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Showing posts from January, 2015

दरअसल : सेंसर बोर्ड का ताजा हाल

-अजय ब्रह्मात्मज
    बुधवार 21 जनवरी तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के आधिकारिक वेबसाइट पर नए अध्यक्ष का नाम नहीं लगाया गया था। लीला सैंपसन के इस्तीफा देने के बाद नई सरकार ने आनन-फानन में अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ 9 नए सदस्यों की भी नियुक्ति कर दी गई। वेबसाइट पर पुराने 23 सदस्यों के नाम ही लगे थे। उस सूची में नए सदस्यों के नाम नहीं शामिल हो सके थे। डिजीटल युग में प्रवेश करने के बाद भी यह स्थिति है। यह सिर्फ आलस्य नहीं है। वास्तव में यह मानसिकता है,जो ढेर सारी नवीनताओं के प्रति तदर्थ रवैया रखती है। कायदे से नई नियुक्तियों के साथ ही वेबसाइट पर नामों का परिवत्र्तन हो जाना चाहिए था। सेंसर बोर्ड के नए सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति से बौखलाए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि भविष्य में भी यही रवैया रहेगा। बदलने के बावजूद ज्यादातर कामकाज पूर्ववत चलता रहेगा।
    नए अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों के बारे में कहा जा रहा है कि वे भाजपा के करीब हैं। उनमें से कुछ सदस्यों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि उनके संबंध संघ से रहे हैं। मुमकिन है ऐसा हो। तब भी हमें यह ध्यान में रखना होगा कि भारत में सेंसर ब…

फिल्‍म समीक्षा : रहस्‍य

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-अजय ब्रह्मात्मज प्रमुख कलाकार: के के मेनन, टिस्का चोपड़ा, आशीष वशिष्ठ, मीता वशिष्ठ और अश्विनी कालसेकर।
निर्देशक: मनीष गुप्ता
स्टार: दो मनीष गुप्ता की 'रहस्य' हत्या की गुत्थियों को सुलझाती फिल्म है, जिसमें कुछ कलाकारों ने बेहतरीन परफॉर्मेंस की हैं। उन कलाकारों की अदाकारी और लंबे समय तक हत्या का रहस्य बनाए रखने में कामयाब निर्देशक की सूझ-बूझ से फिल्म में रोचकता बनी रहती है। अगर पटकथा और चुस्त रहती तो यह फिल्म 'किसने की होगी हत्या' जोनर की सफल फिल्म होती। आयशा महाजन की हत्या हो जाती है। आरंभिक छानबीन से पुलिस इस नतीजे पर पहुंचती है कि हत्या आयशा के पिता सचिन महाजन ने की होगी। वे गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। बाद में उनकी प्रेमिका एक मशहूर वकील को मुकदमे में शामिल करती है और सीबीआई जांच होती है तो शक की सुई उनके किरदारों से होती हुई जिस पर टिकती है, उसके बारे में कल्पना नहीं की जा सकती। मनीष गुप्ता ने हत्या के रहस्य को अच्छी तरह उलझाया है। सीबीआई अधिकारी सुनील पारस्कर की खोजबीन सच्चाई की तह तक पहुंचती है तो रिश्तों का झूठ और संबंधों का सच प्रकट होता है। लंबे समय के ब…

फिल्‍म समीक्षा : खामोशियां

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-अजय ब्रह्मात्मज प्रमुख कलाकार: गुरमीत चौधरी, सपना पब्बी और अली फजल।
निर्देशक: करण दारा
संगीतकार: अंकित तिवारी, जीत गांगुली, बॉबी इमरान और नवद जफर।
स्टार: 1.5 भट्ट कैंप की 'खामोशियां' नए निर्देशक करण दारा ने निर्देशित की है। उन्हें दो नए कलाकार गुरमीत चौधरी और सपना पब्बी दिए गए हैं। उनके साथ अली फजल हैं। कहानी विक्रम भट्ट ने लिखी है और एक किरदार में वे स्वयं भी मौजूद हैं। ऐसा लगता है कि अभी तक भट्ट कैंप अपनी फिल्मों में जिन मसालों का इस्तेमाल करता रहा है, उनकी बची-खुची और मिस्क मात्रा करण को दे दी गई है। प्रस्तुति और स्वभाव में भट्ट कैंप की यह फिल्म उनकी पिछली फिल्मों से कमजोर है। इस बार भट्ट कैंप अपनी एक्सपेरिमेंट देने में चूक गया है। सस्पेंस, मर्डर, हॉरर, भूत-प्रेत, सेक्स, रोमांस और प्रेम जैसे सभी तत्वों के होने के बावजूद यह फिल्म प्रभावित नहीं करती। कारण स्पष्ट है कि लेखक-निर्देशक की विधा और प्रस्तुति के प्रति स्पष्ट नहीं है। कथा बढऩे के साथ छिटकती रहती है और आखिरकार बिखर जाती है। किरदारों में केवल कबीर (अली फजल) पर मेहनत की गई। मीरा (सपना पब्बी) और जयदेव (गुरमीत चौध…

फिल्‍म समीक्षा हवाईजादा

अजय ब्रह्मात्मज
निर्देशक: विभु पुरी
स्टार: 2.5
विभु पुरी निर्देशित 'हवाईजादा' पीरियड फिल्म है। संक्षिप्त साक्ष्यों के आधार पर विभु पुरी ने शिवकर तलपड़े की कथा बुनी है। ऐसा कहा जाता है कि शिवकर तलपड़े ने राइट बंधुओं से आठ साल पहले मुंबई की चौपाटी में विश्व का पहला विमान उड़ाया था। अंग्रेजों के शासन में देश की इस प्रतिभा को ख्याति और पहचान नहीं मिल पाई थी। 119 सालों के बाद विभु पुरी की फिल्म में इस 'हवाईजादा' की कथा कही गई है। पीरियड फिल्मों के लिए आवश्यक तत्वों को जुटाने-दिखाने में घालमेल है। कलाकारों के चाल-चलन और बात-व्यवहार को 19 वीं सदी के अनुरूप नहीं रखा गया है। बोलचाल, पहनावे और उपयोगी वस्तुओं के उपयोग में सावधानी नहीं बरती गई है। हां, सेट आकर्षक हैं, पर सब कुछ बहुत ही घना और भव्य है। ऐसे समय में जब स्पेस की अधिक दिक्कत नहीं थी, इस फिल्म को देखते हुए व्यक्ति और वस्तु में रगड़ सी प्रतीत होती है। शिवकर तलपड़े सामान्य शिक्षा में सफल नहीं हो पाता, पर वह दिमाग का तेज और होशियार है। पिता और भाई को उसके फितूर पसंद नहीं आते। वे उसे घर से निकाल देते हैं। उस रात व…

ऊंचाइयों का डर खत्‍म हो गया - आयुष्‍मान खुराना

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-अजय ब्रह्मात्‍मज      ‘विकी डोनर’ से हिंदी फिल्मों में आए आयुष्मान खुराना की अगली फिल्म ‘हवाईजादा’ है। विभु पुरी निर्देशित ‘हवाईजादा’ पीरियड फिल्म है। यह फिल्म दुनिया के पहले विमानक के जीवन से प्रेरित है,जो गुमनाम रह गए।  विभु पुरी ने विमानक शिवकर तलपडे के जीवन को ही ‘हवाईजादा’ का विषय बनाया।
-पीरियड और अपारंपरिक फिल्म ‘हवाईजादा’ के लिए हां करते समय मन में कोई संशय नहीं रहा?
0 मेरी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ अपारंपरिक फिल्म थी। कांसेप्ट पर आधारित उस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों की सराहना मिली थी। बीच में मैंने दो कंवेशनल फिल्में कीं। फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऐसी ही फिल्म करनी चाहिए,जिसमें स्क्रिप्ट ही हीरो हो। इसी कारण मैं लगातार दो ऐसी फिल्में कर रहा हूं। पहली बार मैं कुछ ज्यादा अलग करने की कोशिश कर रहा हूं। एक मराठी किरदार निभा रहा हूं।
- शिवकर तलपडे के किरदार के बारे में क्या बताना चाहेंगे? और उन्हें पर्दे पर कैसे निभाया?
0 शिवकर तलपडे ने राइट बंधुओं से पहले विमान उड़ाया था। यह सुनते ही मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। पहले मैंने विभु पुरी के बारे में पता किया। पता चला कि वे बड़े होन…

प्रागैतिहासिक प्रेमकहानी

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
मेरे प्रिय निर्देशकों में से एक आशुतोष गोवारिकर ने में प्रिय अभिनेताओं में से एक रितिक रोशन के साथ मोहनजो दाड1ों की शूटिंग भुज में आरंभ की। सिंधु घाटी की सभ्‍यता की इस प्रागैतिहासिे प्रेमकहानी में रितिक रोशन की प्रमिका पूजा हेगड़े हैं। लगान,जोधा अकबर और खेलें हम जी जान से की सफलता-विफलता के बाद आशुतोष गोवारिकर ने फिर से साहसिक पहल की है। हिंदी पिफल्‍मों के इतिहास की यह प्राचीनतम प्रेमकहानी होगी। यह देखना रोचक होगा कि आशुतोष अपने विशेषसों की मदद से कैसी दुनिया रचते हैं ? मोहनजो दाड़ो को लेकर उत्‍सुकता बनी रहेगी।
आप बताएं कि आप कितने उत्‍सुक हैं और क्‍या अपेक्षाएं रखते हैं ?

फिल्‍म समीक्षा : बेबी

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समझदार और रोमांचक  -अजय ब्रह्मात्‍मज  स्टार: चार लंबे समय के बाद... जी हां, लंबे समय के बाद एक ऐसी फिल्म आई है, जो हिंदी फिल्मों के ढांचे में रहते हुए स्वस्थ मनोरंजन करती है। इसमें पर्याप्त मात्रा में रहस्य और रोमांच है। अच्छी बात है कि इसमें इन दिनों के प्रचलित मनोरंजक उपादानों का सहारा नहीं लिया गया है। 'बेबी' अपने कथ्य और चित्रण से बांधे रखती है। निर्देशक ने दृश्यों का अपेक्षित गति दी है, जिससे उत्सुकता बनी रहती है। 'बेबी' आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म है। ऐसी फिल्मों में देशभक्ति के जोश में अंधराष्ट्रवाद का खतरा रहता है। नीरज पांडे ऐसी भूल नहीं करते। यह वैसे जांबाज अधिकारियों की कहानी है, जिनके लिए यह कार्य किसी कांफ्रेंस में शामिल होने की तरह है। फिल्म के नायक अजय (अक्षय कुमार) और उनकी पत्नी के बीच के संवादों में इस कांफ्रेंस का बार-बार जिक्र आता है। पत्नी जानती है कि उसका पति देशहित में किसी मिशन पर है। उसकी एक ही ख्वाहिश और इल्तजा है कि 'बस मरना मत'। यह देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का आतुर ऐसे वीरों की कहानी है, जो देश के लिए जीना चाहते हैं।…

फिल्‍म रिव्‍यू : डॉली की डोली

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  हंसी के साथ तंज भी ***1/2 साढ़े तीन स्‍टार अभिषेक डोगरा और उमाशंकर सिंह की लिखी कहानी पर अभिषेक डोगरा निर्देशित 'डॉली की डोली' ऊपरी तौर पर एक लुटेरी दुल्हन की कहानी लगती है, लेकिन लेखक-निर्देशक के संकेतों पर गौर करें तो यह परतदार कहानी है। लेखक और निर्देशक उनके विस्तार में नहीं गए हैं। उनका उद्देश्य हल्का-फुल्का मनोरंजन करना रहा है। वे अपने ध्येय में सफल रहे हैं, क्योंकि सोनम कपूर के नेतृत्व में कलाकारों की टीम इस प्रहसन से संतुष्ट करती है। डॉली (सोनम कपूर) की एक टीम है, जिसमें उसके भाई, पिता, मां और दादी हैं। ये सभी मिल कर हर बार एक दूल्हा फांसते हैं और शादी की रात जेवर और कपड़े-लत्ते लेकर चंपत हो जाते हैं। यही उनका रोजगार है। डॉली की टीम अपने काम में इतनी दक्ष है कि कभी सुराग या सबूत नहीं छोड़ती। डॉली का मामला रॉबिन सिंह (पुलकित सम्राट) के पास पहुंचता है। वह डॉली को गिरफ्तार करने का व्यूह रचता है और उसमें सफल भी होता है, लेकिन डॉली उसे भी चकमा देकर निकल जाती है। वह फिर से अपनी टीम के साथ नई मुहिम पर निकल जाती है। लेखक-निर्देशक आदर्श और उपदेश के…

हंसल मेहता के निर्देशन में गे प्रोफेसर की भूमिका निभाएंगे मनोज बाजपेयी

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अजय ब्रह्मात्मज  हंसल मेहता और मनोज बाजपेयी की दोस्ती बहुत पुरानी है। बीच में कुछ ऐसा संयोग बना कि दोनों ने साथ काम नहीं किया। इस बीच दोनों अपने-अपने तरीके से संघर्ष करने के साथ उपलब्धियां भी हासिल करते रहे। दोनों ने 'दिल पे मत ले यार' में एक साथ काम किया था। 14 सालों के बाद वे फिर से एक फिल्म करने जा रहे हैं। मनोज बताते हैं, 'मुंबई में हंसल पहले व्यक्ति थे, जिनसे मैं काम मांगने गाया था। 'सत्या' के सफल होने पर मुझे पहचान मिली तो हम दोनों ने साथ काम करने का फैसला किया। तब 'दिल पे मत ले यार' की योजना बनी। इस फिल्म में मेरे साथ तब्बू भी थीं। फिल्म नहीं चली। हम दोनों कुछ नया करने की साच में रहे। एक दौर ऐसा भी आया कि हमारे बीच मनमुटाव हुआ और हम दोनों अलग हो गए। हमारी बातचीत भी बंद हो गई। हंसल अलग मिजाज की फिल्में बनाने लगे। मुझे खुशी है कि 'शाहिद' से वे अपनी जमीन पर लौटे हैं। हमारे संबंध फिर से कायम हुए और उन्होंने अपनी नई फिल्म का प्रस्ताव मेरे सामने रखा। इस फिल्म में मुझे अपना रोल चुनौतीपूर्ण लगा, इसलिए मैंने हां कर दी।'

हंसल मेहता की…

दरअसल :सत्ता और सितारों की नजदीकी

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-अजय ब्रह्मात्मज कयास लगाया जा रहा है कि अमिताभ बच्चन मोदी के नेतृत्व में आई केंद्रीय सत्ता के नजदीक आ गए हैं। हालांकि अपनी बातचीत में अमिताभ बच्चन ने स्पष्ट शब्दों में इस बात से इनकार किया है कि वे मोदी सरकार के किसी प्रचार अभियान का हिस्सा बनेंगे। दरअसल मोदी के मुख्यमंत्री रहते समय अमिताभ बच्चन ने जिस प्रकार गुजरात के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रशंसकों और दर्शकों का आमंत्रित किया, उससे इस प्रकार की संभावनाओं को बल मिलता है। सभी जानते हैं कि अमिताभ बच्चन के जोरदार और आत्मीय आमंत्रण के बाद गुजरात का पर्यटन बढ़ा है। इन दिनों हर राज्य किसी न किसी फिल्मी सितारे को ब्रैंड एंबेसेडर बनने का न्यौता दे रहा है। कुछ राज्यों में सितारे ब्रैंड एंबेसेडर के तौर पर एक्टिव भी हो गए हैं। सत्तारूढ़ पार्टी और सितारों के बीच परस्पर लाभ और प्रभाव के लिए रिश्ते बनते हैं। भारतीय समाज में तीन क्षेत्रों के लोगों को प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हासिल है। इनमें राजनीति, खेल और फिल्म शामिल हैं। स्वार्थ, लाभ और प्रभाव से इनके बीच उपयोगी संबंध बनते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमिताभ बच्चन दादा साहेब फाल्के…

दीवार

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40 साल पहले आज ही के दिन 21 जनवरी 1975 को दीवार रिलीज हुई थी। इसके निर्देशक यश चोपड़ा थे। इस फिल्‍म ने ही अमिताभ बच्‍चन को स्‍टारडम की ऊचाई दी थी। इस फिल्‍म में उनके साथ शशि कपूर और निरूपा राय की भी खास भूमिका थी। इसके पहले 'जंजीर' से उन्‍हें एंग्री यंग मैन की मिली छवि का 'दीवार' ने पुख्‍ता कर दिया था। दोनों ही फिल्‍मों के लेखक सलीम-जावेद थे।  यश चोपड़ा ने पहले राजेश खन्‍ना को विजय और नवीन निश्‍चल को रवि की भूमिका देने की सोची थी। तब उनकी मां की भूमिका वैजयंती माला निभाने वाली थीं। कहते हैं सलीम-जावेद ने शत्रुघ्‍न सिन्‍हा को ध्‍यान में रख कर विजय का रोल लिखा था। वे राजेश खन्‍ना के नाम पर राजी नहीं थे,क्‍योंकि उनसे उनकी अनबन चल रही थी। राजेश खन्‍ना के नहीं चुने जाने पर नवीन निश्‍चल और वैजयंती माला ने भी फिल्‍म छोड़ दी। मां की भूमिका के लिए यश चोपड़ा ने वहीदा रहमान के बारे में भी सोचा था,लेकिन 'कभी कभी' में पति-पत्‍नी की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्‍चन और वहीदा रहमान को साथ में लेना उचित नहीं लगा।  अमिताभ बच्‍चन ने 'दीवार' के साथ-साथ 'शोले' और '…

तमाशा में दीपिका पादुकोण

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परसेप्शन बदले आतंकवाद का-नीरज पाण्डेय

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-अजय ब्रह्मात्मज नीरज पाण्डेय की ‘बेबी’ लागत और अप्रोच के लिहाज से उनकी अभी तक की बड़ी फिल्म है। उनके चहेते हीरो अक्षय कुमार इसके नायक हैं। फिल्म फिर से आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर है। ‘बेबी’ एक मिशन का नाम है,जिस में अक्षय कुमार अपनी टीम के साथ लगे हैं। नीरज पाण्डेय की खूबी है कि उनकी फिल्मों के विषय और ट्रीटमेंट अलग और आकर्षक होते हैं। - हिंदी फिल्मों के ढांचे के बाहर के विषयों के प्रति यह आकर्षण क्यों है और आप का ट्रीटमेंट भी अलहदा होता है? 0 बाकी काम जो लोग सफल तरीके से कर रहे हैं,उसमें जाकर मैं क्या नया कर लूंगा? विषय चुनते समय मैं हमेशा यह खयाल रखता हूं कि क्या मैं कुछ नया कहने जा रहा हूं? कुछ नया नहीं है तो फिल्म बनाने का पाइंट नहीं बनता। कहानियों की कमी नहीं है। पुरानी कहानियों को आज के परिप्रेक्ष्य में रख सकते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि हर बार कुछ नया करूं। एक फिल्म में दो-ढाई साल लग जाते हैं। मुझे लगता है कि अगर कुछ नया न हो तो कैसे काम कर पाएंगे। - आप की सोच और परवरिश की भी तो भूमिका होती है विषयों के चुनाव में? 0 हो सकता है। पहली फिल्म से ही मैंने ऐसी कोशिश की। शुरूआत करते समय…

जैक्‍लीन फर्नाडिस के मोहक नृत्‍य भाव

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आज की प्रेमकहानी है ‘मिर्जिया’-राकेश ओमप्रकाश मेहरा

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-अजय ब्रह्मात्मज
    राकेश ओमप्रकाश मेहरा इन दिनों जैसलमेर में हैं। जोधपुर और उदयपुर के बाद उन्होंने जैसलमेर को अपना ठिकाना बनाया है। वहां वे अपनी नई फिल्म ‘मिर्जिया’ की शूटिंग कर रहे हैं। यह फिल्म पंजाब के सुप्रसिद्ध प्रेमी युगल मिर्जा़-साहिबा के जीवन पर आधारित फिल्म है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा इसे किसी पीरियड फिल्म की तरह नहीं रच रहे हैं। उन्होंने लव लिजेंड की इस कहानी को आधार बनाया है। वे आज की प्रेमकहानी बना रहे हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा के लिए इसे गुलज़ार ने लिखा है। नाम भी ‘मिर्जिया’ रख दिया गया है। गुलज़ार साहब ने इसे म्यूजिकल टच दिया है। उन्होंने इस कहानी में अपने गीत भी पिरोए हैं,जिन्हें शंकर एहसान लॉय ने संगीत से सजाया है।
    कम लोगों को पता है कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘दिल्ली 6’ के बाद ही इसे बनाना चाहते थे,लेकिन तब ‘भाग मिल्खा भाग’ की कहानी मिली। उन्होंने पहले उसका निर्देशन किया। जोधपुर से जैसलमेर जाते समय हाईवे के सफर में राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह बातचीत की। उन्होंने बताया,‘अच्छा ही हुआ कि तीन सालों तक कहानी आहिस्ता-आहिस्ता पकती रही। गुलज़ार भाई इस पर काम करते रहे। यह पोएट…

फिल्‍म समीक्षा : क्रेजी कुक्‍कड़ फैमिली

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फिल्‍म समीक्षा : अलोन

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-अजय ब्रह़मात्‍मज  डरावनी फिल्मों का भी एक फॉर्मूला बन गया है। डर के साथ सेक्स और म्यूजिक मिला कर उसे रोचक बनाने की कोशिश की जारी है। भूषण पटेल की 'अलोन' में डर, सेक्स और म्यूजिक के अलावा सस्पेंस भी है। इस सस्पेंस की वजह से फिल्म अलग किस्म से रोचक हो गई है। हिंदी फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि प्रेम के लिए कुछ लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। कई बार हद टूटने पर बड़ी डरावनी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। 'अलोन' ऐसे ही उत्कट प्रेम की डरावनी कहानी है। संजना और अंजना सियामी जुडवां बहनें हैं। जन्म से दोनों का शरीर जुड़ा है। दोनों बहनों को लगता है कि कबीर उनसे प्रेम करता है। लंबे समय के बाद उसके आने की खबर मिलती है तो उनमें से एक एयरपोर्ट जाना चाहती है। दूसरी इस से सहमत नहीं

दरअसल : ऊपर आका,नीचे काका

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-अजय ब्रह्मात्मज     राजेश खन्ना की लोकप्रियता और उसके प्रभाव को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। आठवें दशक के आरंभ में जवान हो रही पीढ़ी ने इस लोकप्रियता को राजेश खन्ना की फिलमों के जरिए महसूस किया है। अभी डिजायनर और स्टायलिस्ट आ गए हैं,लेकिन किसी भी कथित स्टार या सुपरस्टार के पहनावे की नकल नहीं होती। एक दौर था जब सभी राजेश खन्ना की शैली के गुरू कट कुर्ता पहनते थे। आलों का उनकी शैली में काढ़ते थे और आईने के सामने खड़े होकर पलकों को झपकाते हुए मीठी मुस्कान का रिहर्सल करते थे। राजेश खन्ना पे पूरी पीढ़ी को अपना दीवाना बना दिया था। लड़कियों की दीवानगी के किस्से तो और अलग एवं रोमांचकारी हैं। राजेश खन्ना की जिंदगी और मौत दोनों ने उनके प्रशंसकों का आकर्षित किया। सन् 2012 के जुलाई महीने में निधन के बाद मुंबई की सडक़ों पर उनकी अंतिम यात्रा में शामिल प्रशंसकों के समूह को भीड़ कहना अनुचित होगा। आर्शीवाद से श्मशन की उस यात्रा में उनके प्रशंसक उनकी यादों को तिरोहित करने नहीं,बल्कि संयोजित करने आए थे।     सुपरस्टार राजेश खन्ना ने लोकप्रियता की असीम ऊंचाई देखी और फिर अपनी ही लोकप्रियता का उस ऊंचाई से…