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संग-संग : अनुराग बसु और तानी बसु

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-अजय ब्रह्मात्मज बर्फी से फिलहाल चर्चित अनुराग बसु की पत्‍नी और हमसफर हैं तानी। दोनों की प्रेमकहानी और शादी किसी फिल्‍म की तरह ही रोचक है। संग-संग में इस बार अनुराग और तानी के संग...  मुलाकात और एहसास प्रेम का
तानी - तब मैं दिल्ली के एक गैरसरकारी संगठन में काम करती थी। डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का थोड़ा-बहुत काम देखती थी। मैं उस संगठन में कम्युनिकेशन कंसलटेंट थी। उन्होंने असम के ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का फैसला किया। उस समय मैंने उसकी स्क्रिप्ट लिखी और यह सोचा कि मैं ही डॉक्यूमेंट्री बनाऊंगी। संगठन के प्रमुख आलोक मुखोपाध्याय डायरेक्टर रमण कुमार को जानते थे। दोनों दोस्त थे। उन्होंने रमण जी को यह काम सौंप दिया। मुझे थोड़ा बुरा भी लगा। थोड़ी निराशा जरूर हुई, लेकिन शूटिंग के लिए मैं दिल्ली से असम गई। रमण कुमार जी मुंबई से अपनी टीम लेकर असम पहुंचे। वहां पता चला कि रमण जी तो शूट नहीं कर रहे हैं। रमण जी का एक जवान सा असिस्टेंट ही उछल-कूद कर सारे काम कर रहा है। हालांकि मैंने फिल्म इंस्ट्रीटयूट से पढ़ाई की है, लेकिन उस जवान लडक़े की शॉट टेकिंग से मैं चकित थी। मैं बहुत प्रभावित हुई। बाद में पता चला…

फिल्‍म समीक्षा : बर्फी

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निश्छल प्रेम सी मीठी बर्फी -अजय ब्रह्मात्मज  अगर फिल्म के शुरू में कही गई पंक्तियों को गौर से सुन लें तो अनुराग बसु की बर्फी को सही संदर्भ और अर्थ में समझने में मदद मिलेगी। चुटीले शब्दों में हिदायत देने के बाद कहा गया है..आज का प्यार ऐसा,टू मिनट नूडल्स जैसा,फेसबुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये जवां,कोर्ट में जाकर गया मर..आज के प्रेम की शहरी सच्चाई बताने के बाद फिल्म मिसेज सेनगुप्ता के साथ दार्जीलिंग पहुंच जाती है। मिसेज सेनगुप्ता श्रुति हैं। वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं। कभी दार्जीलिंग में बर्फी ने पहाड़ी झरने सी अपनी कलकल मासूमियत से उन्हें मोह लिया था। मां के दबाव और प्रभाव में उन्होंने मिस्टर सेनगुप्ता से शादी जरूर कर ली,लेकिन बर्फी का खयाल दिल से कभी नहीं निकाल सकीं। अपने रोमांस के साथ जब वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं तो हमारे दिलों की धड़कन भी सामान्य नहीं रह जाती। कभी आंखें भर आती हैं तो कभी हंसी आ जाती है। बर्फी गूंगा-बहरा है। स्वानंद किरकिरे की पंक्तियों और गायकी आला बर्फी के साथ इंट्रोड्यूस होते ही बर्फी हमारा प्रिय हो जाता है। वह हमें रिझा लेता है। उसके म्यूट ही …

दोहरी खुशी का वक्त है-प्रियंका चोपड़ा

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-अजय ब्रह्मात्मज
-आप की ‘बर्फी’ और म्यूजिक सिंगल लगभग साथ-साथ आ रहा है। क्या कहना चाहेंगी?
‘बर्फी’ मेरे करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। परफॉरमेंस के लिहाज से सबसे मुश्किल फिल्म होगी। मैं एक ऑटिस्टिक लडक़ी का रोल प्ले कर रही हूं। बहुत सारे लोग ऑटिस्टिक लोगों के बारे में नहीं जानते हैं।वे बहुत सिंपल,निर्दोष और अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं।   मैंने बहुत  संजीदगी से इस रोल को प्ले किया है। मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था, लेकिन अनुराग बसु ने यह रोल करवाने में मेरी बहुत मदद की है। उनके पैरों पर मैं इस फिल्म में खड़ी हूं। उम्मीद करती हूं कि यह लोगों को बहुत पसंद आएगा। जहां तक ‘सिंगल’ का सवाल है, तो वह भी नया है। मैंने अपने पैरों पर खड़े होकर परफार्म किया है। मैंने पहले कभी गाया नहीं है। यह अंग्रेजी में होगा। अमेरिका के ब्लैक आइड पीज ग्रुप के साथ मैंने यह गाना गाया है। गाने के बोल हैं, ‘इन माय सिटी’। दरसअल, मैं बचपन से बहुत सारे शहरों को अपने पालन-पोषण का श्रेय देती हूं। बरेली हो, लखनऊ हो, लद्दाख या पुणे और मुंबई। या अमेरिका में बोस्टन हो, न्यूयॉर्क हो, जहां मैं पली-बढ़ी हूं। इसलिए मेरे …

प्रेम देने में माहिर है बर्फी-रणबीर कपूर

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-अजय ब्रह्मात्मज
-कल आप की फिल्म रिलीज हो रही है। क्या कहना चाहेंगे?
0 मैं क्या कहूं? फिल्म के ट्रेलर और गाने बहुत कुछ बोल-बता रहे हैं। यह फिल्म आप को हंसाने और रुलाने के साथ एक नजरिया भी देगी जिंदगी का। अभी इतना ही कह सकता हूं।दर्शक बताएंगे कि पैसा वसूल फिल्म हो पाई कि नहीं?
-बर्फी का किरदार क्या है?
0 मैं गुगा-बहरा हूं,लेकिन दस मिनट के अंदर आप किरदार के साथ हो जाएंगे। हम ने उसके गूंगे-बहरे होने पर ज्यादा जोर नहीं दिया है। बर्फी चालू चैप्लिन है। चार्ली चैप्लिन और मिस्टर बिन हमारी प्रेरणा रहे हैं। इस किरदार को अनुराग बसु ने ऐसे ढाला है कि दर्शकों को वह अपना लगे। हम गूंगे-बहरे होने के तकनीकी और मेडिकल तथ्यों में नहीं उलझे हैं। मुझे भाव-भंगिमाएं बनानी पड़ी हैं। बर्फी के एहसास दर्शक महसूस करेंगे।
-डोंट वरी,बी बर्फी का क्या तुक है?
0 एक मशहूर गीत है ़ ़  ड़ोंट वरी,बी हैप्पी। हमलोगों ने हैप्पी की जगह बर्फी कर दिया है। बर्फी भी खुशी की तरह का सनसाइन है। वह हमेशा खुशी बांटता है। वह प्यार देने में माहिर है। अगर उसे कोई वापस प्यार नहीं करता तो भी उसका दिल नहीं टूटता। वह मुस्कराता रहता है। प्रे…

जिंदगी का जश्न है ‘बर्फी’-अनुराग बसु

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-अजय ब्रह्मात्मज
अनुराग बसु की ‘बर्फी’ आम हिंदी फिल्मों से अलग दिख रही है। स्वयं अनुराग बसु की पिछली फिल्मों से इसकी जमीन अलग है और किरदार भी। अनुराग बसु खुद बता रहे हैं ‘बर्फी’ के बारे में ़ ़ ़
पहला ट्रेलर आया ताक लगाा कि यह सायलेंट फिल्म है। फिल्म में ताजगी और उल्लास है। गानों के आने के बाद जिज्ञासाएं और बढ़ गईं हैं। क्या है यह फिल्म?
ट्रेलर में फिल्म की सारी बातें क्लियर नहीं की जा सकतीं। एक ही कोशिश रहती है कि फिल्म का सही इमोशन दर्शकों में जेनरेट हो जाए और एक इंटरेस्ट रहे। यह सायलेंट फिल्म तो नहीं है, लेकिन संवाद बहुत कम हैं। मेरी फिल्मों में आप कई बार ऐसे लंबे दृश्य देखेंगे, जिनमें कोई संवाद नहीं होता। ‘गैंगस्टर’ में 20 मिनट का एक ऐसा ही सीन था। ‘बर्फी’ की कहानी लिखते समय चुनौती रही कि कैसे बगैर संवादों को बातें रखी जाए। इसका अलग मजा और नशा है। शब्दों को भाव और एक्सप्रेशन में बदल देना। रणबीर के होने की वजह से मुझे सुविधा हुई। वे कमाल के एक्टर हैं। उनका कैरेक्टर ट्रेलर में भी समझ में आता है। झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) को ऑटिज्म है। वह दुनिया को एकदम अलग तरीके से देखती है। बहुत ही…

बर्फी में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा

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अनुराग बसु निर्देशित बर्फी में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा अहम भूमिकाओं में हैं। दोनों को अनुराग ने नए अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। इन दिनों इस फिल्‍म की शूटिंग कोलकाता में चल रही है। ये तस्‍वीर इंटरनेट सर्फिंग में दिख गई।

फिल्‍म समीक्षा:काइट्स

-अजय ब्रह्मात्‍मज रितिक रोशन बौर बारबरा मोरी की काइट्स के रोमांस को समझने के लिए कतई जरूरी नहीं है कि आप को हिंदी, अंग्रेजी और स्पेनिश आती हो। यह एक भावपूर्ण फिल्म है। इस फिल्म में तीनों भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों के दर्शकों का खयाल रखते हुए हिंदी और अंग्रेजी में सबटाइटल्स दिए गए हैं। अगर आप उत्तर भारत में हों तो आपको सारे संवाद हिंदी में पढ़ने को मिल जाएंगे। काइट्स न्यू एज हिंदी सिनेमा है। यह हिंदी सिनेमा की नई उड़ान है। फिल्म की कहानी पारंपरिक प्रेम कहानी है, लेकिन उसकी प्रस्तुति में नवीनता है। हीरो-हीरोइन का अबाधित रोमांस सुंदर और सराहनीय है। काइट्स विदेशी परिवेश में विदेशी चरित्रों की प्रेमकहानी है।

जे एक भारतवंशी लड़का है। वह आजीविका के लिए डांस सिखाता है और जल्दी से जल्दी पैसे कमाने के लिए नकली शादी और पायरेटेड डीवीडी बेचने का भी धंधा कर चुका है। उस पर एक स्टूडेंट जिना का दिल आ जाता है। पहले तो वह उसे झटक देता है, लेकिन बाद में जिना की अमीरी का एहसास होने के बाद दोस्ती गांठता है। प्रेम का नाटक करता है। वहीं उसकी मुलाकात नताशा से होती ह…

स्क्रीन प्ले खुद लिखने में आता है मजा: अनुराग बसु

-अजय ब्रह्मात्‍मज
थिएटर एवं टीवी से फिल्मों में आए युवा निर्देशक अनुराग बसु ने टीवी सोप और सीरियलों के बाद एकता कपूर की फिल्म कुछ तो है के निर्देशन में कदम रखा, लेकिन पूरा नहीं कर पाए। साया को अपनी पहली फिल्म मानने वाले अनुराग, भिलाई से 20 की उम्र में मुंबई आए थे। लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिली और अभी उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भरोसेमंद और सफल निर्देशक माना जाता है।

बचपन में कैसी फिल्में देखते थे?

होश संभालने के बाद से पापा-मम्मी को नौकरी के साथ थिएटर में मशगूल पाया। बचपन ग्रीन रूम में बीता। वे रिहर्सल करते, मैं होमवर्क करता। चाइल्ड आर्टिस्ट था। पापा सुब्रतो बसु और मां दीपशिखा भिलाई (छत्तीसगढ) के मशहूर रंगकर्मी हैं। हमारे ग्रुप का नाम अभियान था। वहां फिल्मों का चलन कम था, लेकिन अमिताभ बच्चन की फिल्में मैंने देखीं। तेजाब, कर्मा, हम और अग्निपथ याद हैं।

सिनेमा के प्रति रुझान कैसे हुआ?

मेरा झुकाव आर्ट और थिएटर की ओर था। भिलाई में पढाई का माहौल था। स्टील प्लांट के लोग बच्चों की पढाई पर पूरा ध्यान देते थे। ग्यारहवीं-बारहवीं तक मैंने भी जम कर पढाई की। इंजीनियरिंग में चयन हुआ। फिर लगा कि …

प्यार की उड़ान है काइट्स-राकेश रोशन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

उनकी फिल्मों का टाइटल अंग्रेजी अक्षर 'के' से शुरू होता है और वे बॉक्स ऑफिस पर करती हैं कमाल। रिलीज से पहले ही सुर्खियां बटोर रही नई फिल्म काइट्स के पीछे क्या है कहानी, पढि़ए राकेश रोशन के इस स्पेशल इंटरव्यू में-

[इस बार आपकी फिल्म का शीर्षक अंग्रेजी में है?]

2007 में अपनी अगली फिल्म के बारे में सोचते समय मैंने पाया कि आसपास अंग्रेजी का व्यवहार बढ़ चुका है। घर बाहर, होटल, ट्रांसपोर्ट; हर जगह लोग धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे हैं। लगा कि मेरी नई फिल्म आने तक यह और बढ़ेगा। ग्लोबलाइजेशन में सब कुछ बदल रहा है। अब पाजामा और धोती पहने कम लोग दिखते हैं। सभी जींस-टीशर्ट में आ गए हैं और अंग्रेजी बोलने लगे हैं। यहीं से काइट्स का खयाल आया। एक ऐसी फिल्म का विचार आया कि लड़का तो भारतीय हो, लेकिन लड़की पश्चिम की हो। उन दोनों की प्रेमकहानी भाषा एवं देश से परे हो।

]यह प्रेम कहानी भाषा से परे है, तो दर्शक समझेंगे कैसे?]

पहले सोचा था कि भारतीय एक्ट्रेस लेंगे और उसे मैक्सिकन दिखाएंगे। बताएंगे कि वह बचपन से वहां रहती है, इसलिए उसे हिंदी नहीं आती। फिर लगा कि यह गलत होगा। यह सब सोच…