठ होती है। वे सरकार गिराने की राजनीतिक ताकत रखते हैं1 उसी के दम पर वे अपना प्रभाव और वर्चस्‍व कायम करते हैं। उनकी समानांतर सत्‍ता चलती रहती है। उत्‍तर भारत के ऐसे बाहुबलियों के किस्‍से हम जानते हैं। फिल्‍मों में दिखाते समय लेखक और फिल्‍मकार उनसे बचते हैं। विस्‍तार में नहीं जाते हैं। उन्‍हें उनके व्‍यवहार प्रचलित फिल्‍मी व्‍याकरण का उल्‍लंघन करते दिखते हैं। ऐसे चरित्रों के चित्रण और निर्वाह में हिंदी फिल्‍मों के फिल्‍मकार जानकारी और समझ के अभाव में घिसे-पिटे फार्मूले का इस्‍तेमाल करते हैं। खल चरित्रों को विदूषक बना देते हैं। यह खतरा इस फिल्‍म में भी रहा है,लेकिन राज कुमार गुप्‍ता बच गए हैं। उन्‍होंने रामेश्‍वर सिंह के किरदार को अंकुश में रखा है। उन्‍हें रितेश शाह से लेखकीय मदद मिली है।
’रेड’ एक ईमानदार आयकर अधिकारी और बेईमान नेता के भिडंत की फार्मूलाबद्ध कहानी है। दर्शकों को मालूम है कि अंत में ईमानदार की विजय होनी है,लेकिन उस विजय के पहले की घटनाएं ही तो रोचक होती हैं। रितेश शाह ने किसी एक अधिकारी को अपना नायक नहीं बनाया है। यह बॉयोपिक नहीं है। यह अनेक हिम्‍मती ईमानदार अधिकारियों की सामूहिक कथा है,जिनका प्रतिनिधित्‍व अमय पटनायक कर रहा है। ठीक ऐसे ही रामेश्‍वर सिंह किसी एक व्‍यक्ति से प्रेरित चरित्र नहीं है। वह सत्‍ता के ठेकेदार बने नेताओं की नुमाइंदगी कर रहा है। इस फिल्‍म को देखते समय निजी तौर पर वंचित या अभावग्रस्‍त दर्शकों को आत्मिक और प्रतीकात्‍मक खुशी होती है कि बेईमान को उसके किए की सजा मिलेगी और ईमानदार की जीत होगी। ऐसी फिल्‍में दर्शकों का विरेचन करती हैं। साधारण होने के बावजूद ‘रेड’ जैसी फिल्‍में आज के भारतीय समाज में संतोष और उम्‍मीद का कारण बनती हैं। हमें ऐसी फिल्‍मों की जरूरत है जो हिंदी समाज की मुश्किलों और दुविधाओं को उनकी प्रकृति के साथ पर्दे पर ले आएं। अच्‍छी बात है कि रितेश शाह और राज कुमार गुप्‍ता इस कोशिश में सफल रहे हैं।
उनकी सफलता अजय देवगन और सौरभ शुक्‍ला पर निर्भर रही है। सहयोगी किरदारों में चुने गए कलाकारों का भी यथोचित योगदान रहा है। ईमानदार,हिम्‍मती,जिद्दी और धुनी व्‍यक्ति के रूप में पर्दे पर आते समय अजय देवगन एक अलग चाल और बॉडी लैाग्‍वेज अपनाते हैं। उनकी आवाज सम पर चलती है। ‘जख्‍म’ से उनमें ‘व्‍यक्तित्‍व की ईमानदारी’ की स्‍पष्‍टता का निखार आया है,लेकिन यह शेड उनकी पहली फिल्‍म  से ही देखा जा सकता है। अमय पटनायक को वे सिंघम नहीं होने देते। सामान्‍य व्‍यक्ति की तरह उन्‍हें भी अपनी बीवी और सहयोगियों की चिंता होती है। वे खुद की सुरक्षा के लिए ‘कॉमन सेंस’ का इस्‍तेमाल करते हैं कि दरवाजे के सामने अवरोध लगा दो। अमय पटनायक अकेले दम सभी पर भारी पड़ने वाला हीरो नहीं है। कानून के संबल से सिस्‍टम से मिली सुविधाओं का इस्‍तेमाल करते हुए वह नैतिक बना रहता है। फिल्‍म में पता चलता है कि वह नास्तिक है। सचमुच,नास्तिक ज्‍यादा ईमानदार होते हैं। रामेश्‍वर सिंह के रूप में सौरभ शुक्‍ला ने उत्‍तर भारत के दबंग नेता का चरित्र अच्‍छी तरह निभाया है। वह अपने वर्चस्‍व और प्रभाव का उपयोग करना जानता है। अनपढ़ होने की वजह से शायद वह मंत्री नहीं बन सका है,लेकिन वह अपनी दबंगई मैडम प्रधानमंत्री के सामने भी जाहिर करने से नहीं हिचकता। उत्‍त्‍र भारत के इस कनेक्‍शन तंत्र को समझने पर ही रामेश्‍वर सिंह के अहंकार और शान को समझा जा सकता है। दादी अम्‍मा के रूप में पुष्‍पा जोशी और लल्‍लन सुधीर के किरदार में अमित स्‍याल प्रभावित करते हैं। मुक्‍ता यादव की भूमिका कर रही अभिनेत्री का आत्‍मविश्‍वास उल्‍लेखनीय है। अमय पटनायक की टीम और रामेश्‍वर सिंह के परिवार के अनेक किरदार दो-चार दृश्‍यों के बावजूद याद रहते हैं।
इस फिल्‍म का गीत-संगीत बहुत खटकता है। लखनऊ की पृष्‍ठभूमि में गैरपंजाबी किरदारों के लिए पंजाबी गानों का चयन अनुचित है। लखनऊ की समृद्ध संगीत परंपा का कोई देशी या लोकगीत भी रखा जा सकता था। दो पंजाबी गीत कानों और दृश्‍यों में खटकते हैं। बाकी दो गीत थीम में फिल्‍म के अनुरूप होने के बावजूद सरल और श्रवणीय नहीं हैं। निश्चित ही निर्माताओं के दबाव में अतिरिक्‍त कमाई के लिए ‘हंसुआ के बियाह में खुरपी के गीत’ की तरह इन्‍हें जोड़ दिया गया है।
पुन:श्‍च : रितेश शाह ने फिल्‍म के एक दृश्‍य में ‘धर्मयुग’ पत्रिका दिखाई है,जिसमें फिल्‍म के नायक अमय पटनायक की कवर स्‍टोरी है। कितनी हिंदी फिल्‍मों में हिंदी पत्रिकाएं दिखती हैं? यह सराहनीय सांस्‍कृतिक प्रतीक है। इसके साथ ही नायक-नायिका के अंतरंग पलों में ईमानदारी की बात चलने पर नायक मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ की याद दिलाता है और बताता है कि साल्‍ट इंस्‍पेक्‍टर ने तो कोई ईमानदारी की कसम भी नहीं खाई थी,जबकि आयकर अधिकारी ऐसी सौगंध लेते हैं। फिल्‍म के आरंभ में कौटिल्‍य की उक्त्‍िा है ‘कोष मूलो दंड’ यानी राज्‍य के लिए सेना से बड़ा है खजाना। क्‍योंकि धन है जन कल्‍याण की मुख्‍य आवश्‍यकता।
इस फिल्‍म के दृश्‍यों में अनेक मध्‍यवर्गीय प्रसंग हैं। फिल्‍म के प्रभाव को बढ़ाने में उनसे अप्रत्‍यक्ष मदद मिलती है।

Saturday, October 21, 2017

फिल्‍म समीक्षा : गोलमाल अगेन



फिल्‍म रिव्‍यू
गोलमान अगेन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस फिल्‍म में तब्‍बू अहम भूमिका में हैं। उनके पास आत्‍माओं को देख सकती हैं। उनकी समस्‍याओं का निदान भी रहता है। जैसे कि एक पिता के बेटी के पास सारे अनभेजे पत्र भेज कर वह उसे बता देती हैं कि पिता ने उसके इंटर-रेलीजन मैरिज को स्‍वीकार कर लिया है। तब्‍बू गोलमाल अगेन की आत्‍मा को भी देख लेती हैं। चौथी बार सामने आने पर वह कहती और दोहराती हैं कि गॉड की मर्जी हो तो लॉजिक नहीं,मैजिक चलता है। बस रोहित शेट्टीी का मैजिक देखते रहिए। उनकी यह सीरीज दर्शकों के अंधविश्‍वास पर चल रही है। फिल्‍म में बिल्‍कुल सही कहा गया है कि अंधविश्‍वास से बड़ा कोई विश्‍वास नहीं होता।
फिर से गोपाल,माधव,लक्ष्‍मण 1,लक्ष्‍मण2 और लकी की भूमिकाओं में अजय देवगन,अरशद वारसी,श्रेयस तलपडे,कुणाल ख्‍येमू और तुषार कपूर आए हैं। इनके बीच इस बार परिणीति चोपड़ा हैं। साथ में तब्‍बू भी हैं। 6ठे,7वें और 8वें कलाकार के रूप संजय मिश्रा,मुकेश तिवारी और जॉनी लीवर हैं। दस कलाकारों दस-दस मिनट (हीरो अजय देवगन को 20 मिनट) देने और पांच गानों के फिल्‍मांकन में ही फिल्‍म लगभग पूरी हो जाती है। बाकी कसर नाना पाटेकर के सवाद और बाद में स्‍वयं ही आ जाने से पूरी हो जाती है। आप प्‍लीज लॉजिक न देखें। रोहित शेट्टी का मैजिक देखें कि कैसे वे बगेर ठोस कहानी के भी ढाई घंटे तक दर्शकों को उलझाए रख सकते हैं। फिल्‍म खत्‍म होने पर दर्शक नाखुश नहीं होते। पर्दे पर चल रहे जादू से संतुष्‍ट होकर निकलते हैं।
रोहित शेट्टी ने चौथी बार गोलमाल अगेन में लोकेशन और कलाकारों की ताजगी जोड़ी है। समय और उम्र के साथ उनके लतीफे और हास्‍यास्‍पद सीन भी पहले से बेहतर हुए हैं। उनमें फूहड़ता नहीं हैं। रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में द्विअर्थी संवाद यों भी नहीं होते। गोलमाल अगेन बच्‍चों और बड़ हो चुके दर्शकों में मचल रहे बच्‍चों को पसंद आएगी। यह उनके लिए ही है। बस,कुणाल ख्‍येमू,श्रेयस तलपड़े और तुषार कपूर जवान होने की वजह से ऊलजलूल हरकतों में भी जंचते हैं। अजय देवगन,अरशद वारसी और तब्‍बू को बचकानी हरकतें करते देखना कई दृश्‍यों में पचता नहीं है। पिछली फिल्‍मों और उनमें निभाए रोल से बनी उनकी छवि आड़े आ जाती है। और फिर रोहित शेट्टी अपने कलाकारों को नई भावभंगिताएं नहीं दे पाते। अजय देवगन की हथेली जब भी माथे से टकराती है तो कानों में आता माझी सटकली गूंजने लगता है। वैसे ही अरशद वारसी सर्किट की याद दिलाते रहते हैं।
नए लोकेशन से फिल्‍म में नयापन आ गया है। तब्‍बू और परिणीति चोपड़ा के आने और कहानी में भूत का एंगल होने से नए ट्विस्‍ट और टर्न भी देखने का मिलते हैं। परिणीति चोपड़ा के हिस्‍से में अधिक सीन और कॉस्‍ट्यूम चेंज नहीं हैं। तब्‍बू अपनी अदाकारी से फिल्‍म में मिसफिट नहीं लगतीं। यह उनकी खूबी है।
इस बार गाडि़यां नहीं उड़ी हैं। गीतसंगीत में कैची बोल या संगीत नहीं है। फिल्‍म में अजय देवगन और परिणीति चोपड़ा के बताएं संबंधों की वजह से उन पर फिल्‍मूाया रोमांटिक गाना बेमानी और अनुचित लगता है। फिल्‍म खत्‍म होने के बाद दिखाए गए फुटेज में भी कॉमेडी है। उन्‍हें जरूर देखें।
अवधि- 151 मिनट
*** तीन स्‍टार

Saturday, September 2, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बादशाहो

फिल्‍म रिव्‍यू
मसालों के बावजूद फीकी
बादशाहो
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍मों में लेखन कर रहे एक राजस्‍थानी मित्र ने बादशाहो का ट्रेलर देखते ही सोशल मीडिया में लिखा था कि राजस्‍थनी में हर का उच्‍चारण नहीं होता। भाषा के प्रति ऐसी लापरचाही बड़ी-छोटी फिल्‍मों में होती रहती है। फिल्‍म के सारे किरदार राजस्‍थान के हैं और किसी के लहजे में राजस्‍थानी उच्‍चारण नहीं है। अगर सभी लोकप्रिय भाषा ही बोलते तो क्‍या फर्क पड़ जाता?
बादशाहो राजस्‍थान में सुने-सुनाए प्रचलित किस्‍सों में से एक किस्‍सा पर आधारित है। यह सत्‍यापित नहीं है,लेकिन कहा जाता है कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी के इशारे पर फौज ने महारानी गायत्री देवी के किले पर छापा मारा था और बड़ी मात्रा में सोने-गहने ले गए थे। किसी को मालूम नहीं कि सच क्‍या है? फिर भी किलों में घमने आए गाइड और शहर के बाशिंदे इन किस्‍सों का दोहराते हैं। यह किस्‍सा मिलन लूथरिया ने भी सुन रखा था। कच्‍चे घागे की शूटिंग के दरम्‍यान सुना यह किस्‍सा उनके जहन से निकल ही नहीं पाया। अजय देवगन को भी उन्‍होंने यह किस्‍सा सुनाया था। इस बार जब दोनों साथ में काम करने के लिए राजी हुए तो फिर से किस्‍सा कौंधा। आखिरकार उस पर फिल्‍म बन गई।
किरदार बदल दिए गए। फिर भी कोशिश रही कि ओरिजिनल किरदारों और समय की झलक मिल जाए। फिल्‍म के शुरू में आया किरदार लुक और एटीट्यूड से संजय गांधी का प्रतिरूप लगता है तो गीतांजलि देवी में गायत्री देवी की झलक है। बाकी किरदार मिलन ने जोड़े हैं।
मिलन ने इसे एक एक्‍शन थिलर के रूप में पेश किया है। फिल्‍म में रिलेशनशिप और ड्रामा भी है। तात्‍पर्य यह कि एक्‍शन,थ्रिल,ड्रामा,कॉमेडी,आयटम सौंग,डॉयलॉगबाजी और सनी लियोनी से भरपूर बादशाहो हिदी मसाला फिल्‍मों की परंपरा में बनाई गई है। फिल्‍म इमरजेंसी के दौर की है। अखबार की सुर्खियों से बताया गया है कि देश में इमरजेंसी आ गई है। फिर हम संजीव और गीतांजलि को देखते हैं। संजीव दिवंगत राजा का शयन कक्ष देखने के बहाने उनके बेड रूम में आता है और गीतांजलि के साथ हमबिस्‍तर होना चाहता है। गीतांजलि नानी की तलवार खींच लेती है। यहां से ड्रामा शुरू होता है। अब संजीव किसी भी तरह गीतांजलि को बर्बाद करना चाहता है। उन्‍हें जेल भिजवा देता है और किले में छिपे-गड़े खजाने के लिए फौज भेज देता है।
रानी गीतांजलि पुराने भरोसेमंद आशिक भवानी सिंह(अजय देवगन) की मदद लेती है। उन्‍हें किसी भी सूरत में अपना खजाना चाहिए। उनकी एक सहायिका संजना(ण्‍षा गुप्‍ता) मदद के लिए भेज दी जाती है। भवानी सिंह दलिया(इमरान हाशमी) और टिकला(संजय मिश्रा) को अपने ग्रुप में शामिल करता है। इनका मकसद है कि सहर सिंह(विद्युत जामवाल) के कमांड में जा रे सोने-गहने से लदे ट्रक को लूट लें। फिल्‍म में चेज और एक्‍शन की गुजाइश बनती है। मिलन ने इस चेज में समय लगाया है। बीच में कई घटनाएं होती हैं। कुछ और किरदार आ जाते हैं। कुछ गाने भी हो जाते हैं। फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में एक ट्विस्‍ट है। वहां रिलेशनशिप के लेयर्स दिखते हैं। इन सबके बावजूद कहानी के अभाव में फिल्‍म बांध नहीं पाती। आठवें दशक का एहसास होता है,लेकिन गानों और संवाद में आज के बोल छलते और चुभते हैं।
रजत अरोड़ा हैं तो फिल्‍म में पंच लाइन से भरे संवाद हैं। इमरान हाशमी को फिर से तकियाकलाम दिया गया है। अजय देवगन समेत सभी कलाकारों के हिस्‍से में ढेर सारे संवाद हैं। कई बार तो लगता है कि संवाद के लिए ही दृश्‍य रचे गए हैं। संजय मिश्रा के वन लाइनर पर दर्शक खूब हंसते हैं। संजय मिश्रा अपनी फिल्‍मों में फिल्‍म के हीरो से ज्‍यादा आकर्षित करने लगे हैं। अगर ढंग का निर्देशक हो तो उनके इस आकर्षण का जबरदस्‍त फायदा उठा सकता है।
इस फिल्‍म के महिला किरदारों पर लेखक-निर्देशक ने अधिक ध्‍यान नहीं दिया है। एषा गुप्‍ता का किरदार और रोल तो एक और लड़की की जरूरत पूरी करने के लिए किया गया है।
अवधि- 136 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, September 1, 2017

रिलेशनशिप पर है ‘बादशाहो’-अजय देवगन



रिलेशनशिप पर है बादशाहो-अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजय देवगन एक से अधिक फिल्‍मों में सक्रिय हो गए हैं। शिवाय के निर्माण-निर्देशन में लगे समय की यह भरपाई तो नहीं है,लेकिन वे अभी थोड़ा फ्री महसूस कर रहे हैं। उन्‍होंने रोक रखी फिल्‍मों के लिए हां कहना शुरू कर दिया है। एक साथ कई फिल्‍में निर्माण के अलग-अलग स्‍टेज पर हैं। फिलहाल उनकी बादशाहो रिलीज हो रही है। मिलन लूथरिया के निर्देशन में बनी यह फिल्‍म पैसा वसूल मानी जा रही है।
- कैसे और कब सोची गई बादशाहो’?
0 हमलोग जब कच्‍चे घागे(1999) की राजस्‍थान में शूटिंग कर रहे थे,तब सभी एक किस्‍से की बातें करते थे। सरकार की कोशिशों के बावजूद सोना गायब हो गया था। जिसने भी सोना गायब किया,वह कभी मिला ही नहीं। यह बहुत ही रोचक किस्‍सा था।  हम ने तभी सोचा था कि कभी इस पर फिल्‍म बनाएंगे। अभी हमलोग साथ में फिल्‍म के बारे में सोच रहे थे तो मिलन लूथरिया  एक और कहानी लेकर आए थे। उसमें मजा नहीं आ रहा था तो मैंने इस किस्‍से की याद दिलाई। अच्‍छी एंटरटेनिंग और ड्रामा से भरपूर स्क्रिप्‍ट तैयार हो गई। इस तरह बादशाहो बनी।
- क्‍या यह सच्‍ची कहानी है?
0 पता नहीं कितना रियल है? वहां के लोग इसे सुनते-सुनाते हैं। सबूत पूछो तो किसी के पास कुछ दिखाने-बताने के लिए नहीं है। हम ने उस किस्‍से का इस्‍तेमाल नहीं किया। हम ने उस किस्‍से के इर्द-गिर्द किरदार खड़े किए। इस फिल्‍म में थ्रिल के साथ इमोशन,ड्रामा और रिलेशनशिप है। 
- बादशाहो में आप की क्‍या भूमिका है?
0 यह तो फिल्‍म में देखिए। यह राजस्‍थानी किरदार है। इसे बदमाश और हरामी कह सकते हैं। वह कैसे यह लूट प्‍लान करता है। उसे साने से लदा ट्रक गायब करना है। कैसे के साथ क्‍यों का भी चित्रण किया गया है। उस लूट के पीछे कौन है? फिल्‍म में सभी किरदार कभी एक-दूसरे के साथ तो कभी एक-दूसरे की काट लगेंगे। हमलोंग छह किरदार हैं। सभी इंटरेस्टिंग हैं। मेरा नाम भवानी है।
-इस फिल्‍म का लुक थोड़ा पुराना लग रहा है?
0 हां,आठवें दशक की कहानी है। पहनावे उस दौर के हैं। बत करने के लहजे के साथ संवाद भी उसी पीरियड के अंदाज में हैं। रजत अरोड़ा ने बहुत अच्‍छे संवाद लिखे हैं। वे प्रचुर मात्रा में सवाद लिख देते हैं। कई बार उन्‍हें काटना या छोड़ना पड़ता है। आखिर हर सीन में पंच लाइन तो नहीं दे सकते। आम तौर पर हिंदी फिलमों में चार पंच लाइन काफी होते हैं। रजत अरोड़ा संवाद लिख रहा हो तो वे चालीस हो जाते हैं।
-संवादों को खास बनाने के लिए कुछ अलग से करना पड़ता है क्‍या?
0 अगर उसकी तैयारी की जाए तो वह वर्क नहीं करता। मेरा अनुभव है कि संवाद जितने सिंपल तरीके से बोले जाएं,उतना मजा आता है। वंस आऑन... में मैंने यही सिंपल तरीका अपनाया था। हां तो अब मैं डॉयलॉग बोलूंगा का तरीका सही नहीं है।
-आप क्‍या करते हैं?
0 मैं तो पंक्तियां याद नहीं करता। मैं संवाद सुन लेता हूं। खास शब्‍दों का ध्‍यान रखता हूं। लेखक के संवाद का फील लेकर अपने अंदाज में बोल देता हूं। लंबे संवाद हों तो चार-छह बार पढ़ लेता हूं।क्‍या कहना है,वह क्लियर हेाना चाहिए। याद कर बोले तो रटा हुआ लगता है। दर्शक उचट जाएंगे।
- मिलन लूथरिया के साथ आप का खास रिश्‍ता है? वह पर्दे पर अभिनेता-निर्देशक की समझदार जुगलबंदी के रूप में खिता है...
0 मिलन के साथ तो बहुत पुराना रिश्‍ता है। मिलन से हमारी तब की दोसती है,जब वह एडी(असिस्‍टैंट डायरेक्‍टर) था। वह महेश भट्ट के साथ था। मैंने तभी प्रामिस किया था कि तू जब डायरेक्‍अर बनेगा तो मैं तेरी पहली पिक्‍चर मैं करूंगा। उस हिसाब से कच्‍चे धागे की थी।
-मिलन लूथरिया की कोई खासियत बताना चा‍हेंगे?
0 रिलेशन‍शिप को लेकर उसकी सोच महेश भट्ट की तरह की है। उनके साथ पंद्रह-बीस साल रहा है। भट्ट साहब का असर सभी जानते हैं। वह संबंधों की गहराई समझता है। वह उसका प्‍लस पाइंट है।
-क्‍या बादशाहो जैसी फिल्‍म आज के दर्शक पसंद कर पाएंगे?
0 इस फिल्‍म का ट्रीटमेंट आज की सोच के मुताबिक है। हाल-फिलहाल में ऐसी कोई फिल्‍म नहीं आई है,जो कमर्शियल ढांचे में आज की कहानी कह रही हो। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि यह फिल्‍म चलेगी। अगर फिल्‍में दर्शकों के बीच वर्क नहीं करेगी तो फिर कमाई की उम्‍मीद छोड़ दें।
-इसके बाद...
0 गोलमाल... आएगी। लगातार काम कर रहा हूं। फिल्‍में आती रहेंगी। अगले महीने राजकुमार गुप्‍ता की रेड की शूटिंग आरंभ करूंगा। उसके साथ यूपी लौटूंगा।

Friday, October 28, 2016

फिल्‍म समीक्षा : शिवाय




एक्‍शन और इमोशन से भरपूर
शिवाय
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजय देवगन की शिवाय में अनेक खूबियां हैं। हिंदी में ऐसी एक्‍शन फिल्‍म नहीं देखी गई है। खास कर बर्फीली वादियों और बर्फ से ढके पहाड़ों का एक्‍शन रोमांचित करता है। हिंदी फिल्‍मों में दक्षिण की फिल्‍मों की नकल में गुरूत्‍वाकर्षण के विपरीत चल रहे एक्‍शन के प्रचलन से अलग जाकर अजय देवगन ने इंटरनेशनल स्‍तर का एक्‍शन रचा है। वे स्‍वयं ही शिवाय के नायक और निर्देशक हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में उनकी तल्‍लीनता दिखती है। पहाड़ पर चढ़ने और फिर हिमस्‍खलन से बचने के दृश्‍यों का संयोजन रोमांचक है। एक्‍शन फिल्‍मों में अगर पलकें न झपकें और उत्‍सुकता बनी रहे तो कह सकते हैं कि एक्‍शन वर्क कर रहा है। शिवाय का बड़ा हिस्‍सा एक्‍शन से भरा है,जो इमोशन को साथ लेकर चलता है।
फिल्‍म शुरू होती है और कुछ दृश्‍यों के बाद हम नौ साल पहले के समय में चले जाते हैं। शिवाय पर्वतारोहियों का गाइड और संचालक है। वह अपने काम में निपुण और दक्ष है। उसकी मुलाकात बुल्‍गारिया की लड़की वोल्‍गा से होती है। दोनों के बीच हंसी-मजाक होता है और वे एक-दूसरे को भाने लगते हैं। तभी हिमपात और तूफान आता है। इस तूफान में शिवाय और वोल्‍गा फंस जाते हैं। बर्फीले तूफान से बचने के लिए वे वे अपने तंबू में घुसते है। वह तंबू एक दर्रे में लटक जाता है। यहीं दोनों का सघन रोमांस और प्रेम होता है। चुंबन-आलिंगन के साथ उनकी प्रगाढ़ता दिखाई जाती है। लेखक संदीप श्रीवास्‍तव ने नायक-नायिका प्रेम की अद्भुत कल्‍पना की है। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्‍मों में पहली बार ऐसा प्रेम दिखा है। आम हिंदी फिल्‍मों की तरह ही नायिका गर्भवती हो जाती है। वोल्‍गा अभी मां बनने के लिए तैयार नहीं है,लेकिन शिवाय को संतान चाहिए। आखिरकार वोल्‍गा इस शर्त पर राजी होती है कि वह प्रसव के बाद बच्‍चे का मुंह देखे बगैर अपने देश लौट जाएगी।
कहानी इसी अलगाव से पैदा होती है। घटनाएं जुड़ती हैं और फिल्‍म आगे बढ़ती है। शिवाय अपनी बेटी का नाम गौरा रखता है। बाप-बेटी के बीच गहरा रिश्‍ता है। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं। गौरा को मां की कमी नहीं महसूस होती। एक भूकंप के बाद अचानक मां का पत्र उसके हाथ लगता है। वह जिद कर बैठती है कि उसे मां से मिलना है। शिवाय आरंभिक इंकार के बाद बुल्‍गारिया जाने के लिए राजी हो जाता है। बाप-बेटी बुल्‍गारिया पहुंचते हैं,लेकिन मां ने अपना ठिकाना बदल लिया है। वे भारतीय दूतावास की मदद लेने आते हैं तो वहां एक बिहारी अधिकारी मिलते हैं। उनके इंट्रोड्यूसिंग सीन में बिहारी लहजे और स्‍वभाव पर जोर दिया गया है,जो बाद में लेखक,निर्देशक और कलाकार भूल जाते हैं। बहरहाल,बुल्‍गारिया में कुछ अप्रत्‍याशित घटता है और शिवाय को फिर से एक्‍शन मोड में आ जाने का मौका मिलता है। एक्‍शन और इमोशन से लबरेज इस फिल्‍म में चाइल्‍ड ट्रैफिकिंग का मुद्दा भी आ जुड़ता है। उसकी भयावहता और इंटरनेशनल तार से भी हम वाकिफ होते हैं। पता चलता है कि कैसे सिर्फ 72 घंटों में गायब किए गए बच्‍चों को ठिकाना लगा दिया जाता है।
अजय देवगन की यह फिल्‍म एक्‍शन और इमोशन के लिए देखी जा सकती है। अजय देवगन ने एक्‍शन का मानदंड बढ़ा दिया है। चूंकि वे पहली फिल्‍म से ही एक्‍शन में प्रवीण है,वे इस रोल और एक्‍शन में जंचते हैं। उन्‍होंने एक्‍शन के साथ अपनी अदाकारी के जलवे भी दिखाए हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में उनकी आंखें और चेहरे के भाव बोलते हैं। वोल्‍गा बनी एरिका कार के हिस्‍से कम सीन आए हैं। उन्‍हें मुख्‍य रूप से खूबसूरत दिखना था। वह दिखी हैं। अभिनय और दृश्‍य के लिहाज से सायशा को अधिक स्‍पेस मिला है। पहली फिल्‍म होने के बावजूद वह अपनी मौजूदगी दर्ज करती है। वह अच्‍छी लगती हैं। उन्‍होंने अपने किरदार के द्वंद्व को समझा और पेश किया है। बेटी गौरा की भूमिका में एबिगेल एम्‍स बहुत एक्‍सप्रेसिव हैं। एबिगेल मूक किरदार में है,लेकिन वह अपने एक्‍सप्रेशन और अंदाज से सारे इमोशन बखूबी जाहिर करती हैं।
अजय देवगन की शियाय में शिव का धार्मिक या आध्‍यात्मिक पक्ष नहीं है। शिवाय की शिव में श्रद्धा है और उसके स्‍वभाव में शैवपन है। बाकी वह ट्रैडिशनल भारतीय पुरुष है,जो परिवार,संतान और पारिवारिक मूल्‍यों को तरजीह देता है। देखें तो वोल्‍गा पश्चिम की लड़की है। वे ऐसे इमोशन में यकीन नहीं करती है। वह बेटी को सौंप कर शिवाय की जिंदगी से निकल जाती है। हालांकि बाद में लेखक ने उसकी ममता जगा दी है,फिर भी वह शिवाय और गौरा के साथ नहीं आती। शिवाय इमोशनल फिल्‍म है,लेकिन हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित मैलोड्रामा से बचती है।
अजय देवगन का प्रयास सराहनीय है। उन्‍होंने हर स्‍तर पर फिल्‍म की हद बढ़ाई है।
अवधि- 172 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Tuesday, July 12, 2016

भावनाओं का शिखर है शिवाय : अजय देवगन




     -अजय ब्रह्मात्मज

दो साल की कड़ी तपस्‍या के बाद अजय देवगन अब आखिरकार अपनी अति महत्वाकांक्षी फिल्म ‘शिवाय’ पूरी कर चुके हैं। वह इस साल दीवाली पर रिलीज होगी। दर्शकों को कुछ अलग देने की गरज से उन्होंने इस में आर्थिक, शारीरिक व मानसिक तीनों निवेश किया है।

-फिल्म देखने पर हम समझें कि शिवाय क्या है। किस चीज ने आप को फिल्म की तरफ आकर्षित किया।
- जी बिल्कुल। देखिए यह एक भावना है। मेरी ज्यादा फिल्में जो वर्क करती हैं, मैं काम करता हूं। उसमें भावनाएं सबसे मजबूत होती हैं। या तो पारिवारिक भावनाएं हो या जो भी इमोशन हो। इस फ़िल्म का आधार भावनाएं ओर परफॉरमेंस  हैं। बाकी सब आप भूल जाइए।तकनीक और एक्शन को एकतरफा कर दीजिए। यह सब आकर्षण हैं, इससे हम एक स्केल पर जा सकते हैं। लेकिन कहानी में आपको कोर भावनाएं अाकर्षित करती हैं , जो कि यूनिवर्सल होता है।  वह एक सोच है। हमने बिल्कुल उलझाने की कोशिश नहीं की है। हम नहीं बता रहे हैं कि नए तरह की फिल्म है। भावनाएं तो वहीं हैं जो आपकी और मेरी होती है। आपके परिवार की तरफ जो भावनाएं हैं, वही मेरे परिवार की तरफ मेरी भावनाएं हैं। वो तो बदल नहीं सकता। फिर चाहे वह अमेरिका हो या हिंदुस्तान । भावनाओं को मजबूत करते हुए हम फिल्म के स्केल को कहां लेकर गए, कहां हमने उसका चित्रण किया, बात वही है।
-शिव भगवान का और शिवजी से आपका कुछ? आपने टाइटल में शिवाय दिया है।
० देखिए। यह फिल्म शिव भगवान के बारे में नहीं है। मैं शिवजी का भक्त हूं यह सबको पता है। मैंने फिल्म में ऐसा नहीं रखा है कि किरदार सुबह उठता है और शिवजी की पूजा करता है। वह आज का मार्डन आदमी है। शिवजी के अलावा फिल्म में उसके और तीन टैटू हैं। जो शिवजी के ही हैं। वह शिव भक्त है। पर वह इस तरह का पूजा-पाठ वाला भक्त नहीं है। वह एक ऊपरवाले का साथ अपना कनेक्शन मानता है। शिव जी के साथ ऐसा कनेक्शन मुझे लगता है कि वह एक ही ऐसे किस्म के भगवान हैं जिन्हें जब भी दर्शाया जाता है एक इंसान के तौर पर किया जाता है।
-जी,सारे देवताओं में एक ऐसे हैं।
-वह सारे देवताओं में एक ऐसे हैं, जिसमें सारी खामियां है। जो आप में और मुझमें है। उन्हें भोला भंडारी भी कहते हैं। अगर आप उनकी कहानियां पढ़े तो। उन्हें भांग भोगी भी कहते हैं।अब यह रिकार्ड में बोलना चाहिए या नहीं पर वह चिलम लेते थे।यह सब किताबों में लिखा है। इससे आप गलत नहीं ठहरा सकते हैं। गुस्सा आज जाएं बिना सोचे समझे काट भी देते थे। बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास भी होता था। आप मुझे बताइए ऐसे कौन से देवता हैं, बाकी सारे भगवान परफेक्ट हैं। यही जो हैं जिनका आज के इंसान के साथ कनेक्शन है। जितने इंसान में अच्छी या बुरी चीजें हैं वह शिव भगवान की हैं।
-और जिसको ग्रे कैरेक्टर कहा जाता है।०-जी। वह खत्म करते हैं तो करते हैं। वह फिर आगे पीछे नहीं देखते हैं। अफसोस करते हैं तो करते हैं। आज हम में यही सारी खूबियां और खामियां है।अब आप उन खूबियों को खामी कैसे बनाते हैं। और खामी को खूबियां कैसे बनाते हैं। यह हम पर निर्भर करता है। यह कांसेप्ट किरदार से उठाया है। किरदार का नाम शिवाय है।
-अच्छा फिल्म में जो आप का नाम है।
-बाकी ऐसा कुछ नहीं है कि मैंने दिखाने की कोशिश की है कि शिव जी ऐसे थे या वैसे थे। बहुत ही सैटल तरीके से दिखाया है कि किरदार पहाड़ में रहता है। उसका एक कनेक्शन है।वह ऐसी जगह पर रहता है। पर कहीं ऐसा नहीं है कि वह पूजा-पाठ में रहता है।
-यह उसका अपना कैलाश है एक तरीके से?
- जी उसकी जिंदगी है। लेकिन दिमाग में उसकी सोच वैसी है। जो आपने कहानियों में पढ़ा हुआ है। पर आज के मार्डन डे के हिसाब से। कही वह शिवलिंग पर जल चढ़ा रहा है। शिवजी की पूजा कर रहा है, ऐसा कुछ नहीं है। हां। बस वक्त आता है तो वह हम सब की तरह ही है। ट्रांसफार्मर ,प्रोटेक्टर  डिस्ट्रॉयर। 

-निर्देशन की सफलता का मंत्र क्या है।  
- यही कि आप तीन सौ लोगों की यूनिट में से सौ को भी अपने विजन की तरफ कर पाना। बाकी लोगों को नहीं। हालांकि सब का आप के साथ चलना अहम है। वह भी बिना आप के कहें। उन्हें लगें कि वह कुछ ऐसा बनाना चाहता है, जिसे हम भी दिखाना चाहते हैं कि यह ऐसा लगे। यह उनका क्रेडिट है।

-हां जैसे हॅालीवुड औऱ बाहर होता?
- आज अगर यह फिल्म में हॅालीवुड में बनाऊं तो हजार करोड़ की फिल्म होगी। उससे नीचे की फिल्म नहीं होगी। मतलब आप किसी भी हॅालीवुड की फिल्म से तुलना कर लें फिर आपको लगें कि कहीं कोई कमी है तो आप मुझे आ कर सीधे कह सकते हैं।

-ऐसा होता है कि आप परफ़ॉर्मर के तौर प्र इंडिविजुअल परफॉर्म कर रहे होते हैं । जैसे खेल में होता है ना। सचिन ने शतक लगाया। वह सचिन की निजी एचिवमेंट है। पर कहीं ना कहीं क्रिकेट की भी एचिवमेंट है।
- जी , बिल्कुल। अप्रोच वही है ना। आज आप मुझे बताइए। उस दिन में एक लेख पढ़ रहा था। आज हमारी फिल्में हॅालीवुड फिल्म से स्पर्धा करने उतर आयी हैं। आप बड़े स्टार की बात करते हैं। लेकिन आप आखरी की कुछ फिल्में देखें तो बड़े स्टार से ज्यादा बिना स्टार वाली हॅालीवुड फिल्मों ने कमाई की है। पर क्यों। क्योंकि हमारे दर्शकों को एक एक्सपोजर मिल गया है। मैं केवल क्लास की बात नहीं कर रहा हूं। मैं मॅास की बात कर रहा हूं। आज आप जगंल बुक भी देखते हैं, उसमें कौन सा बड़ा हीरो था। एक छोटा सा बच्चा था. दर्शकों को चाहिए। आप दर्शकों को मौका क्यों दे रहे हो कि सामने वाले की फिल्म वह देखें। आप खुद क्यों सामने नहीं आ रहे हो।

-तकनीक के तौर पर पीछे रहने की बात बहुत सारे लोग करते हैं। एक तौ पैसा बड़ा फेक्टर है।
- एक तो पैसा बड़ा फेक्टर हैं और दूसरा इन्टनैशन। जैसा कि मैंने कहा , आज पैसा मेरे लिए बड़ा फेक्टर है। जिस बजट पर मैंने फिल्म बनाई उसमें मैं डायरेक्टर और सब लेकर करता तो शायद फिल्म बना ही नहीं पाता। मुमकिन ही नहीं था। फिर बजट ही जोड़ते हुए जान निकल जाती। इसके लिए आपने क्या किया। जो आप को लेना चाहिए था आपने पूरा त्याग दिया। आपने पूरा ही फिल्म में लगा दिया। फिल्म के बजट का तीस प्रतिशत ही फिल्म पर लगाया जाता है। बाकी तो लोग ले जाते हैं।
-अजय देवगन एक्टर हैं, निर्देशक हैं, निर्माता हैं। अजय देवगन बिजनेस मैन हैं। जिसकी कोई चर्चा नहीं है। बाकी के स्टार चर्चा में रहते हैं। आपने अपना थोड़ा बहुत बिजनेस स्टेअप किया है। अगर कह लें कि आपके नाम के आगे एक ही कुछ लिखना हो, मैं क्या लिखूं औऱ आप क्या लिखवाना पसंद करेंगे।
इंसान सही होगा।
-नहीं वो तो हैं ही। और क्या कह सकते हैं।
0 मैं क्या कहूं।
-चूंकि हम इमोशन और रिलेशन की बाते कर रहे हैं।
मैं इसी वजह से इंसान कह रहा हूं कि, क्योंकि आप बोलें कि अजय देवगन बेटे के तौर पर या पति के तौर पर या अजय देवगन पिता के तौर पर या अजय देवगन बिजनस मैन या फिल्ममेकर या एक्टर जो भी आप कह लीजिए। मतलब का का में एक चीज हो गई। तो आप किस को ज्यादा ऊपर मानेंगे। उस पर मैं पिन पाइंट नहीं कर सकता हूं।
-काजोल की अहमियत और परिवार में उनके योगदान को किस तरह रेखांकित करना चाहेंगे।
मैं अपने काम को भी उतना ही महत्व देता हूं।अब यह मैं कैसे कर पाता हूं यह पता नहीं। लेकिन कुछ ना कुछ मैनेज कर लेता हूं मैं। आज सबसे कम जरूरत घर में किसी की है वह मेरी है। मैं आपसे इसलिए कहूंगा कि जब आपका परिवार आपसे में घुल मिल जाता है,आपके माता-पिता आपके बच्चे और पत्नी आपस में घुल मिल जाते हैं तो उससे ज्यादा सफल आप अपने आप को क्या कह सकते हो। अगर मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है ,मुझे परेशान होने की जरुरत नहीं है। मेरी पत्नी है। मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है तो वह मुझ पर इतना विश्वास नहीं करेंगी जितना विश्वास काजोल पर करेंगी। ऐसा ना हो मगर आज अगर मेरे माता-पिता में से किसी को अस्पताल जाना पड़े तो मैं नहीं रहूंगा वहां चलेगा। वहां पर काजोल जरूर रहनी चाहिए।आज मेरे बच्चे लंदन छुट्टी के लिए गए हुए हैं। काजोल साथ में गई हुई है। जब मैं घर जाता हूं मा शुरू हो जाती है। वह कहती हैं कि मैं बच्चों को मिस कर रही हूं। बच्चों से ज्यादा काजोल को मिस कर रही हूं। सबसे ज्यादा शोर घर पर वह करती है। जब आपको यह मिल जाता है ना ,फिर सारी चीजें बैलेंस हो जाती हैं।

Thursday, July 30, 2015

फिल्‍म समीक्षा - दृश्‍यम

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
           मलयालम, कन्नड, तेलूगु और तमिल के बाद ‘दृश्यम’ हिंदी में आई है। हिंदी में इसे दृश्य कहा जाएगा। संस्कृत मूल के इस शब्द को ही हिंदी के निर्माता-निर्देशक ने शीर्षक के तौर पर स्वीकार किया। भाषिक मेलजोल और स्वीकृति के लिहाज से यह उल्लेखनीय है। निर्माता ने फिल्म में इसे ‘दृष्यम’ लिखा है। यह गलत तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हिंदी में प्रचलित नहीं है। इन दिनों अधिकांश निर्माता फिल्मों के पोस्टर हिंदी में लाने में रुचि नहीं लेते। लाते भी हैं तो रिलीज के समय दीवारों पर चिपका देते हैं। तब तक फिल्मों के नाम गलत वर्तनी के साथ पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे होते हैं।
              हिंदी में बनी ‘दृश्यम’ में अजय देवगन और तब्बू हैं। दोनों उम्दा कलाकार हैं। तब्बू ने हर बार अपनी अदाकारी से दर्शकों को सम्मोहित किया है। ‘दृश्यम’ में पुलिस अधिकारी और मां की द्विआयामी भूमिका में वह फिर से प्रभावित करती हैं। दृश्यों के अनुसार क्रूरता और ममता व्यक्त करती हैं। अजय देवगन के लिए विजय सलगांवकर की भूमिका निभाने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। पिछली कुछ फिल्मों ने उनकी छवि सिंघम की बना दी है। इससे बाहर निकलने पर वे कॉमेडी करते ही नजर आते रहे हैं। एक अंतराल के बाद उन्होंने भावपूर्ण किरदार निभाया है। उनकी अभिनय क्षमता का उपयोग हुआ है। अजय देवगन की आंखों और चाल में खास बात है। वे इनका भरपूर इस्तेमाल करते हैं। इस फिल्म में ही संरक्षक पिता और चालाक व्यक्ति के रूप में वे खुद को अच्छी तरह ढालते हैं। बड़ी बेटी का किरदार निभा रही इशिता दत्ता और छोटी बेटी के रूप में मृणाल जाधव ने दृश्यों के अनुसार नियंत्रित अभिनय किया है। मासूमियत, डर और बालपन को उसने उम्र के अनुरूप निभाया है। फिल्म में नृशंस और क्रूर पुलिस अधिकारी गायतोंडे के किरदार को कमलेश सावंत ने पूरे मनोयोग से निभाया है। फिल्म में कई बार गायतोंडे के व्यवहार पर गुस्सा आता है। 
                मलयालम में ‘दृश्यम’ को फैमिली थ्रिलर कहा गया था। हिंदी में भी इसे यही कहना उचित रहेगा। फिल्म में पर्याप्त थ्रिल और फैमिली वैल्यू की बातें हैं। खासकर मुश्किल और विपरीत स्थितियों में परिवार के सदस्यों की एकजुटता को दर्शाया गया है। स्क्रिप्ट की इस खूबी का श्रेय मूल लेखक जीतू जोसेफ को मिलना चाहिए। इसका हिंदीकरण उपेन्द्र सिध्ये ने किया है। उन्होंने हिंदी दर्शकों की रुचि का ख्याल रखते हुए कुछ तब्दीेलियां की हैं। अच्छी बात है कि निर्देशक निशिकांत कामत फिल्म के हीरो अजय देवगन की लोकप्रिय छवि के दबाव में नहीं आए हैं। यह फिल्म इस वजह से और विश्वसनीय लगने लगती है कि पिछली फिल्मों में दर्जनों से मुकाबला करने वाला एक्टर ऐसा विवश और लाचार भी हो सकता है। विजय सलगांवकर को लेखक-निर्देशक ने आम मध्यवर्गीय परिवार के मुखिया के तौर पर ही पेश किया है। विजय की युक्तियां वाजिब और जरूरी लगती हैं। 
              यह फिल्म मलयालम में रिलीज हुई थी तो तत्कालीन पुलिस अधिकारी सेनुकुमार ने आपत्तियां जताईं थीं। उनके अनुसार इस फिल्म से प्रेरित हत्याओं के अपराध सामने आए थे। इस पर बहस भी चली थी। सवाल है कि क्या ऐसी फिल्में अपराधी प्रवृति के लोगों को आयडिया देती हैं या इन्हें सिर्फ पर्दे पर चल रही काल्पनिक कथा ही समझें? अपराध हो जाने की स्थिति में सामान्य नागरिक मुश्किलों से बचने के लिए क्या कदम उठाएं? क्या परिवार को बचाने के लिए कानून को धोखा देना उचित है? ऐसी फिल्में एक स्तर पर पारिवारिकता को अपराध के सामने खड़ी करती हैं और पारिवारिकता के नाम पर सराहना भी बटोरती हैं। ऐसा भी तो हो सकता था कि पुलिस रिपोर्ट के बाद बेटी को अपराध मुक्त कर दिया जाता। यह फिल्म अमीर और संपन्न परिवारों की बिगड़ती संतानों की झलक भर देती है। वजह के विस्तार में नहीं जाती। यह फिल्म का उद्देश्य नहीं था, लेकिन चलत-चलते इस पर बातें हो सकती थीं। ‘दृश्यम’ अजय देवगन और तब्बू् की अदाकारी के लिए दर्शनीय है। 
अवधिः 163 मिनट
स्‍टार- *** तीन स्‍टार