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Monday, March 11, 2013

परदे पर साहित्‍य -ओम थानवी

ओम थानवी का यह लेख जनसत्‍ता से चवन्‍नी के पाठकों के लिए लिया गया है। ओम जी ने मुख्‍य रूप से हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्‍य पर बात की है। इस जानकारीपूर्ण लेख से हम सभी लाभान्वित हों। 
 -ओम थानवी
जनसत्ता 3 मार्च, 2013: साहित्य अकादेमी ने अपने साहित्योत्सव में इस दफा तीन दिन की एक संगोष्ठी साहित्य और अन्य कलाओं के रिश्ते को लेकर की। एक सत्र साहित्य और सिनेमापर हुआ। इसमें मुझे हिंदी कथा-साहित्य और सिनेमा पर बोलने का मौका मिला।
सिनेमा के मामले में हिंदी साहित्य की बात हो तो जाने-अनजाने संस्कृत साहित्य पर आधारित फिल्मों की ओर भी मेरा ध्यान चला जाता है। जो गया भी। मैंने राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा उर्फ बिज्जी के शब्दों में सामने आई लोककथाओं की बात भी अपने बयान में जोड़ ली।
बिज्जी की कही लोककथाएं राजस्थानी और हिंदी दोनों में समान रूप से चर्चित हुई हैं। हिंदी में शायद ज्यादा। उनके दौर में दूसरा लेखक कौन है, जिस पर मणि कौल से लेकर हबीब तनवीर-श्याम बेनेगल, प्रकाश झा और अमोल पालेकर का ध्यान गया हो?
वैसे हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा फिल्में- स्वाभाविक ही- उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की रचनाओं पर बनी हैं। इसलिए नहीं कि जब बंबई (अब मुंबई) में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ, प्रेमचंद ने खुद बंबई फिल्म जगत की ओर रुख किया। वहां वे विफल ही हुए। सरस्वती प्रेस के घाटे के चलते साप्ताहिक जागरणको दो साल चलाकर बंद करना पड़ा था। सो मोहन भावनानी की कंपनी अजंता सिनेटोन के प्रस्ताव पर 1934 में आठ हजार रुपए सालाना के अच्छे-खासे अनुबंध पर वे मुंबई पहुंच गए।
प्रेमचंद की कहानी पर मोहन भावनानी ने 1934 में मजदूर बनाई। उसका नाम कभी मिल हुआ, कभी सेठ की बेटी भी। प्रेमचंद का क्रांतिकारी तेवर उसमें इतना प्रभावी था कि फिल्म सेंसर के हत्थे चढ़ गई। मुंबई प्रांत; पंजाब/लाहौर; फिर दिल्ली- फिल्म पर प्रतिबंध लगते गए। उसमें श्रमिक अशांतिका खतरा देखा गया। फिल्म की विधा तब नई थी, समाज में फिल्म का असर तब निरक्षर समुदाय तक भी पुरजोर पहुंचता था।
अंतत: मजदूर सेंसर से पास हुई, पर चली नहीं। हां, उसके असर ने कहते हैं प्रेमचंद के अपने सरस्वती प्रेस के मजदूरों को जागृतकर दिया था! वहां के श्रमिकों में असंतोष भड़क गया!
1934 में ही प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन’ (जो पहले उर्दू में बाजारे-हुस्न नाम से लिखा गया था) पर नानूभाई वकील ने फिल्म बनाई। प्रेमचंद उससे उखड़ गए थे। हिंदी साहित्य में लेखक और फिल्मकार की तकरार की कहानी वहीं से शुरू हो जाती है। हालांकि चार साल बाद इसी उपन्यास पर तमिल में के. सुब्रमण्यम ने जब फिल्म बनाई, प्रेमचंद उससे शायद संतुष्ट हुए हों। उस फिल्म में एमएस सुब्बुलक्ष्मी नायिका थीं। अभिनय, सुब्बुलक्ष्मी के गायन आदि के कारण वह फिल्म बहुत सफल हुई।
अगले वर्ष उनके उपन्यास नवजीवन पर फिल्म बनी। इस बीच प्रेमचंद का मोहभंग हुआ, पीछे सरस्वती प्रेस के मजदूर भी हड़ताल पर चले गए। वे मुंबई छोड़ बनारस लौट आए। 1936 में उनका निधन हो गया। निधन के बाद उनकी कहानी पर स्वामी (औरत की फितरत/त्रिया चरित्र), हीरा-मोती (दो बैलों की कथा), रंगभूमि, गोदान, गबन और बहुत आगे जाकर सत्यजित राय सरीखे फिल्मकार के निर्देशन में शतरंज के खिलाड़ी और सद्गति बनीं।
हिंदी फिल्मों में सत्यजित राय को छोड़कर शायद ही किसी फिल्मकार ने प्रेमचंद के साहित्य के मर्म को समझने की कोशिश की हो। यों मृणाल सेन ने भी कफनकहानी पर तेलुगु में फिल्म (ओका उरी कथा) बनाई है, जिसे मैं अब तक देख नहीं सका हूं। राय ने शतरंज के खिलाड़ी  में बहुत छूट ली- उस पर आगे बात होगी- लेकिन रचना की उनकी समझ पर कौन संदेह कर सकता है?
वैसे प्रेमचंद अजंता सिनेटोन में अपना अनुबंध पूरा होने के पहले ही समझ गए थे कि रचना को लेकर फिल्म वाले फिल्मी ही हैं। 28 नवंबर, 1934 को जैनेंद्र कुमार को लिखे एक पत्र में प्रेमचंद कहते हैं- ‘‘फिल्मी हाल क्या लिखूं? मिल (बाद में मजदूर नाम से जारी चलचित्र) यहां पास न हुआ। लाहौर में पास हो गया और दिखाया जा रहा है। मैं जिन इरादों से आया था, उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आता। ये प्रोड्यूसर जिस ढंग की कहानियां बनाते आए हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। वल्गैरिटीको ये एंटरटेनमेंट बैल्यूकहते हैं।... मैंने सामाजिक कहानियां लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे; लेकिन उनकी फिल्म बनाते इन लोगों को संदेह होता है कि चले, या न चले!’’
प्रेमचंद की कृतियों पर बनी फिल्मों के दौर में ही अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, सुदर्शन, सेठ गोविंददास, होमवती देवी, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और आचार्य चतुरसेन की रचनाओं पर भी फिल्में बनीं। वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर दो-दो बार। आम तौर वे सब साधारण फिल्में थीं।
1966 में फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफामपर बासु चटर्जी ने तीसरी कसम बनाई। भारी कर्ज लेकर फिल्म में पैसा शैलेंद्र ने लगाया। राज कपूर और वहीदा रहमान को लेकर भी फिल्म नहीं चली। कहते हैं इस सदमे में शैलेंद्र की जान चली गई। लेकिन आज वह फिल्म क्लासिक मानी जाती है। अभिनय, गीत-संगीत, नृत्य आदि में फिल्म उत्तम थी। छायांकन में उत्कृष्ट। पथेर पांचाली सहित सत्यजित राय की अनेक फिल्मों के छविकार सुब्रत मित्र ने तीसरी कसम भी फिल्माई थी। पर फिल्म का संपादन कमजोर था। रोचक कहानी भी बिखर-बिखर जाती थी। दूसरे, हीराबाई का दर्द फिल्म में उभर कर ही नहीं आया।
इसके बाद बासु चटर्जी ने राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाश (1969)   और मन्नू भंडारी की कहानी यही सच हैपर रजनीगंधा (1974) फिल्में बनाईं, जो चलीं। हालांकि फिल्म की सफलता से यह शायद ही जाहिर होता हो कि फिल्म ने कथा को बखूबी प्रस्तुत किया या नहीं। बासु चटर्जी, साफ नीयत के बावजूद, भावुकतावादी लोकप्रिय बुनावट के कारीगर हैं। हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार आदि हमारे यहां यही काम करते रहे हैं।
इस दौर को मैं साहित्य के संदर्भ में हिंदी फिल्मों का खुशगवार दौर कहता हूं। जो और फिल्में साठ और सत्तर के दशक में हिंदी लेखन को केंद्र में रखकर बनीं उनमें उल्लेखनीय थीं- फिर भी (तलाश): कमलेश्वर/शिवेंद्र सिन्हा, बदनाम बस्ती: कमलेश्वर/प्रेम कपूर; 27 डाउन (अठारह सूरज के पौधे): रमेश बक्षी/अवतार कौल; चरणदास चोर: विजयदान देथा/श्याम बेनेगल; त्यागपत्र (जैनेंद्र कुमार/रमेश गुप्ता); आंधी (काली आंधी): कमलेश्वर/गुलजार; जीना यहां (एखाने आकाश नाय): मन्नू भंडारी/बासु चटर्जी, आदि। इस तरह की फिल्में बंबइया बाजार की लीक से कुछ हटकर थीं। मगर थीं व्यावसायिक।
इनसे हटकर हिंदी फिल्मों का वह दौर है, जिसे नई धारा का समांतर सिनेमा भी कहा गया। साहित्य से इसका संबंध ईमानदार रहा, भले ही लेखक अपनी कृति के दृश्यों में ढले रूप से संतुष्ट न रहे हों।
साहित्यिक रचनाओं पर बनी सभी फिल्मों की सूची देना या उनकी समीक्षा करना यहां मेरा प्रयोजन नहीं है। पर उदाहरण के बतौर कुछ फिल्मकारों का उल्लेख और उनके काम की चर्चा मैं करता चलता हूं।
समांतर सिनेमा के दौर में हिंदी साहित्य को सबसे ज्यादा महत्त्व और निष्ठाभरी समझ मणि कौल ने दी। इसी दौर में कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पण पर फिल्म बनाई। इसके अलावा दामुल (कबूतर): शैवाल/प्रकाश झा; परिणति: विजयदान देथा/प्रकाश झा; पतंग: संजय सहाय/गौतम घोष; सूरज का सातवां घोड़ा: धर्मवीर भारती/श्याम बेनेगल; कोख (किराए की कोख): आलमशाह खान/आरएस विकल; खरगोश: प्रियंवद/परेश कामदार जैसी फिल्में भी कथा के निरूपण की दृष्टि से बेहतर थीं।
मणि कौल ने पूना फिल्म संस्थान की दीक्षा के फौरन बाद उसकी रोटी (1969) बनाई। मोहन राकेश की कहानी पर बनी इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा में कथा कहने का तरीका सिर से पांव तक बदल दिया। मणि के दिमाग में राकेश की कहानी का मर्म था, कथोपकथन और घटना-क्रम उन्होंने उतना ही लिया जितना अनिवार्य जान पड़ा। इस तरह उसकी रोटी ट्रक-ड्राइवर सुच्चा सिंह और उसकी पत्नी बालो की घरेलू दास्तान न बनकर मर्द की बेरुखी और औरत की वेदना का काव्यात्मक चित्रण बन गई। संवादों की अदायगी, संगीत की जगह सहज आवाजों का इस्तेमाल और छायांकन (के.के. महाजन) में ठहरी हुई छवियों की काली-सफेद भंगिमा ने कहानी को जैसे परदे की कविता में ढाल दिया।
खयाल करने की बात है कि इसी अंदाज में माया दर्पण (1972) चलती है, जो रंगीन भी है। कहानी का निर्वाह उसमें काव्यात्मक- दूसरे अर्थ में कलात्मक- है। लेकिन उसमें बिखराव भी है। चाहे प्रयोग हो, पर दर्शक के साथ तारतम्य टूटने का मतलब होता है, फिल्म का अपनी लय से छूटना। साहित्य में पाठक के साथ रिश्ता टुकड़ों में शक्ल ले सकता है, लेकिन सिनेमा में दर्शक को एक निरंतरता चाहिए। फिल्म के साथ अपने रिश्ते को दर्शक- पाठक की तरह- आगे भी आविष्कृत कर सकता है, लेकिन हर बार उसे एक तारतम्य फिर भी चाहिए।
अपने अंदाज में ही मणि कौल ने बाद में आषाढ़ का एक दिन (मोहन राकेश), दुविधा (विजयदान देथा), सतह से उठता आदमी (मुक्तिबोध) और नौकर की कमीज (विनोद कुमार शुक्ल) फिल्में बनाईं। सतह से उठता आदमी जरूर- माया दर्पण की तरह- किसी संगति से उचट जाती है, लेकिन नौकर की कमीज संगति के मामले में उन्हें बिल्कुल मुकम्मल ढंग से पेश करती है।
प्रसंगवश जिक्र करना मुनासिब होगा कि 1994 में एक जर्मन निर्माता के लिए मणि कौल ने एक छोटी फिल्म द क्लाउड डोर (बादल द्वार) बनाई थी। भास के नाटक अविमारकऔर जायसी के महाकाव्य पद्मावतपर आधारित फिल्म सिनेमाई बिंबविधान की दृष्टि से, मेरी समझ में, मणि कौल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है।
साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को जोड़े रखने में दूरदर्शन की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन कड़ियों में घर-घर को ध्यान में रखकर बनने वाले फिल्म-रूप आम तौर पर लचर ही देखे गए हैं। छोटे परदे के लिए फिल्मांकन की अपनी सीमाएं होती हैं। सद्गति (प्रेमचंद/सत्यजित राय) और तमस (भीष्म साहनी/गोविंद निहलानी) को छोड़कर कोई उल्लेखनीय चित्रांकन मुझे खयाल नहीं पड़ता। यों चंद्रकांता (देवकीनंदन खत्री), निर्मला (प्रेमचंद), राग दरबारी (श्रीलाल शुक्ल), कब तक पुकारूं (रांगेय राघव), मुझे चांद चाहिए (सुरेंद्र वर्मा), नेताजी कहिन (कक्काजी कहिन, मनोहर श्याम जोशी) पर भी धारावाहिक फिल्मांकन हुआ है। अन्य अनेक कहानियों पर भी। प्रेमचंद की कहानियों पर तो गुलजार ने काम किया। लेकिन यह सब कहानियों का इस्तेमाल भर रहा।
साफ कर दूं कि सिनेमा या टीवी के लिए संवाद या पटकथा लेखन को मैं यहां दूर रखता हूं। वरना प्रेमचंद के अलावा सुदर्शन, हरिकृष्ण प्रेमी, सेठ गोविंददास, द्वारकाप्रसाद मिश्र, धनीराम प्रेम, अमृतलाल नागर, राही मासूम रजा, मनोहर श्याम जोशी ने फिल्मों और टीवी के लिए भी बड़ी कलम-घिसाई की।
पर सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी के लिए हमें सत्यजित राय पर अलग से बात करनी चाहिए। हिंदी में राय ने   दो ही फिल्में बनाईं; दोनों प्रेमचंद की कहानियों पर। शतरंज के खिलाड़ी 1977 में बनी। सद्गति दूरदर्शन के लिए चार साल बाद बनाई। पहली फिल्म पर विवाद उठा। दरअसल, ‘शतरंज के खिलाड़ीछोटी कहानी है, पूर्ण अवधि की फिल्म उस पर बन नहीं सकती। राय फिल्म में वाजिद अली शाह और लॉर्ड डलहौजी के सैनिकों की पेशकदमी ले आए। वरना प्रेमचंद की कहानी घर-परिवार और समाज-सरकार को ताक पर रख हरदम शतरंज खेलने वाले दो निकम्मे नवाबों के गिर्द सिमटी रहती है। राय ने कहानी का अंत फिल्म में बदल दिया।
सत्यजित राय ने प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ीका विस्तार तो किया ही था, अंत भी बदल दिया था। मिर्जा और मीर वहां एक दूसरे को तलवार से मौत के घाट नहीं उतारते, फिर से बाजी जमा कर बैठ जाते हैं। परस्पर मार-काट दो नवाबों की आपसी कहानी बन कर रह जाता; फिल्म में तमंचे निकाल कर, चला कर अंतत: फिर बाजी पर आ जाना अंगरेजी फौज के हमले के प्रति अवध की (व्यापक अर्थ में हमारी) अनवरत उदासीनता का मंजर बन जाता है। मुझे लगता है राय ने प्रेमचंद को आदर भी दिया (कहानी का चुनाव और उस पर उस दौर में बड़े बजट की फिल्म बनाना भी एक प्रमाण है) और उसके असर में इजाफा भी किया।
हालांकि किसी लेखक के गले यह बात न उतरे कि फिल्मकार- चाहे कितना ही महान हो- अपनी पुनर्रचना में इतनी छूट ले सकता है। आलोचकों ने इसे खिलवाड़कहा।
राय अपनी ज्यादातर फिल्में कथा-साहित्य पर ही केंद्रित रखते आए थे। शायद ही कभी कथा में बड़ा बदलाव उन्होंने किया हो। हिंदी कहानी के साथ यह प्रयोगभारी आलोचना का कारण बना। विवाद का नतीजा था या राय ने खुद सद्गति में किसी तरह के परिवर्तन की जरूरत अनुभव नहीं की, कहा नहीं जा सकता।
इस बारे में मेरा विचार यह है कि अगर फिल्मकार पाए का है और लेखक को उस पर भरोसा है तो फिल्मकार को पर्याप्त छूट मिलनी चाहिए। एक फिल्मकार किसी कहानी, उपन्यास या नाटक पर हमेशा इसलिए फिल्म नहीं बनाता कि उसे फिल्म की पटकथा के लिए बना-बनाया कथा-सूत्र चाहिए। इसके लिए उसे बेहतर लोकप्रिय चीजें- गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक ढेर उदाहरण मिल जाएंगे- मिल सकती हैं। साहित्यिक कृति को चुनने में ही गंभीर सृजन के प्रति उसका सम्मान जाहिर हो जाता है; अगर लेखक का भी भरोसा उसमें हो तो अपनी कृति उसे फिल्मकार के विवेक पर छोड़ देनी चाहिए। वह परदे पर संवर भी सकती है, बिगड़ भी सकती है।
हम इस बात का खयाल रखें कि किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म उसके पाठकों का विस्तार करने के लिए नहीं बनाई जाती। न इसलिए कि जिन तक लेखनी न पहुंच सके, चाक्षुष रूप में फिल्म पहुंच जाए। फिल्म शब्दों का दृश्य विधा में अनुवादनहीं हो सकती। यह फिल्म की विधा को कमतर करके देखना होगा, और साहित्य को भी। फिल्मकार के उपकरण जुदा होते हैं। वह रचना को शब्दों के पार ले जाना चाहता है। मुश्किल यहीं पर है, जब साहित्यजगत फिल्म में से साहित्य को हू-ब-हू देखना चाहता है। एक हद तक यह लगभग असंभव अपेक्षा ही है; गद्य का विवरण- नैरेटिव- फिल्म में सिर्फ पार्श्व से बोलकर व्यक्त किया जा सकता है- सूरज का सातवां घोड़ा- पर वह हमेशा शायद ही कारगर साबित हो।
साहित्य पर बनी गंभीर और ईमानदार फिल्म दृश्यों, ध्वनियों, रंगों और प्रकाश के आयामों में एक कृति को समझने की कोशिश होती है। पाठक रचना से हजार अर्थ लेकर बाहर निकलते हैं, एक फिल्मकार भी एक श्रेष्ठ कृति का अपना पाठ प्रस्तुत करता है। इस तरह वह किसी रचना की पुनर्रचना भी करता है, जो बड़ा काम है।
हिंदी में सौ वर्षों में साहित्यिक कृतियों पर सौ फिल्में भी नहीं बनी हैं। कुमार शहानी जैसे फिल्मकार ने माया दर्पण बनाई, पर निर्मल वर्मा उसमें अपनी कहानी देखते थे। शहानी कहते थे, यह उस कहानी का बिंबों में पुनराविष्कार है।
मन्नू भंडारी के उपन्यास आपका बंटीपर फिल्म बनी तो मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया। अंत में यह समझौता हुआ कि फिल्म आपका बंटीसे जोड़कर नहीं प्रचारित की जाएगी। वह फिल्म समय की धारा नाम से दिखाई गई। बहरहाल, यह व्यावसायिक फिल्म थी। बाजार के लिए किए गए बदलाव छूट के घेरे में नहीं आ सकते।
यहीं मायादर्पण का मामला यहां अलग हो जाता है। शतरंज के खिलाड़ी या उसकी रोटी का भी। दुविधा के सिनेमाई भाष्य में मणि कौल और अमोल पालेकर में रात-दिन का भेद है। श्याम बेनेगल ने भी चरणदास चोर में अपने भाष्य की खूब छूट ली है। कहानी उसे निखारती ही है।
विदेश में साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बेहतर है। वहां शेक्सपियर की कृतियों पर बेशुमार फिल्में बनी हैं। एक ही कृति पर अनेक बार फिल्म बनना जाहिर करता है कि हर फिल्मकार कृति को नए सिरे से पढ़ना’, अपनी विधा में आविष्कृत करना चाहता है। बालजाक, सरवांतेस, तोलस्तोय, चार्ल्स डिकंस, टॉमस हार्डी, मार्क ट्वेन, अल्बेयर कामू, ग्राहम ग्रीन, ईएम फॉस्टर, व्लादीमिर नाबोकोव, मार्शल प्रूस्त, एमिल जोला, गुंथर ग्रास, हरमन हेस... सूची बेहद लंबी है। उनकी कृतियों पर अच्छी फिल्में भी मिलती हैं, बुरी भी। गाब्रिएल गार्सिया मार्केस ने अपने तीन उपन्यासों पर बनी फिल्में देखने के बाद निश्चय किया कि अ हंड्रेड इयर्स आॅफ सॉलिट्यूडपर फिल्म बनाने की इजाजत कभी नहीं देंगे।
मैं समझता हूं फिल्म की विधा जब तक कथा का   आधार चाहती है- हालांकि अब इस पद्धति में बदलाव आ रहे हैं- तब तक उसे साहित्य को अपना भाष्य देने की आजादी रहनी चाहिए। साहित्य और सिनेमा का यह सार्थक रिश्ता होगा। हिंदी में तो अनेक कृतियों में सिनेमा की संभावनाएं हैं। किसी कृति का मेरा पाठ मुझ में है, पर मैं यह भी क्यों न जानना चाहूं कि चाक्षुष विधा का कोई गंभीर सर्जक बाणभट्ट की आत्मकथा, नदी के द्वीप, अमृत और विष, दिव्या या मैला आंचल को किस तरह सामने ला सकता है?

Thursday, April 15, 2010

हिंदी टाकीज द्वितीय:सिनेमा के कई रंग-ओम थानवी

यह संस्मरण चवन्नी ने मोहल्ला लाइव से लिया है . ओम थानवी से अनुमति लेने के बाद इसे यहाँ प्रकाशित करते हुए अपार ख़ुशी हो रही है.ओम जी ने इसे चवन्नी के लिए नहीं लिखा,लेकिन यह हिंदी टाकीज सीरिज़ के लिए उपयुक्त है।


भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।

हमारे कस्बे फलोदी में तब एक सिनेमा हॉल था। अब दो हैं। पर पहले जो था उसमें सिनेमा तो था, हॉल नहीं था। यानी चारदीवारी थी, छत नहीं थी। सर्दी हो या गरमी, नीले गगन के तले सिनेमा का अजब प्यार पलता था। और तो और, ‘हॉल’ में कुर्सियां भी नहीं थीं। मुक्ताकाशी था, इसलिए फिल्में दिन ढलने के बाद ही देखी-दिखायी जा सकती थीं।
उस सिनेमाघर का नाम था – श्रीलटियाल टाकीज। लटियाल देवी का नाम है, इसलिए ‘श्री’ उपसर्ग। ऐसे ही बीकानेर में घर के पास जो सिनेमाघर था, उसका नाम था श्रीगंगा थिएटर। किसी महाराजा के नाम पर कोई चीज – इमारत हो या शहर – बगैर उपसर्ग के कैसे तामीर हो सकती है! लोग तो देवता के नाम पर इंसान के नामकरण में भी श्री जड़ना नहीं भूलते थे : श्रीनारायण बगरहट्टा!
बीकानेर में आधिकारिक तौर पर तब तीन सिनेमाघर थे। चौथा हमने अपने स्रोतों से तलाश लिया था। वह शहर से बाहर फौजी छावनी में था। श्रीकरणी थिएटर। करणी माता बीकानेर की कुलदेवी हैं। निशानेबाज के रूप में मशहूर हुए महाराजा करणी सिंह का नाम उसी देवी के नाम पर रखा गया था।
पर श्रीकरणी थिएटर केवल नाम में शाही था। वह दरअसल फलोदी के श्रीलटियाल टाकीज का सहोदर था। जबकि श्रीगंगा थिएटर रियासत के दौर की निशानी था। भव्य और आरामदेह। वह रंग प्रदर्शनों के लिए बना ‘थिएटर’ था, ‘टाकीज’ की शक्ल उसने बोलती फिल्मों के आविष्कार के कई साल बाद अख्तियार की। पर हमें श्रीकरणी थिएटर ज्यादा रास आता था। साठ पैसे के टिकट के मुकाबले वहां टिकट सिर्फ बीस पैसे था। दूसरे, जान-पहचान के चेहरे भी वहां नहीं होते थे, जिनसे आंख चुराएं।
उस दौर के सिनेमा के कई रंग बरबस याद आते हैं। जैसे श्रीलटियाल टाकीज में पहले बैठे-बैठे, फिर फर्श पर पसर कर फिल्म देखना। या श्रीगंगा थिएटर में किस्तों में फिल्म देखना। किस्तों में यों, कि आधी फिल्म आज, आधी कल! बच्चों का फिल्म देखना तब कोई सुरुचिपूर्ण काम नहीं समझा जाता था। पर पिता जी खुद अच्छी फिल्म देखने को उकसाते थे। पैसा देते थे। ‘जागते रहो’, ‘आशीर्वाद’ जैसी फिल्में सुझाते थे। या चार्ली चैपलिन, लारेल-हार्डी या आयवरी-मर्चेंट की ‘द गुरु’। विदेशी फिल्में इतवार को सुबह दस बजे के शो में ही चलती थीं। हिंदी फिल्मों को देखते वे छोटी होती थीं।
पर हमें शौक था रोज का। ज्यादा मजा ‘फूल और पत्थर’ (शांति, तू नहीं जानती, दुनिया कितनी जालिम है!), या ‘मेरे हुजूर’ (कौनसे ऐसे शहर में कौन सी ऐसी फिरदौस है, जिसे हम नहीं जानते!) में था। या ‘वक्त’ और ‘पाकीजा’, जिनके संवाद फिल्म चलने से पहले लोगों की जुबान पर होते थे। या दारा सिंह – रंधावा भाइयों की फिल्में, जिनमें फिल्म का कोई तत्त्व शायद ही रहता होगा।
इनमें अधिकांश फिल्में किस्तों में देखीं। किस्तों में इसलिए नहीं कि फिल्में लंबी होती थीं। दरअसल फिल्म देखते थे स्कूल से नागा कर। फिल्म खत्म होती, तब तक पीछे स्कूल की छुट्टी हो चुकी होती थी। देर से घर पहुंच कर रोज कोई सफाई दें, उससे बेहतर उपाय यह था कि आधी फिल्म देखकर वक्त पर घर पहुंच जाएं। अगले रोज स्कूल से घर लौटें और किसी बहाने बाहर निकल कर मध्यांतर के बाद की बाकी फिल्म देख आएं!
आप कहेंगे, यह कैसे होगा। मध्यांतर में फिल्म छोड़ सकते हैं, पर मध्यांतर के बाद भला किस सीट पर बैठेंगे! तो जनाब, किस्तों में फिल्म देखने वाला बीकानेर शहर में मैं अकेला नहीं था! ज्यादा नहीं, पर सिनेमा को समर्पित ढेर शौकीन थे। उन्हीं में हर रोज कुछ ‘हाफ टिकट’ यानी ‘इंटरवल’ बेचने वाले रहते तो कुछ खरीदने वाले। झूठ न समझें, एकाध बार तो यह भी किया कि मध्यांतर के बाद की फिल्म पहले देखी, मध्यांतर से पहले की बाद में!
मगर हम ही नहीं थे। जो उम्र में बड़े थे और कमाते थे, वे फिल्म पर खर्च का बाकायदा बजट रखते थे। एकाधिक बार फिल्म देखने वाले तो बेशुमार थे। कुछ एक ही फिल्म को आधा दर्जन दफा, या इससे भी ज्यादा देखने के लिए बदनाम थे। मेरे एक मामा ने ‘दो रास्ते’ बीस बार देखी थी।
लगातार फिल्में देखने वालों में नंदकिशोर आचार्य जैसे भले और रचनाधर्मी लोग भी थे। नवरात्र के श्रद्धालु जैसे वक्फे भर के लिए मांस-मदिरा छोड़ देते हैं, शहर के छात्र परीक्षा के दिनों में संजीदा होकर सिनेमाघरों से मुंह मोड़ लेते। पर आखिरी परीक्षा खत्म होने के बाद सीधे सिनेमाघर पहुंचते। रंगकर्मी और कथाकार वागीश कुमार सिंह सुबह आखिरी परीक्षा देने के बाद दिन में बाकी बचे तीनों शो देख आते थे। फिल्मों के कुछ रसिया ऐसे भी थे जो एक शो देखकर निकलते, दूसरे दरवाजे से अगले शो के लिए दाखिल हो जाते। अक्सर उसी फिल्म के लिए।
नयी फिल्में तब भी शुक्रवार के ‘शुभ दिन’ शुरू होती थीं। धाकड़ फिल्म हो तो पहला शो सुबह छह बजे शुरू होता। हम ‘पढ़ने वाले’ बच्चे-किशोरों का छह बजे के शो के लिए निकलना नामुमकिन था। उन वीरों को हम ईर्ष्या से देखते थे, जो हर कीमत पर पहला शो देख आते। उनका कौल था, बस पहला शो, वरना यह फिल्म कभी न देखूंगा। ऐसे जुनूनी सिनेमा प्रेमी, सुनते थे, रात सिनेमा की खिड़की के बाहर ही कहीं सो रहते हैं। एहतियातन वे अपनी हवाई चप्पल खिड़की के सामने बने जंगले में रख देते। सुबह पांच बजे, खिड़की में आहट हो उससे पहले, ऐसी चप्पलों की छोटी-मोटी कतार लग जाती थी। शहर के लोग निहायत शरीफ थे। कभी नहीं सुना कि बाद में आने वाले ने किसी चप्पल को फांद लिया हो। हां, खिड़की खुलने के बाद शराफत की गारंटी खत्म हो जाती। चप्पल पांव में हों तो ठीक, वरना टिकट गया और चप्पल भी!
लंबी फिल्में तब ज्यादा पसंद की जाती थीं। फिल्म डिवीजन की न्यूजरील के खत्म होने के बाद फिल्म बोर्ड का प्रमाण-पत्र परदे पर आते ही पूरे हॉल में एक हिस्स की गूंज उठती। असल में लगभग हर दर्शक फिल्म की ‘रीलों’ की संख्या पढ़ते हुए उसका उच्चारण भी करता था।
एक और याद, जो शायद अजीब लगे। सिनेमाघर के गलियारे में हम लोग हॉल के दरवाजे पर कान सटा कर फिल्म को सिर्फ सुनते थे। इसलिए कि एक बार देखी फिल्म पर दुबारा पैसा खर्च करने की ताब न थी, तो संवाद-संगीत सुनने भर से काम चला लेते थे। शायद मेरे जैसे फिल्म प्रेमियों (!) के लिए ही एचएमवी ने ‘मुगले-आजम’ और पॉलीडोर ने ‘शोले’ के संवादों की एलपी तक निकाल दीं। फिल्म को देखें ही नहीं, सुनें भी!
तब हर फिल्म के गानों के रेकार्ड निकलते थे। बाद में कैसेट आये। अब सीडी-डीवीडी के जमाने में पूरी फिल्म मिल जाती है, तो केवल गानों की क्या जरूरत। नये बाजार के सामने फिल्मी गानों का बाजार भी कुछ सिमट गया है। लेकिन विदेशों में आज भी बहुत-सी फिल्मों का संगीत अलग से बिकता है। गाने तो वहां की फिल्मों में आम तौर पर होते नहीं, पर दृश्यों के साथ चलते संगीत का अपना वजन होता है।
कीसलोव्स्की की ‘थ्री कलर्स’ त्रयी या काकोयानिस की ‘जोरबा द ग्रीक’ क्लासिक होते हुए भी बार-बार कब देख सकते हैं। लेकिन इन फिल्मों के संगीत की सीडी मैंने दर्जनों बार सुनी होगी। ऐसा संगीत यों तो दृश्य में प्रभाव पैदा करने का सहारा होता है, लेकिन फिल्म की स्थितियों के मुताबिक तैयार की गयी रचनाएं अलग से सुनने पर फिल्म के दृश्य की याद ही नहीं दिलातीं, कभी अलग रचना का सुख भी देती हैं।
तो हॉल के बाहर खड़े होकर भी फिल्म देखने का सुख हम अनुभव कर सकते थे। जो फिल्में न देख सकें, उनके चित्र (‘पोस्टर’) देखकर खुश हो लेते। नादानी कहिए या दीवानगी, फिल्मगीरी के ऐसे किस्से हजार होंगे! शायद ऐसे प्रतिबद्ध दर्शकों के चलते ही देश में फिल्में हफ्तों-महीनों नहीं, कभी-कभी बरस-दो बरस चल जाती थीं। क्या आज सिनेमा के प्रति दीवानगी कुछ कम नहीं हो गयी है? क्या ऐसी फिल्में नहीं आतीं जिनसे समाज अपने को जोड़ सके? या सिनेमा अब मनोरंजन का अहम साधन नहीं रहा?
ऐसा लगता तो नहीं। बीच में जरूर सिनेमा के बुरे दिन आये। टीवी की ‘क्रांति’ ने सिनेमा को पीछे ढकेल दिया। सिनेमाघर टूट-बिखर कर मॉल या शॉपिंग सेंटरों में बदल गये। लेकिन इन्हीं बाजारों में – कहते हैं – मल्टीप्लेक्स के चलन ने डूबते फिल्म उद्योग को फिर पटरी पर ला खड़ा किया है। क्या सचमुच?
आजकल ज्यादा फिल्में मैं घर पर देखता हूं। इसमें फिल्म का चुनाव और समय की सुविधा का तालमेल रहता है। फिर भी सिनेमा हॉल में एक जमात के बीच फिल्म देखने का अनुभव बिलकुल अलग होता है। पर फिल्म का चुनाव वहां सीमा में होगा। अपनी पसंद की फिल्म आप वहां नहीं चलवा सकते!
बहरहाल, पिछले दिनों मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में जाकर सात फिल्में देखीं।
एक मित्र का कहना है कि मैं विदेशी फिल्मों से आक्रांत रहता हूं। फ्रांसीसी, इतालवी, जर्मन, स्पानी, ईरानी, तुर्की। हिंदी फिल्मों को हिकारत से देखता हूं। जबकि हिंदी फिल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर को छूने लगी हैं। ऑस्कर नामित फिल्मों से होड़ लेती हैं। उन्होंने जब अमिताभ बच्चन की ‘ब्लैक’ की तारीफ में कसीदे पढ़े तो फौरन ‘चाणक्य’ सिनेमाघर को मुंह किया। निराश हुआ। अमिताभ की अतिनाटकीयता से वाकिफ होते हुए भी जोखिम ली और पछताया। वास्तविकता यह है कि हिंदी फिल्मों में कथा, पटकथा, संगीत, छायाकारी आदि के मामले में विशुद्ध बाजारू रवैया रहता है। सिनेमाघर में हिंदी फिल्म का संगीत इस तरह सिर पर चढ़ कर बजता है जैसे सिर फोड़ने पर आमादा हो।
फिर भी कभी-कभी खबर रखनी चाहिए कि क्या कुछ चल रहा है। इस बार पहले ‘कमीने’ देखी। फिर भरपूर तारीफ सुनकर ‘थ्री इडियट्स’। बाद में ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘एलएसडी’ यानी ‘लव, सेक्स और धोखा’, ‘वेल डन अब्बा’ और देर-दुरुस्त ‘इश्किया’। ‘कमीने’ पिछले वर्ष की फिल्म है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में कसावट के साथ नया अंदाज रहता है, जो हॉल से बाहर आते वक्त दर्शक को बेचैन नहीं करता। ‘इश्किया’ में सिनेमा का विवेक अनुभव होता है। कथानक के अनुकूल छायाकारी, गठे हुए संवाद, सधा हुआ अभिनय, कारगर संगीत। निर्देशक अभिषेक चौबे की यह पहली फिल्म है। विशाल भारद्वाज इसके निर्माता हैं और संगीत, पटकथा-संवादों में भी शरीक रहे हैं। उन्हें सिनेमा की गहरी समझ है, जो ‘मकबूल’ में श्रेष्ठ रूप में सामने आयी। उनका मार्गदर्शन भी चौबे को मिला होगा।
‘एलएसडी’ के निर्देशक दिवाकर बनर्जी दो फिल्मों ‘खोसला का घोंसला’ और ‘ओए लकी लकी ओए’ में अपनी प्रतिभा की झलक दे चुके हैं। लेकिन ‘एलएसडी’ फिल्म जर्मन मूल के फिल्मकार माइकल हेनेके की शैली की नकल है। नकल अपने में बुरी चीज नहीं है। पिकासो ने कहा था, खुद की नकल करने से बेहतर है दूसरे की नकल करना। इसमें आप सीखते हैं; अपनी नकल खुद को वहीं रखती है, जहां पहले थे। ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ शरद जोशी के व्यंग्य से प्रेरित है। साफ, निर्दोष प्रहसन के रूप में देखने के बाद इसे हम भूल सकते हैं।
लेकिन सबसे निराश किया शलाका-पुरुष श्याम बेनेगल की फिल्म ‘वेल डन अब्बा’ ने। अनिल अंबानी के ‘बिग सिनेमा’ के लिए बनायी गयी फिल्म में उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है। गरीबी की रेखा के नीचे दिखाने से लेकर कर्ज की मंजूरी के तिकड़मों को हंसी-मजाक के बीच उन्होंने बखूबी झलकाया है। लेकिन फिल्म धीमी चलती है और कोई नया कोण नहीं देती। यह खयाल सताने लगता है कि यह अंकुर, मंथन, भूमिका या जुनून के निर्देशक की फिल्म है। दुर्भाग्य से बेनेगल शायद मानने लगे हैं कि बाजार में कायम रहने के लिए फिल्म को अब बड़े समझौते करने पड़ते हैं। अंगरेजी में नामकरण तक के।
‘थ्री इडियट्स’ एक बेहतर कॉमेडी हो सकती थी। लेकिन एक तो उपदेशक या शिक्षा सुधार की भंगिमा अख्तियार करते हुए अतिरंजना के घेरे में दाखिल हो गयी। दूसरे, तर्क की वकालत करने वाली फिल्म अतिवादी स्थितियों में घुसती चली गयी। मसलन वैक्यूम क्लीनर के सहारे प्रसव, दुपहिए पर ‘एंबुलेंस’ आदि। फिल्म का संपादन बेहद लचर है। जैसे लेखक खुद अपनी रचना का बेहतर संपादन नहीं कर सकता, राजकुमार हीरानी जैसे प्रतिभावान निर्देशक को अपनी फिल्म का संपादन खुद करने से बचना चाहिए। कुशल संपादन से फिल्म में कसावट आती, अवधि भी कम होती।
इन फिल्मों की समीक्षा करना मेरा मकसद नहीं है, लेकिन गौर करें कि ये फिल्में पूरी तरह हिंदी फिल्मों के दशकों पुराने नाच-गान के फार्मूले पर आधारित नहीं हैं। जबकि आजकल कमोबेश हर फिल्म – ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ सहित – वर्जिश मार्का सामूहिक नृत्य और मशीनी लय वाले झमाझम संगीत से भरी होती हैं। जिन फिल्मों का मैंने जिक्र किया है, उनमें ज्यादातर हास्य-रस के फार्मूले का दोहन करती हैं। पहले हास्य की जगह हाशिये पर होती थी। ‘हाफ टिकट’ से लेकर ‘जाने भी दो यारों’ तक अनेक विशुद्ध रूप से हास्यप्रधान फिल्मों के बावजूद।
लेकिन अब गरीबी और भ्रष्टाचार में भी हास्य की संभावनाएं खोजी जा रही हैं। कहना न होगा, इससे फिल्म में मनोरंजन तो बना रहता है, लेकिन कथ्य की धार को ये कुछ कुंद भी करती हैं। बात के खुलासे के लिए एक उदाहरण दिया जा सकता है : ‘थ्री इडियट्स’ में गरीब मां बेलन से लकवाग्रस्त पति की छाती खुजाती है और केश-सने बेलन से रोटी बेल कर बेटे के दोस्तों को परोसती है। परिवार की दारुण हालत से भौंचक्क दोस्तों को इससे उबकाई आती है। पर दृश्य दर्शकों को हंसाता है। ठीक वैसे, जैसे तीसरे ‘इडियट’ की तकरीर में ‘चमत्कार’ की जगह ‘बलात्कार’ शब्द का अनवरत प्रयोग।
हंसाने के लिए हर चीज को हंसी में नहीं ढाला जा सकता। लगता है हिंदी सिनेमा अपने बचे रहने की जद्दोजहद में सारे हथकंडे आजमा रहा है। इसके बावजूद स्थिति यह है कि एकाध फिल्म को छोड़कर किसी में पचास दर्शक भी नहीं दिखाई दिये। कतार दूर, आगे पीछे दूसरा ग्राहक तक नहीं। भीतर दूर तक खाली सीटें।
सिनेमा ने तकनीक के स्तर पर बहुत तरक्की की है। लेकिन कोई मुकम्मल दिशा उसे अब भी दरकार है। सबसे बड़ा तो विचार या प्रत्यय का टोटा है। महात्मा गांधी के संघर्ष तक को हमारे फिल्मकार तब तक फिल्म के काबिल नहीं समझते, जब तक कोई अंगरेज उन पर सफल फिल्म बना कर न दिखा दे। एटनबरो के बाद जरूर जानू बरुआ से लेकर श्याम बेनेगल तक गांधी को कैमरे में उतार चुके हैं। बीच-बीच में हमें ‘परजानिया’ या ‘फिराक’ जैसी फिल्में देखने को मिल जाती हैं, जो गुजरात के खून-खराबे को भी परदे पर लाने में नहीं झिझकतीं। लेकिन फार्मूलों – चाहे पुराने हों या नये – के भरोसे चलने वाली फिल्मों के समक्ष उनकी तादाद नगण्य है।
इसमें क्या शक कि हालात बहुत बदल गये हैं। भाग-दौड़ और आपाधापी के दौर में सिनेमा के लिए पहले जैसा जुनून और फुरसत लोगों के पास नहीं है। लेकिन उनके पास साधन बढ़े हैं। टीवी ने सिनेमा के बाजार को जिस तरह घेर लिया था, मॉल संस्कृति में मल्टीप्लेक्स उसे छुड़ा लाने की जुगत में हैं। शहरों में सही, सौ-डेढ़ सौ रुपये का टिकट लोग खरीदते हैं। मेरे घर के इर्द-गिर्द ही कोई तीस सिनेमा हॉल हैं। शायद तीस से ज्यादा। दस मॉल हैं। हरेक में तीन, कहीं-कहीं चार सिनेमा हॉल हैं। खरीदारी या तफरीह की चहलकदमी के बीच सिनेमा अपना बाजार फिर खड़ा कर रहा है। लेकिन उसे क्यों लगता है दर्शक हर चीज मनोरंजन की चाशनी में ग्रहण करना चाहता है? दर्शक को आकर्षित करने का जुगाड़ उसे जैसे हिंसा और हंसी में ही नजर आता है। इससे आगे बात जब कभी जाती है – राजनीति, भ्रष्टाचार या डगमग मीडिया को मुद्दा बनाकर – तो उसे इतने स्थूल और अवास्तविक धरातल पर चित्रित किया जाता है कि यथार्थ विद्रूप की शक्ल ले बैठता है।
मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की सीढ़ियां उतरते हुए यही लगता है कि दर्शक की उदासीनता अपनी जगह होगी, सिनेमा की दुनिया में एक बेरुखी-सी छायी है। हमारे नये निर्देशकों में प्रतिभा और ऊर्जा खूब है। तकनीक में हम कहीं पीछे नहीं। समस्या बेहतर कथानक और सलीके की है। या अभिनय में इरफान खान और अक्षय कुमार या नंदिता दास और कैटरीना कैफ की खूबियां-सीमाएं समझने की। उम्मीद ही कर सकते हैं कि नये बाजारों के बीच पनप रहा सिनेमा बेहतर मुकाम हासिल करने का जतन करेगा।
(ओम थानवी का पाक्षिक स्‍तंभ अनंतर। जनसत्ता, 11 अप्रैल 2010 से साभार)