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Friday, October 14, 2016

फिल्‍म समीक्षा : इनफर्नो


जैसी किताब,वैसी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
डैन ब्राउन के उपन्‍यास पर आधारित रॉन होवार्ड की फिल्‍म इनफर्नो का भारत में सबसे बड़ा आकर्षण इरफान खान हैं। इनकी वजह से फिल्‍म का एक भारतीय ट्रेलर भारत में जारी किया गया। यह भ्रम बनाया गया कि इस फिल्‍म में इरफान खान की भूमिका टॉम हैंक्‍स को टक्‍कर देगी। ऐसे प्रशंसक दर्शकों को इनफर्नो निराश करेगी। प्रचार के मुताबिक इसमें इरफान खान हैं। उन्‍हें महत्‍वपूर्ण किरदार भी मिला है,लेकिन स्‍क्रीन प्रेजेंस के लिहाज से यह अपेक्षाकृत छोटा है।
डेविड कोएप ने मूल उपन्‍यास को स्क्रिप्‍ट में बदला है। उन्‍होंने पहले भी डैन ब्राउन के उपन्‍यास की फिल्‍म स्क्रिप्‍ट तैयार की है। पिछले अनुभवों से उन्‍हें लाभ हुआ है। उपन्‍यास की आत्‍मा के साथ उसके शरीर को भी उन्‍होंने फिल्‍म में जस का तस रखा है। यही वजह है कि निर्देशक रॉन होवार्ड की कोशिशों के बावजूद फिल्‍म साधारण ही रह जाती है। भारत में डैन ब्राउन लोकप्रिय लेखक हैं। विदेश में उन्‍हें एयरपोर्ट रायटर का दर्जा हासिल है। भारत समेत अनेक देशों में साधारण उपन्‍यासों पर बेहतरीन फिल्‍में बनती रही हैं,लेकिन यह फिल्‍म उपन्‍यास की सीमाओं में ही रह जाती है।
रॉन होवार्ड ने इर फान खान के साथ टॉम हैंक्‍स, फेलिसिटी जोन्‍स,बेन फोस्‍टर और ओमर साई जैसे कलाकारों को चुना है। इन कलाकारों ने सौंपी गई भूमिकाओं को ढंग से निभाया है। फिल्‍म की कमजोरी इसकी पटकथा है,जो विश्‍वसनीयता पैदा नहीं कर पाती। ज्‍यादातर दृश्‍य रोचक शुरूआत के बाद बीच में ही अटक और फिर भटक जाते हैं। एक्‍शन और तकनीकी प्रभावों के बावजूद फिल्‍म प्रभावित नहीं करती। इटली के फ्लोरेंस शहर की पृष्‍ठभूमि भी कारगर नहीं हो पाती। हां,क्‍लाइमेक्‍स के पहले फिल्‍म गति पकड़ती है। अंतिम दृश्‍यों में स्‍पेशल इफेक्‍ट और किरदारों के सम्मिलित योगदान से फिल्‍म पटरी पर आती लगती है।
इनफर्नो इसी सीरिज की पिछली फिल्‍मों की तरह साधारण रह जाती है। सफल और योग्‍य कलाकार भी उसे स्क्रिप्‍ट के सीमाओं से नहीं निकाल पाते।अवधि- 121 मिनटढाई स्‍टार 

Tuesday, January 19, 2016

मिसाल है मंटो की जिंदगी - नंदिता दास


अभिनेत्री नंदिता दास ने 2008 में फिराक का निर्देशन किया था। इस साल वह सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित एक बॉयोपिक फिल्म की तैयारी में हैं। उनकी यह फिल्म मंटो के जीवन के उथल-पुथल से भरे उन सात सालों पर केंद्रित है,जब वे भारत से पाकिस्तान गए थे। नंदिता फिलहाल रिसर्च कर रही हैं। वह इस सिलसिले में पाकिस्तान गई थीं और आगे भी जाएंगी।

 - मंटो के सात साल का समय कब से कब तक का है?
0 यह 1945 से लेकर तकरीबन 1952 का समय है। इस समय पर मैैंने ज्यादा काम किया। उनके जीवन का यह समय दिलचस्प है। हमें पता चलता है कि वे कैसी मुश्किलों और अंतर्विरोधों से गुजर रहे थे।

- यही समय क्यों दिलचस्प लगा आप को?
0 वे बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के साथ थे। प्रोग्रेसिव रायटर मूवमेंट का हिस्सा थे। इस बीच हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए थे। उस माहौल का उन पर क्या असर पड़ा? उन्होंने कैसे उस माहौल के अपनी कहानी में ढाला। वे क्यों बॉम्बे छोड़ कर चले गए,जब कि वे बॉम्बे से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि मुझे कोई घर मिला तो वह बम्बई था। यह अलग बात है कि उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। वे दिन उनके लिए मुश्किल थे। बम्बई में उन्हें पैसा मिला। काम मिला। इज्जत मिली। वे अच्छी जिंदगी जी रहे थे। वह नहीं जाना चाहते थे। वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। धीरे-धीरे वे कौन से हालात हुए कि वे चले गए। देखें तो आज भी वही मसले हैैं। उन्होंने बहुत लड़ाई लड़ी। छह बार उन पर केस दर्ज हुआ। आज भी हम उन्हीं सब चीजों का सामना कर रहे हैैं। फिल्मों को काटा जा रहा है। किताबों पर रोक लग रही है।  हम लड़ रहे हैैं। यह सब बेवकूफी हो रही है। मंटो आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक है।
 
-पिछले कुछ सालों में हिंदी में उनकी किताबें आयी हैैं। मुझे नहीं लगता है कि जितना मंटो को पढ़ा गया है,उतना किसी और लेखक को पढा गया होगा?
0 खासकर 2012 में जब उनका जन्मशती समारोह हुआ।  तब बहुत लोगों ने उनके बारे में लिखा। अब युवा वर्ग भी उन्हें बहुत पढ़ रहे हैैं। रिसर्च के दौरान मैैंने देखा कि मुंबई में ऐसे मंटो ग्रुप हैैं,जो उनकी कहानियों पर नाटक करते हैैं। कई उर्दू गु्रप हैैं जो उनकी कहानियां पढ़ते हैैं। पाकिस्तान में तो कई सालों तक मंटो को कैसे देखा जाए इस पर चर्चा हो रही थी। वे मंटो का स्ािान निर्धाििरत नहीं कर पा रहे थे। आखिरकार 2012 में उन्हें अवार्ड दिया गया। उन पर स्टैम्प बनाया गया। एक फिल्म भी बनायी गई।  मंटो पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। मेरी फिल्म में मंटो के बंबई और लाहौर के जीवन को लेना जरूरी है।

-मंटो से आपका परिचय कब हुआ?
0 कॉलेज के दिनों  मेरा उनसे परिचय हुआ था। मेरे पास उनकी दस्तावेज किताब का पूरा कलेक्शन है। दिल्ली में एक ग्रुप ने मंटो की दस्तावेज पर नाटक किया था। मुझे वह बहुत ही अच्छा लगा। उसके बाद मैैंने दस्तावेज का पूरा कलेक्शन ही खरीद लिया। मैैं उसे बीच-बीच में पढ़ती थी। जब मैैं फिल्मों में काम करने लगी तो सोचा कि इस पर फिल्म बनानी चाहिए। शार्ट फिल्म भी बन सकती है। कुछ कारणों की वजह से वह हुआ नहीं। कुछ कहानियां मैंने सोची भी थी। मैैंने फिर फिराक बनायी। मैैं कोई फुल टाइम डायरेक्टर तो हूं नहीं कि निर्देशन के लिए कहानी खोजी। मैैंने मंटो को पढ़ा तो पाया कि उनकी जिंदगी मिसाल है। उनकी कहानियों से भी बढ़कर उनकी असल जिंदगी है।
-जो आपने कहा कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति को भी पत्र लिखे थे।
0 जी,अंकल सैम के नाम ¸ ¸ ¸ वे पत्र आज भी प्रासंगिक है। इस तरह की बहुत सारी चीजें हैैं। मैैंने 2013 के शुरुआत में इस पर गंभीर होकर काम आरंभ किया। काफी चीजें निकलती गई। 2014 के बीच में मैैंने कई चीजें पढ़ी। मैैंने पाया कि कुछ रचनाओं का उर्दू से हिंदी में अनुवाद नहीं किया गया है। मुझे उर्दू पढ़ने नहीं आती है। मुझे लगा कि लिखने के लिए को रायटर लेना चाहिए। मैैंने तब तक काफी काम कर लिया था। मैैंने डोर के लेखक अली को अपने साथ लिया। उमैैंने उनके साथ मंटो का काम पूरा किया। पिछले साल मैैंने न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय से चार महीने का फेलोशिप किया था। मैैं अपने पांच साल के बेटे को ले गई थी। उस दौरान मैैं अली से मिली।
-आप की फिल्म में रचनाओं से निकले मंटो रहेंगे?
0 उन्होंने बहुत सारी चीजें अपने बारे में लिखी हैैं। उनकी एक कहानी है मुरली की धुन। इसमें उन्होंने अपने दोस्त श्याम के बारे में लिखा है। उनके साथ सहायक कहानी है। यह उनके बारे में है। मैैं उनके पूरे परिवार से मिली। उनकी बारीकियों पर काम किया। वे कैसे बैठते थे। अपनी बेटियों के साथ उनका कैसा रिश्ता था। वह अपने बच्चों को कविताएं सुनाते थे। रिश्तों या समाज के बारे में वे माडर्न खयाल थे। मंटो के बारे में लोग उतना जानते नहीं हैैं।

-कास्ट को लेकर क्या सोचा है।
0 मेरी अभी इरफान खान से बातचीत चल रही है। वह अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैैं। जब तक पूरी तरह हां ना कहें तब तक कुछ कहां नहीं जा सकता।

-इरफान तो कई साल पहले से मंटो करना चाहते थे।  उन्हें इसका प्रस्ताव भी मिला था। वह उसकी तैयारी भी कर रहे थे।
0 अच्छा। उनकी जबान में कहूं तो उन्होंने कहा था कि कब्र से निकल कर भी मंटो का किरदार निभाने के लिए तैयार रहेंगे। मैैंने उनको कहां कि आप अभी कर लो। कब्र से निकलने की क्या जरूरत है। मेरी उनसे मुलाकात हुई है। उन्होंने फर्स्ट ड्राफ्ट लिया है।

-उनकी कद-काठी मिलती है?
0 हां, बिल्कुल सही। वह उकडू  बैठकर कर सकते हैैं। हमने मंटो को नहीं सुना है। इरफान की स्टाइल शायद उनसे मेल खाती है। मंटो की जिंदगी नाटकीय थी। इरफान की एक्टिंग उसी तरह है। मैैं उत्साहित हूं।

Thursday, October 1, 2015

मानवीय संवेदनाओं की कहानी 'तलवार'



-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ज
    मुंबई के पाली हिल में गुलजार का बोस्कियाना है। बेटी बोस्‍की के नाम पर उन्‍होंने अपने आशियाने का नाम बोस्कियाना रखा है। गुलजार और राखी की बेटी बोस्‍की ने कभी पर्दे पर आने की बात नहीं सोची। बोस्‍की बड़ी होकर मेघना कहलायीं। उन्‍होंने पर्दे के पीछे रहने और कहानी कहने में रुचि ली। पहली फिल्‍म फिलहाल आई। कुछ समय घरेलू जिम्‍मेदारियोंं में गुजरा। घर-परिवार की आवश्‍यक जिम्‍मेदारी से अपेक्षाकृत मुक्‍त होने पर उन्‍होंने फिर से फिल्‍म निर्देशन के बारे में सोचा। इस बार उन्‍हें अपने पिता गलजार के प्रिय विशाल भारद्वाज का साथ मिला। तलवार बनी और अब रिलीज हो रही है।
             मेघना टोरंटो फिल्‍म फस्टिवल से लौटी हैं। वहां इस फिल्‍म को अपेक्षित सराहना मिली है। मेघना अपने अनुभव बताती हैं, जिंदगी के कुछ लमहे ऐसे होते हैं,जिन्‍हें आप हमेशा याद रखते हैं। वे यादगार हो जाते हैं। पहले ही सीन में इरफान एक लतीफा सुनाते हैं। इस लतीफे पर यहां की स्‍क्रीनिंग में किसी ने रिएक्‍ट नहीं किया था। मैंने पाया कि वहां 1300 सीट के हॉल में सभी ठठा कर हंसे। इनमें 65 प्रतिशत विदेशी दर्शक थे। यहां से जो माहौल बना,वह फिल्‍म के अंत तक तारी रहा। यह फिल्‍म जुमलों ऑर लतीफों की नहीं है। अगर आप भारतीय नहीं हैं तो इस केस के बारे में जानते भी नहीं। पूरी फिल्‍म को आप सबटायटल से फॉलो कर रहे हैं। दर्शकों के उत्‍साह ने प्रोत्‍साहित किया।
    सबटायटल के साथ फिल्‍म का मजा आता है क्‍या ?  गुलजार हस्‍तक्षेप करते हैं, फिल्‍म का मीडियम ऐसा होता है कि वहां आप केवल पड़ या सुन नहीं रहे होते हें। आप देखते हैं। कानों में ध्‍वनियां आ रही हैं। बैकग्राउंड स्‍कोर दृश्‍यों को संदर्भ और अर्थ देता है। कला‍कारो के बॉडी लैंग्‍वेज से दृश्‍यों का भाव भी समझ में आता है। धीरे-धीरे फिल्‍म से आप का रिश्‍ता बन जाता है। आप डायरेक्‍टर के साथ हो जाते हैं। फिल्‍म समझने लगते हें तो सबटायटल से निगाह हट जाती है। अगर आप डीवीडी से देख रहे हों तो दृश्‍यों को ठीक से समझने के लिए वापिस भी आ जाते हैं। सिनेमाघर में सचेत रहना पड़ता है,क्‍योंकि वहां रिप्‍ले नहीं हो सकता।
    मेघना गुलजार तलवार को ह्यूमन कहानी मानती हैं। फिल्‍म में हत्‍या और अपराध है,लेकिन यह मर्डर मिस्‍ट्री नहीं है। वह स्‍पष्‍ट कहती हैं, अगर हमारी सामाजिक,न्‍यायिक और प्रशासनिक संस्‍थाओं से असंतोष है तो वह कहानियों में चरित्रों के अंतर्संबंधों से जाहिर होता है। कानून व्‍यवस्‍था में कहीं कोई कमी रह जाती है तो वह अखरती है। यह सिस्‍टम में फंसे व्‍यक्तियों की कहानी है। इसकी वजह से ही दर्शक जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। गुलजार जोड़ते हैं, इसमें संवादों में सूचनाएं हैं। भारत के दर्शकों को यह सुविधा रहेगी कि वे इस केस के बारे में जानते हैं। मैंने मेघना को इस फिल्‍म के लिए दिन-रात काम करते देखा है। कई बार तो ऐसा होता था कि मेरा नाती मां के इंतजार से थक कर मेरे पास आकर सो जाता था। फिल्‍मकें जब बन रही होती हैं तो रिश्‍ते किनारे हो जाते हैं।
    सभी जानते हैं कि यह आरुषि कोड पर आधारित फिल्‍म है। लेकिन क्‍या मेघना इसे उस कांड पर बनी आधिकारिक फिल्‍म मानती हैं। और फिर यह भी सवाल है कि क्‍या यह किसी घटना का इस्‍तेमाल नहीं है ? मेघना जवाब देती हैं, न तो हम ने इंकार किया है और न ही स्‍वीकार किया है। हम झूठ नहीं बोलना चाहते। ट्रेलर से ही स्‍पष्‍ट हो जाता है। यह फिल्‍म उस कांड का विजुअल नाटकीयकरण है। हम ने अपने किरदारों को एक से ज्‍यादा डायमेंशन देने की कोशिश की है। केस के फैक्‍ट में कोई छेड़खानी नहीं की गई है। मेरी फिल्‍म का कंटेंट तो पब्लिक डोमेन में है। अगर कोई कहता है हिक हम ने इस का इस्‍तेमाल किया है तो मैं यही कहूंगी कि अगर हमें इसे स्‍कैंडलस फिल्‍म के तौर पर पेश करना होता तो हम चरित्रों के अलग-अलग डायमेंशन में नहीं जाते। एक ही पक्ष की कहानी कह देते तो कट्रोवर्सी और पर्याप्‍त कवरेज मिल जाता।
       मेघना के तर्क को गुलजार विस्‍तार देते हें, यह फिल्‍म मर्डर पर फोकस नहीं करती। कानूनी और जांच प्रक्रिया में क्‍या हुआ और उसका चरित्रों पर क्‍या असर पड़ा ? समाज में कानून औा कानून से व्‍यक्ति के रिश्‍ते को तो आम आदमी झेल ही रहा है। वह इसे समझ सकेगा। उसे अपना हिस्‍सा नजर आएगा। फिल्‍म सुने और पढ़े गए किस्‍से को विजुअल बना देती है। मेघना आगे कहती हैं, मेरे लिए बेटी के साथ एक बीवी और मां की भी कहानी है। मैं स्‍वयं एक बेटी और मां हूं। मैंने स्‍त्री की सोच भी रखी है।
    इस फिल्‍म में गुलजार की कैसी हिस्‍सेदारी रही है ? गुलजार बताते हैं, मेरा सपोर्ट हरमोनियम पर रहा है। मैं पेटी मास्‍टर के साथ था। इस फिल्‍म में गानों की ज्‍यादा गुंजाइश नहीं थी। मैंने ट्राय भी किया और कुछ गीत भी लिखे,लेनि मेघना रिजेक्‍ट कर देती थीं। इनका कहना होता था कि किरदारों के साथ यह नहीं जाता। मैंने फिल्‍म की थीम पर कमेंट की सुरत में कुछ कहा है। जिस दिन आकाश बेदाग होगा,चेहरा चांद का साफ होगा। जिस दिन समय ने आंखें खेलीं,इंसाफ होगा,इंसाफ होगा।