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Friday, September 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : कट्टी बट्टी

नए इमोशन,नए रिलेशन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    निखिल आडवाणी की फिल्‍में देखते हुए उनकी दुविधा हमेशा जाहिर होती है। कट्टी बट्टी अपवाद नहीं है। इस फिल्‍म की खूबी हिंदी फिल्‍मों के प्रेमियों को नए अंदाज और माहौल में पेश करना है। पारंपरिक प्रेमकहानी की आदत में फंसे दर्शकों को यह फिल्‍म अजीब लग सकती है। फिल्‍म किसी लकीर पर नहीं चलती है। माधव और पायल की इस प्रेमकहानी में हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित तत्‍व भी हैं। खुद निखिल की पुरानी फिल्‍मों के दृश्‍यों की झलक भी मिल सकती है। फिर भी कट्टी बट्टी आज के प्रेमियों की कहानी है। आप कान लगाएं और आंखें खोलें तो आसपास में माधव भी मिलेंगे और पायल भी मिलेंगी।
    माधव और पायल का प्रेम होता है। माधव शादी करने को आतुर है,लेकिन पायल शादी के कमिटमेंट से बचना चाहती है। उसे माधव अच्‍छा लगता है। दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगते हैं। पांच सालों के साहचर्य और सहवास के बाद एक दिन पायल गायब हो जाती है। वह दिल्‍ली लौट जाती है। फिल्‍म की कहानी यहीं से शुरू होती है। बदहवास माधव किसी प्रकार पायल तक पहुंचना चाहता है। उसे यकीन है कि पायल आज भी उसी से प्रेम करती है। फिल्‍म में एक एक इमोशनल ट्विस्‍ट है। जब ट्विस्‍ट की जानकारी मिलती है तो लगता है कि इतने पेंच की जरूरत नहीं थी। शायद लेखक-निर्देशक को जरूरी लगा हो कि इस पेंच से भावनाओं का भंवर तीव्र होगा। हम सुन चुके हैं कि इस फिल्‍म को देखते हुए आमिर खान फफक पड़े थे और उन्‍हें आंसू पोंछने के लिए तौलिए की जरूरत पड़ी थी। अनेक हिंदी फिल्‍मों में हम ऐसे प्रसंग देख चुके हैं। ऐसे प्रसंगों में निश्चित ही दर्शक भावुक होते हैं। कट्टी बट्टी लंबे समय के बाद आई ऐसी हिंदी फिल्‍म है,जो दर्शकों को रोने का अवसर देती है।
    माधव और पायल के मुख्‍य किरदारों में इमरान खान और कंगना रनोट हैं। इमरान खान एक गैप के बाद आए हैं। इमरान खान के इमोशन और एक्‍सप्रेशन के दरम्‍यान एक पॉज आता है,जो उनके बॉडी लैंग्‍वेज से भी जाहिर होता है। लगता है कि उनकी प्रतिक्रियाएं विलंबित होती हैं। दूसरी तरफ कंगना रनोट हैं,जिनके इमोशन पर एक्‍सप्रेशन सवार रहता है। वह बहुत जल्‍दबाजी में दिखती हैं। अनेक दृश्‍यों में इसकी वजह से उनका अभिनय सटीक लगता है। इस फिल्‍म में कुछ दृश्‍यों में वह हड़बड़ी में खुद को पूरी तरह से व्‍यक्‍त नहीं कर पाती हैं। दोनों कलाकारों की खूबियां या कमियां इस फिल्‍म के लिए स्‍वाभाविक हो गई हैं। निखिल ने इमरान और कंगना को बहुत कुछ नया करने का मौका दिया है। इमरान का आत्‍मविश्‍वास कहीं-कहीं छिटक जाता है। कंगना रमती हैं। वह फिल्‍म के आखिरी दृश्‍यों में अपने लुक पर सीन के मुताबिक प्रयोग करने से नहीं हिचकतीं। उन्‍होंने पायल के द्वंद्व और पीड़ा को मुखर किया है।कंगना के इन दृश्‍यों में नाटकीयता नहीं है। वह जरूरत के अनुसार उदास,कातर और जिजीविषा से पूर्ण दिखती हैं।   
मजेदार है कि असली वजह मालूम होने के बाद भी दोनों किरदारों के प्रति हम असहज नहीं होते। हमें बतौर दर्शक तकलीफ होती है कि इनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था। यही वह क्षण होता है,जब गला रुंधता है और आंसूं निकल पड़ते हैं। कट्टी बट्टी नई और आधुनिक संवेदना की मांग करती है। इस फिल्‍म के विधान और क्राफ्ट में नयापन है। निखिल आडवाणी ने प्रयोग का जोखिम लिया है।
    इस फिल्‍म में स्‍टॉप मोशन तकनीक से शूट किया गया गीत तकनीक और इमोशन का नया मिश्रण है। किरदारों की वेशभूषा और माहौल में शहरी मध्‍यवर्ग की असर है। निखिल ने अपने किरदारों और फिल्‍म के परिवेश को मध्‍यवर्गीय ही रखा है। अमूमन ऐसी फिल्‍मों में भी किरदारों के लकदक कपड़े और सेट की सजावट दर्शकों का दूर करती है। हां,इस फिल्‍म के इमाशनल स्‍ट्रक्‍चर और कैरेक्‍टराइजेशन की नवीनता से पारंपरिक दर्शकों को दिक्‍कत हो सकती है।
अवधि- 131 मिनट 
स्‍टार तीन स्‍टार

Friday, November 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : गोरी तेरे प्‍यार में

gori tere pyaar mein-अजय ब्रह्मात्‍मज 
धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनी पुनीत मल्होत्रा की फिल्म 'गोरी तेरे प्यार में' पूरी तरह से भटकी, अधकचरी और साधारण फिल्म है। ऐसी सोच पर फिल्म बनाने का दुस्साहस करण जौहर ही कर सकते थे। करण जौहर स्वयं क्रिएटिव और सफल निर्देशक हैं। उन्होंने कुछ बेहतरीन फिल्मों का निर्माण भी किया है। उनसे उम्मीद रहती है, लेकिन 'गोरी तेरे प्यार में' वे बुरी तरह से चूक गए हैं।
जोनर के हिसाब से यह रोमांटिक कामेडी है। इमरान खान और करीना कपूर जैसे कलाकारों की फिल्म के प्रति दर्शकों की सहज उत्सुकता बन जाती है। अफसोस है कि इस फिल्म में दर्शकों की उत्सुकता भहराकर गिरेगी। दक्षिण भारत के श्रीराम (इमरान खान) और उत्तर भारत की दीया (करीना कपूर) की इस प्रेमकहानी में कुछ नए प्रसंग,परिवेश और घटनाएं हैं। उत्तर-दक्षिण का एंगल भी है।
ऐसा लगता है कि लेखक-निर्देशक को हीरो-हीरोइन के बीच व्यक्ति और समाज का द्वंद्व का मसाला अच्छा लगा। उन्होंने हीरोइन की सामाजिक प्रतिबद्धता को हीरो के प्रेम में अड़चन की तरह पेश किया है। हाल-फिलहाल तक हीरोइन का साथ और हाथ हासिल करने के लिए हीरो उसके पिता की सहमति का सविनय प्रयास करता था। इस फिल्म में हीरोइन के पिता की जगह सामाजिक कार्य और एनजीओ आ गया है।
हीरो की पूरी कोशिश किसी तरह काम पूरा कर हीरोइन को साथ ले जाना भर है। हीरोइन का सोशल एक्टिविज्म प्रेम के लिए हां करने के साथ ही काफुर हो जाता है।
'गोरी तेरे प्यार में' जैसी फिल्म युवाओं की सामाजिकता में बढ़ती रुचि को नष्ट करती हैं। सुधार,बदलाव और नेक कार्य को भी एक मजाक बना देती हैं। वास्तव में यह कहीं न कहीं लेखक, निर्देशक और निर्माता की भ्रमित सोच का नतीजा है। उन्हें अपने देश की समस्याओं और प्रवृत्तियों की सही जानकारी नहीं है। ज्ञान के इस अभाव में 'गोरी तेरे प्यार में' जैसी ही मनोरंजक फिल्में बन सकती हैं।
फिल्म में अनेक समस्याएं हैं। तर्क और कारण के लिहाज से विचार करें तो अनेक दृश्य और प्रसंग असंगत लगेंगे। प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी से संबंधित व्यक्तियों को इन बातों पर बेसिक ध्यान देना चाहिए।
अवधि-147 मिनट
*1/2

Friday, August 16, 2013

फिल्‍म समीक्षा : वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा

Once upon a time in Mumbai Dobaara
नहीं बनी बात 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
मिलन लुथरिया अपनी पहचान और प्रयोग के साथ बतौर निर्देशक आगे बढ़ रहे थे। 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा' से उन्हें झटका लगेगा। यह उनकी कमजोर फिल्म है। पहली कोशिश में मिलन सफल रहे थे, लेकिन दूसरी कोशिश में पहले का प्रभाव नहीं बनाए रख सके। उन्होंने दो अपराधियों के बीच इस बार तकरार और तनाव के लिए प्रेम रखा, लेकिन प्रेम की वजह से अपराधियों की पर्सनल भिड़ंत रोचक नहीं बन पाई। पावर और पोजीशन के लिए लड़ते हुए ही वे इंटरेस्टिंग लगते हैं।
शोएब और असलम अनजाने में एक ही लड़की से प्रेम कर बैठते हैं। लड़की जैस्मीन है। वह हीरोइन बनने मुंबई आई है। आठवें दशक का दौर है। तब फिल्म इंडस्ट्री में अंडरव‌र्ल्ड की तूती बालती थी। जैस्मीन की मुलाकात अंडरव‌र्ल्ड के अपराधियों से होती है। कश्मीर से आई जैस्मीन का निर्भीक अंदाज शोएब को पसंद आता है। वह जैस्मीन की तरफ आकर्षित होता है, लेकिन जैस्मीन तो शोएब के कारिंदे असलम से प्रेम करती है। आखिरकार मामला आमने-सामने का हो जाता है। लेखक-निर्देशक ने इस छोटी सी कहानी के लिए जो प्रसंग और दृश्य रचे हैं, वे बांध नहीं पाते। संवादों पर अधिक मेहनत की गई है। इतनी मेहनत हो गई है कि दृश्यों पर संवाद भारी पड़ते हैं और अपना अर्थ खो देते हैं। दृश्यों में नाटकीयता हो तो संवादों (डायलॉगबाजी) में मजा आता है। इस बार रजत अरोड़ा का गुण ही फिल्म के लिए अवगुण बन गया है।
फिल्म के पीरियड में एकरूपता नहीं रखी गई है। कभी 'मदर इंडिया' के पोस्टर दिख जाते हैं तो कभी बाद के दशक का गाना सुनाई पड़ता है। अक्षय कुमार और इमरान खान के लुक और स्टाइल में भी उल्लेखनीय भिन्नता है। हां, कोशिश की गई है मारुति के बाद की कारें सड़कों पर न दिखाई पड़े। सोनाक्षी सिन्हा के पहनावे, चाल-ढाल और संवाद अदायगी में पीरियड का अधिक खयाल नहीं रखा गया है।
कुछ ही दृश्यों में इमरान खान की मेहनत सफल होती दिखती है। भाव और संवाद की अदायगी में वे सक्षम नहीं हैं। अक्षय कुमार के चरित्र को स्टाइल देने में सफलता मिली है। उन्हें जोरदार डायलॉग भी मिले हैं, लेकिन उनके कुछ संवादों में 'बुरा मान जाएगी' तकियाकलाम जोड़ने के चक्कर में रजत अरोड़ा ने उन्हें बेअसर कर दिया है। सोनाक्षी सिन्हा को शुरू में चपर-चपर करना था और बाद में बिसूरना था। वह दोनों ही काम को निजी स्तर पर ढंग से कर ले गई हैं। फिल्म के अन्य किरदार अत्यंत ढीले और फीके हैं।
यह फिल्म मर्दवादी है। शोएब के किरदार को रंगीन और असरकारी दिखाने के लिए रचे गए दृश्यों और संवादों में यह नजरिया स्पष्ट है। शोएब के चरित्र को नकारात्मक रखा गया है तो इसे लेखक-निर्देशक युक्तिसंगत ठहरा सकते हैं। जैस्मीन या अन्य महिला किरदारों के प्रति पुरूष किरदारों का रवैये के बारे में क्या कहेंगे? कह सकते हैं कि मर्द दर्शकों को ध्यान में रख कर ही यह फिल्म बनाई गई है।
और हां, अक्षय कुमार का नाम शोएब है। बीच-बीच में वह शोहेब क्यों सुनाई पड़ता है?
अवधि-160 मिनट 
** दो स्‍टार 

Friday, January 11, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : मटरू की बिजली का मन्‍डोला

matru ki bijlee ka mandola film review

मुद्दे का हिंडोला

-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे संवेदनशील फिल्मकारों को झकझोर रहे हैं। वे अपनी कहानियां इन मुद्दों के इर्द-गिर्द चुन रहे हैं। स्पेशल इकॉनोमिक जोन [एसईजेड] के मुद्दे पर हम दिबाकर बनर्जी की 'शांघाई' और प्रकाश झा की 'चक्रव्यूह' देख चुके हैं। दोनों ने अलग दृष्टिकोण और निजी राजनीतिक समझ एवं संदर्भ के साथ उन्हें पेश किया। विशाल भारद्वाज की 'मटरू की बिजली का मन्डोला' भी इसी मुद्दे पर है। विशाल भारद्वाज ने इसे एसईजेड मुद्दे का हिंडोला बना दिया है, जिसे एक तरफ से गांव के हमनाम जमींदार मन्डोला व मुख्यमंत्री चौधरी और दूसरी तरफ से मटरू और बिजली हिलाते हैं। हिंडोले पर पींग मारते गांव के किसान हैं, मुद्दा है, माओ हैं और व‌र्त्तमान का पूरा मजाक है। वामपंथी राजनीति की अधकचरी समझ से लेखक-निर्देशक ने माओ को म्याऊं बना दिया है। दर्शकों का एक हिस्सा इस पर हंस सकता है, लेकिन फिल्म आखिरकार मुद्दे, मूवमेंट और मास [जनता] के प्रति असंवेदी बनाती है।
मन्डोला गांव के हमनाम जमींदार मन्डोला दिन में क्रूर, शोषक और सामंत बने रहते हैं। शाम होते ही गुलाबो [एक लोकल शराब] के नशे में आने के बाद वे खुद के ही खिलाफ हो जाते हैं। उनका उदार, डेमोक्रेटिक और प्रगतिशील चेहरा नजर आता है। धुत्त होने के बाद वे अद्भुत हो जाते हैं। उन्होंने प्रदेश की मुख्यमंत्री के साथ मिल कर अपने गांव के खेतों को मिल-कारखाने में बदलने की योजना बना डाली है। गांव के किसान अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ते हैं, जिसमें माओत्से तुंग की राय से वे निर्देशित होते हैं। माओ का यह उल्लेख और प्रसंग आम दर्शकों को सही राजनीतिक संदर्भ दे या न दे, लेकिन उन्हें तुरंत ही देश में चल रहे माओवादी आंदोलन का स्मरण कराएगा। इस आंदोलन की सरकारी व्याख्या और मीडिया कवरेज से समझ बनाए दर्शकों को यह प्रहसन गुदगुदाएगा,जबकि माओवादियों का आंदोलन इस देश की क्रूर सच्चाई का एक पहलू है। ना..ना.. विशाल भारद्वाज से ऐसी उम्मीद नहीं थी।
दरअसल, हमारे ज्यादातर फिल्मकार विदेशों के फिल्मकारों का शिल्प लेकर स्थानीय कथ्य गढ़ने की कोशिश करते हैं। स्थानीय कथ्य को ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ के सही परिपेक्ष्य में नहीं रखने से सच, कल्पना और सोच की गडमड होती है। यह गडमड 'मटरू की बिजली का मन्डोला' में कुछ ज्यादा है। पूछने का मन कर रहा है-आप की राजनीति क्या है विशाल? शबाना आजमी के एक लंबे संवाद में बताया गया है कि कैसे देश का मतलब समूह, समूह का मतलब भीड़ और भीड़ को चेहरा देने वाले नेता,नेता के व्यक्तिगत गुणों-अवगुणों से बनते देश और भारत के इतिहास की संक्षिप्त व्याख्या की गई है। इस से देश, समाज और जन की आप की समझ भी जाहिर होती है। फिल्म किरदारों के सहारे कथ्य के प्रभाव को बढ़ाती है। किरदार अधिक प्रभावशाली हो जाएं और उनमें परस्पर संतुलन न हो तो प्रवाह टूटता है। पंकज कपूर और शबाना आजमी सिद्ध अभिनेता हैं। वे मामूली दृश्यों को भी गैरमामूली बना देते हैं। उनके बीच इमरान खान और अनुष्का शर्मा जैसे अभिनय के छोटे बटखरे पासंग नहीं बना पाते। उनका हरियाणवी लहजा बार-बार टूटता है।
विशाल भारद्वाज शब्द और दृश्य के धनी फिल्मकार हैं। इसके बावजूद उनकी फिल्मों को क्रमवार देखें तो 'मकबूल' से 'मटरू की बिजली का मन्डोला' तक की यात्रा में लगातार बिखराव की ओर बढ़ रहे हैं। उनका क्राफ्ट निखरता जा रहा है और कथ्य बिखरता जा रहा है। हो सकता है कि वे अपनी अभिव्यक्ति का सही माध्यम खोज रहे हों, लेकिन इस प्रक्रिया में उनका असमंजस सामने आ रहा है। यह भी मुमकिन है कि वे अपने कथ्य और प्रस्तुति को लेकर स्पष्ट हों। कई बार ऐसा होता है कि लेखक और निर्देशक की स्पष्ट धारणाएं भी पन्ने और पर्दे पर प्रतिभासी हो जाती हैं। फिल्म के चुटीले संवाद और चटकीले दृश्य लुभाते हैं। पूरी फिल्म में यह निरंतरता रहती तो निश्चित ही अधिक आनंद आता।
विशाल भारद्वाज की फिल्मों का गीत-संगीत बहुत ओजपूर्ण, मधुर और कर्णप्रिय होता है। इस फिल्म के गीत-संगीत में भी वे सारी खूबियां हैं। सवाल है कि दर्शकों को कब तक झुनझुना सुनाते रहेंगे विशाल? उन्हें अपनी इस क्षमता का सदुपयोग फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में करना चाहिए। फिल्म के प्रचार से आभास मिला था कि यह पूरी तरह से कामेडी फिल्म होगी। फिल्म का अप्रोच कॉमिकल है और विषय राजनीतिक मुद्दे की अधूरी समझ से गढ़ा गया है, इसलिए फिल्म का घालमेल निराश करता है।
पुनश्च-विशाल भारद्वाज की इस हिम्मत के लिए बधाई कि इस फिल्म के पोस्टर पर फिल्म का टायटल चलन के मुताबिक अंग्रेजी में नही लिखा गया है। रोमन टायटल पोस्टर पर दिखे ही नहीं।
अवधि- 151 मिनट
** ढाई स्टार

Thursday, October 18, 2012

मटरू की बिजली का मन्डोला का नामकरण

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
विशाल भारद्वाज ने मकड़ी,मकबूल और ओमकारा के बाद पहली बार सात खून माफ में तीन शब्दों का टायटल चुना था। इस बार उनकी फिल्म के टायटल में पांच शब्द हैं-मटरू की बिजली का मन्डोला। फिल्म के नाम की पहली घोषणा के बाद से ही इस फिल्म के टाश्टल को लेकर कानाफूसी चालू हो गई थी। एक तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंगेजीदां सदस्यों के लिए टंग ट्विस्टर थ और दूसरे इसका मानी नहीं समझ में आ रहा था। बहुत समय तक कुछ लोग मटरू को मातृ और मन्डोला को मन डोला पढ़ते रहे। विशाल भारद्वाज ने इस फिल्म के टायटल की वजह बताने के पहले एक किस्सा सुनाया। जावेद अख्तर को यह टायटल पसंद नहीं आया था। उनहोंने विशाल से कहा भी कि यह कोई नाम हुआ। उनकी आपत्ति पर गौर करते हुए विशाल ने फिल्म का नाम खामखां कर दिया। वे अभी नए टायटल की घोषणा करते इसके पहले ही विशाल के पास जावेद साहब का फोन आया- आप ने खामखां नाम जाहिर तो नहीं किया है। मुझे पहला टायटल ही अच्छा लग रहा है। किसी मंत्र का असर है उसमें। आप तो मटरू की बिजली का मन्डोला टायटल ही रखो। इस फिल्म के गीत के लिए जब विशाल अपने गुरू और गॉडफादर गुलजार से मिले तो वे भी चौंके,लेकिन शब्दों के कारीगर को यह टायटल बहुत पसंद आया। उन्होंने तुरंत जोड़ा-पहले मैं बोला,फिर वो बोला,मटरू की बिजली का मन्डोला। अभी यह गीत बन गया है। विशाल ने बताया कि उन्होंने हरियाण में एक दुकान पर मटरू नाम देख था और बिजली शब्द तो उन्हें इतना प्रिय है कि उन्हें बेटी होती तो वे उसका नाम बिजली हीे रखते। हरियाणा में  मन्डोला नाम का एक गांव है। इस तरह विशाल की अगली फिल्म का नाम मटरू की बिजली का मन्डोला पड़ा। और एक खास बात विशाल ने पोस्टर पर केवल नागरी लिपि में यानी हिंदी में फिल्म का नाम डाला है। इस फिल्म में मटरू इमरान खान है और बिजली अनुष्का शर्मा। 

Sunday, September 16, 2012

मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज
उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।
    -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं?
0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसलिए यह गलतफहमी है। अब धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो रहा है कि मैं एफटीआईआई से आया हूं। पिछले दो-तीन सालों में और भी कुछ छात्र आए हैं।
    - एक जमाने में एफटीआईआई से एक्टर की पूरी जमात आई थी। वे सभी आज मशहूर हैं। एक अंतराल के बाद आप लोग उस ट्रेडिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी कैसी फैकल्टी है और वहां पढऩे का क्या लाभ हुआ?
0 पेंटल साहब हमारे हेड थे। फैकल्टी काफी अच्छी थी। दो सालों की पढ़ाई में उनलोगों ने एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। वहां थोड़ी आजादी भी दी जाती है। आप ने सही कहा। एक समय एफटीआईआई से काफी एक्टर हिंदी फिल्मों में आए। उन्होंने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग को नई दिशा दी। बीच में वहां एक्टिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। अब शुरू हुई है। धीरे-धीरे हमारी तादाद बढ़ेगी।
    - आप ने एफटीआईआई जाने की जरूरत क्यों महसूस की? आप के पहले नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद एफटीआईआई से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिया। क्या एफटीआईआई में फिल्म एक्टिंग की खास पढ़ाई होती है?
0 मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था। वहां श्रीराम सेंटर से जुड़ा हुआ था। 2004 में जब एफटीआईआई में एक्टिंग का कोर्स चालू हुआ तो एक मित्र वहां गए। उनके बारे में सुनने और जानने के बाद मैंने भी एफटीआईआई में ही जाना उचित समझा। एनएसडी का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। मुझे थिएटर करना ही नहीं था। शुरू से स्पष्ट था कि मुझे फिल्मों में एक्टिंग करनी है। मेरे दिमाग में यह बात थी कि एफटीआईआई मुंबई के नजदीक है। एफटीआईआई से निकले काफी लोग फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। मुझे लगा कि उससे थोड़ी सहूलियत होगी।
    -फिल्मों में एक्टिंग करने का फैसला कब लिया आप ने?
0 सच कहूं तो स्कूल के दिनों में सोच लिया था। स्कूल के वार्षिक समारोहों और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया करता था। दोस्तों और शिक्षकों की प्रशंसा से लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। उन्हीं दिनों यह ख्वाब पैदा हुआ। बाद में डांस सीखा, थिएटर किया, नाटक पढ़े, फिल्में देखी.. और खुद को फिल्मों के लिए तैयार किया।
    - अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं गुडग़ांव का हूं। उस गुडग़ांव का, जो एक गांव हुआ करता था। अभी तो वह सिंगापुर का मुकाबला कर रहा है। हम रात में छतों पर चादर बिछाकर सोया करते थे। ऊपर तारों से सजा आकाश होता था। वहीं कुछ सपने देखे थे। मेरे पिता पटवारी थे। उन्होंने ईमानदार जिंदगी जी और उसी की सीख दी। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। दोनों बड़े भाई भी एक्टिंग और डांसिंग के शौकीन थे। फिलहाल वे नौकरी कर रहे हैं। मुझे पर्दे पर देखकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है। शायद मैं उनके अधूरे ख्वाबों को भी जी रहा हूं। बहुत संबल मिलता है। बतौर एक्टर मुझे बचपन की सरल और साधारण जिंदगी बहुत मदद करती है। मैंने चेहरे और किरदार पढ़े हैं। वे सभी मेरे अंदर जिंदा हैं। मैंअपने परिवार और परिवेश का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में ही अनौपचारिक ट्रेनिंग दे दी। मैं संयुक्त परिवार से आता हूं। रिश्तों की रेस्पेक्ट जानता हूं। रहते हम लोग गुडग़ांव में थे, लेकिन दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। मुझे एक साथ गांव और शहर दोनों को समझने और जीने का मौका मिला।
    - परिवार का माहौल कैसा था? फिल्मों के प्रति मां-बाप की रुचि थी या नहीं?
0 फिल्मों के प्रति बहुत ज्यादा रूझान नहीं था, लेकिन मेरी मां अमिताभ बच्चन की जबरदस्त प्रशंसक हैं। पिताजी को राजेश खन्ना ज्यादा पसंद थे। उनके गाने वे आज भी गुनगुनाया करते हैं। भाइयों को फिल्मों का शौक था। उन्हीं के साथ मुझे भी फिल्में देखने को मिल जाती थी। मुझे बचपन से पूरी आजादी मिली। फिल्में देखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन मैंने कभी इसका नाजायज फायदा नहीं उठाया। मेरे ऊपर 90 प्रतिशत अंक लाने का या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का दवाब नहीं था। मैं ठीक-ठाक छात्र रहा हूं। परीक्षा के समय पढक़र फस्र्ट क्लास लाया करता था। पिताजी ने बताया था कि वे परीक्षा के दिनों में फिल्में जरूर देखते थे। उनसे यह आदत मैंने भी सीख ली।
    -फिल्मों में काम मिलने में कितनी दिक्कतें हुईं? संघर्ष कितना लंबा और कठिन रहा?
0 मुझे लगभग एक साल कथित स्ट्रगल करना पड़ा। आने के बाद मैंने भी वही तरीका अपनाया कि प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी तस्वीर छोड़ो और फिर उनके फोन का इंतजार करो। ज्यादातर निराशा ही हाथ लगती थी। मैंने उन्हीं दिनों दोस्तों की मदद से अपना एक शोरील बनाया। डीवीडी के ऊपर अपनी तस्वीर चिपकाई और किसी प्रोफेशनल एक्टर की तरह उन्हें प्रोडक्शन के दफ्तरों में छोड़ा। फिर कहीं अखबार में पढ़ा कि दिबाकर बनर्जी को   ‘लव सेक्स और धोखा’ के लिए नए कलाकार चाहिए। मुझे यकीन हो गया कि मेरे लिए ही उन्होंने यह शर्त रखी है। मैंने उनके कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क किया। संयोग देखें कि मेरा चुनाव हो भी गया। उस एक फिल्म ने हिंदी फिल्मों में मेरा प्रवेश आसान कर दिया। उसके तुरंत बाद  ‘रागिनी एमएमएस’ मिल गई। वैसे  ‘लव सेक्स और धोखा’ की शूटिंग के बाद ही मैंने  ‘चिटगांव’ की शूटिंग शुरू कर दी थी और  ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के लिए हां कह दिया था। फिर विजॉय नांबियार ने  ‘शैतान’ में छोटा सा अपीयरेंस दिया। अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हूं और मुझे लग रहा है कि सही दिशा में बढ़ रहा हूं।
    -अपनी फिल्म  ‘शाहिद’ के बारे में बताएं?
0 यह मुंबई के वकील शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित है। वे ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की वकालत करते थे, जिन्हें किसी गलतफहमी या साजिश के तहत गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कई निरपराध आरोपियों को बरी कराया। उनके इस रवैए से परेशान होकर असामाजिक तत्वों ने राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या कर दी। हंसल मेहता ने उनकी जिंदगी पर बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह फिल्म मेरी क्षमताओं से दर्शकों और समीक्षकों को परिचित कराएगी।
    -आप का करियर अच्छा और सीधा ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। अभी तक की फिल्मों में किस अभिनेता या अभिनेत्री के साथ एक फ्रेम में आने की सबसे ज्यादा खुशी हुई? भविष्य में और किस के साथ आना चाहेंगे?
0  ‘चिटगांव’ में मनोज बाजपेयी के साथ आना मेरे लिए गर्व की बात थी। उनके साथ एक कनेक्शन महसूस करता हूं। वे भी दिल्ली से थिएटर कर मुंबई आए। मैं उन्हीं के पद्चिह्नों पर चल रहा हूं। उसके बाद  ‘तलाश’ की शूटिंग में आमिर खान के साथ काम करने का मौका मिला। आमिर बड़े ही सहज और डेमोक्रेटिक स्टार हैं। उन्होंने फिल्म एक्टिंग की बारीकियां बातों-बातों में सिखा दीं। भविष्य में चाहूंगा कि कभी इरफान के साथ काम करने का मौका मिले। मुझे डर है कि शायद मैं सहज नहीं रह पाऊंगा। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और उनके प्रभामंडल से प्रभावित हूं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ी है।

Monday, February 13, 2012

फिल्म समीक्षा : एक मैं और एक तू

डायनिंग टेबल ड्रामाडायनिंग टेबल ड्रामा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

करण जौहर निर्माता के तौर पर एक्टिव हैं। कुछ हफ्ते पहले उनकी अग्निपथ रिलीज हुई। एक्शन से भरी वह फिल्म अधिकांश दर्शकों को पसंद आई। इस बार वे रोमांटिक कामेडी लेकर आए हैं। वसंत का महीना प्यार और रोमांस का माना जाता है। अब तो 14 फरवरी का वेलेंटाइन डे भी मशहूर हो चुका है। इस मौके पर वे करीना कपूर और इमरान खान के डेट रोमांस की फिल्म एक मैं और एक तू किशोर और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर ले आए हैं। करण जौहर की ऐसी फिल्मों की तरह ही इसका लोकेशन भी विदेशी है। वेगास से आरंभ होकर यह फिल्म नायक-नायिका के साथ मुंबई पहुंचती है और डायनिंग टेबल ड्रामा के साथ समाप्त होती है। और हां,इस फिल्म के निर्देशक शकुन बत्रा हैं।

अचानक मुलाकात, हल्की सीे छेडछाड़, साथ में ड्रिंक और फिर अनजाने में हुई शादी बता दें कि कहानी में लड़का थोड़ा दब्बू और लड़की बिंदास है। यूं इस फिल्म की अन्य महिला किरदार भी यौन ग्रंथि की शिकार दिखती हैं। मुमकिन है विदेशों में लड़कियां यौन संबंधों को लेकर अधिक खुली और मुखर हों।

राहुल और रियाना अनजाने में हुई अपनी शादी रद्द करवाने के चक्कर में दो हफ्ते मिलते और साथ रहते हैं। रियाना के संसर्ग में आकर राहुल बदलता ही नहीं है। वह रियाना से प्यार भी करने लगता है। रियाना उसके प्यार का तूल नहीं देती। वह उसे सिर्फ दोस्त समझती है। थोड़े मान-मनौव्वल के बाद दोनों प्यार के बराबर एहसास को महसूस करते हैं।

नयी सोच और भाषा की यह प्रेम कहानी हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों के लिए थोड़ी मुश्किल हो सकती है क्योंकि संवादों में अंग्रेजी धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई है। शहरी और कॉलेज के युवकों को प्रेमकहानी की यह नई शैली पसंद आ सकती है। शकुन बत्रा ने एक छोटी सी कहानी को लंबा खींचा है। इसलिए इंटरवल के पहले कहानी आगे बढ़ती नहीं लगती। भारत आने के बाद अन्य किरदार जुड़ते हैं और घटनाएं तेजी से घटती हैं। डायनिंग टेबल ड्रामा अच्छी तरह से लिखा और शूट किया गया है।

राहुल का किसी ज्वालामुखी की तरह फटना फिल्म का चरम बिंदु है। इमरान ने दृश्य की जरूरत के मुताबिक मेहनत की है। करीना कपूर का अभिनय प्रवाह देखते ही बनता है। इस फिल्म को देखते हुए जब वी मेट की गीत का खयाल आना स्वाभाविक है, लेकिन दोनों में फर्क है। करीना ने अपने दोनों किरदारों को एक सा नहीं होने दिया है। बाकी कलाकार और किरदार भरपाई के लिए हैं। अमिताभ भट्टाचार्य के एक गीत में पानी का बहुवचन पानियों सुनाई पड़ता है। यह प्रयोग कितना उचित है? अमित त्रिवेदी धुनों की नवीनता केसाथ यहां मौजूद हैं। आंटी जी अमित और अमिताभ का मजेदार म्यूजिकल क्रिएशन है।


*** तीन स्टार

Friday, September 9, 2011

फिल्‍म समीक्षा : मेरे ब्रदर की दुल्‍हन


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पंजाब की पृष्ठभूमि से बाहर निकलने की यशराज फिल्म्स की नई कोशिश मेरे ब्रदर की दुल्हन है। इसके पहले बैंड बाजा बारात में उन्होंने दिल्ली की कहानी सफल तरीके से पेश की थी। वही सफलता उन्हें देहरादून के लव-कुश की कहानी में नहीं मिल सकी है। लव-कुश छोटे शहरों से निकले युवक हैं। ने नए इंडिया के यूथ हैं। लव लंदन पहुंच चुका है और कुश मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आ गया है। उल्लेखनीय है कि दोनों का दिल अपने छोटे शहर की लड़कियों पर नहीं आया है। क्राइसिस यह है कि बड़े भाई लव का ब्रेकअप हो गया है और वह एकबारगी चाहता है कि उसे कोई मॉडर्न इंडियन लड़की ही चाहिए। बड़े भाई को यकीन है कि छोटे भाई की पसंद उससे मिलती-जुलती होगी, क्योंकि दोनों को माधुरी दीक्षित पसंद थीं।

किसी युवक की जिंदगी की यह क्राइसिस सच्ची होने के साथ फिल्मी और नकली भी लगती है। बचे होंगे कुछ लव-कुश, जिन पर लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर की नजर पड़ी होगी और जिनका प्रोफाइल यशराज फिल्म्स के आदित्य चोपड़ा को पसंद आया होगा। इस क्राइसिस का आइडिया रोचक लगता है, लेकिन कहानी रचने और चित्रित करने में अली अब्बास जफर ढीले पड़ गए हैं। कहानी की रोचकता बनाए रखने के लिए उनके पास वजह और घटनाएं नहीं थीं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि हम टीवी पर चल रहा कोई कामेडी शो देख रहे हैं। इंटरवल के आगे-पीछे कहानी अटक सी गई है। लव-कुश और डिंपल के पिताओं की बकझक और सहमति फिल्म के प्रभाव को और गिराती है।

स्क्रिप्ट में चुस्ती रहती और घटनाएं तेजी से घटतीं तो मेरे ब्रदर की दुल्हन इंटरेस्टिंग रोमांटिक कामेडी हो सकती थी। इस फिल्म की दूसरी बड़ी बाधा इमरान खान हैं। अपनी कोशिशों के बावजूद वह अपने किरदार में केवल मेहनत करते ही नजर आते हैं। कभी संवाद है तो भाव नहीं और कभी भाव के नाम पर अजीबोगरीब मुद्राएं हैं। इमरान खान की सबसे बड़ी समस्या संवाद अदायगी है। उन्हें अपनी भाषा के साथ ही भाव पर ध्यान देना चाहिए। कट्रीना कैफ डिंपल के किरदार में सहज दिखी हैं। वह चुहलबाजी और मस्ती करती हुई अच्छी लगती हैं। उनमें सुधार आया है। अली जफर ने फिर एक बार साबित किया कि वे नैचुरल एक्टर हैं। कुश के दोनों दोस्तों में वह प्रभावित करता है, जिसे दो-चार संवाद मिले हैं।

फिल्म में भरपूर नाच-गाना और मस्ती है। टुकड़ों में यह एंटरटेन भी करती है, लेकिन पूरी फिल्म का प्रभाव ढीला हो गया है। फिल्म फिसल गई है। फिर भी अली अब्बास जफर अपनी संभावनाओं से आश्वस्त करते हैं।

*** तीन स्टार

Friday, July 1, 2011

फिल्‍म समीक्षा : देल्‍ही बेली

चौंकाती है इसकी भाषा

देल्ही  बेली: चौंकाती है इसकी भाषा-अजय ब्रह्मात्‍मज
ताशी, अनूप और नितिन तीन दोस्त हैं। दुनिया से बगाने और अपने काम से असंतुष्ट.. गरीबी उनकी जिंदगी पर लदी हुई है। पुरानी दिल्ली के जर्जर से किराए के कमरे में रहते हुए किसी तरह व अपने सपनों को पाल रहे हैं। अचानक उनकी जिंदगी में ऐसी आंधी आती है कि उससे बचने की कोशिश में वे तबाही के करीब पहुंच जाते हैं। मौत के चंगुल से निकलने के लिए वे कामन सेंस का इस्तेमाल करते हैं। उनकी इस फटेहाल और साधारण सी जिंदगी को लेखक अक्षत वर्मा और निर्देशक अभिनय देव ने हूबहू पर्दे पर उतार दिया है। ये साधारण किरदार आसाधारण स्थितियों में फंसते हैं और हमें उनकी बेचारगी पर हंसी आती है। आमिर खान के स्पर्श ने इस फिल्म को अनोखा बना दिया है। मूल रूप से अंग्रेजी में बनी यह फिल्म भारतीय सिनेमा में एक नई शुरुआत है। निश्चित ही इसकी कामयाबी एक नए ट्रेंड को जन्म दगी, जिसके परिणाम से मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री प्रभावित होगी।

भारतीय सिनेमा के आम दर्शकों पर इसका शॉकिंग असर होगा, क्योंकि उन्होंने न तो फिल्मों में ऐसी भाषा सुनी है और न ऐसे दृश्य देखे हैं। अभी तक हम गालियों के इस्तेमाल से उद्वेलित होते रहे हैं। इसमें गाली के साथ गलीज दृश्य भी हैं। लेखक-निर्देशक ने क्रिएटिव शिष्टता का पालन नहीं किया है। कहा जा रहा है कि आज के युवा दर्शकों की रुचि और शैली को इस फिल्म में अभिव्यक्ति मिली है। देल्ही बेली बदले दौर की फिल्म है और मुख्य रूप से शहरी युवकों को लक्ष्य कर बनाई गई है। हालांकि इसे हिंदी में भी डब किया गया है और इस उम्मीद के साथ अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में रिलीज किया गया है कि व्यापक दर्शकों तक फिल्म पहुंचे।

भाषा और दृश्यों की नवीनता के साथ देल्ही बेली की चुस्त एडीटिंग और गति सोचने और पलक झपकाने का मौका नहीं देती। फिल्म देखते हुए कुछ भी अविश्वसनीय नहीं लगता, जबकि फिल्मी फार्मूलों और नाटकीयता का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। लेखक-निर्देशक ने बड़ी चालाकी के साथ पारंपरिक शैली और शिल्प का उपयोग किया है। उन्होंने परंपरागत किरदारों को नया लुक और लैंग्वेज दे दिया है। हमें लगता है कि हम कुछ नया देख रहे हैं, जबकि फिल्म सोच और निर्वाह में किसी साधारण फिल्म की तरह रूढि़वादी, घिसी-पिटी और ट्रेडिशनल है। फिल्म को पेश करने में कास्मेटिक बदलाव लाया गया है और यही देल्ही बेली की खासियत बन गई है।

कुणाल राय कपूर और वीर दास अपनी भूमिकाओं में प्रभावित करते हैं। उनकी वैशाखी पर इमरान खान भी चल जाते हैं। ताशी के किरदार में इमरान अभिनय की पूरी रंगत नहीं दिखा पाए हैं। पूर्णा जगन्नाथन और विजय राज भी अच्छे लगते हैं। फिल्म का गीत-संगीत प्रचार में अश्लील और आक्रामक लग रहा था। फिल्म में उनका बैकग्राउंड में संयमित उपयोग किया गया है।

देल्ही बेली आमिर खान के सधे हाथों में होने के कारण अपने प्रभाव से उतनी खतरनाक नहीं है, लेकिन निश्चित ही इसके प्रभाव में आई अगली फिल्में भ्रष्ट हो सकती हैं। हिंदी सिनेमा में आए इस नए विस्तार का स्वागत करते हुए भी मैं सशंकित हूं। कहीं गलत ट्रेंड की पहली फिल्म न हो जाए देल्ही बेली?

*** 1/2 साढ़े तीन स्टार

Friday, November 26, 2010

फिल्‍म समीक्षा : ब्रेक के बाद

थीम और परफार्मेस में दोहराव

ब्रेक के बाद: थीम और परफार्मेस  में दोहराव-अजय ब्रह्मात्‍मज

आलिया और अभय बचपन के दोस्त हैं। साथ-साथ हिंदी सिनेमा देखते हुए बड़े हुए हैं। मिस्टर इंडिया (1987) और कुछ कुछ होता है (1998) उनकी प्रिय फिल्में हैं। यह हिंदी फिल्मों में ही हो सकता है कि ग्यारह साल के अंतराल में आई फिल्में एक साथ बचपन में देखी जाएं और वह भी थिएटर में। यह निर्देशक दानिश असलम की कल्पना है, जिस पर निर्माता कुणाल कोहली ने मोहर लगाई है।

इस साल हम दो फिल्में लगभग इसी विषय पर देख चुके हैं। दोनों ही फिल्में बुरी थीं, फिर भी एक चली और दूसरी फ्लॉप रही। पिछले साल इसी विषय पर हम लोगों ने लव आज कल भी देखी थी। इन सभी फिल्मों की हीरोइनें प्रेम और शादी को अपने भविष्य की अड़चन मान बे्रक लेने या अलग होने को फैसला लेती हैं। उनकी निजी पहचान की यह कोशिश अच्छी लगती है, लेकिन वे हमेशा दुविधा में रहती हैं। प्रेमी और परिवार का ऐसा दबाव बना रहता है कि उन्हें अपना फैसला गलत लगने लगता है। आखिरकार वे अपने प्रेमी के पास लौट आती हैं। उन्हें प्रेम जरूरी लगने लगता है और शादी भी करनी पड़ती है। फिर सारे सपने काफुर हो जाते हैं। ब्रेक के बाद इसी थीम पर चलती है।

कहानी में नयापन नहीं है। चूंकि दीपिका पादुकोण और इमरान खान को इसी विषय की फिल्मों में हम देख चुके हैं, इसलिए उनके परफार्मेस में दोहराव दिखता है। वैसे भी इमरान खान बतौर एक्टर अपनी पहली फिल्म से आगे नहीं निकल पा रहे हैं। उन्हें अपनी लैंग्वेज के साथ बॉडी लैंग्वेज पर भी काम करना चाहिए। दीपिका पादुकोण में आकर्षण है और वह मेहनत भी करती हैं, लेकिन हिंदी संवादों के उच्चारण में वह पिछड़ जाती हैं। साफ लगता है कि वह शब्दों का अर्थ समझे बगैर उन्हें बोल रही है। उन्हें मालूम ही नहीं कि वाक्य में कहां किस शब्द पर जोर डालना है या ठहरना है। नतीजतन उनकी मेहनत अंतिम प्रभाव में असफल रहती है।

इस फिल्म में पारंपरिक बुआ का अलग किस्म का चित्रण है। वह अपने हीरो भतीजे से उसकी प्रेमिकाओं के बारे में हंसी-मजाक कर लेती हैं और तीन शादियां करने के बाद तीन तलाक भी ले चुकी हैं। आखिर दानिश ऐसी बुआ के मार्फत क्या बताना या कहना चाहते हैं? फिल्म की कहानी किसी क्रम में आगे नहीं बढ़ती। लेखक-निर्देशक की मर्जी से पात्र भारत और विदेश आते-जाते रहते हैं। फिल्म में मॉरीशस को आस्ट्रेलिया दिखाने की कोशिश भी बचकानी है।

* एक स्टार


Friday, July 2, 2010

फिल्‍म समीक्षा आई हेट लव स्‍टोरीज

बालिवुद का रोमांस


-अजय ब्रह्मात्‍मज

चौंकिए नहीं, जब करण जौहर और उनके कैंप के डायरेक्टर हिंदी फिल्मों के बारे में अंग्रेजी में सोचना शुरू करते हैं और फिर उसे फायनली हिंदी में लाते हैं तो बालीवुड के अक्षर बदल कर बालिवुद हो जाते हैं। इस फिल्म के एक किरदार के टी शर्ट पर बालिवुद लिखा साफ दिखता है। बहरहाल, आई हेट लव स्टोरीज मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा के लव और रोमांस की कैंडीलास फिल्मों के मजाक से आरंभ होती है और फिर उसी ढर्रे पर चली जाती है। जैसे कि कोई बीसियों बार सुने-सुनाए लतीफे को यह कहते हुए सुनाए कि आप तो पहले सुन चुके होंगे, फिर भी..और हम-आप हो..हो..कर हंसने लगें। वैसे ही यह फिल्म अच्छी लग सकती है।

पुनीत मल्होत्रा चालाक निर्देशक हैं। उन्होंने हिंदी फिल्मों की लव स्टोरी का मखौल उड़ाते हुए फिर से घिसी-पिटी लव स्टोरी बना दी है। इस आसान रास्ते के बावजूद फिल्म बांधे रखती है, क्योंकि सोनम कपूर और इमरान खान के लब एडवेंचर का आकर्षण बना रहता है। दोनों को पहली बार एक साथ नोंक-झोंक करते और एक-दूसरे पर न्योछावर होते देख कर अच्छा लगता है। दोनों में भरपूर एनर्जी है। लेखक-निर्देशक ने हीरो-हीरोइन पर ही मुख्य रूप से फोकस किया है। यही वजह है कि सपोर्टिग कास्ट कमजोर और अधूरे लगते हैं। सिमरन के मां-बाप, जे की मां और सिमरन के प्रेमी राज को ठीक से नहीं गढ़ा गया है। अगर वे पूरे एवं मजबूत किरदार होते तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली होती।

पूरी फिल्म में एक चमक और चकाचौंध है, जो नजर नहीं हटने देती। पुनीत मल्होत्रा का यही प्रयास रहा है कि हम फिल्म की सजावट में ही उलझे रहें और बुनावट की तरफ ध्यान न दें। वे अपने मकसद में सफल रहे हैं। हिंदी फिल्मों के रेफरेंस से जवान हो रही पीढ़ी को आई हेट लव स्टोरीज भा जाएगी, क्योंकि इसमें उन्हें अपना एटीट्यूड और कंफ्यूजन दिखेगा। इस लिहाज से पुनीत मल्होत्रा अपने टार्गेट ग्रुप को संतुष्ट कर लेंगे। फिर भी इस फिल्म की संरचना किसी फिल्मी सेट की तरह कमजोर, नकली और कामचलाऊ है। सोनम और इमरान की जोड़ी भाती है। दोनों के बीच अच्छी केमिस्ट्री डेवलप हुई है। हालांकि सोनम का परफार्मेस पिछली दोनों फिल्मों से कमजोर है, लेकिन वह साज-सज्जा से आकर्षक लगता है। इसी प्रकार इमरान का एकआयामी किरदार भी समझ में आता है। करण जौहर के प्रतिरूप की भूमिका निभा रहे समीर सोनी को मेहनत करनी पड़ी है। बाकी कलाकारों और किरदारों पर निर्देशक का ध्यान नहीं रहा है। फिल्म का गीत-संगीत चलताऊ है।

** दो स्टार


Saturday, July 25, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लक

-अजय ब्रह्मात्मज
माना जाता है कि हिंदी फिल्मों के गाने सिर्फ 200 शब्दों को उलट-पुलट कर लिखे जाते हैं। लक देखने के बाद फिल्म के संवादों के लिए भी आप यही बात कह सकते हैं। सोहम शाह ने सिर्फ 20 शब्दों में हेर-फेर कर पूरी फिल्म के संवाद लिख दिए हैं। किस्मत, फितरत, तकदीर, गोली, मौत और जिंदगी इस फिल्म के बीज शब्द हैं। इनमें कुछ संज्ञाएं और क्रियाएं जोड़ कर प्रसंग के अनुसार संबोधन बदलते रहते हैं। यूं कहें कि सीमित शब्दों के संवाद ही इस ढीली और लोचदार स्कि्रप्ट के लिए आवश्यक थे। अगर दमदार डायलाग होते तो फिल्म के एक्शन से ध्यान बंट जाता। सोहम की लक वास्तव में एक टीवी रियलिटी शो की तरह ही है। बस, फर्क इतना है कि इसे बड़े पर्दे पर दिखाया जा गया है। इसमें टीवी जैसा रोमांच नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि अंत में जीत हीरो की ही होनी है और उसकी हीरोइन किसी भी सूरत में मर नहीं सकती। वह बदकिस्मत भी हुई तो हीरो का लक उसकी रक्षा करता रहेगा। रियलिटी शो के सारे प्रतियोगी एक ही स्तर के होते हैं। समान परिस्थितियों से गुजरते हुए वे जीत की ओर बढ़ते हैं। इसलिए उनके साथ जिज्ञासा जुड़ी रहती है। बड़े पर्दे पर के इस रियलिटी शो लक में पहले ही पता चल जाता है कि बुरे दिल का राघव (रवि किशन) आउट हो जाएगा। इंटरवल तक तो इस रियलिटी शो के प्रतियोगी जमा किए जाते हैं। उनकी जिंदगी के उदास किस्से सुनाए जाते हैं। निराशा में भी किस्मत के धनी किरदार जिंदादिल और जोशीले नजर आते हैं। अपनी-अपनी मजबूरियों से वे इकट्ठे होते हैं और फिर मूसा (संजय दत्त) उन पर भारी रकम के दांव पर लगाता है। मूसा और उसका सहयोगी तामांग (डैनी डेंजोग्पा) रियलिटो शो के संचालक हैं। लक में तर्क न लगाएं तो ही बेहतर होगा। सारे किरदार नकली और फिल्मी हैं। चूंकि लेखक और निर्देशक सोहम शाह खुद हैं, इसलिए फिल्म के बुरी होने का पूरा श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए। हां, कलाकारों ने उनकी इस कोशिश को बढ़ाया है। खासकर इमरान खान और श्रुति हासन ने। इमरान खान को मान लेना चाहिए कि सिर्फ इंस्टिक्ट से फिल्म चुनना सही नहीं है। देखना चाहिए कि आप फिल्म के किरदार में जंचते भी हैं या नहीं? एक्शन फिल्मों में हीरो का कांफीडेंस उसकी बाडी लैंग्वेज में नजर आता है। इमरान में एक्शन स्टार का कंफीडेंस नहीं है। वे एक्शन करते समय कांपते से नजर आते हैं। श्रुति हासन लक से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत कर रही हैं। अब श्रुति का कमल हासन और सारिका की बेटी होना संयोग है या लक? निर्देशक का ध्यान केवल एक्शन पर रहा है। दो-तीन एक्शन सीक्वेंस बेहतर बन पड़े हैं, लेकिन स्पेशल इफेक्ट से रूबरू दर्शक ऐसे दृश्यों की सच्चाई जानते हैं। फिल्म में इमोशन और ड्रामा रहे तो एक्शन का प्रभाव बढ़ जाता है, लेकिन लक इन दोनों ही मामलों में कमजोर है। फिल्म के अंत में एक डायलाग है - लक उन्हीं का साथ देता है जिनमें जीतने का जच्बा हो। काश, फिल्म बनाने के जज्बे से भी लक को जोड़ा जा सकता।
रेटिंग-*

Wednesday, July 22, 2009

इमरान खान से बातचीत

-अजय ब्रह्मात्मज
साल भर के स्टार हो गए हैं इमरान खान। उनकी फिल्म जाने तू या जाने ना पिछले साल 4 जुलाई को रिलीज हुई थी। संयोग से इमरान से यह बातचीत 4 जुलाई को ही हुई। उनसे उनकी ताजा फिल्म लक, स्टारडम और बाकी अनुभवों पर बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके अंश..
आपकी फिल्म लक आ रही है। खुद को कितना लकी मानते हैं आप?
तकनीकी रूप से बात करूं, तो मैं लक में यकीन नहीं करता। ऐसी कोई चीज नहीं होती है। तर्क के आधार पर इसे साबित नहीं किया जा सकता। मैं अपनी छोटी जिंदगी को पलटकर देखता हूं, तो पाता हूं कि मेरे साथ हमेशा अच्छा ही होता रहा है। आज सुबह ही मैं एक इंटरव्यू के लिए जा रहा था। जुहू गली से क्रॉस करते समय मेरी गाड़ी से दस फीट आगे एक टहनी गिरी। वह टहनी मेरी गाड़ी पर भी गिर सकती थी। इसी तरह पहले रेल और अब फ्लाइट नहीं छूटती है। मैं लेट भी रहूं, तो मिल जाती है। शायद यही लक है, लेकिन मेरा दिमाग कहता है कि लक जैसी कोई चीज होती ही नहीं है।
क्या हमारी सोच में ही लक और भाग्य पर भरोसा करने की बात शामिल है?
हमलोग आध्यात्मिक किस्म के हैं। हो सकता है उसी वजह से ऐसा हो, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री की बात करें, तो यहां इतना पैसा लगता है, मेहनत लगती है और उसके बाद भी फिल्म नहीं चलती, तो हम भाग्य को कोसकर संतोष कर लेते हैं। कामयाबी पर तो हर व्यक्ति का दावा होता है। असफलता किस्मत से जोड़ दी जाती है।
फिर क्या लक जैसी कोई चीज होती है?
जो यकीन करते हैं, उनके लिए होगी। मैं नहीं मानता कि भाग्य से मेरे करियर में कोई बदलाव आएगा। उसके लिए मुझे मेहनत करनी ही होगी।
आपने दीवाली पर ताश खेला होगा या फिर कैसिनो में दांव लगाए होंगे? कितने लकी रहे आप?
अगर जीतने से लक को जोड़ेंगे, तो मैं अनलकी हूं। वैसे भी मुझे ताश और कैसिनो आदि का शौक नहीं है। मैं दांव नहीं लगाता। मैंने कभी लाटरी का टिकट भी नहीं खरीदा है।
आप एक साल से स्टार हैं। इस एक साल में क्या बदला है आपके लिए?
ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन फर्क मेरे जीवन में भी आया है। मेरे पास एक बड़ी और महंगी गाड़ी आ गई है। मेरा बैंक बैलेंस बढ़ गया है। मैं पहले की तरह ही कम खर्च करता हूं। मेरे वही दोस्त हैं। मैं उनके साथ ही समय बिताता हूं।
आप पहले से अधिक मैच्योर हो गए हैं। बात करने की कला आ गई है और प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब देने में स्मार्ट हो गए हैं?
थैंक्स.., अगर पिछले प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात कर रहे हैं, तो उसकी जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई थी। संजय दत्त किसी वजह से नहीं आ सके। अंतिम समय में उनका आना कैंसल हुआ, तो मुझ पर बोझ डाल दिया गया। मैंने कोशिश की कि प्रेस कॉन्फ्रेंस अच्छा और लाइव रहे। थैंक्स कि सब ठीक से हो गया।
क्या आप को नहीं लगता कि आमिर खान की वजह से आप आसानी से स्टार बन गए?
मैं आपसे थोड़ा सहमत और थोड़ा असहमत हूं। मामू से मुझे मदद मिली, लेकिन लोगों ने इमरान खान को स्वीकार किया। भारतीय परंपरा में हम परिवार के सदस्यों को.., उनकी विरासत को स्वीकार करते हैं। फिल्मों के मशहूर परिवारों को देख लें। राजनीति और इंडस्ट्री में भी ऐसा ही है। आरंभिक स्वीकृति मिल सकती है, लेकिन उसके बाद परफॉर्म करना होता है। अगर मेरी फिल्में लगातार फ्लॉप हों और काम भी लोगों को पसंद न आए, तो मुझे कोई भी नहीं बचा सकता।
क्या ऐसा इसलिए है कि हमारा समाज अभी तक सामंती मूल्यों में विश्वास करता है और हम अ‌र्द्ध शिक्षित हैं?
यह एक वजह हो सकती है, लेकिन परिवारों के प्रति हमारा भरोसा जागता है। पूंजीवादी समाज में विचार और राजनीति मूल्यों से लगाव रहता है। हम भारत में वंश, परिवार और विरासत पर जोर देते हैं।
लक की हीरोइन श्रुति हासन के बारे में बताएंगे?
वह मेरी बचपन की दोस्त है। हमलोग स्कूल में एक-दूसरे की मदद करते थे। एक-दूसरे के सहारे परिवार में झूठ बोलकर बच निकलते थे। श्रुति बेहद प्रतिभाशाली ऐक्ट्रेस और सिंगर हैं। उनकी गायन प्रतिभा से में पहले से परिचित हूं। एक्टिंग वे पहली बार कर रही हैं। उनमें कलाकार जैसा आत्मविश्वास है। नए कलाकार के लिए यह फिल्म उतनी आसान नहीं कही जाएगी। उन्होंने पूरे दिल से अपना काम किया है।
डैनी और संजय दत्त जैसे सीनियर कलाकारों के साथ काम करते समय थोड़ा सावधान रहना पड़ा होगा?
संजय दत्त के साथ तो काम कर चुका हूं। डैनी साहब के साथ पहली बार काम किया है। मैं उनका फैन हो गया। उनका व्यक्तित्व बहुत शानदार है। वे सेट पर एकदम सहज रहते हैं। उनके अनुभव और साथ से मैंने बहुत कुछ सीखा।
..और सोहम शाह?
सोहम तो मेरे हमउम्र हैं साथ हैं। उन्होंने जब इस फिल्म के बारे में विस्तार से बताया था, तब मैं सोच में पड़ गया था कि क्या वे यह सब सही-सही कर पाएंगे? फिल्म का तकनीकी पक्ष बहुत स्ट्रॉन्ग है। यह फिल्म किसी विदेशी फिल्म की नकल नहीं है।

Tuesday, July 8, 2008

जाने तू.. देखकर सभी को मजा आएगा: अब्बास टायरवाला

अब्बास टायरवाला ने निर्देशन से पहले फिल्मों के लिए गीत और स्क्रिप्ट लिखे। लगातार लेखन के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब उन्हें न ही कुछ सूझ रहा था और न कुछ नया लिखने की प्रेरणा ही मिल पा रही थी! इसी दौर में उन्होंने निर्देशन में उतरने का फैसला किया और अपनी भावनाओं को जानू तू या जाने ना का रूप दिया। यह फिल्म चार जुलाई को रिलीज हो रही है। बातचीत अब्बास टायरवाला से..
जाने तू या जाने ना नाम सुनते ही एक गीत की याद आती है। क्या उस गीत से प्रेरित है यह फिल्म?
बिल्कुल है। यह मेरा प्रिय गीत है। गौर करें, तो पाएंगे कि इतने साल बाद भी इस गीत का आकर्षण कम नहीं हुआ है। पुराने गीतों की बात ही निराली है। इन दिनों एक फैशन भी चला है। नई फिल्मों के शीर्षक के लिए किसी पुराने गीत के बोल उठा लेते हैं। फिल्म की थीम के बारे में जब मुझे पता चला कि प्यार है, तो इसके लिए मुझे जाने तू या जाने ना बोल अच्छे लगे। इस गीत में खुशी का अहसास है, क्योंकि यह लोगों को उत्साह देता है। मैंने इसी तरह की फिल्म बनाने की कोशिश की है। कोशिश है कि फिल्म लोगों को खुशी दे।
जाने तू या जाने ना के किरदार इसी दुनिया के हैं या आजकल की फिल्मों की तरह उनकी अपनी एक काल्पनिक दुनिया है?
इस फिल्म में लंबे समय बाद हमें इस दुनिया के किरदार देखने को मिलेंगे। वैसे हिंदी फिल्मों में हमारे किरदार वास्तविक नहीं होते। ऐसा लगता है कि या तो हमें वास्तविक दुनिया को भूलने के लिए मजबूर किया गया है, या हम खुद ही उसे भूल जाना चाहते हैं। इसकी वजह यह भी है कि हमें बैंकॉक में मुंबई दिखाना है, लंदन के किसी कॉलेज में जेवियर कॉलेज दिखाना है और हमें ऑस्ट्रेलिया के किसी सड़क को भारत की सड़क बताना है। कहीं न कहीं, यह सोच बैठ गई है कि हमारे शहर और हमारा देश इतना खूबसूरत नहीं है। अमूमन हम अपने शहर को घिनौने या बदसूरत रूप में ही दिखाते हैं। हम गली-कूचों में तभी जाते हैं, जब अंडरव‌र्ल्ड दिखाना होता है। इन कथित खामियों और कमियों के बावजूद इस देश का एक रंग है। मुंबई हमें फिल्मों में नहीं दिखती। मुंबई के समंदर का रंग नीला नहीं है। धूसर, भूरा और गंदा रंग है, लेकिन उसके सामने बैठ कर जो मोहब्बत करते हैं, उन्हें वह बहुत ही रोमांटिक लगता है। मैं चाहता था कि अपने शहर को ही दिखाऊं। इस शहर के रंग, भाषा, माहौल और आशिकी को मैंने पकड़ने और दिखाने की कोशिश की है। फिल्म का हर किरदार मेरी याद, मेरे दोस्तों और मेरे किसी दौर से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही यह परियों की कहानी की तरह है और इसीलिए प्यार, मोहब्बत, अहसास और झगड़े भी हैं इसमें।
प्यार-मोहब्बत और अहसास तो हम हर फिल्म में देखते हैं। इस फिल्म में यह किस तरह अलग है?
लोगों ने अवश्य देखी होगी ऐसी फिल्में, लेकिन उन्होंने इस शहर में इस जिंदगी की और हम लोगों की कहानी नहीं देखी होगी। लोगों ने बॉलीवुड की अलग मायानगरी देखी है। जाने.. की मुस्कुराहट और खुशी लोगों को अपनी लगेगी। उन्हें अपनी भाषा में आसपास की कहानी दिखेगी। लव स्टोरी के साथ इसमें कई मसाले भी होंगे।
ऐसा क्यों हो रहा है कि सारे लेखक एक समय के बाद निर्देशक हो जाते हैं और सारे युवा निर्देशक अपनी फिल्में खुद लिखते हैं? पहले तो ऐसा नहीं था?
पहले का दौर अलग था। तब काम का बंटवारा था। आज के दौर में फिल्मों की मांग बढ़ गई है और एक सच यह भी है कि कॉरपोरेट प्रभाव बढ़ने के कारण फिल्म बनाने के अधिक मौके भी अब ज्यादा मिलने लगे हैं। आपके पास कोई नया आइडिया हो, तो आप निर्देशक बन सकते हैं। निर्देशक बनने में कम जोखिम है। मैं कहना चाहूंगा कि ज्यादातर निर्देशकों को फिल्में नहीं मिलनी चाहिए। अपने छोटे से करियर में मुझे लगा कि मैं दूसरों से बुरी फिल्म नहीं बनाऊंगा। लेखक होने के कारण यह आत्मविश्वास है। इसके साथ ही मेरे मां-पिता ने सिखाया कि अगर एक काम कोई और कर सकता है, तो मैं भी मेहनत कर उस काम को उसी स्तर का या उस से बढि़या कर सकता हूं। देखना है कि यह बात सही उतरती है या मैं मुंह की खाऊंगा..!
स्क्रिप्ट लिखते समय कोई ऐक्टर ध्यान में था क्या?
मैंने कभी ऐक्टर की इमेज को लेकर फिल्म नहीं लिखी। शाहरुख खान की दोनों फिल्में अशोका और मैं हूं ना उदाहरण हैं। इस फिल्म के लेखन के समय तो इमरान खान कहीं थे ही नहीं! मैं किसी स्टार को ध्यान में रख कर फिल्म कभी नहीं लिखूंगा। मेरे लिए यह नामुमकिन है।
क्या यह मालूम था कि फिल्म का अदिति.. गीत इतना पॉपुलर हो जाएगा?
ए.आर. रहमान ने जब यह धुन पहली बार सुनाई थी, तभी मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि यह गीत पॉपुलर होगा। वैसे यूनिट के लोगों को लगता था कि पप्पू.. ज्यादा हिट होगा। तब मैं सभी से यही कहता था कि अदिति.. सभी की जुबान पर चढ़ जाएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें नई बात सरल तरीके और मधुर धुन के साथ कही गई है। जब प्रोमो बने, तब भी सबकी राय यही थी कि पप्पू.. का प्रोमो पहले चलाना चाहिए। मैं चाहता था कि अदिति.. ही पहले चले। मैंने आमिर खान से भी कहा। उन्होंने कहा कि अगर निर्देशक होने के नाते आपको यह गीत पहले चलाना है, तो हम इसे ही पहले चलाएंगे।
जाने तू.. यूथफुल लग रही है?
प्रोमोशन देख कर ऐसा लग सकता है। मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि यह फिल्म यूथ के बारे में जरूर है, लेकिन सभी के देखने लायक है। यह मेरा दर्शकों से वादा है कि इसे देखने के बाद कोई नहीं कह सकता कि हमें मजा नहीं आया। बहुत सारे भाव, रस, किरदार और बातें हैं, जो हर उम्र के दर्शकों को लुभाएंगे।
लेखक और गीतकार होने के कारण निर्देशक अब्बास को कितनी मदद मिली?
चूंकि सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी, इसीलिए मुझे बहुत खुशी मिली। मैं यहां बताना चाहूंगा कि मुझसे पहले केवल गुलजार साहब ने ही अपनी फिल्मों के गीत, स्क्रिप्ट और कहानी लिखे हैं।
दर्शक क्यों जाएं आपकी फिल्म देखने?
मैंने सच्चाई से फिल्म बनाई है। इसमें उमंग, भावना, दोस्ती और प्यार की यात्रा है। इस यात्रा में लोगों को पूरा आनंद आएगा। यह फिल्म किसी को बुरी नहीं लगेगी। यह या तो लोगों को पसंद आएगी या बहुत पसंद आएगी। यह मेरा आत्मविश्वास है। मैं अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर लोगों को फिल्म देखने के लिए आमंत्रित करता हूं। लोग दोस्त और परिवार के साथ इसे देखें। मेरी बात का यकीन करें कि उनका शुक्रवार बर्बाद नहीं होगा।

Sunday, July 6, 2008

हरमन बवेजा बनाम इमरान खान

पिछली चार जुलाई को हरनाम बवेजा ने 'लव स्टोरी २०५०' और इमरान खान ने 'जाने तू या जाने ना' से अपनी मौजूदगी दर्शकों के बीच दर्ज की.अभी से यह भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा कि दोनों में कौन आगे जायेगा ?पहली फ़िल्म के आधार पर बात करें तो इमरान की फ़िल्म'जाने तू...'की कामयाबी सुनिशिचित हो गई है.'लव स्टोरी...' के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती.हालाँकि चार जुलाई के पहले हरमन की फ़िल्म की ज्यादा चर्चा थी और इमरान की फ़िल्म छोटी मानी जा रही थी.वैसे भी हरमन की फ़िल्म ५० करोड़ में बनी है,जबकि इमरान की फ़िल्म की लगत महज १० करोड़ है।
चवन्नी को इसका अंदेशा था.सबूत है इसी ब्लॉग पर किया गया जनमत संग्रह.चवन्नी ने पूछा था की पहले किसकी फ़िल्म देखेंगे? २५ लोगों ने इस जनमत संग्रह में भाग लिया था,जिनमें से १७ ने इमरान की फ़िल्म पहले देखने की राय दी थी,बाकी ८ ने हरमन के पक्ष में मत दिए.चवन्नी को तभी समझ जाना चाहिए था कि दोनों फिल्मों के क्या नतीजे आने जा रहे हैं.चवन्नी ने एक पोस्ट के बारे में सोचा भी था।
हरमन और इमरान को मीडिया आमने-सामने पेश कर रहा है.मुमकिन है कि कुछ दिनों के अन्दर इस तरह के आलेख भी आने लगें कि इमरान ने हरमन को पछाड़ा.कोई शक नहीं कि 'जाने तू...' अच्छी चल रही है और उसकी तुलना में 'लव स्टोरी...' पिछड़ती जा रही है,किंतु सिर्फ़ इस आधार पर इमरान की जीत घोषित कर देना अनुचित होगा.अभी इश्क के इम्तेहान और भी हैं...इमरान की परीक्षा अगली फ़िल्म में होगी.हरमन को भी मौका मिलेगा कि वे अगली फ़िल्म में इस फ़िल्म की भरपाई कर सकें.उनकी अगली फ़िल्म अनीस बज्मी के साथ है,जो कामयाब फिल्मों के पर्याय बन गए हैं.इमरान कि अगली फ़िल्म संजय गडवी के साथ है,जिन्होंने धूम फिल्में बनाई थीं.हाँ कह सकते हैं कि पहले राउंड में इमरान आगे निकल गए हैं।
अगर दोनों के अभिनय क्षमता पर ध्यान देन तो ज्यादा अन्तर नहीं है.हरमन कुछ मामलों में आगे हैं.हिन्दी फिल्मों के अभिनेता के लिए आवश्यक नाच,गाना और मारधाड़ के लिए वे उपयुक्त हैं.उनके चेहरे में आकर्षण है,जो फिलहाल रितिक रोशन के नक़ल माना जा रहा है.जल्दी ही उनकी अपनी पहचान बन जायेगी.दूसरी तरफ़ इमरान का आम चेहरा उन्हें सहज और साधारण किरदारों के लिए अनुकूल ठहराता है.एक्शन दृश्यों में इमरान कैसे लगेंगे,कहना मुश्किल है।
आब आप कि बरी है.आप बताएं कि आप को कौन ज्यादा पॉपुलर होता दिख रहा है?

Friday, July 4, 2008

फ़िल्म समीक्षा:जाने तू या जाने ना

कुछ नया नहीं, फिर भी नॉवल्टी है
-अजय ब्रह्मात्मज
रियलिस्टिक अंदाज में बनी एंटरटेनिंग फिल्म है जाने तू या जाने ना। एक ऐसी प्रेम कहानी जो हमारे गली-मोहल्लों और बिल्डिंगों में आए दिन सुनाई पड़ती है।
जाने तू... की संरचना देखें। इस फिल्म से एक भी किरदार को आप खिसका नहीं सकते। कहानी का ऐसा पुष्ट ताना-बाना है कि एक सूत भी इधर से उधर नहीं किया जा सकता। सबसे पहले अब्बास टायरवाला लेखक के तौर पर बधाई के पात्र हैं। एयरपोर्ट पर ग्रुप के सबसे प्रिय दोस्तों की अगवानी के लिए आए चंद दोस्त एक दोस्त की नई गर्लफ्रेंड को प्रभावित करने के लिए उनकी (जय और अदिति) कहानी सुनाना आरंभ करते हैं। शुरू में प्रेम कहानी के नाम पर मुंह बिचका रही माला फिल्म के अंत में जय और अदिति से यों मिलती है, जैसे वह उन्हें सालों से जानती है। दर्शकों की स्थिति माला जैसी ही है। शुरू में आशंका होती है कि पता नहीं क्या फिल्म होगी और अंत में हम सभी फिल्म के किरदारों के दोस्त बन जाते हैं।
माना जाता है कि हिंदी फिल्में लार्जर दैन लाइफ होती हैं, लेकिन जाने तू.. देख कर कहा जा सकता है कि निर्देशक समझदार और संवेदनशील हो तो फिल्म सिमलर टू लाइफ हो सकती है। जाने तू... में विशेष नयापन नहीं है, हिंदी फिल्मों की प्रचलित धारणाओं, दृश्यों, प्रसंगों और संवादों का उपयोग किया गया है। अव्यक्त प्रेम को दर्शाती चरित्रों की व्याकुल मनोदशा में कोई नवीनता नहीं है। यह अब्बास टायरवाला के कुशल लेखन और निर्देशन की सफलता है कि घिसे-पिटे फार्मूले की फिल्म में उन्होंने नॉवल्टी पैदा कर दी है। किरदार पुराने हैं, चेहरे नए हैं। भाव पुराने हैं, अभिव्यक्ति और प्रतिक्रियाएं नई हैं। द्वंद्व और संघर्ष घिसा-पिटा है, लेकिन उनका संकलन और निष्पादन नवीन है। गीतों का मर्म प्राचीन है, शब्द नए हैं। यहां तक कि ए.आर. रहमान के संगीत की मधुरता पुरानी है, लेकिन ध्वनियां नई हैं। जाने तू... की यही ताजगी उसकी खूबी बन गयी है।
एक नवीनता गौरतलब है। फिल्म में तीन मां-पिता हैं और तीनों विभिन्न पृष्ठभूमि और परिस्थिति के दांपत्य का चित्रण करते हैं। फिल्म के हीरो और उसकी मां के अंतर्सबंध का ऐसा चित्रण हिंदी फिल्मों में नहीं मिलता। 21वीं सदी की आधुनिक मां की भूमिका में रत्ना पाठक शाह का व्यक्तित्व आकर्षित करता है। शायद यह हिंदी फिल्मों की पहली मां है, जिन्होंने साड़ी नहीं पहनी है। नायिका का संवेदनशील चित्रकार भाई... ऐसे किरदार फार्मूला फिल्मों में गैरजरूरी माने जाते हैं।
इमरान खान अभी कैमरे के आगे सधे नहीं हैं। कुछ दृश्यों में उनका प्रयास दिख जाता है। फिर भी उनकी नेचुरल एक्टिंग अच्छी लगती है। जीनिलिया का सहज और स्वाभाविक अभिनय अदिति के चरित्र को अच्छी तरह पर्दे पर जीवंत करता है। प्रतीक बब्बर प्रभावित करते हैं। छोटे-मोटे किरदारों में आए कलाकार खटकते नहीं हैं। सभी का सराहनीय योगदान है।

Thursday, July 3, 2008

इमरान खान से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

रियलिस्टिक और नैचुरल है जाने तू ....- इमरान खान

क्या आप पहली रिलीज के लिए तैयार हैं?
मुझे नहीं लगता कि ऐसे तैयार होना आसान है, हम ये नहीं सोचते हैं कि आगे जाकर क्या होगा। हमने कोशिश की है कि अच्छी फिल्म बन सके, मैंने ईमानदारी से काम किया है ....आगे क्या होगा किसी को पता नहीं।
लेकिन कुछ तो तैयारी रही होगी। बाहर इतना कम्पिटीशन है। आप पहुंचेंगे, बहुत सारे लोग पहले से ही मैदान में खड़े हैं?
कम्पिटीशन के बारे में आपको सोचना नहीं चाहिए। आपको अपना काम करना है। अगर मैं बैठ कर सोचूंगा कि बाकी एक्टर क्या कर रहे हैं, कैसी फिल्में कर रहे हैं। ये कॉमेडी फिल्म कर रहा है, ये रोमांटिक फिल्म कर रहा है तो मैं अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाऊंगा। मुझे अपना काम करना है, मुझे अपना काम देखना है। मुझे सोचना है कि मुझे कैसी फिल्में अच्छी लगती हैं। मुझे कैसी स्क्रिप्ट पसंद हैं। और ये काम मैं कितने अच्छे तरीके से कर सकता हूं। कभी किसी को देख जलना नहीं चाहिए, इंस्पायर होना चाहिए। किसी और को देखकर अपना काम नहीं करना चाहिए। मेरे खयाल में कम्पिटीशन के बारे में सोचना नहीं चाहिए।
कैसे फैसला लिया कि जाने तू या जाने ना ही करनी है पहले?
यही फिल्म आई मेरे पास। मुझे एक्टर नहीं बनना था। मुझे रायटर-डायरेक्टर बनना था। मैं फिल्म स्कूल भी गया था। मैंने ट्रेनिंग ली है। मैंने सोचा था कि मैं वापस आकर डायरेक्टर बनूंगा। मैंने रायटिंग और डायरेक्शन का कोर्स किया था। मैंने सोचा था कि मैं यहां आकर डायरेक्टर बनूंगा। रायटर बनूंगा। और मैं यही काम कर रहा था। मैंने एकाध स्क्रिप्ट लिखी थी। मैं लोगों से मिल रहा था। टेलीविजन में भी कोशिश कर रहा था कि शायद कोई टेलीविजन शो में रायटर-डायरेक्टर बनूं। असिस्टेंट बन जाऊं या ऐसा कुछ करूं। बीच में अचानक से मेरी मुलाकात अब्बास टायरवाला से हुई। मुझे वे बहुत पसंद आए। उन्होंने मुझे जाने तू या जाने ना की कहानी सुनाई। मुझे कहानी बहुत पसंद आई। और अब्बास ने कहा कि मैं इस कहानी के लिए बिल्कुल सही हूं। उन्होंने कहा कि पहली मुलाकात से मुझे लग गया था कि यू आर द राइट पर्सन ़ ़ मुझे भी कहानी बहुत अच्छी लगी। मैंने इतना सोचा भी नहीं कि मैं ऐसे लांच हो जाऊंगा, मैं हीरो बनूंगा। मैं ये करूंगा। मैं वो करूंगा। मुझे लगा कि एक फिल्म आई है, मुझे फिल्म पसंद है तो मैं कर लेता हूं। आगे जाकर अगर कोई फिल्में ना मिले तो भी ठीक है।
फिल्म के लिए आपको अब्बास ने राजी किया या आपको इस फिल्म में क्या बात अच्छी लगी, जिसकी वजह से आपने तुरंत हां कह दिया?
बहुत यूथफूल कहानी है। बहुत ईमानदार फिल्म है। मैंने ऐसी बहुत फिल्में देखी हैं, जहां रायटर, डायरेक्टर और एक्टर ने कोशिश की कि वे आज के यूथ को दिखाएं कि आजकल के नौजवान कैसे हैं। उनमें से ज्यादातर ठीक से दिखा नहीं पाए। शायद वे ठीक से समझ नहीं पाए कि आज की यूथ कैसी है, उनकी सोच कैसी है, उनकी लाइफ कैसी है। अब्बास खुद बहुत यंग हैं। मुझे लगा कि फिल्म में जो इमोशन हैं, जो सिचुएशन हैं, जो कैरेक्टर हैं, वे सब रियल है। मैं तुरंत इस कहानी से जुड़ गया। मुझे लगा कि कोई ऐसी फिल्म बना रहा है, जो पॉपुलर कमर्शियल हिंदी फिल्म है, लेकिन इतनी रियलिस्टक भी है। मुझे लगा किमुझे इसका हिस्सा होना पड़ेगा। आय वांट टू।
जैसे आप बता रहे थे कि आप डायरेक्टर बनना चाहते थे और उसकी ट्रेनिंग भी ली थी आपने और जब ये एक्टिंग का ऑफर आया तो आपने हां कर दी। आपने क्यों सोचा कि चलो एक्टिंग कर लेते हैं?
क्योंकि मुझे एक्टिंग का भी बहुत शौक है। मुझे फिल्मों का बहुत शौक है। चाहे वो रायटिंग हो या डायरेक्शन या कैमरा वर्क ....एडीटिंग भी मुझे बहुत पसंद है। मुझे गानों का बहुत शौक है। म्यूजिक बहुत सुनता हूं।
आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां हुई है?
मेरी स्कूलिंग काफी जगहों पर हुई है। पहले मुंबई में हुई थी। मैं बॉम्बे स्कॉट्सि में था फोर्थ स्टैंडर्ड तक। उसके बाद मैं ऊटी चला गया। मैं ऊटी में बोर्डिग स्कूल में था आठवीं कक्षा तक। 9वीं और 10वीं में मैं बंगलूर में था। उसके बाद 11वीं और 12वीं मैंने अमेरिका में की। उसके बाद फिल्म स्कूल गया।
फिल्म स्कूल जाने का इरादा क्यों? आपने फिल्म स्कूल ही क्यों चुना?
मैं फिल्मों में काम करना चाहता था। मुझे फिल्मों का बहुत शौक था। मैंने थोड़ा-बहुत सोचा कि कुछ और करूं। कुछ पसंद नहीं आया। जब पंद्रह-सोलह साल का था, मुझे मालूम था कि मुझे फिल्मों में कुछ करना है। वो क्या है, ठीक से मुझे मालूम नहीं था। सोचते-सोचते मैं डायरेक्शन पर आ गया। मैं बचपन से लिखता रहा हूं। मैं छोटी-मोटी फिल्में भी बनाता था। मुझे मालूम था कि मुझे डायरेक्शन का शौक है, रायटिंग का शौक है। उस समय के एक्टरों को देख कर मुझे नहीं लगता था कि मैं ये कर सकता हूं। मैं अपने आप को उस स्टाइल में नहीं देख पाता था। मैंने सोचा नहीं था कि मैं एक्टर बनूंगा। जब ये स्क्रिप्ट आई, इसमें जो हीरो का कैरेक्टर है, वो एक सीधा-सादा नार्मल लड़का है। उसकी बॉडी नहीं है, वो डांस नहीं कर सकता। वो फाइट नहीं करता। सीधे शब्दों में कहें तो ब्वॉय नेक्स्ट डोर है। इसलिए मुझे लगा कि मैं कर सकता हूं। यह रियलिस्टिक और नेचुरल कैरेक्टर है, इसे मैं निभा सकता हूं।
आपको पहली बार यह कब एहसास हुआ कि आप फिल्म फैमिली से हैं और आपकी फैमिली के लोग एक्टर हैं, डायरेक्टर या नाना जी हैं वो फिल्म वाले हैं।
मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया, क्योंकि हमारी फैमिली फिल्मी नहीं है। मतलब हम फिल्मी पार्टियों में नहीं जाते थे। मैं कभी दूसरे एक्टर, डायरेक्टर या प्रोडयूसर के बच्चों के साथ नहीं खेलता था। कभी उनसे मिला भी नहीं हूं। मेरे जो स्कूल के दोस्त थे, मैं उनके साथ खेलता था। हमारी जो फैमिली फ्रेंड हैं वो फिल्मों में काम नहीं करते हैं। मुझे मालूम था कि मेरी फैमिली के लोग फिल्मों में काम करते हैं। क्योंकि मैं सेट पर जा चुका था, एडीटिंग, शूटिंग देख चुका था, लेकिन वो जो फिल्मी-फिल्मी जिसको कहते हैं, वो मैंने कभी देखा नहीं था। और आज तक मैंने नहीं देखा है। हमारी सोच ऐसी नहीं है।
पहली बार कब किसी सेट पर गए थे आप?
जब मैं तीन-चार साल का था। कयामत से कयामत तक की शूटिंग पर गया था। मैंने उसमें एक छोटा रोल भी किया था। मैंने आमिर मामू का बचपन का रोल किया। उसमें शायद एक-दो शॉटस हैं। जो जीता वही सिकंदर में थोड़ा बड़ा रोल है। फिर से आमिर मामू का बचपन। उसके लिए मैंने शायद पांच-छह दिनों की शूटिंग की थी। बचपन से मैं सेट पर जाता रहा हूं, लेकिन मैंने हमेशा उसे ऐसे देखा कि ये काम है। ये नहीं कि ये कुछ ग्लैमरस है या यहां स्टार हैं। मुझे बस ये नजर आया कि ये काम है। लोग सबेरे उठते हैं, नहा कर काम पर जाते हैं, वो शॉट डायरेक्ट करते हैं, कोई एक्टिंग कर रहा है, कोई कैमरा चला रहा है। कोई अपना शॉट देख रहा है, काम कर के शाम को वापस घर लौट आते हैं। हम भी ऐसे ही काम करते हैं।
इस फिल्म के बारे में और कुछ बताएं। एक्टर बनने की क्या चुनौतियां हैं। उनके लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?
हमने काफी तैयारी की है। अब्बास हमेशा चाहते थे कि कैरेक्टर बहुत नैचुरल लगे और हर कैरेक्टर के बीच की रिलेशनशिप असली लगे। फिल्म देखते समय लोग ऐसा न लगे कि हीरो के दोस्त और हीरोइन की सहेलियां हैं। लोगों को लगना चाहिए कि ये छह-सात लड़के-लड़कियां हैं। ये दोस्त हैं। हमने वर्कशॉप किए। हम लोग सात-आठ दिनों के लिए पंचगनी गए थे। हमने स्क्रिप्ट रीडिंग की। हमने डांस प्रैक्टिस किया। एक्टिंग केलिए भी वर्कशॉप किया अब्बास के साथ। अब्बास ने जोर दिया कि हम खुद कुछ सोचें कैरेक्टर के बारे में। हम खुद कैरेक्टर को डेवलप करें। वो कहते थे कि सीन कैसे करेंगे आप? आप बैठे रहेंगे, खड़े रहेंगे, आप क्या करेंगे। आप सोचो। उन्होंने हमें कभी डायरेक्शन नहीं दिया। बहुत आजादी दी कि आपको जैसे करना है, आपको जो सही लगे, आप वैसे करें और आपको जो नेचुरल लगे। उन्होंने कहा कि मुझे एक्टिंग-एक्टिंग बिल्कुल नहीं दिखनी है। एकदम रियलिस्टिक होना चाहिए। हमारी सोच है कि हिंदी फिल्मों के हीरो को हीरो होना चाहिए। ये जो कैरेक्टर है, ये हीरो हीरो नहीं लग रहा है। इतना सीधा-सादा नार्मल सा लड़का है। मेरा सोच थी कि मुझे अच्छे कपड़े पहनने चाहिए, मेरा अच्छा हेयर स्टाइल होना चाहिए। अब्बास उन सभी बातों के लिए मना कर रहे थे। शुरूआत में मुझे थोड़ा अजीब लगा कि शायद डायरेक्टर पागल हो गया है।
लेकिन इमरान और फिल्म के किरदार जय सिंह राठौड़ में फर्क तो रहा होगा?
जय सिंह राठौड़ का कैरेक्टर बिल्कुल मेरे जैसा है। मुझे लगा कि अब्बास ने मुझे देखकर ये कैरेक्टर बनाया है। जय के कुछ प्रिंसिपल है, वह गांधीवादी है। वह बहुत शांत है। अहिंसा में यकीन करता है। कम बात करता है, ज्यादा सोचता है और मैं भी ऐसे ही हूं।
लेकिन पर्दे पर उसे उतारने में दिक्कत तो हुई होगी?
नहीं, कोई दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि वर्कशॉप के वजह से बहुत फायदा हुआ। दूसरा ये है कि उसकी पर्सनैलिटी से मेरी पर्सनैलिटी मिलती है। मैं उसे बहुत आसानी से समझ सकता था।
अच्छी बात है कि आपकी तरफ से कोई घबराहट जैसी चीज दिख नहीं रही है। फिर भी आप से उम्मीदें हैं और उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए आप कितने चिंतित हैं? दबाव तो महसूस कर रहे होंगे।
मैं ज्यादा सोचता नहीं हूं उसके बारे में। मुझे लगता है कि अगर आप इसके बारे में सोचेंगे तो आप इतना घबरा जाएंगे, इतना डर जाएंगे कि कुछ कर नहीं पाएंगे। मैं यह सोचता हूं कि मेरे सामने क्या काम है? आज मुझे क्या करना है? आज मुझे सेट पर जाकर तीन सीन पूरे करने हैं तो मेरी चिंता यह होगी कि मैं कितने अच्छे तरीकेसे उसे कर लूं। ईमानदारी से अपना काम करूं। अगर मेरा काम अच्छा नहीं लगे तो उसमें मैं कुछ कर नहीं सकता हूं। अगर मैं ये बैठकर सोचूं कि लोगों की ये उम्मीदें हैं तो मैं डर के मारे कुछ नहीं कर पाऊंगा।
कभी ऐसा हुआ कि अचानक रात में या कभी परेशान होकर आपने कहा कि मामू आप मुझे बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए या अब्बास बताओ कि मुझे क्या करना है?
मैं मामू से काफी बार पूछ चुका हूं कि कभी-कभी मुझे लगा कि यह ठीक से नहीं जा रहा है। कुछ प्रोब्लम्स हैं। मुझ में यह कमी है। मैं यह ठीकसे नहीं कर पा रहा हूं या फिल्म में यह प्रोब्लम है। आमिर मामू ने मुझे समझाया ़ ़ ़ मेरा एक्सपीरियेंश कम हैं। जो वे देख सकते हैं, वो मैं नहीं देख सकता हूं। जब मुझे लग रहा है कि यह प्रोब्लम है। आमिर मामू कहते थे कि आप पूरी फिल्म को देखो। मैं एक छोटे से प्रोब्लम को लेकर फंस गया था कि इस सीन में मेरा कॉस्टयूम खराब है। आमिर मामू ने कहा कि पूरी फिल्म को देखो। फिल्म यहां शुरू होती है और आप अंत में अगर ऐसा कॉस्टयूम पहन रहे हैं या कोई दूसरा कास्टयूम पहन रहे है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर लोगों को फिल्म यहां तक पसंद आएगी, तो एक कमीज की वजह से लोग नाराज नहीं हो जाएंगे। उनको यह नहीं लगेगा कि फिल्म बकवास है। अगर लोगों को फिल्म यहां तक पसंद नहीं आई तो आपके शर्ट को देख कर इम्प्रेस नहीं हो जाएंगे। अगर उनको इम्प्रेस होना है, तो वो पूरी फिल्म से इम्प्रेस हो जाएंगे। ये उनका एक्सपीरियेंश है।
और क्या टिप्स दिए हैं आमिर ने आपको।
टिप्स काफी कम दिए हैं उन्होंने।
वो परफेक्शनिस्ट हैं तो कुछ न कुछ असर डाला होगा उन्होंने। देखो भाई काम जो होना चाहिए, वह बेहतर होना चाहिए। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। दबाव बन जाता है। सही स्थिति क्या है?
सही सिचुएशन यह है कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर पिक्चर बनाई है। उन्होंने अब्बास से बहुत सवाल किए कि आप फिल्म कैसे बनाएंगे, क्या करना है? उन्होंने मुझ से भी अनेक सवाल किए। मुझे उनके लिए दुबारा ऑडिशन देना पड़ा। पहले मैंने ऑडिशन दिया था और अब्बास ने मुझे चुन लिया था। आमिर मामू को चेक करना था कि वाकई मैं काम कर पाऊंगा या नहीं। ये नहीं कि उन्होंने मुझे बस ऐसे ले लिया। उन्होंने काफी जोर दिया कि.... जब मैं काम कर रहा हूं तो मुझे अपने काम पर पूरा ध्यान देना है। दस-पंद्रह दिनों की शूटिंग के बाद मैं अब्बास केसाथ बदतमीजी कर रहा था। हम बहुत सारे यंग एक्टर थे। सब 20-21 साल के थे तो हम थोड़ी मस्ती कर रहे थे। एक दिन आमिर मामू ने मुझे पकड़ कर कहा कि, देखो इमरान जब तुम काम कर हो तो आपको सिर्फ काम का सोचना है। आपको अपने डायरेक्टर को पूरा सपोर्ट देना है। क्योंकि वह अपनी फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा है। और बहुत बार होता है फिल्म इंडस्ट्री में कि डायरेक्टर को कोई सपोर्ट नहीं देता। स्टार उनको डेट नहीं देते हैं। प्रोडयूसर उनको कह रहा है कि पैसे कम खर्च करो, विदेश मत जाओ, यहीं शूट करो। आप सपोर्ट नहीं करेंगे तो उसे जिस तरीके से फिल्म बनानी चाहिए,वह फिल्म नहीं बना पाएगा। आपको हमेशा वहां रहना चाहिए। उनको कभी मत कहो कि छह बज गए मुझे घर जाना है। मुझे भूख लगी है, मुझे ये है, मुझे वो है ़ ़ ़ भूख तो उसे भी लगी है न? लेकिन वह फिल्म बना रहा है। आप भी फिल्म बनाने आए हैं। आपको सपोर्ट देना है। यह मत कहो कि कल रात को मैं सोया नहीं। डायरेक्टर भी नहीं सोया होगा। वह सेट पर शायद आप से पहले आया होगा। और आपके पैकअप के बाद भी वह यहां रहेंगा और कल के शूट प्लानिंग करेगा। उसके बाद मेरी समझ में आया कि आमिर मामू काम कैसे करते हैं और वे इस वजह और इस पोजिशन पर आज ऐसे ही नहीं पहुंचेहैं।
अब्बास की तरफ से क्या सावधानियां या टिप्स आपको दी गई?
अब्बास नए डायरेक्टर हैं। उन्होंने मुझे कोई टिप्स नहीं दिया। हमने जो कुछ भी काम किया, सब मिलकर किया। अब्बास और मैं आज भाई जैसे बन चुके हैं। हम दोनों ने इतनी तैयारी की है, कास्टिंग, लोकेशन, कास्टयूम .... जो कुछ भी है, मैंने अब्बास का साथ दिया। जो कुछ भी हम कर रहे थे, हमदोनों ने बैठकर, मिलकर सोचा। इसको कैसे करें? क्या करें? इस कैरेक्टर .... सिर्फ मेरा कैरेक्टर नहीं, बाकी कैरेक्टर उनकी कास्टिंग, कॉस्टयूम .... जो कुछ भी है। मैंने उनका बहुत साथ दिया।
मंसूर खान का क्या रोल था?
मंसूर मामू का प्रोडयूसर का रोल था। वे रोज सेट पर आते थे और उनको ये देखना था कि फिल्म सही तरीके से बन रही है या नहीं? पैसे सही तरीके से खर्च हो रहे हैं या नहीं? हमारे बजट, लोकेशन और क्रिएटिव इनपुट का ध्यान रखना था। अब्बास को देखना था कि वे अपना काम कैसे कर रहे हैं? मैं कैसे परफोर्म कर रहा हूं। वे एक ब्रिज थे। प्रोडयूसर और डायरेक्टर के बीच। आमिर मामू प्रोडयूसर थे और अब्बास डायरेक्र... उन दोनों के बीच मंसूर मामू खड़े थे। अब्बास को कहते थे कि अब्बास पैसा च्यादा खर्च हो रहा है, आपको दो दिन में कम्पिलीट करना है, तीन दिन में नहीं। लेकिन अगर उनको लगता कि हमें वाकई तीन दिन चाहिए और अगर हम दो दिन में करेंगे तो सही नहीं जाएगा तो आमिर मामू को समझाते थे। अब्बास नीड मोर टाइम, आप उनको सपोर्ट करें।
कह सकते हैं कि मंसूर की फिल्में सफल रही हैं। काफी अनुभवी हैं वे। उस हिसाब से हो सकता है कुछ सीन भी बताते हों वे कि इस ढंग से करो या इसको ऐसा भी किया जा सकता है।
नहीं, बिल्कुल नहीं। क्योंकि अब्बास का काम करने का जो तरीका है वो मंसूर मामू से काफी मिलता है। उनकी स्टोरी टेलिंग की स्टाइल लगभग एक जैसी है। कहानी अब्बास ने लिखी है। स्क्रीनप्ले और डायलॉग सब उन्होंने लिखे हैं। वे जानते हैं कि उनको क्या पोट्रे करना है। कभी-कभी अगर कोई दिक्कत थी तो मंसूर मामू उन्हें सलाह देते थे कि मैं जानता हूं अब्बास तुम ये करना चाह रहे हो, लेकिन ठीक से नहीं हो रहा है। तो ऐसे करो या वैसे करो। थोड़ा-बहुत टेक्नीकल नॉलेज भी था .. एडवाइज दे रहे थे अब्बास को ़ ़ ़ किस लेंस से किया जाए वाइड शॉट लें या क्लोज जाएं। जैसे कभी बता दिया कि इस शॉट पर अब्बास अगर क्लोजअप लेंगे तो उसका इमोशनल इम्पेक्ट ज्यादा आएगा।
अब इमरान तुम्हें क्या लगता है, हिंदी फिल्मों का एक्टर बनना कितना आसान है?
बहुत मुश्किल है। क्योंकि मेरी हिंदी बहुत-बहुत कमजोर थी और आज भी काफी कमजोर है। मैं बंबई में बड़ा नहीं हुआ हूं। मैं साउथ इंडिया में बड़ा हुआ और फिर अमेरिका चला गया। जब मैंने शुरू किया था तो मैं हिंदी बिल्कुल नहीं बोलता था। मुझे एक-दो लफ्ज आते थे बस । मैंने डिक्शन पर बहुत काम किया। ये काफी मुश्किल था। मैं उतना अच्छा डांस भी नहीं करता हूं। मुझे डांस करना पसंद नहीं है। मैंने उस पर भी बहुत काम किया।
शर्मीले स्वभाव के हैं आप।
हां, मैं बहुत शर्मीले स्वभाव का हूं। आज के हीरो बहुत अच्छे डांसर हैं। वे इतने शर्मीले नहीं हैं। उनको डांस करने का बहुत शौक है। जैसे आप रितिक रोशन को देखें या शाहिद कपूर कैसे नाचते हैं। उनको डांस का बहुत शौक है। मुझे इतना शौक नहीं है। मैं उनकी तरह डांस तो नहीं कर सकता हूं.... तो मैंने बहुत काम किया डांस पर। एक्शन भी बहुत सीखना पड़ा। काफी मुश्किल रहा है। लेकिन मजा भी बहुत आता है मुझे। क्योंकि बाद में जब आप कम्पिलीट प्रोडक्ट को देखते हैं, तो लगता है कि इतना कुछ किया है। इतना कुछ काम किया है और अब पिक्चर ठीक-ठाक लग रही है। मैं ये नहीं कह सकता हूं कि पिक्चर बहुत अच्छी लग रही है। क्योंकि मुझे सिर्फकमजोरियां नजर आती हैं पिक्चर की।
क्या ऐसा लगता है कि आप इस फैमिली से न होते तो फिल्मों में आना और ज्यादा मुश्किल होता?
मुश्किल तो होता। मुझे यह भी नहीं मालूम कि अगर मैं इस फैमिली से नहीं होता तो क्या मुझे फिल्मों का इतना शौक होता? क्योंकि बचपन से मैंने सिर्फ फिल्में देखी हैं। ये देखा कि लोग शूटिंग कैसे करते हैं, एडीटिंग कैसे करते हैं। मुझे बचपन से शौक है।
हिंदी फिल्मों की क्या चीज आकर्षित करती है। चूंकि आप फिल्मों की पढ़ाई भी कर चुके हैं और फिल्म भी कर चुके हैं। हिंदी फिल्मों के साथ क्या खास बातें हैं जो आपको आकर्षित करती है। हिंदी फिल्में आपके लिए क्या है?
मुझे हिंदी फिल्मों का इमोशन बहुत अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि जो इंग्लिश फिल्में हैं या फ्रेंच या जर्मन जो भी हैं। उनमें इतना इमोशन नहीं है, जितना हमारी फिल्मों में है। एक तो हम जो गाने डालते हैं फिल्मों में, हर गाने का एक रीजन है। हम गाने को यहां क्यों डाल रहे हैं। जब हीरो को हीरोइन से प्यार हो जाता है, वो एक गाना गाता है। अपनी दिल का हाल बताने के लिए गीत गाता। अगर दोनों रूठ गए हैं तो एक उदास गीत होगा। इस तरह हमारी फिल्मों में इमोशन आते हैं। अगर आप कोई कोई इंग्लिश फिल्म देखें तो आपको शायद इतना रोना नहीं आएगा। वो कॉमेडी फिल्में अच्छी बना लेते हैं, लेकिन इमोशन है, जो ड्रामा है, जो रोना-धोना है। वो मुझे लगता है कि हम सबसे अच्छा करते हैं।
अब किस तरह से खुद को देख रहे हैं। किस तरह की फिल्में.... क्योंकि चार तारीख को हरमन भी आ रहे हैं।
ऐसे तो मैं हरमन को जानता नहीं हूं। पर्सनली नहीं जानता हूं। लेकिन मैंने पहले ही कहा कि मैं सोचता नहीं हूं कि और लोग क्या कर रहे हैं?
उनकी फिल्म काफी बड़ी फिल्म है। साइंस फिक्सन फिल्म है। अगर मैं ज्यादा सोचूं तो मैं ज्यादा उस पर ध्यान दूंगा, मेरा फोकस उधर चला जाएगा। मुझे अपनी फिल्म पर ध्यान देना है कि हमाके पो्रमोशन कैसे चल रहे हैं। लोगों को हमारा म्युजिक पसंद आ रहा है या नहीं, हमारा ट्रेलर पसंद आ रहा है या नहीं? मेरा फिल्म देखने का इरादा तो है, क्योंकि मुझे साइंस फिक्शन पसंद है। लेकिन मैं ये भी मानता हूं और ये मैं आमिर मामू से सीखा है, वो हमेशा कहते हैं कि अगर फिल्म अच्छी है तो आप उसे मार नहीं सकते हैं और अगर फिल्म खराब है तो आप उसे बचा नहीं सकते।
हरमन के लिए क्या मैसेज देंगे आप?
आपको मालूम है? मेरी एक फ्रेंड है, वो हरमन के साथ एक दूसरी फिल्म में काम कर चुकी है। वो असिस्टेंट थी। पता नहीं कहीं शूटिंग कर रहे थे, कुछ लोग मेरी फ्रेंड के साथ बदतमीजी कर रहे थे। उसने बताया कि उस सेट पर एक ही जेंटलमेन था, वो था हरमन। उसने आकर मेरे दोस्त को बचाया। जो लोग बदतमीजी कर थे,उनसे कहा कि यहां से निकल जाओ। मैं हरमन को थैक्यू कहना चाहूंगा कि उसने मेरे फ्रेंड का साथ दिया।
वैसे हरमन की कामयाबी के लिए आप क्या कहेंगे? कोई घबराहट है क्या?
घबराहट तो नहीं है। मुझे ये भी लगता है कि हमारी इंडस्ट्री में नए टैलेंट का आना बहुत जरूरी है। नए एक्टर का, नए रायटर का, नए डायरेक्टर का। जो यंग और टैलेंटिड हो, हमें उसका सपोर्ट करना चाहिए। जितने नए एक्टर, डायरेक्टर और रायटर आएंगे, इस इंडस्ट्री का उतना ही भला होगा। मैं हरमन की कामयाबी चाहूंगा।
वो दिख रहा है कि पहली फिल्म के आने के पहले ही आप लोगों को फिल्में मिल गई हैं। दूसरी फिल्म पूरी हो चुकी है।
हां, दूसरी फिल्म पूरी हो चुकी है और तीसरी फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं।
उसके बाद भी लगातार ऑफर आ रहे है। उस हिसाब आप समझ सकते हैं कि कितनी कमी है। इसक ा कितना फायदा उठा पा रहे हैं या किस तरह की फिल्में आप चुन रहे हैं?
किडनैप थ्रिलर है। ज्यादा कुछ कह नहीं सकता हूं उसके बारे में, क्योंकि उनके प्रोमोशन शुरू नहीं हुए। उसमें काफी सस्पेंस और ड्रामा है।
उसमें आप अकेले हैं?
नहीं, संजय दत्त हैं।
हीरोइन कौन है आपकी?
हीरोइन है मिनीषा लांबा।
दूसरी लक क्या है?
लक में अभी-अभी हीरोइन कास्ट हुई है। उसका नाम श्रुति हसन है। कमल हसन की बेटी। यह अष्टविनायक की फिल्म है। उसमें डैनी डेंजोगप्पा हैं, मिथुन चक्रवर्ती हैं और रवि किशन हैं।
कौन डायरेक्टर हैं?
सोहम।
अगले पांच सालों में इमरान खुद को कहां देख रहे हैं?
उसके बारे में सोचा नहीं है मैंने। जब कोई भी स्क्रिप्ट आती है मेरे पास। जब कोई भी प्रोजेक्ट आए, मैं हमेशा दर्शक की तरह सोचता हूं। मैं कहानी सुनता हूं और बैठकर सोचता हूं कि अगर मैंने टिकट खरीद कर यह फिल्म देखी तो मुझे पसंद आएगी या नहीं? यह नहीं सोचता हूं कॉमेडी फिल्म है या कुछ और? मैं बस सोचता हूं कि अगर मैंने टिकट खरीद कर यह पिक्चर देखी तो मेरा पैसा वसूल होगा या नहीं? अगर मुझे पसंद आया तो मैं कर लेता हूं। अगर मुझे पसंद नहीं आया तो मैं नहीं करता हूं। ज्यादा इंटेलेक्चुअल बन के कुछ फायदा नहीं है।
डायरेक्शन और रायटिंग क्या बैक बर्नर पर चला गया है?
डायरेक्शन तो फिलहाल बैक बर्नर पर चला गया है। थोड़ी-बहुत रायटिंग करता हूं, लेकिन अभी तक कुछ इतना पसंद नहीं आया है मुझे।
रायटिंग किस तरह की सिर्फ फिल्मों की रायटिंग करते हैं या क्रिएटिव रायटिंग भी करते हैं?
हां, फिल्मों की रायटिंग कर रहा हूं।
पोयम, शायरी या इस तरह के....
नहीं, मुझमें वह टैलेंट नहीं है।
प्रेम-मोहब्बत तो आपके उम्र में जरूरी है, उस फ्रंट पर क्या सोचते हैं?
मेरी गर्लफ्रेंड है। उसका नाम अवंतिका है, हम पिछले छह साल से साथ हैं। अभी आगे का कुछ सोचा नहीं है।
वह क्या करती हैं?
वह भी फिल्मों में काम करती हैं। वो प्रोडक्शन में काम करती हैं एक प्रोडक्शन कंपनी में। प्रोडयूसर हैं।

Sunday, June 29, 2008

प्रोड्यूसर आमिर खान काफी एक्टिव हो गए हैं

मैं जाने तू ... का पहला निर्माता नहीं हूं। इसे पहले जामू सुगंध बना रहे थे। मुझे मालूम था कि इमरान अब्बास की फिल्म कर रहे हैं। उस समय मैंने इमरान से केवल इतना ही पूछा था कि क्या आपको अब्बास और फिल्म की कहानी पसंद है? उन्होंने हां कहा तो मैंने कहा कि जरूर करो। उस वक्त जामू सुगंध आर्थिक संकट से गुजर रहे थे। उन्होंने तीन फिल्में की घोषणा की थी। दो की शूटिंग भी आरंभ हो गई थी, लेकिन वे उन्हें बना नहीं पाए। जाने तू ... अभी शुरू नहीं हुई थी। तब अब्बास मेरे पास प्रोजेक्ट लेकर आए और पूछा कि क्या आप इसे प्रोडयूस करना चाहेंगे। मैंने कहानी सुनी तो कहानी अच्छी लगी। तब तक अब्बास फिल्म के चार गाने रहमान के साथ रिकॉर्ड कर चुके थे। वे गाने भी मुझे पसंद आए। फिर मैंने अब्बास से कहा कि पांच-छह सीन शूट कर के दिखाओ। उन्होंने कुछ सीन शूट किए। वे भी मुझे पसंद आए। मुझे विश्वास हुआ कि अब्बास फिल्म कर पाएंगे। फिर मैंने इमरान का स्क्रीन टेस्ट देखा। हर तरह से संतुष्ट हो जाने पर मैंने फिल्म प्रोडयूस करने का फैसला किया। जाने तू ... बनाने का मेरा फैसला पूरी तरह से गैरभावनात्मक था। ऐसा नहीं था कि इमरान के लिए फिल्म बनानी है तो फिल्म ढूंढने चलें। यह अपने आप हो गया। एक तरह से इमरान ने अपनी फिल्म खुद खोजी। मैं बाद में शामिल हो गया।
फिर भी जाने तू ... के निर्माण के फैसले के समय इमरान के भांजे होने की वजह तो काम कर रही होगी?
निर्माता के तौर पर मैं थोड़ा अलग ढंग से सोचता हूं। और मेरी पहली जिम्मेदारी दर्शकों के साथ है। अगर मुझे कहानी पसंद नहीं आती या इमरान इस फिल्म में नहीं जंचते तो मैं इमरान को नहीं लेता। सबसे पहले तो कहानी पसंद आना जरूरी है।
आमिर खान को किसी प्रोजेक्ट के लिए राजी कर पाना आसान काम नहीं है। जाहिर सी बात है कि उनकी सहमति से बनी फिल्म में खोट निकालना मुश्किल काम होगा?
ऐसा नहीं है कि मैं जो भी फिल्म बनाऊंगा, वह कामयाब ही होगी। मेरी कोशिश रहती है कि अपनी तरफ से कोई कसर न छोडं़ू। फिर फिल्म बनती है और कामयाब होती है तो वह अलग बात है।
फिल्म चुनते समय कोई और नजरिया रहा या आमिर ने अपनी पसंद के मुताबिक ही फिल्म चुनी?
फिल्म चुनते समय मैं कहानी को एक दर्शक के तौर पर सुनता हूं। उस समय मेरे दिमाग में यह नहीं रहता कि मैं फिल्म कर रहा हूं या नहीं कर रहा हूं। कोई प्रोजेक्ट लेकर आता है तो मैं यह नहीं पूछता कि आप मुझे कौन सा रोल देने वाले हैं। रंग दे बसंती की मैंने कहानी सुनी थी। फरहान की फिल्म दिल चाहता है की मैंने कहानी सुनने के बाद पूछा था कि कौन सा रोल मेरे लिए सोचा है। उन्होंने सिड सोचा था, जो आखिरकार अक्षय खन्ना ने किया। मैंने तब कहा था कि मुझे आकाश ज्यादा पसंद है। कई दफा ऐसा भी हुआ है कि मैंने कहानी सुनी है। कहानी पसंद आई है, लेकिन मुझे अपना रोल पसंद नहीं आया। तब मैंने डायरेक्टर से कहा कि आप बनाइए, लेकिन मुझे लेकर मत बनाइए।
अब्बास और इमरान की बातचीत से ऐसा लगता है कि यह फिल्म सामान्य लव स्टोरी है, जो रियलिस्टिक अंदाज में शूट की गई है। आपके नजरिये से इस में और क्या खास बात है?
कहानी सुनते समय मैं इस पर ध्यान देता हूं कि कहानी कैसे कही जा रही है। रंग दे बसंती जब मैंने की थी, उस वक्त भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद पर चार फिल्में आ चुकी थीं। ऐसा नहीं था कि उनकी कहानी में हम कुछ बदल देते। हर निर्देशक के बोलने का अंदाज अलग होता है। जाने तू ... की कहानी सुनते समय लगा कि अब्बास ने ताजा कहानी लिखी है। कैरेक्टर और संवाद अच्छे हैं। फिल्म आपको नयी लगेगी। इसमें कुछ अलग बात है। सामान्य तौर पर लव स्टोरी में माता-पिता खिलाफ रहते हैं। इस फिल्म में वैसी कोई बात नहीं है। किसी और की खिलाफत है। मुझे यह एंटरटेनिंग लगी। फिल्म दिल को छूती है। इसमें पहले की फिल्मों जैसा मैलोड्रामा नहीं है। जिंदगी की सहज सच्चाइयां फिल्म के जरिए सामने आती है।
इमरान को एक्टर के तौर पर कैसे आंकते हैं आप?
उसमें संभावनाएं हैं। वह अच्छा है। अभी उसे सीखने की जरूरत है। वह आगे जाएगा।
ऐसा लग रहा है कि प्रोडयूसर आमिर खान काफी एक्टिव हो गए हैं?
कोशिश कर रहा हूं। मैं प्रोडयूस तो तारे जमीन पर ही कर रहा था। इत्तफाक से अब्बास टायरवाला की जाने तू ... आई। ये अच्छी लगी तो मैंने कहा कि चलो इसे भी बना लेता हूं। सौभाग्य से मेरी प्रोडक्शन टीम बहुत अच्छी है। चूंकि बाद में मैं तारे जमीन पर डायरेक्ट करने लगा तो मुझे एहसास हुआ कि जाने तू.. के लिए प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी सही तरीके नहीं निभा पाऊंगा। डायरेक्ट करते समय मैं कुछ और नहीं कर सकता। पहले सोचा कि जाने तू.. .बाद में करता हूं, लेकिन वह फैसला सही नहीं लगा। फिर मैंने मंसूर खान से कहा कि आप आकर मेरी जिम्मेदारी संभाल लो। मंसूर मान गए। उसके बाद दो और स्क्रिप्ट आई। अभिनव देव की दिल्ली बेली और अनुषा रिजवी की लिखी फिल्म, जिसे वही डायरेक्ट भी करेंगी। इन दोनों के लिए हां कह दिया है।
लोग तो जानना चाह रहे हैं कि किरण की फिल्म कब शुरू हो रही है?
किरण ने अपनी कंपनी शुरू कर दी है। उन्होंने एक स्क्रिप्ट लिखी है, जिसे वह खुद डायरेक्ट करेंगी। मुझे वह फिल्म पसंद आई है।
तो क्या उसमें आमिर हैं?
अभी मैं नहीं हूं। अगर किरण चाहेंगी तो मुझे खुशी होगी। वैसे किरण का नजरिया है कि उन्हें छोटी फिल्म बनानी है। मैंने सबकुछ किरण के ऊपर छोड़ दिया है। वह गुरिल्ला टाइप फिल्म बनाएंगी। 18-20 लोग ही प्रोडक्शन टीम में रहेंगे। दो-तीन महीनों में फिल्म की शूटिंग आरंभ हो जाएगी। उनकी कंपनी का नाम सिनेमा-73 है। उस साल किरण पैदा हुई थीं शायद..
राजकुमार हिरानी की फिल्म कब शुरू कर रहे हैं?
इस फिल्म की शूटिंग पहले शुरू हो जाएगी, लेकिन मैं एक नवंबर से इसमें शामिल होऊंगा।
अब्बास ने बताया कि आप सेट पर बिल्कुल नहीं गए?
उसकी वजह यह रही कि हमलोग तारे जमीन पर और जाने तू.. साथ-साथ शूट कर रहे थे। और फिर मंसूर सेट पर थे ही, इसलिए जरूरत नहीं थी कि मैं सेट पर जाऊं।
ऐसा देखा गया है कि मशहूर डायरेक्टर और एक्टर प्रोडक्शन में आने के बाद नए डायरेक्टरों को अवसर देने के बावजूद उनसे अपनी शैली की ही फिल्में बनवाते हैं या अपनी सोच से उन्हें प्रभावित करते हैं। आप का क्या रवैया रहा?
मैं इस तरह से नहीं सोचता। अगर मैं किसी नए डायरेक्टर या किसी और के साथ काम कर रहा हूं तो जाहिर सी बात है कि उसकी काबिलियत पर मुझे भरोसा है। वह कुछ कहना चाह रहा है, जो मुझे भी पसंद है। अब जो चीज मुझे पसंद आ चुकी है, उसे तोड़ने-मरोड़ने की जरूरत ही नहीं है। मैंने एक्टर के तौर पर भी कभी किसी के काम में हस्तक्षेप नहीं किया। हां, अगर मुझे लगेगा कि काम मुझे पसंद नहीं आ रहा है तो उसे बिल्कुल छोड़ दूंगा या फिर अपने हाथ में ले लूंगा। तारे जमीन पर के समय मुझे लगा कि फिल्म अच्छी नहीं बन पा रही है तो मैंने डायरेक्शन संभाल लिया।
नासिर साहब ने आपको लेकर फिल्म बनाई थी। आपने उनके नाती इमरान के साथ फिल्म बनाई। लगता है कि एक चक्र पूरा हो गया?
हां, बगैर किसी योजना के यह चक्र पूरा हो गया। और अगर आज नासिर साहब होते तो बहुत खुश होते।

Friday, June 13, 2008

चार जुलाई को चमकेंगे दो स्टार!

-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए पहली छमाही कोई सुखद समाचार नहीं ला सकी। न तो कोई फिल्म जबर्दस्त सफलता हासिल कर सकी और न ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से आए स्टारसन में कोई चमक दिखी। हाल ही में रिलीज हुई वुडस्टॉक विला में आए सिकंदर खेर को ढेर होते हमने देखा। उसके पहले मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती अपनी पहली फिल्म जिम्मी में फुस्स साबित हुए। आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों ही नवोदित स्टारों को दर्शकों ने नोटिस नहीं किया। हालांकि दोनों के पास अभी एक-एक फिल्म है, लेकिन कहना मुश्किल है कि दूसरी फिल्मों में वे कोई जलवा बिखेर पाएंगे!
हां, चार जुलाई को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दो स्टार चमकने को तैयार हैं। लव स्टोरी 2050 से हैरी बावेजा के पुत्र हरमन बावेजा और जाने तू या जाने ना से आमिर खान के भतीजे इमरान खान की फिल्मों में एंट्री हो रही है। चार जुलाई को एक साथ रिलीज हो रही इन दोनों फिल्मों के मुख्य कलाकारों को फिलहाल भविष्य के स्टार के रूप में देखा जा रहा है। उनकी पहली फिल्म की रिलीज के पहले ही उनकी आने वाली फिल्में भी लगभग पूरी हो गई हैं। दोनों को लगातार फिल्मों के ऑफर मिल रहे हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि अगर दोनों ने अपनी पहली फिल्म से दर्शकों को थोड़ा भी संतुष्ट किया, तो उनके घरों के आगे निर्माताओं की कतारें लग जाएंगी।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में हमेशा से चार-पांच स्टारों की ही मांग सबसे ज्यादा रही है। आज भी वही स्थिति बनी हुई है, लेकिन एक फर्क जरूर आ गया है। पहले हर स्टार की साल में कम से कम चार-पांच फिल्में रिलीज हो जाया करती थीं, लेकिन इधर एक समय में एक फिल्म की शूटिंग करने की प्राथमिकता के कारण पॉपुलर स्टारों की बमुश्किल दो फिल्में ही आ पाती हैं। तीनों खानों के साथ अक्षय कुमार, रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम की पिछली फिल्मों को याद करें, तो इस स्थिति को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इन सभी में केवल अक्षय कुमार अकेले ऐसे स्टार हैं, जिनकी ज्यादा फिल्में आ रही हैं और उनमें से अधिकांश सफल भी हो रही हैं।
जाहिर-सी बात है कि इस परिदृश्य में आधे दर्जन स्टारों के सहारे दर्शकों के लिए सौ-सवा सौ फिल्मों की सालाना जरूरत पूरी नहीं की जा सकती! दरअसल, यही वजह है कि निर्माता-निर्देशक और फिल्मों के बड़े कॉरपोरेट हाउस भरोसेमंद स्टार के लिए तरस रहे हैं और इसीलिए किसी में थोड़ी संभावना दिखते ही सब उस पर टूट पड़ते हैं। अगर वह संभावना फिल्म इंडस्ट्री से उभर रही हो, तो उस पर निर्माता-निर्देशकों का भरोसा कुछ ज्यादा ही होता है।
फिल्म इंडस्ट्री के लोग जब इंटरव्यू में कहते हैं कि हमारी इंडस्ट्री एक परिवार की तरह है, तो दर्शक और इंडस्ट्री के बाहर के लोगों को हंसी आती है। खेमेबाजी और आगे बढ़ने की फिक्र में भले ही इंडस्ट्री के सदस्य एक-दूसरे के विरोध में नजर आएं, लेकिन यह एक ठोस सच्चाई यह भी है कि इंडस्ट्री में एक-दूसरे की मदद की पुरानी परंपरा रही है। मैं तुम्हारा समर्थन करता हूं, तुम मुझे सहयोग देना की नीति पर अमल करती फिल्म इंडस्ट्री का घेरा इतना मजबूत होता है कि बाहर से आए कलाकारों को उसे भेदने के लिए भारी मेहनत करनी पड़ती है। क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि किसी बाहरी ऐक्टर को अभिषेक बच्चन जितने अवसर मिल पाते हैं? लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के लोग घाटा उठाकर बिरादरी के लड़कों को मौका नहीं देते। बहुत ही क्रूर तरीके से छंटाई भी चलती रहती है। चूंकि फिल्म निर्माण शुद्ध रूप से बिजनेस हो गया है, इसलिए उनमें ही निवेश किया जाता है, जिनसे मुनाफे की उम्मीद हो। फिलहाल हरमन बावेजा और इमरान खान ऐसी उम्मीद के रूप में दिख रहे हैं। दोनों की दूसरी फिल्में भी तैयार हैं और आगामी फिल्मों की बातचीत भी चल रही है। दोनों के पीछे फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवी और सफल व्यक्ति हैं, जिनके अपने संबंध और प्रभाव भी कार्य कर रहे हैं। चार जुलाई को इन दोनों कलाकारों की चमक सुनिश्चित की जा रही है और हैरी बावेजा और आमिर खान रणनीति बना रहे हैं।

Tuesday, April 29, 2008

आमिर खान के भतीजे इमरान खान


आमिर खान ने अपने भतीजे इमरान खान को पेश करने के लिए एक फ़िल्म बनाई है-जाने तू.यह उनके प्रोडक्शन की तीसरी फ़िल्म होगी.आमिर को उम्मीद है की लगान और तारे ज़मीन पर की तरह यह भी कामयाब होगी और इस तरह वे कामयाबी की हैट्रिक लगन्र में सफल रहेंगे।
आप सभी जानते होंगे की आमिर खान को उनके चाचा नासिर खान ने पेश किया था.फ़िल्म थी क़यामत से क़यामत त और उसके निर्देशक थे मंसूर खान.आमिर ने परिवार की उसी परम्परा को निभाते हुए अपने भतीजे को पेश किया है.उनकी फ़िल्म के दिरेक्टोर हैं अब्बास टायरवाला ।
आज कल की फिल्मों और नए सितारों को पेश करने की चलन से थोड़े अलग जाकर इमरान खान को पड़ोसी चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा है.अगर याद हो तो आमिर खान भी इसी छवि के साथ आए थे।
और हाँ याद रखियेगा की इमरान खान को पहली बार आप ने चवन्नी के ब्लॉग पर देखा.