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Wednesday, April 17, 2013

हम दोनों हैं जुदा-जुदा... हुमा कुरैशी - साकिब सालिम

रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से चवन्‍नी के पाठकों के लिए साधिकार...

हुमा कुरैशी अपने छोटे भाई साकिब सालिम को तंग करने का एक भी मौका नहीं गंवातीं, तो साकिब भी उनकी टांग खींचने के लिए तैयार रहते हैं. बहन-भाई की शैतानियों की कहानियां बता रहे हैं रघुवेन्द्र सिंह
भाई-बहन को साथ एक फिल्म में कास्ट करना हो, तो कैसी स्क्रिप्ट होनी चाहिए? आप सोचते रहिए... हुमा कुरैशी और साकिब सालिम ने तो सोच लिया है. ''भाई-बहन की ही कहानी होनी चाहिए और अगले पांच मिनट के बाद बहन की फोटो दीवार पर टंगी होनी चाहिए." यह कहकर साकिब ठहाका लगाते हैं. ''हां, क्योंकि अगर मैं उससे ज्यादा देर तक फिल्म में रही, तो तुम्हारा रोल खा जाऊंगी." अपने छोटे भाई की बात का जवाब देकर हुमा भी हंस पड़ती हैं और वे नई कहानी का सुझाव देती हैं, ''भाई-बहन रोड ट्रिप पर जाते हैं... " और ''भाई बहन को मार देता है..." शरारती साकिब हुमा की बात को बीच में ही काट देते हैं और फिर भाई-बहन की खिलखिलाती हंसी गूंजने लगती है.
आप समझ गए होंगे कि हुमा और साकिब के बीच किस तरह का रिश्ता है. दोनों तू-तू, मैं-मैं करते रहते हैं और एक-दूसरे की खिंचाई का मौका हाथ से नहीं निकलने देते. ''हम दोनों बचपन से ऐसे हैं.", हुमा हमारी हैरानी को थोड़ा कम करती हैं. हुमा से दो साल छोटे साकिब खुलासा करते हैं, ''बचपन में हुमा की एक आदत थी. जब भी हम लड़ते थे, ये चिल्ला-चिल्लाकर रोती थीं, ताकि मम्मी-पापा सुनें और मुझे आकर डांटें. मैं इन्हें हैरानी से देखता रहता था कि ओए, तू कितनी बड़ी फ्रॉड है." साकिब एक मजेदार वाकया बताते हैं, ''हम पड़ोस की एक आंटी के घर गए थे. कुछ देर बात आंटी ने देखा कि उनके वॉशरुम के सारे कॉस्मेटिक्स गायब हैं. उसके लिए मुझे खूब डांट पड़ी." कॉस्मेटिक्स गायब कैसे हुए थे, इसका खुलासा उस घटना के पंद्रह साल बाद हुआ. ''कुछ साल पहले वो आंटी डिनर पर घर आईं. उस घटना का जिक्र आया, तो मैंने कहा कि आंटी, कसम से मैंने आपके कॉस्मेटिक्स नहीं गायब किए थे. तभी टेबल के दूसरी ओर से धीमी सी एक आवाज आई- वो ना मैंने किया था." अपनी हंसी रोककर हुमा सच बताती हैं, ''मैं एक्चुअली डर गई थी, इसलिए मैंने सच नहीं बताया था." ''क्या हुआ था कि साकिब सो गया था. मेरे पास करने के लिए कुछ था नहीं, तो मैंने उनके सारे कॉस्मेटिक्स तोड़े और उन्हें खिडक़ी से बाहर फेंक दिए."  
हुमा और साकिब का बचपन दिल्ली के कालकाजी में गुजरा है. दिल्ली का मशहूर रेस्टोरेंट सलीम्स (कबाब के लिए लोकप्रिय) इनके डैड सलीम का है. इनके बड़े भाई नईम और मोइन डैड के बिजनेस में मस्त हैं. हुमा-साकिब के परिवार का फिल्मों से नाता भले न रहा हो, लेकिन उनका परिवार पूरा फिल्मी है. हुमा इस बात को साबित करती हैं, ''हमारे डैड दिल्ली से हैं, लेकिन मम्मी (अमीना) कश्मीर से हैं. दोनों के बीच एपिक-सा रोमांस हुआ था. दोनों घर से भाग गए थे. कई साल तक हमारे नाना ने दोनों से बात नहीं की. फिर हम पैदा हुए और नाना जी का दिल पिघल गया." ''हमारे अंदर ये एक्टिंग के जीन्स कहां से आए हैं? वहीं से तो आए हैं." हंसते हुए साकिब आगे कहते हैं, ''मुझसे कोई पूछता है कि आपने एक्टिंग कहां से सीखी है, तो कहता हूं कि मम्मी को देखकर मैंने एक्टिंग सीखी है. वो बहुत ड्रैमेटिक हैं." हुमा-साकिब के घर में फिल्में देखने की छूट नहीं थी, लेकिन ये दोनों देर रात को सबके सो जाने के बाद चोरी से टीवी पर हॉलीवुड की फिल्में देखा करते थे. 
हुमा-साकिब ने दिल्ली के रयान स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ली. उसके बाद हुमा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के गार्गी कॉलेज और साकिब ने हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया. ''बारहवीं में मेरे 87 परसेंट माक्र्स आए थे, लेकिन मेरा एडमिशन स्पोर्ट्स कोटे के तहत हुआ था." साकिब बताते हैं. ''हां, साकिब को क्रिकेट का शौक था और मैं बॉस्केट बॉल खेलती थी." हुमा कहती ही हैं कि साकिब अचरज भरी निगाहों से उनकी ओर देखते हैं, ''झूठ मत बोलो यार." जवाब में हुमा कहती हैं, ''मेरे पास सर्टिफिकेट्स हैं." तपाक से साकिब जवाब देते हैं, ''वो नकली हैं." दोनों फिर आपस में लडऩा शुरू कर देते हैं. मैं बीच-बचाव करता हूं और दोनों के अभिनय की ओर आने के बारे में पूछता हूं. साकिब गंभीरता से जवाब देते हैं, ''अगर आप दिल्ली के हमारे घर में आएंगे, तो आपको सौ से भी ज्यादा फिल्मफेयर की कॉपीज मिलेंगी. मुझे फिल्में देखने का शौक था, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक्टर बनूंगा." और वह बताते हैं, ''कॉलेज डेज में हुमा थिएटर करती थीं. मैं क्रिकेट खेलता था. मैं इन्हें पिकअप करने जाता था, तो इनके रिर्हसल्स देखा करता था." हुमा कॉलेज के थिएटर ग्रुप की प्रेसीडेंट भी थीं. मगर उन्होंने परिजनों से कह रखा था कि वे डॉक्टर बनना चाहती हैं. साकिब उस लम्हे के बारे में बताते हैं, जिसके खुलासे के बाद उनका घर हिल गया था, ''एक दिन कॉलेज से मैं घर लौटा, तो देखा कि मम्मी सिर पर हाथ रखे बैठी हैं कि बेटी ने मेरा सपना तोड़ दिया. दूसरी ओर सोफे पर हुमा फुल सेंटी बैठी थीं कि मम्मा, मैं मेडिकल की पढ़ाई नहीं कर पाऊंगी." हुमा कहती हैं, ''घर वालों ने जब पूछा कि मेडिकल नहीं करोगी, तो क्या करोगी? मैंने जल्दबाजी में कह दिया कि सिविल सर्विस की तैयारी."
हुमा ने मम्मी-पापा से कह तो दिया कि वह सिविल सर्विस की तैयारी करेंगी, लेकिन उनका मन थिएटर में रमता था. उन्होंने दिल्ली का मशहूर थिएटर ग्रुप एक्ट वन भी जॉइन कर लिया था. ये सब देखने के बाद एक दिन उनके डैड ने उनसे पूछा कि आखिर वह क्या करना चाहती हैं, तो जवाब मिला कि डायरेक्टर बनना है. ''क्योंकि मैं जानती थी कि वे मुझे एक्टर बनने की मंजूरी नहीं देंगे. हम दिल्ली की एक कंजर्वेटिव फैमिली से हैं." हुमा कहती हैं. और जब उन्होंने मम्मी-डैडी से बताया कि उन्हें एक्टर बनना है, तब क्या हुआ? साकिब बताते हैं, ''मॉम-डैड ने सोचा कि ज्यादा किताबें पढऩे से हुमा का दिमाग खराब हो गया है." परिवार के सुझाव पर हुमा विदेश जाकर एमबीए करने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन बाद में उनके पापा को एहसास हुआ कि वे बेटी की इच्छा का दमन कर रहे हैं. हुमा बताती हैं, ''डैड से जब मैंने कहा कि मैं पूरी जिंदगी यह सोचूंगी कि उनकी वजह से अपना सपना पूरा नहीं कर पाई, तो वे इमोशनल हो गए. दूसरे ही दिन मुंबई का टिकट कटवाया और खुद मुझे लेकर मुंबई आए. उन्होंने कहा कि एक साल में अगर कुछ नहीं हुआ, तो नॉर्मल जिंदगी जीने वापस लौट आना."और हुमा 2008 में मुंबई आ गईं.
उधर साकिब अपनी गर्लफ्रेंड के बार-बार कहने पर मॉडलिंग करने लगे. मॉडलिंग में कई अवॉर्ड्स मिले. फिर किसी दोस्त ने कहा कि तुम मुंबई क्यों नहीं चले जाते. साकिब बताते हैं, ''मैंने हुमा को फोन किया कि सुनो, अगर मैं मुंबई आऊंगा, तो एक्टर बन जाऊंगा क्या? हुमा ने कहा कि हां, थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ेगी." साकिब के मुंबई आने के सही कारण का खुलासा हुमा करती हैं, ''साकिब की एक गर्लफ्रेंड थी, जो मॉडल थी. वो मुंबई आ रही थी, तो साकिब भी बेबी के पीछे मुंबई आ गया." उन दिनों साकिब अपने डैड के रेस्टोरेंट के बिजनेस में हाथ बंटा रहे थे. उन्होंने पापा से कहा, ''डैड, मैंने कभी इंडीपेंडेंट लाइफ नहीं जी. मैं मुंबई जाना चाहता हूं और फिर वहां हुमया जी का ध्यान रखने के लिए कोई होना चाहिए न." 2010 में साकिब मुंबई आए, लेकिन जिस गर्लफ्रेंड के लिए वह मुंबई आए थे, उससे अगले दो महीने में ब्रेकअप हो गया. मगर साकिब दिल्ली नहीं लौटना चाहते थे. वे अपने दोस्तों के साथ पीजी में रह रहे थे. ''मैं अपनी लाइफ जीना चाहता था, इसलिए मैंने हुमा के पास न रहने का फैसला किया." साकिब बताते हैं.

हुमा को मुंबई में अपने हिस्से का संघर्ष करना पड़ा, लेकिन साकिब लकी रहे. हुमा बताती हैं, ''मैं आठ महीने तक मुंबई में किसी से मिली-जुली नहीं. मैं उधेड़बुन में लगी रहती थी कि क्या करना चाहिए. कोई गाइड करने वाला भी नहीं था. मुझे मुंबई को समझने में वक्त लगा. साकिब ओपन परसन है. यह फौरन मुंबई का हो गया." साकिब पहली बार ऑडिशन देने गए और उनको टाटा डोकोमो का वह एड मिल गया. फिल्मों की ओर आने की बाबत साकिब कहते हैं, ''मेरे दोस्त हैं- फैशन डिजाइनर वरुण बहल. उन्होंने मुझसे कहा कि यशराज फिल्म्स की कास्टिंग डायरेक्टर हैं शानू, तुम उनसे जाकर मिल लो. मैं उस वक्त फिल्में नहीं करना चाहता था. मैं बेमन से शानू से मिलकर आ गया."
संयोग देखिए कि हुमा को उधर अनुराग कश्यप की फिल्म गैंगस ऑफ वासेपुर मिली, तो इधर साकिब को वाईआरएफ की फिल्म मुझसे फ्रेंडशिप करोगे. दोनों एक साथ शूटिंग में व्यस्त हो गए. मगर साकिब की फिल्म हुमा की फिल्म से एक साल पहले प्रदर्शित हुई. हुमा बताती हैं, ''जब इसकी फिल्म के प्रोमो टीवी पर चल रहे थे, तो यह बहुत नर्वस था. मैंने इससे कहा कि फिल्म का चाहे जो भी रिजल्ट हो, लेकिन यह याद रखना कि तुम केवल बाइस साल के हो. तुमने यह सब अपने बलबूते किया है. वो तुम्हारा अचीवमेंट." साकिब बताते हैं कि उनके जीवन में बड़ी बहन की क्या जगह है, ''मैंने इनसे कहा कि आप मेरी फिल्म देखो. मुझे फर्क नहीं पड़ता कि क्रिटिक्स क्या कहते हैं. मैंने आपको देखकर थोड़ी-बहुत एक्टिंग सीखी है, जब आप थिएटर में रिहर्सल करते थे." मुझसे फ्रैंडशिप करोगे देखने के बाद हुमा हैरान थीं. ''मुझे यकीन नहीं हुआ कि साकिब इतना ब्रिलिएंट और स्पॉनटेनियस एक्टर है."  
मुंबई शहर ने न सिर्फ हुमा-साकिब को एक पहचान दी है, बल्कि दोनों को एक-दूसरे के करीब भी लाया है. दोनों ने हाल में मुंबई के ओशिवारा में मिलकर एक फ्लैट खरीदा है. ''हम एक-दूसरे से अपनी बातें शेयर करते हैं. साकिब बहुत मेच्योर है, मुझसे भी ज्यादा. मुझे लोगों की समझ नहीं है." हुमा बड़ी साफगोई से कहती हैं. साकिब हामी भरते हैं, ''अगर आप इनसे अच्छे से बात कर लेंगे, तो ये आपको पसंद करने लगेंगी. मैं इन्हें समझाता हूं कि किसी पर इतनी जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए." हुमा बताती हैं. साकिब स्वीकार करते हैं कि यह शहर उन्हें अपनी बड़ी बहन के करीब लाया है. ''पहले हम पर्सनल लाइफ की बातें शेयर नहीं करते थे, लेकिन मुंबई आने के बाद एहसास हुआ कि यहां हम एक-दूसरे पर ही डिपेंड रह सकते हैं. अगर मैं एक्टिंग में नहीं आता, तो हुमया जी को समझ नहीं पाता." हुमा को हुमया जी कहने के बारे में पूछने पर साकिब ने हंसते हुए बताया, ''बचपन में मैं तोतला था. मैं हुमा बाजी को हुमया जी कहता था. लोग समझते हैं कि मैं इन्हें रिस्पेक्ट के लिए जी कहता हूं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है."
गैंगस ऑफ वासेपुर और लव शव ते चिकन खुराना जैसी फिल्मों में अपने पॉवरफुल अभिनय की बदौलत हुमा नई पीढ़ी की शीर्ष एक्ट्रेस में शामिल हो गई हैं और साकिब अगली पीढ़ी के हॉट स्टार माने जा रहे हैं. साकिब की दूसरी फिल्म यशराज बैनर की मेरे डैड की मारुति अगले महीने रिलीज हो रही है, जबकि हुमा की डी डे और एक थी डायन इस वर्ष प्रदर्शित होंगी. साकिब कहते हैं, ''जब मुझसे कोई कहता है कि हुमा आपकी बहन हैं? वो कमाल की एक्टर हैं, तो मुझे बहुत खुशी होती है." 
हुमा-साकिब के फ्रेंड्स कॉमन हैं. साकिब हुमा को तंग करते हैं, ''हुमया जी का कोई दोस्त नहीं है." ''हां, साकिब थैंक्यू, तुम्हारी वजह से मैं जिंदा हूं." हुमा जवाब में कहती हैं. बॉयफ्रेंड के मामले में हुमा की पसंद के बारे में साकिब हंसते हुए कहते हैं, ''मेरी बहन अगर किसी कमरे में घुसेगी, तो सबसे छुपकर जो लडक़ा बैठा होगा, कहेगी- दैट्स माय बॉय. इसे पप्पू ही पसंद आते हैं." हुमा उन्हें टोकते हुए कहती हैं, ''तुम्हें लड़कियों का टेस्ट नहीं पता... यह सुनकर साकिब हंस पड़ते हैं, जो फिलहाल एक लडक़ी को डेट कर रहे हैं.
                                                                  मेरे डैड की मारुति
आई हेट यू, बट आई लव यू
साकिब के बारे में हुमा-
पसंद
- साकिब अपने काम और रिलेशनशिप को लेकर बहुत सिंसेयर है. यह बहुत केयरिंग है. मगर कभी-कभी ओवर सेंसिटिव हो जाता है. इसका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है.
नापसंद
- यह लेजी है. लेकिन बहुत लकी है. मेरे हिसाब से लक यह है कि आपकी वाइब्स बहुत अच्छी हैं और आप अच्छी चीजों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं.
                                                                    एक थी डायन
हुमा के बारे में साकिब-
पसंद
ये हर चीज को सहेजकर रखती हैं. बहुत सेंसिटिव हैं. बहुत टैलेंटेड हैं. गॉड गिफ्टेड एक्टर हैं.
नापसंद
ये रोंदू हैं. इनमें धैर्य की कमी है. ये किसी चीज को हासिल करने के लिए बहुत मेहनत करेंगी, लेकिन जब उसके करीब पहुंचेंगी, तो कहेंगी कि अरे, नहीं हो रहा है.

साभार: FILMFARE

Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : मेरे डैड की मारुति

Mere dad ki maruti film review-अजय ब्रह्मात्‍मज
यशराज फिल्म्स युवा दर्शकों को ध्यान में रख कर कुछ फिल्में बनाती है। 'मेरे डैड की मारूति' इसी बैनर वाय फिल्म्स की फिल्म है। चंडीगढ़ में एक पंजाबी परिवार में शादी की पृष्ठभूमि में गढ़ी यह फिल्म वहां के युवक-युवतियों के साथ बाप-बेटे के रिश्ते, दोस्ती और निस्संदेह मोहब्बत की भी कहानी कहती है। फिल्म में पंजाबी संवाद और पंजाबी गीत-संगीत की बहुलता है। इसे हिंदी में बनी पंजाबी फिल्म कह सकते हैं। पंजाब का रंग-ढंग अच्छी तरह उभर कर आया है। ऐसी फिल्में क्षेत्र विशेष के दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कर सकती हैं। भविष्य में हिंदी में इस तरह की क्षेत्रीय फिल्में बढ़ेंगी, जो बिहार, राजस्थान, हिमाचल की विशेषताओं के साथ वहां के दर्शकों का मनोरंजन करें।
तेजिन्दर (राम कपूर) और समीर (साकिब सलीम) बाप-बेटे हैं। अपने बेटे की करतूतों से हर दम चिढ़े रहने वाले तेजिन्दर समीर को किसी काम का नहीं समझते। समीर अपने जिगरी दोस्त गट्टू के सथ शहर और यूनिवर्सिटी में मंडराता रहता है। अचानक एक लड़की उसे पसंद करती है और डेट का मौका देती है। डेट पर जाने के लिए समीर अनुमति लिए बगैर अपने डैड की नई मारुति लेकर जाता है। डेट,प्यार और उत्साह के चक्कर में वह कार खो जाती है। यहां यह भी बता दें कि तेजिन्दर ने वह मारुति अपने दामाद को भेंट करने के लिए खरीदी है। संगीत से शादी के चंद दिनों के बीच मारुति तलाशने और लाने के दरम्यान फिल्म में रोमांस, गाने और युवकों के बीच प्रचलित लतीफेबाजी है।
फिल्म में युवाओं के बीच प्रचलित भाषा का अधिकाधिक उपयोग किया गया है। गैरशहरी दर्शकों को इसे समझने में दिक्कत हो सकती है, लेकिन यह फिल्म उनके लिए बनी भी नहीं है। फिल्म का उद्देश्य शहरी युवाओं के मन-मानस को पेश करना है। बहरहाल, पिता की भूमिका में आए राम कपूर किरदार के मिजाज को अच्छी तरह पर्दे पर जीवंत करते हैं। उनकी अदायगी में आई नाटकीयता किरदार की जरूरत है। बेटे की भूमिका में साकिब सलीम ने अच्छी मेहनत की है। नृत्य और भागदौड़ के दृश्यों में वे अधिक जंचे हैं। भावनात्मक और नाटकीय दृश्यों में उनकी मेहनत झलकती है। अभी अभ्यास चाहिए। कुछ दृश्यों में उनका सहयोगी गट्टू बाजी मार ले जाता है।
फिल्म के परिवेश के मुताबिक पंजाबी गीत-संगीत की भरमार है। मौका संगीत और शादी का है तो नाच-गाने जरूरी लगने लगते हैं। फिर भी दुल्हन का आयटम गीत का तुक समझ में नहीं आता, जबकि दिखाया गया है कि भाई और दूल्हा उस नृत्य पर झेंप रहे हैं। एक मां हैं, जो चुटकियां बजा रही हैं।
पुन:श्च- फिल्म में मारुति कार का प्रचार किया गया है। यह प्रचार खटकता है।
-अजय ब्रह्मात्मज
अवधि-101 मिनट
ढाई स्टार