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Monday, June 7, 2010

राजनीति को फिल्म से अलग नहीं कर सकता: प्रकाश झा


=अजय ब्रह्मात्मज

हिप हिप हुर्रे से लेकर राजनीति तक के सफर में निर्देशक प्रकाश झा ने फिल्मों के कई पडाव पार किए हैं। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाई। सामाजिकता उनकी विशेषता है। मृत्युदंड के समय उन्होंने अलग सिनेमाई भाषा खोजी और गंगाजल एवं अपहरण में उसे मांजकर कारगर और रोचक बना दिया। राजनीति आने ही वाली है। इसमें उन्होंने सचेत होकर रिश्तों के टकराव की कहानी कही है, जिसमें महाभारत के चरित्रों की झलक भी देखी जा सकती है।

फिल्मों में हाथ आजमाने आप मुंबई आए थे? शुरुआत कैसे हुई?

दिल्ली यूनिवर्सिटी से फिजिक्स ऑनर्स करते समय लगा कि सिविल सर्विसेज की परीक्षा दूं, लेकिन फिर बीच में ही पढाई छोडकर मुंबई आ गया। सिर्फ तीन सौ रुपये थे मेरे पास। जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स का नाम सुना था, वहां पढना चाहता था। यहां आकर कुछ-कुछ काम करना पडा और दिशा बदलती गई। मुंबई आते समय ट्रेन में राजाराम नामक व्यक्ति मिले, जो शुरू में मेरे लिए सहारा बने। वे कांट्रेक्टर थे। उनके पास दहिसर में सोने की जगह मिली।

फिर जे. जे. स्कूल नहीं गए?

वहां गया तो मालूम हुआ कि सेमेस्टर आरंभ होने में अभी समय है। मेरे पास कैमरा था। फोटो खींचता था। मुंबई में काम के लिहाज से सबसे पहले इंग्लिश स्पीकिंग इंस्टीट्यूट में नौकरी मिली। अंग्रेजी अच्छी थी तो पढाने का काम मिल गया। वहां बिजनेस मैन आते थे। तीन-चार घंटे पढाने के बाद बचे हुए खाली समय में गैलरियों के चक्कर लगाता था। दहिसर में एक आर्ट डायरेक्टर आगा जानी थे। वे मुझे धरमा फिल्म के सेट पर ले गए। उन्हें लगा कि मैं उन्हें असिस्ट कर सकता हूं। फिल्मी दुनिया से वह मेरा पहला जुडाव रहा। उस दिन धरमा के सेट पर राज को राज रहने दो गाने की शूटिंग चल रही थी। एक कोने में खडा होकर मैं लगातार सब देखता रहा। आगा जानी लौटने लगे तो मैंने कहा कि आप चलिए, मैं आ जाऊंगा। मुझ पर इस माहौल का जादुई असर हो रहा था। मन में विचार आया कि यही करना है। जिंदगी का लक्ष्य मिल गया।

इससे पहले कितनी फिल्में देखीं?

तिलैया के आर्मी स्कूल में पढता था। दिल्ली आकर पढाई में लगा रहा। कॉलेज के दिनों में पाकीजा दो-तीन बार देखी। पेंटिंग-मूर्तिकारी का भी शौक था। धरमा की शूटिंग देखने के अगले दिन आगा साहब ने डायरेक्टर चांद से मिलवा दिया। मैं उनका तेरहवां असिस्टेंट बन गया। मेरे जिम्मे चाय-कुर्सियों का इंतजाम था। कुछ असिस्टेंट तो चार-पांच साल से थे। चीफ असिस्टेंट देवा 13 साल से सहायक थे। मैं सिर्फ पांच दिन ही यहां असिस्टेंट रहा। रोज के तब पांच रुपये मिलते थे।

ऐसा क्यों?

पांच दिन में ही लगा कि असिस्टेंट बना रहा तो बारह-पंद्रह साल कोई उम्मीद नहीं रहेगी। छठे दिन शेड्यूल खत्म होते ही एफ.टी.आई.आई. के बारे में पता करने पूना चला गया। पता चला कि मैं केवल एक्टिंग के लिए ही क्वालीफाई कर रहा हूं। पढाई ग्रेजुएशन में ही छोड दी थी। मुंबई लौटने के बद मैंने दहिसर छोड दिया। सोचा कि ऐसी नौकरी करूं, जिसमें पढाई के लिए समय मिले। ताडदेव के एक रेस्टरां में आवेदन किया। कोलाबा में उनका ब्रांच खुल रहा था। मालिकों में तीन भाई थे। उनमें से एक सैनिक स्कूल में पढ चुका था। उसने मुझे तीन सौ रुपये महीने पर रखा। समय निकाल कर मैं पढाई करता था। कुछ पैसे बच जाते थे, बाद में यही पैसे पूना में फीस देने के काम आए।

यह कब की बात है?

1973 में पूना गया था। वहां मैंने एडिटिंग में एडमिशन लिया। मेरे साथ डेविड धवन, रेणु सलूजा थे। डायरेक्शन में केतन मेहता, कुंदन शाह, विधु विनोद चोपडा, सईद मिर्जा थे। नसीरुद्दीन और ओम पुरी भी थे। 1974 में वहां स्ट्राइक हुई। गिरीश कर्नाड थे तब..। इंस्टीट्यूट बंद हो गया, हमें कैंपस छोडना पडा।

आपका पहला काम 1975 में आया था। उसकी योजना कैसे बनी?

पूना से लौटने पर शिवेन्द्र सिंह का घर मेरा ठिकाना बना। उनका भतीजा मंजुल सिन्हा मेरा दोस्त था। हम दोनों चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी, फिल्म्स डिवीजन जैसी जगहों से कुछ काम जुगाड लेते थे। स्क्रिप्ट वगैरह में मदद कर देते थे। तभी पता चला कि गोवा सरकार वहां की संस्कृति पर डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहती है। कोशिश करने पर वह हमें मिल गई। अंडर द ब्लू नाम से मेरा पहला काम सामने आया।

यह फीचर फिल्मों के पहले की तैयारी थी या फिल्म मेकिंग के अभ्यास का उपाय? आपकी रुचि तो फीचर फिल्म बनाने में थी?

तब फीचर फिल्म कोई नहीं दे रहा था। कम समय और लागत में डॉक्यूमेंट्री बन जाती थी। पांच-छह सालों तक डॉक्यूमेंट्री बनाता रहा, पैसे बचा कर दुनिया घूमता रहा। इस एक्सपोजर का फायदा हुआ। 1979 में बैले डांसर फिरोजा लाली पर बा द दा यानी डांस बाई टू डॉक्यूमेंट्री शुरू की। इस सिलसिले में सोवियत संघ और लंदन गया। इस दौरान फिल्ममेकर के तौर पर मेरे अंदर बडा परिवर्तन आया। मेरी फिल्मों में यथार्थ का नाटकीय चित्रण रहता है। इसके सूत्र इसी प्रवास में हैं।

बिहारशरीफके दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री काफी चर्चित रही थी..।

लंदन से लौटते हुए दंगों की खबर मिली थी। मार्च का महीना था। बी.बी.सी. पर खबर दिखी। मुझे बहुत धक्का लगा। मुंबई आते ही मैं फिल्म्स डिवीजन गया। वहां चीफ प्रोड्यूसर एन.एस. थापा से मैंने यूनिट की मांग की और बिहार शरीफगया। इस डॉक्यूमेंट्री की हृषीकेष मुखर्जी ने भी काफी तारीफकी थी।

परिवार से कोई संपर्क था कि नहीं?

1975 में मेरी डॉक्यूमेंट्री आई। तब पिताजी मोतिहारी में थे। मां-पिताजी ने फिल्म वहीं देखी। उसे देखकर पिता सन्नाटे में आ गए और मां रोने लगीं। उन्होंने पिता से मुंबई चलने को कहा। मैंने 1972 में घर छोडा। यह 1975 के अंत या 1976 के शुरू की बात है। मैं जुहू में पेइंग गेस्ट था। मां से पत्राचार था, लेकिन पिताजी से तो बात भी नहीं होती थी। दोनों अचानक मुंबई आ गए। तब उनसे बराबरी के स्तर पर बात हुई। वे हफ्ते भर रहे। उन्हें मुंबई दर्शन करवा दिया। उस बातचीत के बाद अपने प्रति उनका वास्तविक कंसर्न समझ में आया। खुद पर गुस्सा भी आया।

डायरेक्टर प्रकाश झा के इस निर्माण काल में किन व्यक्तियों और घटनाओं का सहयोग मिला?

बिहारशरीफपर फिल्म बनाने के दौरान बहुत कुछ समझ में आया। रियलिज्म, पॉलिटिक्स और सोसायटी का टच भी वहीं से आया। मजिस्ट्रेट वी. एस. दूबे ने मदद की और छूट दी। फिल्म को मैंने शैवाल की धर्मयुग में प्रकाशित एक कविता से खत्म किया। उनकी कहानी कालसूत्र पर मैंने दामुल बनाई। तभी मनमोहन शेट्टी से दोस्ती हुई। दामुल के लिए हां करते हुए उन्होंने कहा कि उसे बैलेंस करने के लिए कमर्शियल फिल्म भी सोचो। मैंने उन्हें हिप हिप हुर्रे की कहानी सुनाई। दोनों साथ में बनाने की बात थी। बिहार में शूटिंग होनी थी। हिप हिप हुर्रे की शूटिंग के दौरान मैं इतना थक गया कि उसे एडिट कर रिलीज कर देना चाहा। दामुल में छह महीने की देर हो गई। वह दूसरी फिल्म बनी, जबकि पहले सोची थी।

दामुल को पुरस्कार मिलने के बाद आप समानांतर सिनेमा के अग्रणी फिल्मकारों में आए। परिणति के बाद अचानक गायब हो गए। क्या फिल्म माध्यम से विरक्ति हो गई?

जीवन अजीब ढंग से व्यस्त हो गया था। शादी की तो दांपत्य जीवन डिस्टर्ब रहा। फिल्मों के साथ डॉक्यूमेंट्री व टीवी का काम जारी रखा। 1989 के दिनों में लगा कि निचुड जाऊंगा। खुद को रिवाइव करने की जरूरत महसूस होने लगी तो पटना लौट गया। वहां एक-दो संस्थाओं के साथ मिल कर काम किया। संस्था अनुभूति बनाई। उसके जरिये मैंने बहुत सारे युवकों को प्रशिक्षित किया। एफ.टी.आई.आई. के सतीश बहादुर को बुलाकर फिल्म एप्रीसिएशन के कोर्स चलाए। चंपारण में संस्था संवेदन बनाई और युवकों को छोटे-मोटे उद्योगों के लिए प्रेरित किया। मैंने एक बेटी गोद ली थी। मां के देहांत के बाद परिवार बिखर गया। मैं बेटी दिशा को लेकर मुंबई आ गया। नए सिरे से शुरुआत की।

दूसरी पारी की क्या मुश्किलें थीं? फिल्म इंडस्ट्री में तो रिवाज है कि जो चला गया उसे भूल जा..।

कुछ महीने जुहू के एक होटल में था। फिर मनमोहन शेट्टी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अब दस-बारह लाख में फिल्में नहीं बन सकतीं। कम से कम सत्तर-अस्सी लाख लगेंगे। जोड-तोड करो। मैंने मृत्युदंड की कहानी लिखी थी। उसे एन.एफ.डी.सी. में जमा किया। तिनका-तिनका फिर से जोडना शुरू किया।

दोबारा मुंबई आने पर आप की पहली फिल्म बंदिश बनी थी?

बंदिश एक अपवाद है। वैसी फिल्म मैंने पहले या बाद में नहीं बनाई। मुंबई आने पर जावेद सिद्दीकी, रॉबिन भट्ट और सुरजीत सेन से मुलाकात हुई। उन्होंने मिलकर फिल्म लिखी थी। फिल्म में जैकी श्राफ आए तो फायनेंसर भी मिल गया। सबने कहा कि सेटअप तैयार हो गया है तो काम करो। बंदिश में इंटरेस्ट नहीं रहा। मैं बगैर स्क्रिप्ट के फिल्म नहीं बनाता। विषय मेरे अनुकूल नहीं था। लेकिन यह बात समझ में आई कि कमर्शियल फिल्मों का काम कैसे होता है। मृत्युदंड में पॉपुलर हीरोइन को लेना तभी तय हो गया था।

माधुरी दीक्षित को मृत्युंदड के लिए कैसे राजी किया?

सुभाष घई को कहानी सुनाते हुए मैंने उनका नाम लिया था। उन्होंने ही माधुरी को फोन किया। फिल्मिस्तान स्टूडियो में खलनायक के गीत चोली के पीछे की शूटिंग चल रही थी। शॉट के बीच में उन्होंने बहुत गौर से कहानी सुनी। तभी उन्होंने शॉट रोका और पौन घंटे तक कहानी सुनी। कहानी खत्म होते ही उन्होंने हां कर दी। शूटिंग के दरम्यान ही यूनिट भी खडी हो गई। फिल्म सफल रही।

मृत्युदंड के बाद आपने एक अलग भाषा विकसित की..।

मैं नए दौर में पॉपुलर सिनेमा के लोकप्रिय तत्वों को समाहित कर अपनी शैली और भाषा खोज रहा था। मृत्युदंड में उसकी शुरुआत हुई, जो गंगाजल और अपहरण में विकसित हुई। राजनीति में वह फुल फॉर्म में है। एक बात साफ है कि दर्शक जिस भाषा को समझते हैं, उसी में बात करनी होगी। इसका फायदा यह हुआ कि आज मैं अपनी बात मजबूती से कह पाता हूं। सीन, सब्जेक्ट, सिनेमैटिक, डायलॉग, कंस्ट्रक्शन सभी क्षेत्रों की समझ विकसित की। पॉपुलर फिल्मों के ढांचे में ही फिल्में बना रहा हूं, लेकिन वे प्रचलित फॉर्मूले में नहीं हैं।

आपने राजनीति से परहेज नहीं किया। कमर्शियल ढांचे में बनी फिल्मों में भी मजबूत सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण रहता है।

मैं बिहार का हूं। बिहारी समाज सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय है। आम आदमी भी राजनीतिक समझ रखता है। दामुल पारंपरिक सामंतवादी परिवेश की फिल्म है। फिर 1990 में मंडल कमीशन और ओपन मार्केट की नीति से समाज में ठेकेदार बढे और धार्मिक कट्टरता बढी। पारंपरिक सामंतवादी समीकरण में आए बदलाव को मैंने मृत्युदंड में रखा। मृत्युदंड के बाद पॉलिटिकली बैकवर्ड समझे जाने वाले लोग सत्ता में आए। इसके बाद पिछडी जातियों में मतभेद बढे। इसे गंगाजल में दिखाया है। अपहरण में बेरोजगारी और लॉ एंड ऑर्डर में आए बिखराव की दास्तान थी। अब राजनीति और लोकतांत्रिक ढांचे में आ रहे परिवर्तन को समझने के लिहाज से राजनीति बनाई है।

राजनीति को देश की वर्तमान राजनीति से प्रेरित कहा जा रहा है?

राजनीति के किरदार आदिकाल में भी थे, आज भी हैं। हमारा देश लोकतांत्रिक है और लोकतंत्र लगातार मजबूत भी हुआ है, लेकिन परिवार और वंश भी चल रहे हैं। सत्तर के बाद पावर बंटा, नई शक्तियां उभरीं। अब वे खुद सत्ता का केंद्र बन गई हैं और अपने तरीकेसे परिवार और वंश को बढावा दे रही हैं। राजनीति में फ‌र्स्ट फेमिली से लेकर लास्ट तक यही प्रवृत्ति दिखाई पड रही है। फिल्म राजनीति में परिवार, व्यक्ति और समाज तीनों के बीच के रिश्तों की कहानियां हैं। इसमें महाभारत के चरित्रों की झलक भी मिलेगी।

राजनीति में पॉपुलर कलाकारों को लेने की कोई खास वजह है?

फिल्म मृत्युदंड में माधुरी को लिया था। बीच में अजय देवगन को लेकर दो फिल्में बनाई। राजनीति में ज्यादा कैरेक्टर हैं। उस लिहाज से मैंने कास्टिंग की है। रणबीर कपूर और कट्रीना कैफको रोल अच्छे लगे, इसलिए उन्होंने हां की। पॉपुलर एक्टर्स से फिल्म चर्चा में रहती है और आम दर्शक उन्हें देखने आते हैं। यकीनन रणबीर और कट्रीना ने अब तक ऐसे रोल नहीं किए हैं।


Friday, June 4, 2010

फिल्म समीक्षा:राजनीति

राजनीतिक बिसात की चालें
-अजय ब्रह्मात्मज
भारत देश के किसी हिंदी प्रांत की राजधानी में प्रताप परिवार रहता है। इस परिवार केसदस्य राष्ट्रवादी पार्टी के सक्रिय नेता हैं। पिछले पच्चीस वर्षो से उनकी पार्टी सत्ता में है। अब इस परिवार में प्रांत के नेतृत्व को लेकर पारिवारिकअंर्तकलह चल रहा है। भानुप्रताप के अचानक बीमार होने और बिस्तर पर कैद हो जाने से सत्ता की बागडोर केलिए हड़कंप मचता है। एक तरफ भानु प्रताप केबेटे वीरेन्द्र प्रताप की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं तो दूसरी तरफ भानुप्रताप के छोटे भाई चंद्र प्रताप को मिला नेतृत्व और उनके बेटे पृथ्वी और समर की कशमकश है। बीच में बृजलाल और सूरज कुमार जैसे उत्प्रेरक हैं। प्रकाश झा ने राजनीति केलिए दमदार किरदार चुने हैं। राजनीतिक बिसात पर उनकी चालों से खून-खराबा होता है। एक ही तर्कऔर सिद्धांत है कि जीत के लिए जरूरी है कि दुश्मन जीवित न रहे।
प्रकाश झा की राजनीति मुख्य रूप से महाभारत के किरदारों केस्वभाव को लेकर आज के माहौल में बुनी गई कहानी है। यहां कृष्ण हैं। पांडवों में से भीम और अर्जुन हैं। कौरवों में से दुर्योधन हैं। और कर्ण हैं। साथ में कुंती हैं और थोड़ी उदारता से काम लें तो द्रौपदी हैं। महाभारत के ठोस किरदारों के साथ मशहूर फिल्म गाडफादर से भी साम्राज्य बचाने की कोशिशें ली गई हैं। यहां भी मुख्य किरदार बाहर से आता है और परिवार पर आए खतरों को देखते हुए अनचाहे ही साजिशों में संलग्न होता है और फिर नृशंस भाव से हिसाब बराबर करता है।
राजनीति का देश की राजनीति से सीधा ताल्लुक नहीं है। हां, व‌र्त्तमान राजनीतिक परिदृश्य की झलक मिलती है। पिछले एक-डेढ़ दशकों में उभरी ताकतों और उनकी वजह से प्रभावित हो रही राजनीति के संकेत मिलते हैं, लेकिन राजनीति किसी एक पार्टी, वाद या सिद्धांत पर निर्भर नहीं है। कह सकते हैं कि यह फिल्म नेपथ्य में चल रही नेतृत्व की छीनाझपटी को उजागर करती है। राजनीतिक दांवपेंचों से वाकिफ दर्शक फिल्म के पेंच अच्छी तरह समझ सकेंगे और उन्हें उनमें अपने प्रदेशों, राज्यों और यहां तककि जिला स्तर की राजनीतिक उठापटक दिखेगी। प्रकाश झा ने फिल्म को वास्तविक नहीं रखा है, लेकिन उन्होंने इसे इतना काल्पनिक भी नहीं रखा है कि सब कुछ नकली, कृत्रिम और वायवीय दिखने लगे। पृथ्वी, समर, वीरेन्द्र, सूरज, बृजलाल, चंद्र प्रताप और भानु प्रताप को हम विभिन्न पालिटिकल पार्टियों में आए दिन देखते रहते हैं।
राजनीति के नायक अवश्य समर प्रताप यानि रणबीर कपूर हैं, लेकिन प्रकाश झा और अंजुम रजबअली ने इस तरह कथा बुनी है कि प्रमुख कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए पर्याप्त स्पेस और मौके मिले हैं। सीमित दृश्यों में भी आए किरदार अच्छी तरह गढ़े गए हैं। नसीरुद्दीन शाह, चेतन पंडित, खान जहांगीर खान और नाना पाटेकर अपनी भूमिकाओं में सक्षम और प्रभावशाली लगे हैं। किरदारों के बड़े समूह के साथ न्याय करते हुए उनके चरित्रों का उपयोगी निर्वाह प्रकाश झा और अंजुम रजबअली के लिए चुनौती रही होगी। उनके लेखन का कमाल चुटीले, धारदार और प्रासंगिक संवादों में भी दिखता है। उल्लेखनीय है कि हिंदी संवादों के स्वभाव और निहितार्थ को अच्छी तरह समझने की वजह से मनोज बाजपेयी, अजय देवगन और चेतन पंडित दृश्यों को जीवंत बना देते हैं। मनोज बाजपेयी की तीक्ष्णता इस फिल्म में उभर कर आई है। वे शातिर, वंचित और परिस्थिति के शिकार चरित्र के रूप में स्वाभाविक लगते हैं। उन्होंने अपने चरित्र को नाटकीय और ओवरबोर्ड नहीं जाने दिया है।
राजनीति की खूबी इसका लोकेशन और दृश्यों के मुताबिक जनता की भीड़ है। प्रकाश झा और उनके कला निर्देशकजयंत देशमुख ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक सब कुछ संजोया है। फिल्म सिर्फ भीड़ और भाषण तक सीमित नहीं रहती। अहं और नेतृत्व की लालसा में मानवीय स्वभाव के लक्ष्णों की भी जानकारी मिलती है। फिल्म का पार्श्‍व संगीत प्रभावशाली है। हर नाटकीय दृश्य की शुरूआत में लगता है कि म्यान से तलवारें निकल रही हों। एक सिहरन सी पैदा होती है।
कलाकारों में अर्जुन रामपाल और रणबीर कपूर चौंकाते हैं। खास कर अर्जुन ने पृथ्वी के किरदार के द्वंद्व को अच्छी तरह पकड़ा है। रणबीर कपूर के संयत तरीके से समीर को पर्दे पर उतारा है। एक चालाक रणनीतिज्ञ के तौर पर खेली जा रही साजिशों में वे उत्तेजित न होते हुए भी प्रभावित करते हैं। कट्रीना कैफ इंदु की मानसिकता को समझने और निभाने में सफल रही हैं।
राजनीति हर लिहाज से देखने लायक फिल्म है। लंबे अर्से के बाद हिंदी भाषा, संस्कृति और राजनीति की खूबियों के साथ हिंदी में बनी यह फिल्म अच्छा मनोरंजन करती है।
**** 1/2 साढ़े चार स्टार

Monday, May 10, 2010

'राजनीति' महाभारत से प्रेरित है : मनोज बाजपेयी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राजनीति में रोल क्या है आप का?

पॉलिटिकल फैमिली में पैदा हुआ है मेरा किरदार। बचपन से पावर देखा है उसने। उसके अलावा कुछ जानता भी नहीं और वही वह चाहता है। वह जानता है कि जो पोजिशन और पावर है, वह उसे ही मिलनी चाहिए। जिद्दी आदमी है, तेवर वाला आदमी है। कहीं न कहीं मैं ये कहूंगा कि बहुत ही धाकड़ खिलाड़ी भी है राजनीति में। तो वह चालाकी भी करता है। लेकिन जब विपत्ति आती है तो कहीं न कहीं अपने तेवर और जिद्दी मिजाज की वजह से उसका दिमाग काम नहीं कर पाता। वीरेन्द्र प्रताप सिंह नाम है। वीरू भैया के नाम से मशहूर है।

खासियत क्या है? पॉलिटिकल रंग की अगर बात करें तो ़ ़ ़

जो राजनीति उसे विरासत में मिली है और जिसे छोड़ पाने में हमलोग बड़े ही असमर्थ हो रहे हैं, वीरू उस राजनीति की बात करता है। वह राजनीति अभी ढह रही है या चरमरा रही है। चरमराने के बाद डिप्रेशन आ रहा है लोगों में। उसी डिप्रेशन को वीरेन्द्र प्रताप सिंह रीप्रेजेंट करता है।

वीरेन्द्र प्रताप सिंह को निभाने के लिए क्या कोई लीडर या कोई आयकॉन आपके सामने था?

कोई आयकॉन सामने नहीं था। चूंकि बचपन से हम एक ऐसे परिवार और माहौल में पले-बढ़े हैं, जहां न्यूजपेपर अनिवार्य माना जाता था। जाहिर सी बात है कि राजनीति में हमार ी रुचि एक आम शहरी आदमी से ज्यादा रही है। ज्यादा जागरुकता रही है राजनीति को लेकर। मैंने इस कैरेक्टर को एक गैर राजनीतिक आदमी के ऊपर ढाला है। एक फ्यूडल आदमी के ऊपर ढाला है। उसके अनुरूप मैंने ढलने की कोशिश की है।

महाभारत वाली बात कितनी सच है कि राजनीति के किरदार उस से प्रेरित हैं?

बिल्कुल सच है। यह एक तरीके से महाभारत का ट्रिब्यूट है और महाभारत के बहुत सारे पात्र आपको इसमें चलते-फिरते नजर आएंगे। महाभारत को आज के दौर की राजनीति में डाल दिया गया है।

वीरू भाई किससे प्रेरित हैं।

दुर्योधन से। दुर्योधन का जब मैं नाम लेता हूं तो आपको समझ में आ जाएगा कि वह राजा ही था। उसे लगता था कि हर चीज जो उसे दी जा रही है,उसमें कुछ कमी है। हर चीज जो उसे मिलनी चाहिए, उसमें बाधाएं डाली जा रही हैं। महाभारत कहता भी है कि पूरे तौर से न कोई सही है और न कोई गलत है। कृष्ण कहते हैं कि सभी अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। सही और गलत का निर्णय लेना तो भगवान के हाथ में है।

अंतत: जो जीत जाता है, वही सही होता है?

महाभारत में जीता कौन? जीता कृष्ण। उसके अलावा तो कोई जीता नहीं।

क्या अलग एक्सपीरियेंस रहा है राजनीति का? फिल्म और डायरेक्टर प्रकाश झा के संदर्भ में पूछ रहा हूं?

प्रकाश जी हमारे ही इलाके के हैं और हमने साथ में कभी काम नहीं किया था। ये बात मुझे भी खटकती थी और बाद में मुझे पता चला कि उनको भी यह बात खटक रही थी। हम दोनों एक ऐसी फिल्म में साथ आ रहे हैं, जो उनके और मेरे दोनों के करियर के लिए खास फिल्म है। मुझे सबसे अच्छी और अनोखी बात लगी कि प्रकाश जी की टीम पूरी तरह से आर्गेनाइज्ड है। मैंने बड़ी फिल्में भी की है, बहुत ही बड़ी-बड़ी फिल्में की हैं और बहुत छोटी फिल्में भी की है। मैंने ऐसी व्यवस्था कहीं नहीं देखी।

प्रकाश झा के बारे में क्या कहेंगे? उनकी फिल्मों के बारे में?

प्रकाश जी देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर फिल्में बनाते हैं। इस पर उनकी पकड़ बहुत अच्छी है। वे बहुत निर्भीक होकर काम करते हैं, क्योंकि उनकी आस्था है इन विषयों पर। दूसरा वे गाहे-बेगाहे एक पॉलीटिशियन भी हैं, समाज सेवक भी हैं। एक एक्टर के तौर पर आप बहुत कुछ लेने के मूड में होते हैं, बहुत कुछ ले सकते हैं और बहुत ज्यादा लोभी बन जाते हैं। इस फिल्म में मैंने जो काम किया है, उसमें 70 प्रतिशत काम प्रकाश झा का है। उनका मेरे अभिनेता के ऊपर अथाह विश्वास था। मेरा उनकी जानकारी और निर्देशन के ऊपर। काम करने के दौरान मैं बहुत कम अपने डायरेक्टर से पूछता हूं कि आप बताइए मैं इसको कैसे करूं? मैं बार-बार इनके पास जाता था, बताइए मैं इसको कैसे करूं।

Wednesday, February 25, 2009

दरअसल: अभिनेत्रियों का राजनीति में आना

-अजय ब्रह्मात्मज
लोकसभा चुनाव में अभी देर है, फिर भी सभी पार्टियों में उम्मीदवारों को लेकर बैठकें चल रही हैं। जीत और सीट निश्चित और सुरक्षित करने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को तैयार किया जा रहा है, जो अधिकाधिक मतदाताओं की पसंद बन सकें।
भोपाल का उदाहरण लें। बीच में खबर आई कि यहां से नगमा चुनाव लड़ सकती हैं। अभी पार्टी निश्चित नहीं है। नगमा के करीबी कहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां उन्हें टिकट देने को राजी हैं। संभव है, यह मात्र शगूफा हो। दूसरी तरफ भोपाल से जया भादुड़ी को टिकट देने की बात भी चल रही है। वे सपा की उम्मीदवार होंगी। उन्हें भोपाल की बेटी के रूप में पेश किया जा सकता है। अगर नगमा और जया भादुड़ी की तुलना करें, तो जया ज्यादा मजबूत उम्मीदवार दिख रही हैं।
अभिनेत्रियों को राजनीति में जगह दी जाती रही है। इसकी शुरुआत नरगिस से हो गई थी। वैसे देविका रानी भी राजनीतिक गलियारे में नजर आती थीं और जवाहरलाल नेहरू की प्रिय थीं, लेकिन उन्होंने राजनीति में खास रुचि नहीं ली। नरगिस ने अवश्य संसद की मानद सदस्यता स्वीकार की थी। वे भी नेहरू परिवार की करीबी थीं। नेहरू उन्हें बहुत पसंद करते थे। नरगिस संसद में भले ही पहुंच गई, लेकिन एक राजनीतिज्ञ या सजग सदस्य के रूप में उन्हें नहीं याद किया जाता। उन्होंने संसद की बहसों में अधिक हिस्सा नहीं लिया। कहते हैं, एक बार सत्यजित राय के खिलाफ उन्होंने यह बोल दिया था कि उन्होंने अपनी फिल्मों में भारत की गरीबी दिखाकर इंटरनेशनल ख्याति हासिल की है।
जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय रहीं। एम.जी. रामचंद्रन के निर्देश पर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं। दक्षिण भारत के फिल्म अभिनेता-अभिनेत्रियों का राजनीतिक महत्व और योगदान रहा है। हिंदी फिल्मों के कलाकारों की तुलना में उनकी राजनीतिक और सामाजिक स्वीकृति भी अधिक रही है। दक्षिण भारत से हिंदी फिल्मों में आई वैजयंतीमाला भी संसद में पहुंचीं, लेकिन कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं कर सकीं। ऐसा लगता है कि संसद में उनकी उपयोगिता केवल शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रही।
पिछले दस सालों में भाजपा और सपा ने अभिनेत्रियों को अवश्य संसद में भेजा है। आज भी ये दोनों पार्टियां ही फिल्म कलाकारों के राजनीतिक उपयोग में आगे हैं। सपा के उम्मीदवार के रूप में रामपुर से चुनाव जीत कर संसद में पहुंचीं जयाप्रदा के राजनीतिक महत्व पर सवाल उठते रहे हैं। हां, जया बच्चन अपनी मुखरता के कारण गाहे-बगाहे चर्चा में जरूर रही हैं। बच्चन परिवार के सदस्य बताते हैं कि जया बच्चन संसद की कार्यवाहियों के प्रति सजग और सचेत रहती हैं। हेमा मालिनी भाजपा की सांसद हैं। संसद के हर सत्र में और कुछ हो या न हो, उनकी तस्वीर जरूर अखबारों में छप जाती है। इन तस्वीरों में वे दो-तीन सांसदों के बीच ड्रीम गर्ल वाली मुस्कान फेंकती नजर आती हैं। पार्टी के अंदर हेमा का राजनीतिक कद बहुत बड़ा नहीं है। भाजपा ने रामायण सीरियल की लोकप्रियता के बाद सीता बनी दीपिका चिखलिया को भी अपनी पार्टी की सदस्यता दी थी। इधर क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी की भूमिका से मशहूर हुई स्मृति ईरानी भी भाजपा से चुनाव लड़ चुकी हैं। मुमकिन है कि इस बार भी वे कहीं से संसद की उम्मीदवार बनें!
फिल्मों से राजनीति में आए कलाकारों की बात करें, तो शत्रुघ्न सिन्हा और राज बब्बर जागरूक रहे हैं। उन्होंने अपनी पार्टियों के लिए बहुत कुछ किया। शत्रुघ्न सिन्हा की तो मंशा ही रही है कि वे बिहार के मुख्यमंत्री बनें, लेकिन धुरंधर राजनीतिज्ञों ने उन्हें इस लायक नहीं समझा। राज बब्बर सपा से निकलने के बाद राजनीतिक दृष्टि से थोड़े कमजोर हुए हैं। विनोद खन्ना और धर्मेन्द्र नाम के ही सांसद हैं। अभी तक केवल सुनील दत्त ने राजनीति में अपनी पहचान छोड़ी और अपने काम से दूसरों को प्रभावित भी किया। इस लिहाज से राजनीति में गई अभिनेत्रियां संयोग या दुर्भाग्य से अधिक योगदान नहीं कर सकी हैं। राजनीतिक पार्टियां उनका इस्तेमाल तो करती हैं, लेकिन उन्हें जिम्मेदारी देने से बचती भी हैं। ऐसा क्यों है..?