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Tuesday, April 14, 2015

समय की क्रूरता से टकराती एन एच 10 - विनोद अनुपम

http://singletheatre.blogspot.in/2015/04/10.html



कहानी कोई नई नहीं,हिन्दी में अब तक सौ से ज्यादा फिल्में बन चुकी होंगी जिसमें नायिका अपने और अपने पति पर हुए अन्याय का हिंसक बदला लेती है।एन एच 10 की कहानी भी वहीं से चलती वहीं खत्म होती है,लेकिन खत्म होने के पहले हरेक मोड और घुमाव पर यह जिन जिन सवालों से टकराती है,वह इस फिल्म को एक नई ऊंचाई पर खडी करती है।हाल के वर्षों में आयी फिल्मों में एन एच 10 को ऐसी कुछेक फिल्म में शामिल किया जा सकता है जो फ्रेम दर फ्रेम उंची उठती चली जाती है,पूरी फिल्म में ऐसे मौके विरले ढूंढे जा सकते हैं,जहां लगे कि लेखक निर्देशक के पास कहने के लिए कुछ नहीं है।और वह अपनी शून्यता की भरपाई खूबसूरत दृश्यों या आइटम नंबर या भारी भरकम संवादों से करने की कोशिश कर रहा है।निर्देशक नवदीप सिंह की कुशलता इसी से समझी जा सकती है कि महिला सशक्तीकरण,ऑनर कीलिंग,उपभोक्तावाद,शहरीकरण,कानून व्यवस्था,पुलिस व्यवस्था,पंचायती राज और समस्याओं के प्रति समाजिक चुप्पी जैसे मुद्दों को उधेडती यह फिल्म दृश्यों के सहारे ही संवाद करती है,यहां शब्दों की अहमियत बस दृश्य को सपोर्ट करने तक ही सीमित हैं।
कहानी एक महानगर के सफल जोडे के सहज संवादों से शुरु होती है।हालांकि अस्पष्ट संवाद और अस्पष्ट दृश्य पहले फ्रेम से दर्शकों को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि एन एच 10 का यह सफर आसान नहीं,इसीलिए बहुत रिलैक्स होने की कोशिश न करें। मीरा (अनुष्का शर्मा) और अर्जुन(नील भूपलम) नवविकसित शहर गुडगांव के मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं। दक्षिण भारतीय मीरा और उत्तर भारतीय अर्जुन के प्रेम विवाह में कोई समस्या नहीं,दोनों ही एक दूसरे को स्पेश देते हुए, एक दूसरे के साथ होने की भी कोशिश करते दिखते हैं। अर्जुन को अपने दोस्त की पार्टी में जाना है जबकि मीरा की इच्छा घर पर साथ समय गुजारने की है,लेकिन मीरा अर्जुन की इच्छा सम्मान करते हुए पार्टी जाना तय करती है। वहीं चुंबन लेने के बाद जब अर्जुन मीरा से फिर से सिगरेट पीने की शिकायत करता है, और मीरा उसे हंसकर टाल देती है तो अपने आप में यह संबंधों पर आर्थिक स्वतंत्रता के प्रभाव की कथा कह जाती है। पार्टी के बीच मीरा को एक प्रेंजेटेशन के लिए अर्जेंट कॉल आता है, और अर्जुन का दोस्त कहता है, तुम कार लेकर चली जाओ, मैं इसे अपनी गाडी से छोड दूंगा।वास्तव में शुरुआत के ये छोटे छोटे डिटेल्स बाद में मीरा के उस चरित्र को सहजता से स्थापित करने में सहायक होते हैं, जो ऊंची खडी चट्टान की चढाई करती भी दिखती है और अपराधियों के साथ मिले पुलिस इंसपेक्टर की आंखों में कलम घोंपते भी। कलम भी आत्मरक्षा का हथियार बन सकता है,नवदीप मीरा के बहाने शायद आज की लडकियों को समझ भी देते हैं,जरुरत सिर्फ आत्मविश्वास की होती है। वास्तव में नवदीप मीरा को सशक्त दिखाना चाहते हैं तो वे संवादों के बजाय दृश्यों के सहारे बढते हैं।
रात में अकेले कार से लौटते हुए लाल सिगनल देख सडक खाली होने के बावजूद मीरा कार रोक कर सिगनल होने का इंतजार करती है। वास्तव में नवदीप कानून पर उसके भरोसे को स्थापित करने की कोशिश करते हैं। यहीं उसका सामना दो गुंडों से होता है जो उसकी गाडी का सीसा तोड उसके साथ बदतमीजी करना चाहते हैं।लेकिन वह अपनी गाडी को भगा कर बच निकलती है। बदलते समय ने महिलाओं के प्रति हमारी समझ किस तरह बदली है,यह दिखाने की शुरुआत यहीं से होती है।मीरा की गाडी का सीसा तोडने वाले कोई पेशेवर अपराधी नहीं दिखते, एक सामान्य युवक की तरह वे बाइक से जा रहे होते है,बस अकेली लडकी को कार में अकेले देख कर वे लपक पडते हैं। अभी तक शायद ही कोई समाजशास्त्री इसका जवाब ढूंढ पाए हैं कि आखिर क्यों अकेली लडकी को देख कर उसके प्रति हिंसक भावनाएं बलवती होने लगती है। आखिर क्यों नहीं एक सामान्य जीव की तरह लडकियों को भी हम देख पाते हैं? अपराध की इस नई प्रवृति को पुलिस अधिकारी भी अपने तर्क से रेखांकित करता है, बढता हुआ बच्चा है साहब,कूदी तो मारेगा ही। यहां इसका जवाब नहीं मिलता कि बढते बच्चों की शैतानियों को तो उनके मां-बाप, परिवार शिक्षक नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं,यहां शहर के संदर्भ में अभिभावक के रुप में पुलिस या जनप्रतिनिधियों की भी कोई भूमिका बनती है या नहीं? पुलिस आसान सा रास्ता सुझाती है, बडे पुलिस अधिकारी आपके मित्र हैं,रिवाल्वर का लाइसेंस ले लिजिए।
यदि एन एच10 को ऑनर किलिंग या किसी एक विषय से जोड कर देखें तो फिल्म छोटी लग सकती है,लेकिन फिल्म अपने को बांध कर नहीं रखती,जहां अवसर मिलता है,बदलते समय और समाज पर अपने दृश्यों से टिप्पणी करती चलती है।फिल्म भारतीय समाज में आ रहे एक बडे अंतर को भी शिद्दत से रेखांकित करती है,एक ओर छोटे बेटे के सामने सास से पिटती महिला है, दूसरी ओर पुरुषों के बोर्ड के सामने सेनेटरी नेपकीन के ब्रांड प्रमोशन की रणनीति तैयार कर रही मीरा। यह फर्क मीरा के शब्दों से भी जाहिर होता है,जब वह कहती है कि आमतौर पर अभी भी नेपकीन खरीदने महिलाएं स्वयं नहीं निकलती। मीरा को निर्देशक एक प्रोफेशनल के रुप में दिखाते हैं, जिसके लिए सबसे महत्वपूर्ण उसका काम है, लेकिन मीरा अपने स्व को अपने प्रोफेशन के सामने समर्पित नहीं करती। वह महिला अधिकार की झंडाबरदार नहीं,लेकिन जब ढाबे के बाथरुम में दरवाजे पर वह महिलाओं के प्रति अपशब्द लिखी देखती है,तो उसे मिटाए बिना नहीं निकलती। लेकिन यही मीरा तब अधिकांश लोगों की तरह चुप रहती है,जब उसके सामने एक लडकी मारपीट कर उठाया जा रहा होता है। रोती चीखती भागती मीरा को निर्देशक कहीं पर भी सुपर वोमैन दिखाने की कोशिश नहीं करते। वास्तव में यह फिल्म किसी टेक्स्टबुक की तरह भी देखी जा सकती है कि कठिनाइयों में फंसने पर हम किस तरह अपना बचाव कर सकते हैं।
लौटते हैं कहानी पर अर्जुन मीरा को उसके जन्मदिन पर वीकएंड बिताने पास के किसी सुंदरपुरा फार्महाउस पर ले जा रहा होता है। शहर की सीमा खत्म होती है,गांव की हरियाली और खुलापन दिखने लगता है,लेकिन नहीं दिखता तो हमारे सपनों का गांव, गांव के एक मुहाने पर चार लोग बैठे हैं,उम्रदराज, ताश खेलते और शराब पीते हुए। उनसे जब अर्जुन सुंदरपुरा का पता पूछता है, तो वे उनसे पानी और शरबत के लिए नहीं पूछते, बल्कि पूरी बदतमीजी से कहते हैं,बोलो तो गोद में लेकर पहुंचा दूं। निर्देशक यह कहने में कतई संकोच नहीं करते कि एन एच से आ रही समृद्धि गांव से कीमत के रुप में सबसे पहले उसका गांवपन ही छीन रही है।
हाइ वे के एक ढाबे पर वे एक लडकी से टकराते हैं,जो प्रेम विवाह कर अपने पति के साथ गांव छोडकर भाग रही होती है। जबकि उसके भाई और रिश्तेदार उनकी जान लेने उनका पीछा कर रहे हैं।ढाबे पर वे लडके और लडकी को पकड लेते हैं,सारे लोग चुपचाप अत्याचार देखते रहते हैं,लेकिन अर्जुन अपने को रोक नहीं पाता,और लडकी के भाई सुरजीत(दर्शन कुमार) से भिड जाता है।समूह के सामने अकेला अर्जुन असहाय पिट जाता है।लेकिन पिटने का अपमान वह गले के नीचे नहीं उतार पाता। लगता है उसकी उत्तेजना को बैग में रखी रिवाल्वर हवा देती है।यहां नवदीप हमारे स्वभाव पर हथियार के प्रभाव को रेखांकित करने में सफल होते हैं। अर्जुन हाथ में रिवाल्वर लेकर उनके पीछे निकल जाता है, मीरा के रोकने पर वह कहता है,अरे गांव वाले हैं रिवाल्वर देख कर डर जाएंगे,उसे पता नहीं कि गांव के लिए हथियार अब सामान्य बात हो चुकी है। यहां नवदीप यह स्पष्ट करने से नहीं चूकते कि अर्जुन के लिए अब महत्वपूर्ण लडकी को बचाना नहीं,अपने अपमान का बदला लेना अधिक है, मीरा उसे उलझने से रोकने की कोशिश करती है,लेकिन वह नहीं रुकता और मीरा को गाडी में अकेले छोडकर चला जाता है।
अर्जुन की आंखों के सामने लडकी और लडके की क्रूरता से हत्या कर दी जाती है।वह मीरा को लेकर जान बचाकर भागता है। लेकिन भाग नहीं पाता, चोट खाए अर्जुन को अकेले छोडकर मीरा मदद की गुहार लेकर रात भर भागती है,लेकिन पुलिस उसकी मदद नहीं करती है। उसकी पूरी यात्रा में एकमात्र एक बिहारी दंपति उसके साथ होता है। उल्लेखनीय है कि लंबे अंतराल के बाद एन एच 10 में बिहारी चरित्र दिखते हैं।हरियाणा के एक क्रशर पर मजदूर दंपति के रुप में दिखते ये पात्र गरीब भले ही दिखते हैं,लेकिन कमजोर नहीं। स्थानीय गुंडों से जान बचाकर भागती नायिका इनके झोंपडे में शरण मांगती है, ये गुंडों के खिलाफ खडे नहीं होते,लेकिन नायिका को बचाते अवश्य हैं। उनके चेहरे पर डर नहीं दिखता। यह है हिन्दी सिनेमा में दिखता नया बिहार। आमतौर पर अधिकतर हिन्दी फिल्मों में बिहारियों को तिकड़मी और अपराधी के रूप में चित्रित कर घृणा का पात्र बनाया जाता रहा था, या फिर मूर्ख गंवार के रूप में हंसी का। परदे पर दिखता यह बिहार अब अलग है।एन एच 10 में फिल्मकार दिखाता है कि गुंडे बिहारी मजदूर से पानी पिलाने को भी कहता है तो दरवाजे के बाहर से,घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं करता। हिन्दी सिनेमा में मजदूर ही सही,लेकिन आत्मविश्वास से भरे बिहारियों का दिखना सुकून देता है।
मीरा बडी उम्मीदों के साथ सरपंच के यहां पहुंचती है।यहां भी छोटे छोटे दृश्यों से गांवों की हमारी परंपरागत मान्यता को खारिज करने की कोशिश करते हैं। गांव में 26 जनवरी के अवसर पर तमाशे हो रहे हैं। वहीं मीरा को एक छोटा बच्चा मिलता है,जिससे वह सरपंच के घर पहुंचाने का अनुरोध करती है, लगभग सात आठ साल का दिखता वह बच्चा उसके बदले मीरा से घडी की मांग करता है,फिर बोलता भी है इसमें लाइट नहीं,मेरे तो जूते में भी लाइट है। यह है गांवों पर एन एच का प्रभाव। यहां महिलाओं का महिलाओं के प्रति क्रूरता भी दिखती है,और गांवो  मे धूमधाम से चल रहे प्रजातांत्रिक व्यवस्था की हकीकत का भी।

वास्तव में एन एच 10 समय के बदलाव की कथा है,जिसके लिए नवदीप छोटी छोटी चीजें रेखांकित करते हैं। फिल्म में आरंभ से अंत तक नवदीप एक वातावरण बनाने में सफल होते हैं,जो दर्शकों को कहीं रिलैक्स होने का या कहें कहानी से निकलने का अवसर नहीं देती। लगभग रात भर की यह कहानी नीम अंधेरे में गुजरती है। फिल्म का कलर टोन धूसर रखा गया है,जो कहानी के तनाव को बनाए रखती है। फिल्म में अनुष्का,नील,दीपक झंकाल और दीप्ति नवल के अतिरिक्त अधिकांश पात्रों को पहचानना भले ही मुश्किल होता हो,लेकिन ऐसा कम होता है सभी अपने पात्रों की जीते दिखें। इस फिल्म के निर्माण से भी अनुष्का जुडी हैं,और इस फिल्म के लिए अनुष्का के सौ पी के माफ किए जा सकते हैं।

Wednesday, May 16, 2012

फिल्म समीक्षा के भी सौ साल

100 years of film review-अजय ब्रह्मात्‍मज 
पटना के मित्र विनोद अनुपम ने याद दिलाते हुए रेखांकित किया कि भारतीय सिनेमा के 100 साल के आयोजनों में लोग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं कि फिल्म समीक्षा के भी 100 साल हो गए हैं।
दादा साहेब फालके की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की रिलीज के दो दिन बाद ही बॉम्बे क्रॉनिकल में 5 मई, 1913 को उसका रिव्यू छपा था। निश्चित ही भारतीय संदर्भ में यह गर्व करने के साथ स्मरणीय तथ्य है। पिछले 100 सालों में सिनेमा के विकास के साथ-साथ फिल्म समीक्षा और लेखन का भी विकास होता रहा है, लेकिन जिस विविधता के साथ सिनेमा का विकास हुआ है, वैसी विविधता फिल्म समीक्षा और लेखन में नहीं दिखाई पड़ती। खासकर फिल्मों पर लेखन और उसका दस्तावेजीकरण लगभग नहीं हुआ है।
इधर जो नए प्रयास अंग्रेजी में हो रहे हैं, उनमें अधिकांश लेखकों की कोशिश इंटरनेशनल पाठकों और अध्येताओं को खुश करने की है। हिंदी फिल्मों की समीक्षा के पहले पत्र-पत्रिकाओं ने उपेक्षा की। कला की इस नई अभिव्यक्ति के प्रति सशंकित रहने के कारण यथेष्ट ध्यान नहीं दिया गया। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों का स्थान न देने की नीति बनी रही।
दरअसल, समाज में सिनेमा की जो स्थिति रही है, वही भाव पत्र-पत्रिकाओं में भी दिखा। अगर आरंभ से ही इस तरफ ध्यान दिया जाता तो निश्चित ही अभी तक एक परंपरा बनी रहती। हिंदी में लिखने-पढ़ने वाले अधिकांश व्यक्तियों का रिश्ता साहित्य से आरंभ होकर साहित्य की सीमा में ही घुट जाता है। जब भी फिल्मों की बात होती है तो एक हेय दृष्टि के साथ उस पर नजर डाली जाती है। रघुवीर सहाय के नेतृत्व में अवश्य ही कुछ बेहतरीन प्रयास हुए, लेकिन उस दौर के ज्यादातर समीक्षकों ने एक विशेष प्रकार के सिनेमा को ही विमर्श के काबिल समझा। उन्होंने मेनस्ट्रीम और लोकप्रिय सिनेमा को अछूत बना दिया। चूंकि आरंभिक प्रस्थान ही भटक गया, इसलिए अभी तक फिल्म समीक्षा और फिल्म लेखन भटकाव का शिकार नजर आता है।
समस्या यह भी है कि विमर्श के लिए स्थान नहीं है। फिल्मों की ऐसी गंभीर पत्रिकाएं और जर्नल नहीं निकलतीं, जहां कोई कुछ लिख सके। पत्र-पत्रिकाओं में शब्दों की सीमा और तात्कालिकता के दबाव में नियमित समीक्षक पूरी बात रख नहीं पाते। मैं अपने अनुभवों की बात करूं तो दैनिक जागरण जैसे अखबार में समीक्षा लिखते समय मेरा पहला दायित्व होता है निश्चित शब्द सीमा में हर उम्र और तबके के पाठकों तक फिल्म का मुख्य भाव और अभिप्रेत रख सकूं। निर्णायक समीक्षा लिखने से बेहतर है कि आप अपनी राय रख दें। उसके बाद पाठक तय करें कि उन्हें उससे क्या मिला? कुछ लोगों को लगता है कि अखबारों के रिव्यू दबाव में लिखे जाते हैं। अन्य अखबारों के बारे में नहीं मालूम, लेकिन दैनिक जागरण में कभी इस प्रकार का दबाव नहीं रहा।
मेरी स्पष्ट धारणा है कि फिल्मों की जानकारी और सूचना देना फिल्म पत्रकारिता का हिस्सा है। वहां संबंधित व्यक्तियों के नजरिए से प्रशंसा हो सकती है। फिल्म समीक्षा एक प्रकार का क्रिएटिव लेखन है, जिसमें समीक्षक के संस्कार, परिवेश, ज्ञान और जानकारी का पता चलता है।
हिंदी में ब्लॉग की लोकप्रियता के बाद फिल्मों पर बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। सभी लेखकों को समीक्षक मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन अगर उन सभी ब्लॉग को संकलित किया जाए तो पाठकों की सहज प्रतिक्रिया से फिल्म की समझ बढ़ सकती है। हिंदी में फिल्मों पर लेखन को अधिक बढ़ावा नहीं दिया जाता। यही कारण है कि हिंदी में मौलिक लेखक और समीक्षक फिल्मों के अनुपात में बहुत ही कम हैं।
इसके साथ ही हमें ध्यान देने की जरूरत है कि फिल्मों के बारे में निर्माता, निर्देशक, कलाकार और तकनीशियन खुद कितनी बातें और तथ्य शेयर करना चाहते हैं। अमूमन ज्यादातर प्रचारात्मक सामग्रियां उपलब्ध करवाई जाती हैं। होड़ और प्रतियोगिता में सभी लेखक और समीक्षक एक-दूसरे की नकल करते रहते हैं। जरूरत है कि हम फिल्मों पर भावात्मक, साहित्यिक और एकांतिक लेखन करने की बजाय फिल्मों के सामाजिक संदर्भ के साथ सौंदर्यबोध की दृष्टि से उसकी समीक्षा करें।

Sunday, May 29, 2011

दबंग के पक्ष में - विनोद अनुपम

सिने सवाद           दबंग के पक्ष में  विनोद अनुपम          भरा पूरा गाँव, ढ़ेर सारे बेतरतीब लोग, जिसमें कुछ को हम पहचान पाते हैं कुछ को नहीं। इनमें पाण्डेय भी हैं, सिंह भी, कुम्हार भी। सबों की अलग-अलग बनावट, अलग-अलग वेषभूषा, अलग-अलग स्वभाव। हद दर्जे का लालची भी, पियक्कड़ भी, मेहनती भी, आलसी भी, हिम्मती भी और डरपोक भी। यही विविध्ता पहचान है किसी हिन्दी समाज की, जो अपनी पूर्णता में प्रतिबिम्बित होता दिखता है 'दबंग' में। यही है जो 'दबंग' को एक विशिष्टता देती है, जिसमें हम अपने आस-पास को दख सकते हैं। ठीक 'शोले' की तरह, जहाँ नायक भले ही ठाकुर होता है, लेकिन गाँव को गाँव बनाने में 'मौसी' की भी उतनी ही भूमिका होती है जितना मौलबी साहब की। 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पफैमिली' के दौर में जब याद करने की कोशिश करते हैं कि पिछली बाद पर्दे पर अपना यह समाज हमने कब देखा था तो 'दबंग' की अहमियत का अहसास होता है। आश्चर्य नहीं कि छपरा, मुंगेर और बलिया जैसे शहरों में जहाँ कहा जाता था लोगों ने सिनेमा द्घर जाना छोड़ दिया है, वहाँ महीने भर तक टिकटों के लिए मारा-मारी होती रही थी। कहीं छुरे निकल रहे थे तो कहीं पुलिस लाठियां बरसा रही थी। १८०० प्रिंट के साथ रिलीज 'दबंग' की लोकप्रियता का यही कमाल था कि पहले ही दिन १७ करोड़ की कमाई कर इसने हिन्दी सिनेमा की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले। यह लोकप्रियता सिर्पफ मार्केटिंग गिमिक्स पर आधरित नहीं थी। जैसे जैसे दिन बीतता गया दर्शकों की बढ़ती भीड़ के साथ यह भी स्पष्ट होता गया। शुक्रवार, शनिवार, रविवार मात्रा तीन दिनों में इसकी कुल कमाई थी लगभग ५० करोड़, अब तक की सबसे बड़ी हिट मानी जाने वाली 'थ्री इडियट्स' से लगभग १२ करोड़ ज्यादा। पिफल्म के टे्रड विश्लेषको के चौंकने की बारी तब थी जब पहले हफ्रते में कुल ८२ करोड़ की कमाई के बावजूद टिकट खिड़की पर दर्शकों की भीड़ कायम थी। जबकि 'लपफंगे परिंदे' और 'अंजाना अंजानी' जैसी बड़े बैनर की बड़े सितारों की पिफल्में पहले दिन भी दर्शकों को सिनेमा द्घरों में नहीं रोक पा रही थी।  क्या कमाल सलमान खान का था, यदि ऐसा होता तो 'युवराज' जैसी भव्य पिफल्म दर्शकों द्वारा नकार नहीं दी जाती। क्या 'मुन्नी' की नाच देखने लोग जा रहे थे, यदि ऐसा होता तो 'आक्रोश' भी हिट होती जहाँ लगभग इसी तरह के गानों को पिफल्माने की कोशिश की गई थी। नवोदित निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप और देशी सी लगती नवोदित नायिका सोनाक्षी के नाम में भी दर्शकों को इस कदर खींचने की क्षमता कहा हो सकती थी। दबंग के प्रति दर्शकों के पागलपन की वजह एक ही लगती है वह है उसका लगता अपनापन। वह अपनापन जो हिन्दी सिनेमा से बीते दस व८र्ाों से पूरी तरह से लगभग गुम हो गया है। 'दबंग' की कहानी भी बहुत सीध्ी सी नहीं। ढ़ेर सारे पात्रा और ढ़ेर सारे पेंच है कहानी में, जैसा कि हमारे लोक कथाओं में होते रहे हैं। एक काम्पलेक्स सा परिवार, माँ नैना देवी, माँ का अपना बेटा चुलबुल पाण्डेय, माँ का दूसरा पति प्रजापति पाण्डेय और दोनों का बेटा मक्खी पाण्डेय। 'दबंग' में हालांकि इस पारिवारिक पृष्ठभूमि को जरा भी व्याख्यायित करने की कोशिश नहीं की जाती, लेकिन हिन्दी समाज के बदलते स्वरूप को जिस सहजता से स्थापित करती है वह चकित करता है, जो अपनी कटटर पारंपरिक स्वरूप के लिए कुख्यात रहा है। उस समाज में आज से बीस वर्ष पहले विध्वा विवाह ही नहीं हो रहे थे, उसके बच्चे को भी स्वीकार्य किया जा रहा था, और गाँव में इस विवाह, इस परिवार को प्रतिष्ठा भी मिल रही थी। यह है अपने समाज के बदलाव की पहचान जो निश्चित रूप से किसी चोपड़ा और किसी जौहर या मुम्बई में रमे किसी पिफल्मकार को नहीं मिल सकती। इसके लिए आपको अभिनव सिंह कश्यप या विशाल भारद्वाज या प्रकाश झा होना जरूरी हो जाता है।  चुलबुल पाण्डेय पढ़-लिख कर इंस्पेक्टर बन जाता है लेकिन अपने सौतेले पिता को स्वीकार्य करना उसके लिए मुश्किल रहता है। भाई मक्खी के साथ उसका प्रेम और द्घृणा का रिश्ता बना रहता है। चुलबुल अपने आपको रॉबिन हुड पाण्डेय कहता है। जुझारू इंस्पेक्टर लेकिन नैतिकता से कोई सरोकार नहीं। अपनी दिल की बात सुनता है वह। उसका सामना होता है गाँव की कुम्हारन रज्जो से, और मजबूत कद काठी की हिम्मती लड़की को वह दिल दे बैठता है। रज्जो की अपनी समस्या है उसके पिता पियक्कड़ हैं और दारू के लालच में वह कुछ भी करने को तैयार होता है। रज्जो की जिद है कि जब तक उसके पिता जीवित है वह शादी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता की देखभाल कौन करेगा। कहानी की एक पराकाष्ठा यहा भी दिखती है जब चुलबुल से शादी की उम्मीद में रज्जो के पिता अपने आप को अड़चन समझ कर नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं।  'दबंग' में अध्किांश चरित्रा ग्रे शेड में हैं, जैसा की हम होते हैं। किसी पल कोई महानता के शिखर पर होता है तो दूसरे ही पल मानवीय कमजोरियों में डगमग दिखता है। मक्खी निर्मला से प्यार करता है। निर्मला मास्टर के बेटी है, वह मक्खी से शादी की शर्त रखता है, लाख रुपये। मक्खी के पिता प्रजापति पाण्डेय अपनी छोटी सी पैफक्ट्री चलाते हैं वह मक्खी की शादी पर कोई पैसे खर्च करना नहीं चाहते।  इध्र चुलबुल पाण्डेय का सामना छेदी सिंह से हो जाता है, जो एक क्षेत्रिाय पार्टी के छात्रा संध् का अध्यक्ष है। लेकिन राजनीति के नाम पर सारे कुकृत्य करने को तैयार। चुलबुल छेदी के पर कतरने के लिए पार्टी के नेता दयाल बाबू से संपर्क करता है। लेकिन छेदी मक्खी के हाथों बम विस्पफोट करवा कर दयाल बाबू की हत्या करवा देता है। इतना ही नहीं छेदी चुलबुल की मां की हत्या ही नहीं करता उसके पिता के पैफक्ट्री में भी आग लगवा देता है।  कई सारे छोटे-छोटे क्लाइमेक्सों के साथ अंत में कहानी राजी खुशी खत्म होती है। जब चुलबुल और मक्खी दोनों भाई मिल जाते हैं। दोनों को अपनी अपनी प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं और जिस पिता से चुलबुल ने जिंदगी भर द्घृणा की उनका प्यार भी उन्हें हासिल हो जाता है। कहानी को इतने विस्तार से बयान करने का अर्थ सिर्पफ इतना भर है कि ये कथा वाचन हिन्दी समाज की परंपरा है। आज अध्किांश पिफल्में 'दे दना-दन' और 'वेलकम' जैसे कॉमेडी की बात छोड़ भी दें तो 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पैफमिली' जैसी पिफल्मों में कहानी के सूत्रा शुरू होते ही समाप्त हो जाते हैं। अध्किांश पिफल्में सिपर्फ दृष्यों का संयोजन होती हैं, अनजाना अनजानी जैसी पिफल्मों की कहानी आप एक पंक्ति में बयान कर दे सकते हैं। न किसी चरित्रा का विस्तार आप देख सकते हैं, न उसके अंतःकरण में झाँकने का अवसर पा सकते हैं। देख सकते हैं तो बस उसके डिजायनर कपड़े, डिजायनर एक्ससेरीज, मेकअप यशपाल की 'दुःख' कहानी को याद करें तो इनके दुख भी इनके खुद के ढोए हुए लगते हैं, जिनके प्रति आप लाख कोशिश करले कतई सहानुभूति नहीं कर सकते। वहाँ कोई समाज नहीं दिखता जिसे आप पहचान सकते, दिखते हैं अमेरिका की सड़कें, बैंकाक की रंगीनियाँ जहाँ आप एकदम अजनबी हो जाते हैं। 'दबंग' में जिन चेहरों को आप नहीं पहचान पाते, वे भी आप को अपने जैसे लगते हैं क्योंकि वे सब मिलकर एक समाज बनाते लगते हैं।  'दबंग' की लोकप्रियता की वजह इसके भदेसपन, इसकी 'मुन्नीबाई' में, इसके सलमान में, ढूँढ़े जाने के पहले इसके कथानक और इसकी प्रस्तुति में ढूँढ़ी जानी चाहिए। संयोग नहीं कि अभिनव सिंह कश्यप और लेखक दिलीप शुक्ला दोनो ही उत्तर प्रदेश से आते हैं जो अपने चरित्राों के साथ जिते रहे हैं। इसी लिए 'दबंग' के चरित्रा लार्जर देन लाइपफ होते हुए भी अपरिचित नहीं लगते। चाहे वह हवाओं में उड़कर मार करने वाला चुलबुल पाण्डेय हो या खुबसूरत कुम्हारन रज्जो। सभी पात्राों के बेहद करीब ले जाते हैं अभिनव। इतना कि आल्हा के सूर में 'हुड़ हुड़ दबंग दबंग' की गुंज के साथ जब चुलबुल की बांहे पफड़कती हैं तो सिनेमा द्घरों में बैठे दर्शकों के भी सीने चौड़े हो जाते है। अपने पात्राों से यह निकटता वह भी महसूस करते हैं जिन्होने वर्षों पहले अपनी माटी को छोड़कर रोजी रोटी के लिए महानगर को आशियाना बनाया और वे भी करते हैं जो अपनी माटी को अभी भी सींच रहे है। शायद इसीलिए दबंग जिस तरह छोटे शहरों के सिंगल थियेटरों में पसंद की गई, उतना ही महानगरों के मल्टीप्लेक्सों में भी। वास्तव में लम्बे अर्से के बाद कोई ऐसी हिन्दी पिफल्म उनके सामने आयी थी जिसमें उनके वजूद पर सवाल नहीं उठाया गया था। 'ओमकारा' हो या 'अपहरण', 'गंगाजल' अपने पर ही शर्म करने को मजबूर करते थे। खुद को सवालों के द्घेरे में खड़ा करते थे। ये पिफल्में अपने 'होने' के प्रति उत्साहित नहीं करती थी। 'दबंग' में भी हिंसा है, यहा भी नकारात्मकता है, राजनीतिक गड़बड़ियाँ यहाँ भी दिखती है, लेकिन यह सब समाज के एक अंश के रूप में दिखता है, जो आश्वस्त करती है कि हम इससे निबट सकते हैं। 'अपहरण' या 'ओमकारा' यह विश्वास दिलाने में सक्षम नहीं होती, इन पिफल्मों को देखते हुए हिन्दी समाज अपराध् का पर्याय लगने लगती है। 'दबंग' को शायद इसीलिए सर आँखों पर स्वीकार्य करते हैं। निश्चित रूप से 'दबंग' कोई क्लासिक पिफल्म नहीं है, क्लासिक 'शोले' भी नहीं थी लेकिन समय ने उसे क्लासिक का दर्जा दिलाया, हो सकता है २५ वर्ष बाद शायद 'दबंग' को भी एक क्लासिक के रूप में याद किया जाय। लेकिन आज यह क्लासिक होने का दावा करते भी नहीं लगती। पिफल्म के संवादों में भदेस शब्दों की भरमार है, वस्त्रा विन्यास में बिहार उत्तरप्रदेश की स्थानियता का खास ध्यान रखा गया है। अभिनय अतिरंजित है किसी ग्रामीण रंगमंच जैसा। यहाँ तक की चुलबुल पाण्डेय के गले में पड़ी माला भी कापफी जानी पहचानी लगती है। िपफल्म की पूरी शूटिंग महाराष्ट्र के वई में की गई, जहां प्रकाश झा भी अपना बिहार सृजित करते है। जाहिर है अभिनव को भी अपना लालगंज सृजित करने में कोई असुविध नहीं होती। वास्तव में हिन्दी सिनेमा ने जिस तरह हमारे सौंदर्यबोध् को तथाकथित रूप से लगातार कोशिश करते हुए हमें अपने ही समाज से अपरिचित करने की कोशिश की है उसमें 'दबंग' को मुखरता से स्वीकार्य करना मुश्किल होता है। लेकिन सच यह भी है कि अपनी सच्चाई, अपनी सहजता, अपनी माटी से मुकरना भी हमारे लिए मुश्किल होता है। इसीलिए 'दबंग' हमें चाहे अनचाहे भी आकर्षित करती है। इसलिए भी की भोजपुरी पिफल्मों की तरह भी अभिनव हिन्दी का स्वभाविक वातावरण रचते हुए भी तकनीकी कुशलता से कहीं समझौता नहीं करते। 'दबंग' में जितनी ही कुशल सिनेमेटोग्रापफी दिखती है उतना ही तीक्ष्ण संपादन, जो कहीं पर भी दर्शकों को 'लालगंज' से निकलने का अवसर नहीं देती। आश्चर्य नहीं कि दबंग हमें सिनेमायी संतुष्टि भी देती है। 'दबंग' की सपफलता वास्तव में हिन्दी सिनेमा में हिन्दी की जीत है। हिन्दी के स्वभाविक सिनेमा की जीत है। जिसमें जीवन के सारे सुर एक साथ मिलते हैं, इमोशन भी, हिंसा भी, परिवार भी, प्रेम भी, द्घृणा भी। लेकिन सारी जद्दोजहद के बीच जीत सच की। वास्तव में हिन्दी सिनेमा में यह सीध्ी सी बात देखने के लिए आँखें तरस गयी थीं। 'दबंग' हिन्दी सिनेमा को एक बार पिफर अपने पुराने व्याकरण की ओर लौटने को प्रेरित कर सकती है, बशर्ते 'दबंग' की सपफलता को संयोग नहीं माने हिन्दी सिनेमा।  ;लेखक पिफल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार से सम्मानित हैंद्ध ५३, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-२०,  मो. ९३३४४०६४४२नेशनल फिल्‍म अवार्ड मिलने के बाद से निरंतर 'दबंग' की चर्चा चल रही है। ज्‍यादातर लोग 'दंबग' को पुरस्‍कार मिलने से दंग हैं। विनोद अनुपम ने 'दबंग' के बारे में यह लेख फिल्‍म की रिलीज के समय ही लिखा था। उसकी प्रासंगिकता देखते हुए हम उसे यहां पोस्‍ट कर रहे हैं...

भरा पूरा गाँव, ढ़ेर सारे बेतरतीब लोग, जिसमें कुछ को हम पहचान पाते हैं कुछ को नहीं। इनमें पाण्डेय भी हैं, सिंह भी, कुम्हार भी। सबों की अलग-अलग बनावट, अलग-अलग वेषभूषा, अलग-अलग स्वभाव। हद दर्जे का लालची भी, पियक्कड़ भी, मेहनती भी, आलसी भी, हिम्मती भी और डरपोक भी। यही विविध्ता पहचान है किसी हिन्दी समाज की, जो अपनी पूर्णता में प्रतिबिम्बित होता दिखता है 'दबंग' में। यही है जो 'दबंग' को एक विशिष्टता देती है, जिसमें हम अपने आस-पास को दख सकते हैं। ठीक 'शोले' की तरह, जहाँ नायक भले ही ठाकुर होता है, लेकिन गाँव को गाँव बनाने में 'मौसी' की भी उतनी ही भूमिका होती है जितना मौलबी साहब की। 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पफैमिली' के दौर में जब याद करने की कोशिश करते हैं कि पिछली बाद पर्दे पर अपना यह समाज हमने कब देखा था तो 'दबंग' की अहमियत का अहसास होता है।
आश्चर्य नहीं कि छपरा, मुंगेर और बलिया जैसे शहरों में जहाँ कहा जाता था लोगों ने सिनेमा द्घर जाना छोड़ दिया है, वहाँ महीने भर तक टिकटों के लिए मारा-मारी होती रही थी। कहीं छुरे निकल रहे थे तो कहीं पुलिस लाठियां बरसा रही थी। १८०० प्रिंट के साथ रिलीज 'दबंग' की लोकप्रियता का यही कमाल था कि पहले ही दिन १७ करोड़ की कमाई कर इसने हिन्दी सिनेमा की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले। यह लोकप्रियता सिर्पफ मार्केटिंग गिमिक्स पर आधरित नहीं थी। जैसे जैसे दिन बीतता गया दर्शकों की बढ़ती भीड़ के साथ यह भी स्पष्ट होता गया। शुक्रवार, शनिवार, रविवार मात्रा तीन दिनों में इसकी कुल कमाई थी लगभग ५० करोड़, अब तक की सबसे बड़ी हिट मानी जाने वाली 'थ्री इडियट्स' से लगभग १२ करोड़ ज्यादा। पिफल्म के टे्रड विश्लेषको के चौंकने की बारी तब थी जब पहले हफ्रते में कुल ८२ करोड़ की कमाई के बावजूद टिकट खिड़की पर दर्शकों की भीड़ कायम थी। जबकि 'लपफंगे परिंदे' और 'अंजाना अंजानी' जैसी बड़े बैनर की बड़े सितारों की पिफल्में पहले दिन भी दर्शकों को सिनेमा द्घरों में नहीं रोक पा रही थी।
क्या कमाल सलमान खान का था, यदि ऐसा होता तो 'युवराज' जैसी भव्य पिफल्म दर्शकों द्वारा नकार नहीं दी जाती। क्या 'मुन्नी' की नाच देखने लोग जा रहे थे, यदि ऐसा होता तो 'आक्रोश' भी हिट होती जहाँ लगभग इसी तरह के गानों को पिफल्माने की कोशिश की गई थी। नवोदित निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप और देशी सी लगती नवोदित नायिका सोनाक्षी के नाम में भी दर्शकों को इस कदर खींचने की क्षमता कहा हो सकती थी। दबंग के प्रति दर्शकों के पागलपन की वजह एक ही लगती है वह है उसका लगता अपनापन। वह अपनापन जो हिन्दी सिनेमा से बीते दस व८र्ाों से पूरी तरह से लगभग गुम हो गया है।
'दबंग' की कहानी भी बहुत सीध्ी सी नहीं। ढ़ेर सारे पात्रा और ढ़ेर सारे पेंच है कहानी में, जैसा कि हमारे लोक कथाओं में होते रहे हैं। एक काम्पलेक्स सा परिवार, माँ नैना देवी, माँ का अपना बेटा चुलबुल पाण्डेय, माँ का दूसरा पति प्रजापति पाण्डेय और दोनों का बेटा मक्खी पाण्डेय। 'दबंग' में हालांकि इस पारिवारिक पृष्ठभूमि को जरा भी व्याख्यायित करने की कोशिश नहीं की जाती, लेकिन हिन्दी समाज के बदलते स्वरूप को जिस सहजता से स्थापित करती है वह चकित करता है, जो अपनी कटटर पारंपरिक स्वरूप के लिए कुख्यात रहा है। उस समाज में आज से बीस वर्ष पहले विध्वा विवाह ही नहीं हो रहे थे, उसके बच्चे को भी स्वीकार्य किया जा रहा था, और गाँव में इस विवाह, इस परिवार को प्रतिष्ठा भी मिल रही थी। यह है अपने समाज के बदलाव की पहचान जो निश्चित रूप से किसी चोपड़ा और किसी जौहर या मुम्बई में रमे किसी पिफल्मकार को नहीं मिल सकती। इसके लिए आपको अभिनव सिंह कश्यप या विशाल भारद्वाज या प्रकाश झा होना जरूरी हो जाता है।
चुलबुल पाण्डेय पढ़-लिख कर इंस्पेक्टर बन जाता है लेकिन अपने सौतेले पिता को स्वीकार्य करना उसके लिए मुश्किल रहता है। भाई मक्खी के साथ उसका प्रेम और द्घृणा का रिश्ता बना रहता है। चुलबुल अपने आपको रॉबिन हुड पाण्डेय कहता है। जुझारू इंस्पेक्टर लेकिन नैतिकता से कोई सरोकार नहीं। अपनी दिल की बात सुनता है वह। उसका सामना होता है गाँव की कुम्हारन रज्जो से, और मजबूत कद काठी की हिम्मती लड़की को वह दिल दे बैठता है। रज्जो की अपनी समस्या है उसके पिता पियक्कड़ हैं और दारू के लालच में वह कुछ भी करने को तैयार होता है। रज्जो की जिद है कि जब तक उसके पिता जीवित है वह शादी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता की देखभाल कौन करेगा। कहानी की एक पराकाष्ठा यहा भी दिखती है जब चुलबुल से शादी की उम्मीद में रज्जो के पिता अपने आप को अड़चन समझ कर नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं।
'दबंग' में अध्किांश चरित्रा ग्रे शेड में हैं, जैसा की हम होते हैं। किसी पल कोई महानता के शिखर पर होता है तो दूसरे ही पल मानवीय कमजोरियों में डगमग दिखता है। मक्खी निर्मला से प्यार करता है। निर्मला मास्टर के बेटी है, वह मक्खी से शादी की शर्त रखता है, लाख रुपये। मक्खी के पिता प्रजापति पाण्डेय अपनी छोटी सी पैफक्ट्री चलाते हैं वह मक्खी की शादी पर कोई पैसे खर्च करना नहीं चाहते।
इध्र चुलबुल पाण्डेय का सामना छेदी सिंह से हो जाता है, जो एक क्षेत्रिाय पार्टी के छात्रा संध् का अध्यक्ष है। लेकिन राजनीति के नाम पर सारे कुकृत्य करने को तैयार। चुलबुल छेदी के पर कतरने के लिए पार्टी के नेता दयाल बाबू से संपर्क करता है। लेकिन छेदी मक्खी के हाथों बम विस्पफोट करवा कर दयाल बाबू की हत्या करवा देता है। इतना ही नहीं छेदी चुलबुल की मां की हत्या ही नहीं करता उसके पिता के पैफक्ट्री में भी आग लगवा देता है।
कई सारे छोटे-छोटे क्लाइमेक्सों के साथ अंत में कहानी राजी खुशी खत्म होती है। जब चुलबुल और मक्खी दोनों भाई मिल जाते हैं। दोनों को अपनी अपनी प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं और जिस पिता से चुलबुल ने जिंदगी भर द्घृणा की उनका प्यार भी उन्हें हासिल हो जाता है। कहानी को इतने विस्तार से बयान करने का अर्थ सिर्पफ इतना भर है कि ये कथा वाचन हिन्दी समाज की परंपरा है। आज अध्किांश पिफल्में 'दे दना-दन' और 'वेलकम' जैसे कॉमेडी की बात छोड़ भी दें तो 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पैफमिली' जैसी पिफल्मों में कहानी के सूत्रा शुरू होते ही समाप्त हो जाते हैं। अध्किांश पिफल्में सिपर्फ दृष्यों का संयोजन होती हैं, अनजाना अनजानी जैसी पिफल्मों की कहानी आप एक पंक्ति में बयान कर दे सकते हैं। न किसी चरित्रा का विस्तार आप देख सकते हैं, न उसके अंतःकरण में झाँकने का अवसर पा सकते हैं। देख सकते हैं तो बस उसके डिजायनर कपड़े, डिजायनर एक्ससेरीज, मेकअप यशपाल की 'दुःख' कहानी को याद करें तो इनके दुख भी इनके खुद के ढोए हुए लगते हैं, जिनके प्रति आप लाख कोशिश करले कतई सहानुभूति नहीं कर सकते। वहाँ कोई समाज नहीं दिखता जिसे आप पहचान सकते, दिखते हैं अमेरिका की सड़कें, बैंकाक की रंगीनियाँ जहाँ आप एकदम अजनबी हो जाते हैं। 'दबंग' में जिन चेहरों को आप नहीं पहचान पाते, वे भी आप को अपने जैसे लगते हैं क्योंकि वे सब मिलकर एक समाज बनाते लगते हैं।
'दबंग' की लोकप्रियता की वजह इसके भदेसपन, इसकी 'मुन्नीबाई' में, इसके सलमान में, ढूँढ़े जाने के पहले
इसके कथानक और इसकी प्रस्तुति में ढूँढ़ी जानी चाहिए। संयोग नहीं कि अभिनव सिंह कश्यप और लेखक दिलीप शुक्ला दोनो ही उत्तर प्रदेश से आते हैं जो अपने चरित्राों के साथ जिते रहे हैं। इसी लिए 'दबंग' के चरित्रा लार्जर देन लाइपफ होते हुए भी अपरिचित नहीं लगते। चाहे वह हवाओं में उड़कर मार करने वाला चुलबुल पाण्डेय हो या खुबसूरत कुम्हारन रज्जो। सभी पात्राों के बेहद करीब ले जाते हैं अभिनव। इतना कि आल्हा के सूर में 'हुड़ हुड़ दबंग दबंग' की गुंज के साथ जब चुलबुल की बांहे पफड़कती हैं तो सिनेमा द्घरों में बैठे दर्शकों के भी सीने चौड़े हो जाते है। अपने पात्राों से यह निकटता वह भी महसूस करते हैं जिन्होने वर्षों पहले अपनी माटी को छोड़कर रोजी रोटी के लिए महानगर को आशियाना बनाया और वे भी करते हैं जो अपनी माटी को अभी भी सींच रहे है। शायद इसीलिए दबंग जिस तरह छोटे शहरों के सिंगल थियेटरों में पसंद की गई, उतना ही महानगरों के मल्टीप्लेक्सों में भी। वास्तव में लम्बे अर्से के बाद कोई ऐसी हिन्दी पिफल्म उनके सामने आयी थी जिसमें उनके वजूद पर सवाल नहीं उठाया गया था। 'ओमकारा' हो या 'अपहरण', 'गंगाजल' अपने पर ही शर्म करने को मजबूर करते थे। खुद को सवालों के द्घेरे में खड़ा करते थे। ये पिफल्में अपने 'होने' के प्रति उत्साहित नहीं करती थी। 'दबंग' में भी हिंसा है, यहा भी नकारात्मकता है, राजनीतिक गड़बड़ियाँ यहाँ भी दिखती है, लेकिन यह सब समाज के एक अंश के रूप में दिखता है, जो आश्वस्त करती है कि हम इससे निबट सकते हैं। 'अपहरण' या 'ओमकारा' यह विश्वास दिलाने में सक्षम नहीं होती, इन पिफल्मों को देखते हुए हिन्दी समाज अपराध् का पर्याय लगने लगती है। 'दबंग' को शायद इसीलिए सर आँखों पर स्वीकार्य करते हैं।
निश्चित रूप से 'दबंग' कोई क्लासिक पिफल्म नहीं है, क्लासिक 'शोले' भी नहीं थी लेकिन समय ने उसे क्लासिक का दर्जा दिलाया, हो सकता है २५ वर्ष बाद शायद 'दबंग' को भी एक क्लासिक के रूप में याद किया जाय। लेकिन आज यह क्लासिक होने का दावा करते भी नहीं लगती। पिफल्म के संवादों में भदेस शब्दों की भरमार है, वस्त्रा विन्यास में बिहार उत्तरप्रदेश की स्थानियता का खास ध्यान रखा गया है। अभिनय अतिरंजित है किसी ग्रामीण रंगमंच जैसा। यहाँ तक की चुलबुल पाण्डेय के गले में पड़ी माला भी कापफी जानी पहचानी लगती है। िपफल्म की पूरी शूटिंग महाराष्ट्र के वई में की गई, जहां प्रकाश झा भी अपना बिहार सृजित करते है। जाहिर है अभिनव को भी अपना लालगंज सृजित करने में कोई असुविध नहीं होती। वास्तव में हिन्दी सिनेमा ने जिस तरह हमारे सौंदर्यबोध् को तथाकथित रूप से लगातार कोशिश करते हुए हमें अपने ही समाज से अपरिचित करने की कोशिश की है उसमें 'दबंग' को मुखरता से स्वीकार्य करना मुश्किल होता है। लेकिन सच यह भी है कि अपनी सच्चाई, अपनी सहजता, अपनी माटी से मुकरना भी हमारे लिए मुश्किल होता है। इसीलिए 'दबंग' हमें चाहे अनचाहे भी आकर्षित करती है। इसलिए भी की भोजपुरी पिफल्मों की तरह भी अभिनव हिन्दी का स्वभाविक वातावरण रचते हुए भी तकनीकी कुशलता से कहीं समझौता नहीं करते। 'दबंग' में जितनी ही कुशल सिनेमेटोग्रापफी दिखती है उतना ही तीक्ष्ण संपादन, जो कहीं पर भी दर्शकों को 'लालगंज' से निकलने का अवसर नहीं देती। आश्चर्य नहीं कि दबंग हमें सिनेमायी संतुष्टि भी देती है।
'दबंग' की सपफलता वास्तव में हिन्दी सिनेमा में हिन्दी की जीत है। हिन्दी के स्वभाविक सिनेमा की जीत है। जिसमें जीवन के सारे सुर एक साथ मिलते हैं, इमोशन भी, हिंसा भी, परिवार भी, प्रेम भी, द्घृणा भी। लेकिन सारी जद्दोजहद के बीच जीत सच की। वास्तव में हिन्दी सिनेमा में यह सीध्ी सी बात देखने के लिए आँखें तरस गयी थीं। 'दबंग' हिन्दी सिनेमा को एक बार पिफर अपने पुराने व्याकरण की ओर लौटने को प्रेरित कर सकती है, बशर्ते 'दबंग' की सपफलता को संयोग नहीं माने हिन्दी सिनेमा।

Thursday, October 7, 2010

दबंग देखने लौटे दर्शक

दबंग देखने लौटे दर्शक-अजय ब्रह्मात्‍मज

पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मधुबनी..। पिछले दिनों इन चार शहरों से गुजरने का मौका मिला। हर शहर में दबंग की एक जैसी स्थिति नजर आई। अभिनव सिंह कश्यप की यह फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई है। तीन हफ्तों के बाद भी इनके दर्शकों में भारी गिरावट नहीं आई है। बिहार के वितरक और प्रदर्शकों से लग रहा है कि दबंग सलमान खान की ही पिछली फिल्म वांटेड से ज्यादा बिजनेस करेगी। उल्लेखनीय है कि बिहार में वांटेड का कारोबार 3 इडियट्स से अधिक था और सलमान खान बिहार में सर्वाधिक लोकप्रिय स्टार हैं।

पटना में फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम दबंग की कामयाबी से बहुत अधिक चकित नहीं हैं। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपनी एक राय जाहिर की, गौर से देखें तो दबंग हिंदी में बनी भोजपुरी फिल्म है। यही कारण है कि पिछले दस सालों में हिंदी सिनेमा से उपेक्षित हो चुके दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ अपनाया। पिछले दस सालों में भोजपुरी सिनेमा ने उत्तर भारत और खासकर बिहार और पूर्वी यूपी में दर्शकों के मनोरंजन की जरूरतें पूरी की है। उनकी रुचि और पसंद पर दबंग खरी उतरी है।

विनोद अनुपम की राय में सच्चाई है। दबंग में हिंदी सिनेमा में पिछले दस-पंद्रह सालों में बढे़ नकली और शहरी अभिजात्य का अंतर नहीं है। यह फिल्म किसी विदेशी लोकेशन में नहीं जाती। कलाकारों का पहनावा-ओढ़ावा भी उत्तर भारतीय है। सालों बाद हिंदी सिनेमा में यह परिवेश और परिधान दिखा है। फिल्म में बड़ी होशियारी के साथ संवादों में भोजपुरी का टच दिया गया है। यह अभिताभ बच्चन के समय के पुरबिया टच से अलग है। व्यक्तिगत स्तर पर मुझे दबंग की शैली और अभिप्राय से आपत्ति हो सकती है, लेकिन इस फिल्म ने सालों बाद हिंदी प्रदेश के दर्शकों के साथ जो क्नेक्ट स्थापित किया है, वह अतुलनीय है। दबंग में सलमान की लोकप्रियता की दबंगई ने सोने पर सुहागा का काम किया है। अगर बिहार और पूर्वी यूपी में दबंग के सितारों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि यह फिल्म उन सभी सिनेमाघरों पर पिछले तीन हफ्तों में काबिज है, जिनमें कुछ सालों से केवल भोजपुरी फिल्में चल रही थीं, हिंदी सिनेमा में दबंग की इस उपलब्धि पर मुंबई के ट्रेड पंडितों की भले ही नजर पड़े या वे इसे नजरंदाज करें, किंतु यह सच है कि इस फिल्म ने हिंदी प्रदेश के पारंपरिक दर्शकों का मनोरंजन किया है और उन्हें सिनेमाघरों में आने के लिए उकसाया है। यह केवल मुन्नीबाई बदनाम हुई.. का जलवा या सलमान का जादू भर नहीं है। दबंग पूरी तरह से चटनी छाप दर्शकों को संतुष्ट करती है। अभिनव सिंह कश्यप किसी प्रकार का आग्रह या दंभ लेकर नहीं चलते।

दरअसल, हिंदी सिनेमा के भविष्य के लिए दबंग जैसी फिल्मों की जरूरत है। इस फिल्म ने दर्शकों को उनके घरों से खींचा है और फिर से सिनेमाघरों में बैठने के लिए मजबूर किया है। हम इंटरनेशनल सिनेमा के साथ कदमताल अवश्य करें लेकिन अपने आम दर्शकों को तो न भूलें। हमें उनकी जरूरतों और अपेक्षाओं का भी ध्यान रखना चाहिए। हमें उनका भी मनोरंजन करना चाहिए।


Wednesday, July 8, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी-विनोद अनुपम


हिन्दी टाकीज-४२

हिन्दी फिल्मों के सुधि लेखक विनोद अनुपम ने आखिरकार चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह पोस्ट भेजी । विनोद अनुपम उदहारण हैं कि फिल्मों पर बेहतर लिखने के लिए मुंबई या दिल्ली में रहना ज़रूरी नहीं है। वे लगातार लिख रहे हैं और आम दर्शकों और पाठकों के बीच सिनेमा की समझ बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने परिचय में लिखा है...जब पहली ही कहानी सारिका में छपी तो सोचा भी नहीं था, कभी सिनेमा से इस कदर रिश्ता जुड़ सकेगा। हालांकि उस समय भी महत्वाकांक्षा प्रेमचंद बनने की नहीं थी, हां परसाई बनने की जरूर थी। इस क्रम में परसाई जी को खूब पढ़ा और खूब व्यंग्य भी लिखे। यदि मेरी भाषा में थोड़ी भी रवानी दिख रही हो तो निश्चय ही उसका श्रेय उन्हें ही जाता है। कहानियां काफी कम लिखीं, शायद साल में एक। शापितयक्ष (वर्तमान साहित्य), एक और अंगुलिमाल (इंडिया ठूडे) ट्यूलिप के फूल (उद्भावना), स्टेपनी (संडे इंडिया), आज भी अच्छी लग जाती है, लेकिन बाकी की दर्जन भर कहानियों के बारे में यही नहीं कह सकता। सिनेमा देखने की आदत ने, सिनेमा समझने की जिद दी, और इस जिद ने 85 से 90 के दौर में बिहार में काम कर रहे प्रकाश झा से जुड़ने का अवसर दिया। उन्हीं के सौजन्य से फिल्म अध्येता सतीश बहादुर से भी फिल्म ‘पढ़ने’ की शिक्षा ग्रहण की। और फिर प्रकाश जी ने ही फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स के लिए पुणे भेजने की भी पहल की। सिनेमा के बारे में जितनी ही दृष्टि खुलती गई, उतनी ही मेरे लेखन को एक दिशा मिलती गई। ‘उदभावना’ के संपादक अजय कुमार ने सिनेमा अंक के अतिथि संपादक के लिए मुझसे जमालपुर में संपर्क किया तो वाकई चकित रह गया, लेकिन सही दिशा में बढ़ने का विश्वास मिला। बाद में 2002 में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा ने भी कुछ ऐसे ही आश्चर्य में डाल दिया था। पटना से प्रकाशित ‘आज’ और ‘हिन्दुस्तान’ में छपी ‘सामान्य’ सी समीक्षाओं पर मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने खुशी तो दी लेकिन सिनेमा पर लेखन के प्रति चिन्ता भी। तब से मौके मिलने पर ही नहीं, मौके ढ़ूंढकर और मांगकर लिखे मैंने सिनेमा पर। आज संतोष होता है जब लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में सिनेमा पर नियमित स्तंभ दिखाई देते हैं। शायद न भी हो, लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं अपनी भूमिका मान मैं खुश होता रहता हूँ।

बात हाई स्कूल की है, पता नहीं क्लास कौन सा था, नौवां या दसवां। एक सहपाठी ने मेरे सिनेमा प्रेम पर मुझे काफी आत्मीयता से समझाते हुए कहा था, पता है ज्यादा सिनेमा देखने से आदमी सिनेमा में ही काम करने लगता है। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है भला कौन सिनेमा में काम नहीं करना चाहता? उसने मेरे उत्साह का शमन करते हुए समझाया, अरे बेवकूफ सिनेमा मतलब, सिनेमा हॉल, वो देखते हो न टार्च दिखाने वाला, गेट पर टिकट चेक करने वाला, वही सब। हालांकि उस समय मेरे लिए ये काम भी रश्क का विषय थे। हर घड़ी सिनेमा हॉल में रहने का उनका सुख सोचकर ही मैं गुदगुदा उठता था। फिर जिस तरह एक टिकट के लिए लोग गेट कीपर के पीछे आपाधापी मचाए रखते, मेरी नजर में उसका महत्ब बरकरार रखता। लेकिन उसके रहन-सहन से इतना अंदाजा तो हो ही जाता कि ये काम मजेदार जरूर है, बढ़िया नहीं। लेकिन जाहिर है सिनेमा में काम करने की बात से एक बार डर जरूर गया, लेकिन सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी। यह डर तब और घना हो गया जब मैट्रिक के इम्तेहान में उस मित्र को प्रथम श्रेणी मिली जबकि मैं चार नंबरों से रह गया। आज सोचता हूँ तो वाकई यह पागलपन ही लगता है कि अपने प्रथम श्रेणी की परम्परा वाले परिवार में आयी मेरी द्वितीय श्रेणी भी सिनेमा से मुझे दूर नहीं ले जा सकी। सिनेमा देखना जारी रहा और पढ़ाई भी। पता नहीं सिनेमा और पढ़ाई का मेरा संतुलन सायाश था अनायास, लेकिन यह जरूर हुआ कि एक प्रतियोगिता परीक्षा की सीढ़ी पार कर मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई में चला आया। फिर दूसरी प्रतियोगिता पार कर बिहार सरकार की नौकरी भी हासिल करली। साहित्य से शौक ने हिन्दी साहित्य से भी एम। ए. करवा दिया। सिनेमा देखने से अब इतना शउर आ गया था कि उस पर कुछ अपनी राय जाहिर कर सकता था, जिसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशन योग्य भी समझने लगी थी। एक दिन हतप्रभ रह गया जब दरवाजे पर मैंने उसी मित्र को खड़ा पाया, वर्षों बाद, मुझे क्षण भर लगा उसे पहचानने में। उसने बधाई दी। सिनेमा पर खूब लिख रहे हो, फिर कहा मैं भी कुछ करना चाहता हूँ, रास्ता बताओ। पता चला कई एक प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफलता के बाद वह घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा है। सिनेमा वह अब भी नहीं देखता, लेकिन यह जरूर है कि अब अपने बच्चों को सिनेमा देखने से नहीं रोकता।

सिनेमा खूब देखे मैंने, और सिनेमा देखकर खूब पिटाई भी खायी। कई पिटाई तो ऐतिहासिक थी। राजकपूर की ‘बॉबी’ के साथ कई रिकार्ड जुड़े हों, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा रिकार्ड तो यही है कि मेरे बड़े भाई साहब ने ‘बॉबी’ देखने के ‘अपराध’ में मुझे पहले कमरे में बंदकर अपने बेल्ट से पीटा, फिर बीच सड़क पर पीटते हुए स्कूल तक ले गये थे और उस लड़के को भी पीटा, जिसके साथ साईकिल पर सात किलोमीटर की सवारी कर मैं दूसरे शहर ‘बॉबी’ देखने गया था। उस समय मैं आठवीं में था, उम्र होगी बमुश्किल 14 साल। वास्तव में सिनेमा देखना उस समय भी मेरा सबसे बड़ा शगल था। दशहरा हो, दिवाली हो, रक्षा बंधन हो या सरस्वती पूजा’.... मेरे लिए इनका बड़ा महत्व यही था कि मैं सिनेमा देख सकता था। उस समय सिनेमा नून शो में चला नहीं करते थे। मैटनी शो में शाम छः बजे तक बाहर रहने की आजादी आम दिनों में मिलती नहीं थी। मिलती थी तो 4 बजे घर में हाजिरी देने के बाद। त्योहारों में घूमने के नाम पर यह छूट मिल जाती थी। ‘बॉबी’ भी सरस्वती पूजा विसर्जन के दिन देखी थी मैंने, और उसके ठीक एक दिन पहले ‘गद्दार’ भी देखली थी, प्राण, विनोद खन्ना और शायद पद्मा खन्ना....... लगातार दो दिन दो सिनेमा देखने का अक्षम्य अपराध में लगी उस पिटाई का विरोध सिर्फ मां ने किया था।

मां सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं, अच्छी खासी तनख्वाह। उनकी एक ही विलासिता थी, सिनेमा। होश आने के पहले भी और होश आने के बाद भी मां का सिनेमा देखना सदा मेरी याददाश्त से जुड़ा रहा। पिता जी सिनेमा नहीं देखते थे, बगैर किसी कारण। बस उन्हें सिनेमा हॉल का बंद वातावरण अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मां के सिनेमा देखने का उन्हें कभी विरोध करते भी नहीं देखा हमने। बल्कि अक्सर ऐसा होता कि मां सिनेमा देखकर बाहर आती तो पिता जी आॅफिस से लौटते हुए उन्हें साथ लेते आते। उस समय लेडिज क्लास का चलन था, लेडिस के लिए अलग काउंटर होते थे और सबसे कमाल यह कि सबसे कम टिकट दर भी उन्हीं का रहता था। महिलाओं के लिए सिनेमा देखना सुखद भले न हो, सुरक्षित अवश्य था। यूं आज के मल्टीप्लेक्स और कल के बॉलकनी को देखें तो स्पष्ट लगता है यह सुखद की सीमा हमेशा बदलते रही है।

जमालपुर (बिहार) में शायद आज भी सिनेमा के प्रचार का वही परंपरागत साधन है, जो बचपन में याने लगभग 30 साल पहले था। रिक्शे पर एक लाउडस्पीकर और माईक के साथ बैठा गेटकीपर। रिक्शे के पीछे प्लाई बोर्ड के टूकड़े पर एक मध्यम आकार का रंगीन पोस्टर चिपका रहता। अमूमन रिक्शा आने का समय शुक्रवार को 9 से 10 बजे का होता। फिल्म कोई भी हो, एनाउंस एक ही सुर में होता, अवन्तिका सिनेमा के रूपहले परदे पर आज से देखें, चुपके-चुपके धुंआधार मारपीट, नाचगाने, हंसी मजाक और सीन सिनहरी से भरपूर ‘चुपके-चुपके’ फिल्म के सितारे हैं, धरमिन्दर, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टाइगोर और जया भादुड़ी, पूरे परिवार के साथ देखें ‘चुपके-चुपके’। फिल्म का नाम बदलता जुमला जस का तस रहता, चाहे ‘दोराहा’ यदि मैं गलत नहीं तो राधा सलूजा इसकी नायिका थी और एडल्ट फिल्म होने के कारण एक तरह से बदनाम भी थी यह फिल्म, अफसोस यह फिल्म मैं आज तक नहीं देख सका हो या ‘कोशिश’ जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी दोनों ने गुंगे बहरे की भूमिका निभाई थी।

फिल्म और कलाकारों के प्रति उद्घोषक की उदासीनता रहती या सामाजिक पूर्वाग्रह का प्रभाव, अब याद करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि कभी संयोग से भी नायिका का नाम वह पहले नहीं लेता। उस फिल्म में जया भादुड़ी किसी नवोदित के साथ थी, शायद विक्रम या विजय अरोड़ा। लेकिन उदघोषक विक्रम के मुकाबले भी जया भादुड़ी को आगे करने की कोशिश नहीं करता। पुरूष सत्ता का प्रभाव हमारे मन को किस तरह अवचेतन में प्रभावित रखता है इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। यह बात आज मेरे समझ में आ रही है, लेकिन उस समय तो मेरे लिए यह उद्घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण रहती कि मैं मां को फिल्म बदलने की सूचना सबसे पहले देने से अपने आपको वंचित नहीं करना चाहता। शायद कोई समझदारी मेरी नहीं थी उस समय, मेरे लिए यह बस इसी लिए महत्वपूर्ण था कि अच्छी फिल्म की सूचना से मां को खुशी मिलती और वे फिल्म देखने की योजना बना सकती थी।

उस समय फिल्मों के चार सौ प्रिन्ट एक साथ रिलीज नहीं होते थे, न ही डिजीटल रिलीज की सुविधा थी। बस बक्से में फिल्म की रील आती, निश्चय ही छोटे शहरों तक आते-आते यह अवधि साल भी हो जाती कभी-कभी। फिर भी फिल्म देखने का उत्साह कम नहीं होता। बड़े शहरों से जैसे-जैसे फिल्म की सिल्वर जुबली याने 25 हते की सूचना आती, छोटे शहरों में फिल्म का क्रेज बनता। लेकिन तब तक फिल्म की रील घिस चुकी होती और उसके पोस्टर खत्म हो चुके होते थे। उस समय नई फिल्म के अधिकांश पोस्टर ट्रेडिल मशीन पर डेढ़ फीट बाय डेढ़ फीट के आकार में स्थानीय प्रेस में सिनेमा मालिकों द्वारा ही छपवाये जाते, आशुद्धियों से भरे इन पोस्टरों पर सिनेमा हॉल, सिनेमा के नाम के साथ सिर्फ कलाकारों के नाम होते थे। तस्वीरों वाले बड़े पोस्टर सिनेमा हॉल के अलावा शहर में सिर्फ एक जगह लगा करता था। अमूमन जिसे देखने के लिए हमलोग पहुंच ही जाया करते थे। शुक्रवार की दोपहर हमें प्रतीक्षा रहती मुंगेर के सिनेमा घरों की प्रचार गाड़ी की। अमूमन मुंगेर की प्रचार गाड़ी जीप पर बनायी जाती। तख्ते के क्यूब पर रंगीन पोस्टर चिपका कर उसे जीप पर रख दिया जाता। और साथ ही साथ माईक से एलाउंस भी होता रहता। सिनेमा और सिनेमा हॉल के नाम का तुक बिठाने में हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती। ‘हम किसी से कम नहीं’ सुनाई देता तो विजय टॉकीज गायब हो जात, विजय सुनाई देता तो ‘हम किसी से कम नहीं’। इस प्रचार गाड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण इसके साथ उड़ने वाले रंगीन पर्चे होते थे। पतले रंगीन कागज पर छपे ये परचे मिल जाना हमारी एक उपलब्धि होती थी। आज सोचता हूँ वाकई मजेदार लगता है, अजूबा तो उस समय भी लगता था। मुंगेर के बैधनाथ सिनेमा ने एक घोड़ा गाड़ी रखी थी, मतलब बग्घी। आगे जुते घोड़े और पीछे बक्से पर सिनेमा पोस्टर के क्यूब। बैधनाथ की एक और विशेषता थी, अपनी बालकनी को उसने दो भागों में बांट लिया था, आधा डी।सी. कहा जाता था, आधे में लेडीज। डी.सी. में मात्र 8 तीन लंबे गद्देदार स्पिंग वाले सोफे थे, जिसपर सिनेमा देखना वाकई सुखद लगता था। लेकिन मुश्किल लेडीज के साथ थी, उसके ठीक पीछे प्रोजेक्शन रूम था। अक्सर ही ऐसा होता कि नायक-नायिका के बीच किसी तीसरी स्त्री का जूड़ा या फिर रोते हुए बच्चों को खड़े होकर चुप कराती किसी महिला की छवि परदे तक पहुंच जाती और दर्शकों की जबरदस्त हाजिर जवाब चुटकियों से हॉल गुंज उठता था।

मेरे होशोहवाश में आने तक देश में बिजली संकट शुरू हो गया था। बिजली जाने लगी थी, लेकिन सिनेमा घरों में जेनरेटर का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। बिजली जाती तो घंटे-आधे घंटे तक दर्शकों को इन्तजार करना पड़ता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि आधी फिल्म में बिजली चली जाती और घंटे भर बाद घोषणा होती कि कल इसी टिकट पर आकर सिनेमा देख सकते हैं। यदि फिल्म आधी से भी कम चली होती और बिजली अनंत काल तक के लिए चली गई होती तो टिकट के पैसे वापस कर दिये जाते। हमारे लिए दुख से अधिक खुशी का अवसर होता यह, एक टिकट में दो खेल।

जमालपुर में उस समय दो सिनेमा घर थे, एक अवन्तिका और एक रेलवें, जिसे रेलवे ने अपने कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए बनवाया था। रेलवे में रेल कर्मचारियों को उस समय (1970-1980) मात्र 80 पैसे डी.सी. के लिए देने होते थे, जबकि आम दर्शकों को 1 रूपये 60 पैसे । बगल के जिला मुख्यालय मुंगेर में तीन सिनेमा घर थे। जब कोई बड़ी हिट या चर्चित फिल्म आती तो हमलोग मुंगेर जाते। याद है मुझे ‘जयसंतोषी मां’ देखने के लिए जाना था तो स्कूल से मुझे आधी छुटटी में बुला लिया गया था और स्कूल ड्रेस में ही मां के साथ सिनेमा देखने चला गया था। मुंगेर में सिनेमा देखने हमलोगों के लिए विलासिता ही थी, क्योंकि टैक्सी में बैठकर जाना होता और सिनेमा देखने के बाद रेस्टूरेंट में चाट और कुल्फी के लिए भी पिता जी ले जाते।

पता नहीं सिनेमा देखने की आदत की शुरूआत यहीं से हुई या इसकी नींव कहीं और पड़ी लेकिन इतना जरूर था कि सिनेमा मेरे परिवार में कभी त्याजय नहीं था, सिनेमा देखने - सिनेमा पर बातें करने पर कभी किसी को आपति नहीं होती, शर्त यह कि सिनेमा देखने की स्वीकृति घर में ले ली जाय। याद नहीं वह साल कौन सा था, लेकिन यह याद है कि वह फिल्म थी ‘गंगा तेरा पानी अमृत’, जिसे पहली बार अकेले देखने मैं गया था, मां से स्वीकृति और पैसे लेकर। लेकिन जैसे-जैसे मैं ऊपर के क्लास में चढ़ता गया, सिनेमा देखने की संख्या भी बढ़ती गई, जाहिर है उस अनुपात में घर से स्वीकृति संभव नहीं थी, सो चोरी-छिपे सिनेमा देखने की शुरूआत हुई। कुछ ऐसी भी फिल्में उस समय आने लगी, जिसके लिए घर से स्वीकृति मांगनी संभव भी नहीं थी, अब ‘गुप्तज्ञान’ देखने के लिए स्वीकृति मांगता भी कैसे? और नौवीं-दसवीं का समय ऐसा था, जब ऐसी फिल्में आकर्षित ज्यादा करती थी। जमालपुर में उस समय हरेक वर्ष नवम्बर-दिस्मबर में रामायण सम्मेलन आयोजित होते थे, देश भर से मानस विद्वान वहां उपस्थित होते थे और शाम 7 बजे से 12 रात्रि तक प्रत्येक दिन प्रवचन सुनने शहर के लोग इकट्ठा होते थे। हमे भी मानस सम्मेलन में जाने के लिए आसानी से स्वीकृति मिल जाती, जिसका उपयोग मैं अकसर अपने दोस्तों के साथ 9 से 12 बजे रात्रि शो में फिल्म देखने के लिए कर लेता। और तो याद नहीं लेकिन ‘तन्हाई’ मुझे अभी तक याद है जिसे मैंने 9 से 12 के ही शो में देखा था। शत्रुध्न सिन्हा और रेहाना सुल्तान के भी नाम याद हैं, और यह भी याद है कि उस फिल्म में कुछ ‘ऐसे’ दृश्य थे, जिसने मुझे कुछ गलत करने का अहसास दिलाया था, पता नहीं अब के बच्चों को सी-ग्रेड फिल्में देखकर भी अब यह अहसास होता है या नहीं?

आज भी सिनेमा देखने के लिए कोई आधार मैं नहीं मानता। काफी बाद में फिल्म भाषा और तकनीक पर आधारित एक कार्यशाला में वरिष्ठ फिल्म अध्येता गायत्री चटर्जी ने जब यह कहा कि यदि फिल्म के बारे में जानना हो तो खूब फिल्में देखनी चाहिए, तो मुझे समझ में आया कि शायद मैं गलत नहीं था। मैंने अच्छी-बुरी जब भी जैसी जो फिल्में मिली मैंने देखी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान दोस्तों के साथ कभी-कभी एक दिन में दो शो फिल्में भी देख डालीं।

सिनेमा आज भी देखता हूँ। लगातार, काफी कम फिल्में ऐसी होती है जिसे मैं नहीं देख पाता। सिनेमा हॉल में फिल्में देखना आज भी मेरी हॉबी है, 45 वर्ष की उम्र में। लेकिन सच कहूं वो उत्साह, वो सुख अब सिर्फ ख्यालों में ही आते हैं, जिसे हमने जमालपुर-मुंगेर के तंग से सिनेमा घरों में हासिल किया। क्यों? पता नहीं, शायद इसलिए कि वहां के गेटकीपर से लेकर सिनेमा की टूटी सीटों से एक अपनापन महसूस होता था, जो आतंकित करती मल्टीप्लेक्स की भव्यता से हासिल नहीं होती।

पसंद की फिल्में:-

1. मेरा नाम जोकर
2. ब्लैक
3. स्वदेश
4. आवारा
5. गाईड
6. वेलकम टू सजनपुर
7. लगे रहो मुन्ना भाई
8. दिलवाले दुल्हनियां ले जाऐंगे
9. गोलमान
10. विवाह
कृप्या क्रम पर गौर नहीं करें

विनोद अनुपम, बी-53, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20 मो. 9334406442