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Friday, June 20, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हमशकल्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज
साजिद खान की 'हमशकल्स' वास्तव में हिंदी फिल्मों के गिरते स्तर में बड़बोले 'कमअकल्स' के फूहड़ योगदान का ताजा नमूना है। इस फिल्म में पागलखाने के नियम तोडऩे की एक सजा के तौर पर साजिद खान की 'हिम्मतवाला' दिखायी गयी है। भविष्य में कहीं सचमुच 'हमशकल्स' दिखाने की तजवीज न कर दी जाए। साजिद खान जैसे घनघोर आत्मविश्वासी इसे फिर से अपनी भूल मान कर दर्शकों से माफी मांग सकते हैं, लेकिन उनकी यह चूक आम दर्शक के विवेक को आहत करती है। बचपना और बचकाना में फर्क है। फिल्मों की कॉमेडी में बचपना हो तो आनंद आता है। बचकाने ढंग से बनी फिल्म देखने पर आनंद जाता है। आनंद जाने से पीड़ा होती है। 'हमशकल्स' पीड़ादायक फिल्म है।
साजिद खान ने प्रमुख किरदारों को तीन-तीन भूमिकाओं में रखा है। तीनों हमशकल्स ही नहीं, हमनाम्स भी हैं यानी उनके एक ही नाम हैं। इतना ही नहीं उनकी कॉमेडी भी हमशक्ली है। ये किरदार मौके-कुमौके हमआगोश होने से नहीं हिचकते। डायलॉगबाजी में वे हमआहंग (एक सी आवाजवाले) हैं। उनकी सनकी कामेडी के हमऔसाफ (एकगुण) से खिन्नता और झुंझलाहट बढ़ती है। 'हमशकल्स' में कलाकारों और निर्माता-निर्देशक की हमखयाली और हमखवासी से कोफ्त हो सकती है। हिंदी फिल्मों के ये हमजौक और हमजल्सा हुनरबाज हमदबिस्तां(सहपाठी) लगते हैं। सच कहूं तो उन्हें दर्शकों से कोई हमदर्दी नहीं है। इस मायने में साजिद खान की हमशीर (बहन) फराह खान ज्यादा काबिल और माकूल डायरेक्टर हैं। फिर भी साजिद खान की हमाकत (मूर्खता) देखें कि उन्होंने इस फिल्म को किशोर कुमार और जिम कैरी जैसे हुनरमंद कलाकारों को समर्पित किया है और परोसा है कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मनोरंजन। भला किशोर कुमार और साजिद खान मनोरंजन के हमरंगी हो सकते हैं?
'हमशकल्स' में सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर हैं। इन तीनों में केवल रितेश देशमुख अपनी काबिलियत से सुकून देते हैं। यहां तक कि लड़कियों का रूप धारण करने पर भी तीनों में केवल वही अपने नाज-ओ-अंदाज से लड़कीनुमा लगते हैं। सैफ अली खान ने पहली बार ऐसी कॉमेडी की है। अफसोस कि उन्हें केवल जीभ निकालने और पुतलियों को नाक के समीप लाना ही आता है। चेहरे पर उम्र तारी है। उनके लिए बच्चा, कुत्ता, समलैंगिक और लड़की बनना भी भारी है। मार्के की बात है कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में उनके बाल नहीं बिगड़ते। राम कपूर का इस्तेमाल इनकी प्रतिभा से अधिक डीलडौल के लिए हुआ है। बिकनी में वे बर्दाश्त के बाहर हो गए हैं। फिल्म की अभिनेत्रियां साजिद खान की अन्य फिल्मों की तरह केवल नाच-गाने और देहदर्शन के लिए हैं। तमन्ना भाटिया, ईशा गुप्ता और बिपाशा बसु को कुछ दृश्य और संवाद भी मिल गए हैं। फिल्म पूरी होने के बाद बिपाशा बसु का एंड प्रोडक्ट से क्यों मोहभंग हुआ था? उनके बयान का औचित्य समझ में नहीं आता। फिल्म शुरुआत से अंत तक निकृष्ट है। यह बात तो शूटिंग आरंभ होते ही समझ में आ गई होगी। बहरहाल, इस निम्नस्तरीय फिल्म में भी कॉमेडी के नाम पर दी गई घटिया हरकतों के बावजूद सतीश शाह की मौजूदगी तारीफ के काबिल है।
इतना ही नहीं। यह फिल्म 159 मिनट से अधिक लंबी है। बेवकूफियों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता। हंसी लाने की कोशिश में गढ़े गए लतीफों और दृश्य मुंबइया भाषा में दिमाग का दही करते रहते हैं। दर्शकों के दिमाग के साथ धैर्य की भी परीक्षा लेती है 'हमशकल्स'। अगर आप नीली दवा पीकर आदमी के भौंकने और कुत्तों जैसी हरकतें करने पर बार-बार हंस सकते हैं, बड़ों के बच्चों जैसे तुतलाने पर मुस्कराने लगते हों और दो दृश्यों के बीच कोई संबंध या तर्क न खोजते हों तो आप 'हमशकल्स' देख सकते हैं। अन्यथा मनोरंजन के नाम पर तिगुना उत्पीडऩ हो सकता है।
अवधि-159 मिनट
* एक स्‍टार

Thursday, June 19, 2014

हंसी की पुडिय़ा बांधता हूं मैं-साजिद खान


-अजय ब्रह्मात्मज

    ‘हिम्मतवाला’  की असफलता के बाद साजिद खान ने चुप्पी साध ली थी। अभी ‘हमशकल्स’ आ रही है। उन्होंने इस फिल्म के प्रचार के समय यह चुप्पी तोड़ी है। ‘हिम्मतवाला’ के समय किए गए दावों के पूरे न होने की शर्म तो उन्हें है, लेकिन वे यह कहने से भी नहीं हिचकते कि पिछली बार कुछ ज्यादा बोल गया था।
- ‘हिम्मतवाला’ के समय के सारे दावे गलत निकले। पिछले दिनों आपने कहा कि उस समय मैं झूठ बोल गया था।
0 झूठ से ज्यादा वह मेरा बड़बोलापन था। कह सकते हैं कि वे बयान नासमझी में दिए गए थे। दरअसल मैं कुछ प्रुव करना चाह रहा था। तब ऐसा लग रहा था कि मेरी फिल्म अवश्य कमाल करेगी। अब लगता है कि ‘हिम्मतवाला’ का न चलना मेरे लिए अच्छा ही रहा। अगर फिल्म चल गई होती तो मैं संभाले नहीं संभलता। इस फिल्म से सबक मिला। यह सबक ही मेरी सफलता है। मैंने महसूस किया कि मैं हंसना-हंसाना भूल गया था। अच्छा ही हुआ कि असफलता का थप्पड़ पड़ा। अब मैं संभल गया हूं।
- ऐसा क्यों हुआ था?
0 मैं लोगों का ध्यान खींचना चाहता था। एक नया काम कर रहा था। मेरी इच्छा थी कि लोगों की उम्मीदें बढ़ें। वैसे भी दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ी हुई थी। पिछली फिल्मों की सफलता से उन्हें भी लग रहा था कि इस बार साजिद खान बड़ा धमाल करेगा। सच्चाई यह थी कि मैं अंदर से हिला हुआ था। अपनी घबराहट छिपा रहा था। बाकी फिल्मों के समय मेरा बड़बोलापन काम आ गया था। मेरा दिमाग चढ़ा हुआ था। अब लग रहा है कि मैं तो फिल्मकार हूं। मैं क्यों फिल्म के कलेक्शन की परवाह करूं?
- कलेक्शन का दबाव तो है। सब यही पूछते हैं कि यह फिल्म 100 करोड़ का बिजनेस करेगी कि नहीं?
0 दबाव तो है। इस दबाव को अपने काम से ही कम किया जा सकता है। हमारा काम है दर्शकों की अपेक्षा के मुताबिक फिल्म बनाना। ‘हिम्मतवाला’  जैसी गलती दोबारा नहीं करूंगा। मेरा काम हंसना-हंसाना है। मैं कामेडी बनाता हूं। फनी टाइप का निर्देशक हूं। इस बार यही उम्मीद है कि ‘हमशकल्स’ दर्शकों को खूब हंसाएगी। इस फिल्म में पूरा पागलपन डाल दिया है। हर दृश्य में दर्शक हंसेंगे।
- क्या एक्टर की तरह डायरेक्टर भी टाइपकास्ट होते हैं?
0 बिल्कुल होते हैं। हिचकॉक पूरी जिंदगी थ्रिलर बनाते रहे। भारत में अब्बास-मस्तान केवल थ्रिलर बनाते हैं। मेरी बहन फराह खान लार्जर दैन लाइफ मसाला एंटरटेंमेंट फिल्में बनाती हैं। डेविड धवन कामेडी फिल्में बनाते हैं। ये सभी टाइपकास्ट हैं। इनकी तरह मैं भी टाइपकास्ट हूं। मुझे कामेडी फिल्मों के लिए जाना जाता है। रोहित भी टाइपकास्ट हैं, लेकिन उन्होंने ‘सिंघम’ बना कर अपनी इमेज तोड़ी। सब कोई उनकी तरह सफल नहीं होता। अपने बारे में मैंने समझ लिया है कि मेरा काम है लोगों को हंसाना। मुझे कामेडी लिखने और डायरेक्ट करने में मजा आता है। टीवी से लेकर फिल्मों तक यही करता रहा हूं।
- पहले फिल्मों में हंसी का ट्रैक रहता था। अब पूरी फिल्म हंसी पर रहती है। ऐसा क्या हुआ है कि पिछले पांच-सात सालों में दर्शकों को हंसी की ज्यादा जरूरत हो गई है?
0 जब से हीरो कामेडी करन लगे तब से धीरे-धीरे यह ट्रेंड बन गई। भारत की रोजमर्रा जिंदगी में इतना ज्यादा स्ट्रेस है कि अगर फिल्मों से थोड़ी देर के लिए तनाव कम हो तो दर्शक खुश हो जाते हैं। स्ट्रेस रिलीफ के लिए फिल्में रामबाण हैं। इधर हर भाषा में कामेडी फिल्मों की संख्या बढ़ी है। कहा जा सकता है कि हमें हंसने की खुराक चाहिए। शायद भारत में अधिक समस्याएं होने की वजह से कामेडी फिल्में दर्शकों को रिलीफ दे रही हैं। हमारे चारो तरफ तनाव ही तनाव है। हंसी बेहतरीन दवा है और हम इस दवा के बिक्रेता हैं। मैं हंसी की पुडिय़ा बांधता हूं।
- ‘हमशकल्स’ में क्या नया है?
0 एक नया कंसेप्ट है। सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर तीन-तीन भूमिकाओं में हैं। तीन एक्टर के ट्रिपल रोल यानी नौ कैरेक्टर। उनके नाम भी एक समान हैं। अशोक, कुमार और मामा जी। ये तीनों एक ही शहर में रहते हैं। संयोग ऐसा बनता है कि वे एक ही घर में भी आ जाते हैं और फिर कामेडी पर कामेडी होती रहती है। इस फिल्म में ढेर सारी नई बातें हैं। मैं दावा कर रहा हूं कि दर्शकों को इस बार नौ गुणा ज्यादा मजा आएगा। अच्छी बात है कि अपने ट्रेलर और गानों से हमें ऐसा ही रिस्पांस मिल रहा है।

Friday, March 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : हिम्‍मतवाला

बेमेल मसालों का मनोरंजन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1983 में आई के राघवेन्द्र राव की हिम्मतवाला की रीमेक साजिद खान की हिम्मतवाला 1983 के ही परिवेश और समय में है। कपिलदेव के नेतृत्व में व‌र्ल्ड कप जीतने की कमेंट्री के अलावा फिल्म का एक किरदार बाल कर बताता है कि यह 1983 है। इस प्रकार पिछले बीस सालों में हिंदी सिनेमा के कथ्य और तकनीक में जो भी विकास और प्रगति है, उन्हें साजिद खान ने सिरे से नकार और नजरअंदाज कर दिया है। मजेदार तथ्य है कि साजिद खान की सोच और समझ में यकीन करने वाले निर्माता, कलाकार, तकनीशियन और दर्शक भी हैं। निश्चित ही हमारा देश भारत कई स्तरों पर एक साथ चल रहा है। मनोरंजन का एक स्तर साजिद खान का है।
साजिद खान थैंक्स गॉड इटस फ्रायडे जैसा गीत सुनवाने और मॉडर्न फाइट दिखाने के बाद 1983 के गांव रामनगर ले जाते हैं। इस गांव में शेर सिंह, नारायण दास, गोपी, सावित्री आदि जैसे दुनिया से कटे किरदार रहते हैं। बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे ग्राम सभा होती है। यहां पुलिस भी 2000 किलोमीटर दूर से आती है। रामनगर की ग्राम पंचायत में एक ही सरपंच है। उसने सभी ग्रामीणों की जमीन-जायदाद गिरवी रख ली है। प्रतीकात्मक रूप से साजिद खान मनोरंजन जगत की पंचायत के ऐसे ही सरपंच हैं, जिन्होंने दुनिया से कटे दर्शकों के दिल-आ-दिमाग को गिरवी रख लिया है। उन्हें लगता है कि मनोरंजन के नाम पर वे जो भी परोसेंगे, दर्शक उसे चटखारे लेकर देखेंगे।
साजिद खान की पिछली फिल्मों करी सफलता ने उन्हें कुतर्क की गली में और अंदर और गहरे धकेल दिया है। हिम्मतवाला में वे पिछली फिल्मों से ज्यादा सरल, सतही, तर्कहीन और फूहड़ अंदाज में अपने किरदारों को लेकर आए हैं। साजिद खान की हिम्मतवाला शुद्ध मसालेदार फिल्म है। बस, मसालों को बेमेल तरीके से डाल दिया गया है। ऐसे बेमेल स्वाद इन दिनों पसंद किए जा रहे हें।यह कुछ-कुछ पायनीज भेल, चिकेन डोसा या जैन मंचूरियन की तरह है। न कोई ओर, न कोई छोर, लेकिन बिक्री बेजोड़। हिम्मतवाला पहले दिन पहले शो में दर्शकों के साथ देखने का संयोग बना। एक दर्शक ने इंटरवल में उच्छवास लेते हुए कहा-पका दिया। उसी दर्शक ने फिल्म खत्म होने पर टिप्पणी की, जो मन में आता है, बना देते हैं। इस लिहाज से हिम्मतवाला दर्शकों के मनोरंजन के बजाए साजिद खान का मनरंजन है।
साजिद खान ने अजय देवगन को उनके पॉपुलर इमेज में ही पेश किया है। अजय की प्रतिभा का ऐसा स्वार्थी उपयोग साजिद खान ही कर सकते हैं। अजय देवगन स्वयं पिछली कुछ फिल्मों से कॉमेडी और एक्शन के हिट फार्मूले में फंसे हैं। अपने संवादों और दृश्यों से भरोसा उठने पर साजिद खान अजय देवगन से आता माझा सटकली भी बुलवाते हैं। बम पे लात गाना गवाते हैं। पिछली फिल्म के गानों नैनों में सपना और ताकी रे ताकी को इस फिल्म में रखा गया है, लेकिन जितेन्द्र-श्रीदेवी का जादू जगाने में अजय देवगन-तमन्ना असफल रहे हैं। अमजद खान और कादर खान के किरदारों में इस बार महेश मांजरेकर और परेश रावल हैं। दोनों ने साजिद खान की मर्जी से किरदारों को नया अवतार दिया है। अपनी फूहड़ता से कभी वे हंसाते हैं और कभी हंसने पर मजबूर करते हैं कि बात बन नहीं रही है।
हिम्मतवाला साजिद खान का सिनेमा है। उन्हें भ्रम है कि वे मनमोहन देसाई की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस भ्रम में वे सिनेमा को कभी पीछे ले जाते हैं तो कभी तर्कहीन ड्रामा दिखाते हैं।
अवधि-150 मिनट,
*1/2 डेढ़ स्टार

Friday, April 6, 2012

फिल्‍म समीक्षा : हाउसफुल 2

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कामेडी में आयटम का पैबंद


सलीम की गली छोड़-छाड़ कर अनारकली डिस्को जाते हुए जब कम कपड़ों में अपने अंगों को झटके देती है तो पर्दे पर जग्गा डाकू और पुलिस अधिकारी बटुक पटेल भी नाचने को मजबूर हो जाते हैं। अगले दिन अनारकली उनकी बीवियों सरला और हेतल के नाम से उन्हें रिझाती है और उनके बीच फूट डालती है। पूरा गीत और प्रसंग फिल्म में पैबंद की तरह जोड़ा गया है। कैमरे की नजर से यह दर्शकों को थोड़ी देर की उत्तेजना देता है, लेकिन फिल्म के मूल प्रवाह को रोकता भी है। साजिद खान की फिल्मों में कहीं न कहीं बुजुर्गो की दमित सेक्स फैंटेसी भी जाहिर होती रहती है। दर्शकों को बहलाने का यह फूहड़ तरीका है।

साजिद खान की फिल्में देखते समय तर्क और विवेक दोनों के परे जाना होता है। उनकी सभी फिल्मों में लतीफों का सिलसिला रहता है। उन लतीफों को केंद्र में रख कर दृश्य लिखे जाते हैं। एक माहौल सा बन जाता है। हमें किरदारों की बेवकूफ हरकतों पर हंसी आने लगती है। हाउसफुल-2 में साजिद खान ने 12 मुख्य कलाकार रखे हैं। दृश्यों को जोड़ने और बढ़ाने का काम सनी (अक्षय कुमार) करता है, इसलिए उसे हीरो मान सकते हैं। अक्षय कुमार की जोड़ी असिन के साथ है, इसलिए वह हीरोइन हो गई। हीरो-हीरोइन के बिल्ले हटा दें तो सारे किरदार बराबरी के स्तर पर हैं। एक-एक कर उन्हें अपने परफार्मेस से हंसाने का मौका मिलता है। अपने पुकार के नाम डब्बू और चिंटू के रोल में रणधीर कपूर और ऋषि कपूर को देखना रोचक लगता है। दोनों भाइयों ने अपने किरदारों पर मेहनत की है। फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती अपने बदलते रूपों में जमते हैं। गंगापुर के जग्गा डाकू के लंदन में जेडी बनने और फिर फोर्बेस मैग्जीन की अमीरों की सूची में आने का प्रसंग मजेदार है।

फिल्म के उद्देश्य को अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, रितेश देशमुख और श्रेयस तलपड़े अपनी अदाकारी से पूरी करते हैं। अभिनेत्रियों का उपयोग दृश्यों को भरने और दिखाने के लिए किया गया है। मगरमच्छ और अजगर के दृश्यों पर बच्चों को हंसी आ सकती है, अगर दोनों जानवर रितेश और श्रेयस के शरीर के किसी और अंग को हबकते तो कम हंसी आती क्या? लेकिन ऐसे सवाल साजिद खान से पूछने का कोई मतलब नहीं है। उनका उद्देश्य अजीबोगरीब और अश्लील फूहड़ दृश्यों से दर्शकों को हंसाना है।

** दो स्टार