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Tuesday, November 2, 2010

इंसानी दिमाग का अंधेरा लुभाता है मुझे: विशाल भारद्वाज

इंसानी दिमाग का अंधेरा लुभाता है मुझे: विशाल भारद्वाजमकडी से कमीने तक के सफर में ही विशाल भारद्वाज ने अपना खास परिचय दे दिया है। उनकी फिल्मों की कथा-भूमि भारतीय है। संगीत निर्देशन से उनका फिल्मी करियर आरंभ हुआ, लेकिन जल्दी ही उन्होंने निर्देशन की कमान संभाली और कामयाब रहे। उनकी फिल्में थोडी डार्क और रियल होती हैं। चलिए जानते हैं उनसे ही इस फिल्मी सफर के बारे में।

डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश कैसे पैदा हुई?

फिल्म इंडस्ट्री में स्पॉट ब्वॉय से लेकर प्रोड्यूसर तक के मन में डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश रहती है। हिंदुस्तान में फिल्म और क्रिकेट दो ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में हर किसी को लगता है कि उससे बेहतर कोई नहीं जानता। सचिन को ऐसा शॉट खेलना चाहिए और डायरेक्टर को ऐसे शॉट लेना चाहिए। हर एक के पास कहानी है। रही मेरी बात तो संगीतकार के तौर पर जगह बनाने के बाद मैं फिल्मों की स्क्रिप्ट पर डायरेक्टर से बातें करने लगा था। स्क्रिप्ट समझने के बाद ही आप बेहतर संगीत दे सकते हैं। बैठकों से मुझे लगा कि जिस तरह का काम ये कर रहे हैं, उससे बेहतर मैं कर सकता हूं। इसी दरम्यान संगीत के लिए फिल्में मिलनी कम हुई तो लगा कि इस रफ्तार से तो दो सालों बाद काम ही नहीं रहेगा। मेरा एटीट्यूड भी आडे आ रहा था। मैंने डायरेक्शन पर किताबें पढनी शुरू कीं। उन दिनों जी.टी.वी. के लोग गुब्बारे के संगीत के लिए मेरे पास आए। मैंने एक शर्त रखी कि म्यूजिक करूंगा, लेकिन इसके एवज में मुझे एक शॉर्ट फिल्म बनाने के लिए दो। एक तरह से उन्हें ब्लैकमेल किया और मुझे दो शॉर्ट फिल्में मिल गई। उन फिल्मों के बाद लगा कि मैं कितना खराब लेखक हूं। उत्तराखंड का मेरा एक दोस्त लव स्टोरी सिरीज कर रहा था। मैंने उसे दो अन्य कहानियों के बीच अपनी कहानी रख कर दी। उसे पसंद आई तो स्क्रीन प्ले और संवाद मैंने ही लिखे। बहुत पढने के बाद नए विषय की खोज में निकला। अब्बास टायरवाला के पास थ्रिलर कहानी थी मेहमान। मैं अपने दोस्त मनोज वाजपेयी से मिला। उन्हें वह बडी रेगुलर टाइप कहानी लगी। वह हिंदुस्तान-पाकिस्तान के दो सैनिकों की कहानी थी। उन्होंने कहा कि इस पर काम करते हैं। वे फिल्म के लिए राजी हो गए। इसी बीच रॉबिन भट्ट ने अजय देवगन से मिलवाया। उन्हें कहानी पसंद आई और वे फिल्म प्रोड्यूस करने को तैयार हो गए। तभी उनकी राजू चाचा फ्लॉप हो गई। एक महीने बाद मेरी फिल्म की शूटिंग थी, वह ठप हो गई। एक साल से ज्यादा की मेहनत धरी की धरी रह गई।

उन दिनों तो आपने संगीत निर्देशन छोड दिया था?

डायरेक्टर था तो उसी मूड में रहता था। हर डायरेक्टर को कहानी सुनाई। एक्टर भाग जाते थे, प्रोड्यूसर की समझ में कहानी नहीं आती थी। यहां ज्यादातर प्रोड्यूसर को नाम समझ में आता है, काम नहीं। एक साल के बाद चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी गया। वहां मकडी की स्क्रिप्ट जमा की। वह पसंद की गई। स्क्रिप्ट मजबूरी में मैंने खुद लिखी। मेरे दोस्त अब्बास टायरवाला व्यस्त थे। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि किसी लेखक को दूं। इसके साथ दूसरा हादसा हुआ। फिल्म बनी तो सोसायटी ने रिजेक्ट कर दी। मैंने गुलजार साहब और दोस्तों को दिखाई। सबको पसंद आई तो फिल्म रिलीज के बारे में सोचा। दोस्तों से पैसे लेकर चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के पैसे वापस किए। फिल्म डेढ घंटे की थी। मल्टीप्लेक्स बनने लगे थे। फिल्म के लिए कोई स्लॉट नहीं था। उसे बेचने व रिलीज करने में पापड बेलने पडे। लेकिन बाद में यह कल्ट फिल्म बन गई।

बचपन कहां गुजरा? परिवार व परिवेश के बारे में कुछ बताएं?

पैदा बिजनौर में हुआ। बचपन मेरठ में गुजरा। पिता गवर्नमेंट ऑफिस में काम करते थे। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से उनकी दोस्ती थी। उनका नाम राम भारद्वाज था, शौकिया तौर पर फिल्मों में गाने लिखते थे। उन्होंने बिजनेस में भी हाथ आजमाया। फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन में उतरे तो नाकाम रहे। कर्ज हो गया। मेरा संगीत या फिल्म का इरादा ही नहीं था। क्रिकेट खेलता था, उसी में आगे बढना चाहता था। मैं स्कूल की टीम में खेलता था और उत्तर प्रदेश की ओर से खेलने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी भी गया। दिल्ली आने पर एक दोस्त की वजह से संगीत में इंटरेस्ट हुआ, जो बाद में इतना सीरियस हो गया कि क्रिकेट छूट गया।

उन दिनों आपके साथ और कौन दोस्त थे?

पत्नी रेखा थीं। उन्होंने क्लासिकल सीखा था। कुछ और दोस्त थे। हम गजल गाते थे। मैंने पेन म्यूजिक रिकार्डिग कंपनी जॉइन की। उसी जॉब में ट्रांसफर लेकर मुंबई आया। इसी बीच एक बार दिल्ली में गुलजार साहब से मुलाकात हुई। उनके साथ चढ्डी पहन के फूल खिला है गीत की रिकार्डिग की। उसके बाद माचिस का ऑफर मिला।

फिल्मों के प्रति झुकाव कब हुआ? तब की फिल्में याद हैं?

बचपन की देखी हुई पर्दे के पीछे याद आती है। उसमें विनोद मेहरा व नंदा थे। फिल्मों में असल रुचि शोले से जगी। पांचवीं-छठी कक्षा में था। इसके बाद तो अमिताभ बच्चन की अमर अकबर एंथोनी, नसीब, सुहाग जैसी हर फिल्म देखी। श्याम बेनेगल की एक-दो फिल्में भी देखीं। कालेज के समय में उत्सव, कलयुग और विजेता भी याद हैं।

फिल्में परिवार या दोस्तों के साथ देखते थे या अकेले?

ज्यादातर फिल्में दोस्तों के साथ देखीं। तब इतना सीरियस दर्शक नहीं था। संयोग से मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हुआ। गुलजार साहब के साथ उसे देखने गया। वे मुझे साथ ले जाते थे। उसमें किस्लोवोस्की की फिल्म रेड, ब्ल्यू व व्हाइट देखी। अगले साल त्रिवेंद्रम में उनकी डे के लॉग देखी। तब पता चला कि सिनेमा इतना बडा ह्यूमन एक्सप्रेशन है। एक तरह से फिल्म फेस्टिवल ही मेरा स्कूल रहा।

अगर मैं कहूं कि फिल्म फेस्टिवल के अनुभव और उससे पैदा हुए रुझान ने ही आपको इस माध्यम के प्रति सचेत किया। उसके पहले के देखे, सीखे व समझे को भूलने की जरूरत है..।

भूला (अनलर्न) तो नहीं जा सकता। अवचेतन में सारे अनुभव जमा होते हैं। लेकिन सच में सिनेमा का पावर, एक्सप्रेशन और मीडियम की समझ इसके बाद ही आई। बहुत बडा कंट्रास्ट था। फिल्मों ने हिला कर रख दिया। कमर्शियल फिल्में मुख्य रूप से एंटरटेनमेंट होती हैं। विषय और प्रभाव के स्तर पर वे सतह पर होती हैं। अच्छी फिल्में सीने में जम जाती हैं। सत्यजित राय के बारे में कहा गया कि वे गरीबी बेचते हैं। हिंदुस्तान में गरीबी है तो क्यों न दिखाई जाए। हमें गरीबी पर शर्म नहीं आती, उन पर बनी फिल्मों पर शर्म आती है। उन्होंने 40-50 साल पहले जैसी फिल्में बनाई, वैसी फिल्में आज भी नहीं बन सकीं।

बाहर से आई प्रतिभाओं को अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पडता है। इस बारे में आपके अनुभव क्या थे?

मुझे लगता है कि विरोधियों से ज्यादा समर्थक हैं। मेरी बहुत कमाल की एक जगह बन गई है। फर्क नहीं पडता कि कौन क्या बोल रहा है? सच बाहर आ जाता है। यह नैचरल प्रोसेस है। बिना डरे ईमानदारी से अपनी सोच पर काम करने की जरूरत है। यदि सभी लोग सडक पर चल रहे हैं और आप कच्चे रास्ते पर हैं तो वे आपको इडियट समझेंगे, खींचकर सडक पर लाने की कोशिश करेंगे। मेरे लिए तो यह कच्चा रास्ता ही ज्यादा अच्छा है। एक बात गुलजार साहब ने समझाई थी कि अवसर टारगेट की तरह होते हैं। वह कब आपके सामने आ जाएगा, पता नहीं चलेगा। आपको हमेशा अपनी क्रिएटिविटी की बंदूक लोड करके रखनी होगी। अगर आप सोचते हैं कि अवसर आएगा तब गन साफ कर, गोली भरके फायर करेंगे तो टारगेट निकल जाएगा। इसलिए हमेशा तैयार रहना होगा और धैर्य भी बनाए रखना होगा।

मकडी और मकबूल ने आपको एक मजबूत जगह दी। उसके बाद आप अपनी मर्जी की फिल्में बना सके।

हां, ये मेरी मर्जी की फिल्में थीं। मकबूल के लिए पैसे नहीं थे। एक्टर भी तैयार नहीं थे। मैंने एनएफडीसी से संपर्क किया, लेकिन उन्हें बजट ज्यादा लगा। बैंक से लोन लेने की कोशिश की। संयोग से बॉबी बेदी मिले और इसे प्रोड्यूस करने को तैयार हो गए। फिल्म से आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन डायरेक्टर के तौर पर मुझे स्वीकार किया गया।

आपने कहा, यहां सब निर्देशक बनना चाहते हैं। आप क्यों बने?

मेरी समझ में आ गया कि यह मीडियम डायरेक्टर का है। डायरेक्टर की बात सभी को माननी पडेगी। मुझे लगा कि फिल्ममेकिंग से बडा कोई क्रिएटिव एक्सप्रेशन नहीं है। यह सारे फाइन आर्ट्स का समागम है। म्यूजिक, पोएट्री, ड्रामा सब इसमें है।

आपकी फिल्में डार्क और इंटेंस होती हैं?

मुझे मानव मस्तिष्क में चल रही खुराफातें आकृष्ट करती हैं। ह्यूमन माइंड के डार्क साइड में जबरदस्त ड्रामा रहता है। हम सिनेमा में उसे दिखाने से बचते हैं। हम डील नहीं कर पाते। मुझे लगता है कि इस पर काम करना चाहिए। अगर मैकबेथ और ओथेलो चार सौ साल से पापुलर है तो उसकी अपील का असर समझ सकते हैं। यह लिटरेचर भी है। मैं कॉमेडी फिल्म बनाने की तैयारी कर चुका था। मिस्टर मेहता और मिसेज सिंह की स्क्रिप्ट तैयार थी, लेकिन वह फिल्म नहीं बन सकी।

बाहरी दुनिया से संपर्क रखने के लिए क्या करते हैं?

मुंबई से बाहर निकलता हूं। आम आदमी की तरह जीने की कोशिश करता हूं। टिकट की लाइन में लगता हूं। रेस्त्रां में बैठता हूं। मुंबई के सर्कल में सिर्फ फिल्मों की बातें होती हैं। बाहर निकलने पर आम लोगों से मिलता हूं तो अपनी खबर लगती है। पता चलता है कि क्या और कैसे हो रहा है? सूचना के ढेरों माध्यम हैं, लेकिन फ‌र्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस का कोई विकल्प नहीं है।

अजय ब्रह्मात्मज

Sunday, October 17, 2010

मैं अपनी इमेज को फन की तरह लेती हूं-मल्लिका सहरावत

-अजय ब्रह्मात्मज

करीब महीने भर पहले डबल धमालके लिए मल्लिका सहरावत लॉस एंजेल्स के लंबे प्रवास से लौटीं। वहां वह अपनी फिल्म हिस्सके पोस्ट प्रोडक्शन और हालीवुड स्टारों की संगत में समय बिता रही थीं। दूर देश में होने के बावजूद वह अपने भारतीय प्रशंसकों के संपर्क में रहीं। ट्विटर ने उनका काम आसान कर दिया था। करीब से उन पर नजर रखने वालों ने लिखा कि विदेश के लंबे प्रवास से लौटने पर एयरपोर्ट से ही मल्लिका की जबान बदल गई थी। उन्हें बीच में जीभ ऐंठकर अमेरिकी उच्चारण के साथ बोलते सुना गया था, लेकिन एयरपोर्ट पर टीवी इंटरव्यू देते समय फिर से उनकी खालिस बोली की खनक सुनाई पड़ी। सालों पहले अपने ख्वाबों को लेकर हरियाणा से निकली मल्लिका ने अपने सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे। वह अभी शीर्ष पर नहीं पहुंची हैं, लेकिन उनकी अदा और अंदाज का निरालापन उन्हें नजरअंदाज नहीं होने देता। झंकार से यह खास बातचीत डबल धमालके लोकेशन पर मुंबई के उपनगर कांदिवली के एक स्कूल के पास हुई। वह थोड़ी फुर्सत में थी और उन्होंने परिचित पत्रकारों को बुला रखा था। हमारी मुलाकात लगभग पांच सालों के बाद हो रही थी।

-पांच सालों का लंबा वक्त गुजर गया। बातचीत का सिलसिला कहां से शुरू करें?

0 आप जहां से हुकम करो...अच्छा पहले यह बताओ कि मैं दुबली दिख रही हूं क्या? आप इतने सालों के बाद मुझे देख रहे हो। बताओ कि कैसी लग रही हूं?

(किसी लडक़ी और वह भी अभिनेत्री के ऐसा पूछने पर आप अच्छी लग रही हैं के सिवा कोई जवाब दे सकते हैं क्या? मल्लिका ज्यादा स्लिम और सुघड़ हो गई हैं। अपनी देह का खास ध्यान रखती हैं वह ... मेरा जवाब होता है आप अच्छी लग रही हैं और खुशी है कि आप जीरो साइज के चक्कर में नहीं हैं)

मल्लिका - ना.. ना..उसमें तो जाना ही नहीं है। आप ने सुना ही होगा बोन आर फॉर डॉग्स - मैन लाइक मीट (वह अपनी ही बात पर खिलखिलाकर हंसने लगती हैं। मल्लिका का यह खास अंदाज है कि वह सामने बैठे व्यक्ति को अपनी खुशी में ले आती हैं।) आप देखें कि हिंदी फिल्मों में जीरो साइज हीरोइनें ज्यादा पापुलर नहीं रहीं। अपने यहां तो भरे-पूरे जिस्म की हीरोइनें पसंद की जाती हैं।

- अच्छी बात है कि आप लगातार एक्टिव हो। ट्विट से आप की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। अपने प्रशंसकों के साथ आपके रिश्ते में पर्देदारी नहीं दिखती। आप उनके हर तरह के सवालों के जवाब बेतकल्लुफ अंदाज में देती हैं... यह सब कैसे आरंभ हुआ?

0 जब मैं लॉस एंजेल्स गई तो सच बताऊं कि मुझे अपने देश, प्रशंसकों और प्रियजनों की बेहद याद आ रही थी। मुझे मेरे पब्लिसिस्ट ने सलाह दी कि आप ट्विटर अकाउंट खोलो और सभी से बात करो। मुझे बहुत खुशी हुई कि बगैर किसी मिडिएटर के मैंने अपने प्रशंसकों से सीधे बात कर सकती हूं। उनके सवालों के जवाब दे सकती हूं। मुझे मजा आने लगा कि 140 कैरेक्टर में अपनी जवाब दे सकती हूं। ट्विट पर मैंने पोस्ट, वीडियो और अपनी तस्वीरें भी डालीं।

- एक दिन आप अपने अकाउंट से दुनिया भर के प्रशंसकों को उनकी भाषा में जवाब दे रही थीं और फिर बाद में बता भी दिया कि ट्रांसलिट्रेशन की मदद से आप यह कर रही थीं। मुझे लगता है कि आप की साफगोई प्रशंसकों को पसंद आई होगी?

- बिलकुल। पहले तो वे चौंके और जब मैंने सच बताया तो बहुत खुश हुए। आप जानते हो कि मैं अपने इरादों और बातों में हमेशा ईमानदार रही हूं। आगे भी ऐसी ही रहूंगी।

- चर्चा थी कि मल्लिका अब भारत लौट कर नहीं आएंगी? मुंबई के बाद अब उनका पड़ाव हालीवुड ही रहेगा...

0 मैं वापस आ गई हूं,यही बहुत बड़ा जवाब है। यह इंडस्ट्री मेरा घर है। यहां के लोग मेरे दर्शक हैं। मैं एक एक्टर हूं तो मुझे हालीवुड, स्पेन, कोरिया जहां से भी फिल्म मिलेगी, मैं वहां जाकर फिल्में करूंगी। मुझे हालीवुड की स्क्रिप्ट मिली लव बराक’ ... उसके लिए मैं वहां गई। मैं कान फिल्म फेस्टिवल गई। फिर लौट कर आ गई। फिर से कोई फिल्म मिलेगी तो भविष्य में भी जाऊंगी। वहां जाने और रहने का मतलब यह नहीं है कि मैं वहां बस जाऊंगी।

- लॉस एंजेल्स का एक्सपीरिएंस कैसा रहा? आप वहां हिस्सका भी कुछ काम करती रहीं?

0 बहुत अच्छा एक्सपीरिएंस रहा। हिस्सका डायरेक्शन हालीवुड के डायरेक्टर ने किया है। अगर मैं हिस्सके यूनिक पाइंट की बात करूं तो सबसे पहले यही कहूंगी कि वह पूरी तरह से हिंदी फिल्म है। इच्छाधारी नागिन की फिल्म है। बनाई है जेनिफर लिंच ने...लेकिन उन्होंने इसे देसी फिल्म की तरह बनाया है। यह फुल ऑन देसी फिल्म है, जिसमें मैं इच्छाधारी नागिन का किरदार निभा रही हूं। ख्वाहिशमें मैंने 17 किस दिए थे, लेकिन वहां एक इंसान था मेरे साथ। इस फिल्म में तो मेरे साथ नाग है। वह मेरे लिए चैलेंजिंग था। लिंच का कहना था कि तुम नागिन का किरदार निभा रही हो...बी पैशनेट एंड सेक्सी। नकली नाग के साथ सेक्सी कैसे हो सकती थी?

- वैसे आप इच्छाधारी तो हैं,जो चाहती हैं पूरा कर लेती हैं। आप इच्छाधारी नागिन से कम हैं क्या?

0 क्या बात करते हैं? मैंने अपनी इच्छाओं के साथ मेहनत भी की है। अपने देश में इच्छाधारी नागिन का पापुलर मिथ है। पिछले 24 सालों से इस विषय पर कोई फिल्म नहीं आई है। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान मुझे पता चला कि साउथ में इच्छाधारी नागिन के मंदिर हैं, जहां औरतें संतान के वरदान के लिए जाती हैं। मैंने नागों के बारे में डिटेल में पढ़ा।

- आप यकीन करती हैं ऐसे मिथ पर ...

0 मुझे नहीं मालूम कि इच्छाधारी नागिन होती है कि नहीं? और वे बदला लेती है क्या...इस फिल्म में मैं तो बदला लेती हूं और मेरे शिकार अपनी जान के लिए प्रार्थना करते हैं।

- इच्छाधारी नागिन ही बदला लेती है या मल्लिका भी...

0 दोनों...मजाक की बात छोड़ें तो एक एक्टर के लिए नागिन का रोल निभाना। कैमरे के आगे नागिन में तब्दील होना। ऐसा अवसर मुश्किल से मिलता है। मुझे भट्ट साहब की हिदायत याद आती है... वे कहते थे ...बाद में पछताओगी और तरस जाओगी ऐसे रोल के लिए। अपने किरदारों को खुद में सोख लो। केरल में कीचड़ में शूटिंग करते समय बदन पर जोंक और कीड़ों को रेंगते देख कर लगता था कि कहां फंस गई, लेकिन अब पर्दे पर देखती हूं तो संतोष होता है।

- कितना मुश्किल रहा नागिन में बदलना?

0 बहुत मुश्किल प्रोसेस था। तीन घंटों में मुझे नागिन में ढाला जाता था। फिर मैं चल नहीं सकती थी। सेट पर मुझे वे उठा कर ले जाते थे। खाना-पीना भी छोड़ देती थी, क्योंकि मैं बाथरूम भी नहीं जा सकती थी। ऊपर से जेनिफर कहती थी कि ग्लैमरस और सेक्सी दिखो। आप बताएं, पेट में दाना न हो तो कोई सेक्सी कैसे दिखेगा? फिर भी मैंने कोशिश की।

- कितने दिनों के बाद आप लौटी हैं? कैसा स्वागत हुआ आपका?

0 एक ही साल तो लगातार बाहर रही। मुंबई लौटी तो एयरपोर्ट पर पूरा मीडिया मौजूद था। मेरा भाई विक्रम मुझे लेने आया था। दिल भर आया। इतना प्यार और अपनापन दिखाया लोगों ने। उस दिन मैंने महसूस किया कि मेरे प्रशंसकों का जूता भी सिर-आंखों पर। वे मेरी दुनिया हैं। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं।

- और इंडस्ट्री का रवैया? क्या कह सकता हूं कि आप जितने दिन बारह रहीं, उतने दिन इंडस्ट्री ने इंतजार किया?

0 कोई किसी का इंतजार नहीं करता, पर एक बात कहूंगी कि इंडस्ट्री मेरे प्रति बहुत जेनेरस रही। आते ही डबल धमालकी शूटिंग शुरू हो गई। अभी तो दुनिया ग्लोबल विलेज हो गई है। फेसबुक और ट्विटर ने सभी से जोड़ रखा है। आप अभी न्यूयॉर्क में हो और कल मुंबई में हो। मेरे दो घर हो गए हैं - मुंबई और लॉस एंजेल्स।

- हालीवुड में क्या रवैया रहा आपके प्रति? वहां की फिल्म कब रिलीज हो रही है?

0 उनका भी रवैया बहुत अच्छा रहा। हालीवुड की फिल्म अगले साल रिलीज होगी। अभी पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा है। उसका भारतीय टायटल लव बराकहोगा। हालीवुड में पालिटिक्स ऑफ लवनाम से वह रिलीज होगी। उसका रफ ट्रेलर सभी ने देखा होगा। बिल क्लिंटन से हुई मुलाकात में मैंने उन्हें इस फिल्म के बारे में बताया तो वे खुश हुए कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के बीच कोई रोमांटिक कामेडी बन रही है। उन्होंने खैर मनाया कि यह सीरियस फिल्म नहीं है। उन्होंने फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की है।

- ‘पालिटिक्स ऑफ लवतो आप पर्दे पर करेंगी, लेकिन जीवन में चल रहे पॉलिटिक्स ऑफ फेम के बारे में क्या कहेंगी?

0 यह तो आज है, कल नहीं है। मैं इसे सीरियसली नहीं लेती। अपने एक्टर होने को मैं एंज्वॉय करती हूं। किसे मालूम कि कल क्या होगा? मेरे लिए हिस्सएक बड़ा एक्सपीरिएंस है। मैं चाहूंगी कि ऐसी फिल्में करती रहूं।

- ‘हिस्सके आगे-पीछे आप ज्यादातर कामेडी फिल्में कर रही हैं। आप की जैसी इमेज बन चुकी है, उस से मिजाज में ये फिल्में थोड़ी अलग हैं?

0 सबसे पहले तो आप ये बताएं कि मेरी क्या इमेज है?

- आप एक सेक्सी इमेज की एक्ट्रेस हो, जो रियल लाइफ में काफी बिंदास और इंडपेंडेट मिजाज की है।

0 वो तो मैं हूं। लेकिन आप बताएं कि मर्डरअश्लील फिल्म थी क्या? और अगर थी तो 2004 की बड़ी हिट कैसे हो गई?

- आप की रियल पर्सनैलिटी और इमेज में थोड़ा फर्क है, लेकिन बड़े चालाक तरीके से आप अपनी इमेज को मेंटेन करती हैं। आप के ट्विट हों या बातें... उनमें एक खुलापन और बिंदासपन है, जो कई बार प्रशंसकों और दर्शकों की संतुष्टि के लिए लिखा-कहा लगता है...

0 चालाक तरीके से... आप का यह इंटरपटेशन मुझे अच्छा लगा। प्रशंसकों को जो बातें पसंद हैं, वैसी ही बातें करती हूं। मुझे किसी भी सवाल का जवाब देने में कोई हिचक नहीं होती, लेकिन ऐसा न समझें कि मैं अपने प्रशंसकों को उत्तेजित करने के लिए वैसा कुछ लिखती हूं। मैं वैसे ही सोचती हूं और मुझे सेक्स की बातें करने में कोई झिझक नहीं होती। मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक भी मेरे जवाब से संतुष्ट रहते हैं। सारी समस्या है कि मीडिया ने मुझे खास ढंग से प्रोजेक्ट किया। वे उसे बढ़ाते और बताते रहते हैं। सेक्सी होना तो मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। मैं और भी कुछ हूं। फिर भी मीडिया के इस अटेंशन से मुझे दिक्कत नहीं होती। 2005 में मैं जैकी चान के साथ कान फिल्म फेस्टिवल गई थी तो स्वाभाविक रूप से मीडिया ने ज्यादा ध्यान दिया था। मैं अपनी इमेज को फन की तरह लेती हूं। मैं पूरा एंज्वॉय करती हूं। मैं उसके साथ प्ले करती हूं। मर्लिन मुनरो, मधुबाला और माधुरी दीक्षित की सेक्सी इमेज रही। मैं गर्ल नेक्स्ट डोर नहीं हूं। दर्शकों को गर्ल नेक्स्ट डोर ही चाहिए तो वे थिएटर न आएं ...पड़ोस की लडक़ी को ही देखें।

- अपनी सोसायटी में अभी तक सेक्सुयैलिटी को स्वीकार नहीं किया गया है। वात्सयायन और कामसूत्र के देश में अंग्रेजों के साथ आईं विक्टोरियन धारणाएं ही प्रचलित हैं, इसलिए आप की बातें मीडिया और प्रशंसकों को चौंकाती हैं ...शरीर को देखने का हमारा नजरिया संर्कीण कहा जाएगा क्या?

0 यह तो मीडिया और समाज तय करे। मैंने मर्डरमें स्विम शूट पहना था तो बवाल हो गया था, लेकिन उसके बाद तो हीरोइनों ने लाइन लगा दी। क्या-क्या नहीं पहना हीरोइनों ने...और यह शरीर? यह तो आप पुरूषों की वजह से अश्लील मान लिया गया है।

- अगर मैं पूछूं कि पश्चिमी पुरुष से भारतीय पुरुष कितने भिन्न हैं तो क्या जवाब होगा आप का?

0 हाथ मिलाने से लेकर किस करने और हग करने तक में फर्क है। वहां एक खुलापन है। अपने यहां लिहाज और शर्म है, लेकिन अपने देश का यूथ बदल चुका है। पश्चिमी प्रभाव माने या उसका एक्सप्रोजर कहें ...वह नए एक्सपीरिएंसेज के लिए तैयार है।

- क्या दर्शक बदल रहे हैं?

0 ‘मर्डरके समय कितना विवाद हुआ था, लेकिन आप ने इश्कियाको स्वीकार कर लिया। वह तो खुले आम फ्लर्ट करती है। उसके सामने मर्डरका मेरा किरदार फीका लगता है। अभी लोगों की मोरैलिटी बदल रही है। बड़े शहरों में लडक़े-लड़कियों के विचार बदल रहे हैं। मुझे लड़कियों के पत्र आते हैं - मल्लिका यू शोन द वे। मुझे ऐसा लगता है कि एक हिंदुस्तान में कई हिंदुस्तान बसते हैं और एक आदमी के अंदर कई आदमी रहते हैं। और इन सारी बातों से क्या फर्क पड़ता है? अगर वे मेरी फिल्में देख रहे हैं तो सब ठीक है। आखिरकार यह शो बिजनेश है।

- लेकिन मल्लिका का सफर लोगों को प्रेरित करता है। आप की कामयाबी और करतूत हम लिखते हैं तो उसका एक असर होता है़...ऐसे में आप खुद को कितना जिम्मेदार महसूस करती हैं?

0 मुझे लगता है कि हिंदी अखबारों का ज्यादा असर होता है। मेरा उन पाठकों से एक कनेक्शन भी बनता है। मुझे लगता है कि वे मुझे अपने इलाके का और अपनी पहुंच में पाते हैं। गौर करें तो हम सभी दुविधा और पाखंड में जीते हैं। दुविधा से तो आप निकल सकते हैं। पाखंड से नहीं निकल सकते। हमारा समाज पाखंडी रहा है। ख्वाहिशऔर मर्डरके समय से मैं यह महसूस कर रही हूं। आप ने सही कहा कि मेरा सफर लंबा रहा है। मैं तो यही कहूंगी कि अपनी लड़ाई होशियारी से चुनें, क्योंकि प्रतिभा आप के चुनाव पर निर्भर करती है। भट्ट साहब ने बहुत पहले इसका एहसास करवाया था...

- थोड़ा स्पष्ट करें, क्योंकि यह छोटे शहरों की महत्वाकांक्षी लड़कियों के लिए महत्वपूर्ण है?

0 अपने निजी अनुभव से मैं यह जानती हूं कि लड़कियों को करिअर बनाने के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाता। हमेशा लड़कियों को कहा जाता है कि तुम बड़ी हो गई, शादी करो, बच्चे पैदा करो और घर बसाओ। मुझे लगता है कि हमें अपनी जमीन तलाश कर लेनी चाहिए और उस पर टिके रहना चाहिए। अपने बड़ों और परिवार को कभी शर्मिंदा न होने दें। आज कल के बच्चे बहुत समझदार हैं। वे माता-पिता को ठेस नहीं पहुंचा सकते, लेकिन माता-पिता भी बच्चों को समझें। लड़कियां ईमानदार और तेज हो गई हैं। अपने समाज को देखते हुए ही व्यवहार करें।

- कई बार करिअर के चुनाव में परिवार आड़े आ जाता है। फिर क्या करें? आप के भी करिअर में ऐसी मुश्किलें आई थीं...

0 हां, मुझे तो बहुत दिक्कत हुई थी मेरे पिता ने मुझे आज तक माफ नहीं किया। फिल्मों में मेरी एंट्री को वे स्वीकार नहीं सके। मैं उन्हें मिस करती हूं। मुझे परिवार का पूरा समर्थन और प्यार नहीं मिला। उसकी कमी महसूस होती है। मेरा भाई हमेशा मेरे साथ रहा। लेकिन अभी फर्क आ गया है। छोटे शहरों के पैरेंट्स भी समझने लगे हैं। बेहतर होता है कि परिवार के समर्थन से ख्वाब बुनें।

- आप के भाई हिस्सके निर्माता हैं...

0 हां, उसने बहुत बड़ा रिस्क लिया है। यह मैं तेरी नागिन...टाइप की फिल्म नहीं है। वक्त काफी आगे बढ़ गया है। वीएफएक्स का इस्तेमाल किया गया है। मैं फिल्म में जिंदा इंसान को निगल जाती हूं। यह कोई आसान काम है। सात इंसानों को निगल जाती हूं।

- अचानक डबल धमालका इरादा कैसे हो गया?

0 मुझे लगा कि वेलकमके बाद डबल धमालही किया जा सकता है। इस बीच कुछ और किया नहीं है। हिस्सथ्रिलर है। उसके बाद कामेडी का तडक़ा ठीक रहेगा।

- और क्या बताना चाहोगे आप?

0 आप बताओ कि आप क्या जानना चाहते हो? चलो मैं एक सवाल पूछती हूं कि मीडिया क्यों मुझे हमेशा सेक्सी इमेज में पेश करती है। मेरे पास और भी चीजें हैं। सेक्स तो एक पहलू है।

- वह इसलिए कि बाकी एक्ट्रेस न तो तस्वीर से और न बातों से सेक्सी इमेज बनाने के काम आ पाती हैं। तस्वीरें खिंचवा भी लें तो उनकी बातों में खुलापन नहीं रहता। मल्लिका इस मायने में सब के काम आ जाती है

0 बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। तो आप मान रहे हो कि मैं सबसे अलग हूं। शुरू से ही मेरा ऐसा माइंडसेट रहा। भट्ट साहब ने उसे मजबूत किया। अगर सभी लेफ्ट जा रहे होंगे तो मैं राइट जाऊंगी। और ऐसा करते हुए भी मैं उसमें डूबती नहीं हूं। मैं इसमें पर्सनली शामिल नहीं हूं। मेरे लिए यह गेम है। लाइफ इज टू बी एंटरटेंड एंड एंटरटेन। मैं अपने प्रशंसकों को ट्विटर पर साफ बताती हूं कि आप सारी चीजें सीरियसली मत लो। आप बताओ कि हालीवुड के लॉस एंजेल्स के सिटी हाल में मेरा सम्मान हुआ। वहां के कौंसिल मेंबर और मेयर ने मेरा सम्मान किया। यह सब मुझे रिच करता है।

- लेकिन इस ग्लैमर, सम्मान और नाम में मल्लिका खो तो नहीं गई? हरियाणा की वह किशोर लडक़ी, जिसकी आंखों में सपने चमकते थे ...

0 बिल्कुल नहीं। मेरी नाक भले ही आसमान में हो, मेरे पैर जमीन पर ही हैं। बहुत अच्छा समय चल रहा है। अभी हिस्सआ रही है। हिंदी फिल्म को एक हालीवुड डायरेक्टर ने डायरेक्ट किया है। इसमें होली, नागिन और सारे अपने मसाले हैं।

- कहते हैं कि एक्टर ऑफ स्क्रीन और ऑन स्क्रीन परफॉर्म ही करता रहता है। इसमें उसका सेल्फ और रियल इमोशन खो जाता है...

0 यह सच है। हर वक्त परफार्मेंस चलता रहता है,लेकिन उनके बीच भी मल्लिका रहती है। जब किसी ग्लोबल आइकॉन से मिलती हूं और वे मुझे रिकॉगनाइज करते हैं तो बहुत खुशी होती है। मेरे लिए वे खास क्षण होते हैं। मेरी आंखों में फिर से सारे सपने तैरने लगते हैं। कुछ तो है कि मुझ से मिलने वाले ही स्टार स्ट्रक हो जाते हैं। यह सच है। मैं तो ट्रेंड सेटर रहा हूं।

- किन लोगों की मदद मिलती है आप को ...

0 लॉस एंजेल्स में जैकी चान के स्टाफ से काफी मदद मिली। मेरे साथ भट्ट साहब का आर्शीवाद रहता है और ऑफ कोर्स मेरा भाई विक्रम... इन सभी की मदद से मैं आगे बढ़ती रहती हूं। मैं भट्ट साहब को बहुत मिस करती हूं।

- कुछ और कर रहे हो आप?

0 पुनर्जन्म पर एक हिंदी फिल्म है, लेकिन अभी उसके बारे में नहीं बता सकती। ऑफर तो आते ही रहते हैं। मैं फिल्मों में दीवार पर सजे फूल की तरह नहीं आना चाहती। मैंने कुछ गलत फिल्में भी की हैं, लेकिन उनसे सीखा है। सभी ऐसे फैसलों से गुजरते हैं। फ्लॉप भी जरूरी हैं। उनसे आप जमीन पर आ जाते हैं।

- हिस्समें आप के साथ इरफान खान हैं। वे बहुत संजीदा अभिनेता माने जाते हैं। आपका कैसा अनुभव रहा?

0 इरफान के साथ सेट पर रहने से ही आप बहुत कुछ सीख सकते हैंं। वे काफी मदद करते हैं। वे विदेशों में अच्छा कर रहे हैं। उनकी खास पहचान है क्या? उनकी वजह से फिल्म के इंटरनेशनल मार्केट में खरीदार मिले। लिंच से भी मदद मिली।

- पश्चिम और भारत के अनुभवों के बाद बेस्ट क्या है आपके लिए?

0 मैं तो दोनों जगह से बेस्ट चुनूंगी। भारत की गर्मजोशी साथ रखूंगी। पश्चिम का प्रोफेशनलिज्म हमें सीखना चाहिए। हमारी मेहमानवाजी कहीं और नहीं है। वहां शूटिंग करते समय भारतीय मेरे लिए खाना लाते थे तो पश्चिम की यूनिट के लोग चौंकते थे कि तुम कैसे किसी का भी लाया खाना खा सकते हो? तुम्हें डर नहीं लगता। पश्चिम के लोग प्रशंसकों के प्यार को नहीं समझ पाते। भला मेरा प्रशंसक मुझे नुकसान पहुंचाएगा?

Monday, January 18, 2010

लाखों-करोड़ों लोगों के लिए काम करता हूं: सलमान खान


फिल्म के विज्ञापन और तस्वीरों से दर्शकों के बीच उत्साह बनता दिख रहा है। वीर में क्या जादू बिखेरने जा रहे हैं आप?

मुझे देखना है कि दर्शक क्या जादू देखते हैं। एक्टर के तौर पर अपनी हर फिल्म में मैं बेस्ट शॉट देने की कोशिश करता हूं। कई बार यह उल्टा पड़ जाता है। दर्शक फिल्म ही रिजेक्ट कर देते हैं।

वीर जैसी फिल्म करने का इरादा कैसे हो ्रगया? पीरियड फिल्म का खयाल क्यों और कैसे आया? और आप ने क्या सावधानियां बरतीं?

यहां की पीरियड फिल्में देखते समय अक्सर मैं थिएटर में सो गया। ऐसा लगता है कि पिक्चर जिस जमाने के बारे में है, उसी जमाने में रिलीज होनी चाहिए थी। डायरेक्टर फिल्म को सीरियस कर देते हैं। ऐसा ल्रगता है कि उन दिनों कोई हंसता नहीं था। सोसायटी में ह्यूमर नहीं था। लंबे सीन और डायलाग होते थे। मल्लिका-ए-हिंद पधार रही हैं और फिर उनके पधारने में सीन निकल जाता था। इस फिल्म से वह सब निकाल दिया है। म्यूजिक भी ऐसा रखा है कि आज सुन सकते हैं। पीरियड फिल्मों की लंबाई दुखदायक होती है। तीन,साढ़े तीन और चार घंटे लंबाई रहती थी। उन दिनों 18-20 रील की फिल्मों को भी लोग कम समझते थे। अब वह जमाना चला गया है। इंटरेस्ट रहने तक की लेंग्थ लेकर चलें तो फिल्म अच्छी लगेगी। आप सेट और सीन के लालच में न आएं। यह फिल्म हाईपाइंट से हाईपाइंट तक चलती है। इस फिल्म के डायलाग भी ऐसे रखे गए हैं कि सबकी समझ में आए। यह इमोशनल फिल्म है। एक्शन है। ड्रामा है।

इस फिल्म के निर्माण में आपने अनिल शर्मा से कितनी मदद ली है?

अनिल शर्मा ने इस फिल्म को अकल्पनीय बना दिया है। दूसरा कोई डायरेक्टर ऐसी कल्पना नहीं कर सकता था। इस फिल्म के सीन करते हुए मुझे हमेशा ल्रगता रहा कि मैं उन्नीसवीं सदी में ही पैदा हुआ था। कास्ट्यूम और माहौल से यह एहसास हुआ। वह जरूरी भी था। हमें दर्शकों को उन्नीसवीं सदी में ले जाना था। फिल्म देखते हुए पीरियड का पता चलना चाहिए ना?

आपकी आंखों में हमेशा एक जिज्ञासा दिखती है। ऐसा लगता है कि आप हर आदमी को परख रहे होते हैं। क्या सचमुच ऐसा है?

वास्तव में मैं खुद में मगन रहता हूं। ऐसा लग सकता है कि मैं आप को घूर या परख रहा हूं, लेकिन माफ करें ़ ़ ़वह मेरे देखने का अंदाज है। मैं क्या लो्रगों को परखू्रंगा? आप लोग मुझे तौलते-परखते हैं और फिर लिखते हैं।

अभी हम लोग जिस आटो रिक्शा से आ रहे थे, उसके ड्रायवर ने आप का नाम सुनने पर कहा कि सलमान सच्ची में स्टार हैं। हमने कारण पूछा तो उसने कहा कि सलमान ्रगरीबों की मदद करते हैं ़ ़ ़ क्या आप अपनी इस इमेज से परिचित हैं?

मैं जितना करना चाहता हूं या मुझे करना चाहिए ़ ़ ़ वह अभी तक नहीं हो पाया है। मैं कोशिश कर रहा हूं। अपने सोचे हुए मुकाम के आसपास भी अभी नहीं पहुंचा हूं। मैं बीइंग ह्यूमन को डिफर्रेट लेवल पर ले जाना चाहता हूं। वह मुझ से अकेले नहीं हो्रगा। मुझे सबकी मदद चाहिए।

आप का नाम है। शोहरत, इज्जत, फिल्में सब कुछ हासिल कर लिया है आप ने? अब किस वजह से आप कुछ करना चाहते हैं। और क्या हासिल करना है?

काम नहीं करेंगे तो घर में बैठ कर क्या करेंगे? हमारे प्रोफेशन में कोई एक्टर सिर्फ अपने लिए काम नहीं करता। वह लाखों-करोड़ों लो्रगों के लिए काम करता है। अगर एक महीना मैं शूटि्रंग न करूं तो लाइटब्वाय, स्पाटब्वाय, फाइटर, डांसर, कैमरा, एक्जीबिटर्स, डिस्टीब्यूटर्स, लैब, एडिटर और न जाने कितने लो्रगों का काम रूक जाए्रगा। उसके बाद थिएटर हैं। आम दर्शक हैं। दर्शकों को मनोरंजन मिलना चाहिए ना? हम काम नहीं करेंगे तो कारोबार कैसे चलेगा?

पिछले दिनों आपने चुनाव प्रचार में भी नेताओं की मदद की। क्या खुद को देश के प्रति जिम्मेदार मानते हैं?

बार-बार मैं सुनता हूं कि लोग सरकार को दोष देते हैं। मेरा सवाल है कि आप अपना काम करते हो कि नहीं? वोट डालते हो कि नहीं? जब तक आप वोट नहीं दोगे, तब तक कैसे अच्छी सरकार की उम्मीद कर सकते हो। और फिर तालीम की बात करें तो 15 साल की तालीम सभी को मिलनी चाहिए। अगर हर बच्चा दसवीं तक भी पढ़ ले तो बेकारी से निकल जाएगा। स्कूल जाने और किताबें पढ़ने से फायदा होता है। बचपन से किसी धंधे में लग जाओगे तो खाक तरक्की करोगे। पढ़ो और फिर काम के बारे में सोचो। इसके अलावा मुझे लगता है कि इंटर रेलिजन शादियां होनी चाहिए। अगर यह टे्रंड चल गया तो सारे दंगे-फसाद थम जाएंगे।

आप की वीर एक खास समुदाय पर है। पिंडारियों को लुटेरा कौम माना जाता रहा है। आप उस कौम के हीरो को वीर के रूप में पर्दे पर पेश कर रहे हैं ़ ़ ़ इस तरफ ध्यान कैसे गया?

पिंडारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ खुद को एकजुट किया था। वे मूल रूप से किसान थे। जब उन्हें लूट लिया गया तो वे भी लूटमार पर आ गए, लेकिन उनका मकसद था आजादी । आजादी की चि्रंगारी उन्होंने लगायी थी। मैंने एक फिल्म देखी थी बचपन में ़ ़ ़ उस से प्रेरित होकर मैंने पिंडारियों पर इसे आधारित किया। भारत का इतिहास अंग्रेजों ने लिखा, इसलिए अपनी खिलाफत करने वाली कौम को उन्होंने ठग और लुटेरा बता दिया। इस फिल्म में हमलोगों ने बताया है कि पिंडारी क्या थे?

आपने पिता जी की मदद ली कि नहीं? आप दोनों ने कभी साथ में काम किया है क्या?

उन्होंने मेरी एक फिल्म लिखी थी पत्थर के फूल। उसके बाद उन्होंने लिखना ही बंद कर दिया। वे मेरे पिता हैं तो उनकी मदद लेना लाजिमी है। किसी भी फिल्म में कहीं फंस जाते हैं तो उनकी मदद लेते हैं। और वे तुरंत सलाह देते हैं।

इस फिल्म के लिए अलग से मेहनत करनी पड़ी क्या?

पहले मैंने बाडी पर काम शुरू किया। फिर पता चला कि उस समय लो्रग सिक्स पैक नहीं बनाते थे। वे हट्टे-कट्टे रहते थे। उनकी टा्रंगों और जंघाओं में भी दम रहता था। इसके बाद देसी एक्सरसाइज आरंभ किया। माडर्न तरीके में लो्रग धड़ से नीचे का खयाल नहीं रखते। ऐसा ल्रगता है कि माचिस की तीलियों पर बाडी रख दी गयी हो। मुझे मजबूत व्यक्ति दिखना था।

अभी फिल्मों के प्रोमोशन पर स्टार पूरा ध्यान देने लगे हैं। अब तो आप भी मीडिया से खूब बातें करते हैं?

करना पड़ता है। आप के लिए तो एक इंटरव्यू है। लेकिन मुझे अभी पचास इंटरव्यू देने हैं। फिर भी पता चले्रगा कि कोई छूट गया। पहले का समय अच्छा था कि ट्रेलर चलता था। फिल्मों के पोस्टर ल्रगते थे और दर्शक थिएटर आ जाते थे। अभी तो दर्शकों को बार-बार बताना पड़ता है कि भाई मेरी फिल्म आ रही है। पहले थोड़ा रिलैक्स रहता था। कभी मूड नहीं किया तो काम पर नहीं गए। अभी ऐसा सोच ही नहीं सकते। प्रोमोशन, ध्यान, मेहनत सभी चीज का लेवल बढ़ गया है।


Sunday, August 2, 2009

हिन्दी फिल्मों में मौके मिल रहे हैं-आर माधवन


-अजय ब्रह्मात्मज


आर माधवन का ज्यादातर समय इन दिनों मुंबई में गुजरता है। चेन्नई जाने और दक्षिण की फिल्मों में सफल होने के बावजूद उन्होंने मुंबई में अपना ठिकाना बनाए रखा। अगर रहना है तेरे दिल में कामयाब हो गयी रहती, तो बीच का समय कुछ अलग ढंग से गुजरा होता। बहरहाल, रंग दे बसंती के बाद आर माधवन ने मुंबई में सक्रियता बढ़ा दी है। फोटोग्राफर अतुल कसबेकर के स्टूडियो में आर माधवन से बातचीत हुई।


आपकी नयी फिल्म सिकंदर आ रही है। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में क्या खास है?
सिकंदर दो बच्चों की कहानी है। कश्मीर के हालात से हम सभी वाकिफ हैं। वहां बच्चों के साथ जो हो रहा है, जिस तरीके से उनकी मासूमियत छिन रही है। इन सारी चीजों को थ्रिलर फार्मेट में पेश किया गया है। वहां जो वास्तविक स्थिति है, उसका नमूना आप इस फिल्म में देख सकेंगे।
क्या इसमें आतंकवाद का भी उल्लेख है?
हां, यह फिल्म आतंकवाद की पृष्ठभूमि में है। आतंकवाद से कैसे लोगों की जिंदगी तबाह हो रही है, लेकिन लंबे समय सेआतंकवाद के साए में जीने के कारण यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। उन्हें ऐसी आदत हो गयी है कि लाश, हत्या या हादसे देख कर भी वे उत्तेजित नहीं होते। वे इन घटनाक्रमों को देखने के आदी हो गए हैं।
कहा जा रहा है कि आर माधवन ने इधर हिंदी फिल्मों की तरफ ध्यान दिया है?
इधर छोटी फिल्में बन रही हैं और सफल भी हो रही हैं, तो मुझे मौके मिल रहे हैं। सच कहूं तो इधर अच्छी कहानियां मिल रही हैं। कहानियों पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। नए किरदार गढ़े जाने लगे हैं। इसलिए एक्टरों को काम मिलने लगे हैं। सोलो हीरो फिल्मों की उम्मीद मैं नहीं कर सकता। अब हिंदी फिल्मों में मेरे लिए गुंजाइश बनी है।
आपकी दिलचस्पी क्यों बढ़ी है?
यकीन करें कि कहानियां मुझे खींचती हैं। मैं चाहूं तो आराम से चेन्नई में बैठा चार फिल्में कर सकता हूं। दो एक्शन और दो रोमांटिक कामेडी करते हुए जिंदगी गुजार दूंगा, लेकिन तब एक्सपेरिमेंट करने का मौका नहीं मिलेगा। मेरी दुकान दोनों जगह खुली है, तो उस लिहाज से मुझे डबल मौके मिल जाते हैं।
किस तरह की फिल्मों पर ध्यान दे रहे हैं?
मैं विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभा रहा हूं। गुरु, मुंबई मेरी जान और 13बी तीनों अलग किस्म की फिल्में थीं। अभी आमिर खान के साथ थ्री इडियट्स की शूटिंग कर रहा हूं। सिकंदर रिलीज हो रही है। लिविंग लिजेंड अमिताभ बच्चन के साथ तीन पत्ती करते हुए नए अनुभव हुए। मेरी जिंदगी का यह खूबसूरत मोड़ है।
पुरानी कहावत है कि दो नावों पर सवार व्यक्ति की यात्रा मुश्किल होती है?
जी, मैं सहमत हूं। मेरी मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। मुझसे बार-बार पूछा जाता है कि मैं मुंबई का हूं या चेन्नई का? मैं यह नहीं भूल सकता कि चेन्नई में मैं स्टार बना तो वहां की फिल्में करता रहूंगा। अभी हिंदी फिल्मों में मौकेमिल रहे हैं तो इसे भी नहीं छोड़ूंगा। मुझे फायदे भी हो रहे हैं।
ऐसा लगता है कि आपके मन में कोई कसक है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि आप किसी के सामने साबित करना चाह रहे हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों में पहचान की ख्वाहिश अभी तक जिंदा है?
फिल्म इंडस्ट्री में वही चलता है,जिसे दर्शक पसंद करते हैं। स्पोर्ट्स या दूसरे कुछ क्षेत्रों में आपका परफार्मेस अच्छा है, तो आप स्कोर कर सकते हैं, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में तो दर्शक ही स्कोर देते हैं। दर्शक ही आपको विजेता घोषित करता है।
अभी किस तरह की चुनौतियां महसूस करते हैं?
अपने यहां धारणाएं बना दी गयी हैं और उन्हें इमेज से जोड़ दिया गया है। माना जाता है कि टीवी एक्टर फिल्मों के हीरो नहीं बन सकते। कहा जाता है कि साउथ के स्टार हिन्दी फिल्मों में कामयाब नहीं हो सकते। इस तरह से हमारी क्रिएटिविटी रोकी जाती है। अब जैसे मुझे हिंदी फिल्मों में दक्षिण के कैरेक्टर दिए जाते हैं, मैं तो साफ मना कर देता हूं। मैं ऐसी धारणाओं का उदाहरण नहीं बनना चाहता।

Wednesday, July 22, 2009

इमरान खान से बातचीत

-अजय ब्रह्मात्मज
साल भर के स्टार हो गए हैं इमरान खान। उनकी फिल्म जाने तू या जाने ना पिछले साल 4 जुलाई को रिलीज हुई थी। संयोग से इमरान से यह बातचीत 4 जुलाई को ही हुई। उनसे उनकी ताजा फिल्म लक, स्टारडम और बाकी अनुभवों पर बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके अंश..
आपकी फिल्म लक आ रही है। खुद को कितना लकी मानते हैं आप?
तकनीकी रूप से बात करूं, तो मैं लक में यकीन नहीं करता। ऐसी कोई चीज नहीं होती है। तर्क के आधार पर इसे साबित नहीं किया जा सकता। मैं अपनी छोटी जिंदगी को पलटकर देखता हूं, तो पाता हूं कि मेरे साथ हमेशा अच्छा ही होता रहा है। आज सुबह ही मैं एक इंटरव्यू के लिए जा रहा था। जुहू गली से क्रॉस करते समय मेरी गाड़ी से दस फीट आगे एक टहनी गिरी। वह टहनी मेरी गाड़ी पर भी गिर सकती थी। इसी तरह पहले रेल और अब फ्लाइट नहीं छूटती है। मैं लेट भी रहूं, तो मिल जाती है। शायद यही लक है, लेकिन मेरा दिमाग कहता है कि लक जैसी कोई चीज होती ही नहीं है।
क्या हमारी सोच में ही लक और भाग्य पर भरोसा करने की बात शामिल है?
हमलोग आध्यात्मिक किस्म के हैं। हो सकता है उसी वजह से ऐसा हो, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री की बात करें, तो यहां इतना पैसा लगता है, मेहनत लगती है और उसके बाद भी फिल्म नहीं चलती, तो हम भाग्य को कोसकर संतोष कर लेते हैं। कामयाबी पर तो हर व्यक्ति का दावा होता है। असफलता किस्मत से जोड़ दी जाती है।
फिर क्या लक जैसी कोई चीज होती है?
जो यकीन करते हैं, उनके लिए होगी। मैं नहीं मानता कि भाग्य से मेरे करियर में कोई बदलाव आएगा। उसके लिए मुझे मेहनत करनी ही होगी।
आपने दीवाली पर ताश खेला होगा या फिर कैसिनो में दांव लगाए होंगे? कितने लकी रहे आप?
अगर जीतने से लक को जोड़ेंगे, तो मैं अनलकी हूं। वैसे भी मुझे ताश और कैसिनो आदि का शौक नहीं है। मैं दांव नहीं लगाता। मैंने कभी लाटरी का टिकट भी नहीं खरीदा है।
आप एक साल से स्टार हैं। इस एक साल में क्या बदला है आपके लिए?
ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन फर्क मेरे जीवन में भी आया है। मेरे पास एक बड़ी और महंगी गाड़ी आ गई है। मेरा बैंक बैलेंस बढ़ गया है। मैं पहले की तरह ही कम खर्च करता हूं। मेरे वही दोस्त हैं। मैं उनके साथ ही समय बिताता हूं।
आप पहले से अधिक मैच्योर हो गए हैं। बात करने की कला आ गई है और प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब देने में स्मार्ट हो गए हैं?
थैंक्स.., अगर पिछले प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात कर रहे हैं, तो उसकी जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई थी। संजय दत्त किसी वजह से नहीं आ सके। अंतिम समय में उनका आना कैंसल हुआ, तो मुझ पर बोझ डाल दिया गया। मैंने कोशिश की कि प्रेस कॉन्फ्रेंस अच्छा और लाइव रहे। थैंक्स कि सब ठीक से हो गया।
क्या आप को नहीं लगता कि आमिर खान की वजह से आप आसानी से स्टार बन गए?
मैं आपसे थोड़ा सहमत और थोड़ा असहमत हूं। मामू से मुझे मदद मिली, लेकिन लोगों ने इमरान खान को स्वीकार किया। भारतीय परंपरा में हम परिवार के सदस्यों को.., उनकी विरासत को स्वीकार करते हैं। फिल्मों के मशहूर परिवारों को देख लें। राजनीति और इंडस्ट्री में भी ऐसा ही है। आरंभिक स्वीकृति मिल सकती है, लेकिन उसके बाद परफॉर्म करना होता है। अगर मेरी फिल्में लगातार फ्लॉप हों और काम भी लोगों को पसंद न आए, तो मुझे कोई भी नहीं बचा सकता।
क्या ऐसा इसलिए है कि हमारा समाज अभी तक सामंती मूल्यों में विश्वास करता है और हम अ‌र्द्ध शिक्षित हैं?
यह एक वजह हो सकती है, लेकिन परिवारों के प्रति हमारा भरोसा जागता है। पूंजीवादी समाज में विचार और राजनीति मूल्यों से लगाव रहता है। हम भारत में वंश, परिवार और विरासत पर जोर देते हैं।
लक की हीरोइन श्रुति हासन के बारे में बताएंगे?
वह मेरी बचपन की दोस्त है। हमलोग स्कूल में एक-दूसरे की मदद करते थे। एक-दूसरे के सहारे परिवार में झूठ बोलकर बच निकलते थे। श्रुति बेहद प्रतिभाशाली ऐक्ट्रेस और सिंगर हैं। उनकी गायन प्रतिभा से में पहले से परिचित हूं। एक्टिंग वे पहली बार कर रही हैं। उनमें कलाकार जैसा आत्मविश्वास है। नए कलाकार के लिए यह फिल्म उतनी आसान नहीं कही जाएगी। उन्होंने पूरे दिल से अपना काम किया है।
डैनी और संजय दत्त जैसे सीनियर कलाकारों के साथ काम करते समय थोड़ा सावधान रहना पड़ा होगा?
संजय दत्त के साथ तो काम कर चुका हूं। डैनी साहब के साथ पहली बार काम किया है। मैं उनका फैन हो गया। उनका व्यक्तित्व बहुत शानदार है। वे सेट पर एकदम सहज रहते हैं। उनके अनुभव और साथ से मैंने बहुत कुछ सीखा।
..और सोहम शाह?
सोहम तो मेरे हमउम्र हैं साथ हैं। उन्होंने जब इस फिल्म के बारे में विस्तार से बताया था, तब मैं सोच में पड़ गया था कि क्या वे यह सब सही-सही कर पाएंगे? फिल्म का तकनीकी पक्ष बहुत स्ट्रॉन्ग है। यह फिल्म किसी विदेशी फिल्म की नकल नहीं है।

Friday, December 26, 2008

एक्शन,थ्रिल और रोमांस का संगम है 'गजनी'-आमिर खान


आमिर खान का एक इंटरव्यू २४ दिसम्बर को पोस्ट किया था.उसी इंटरव्यू का यह असंपादित मूल है.यहाँ आमिर खान से 'गजनी' के साथ और भी विषयों पर बातें हुईं.आमिर के प्रशंसकों और सिनेमा के अध्येताओं को यह इंटरव्यू विशेष खुशी देगा,क्योंकि अभिनेता आमिर ने यहाँ कुछ और भी बातें की हैं...पढने का आनंद लें...



अपनी नई फिल्म गजनी के बारे में आमिर खान कहते हैं कि यह प्योर थ्रिलर फिल्म है, जो दर्शकों को बिल्कुल अलग तरह का अनुभव देगी। आमिर कहते हैं कि दर्शकों को मेरी फिल्मों को लेकर खास जिज्ञासा रहती है इसलिए उन्हें हमारी फिल्म से उम्मीद भी अधिक रहती है। आमिर ने गजनी सहित अपने फिल्मी जीवन और नई योजनाओं पर खुलकर उद्गार व्यक्त किए।


-कहा जा रहा है कि आमिर खान ने 'गजनी' के प्रचार में बाजी मार ली है। यह कितना सचेत प्रयास है?
<>जहां तक बाजी मारने की बात है तो उसके लिए फिल्म रिलीज होने दीजिए। हां, हाइप जरूर है। वह शायद इसलिए है कि मेरी फिल्में साल में एक दफा आती हैं तो लोगों की जिज्ञासा रहती है। मेरे मामले में दर्शकों की उम्मीद हर फिल्म के साथ बढ़ती जा रही है। पिछली फिल्म उन्हें अच्छी लगती है तो वे अगली फिल्म से और ज्यादा उम्मीद करते हैं। 'गजनी' से ज्यादा उम्मीद इसलिए है कि मैं लंबे वक्त के बाद पूरी तरह से एंटरटेनर फिल्म कर रहा हूं। मेरे लिए 'गजनी' का अनुभव अलग रहा है। दर्शक भी मान रहे हैं कि उनके लिए 'गजनी' देखना अलग अनुभव होगा। दर्शकों ने लंबे समय से कोई एक्शन थ्रिलर नहीं देखा है। मुझे लगता है कि पूरा हाइप इन सारी स्थितियों का मिला-जुला असर है। इसकी मार्केटिंग जरूर अलग ढंग से की जा रही है, क्योंकि इसमें संभावनाएं बहुत हैं। 'तारे जमीन पर' छोटी फिल्म थी तो उसकी मार्केटिंग अलग ढंग से की गई। मैं हमेशा मानता हूं कि जिस तरह की फिल्म है, हमेशा उसी अनुपात में सच्चाई से मार्केटिंग करनी चाहिए।


-ऐसा कहा गया कि आमिर खान ने सलमान खान से दोस्ती निभाई और शाहरुख खान की फिल्म के समय अपनी फिल्म का प्रचार झोंक दिया। क्या किसी को हराने का मन रहता है?
<>किसी को हराने में मेरी कोई रुचि नहीं है। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि किसी का बुरा हो। हमारी सोच में ऐसी बात नहीं है, इसलिए किसी का बुरा नहीं होगा। हमारी वजह से किसी का नुकसान नहीं होगा। मल्टीप्लेक्स के कर्मचारियों ने 'गजनी' का लुक अपनाया। जो भी दर्शक 'रब ने बना दी जोड़ी' देखने गया, उसे 'गजनी' के लुक में कर्मचारी दिखे। टिकट खरीदने से लेकर सीट पर बैठने, पॉपकार्न खरीदने और बाहर निकलने तक 'गजनी' लुक के कर्मचारी दिखे। इससे 'रब ने बना दी जोड़ी' के दर्शक कम नहीं हुए। ऐसा तो नहीं हुआ कि वे सिनेमाघरों में 'गजनी' के लुक में कर्मचारियों को देख का लौट गए। हमेशा चल रही फिल्म के साथ आने वाली फिल्म की पब्लिसिटी की जाती है। दर्शक 'युवराज' देखने गए होंगे तो 'रब ने बना दी जोड़ी' का ट्रेलर दिखा होगा। मेरी फिल्म आएगी तो 'चांदनी चौक टू चाइना' का ट्रेलर दिखेगा। थिएटर में ट्रेलर, बाहर में पोस्टर दिखेंगे ़ ़ ़ प्रचार का यह पारंपरिक तरीका है। हमने एक नया रूप दिया कि आप आएंगे तो आपको 'गजनी' के लुक में कर्मचारी दिखेंगे। हर फिल्म के साथ ऐसा प्रचार नहीं हो सकता। 'गजनी' का एक खास स्ट्रांग लुक है, जो बहुत पहले से दर्शकों के बीच लोकप्रिय है। थिएटर के कर्मचारियों को 'गजनी' का लुक देना ट्रेलर दिखाने जैसा ही है। इस समय 'रब ने बना दी जोड़ी' के बजाय कोई और फिल्म होती तो भी हम यही करते। हमारी कोशिश यह नहीं कि किसी को नुकसान पहुंचाएं। हम अपना प्रचार कर रहे हैं। हमारी सारी कोशिश अपनी फिल्म के मद्देनजर है। हम नहीं चाहेंगे कि हमारी पब्लिसिटी से किसी का नुकसान हो जाए।

-क्या किसी कर्मचारी ने 'गजनी' लुक रखने से इंकार किया?
<>मेरी जानकारी में ऐसी कोई सूचना नहीं आई है। यह थोपा नहीं गया है। इसे थोपा नहीं जा सकता और न मैं चाहूंगा कि थोपा जाए। मैं स्वयं कुछ थिएटरों में गया था। वे बहुत खुश और उत्साहित दिखे। अगर कोई 'गजनी' लुक नहीं रखना चाहे तो ठीक है। मेरे नजर में ऐसा कोई मामला नहीं आया। मैं इसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं हूं। फिर भी अगर कहीं कुछ हुआ होता तो मेरी टीम मुझे बताती। ऐसा प्रचार लोगों की खुशी और सहभागिता से ही होता है। थिएटर के मैनेजर ऐसा प्रचार करते रहते हैं। वे पॉपकॉर्न के डब्बे या और चीजों पर आगामी फिल्म की तस्वीरें लगाते हैं। यह नया आइडिया था। थिएटर में तो हम लोगों ने किया, लेकिन पब्लिक तो बहुत पहले से 'गजनी' लुक में घूम रही है। थिएटर के मैनेजर 'गजनी' को इवेंट फिल्म के तौर पर देख रहे हैं। इसी कारण वे जोश में बहुत कुछ कर रहे हैं।

-पिछले छह-सात सालों में आप ने जैसी फिल्में की हैं, गजनी उनसे बिल्कुल अलग समझी जा रही है। यह किस रूप में अलग है?
-सबसे पहले तो यह मेरी पहली एक्शन थ्रिलर फिल्म है। मैंने पहले भी कहा कि लंबे वक्त के बाद एंटरटेनर फिल्म कर रहा हूं। तीसरी वजह यह है कि लंबे समय के बाद एक्शन फिल्म आ रही है। इधर आपने एक्शन फिल्में नहीं देखी होंगी। आजकल कामेडी ज्यादा बन रही है और कुछ रोमांटिक फिल्में आ जाती हैं। एक्शन फिल्में बंद हैं। बहुत सालों से लोगों ने प्योर एक्शन फिल्म नहीं देखी है।

-पूरा देश मुंबई हमले के बाद निराशा और हताशा के दौर से गुजर रहा है। इस माहौल में बदले की भावना पर आधारित आक्रामक एक्शन फिल्म 'गजनी' से दर्शकों को राहत मिल सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे 'गजनी' को फायदा होगा। आप क्या सोचते हैं?
-हमने ऐसी कोई प्लानिंग नहीं की थी। ऐसे हादसों के बारे में सोच भी नहीं सकते। हम दो सालों से इस फिल्म में लगे थे। मुंबई का हादसा बहुत दर्दनाक है। ऐसे आतंकी हमले पहले भी हुए हैं। बनारस में हुआ, मुंबई के लोकल ट्रेन में बम धमाके हुए और भी जगहों पर हुए। इस बार का मंजर अलग है। पहले बम रखकर आतंकी छिप जाते थे। अब वे खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। यह बहुत ही खतरनाक हादसा है। हम सभी इससे दुखी हैं। मैं एकदम निराशा में चला गया था। हमने इतने जोश और रुचि से फिल्म बनाई थी, लेकिन ताजा माहौल में कुछ कहने या करने का मन नहीं हो रहा था। इस खतरनाक हादसे से हमें डरने की नहीं, जूझने की जरूरत है। यह हमें प्रभावित तो करे, लेकिन वैसे नहीं जैसे कि वे चाहते हैं। यह हमें प्रभावित करे कि हम सही तरीके अपनाएं। हम निराश होकर उम्मीद न छोड़ें। हमारी फिल्म बदले के बारे में है। आज लोगों में नाराजगी है, गुस्सा है, एक आग है, बदले की भावना और आक्रोश है ़ ़ ़ संयोग से ऐसे समय में 'गजनी' आ रही है। इस संयोग से मुझे खुशी नहीं हो सकती है कि फिल्म की भावना से उनका इमोशन जुड़े, लेकिन मुझे दर्द है कि यह हादसा हुआ।

-यह आपकी पहली रीमेक फिल्म होगी। कैसी सावधानी बरतनी पड़ी या चुनौतियां रहीं?
<>मैंने मूल फिल्म में काम नहीं किया है, इसलिए रीमेक फिल्म भी मेरे लिए ताजा अनुभव है। किसी दूसरी नई फिल्म करने जैसा ही जोश है, क्योंकि मेरे लिए यह नई फिल्म ही है। मेरी तरफ से यह सावधानी रही कि मूल फिल्म के हीरो सूर्या की नकल न करूं। सूर्या ने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन यह मेरी प्रस्तुति है। समान स्थितियों में मैं कैसे अपने इमोशन व्यक्त करता हूं ़ ़ मैंने उस पर ध्यान दिया है। डायरेक्टर के लिए ज्यादा मुश्किल रही होगी, क्योंकि वह इसे एक दफा बना चुका है। अब वही चीज वह दोबारा बना रहा है। अगर कोई मुझसे कहे कि 'तारे जमीन पर' दोबारा बनाओ तो मेरा जवाब होगा कि जो इमोशन थे, उन्हें मैं जाहिर कर चुका हूं। अब दोबारा क्या करूं? डायरेक्टर को खुद को रीचार्ज करना था। उसे पहले की तरह ही जोश बनाए रखना था। मुरूगदौस ने यह काम बखूबी किया है। उनमें बच्चों जैसा जोश है। चौदह साल के बच्चे का कौतूहल है उनमें। उनमें गजब की ऊर्जा है।

-मूल फिल्म से क्या चीजें बदली गई हैं?
<>फिल्म के आखिरी 30 मिनट ताजा हैं। वे मूल की तरह नहीं हैं। यह एक बड़ा बदलाव है।

-आपके बुकशेल्फ पर दार्शनिक नीत्से की चार किताबें हैं? कोई खास लगाव है क्या उनके लेखन और दर्शन से?
<>मेरे ख्याल में वे रोचक व्यक्ति थे। उनकी बातों में नवीनता है। मैंने एक किताब पढ़ी थी-ह्वेन नीत्से वेप्ट, जो किसी और ने उनकी जिंदगी के बारे में लिखी है। एक डा. बू्रयेर थे, जो फ्रायड के सीनियर थे। फ्रायड को मनोविश्लेषण का जनक कहा जाता है। डा. बू्रयेर उनके भी बाप हैं। यह किताब ब्रूयेर और नीत्से की बातचीत पर आधारित काल्पनिक किताब है। दोनों कभी मिले नहीं थे। लेखक ने दोनों की जिंदगी पर रिसर्च कर यह किताब लिखी थी। वह किताब मुझे बहुत ही अच्छी लगी थी। उसके बाद नीत्से में मेरी रुचि जगी। मैंने उन्हें पढ़ा कि वे कैसे दार्शनिक हैं?

-क्या उनके दर्शन से आप प्रभावित हुए?
<>उन्होंने काफी क्रांतिकारी बातें की हैं। मैं उनकी सारी अवधारणाओं से सहमत नहीं हूं। लेकिन उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है।

-आप खुद बदले की भावना में यकीन रखते हैं क्या?
<>मैं अहिंसक व्यक्ति हूं। हिंसा में मेरा यकीन नहीं है। बदले की भावना का हम अपनी जिंदगी में अनुभव करते हैं। अलग-अलग वक्त पर ऐसा लगता है कि यार, इस आदमी ने इतना गलत किया है। इसका हमें बदला लेना है। जरूरी नहीं है कि उसकी जान ही लें। मन में उसे दुख पहुंचाने की भावना हो सकती है। हम सभी इस भावना से आवेशित होते हैं। कई बार यह उचित भी होता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर बदले में यकीन नहीं रखता।

-कहते हैं एक्टिंग अपने अनुभवों को जीना है। फिर मूल रूप से अहिंसक होने पर 'गजनी' जैसी फिल्म कैसे कर पाए आप?
<>यही तो चुनौती है। एक्टर को कुछ ऐसा करने को मिले, जिसमें वह व्यक्तिगत तौर पर यकीन नहीं करता तो वह बड़ी चुनौती होती है। मैं रियल लाइफ में बदले में यकीन नहीं करता, लेकिन ऐसी भूमिका कैसे निभाऊंगा? वह एक अलग चुनौती है। 'गजनी' की बात करें तो उसकी जिंदगी में एक बड़ी चीज हुई और उसके बाद उसका दिमाग बदले के रास्ते पर निकल पड़ा। अगर मेरी जिंदगी में कहीं ऐसा हो गया तो मालूम नहीं कैसे रिएक्ट करूंगा या आप कैसे रिएक्ट करेंगे? अगर इतना बड़ा हादसा हमारी जिंदगी में हो तो हम सच्चाई से नहीं कह पाएंगे कि क्या करेंगे? क्या हमारे अंदर भी बदले की भावना जागेगी?

-आपने पत्रकारों से तस्वीरें मंगवाईं और याद किया कि उनसे पहली बार कब मिले थे। आपकी सटीक याद से पत्रकार चौंके हुए हैं और उन्हें लगता है कि फिर तो आपको उनकी कही या लिखी हर बात याद होगी?
<>आप के बारे में सही लिखा है न मैंने। चूंकि 'गजनी' में याददाश्त की बात है तो मेरी पीआर टीम ने यह चुनौती रखी कि चलिए आपकी याददाश्त जांचते हैं। मुझे भी यह अभ्यास रोचक लगा। यह आइडिया अच्छा रहा। अभी तक किसी ने नहीं कहा कि मैंने गलत लिखा है।

-यह कैसे संभव हुआ? क्या आपकी याददाश्त इतनी तेज है?
<>काफी हद तक मेरी यादों ने मेरा साथ दिया। कुछ चीजें मैंने रिसर्च भी की। कुछ पत्रकारों के लेख फिर से पढ़े। जिनसे नहीं मिला हूं, उनके बारे में जानने की कोशिश की। उनके लेखन को समझा।

-कहा जा रहा है कि आमिर खान मीडिया प्रेमी हो गए हैं। इससे कितना फायदा हुआ है?
<>इससे मुझे भावनात्मक फायदा हुआ है। जब मैंने तय किया था कि मीडिया से बात नहीं करूंगा, तब मैं परेशान था और मीडिया से बात नहीं कर रहा था। मेरी व्यक्तिगत परेशानियां थीं। उन दिनों मीडिया में 90 प्रतिशत मेरे खिलाफ ही लिखा या बताया जा रहा था। यह सोच कर कि यह खुद को समझता क्या है? मेरी तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं था, लेकिन कहीं एक गैप था। तब मेरी सफलताओं को कम और असफलताओं को बड़ा कर के बताया जाता था। सफलता-असफलता से परे मेरे बारे में कुछ न कुछ बुरा ही रहता था। निगेटिव बातें होती थीं। मैंने अपनी तरफ से कोशिश की और इसे सुधारा। अभी 80 प्रतिशत कमी आ गई है। एक सुकून मिलता है। मैं सकारात्मक इंसान हूं। मुझे निगेटिव चीजें नहीं लेनी है। मैं दिल में क्यों निगेटिव बातें रखूं। और क्यूं मैं निगेटिव भावनाएं पालूं।

-कहते भी हैं कि नफरत निभाना ज्यादा मुश्किल काम है। मोहब्बत में तो सिर्फ मुस्कराना पड़ता है ़ ़ ़
<>बिल्कुल सही कहा है। नफरत मेरे स्वभाव में नहीं है। पहले मैं चुप रहता था और मुझे मीडिया के डंडे पड़ते थे। अभी बातें करता हूं तो डंडे कम हो गए हैं।

-मूल 'गजनी' देखने पर पूरी फिल्म थोड़ी क्रूर और हिंसक लगती है?
<>मैं तमिल के दर्शकों के बारे में नहीं जानता। मैं अपने दर्शकों के बारे में जानता हूं। उनके लिए मैं 20 सालों से फिल्में बना रहा हूं। मेरी कोशिश रही है कि हिंदी की 'गजनी' हिंदी दर्शकों की सोच-समझ के साथ चले। कैमरामैन रवि चंद्रन हैं। वे हिंदी फिल्मों के मशहूर कैमरामैन हैं। रहमान के बारे में सभी जानते हैं। इस फिल्म से जुड़े सभी कलाकार और तकनीशियन मूल रूप से हिंदी सिनेमा की समझ रखने वाले हैं। मुझे लगता है कि उसका असर होगा फिल्म पर।

-रोमांटिक गीत में आपकी एट पैक बॉडी दिखाई गई है। रोमांस तो बहुत नरम ख्याल है। उसमें शरीर सौष्ठव दिखाने की क्या जरूरत थी?
<>इस फिल्म के लिए मैंने बॉडी बनाई थी। फिल्म के कैमरामैन, डायरेक्टर और कोरियोग्राफर अहमद खान को मेरी बॉडी पसंद आई। उन्होंने कहा कि अरे यार बटन खोलो। तो एक-एक कर के सारे बटन खुल गए। ऐसा नहीं सोचा गया था कि गाने के लिए बॉडी बनानी है और उसे दिखाया है।

-क्या आपको उनके सुझाव सही लगे?
<>हां, मुझे आपको कोई दिक्कत नहीं थी। 'बहका' और 'गुजारिश' गाने पर जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, उनसे लगता है कि लोगों को अच्छा लग रहा है। मुझे इस रूप में देख कर लोगों को अच्छा लग रहा है।

-किस विधा की फिल्म कहेंगे इसे? रोमांटिक, रोमांटिक थ्रिलर या एक्शन थ्रिलर?
<>यह एक्शन थ्रिलर है, जिसमें रोमांटिक और इमोशनल तत्व हैं।

-असिन को रखने की सबसे बड़ी बात क्या रही?
<>असिन ने मूल में अद्भुत काम किया है। मेरा एक ही सवाल था कि असिन को हिंदी आनी चाहिए। हमने पता किया तो मालूम हुआ कि उनकी हिंदी अच्छी है। इस फिल्म की शूटिंग सिंक साउंड में हुई है। कोई भी संवाद डब नहीं किया गया है। उनके उच्चारण में दक्षिण का टोन नहीं है।

-निर्देशक मुरूगदौस को जिम्मेदारी देने की वजह क्या रही?
<>मैंने यह फिल्म उनकी वजह से ही की। मैंने 'गजनी' देखी तो मुझे पसंद आई थी। शुरू में मैं निश्चित था, लेकिन डायरेक्टर से मिलने के बाद मैंने तय किया कि फिल्म करूंगा। उसकी दो वजहें हैं। एक तो डायरेक्टर जब मुझसे मिलने आए तो उन्होंने कहा कि हिंदी रीमेक में अंत का आधा घंटा सुधारना और बदलना है। उनकी यह बात जंची, क्योंकि मैं स्वयं वैसे ही सोच रहा था। उनसे सुनकर लगा कि हम दोनों एक ही तरह से सोच रहे हैं। दूसरी चीज उनकी एनर्जी थी। उनमें बच्चों जैसी ऊर्जा है। उनकी आंखों में चमक है। मुझे लगा कि यह बंदा कुछ अलग है। मुझे इनके साथ काम करना चाहिए।

-अब तो आप घोषित रूप से निर्देशक बन गए हैं। एक धारणा है कि आमिर खान निर्देशक के काम में काफी हस्तक्षेप करते हैं?
<>इसमें सच्चाई नहीं है। हां, निर्देशक की अपनी समझ से मैं निर्देशक को एक ही सीन दो-तीन तरीके से कर के बता सकता हूं। बताता भी हूं। अगर मेरी काबिलियत ज्यादा है तो उससे डायरेक्टर को मदद ही मिलती है। इस तरह मैं अपने किरदार को विभिन्न स्तरों और ऊंचाइयों पर ले जा सकता हूं। लेखक की लिखी कहानी को निर्देशक किसी और लेवल पर ले जाता है। उसी प्रकार डायरेक्टर की सोच को एक्टर बढ़ा सकता है। 'तारे जमीन पर' करते समय मैं दृश्य के बारे में एक ढंग से सोचता था। लेकिन दर्शिल उसे मेरी उम्मीद से बेहतर कर देता था। उसकी छलांग से मुझे खुशी होती थी। मैंने इधर जितने भी निर्देशकों के साथ काम किया चाहे वे मुरूगदौस हों, फरहान अख्तर, राकेश मेहरा, जॉन मैथ्यू या आशुतोष हों ़ ़ सभी के साथ मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे।

-क्या आपने यह फिल्म कुछ अलग करने या क्रिएटिव स्वाद बदलने की गरज से की?
<>मैं सिर्फ अलग करने की गरज से कोई फिल्म नहीं करता। फिल्म की कहानी में मैं अपना एकसाइटमेंट देखता हूं। स्वाभाविक तौर पर मैं अलग ही चीज सुनता हूं। कोई एक फिल्म कर चुका हूं तो उसकी विषय की फिल्म के बारे में नहीं सोचता। मैं अलग चीज खोजता नहीं हूं। मुझे अलग चीज आकर्षित करती है। यह फिल्म मैंने इसलिए की कि इसकी कहानी, भावना और प्रस्तुति पसंद आई। इसकी पटकथा जबरदस्त है। डायरेक्टर तो पसंद थे ही।

-कामेडी फिल्मों की तरफ कब आ रहे हैं? एक अरसा हो गया है आपको किसी कॉमिक किरदार में देखे।
<>अभी मैं राजकुमार हिरानी की जो फिल्म कर रहा हूं। उसमें कामेडी तो नहीं, लेकिन काफी ह्यूमर है। 'थ्री इडियट्स' जिंदगी के बारे में है और उसमें काफी ह्यूंमर है। राजू के साथ काम करने में बहुत मजा आ रहा है। राजू बहुत अच्छे निर्देशक हैं।

-क्या यह चेतन भगत की किताब पर आधारित है?
<>चेतन भगत की किताब पर राजू ने काम किया और इस फिल्म की कहानी विकसित की। मैंने किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए नहीं बता सकता कि क्या अलग है? राजू ने बताया था कि उन्होंने चेतन की किताब में काफी कुछ जोड़ा। अगर आपने किताब पढ़ी हो तो शायद फिल्म अलग लगे, क्योंकि राजू ने इसमें अपना भी कुछ डाला है।

-आपकी पत्नी किरण राव की फिल्म 'धोबीघाट' की क्या स्थिति है?
<>उसे किरण स्वयं प्रोड्यूस कर रही हैं। उन्होंने इसका लेखन, निर्देशन और निर्माण किया है। उनके जीवनसाथी होने की वजह से मैं उन्हें हर प्रकार का सहयोग देना चाहता हूं। आमिर खान प्रोडक्शन इसे प्रस्तुत कर रहा है। तकनीकी रूप से मैं निर्माता नहीं हूं। 'धोबीघाट' संबंधों की कहानी है। मुंबई के बारे में है। इस शहर की जिंदगी इसमें मिलेगी। उसके अलग पहलू हैं। चार जिंदगियां एक मोड़ पर आकर जुड़ती हैं।

-आमिर खान प्रोडक्शन में क्या नया हो रहा है?
<>हमलोग 'देहली बेली' बना रहे हैं। उसके अलावा एक और फिल्म अनुषा रिजवी की है। 'देहली बेली' अंग्रेजी में बनी कामेडी फिल्म होगी। अनुषा की फिल्म ग्रामीण भारत की कहानी है। किसी ने गलत लिख दिया कि वह किसानों की आत्महत्या पर है। फिल्म आज के गाव की कहानी है। गांव की जिंदगी, स्थानीय प्रशासन, स्थानीय राजनीति और उस राजनीति का राष्ट्रीय राजनीति से संबंध और मीडिया ़ ़ इन सभी को मिलाकर अनुषा ने एक व्यंग्य लिखा है, लेकिन यह वास्तव में ग्रामीण भारत की कहानी है। मैं दोनों में एक्ट नहीं कर रहा हूं।

-एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर आमिर खान फिर एक साथ कितनी जल्दी आ रहे हैं?
<>टाइम ही नहीं मिला। 'तारे जमीन पर' के बाद मैं 'गजनी' में लग गया। 'गजनी' अभी रिलीज होगी और जनवरी से 'थ्री इडियट़्स' की शूटिंग आरंभ हो जाएगी। मेरा खयाल है कि राजू की फिल्म पूरी होने के बाद मैं इत्मीनान से सोचूंगा कि मेरी अगली फिल्म कौन सी होगी?

-आपकी उम्र बढ़ रही है। क्या कभी यह ख्याल आया कि अपने बारे में नए सिरे से सोचें?
<>मेरी कोशिश है कि मैं जवान दिखूं। उम्र तो बढ़ेगी ही। उम्र के साथ एनर्जी लेवल बदलती जाती है। जवानी में अनुभव कम होता है। अभी मेरी उम्र 43 है और मुझे 20 सालों का अनुभव है। मेरी एनर्जी अभी तक पहले जैसी है। उसमें कमी नहीं आई है। रोल की बात करूं तो मैंने हमेशा अलग-अलग किस्म के रोल की चुनौती स्वीकार की है। उम्र मेरे लिए बाधा नहीं है। अगर मुझे अस्सी साल के व्यक्ति की भूमिका मिले तो मैं वह करना चाहूंगा। रोल और डायरेक्टर पसंद आने के बाद अगर मुझे लगेगा कि मैं उस किरदार को निभा पाऊंगा, तभी हा कहूंगा। मुझे संतोषी ने 'भगत सिंह' ऑफर की थी। मुझे लगा था कि मैं उसे नहीं कर सकता। भगत सिंह की सच्चाई थी कि वे अठारह साल के लगें। एक लड़का जो 21 साल की उम्र में फांसी चढ़ जाता है, वह अठारह साल की उम्र में कैसा रहा होगा? उसकी बात का अलग वजन होगा। भगत सिंह ऐतिहासिक किरदार थे और उस किरदार का एक बड़ा फैक्टर उनकी उम्र थी। उस उम्र में वे वैसी बातें कर रहे थे और बलिदान के लिए तैयार थे। एक्टर के तौर पर मैं भगत सिंह का किरदार कर सकता हूं, लेकिन उनकी उम्र को मैं सच्चाई से पर्दे पर नहीं ला सकता था।

-इस स्थिति के बारे में क्या कहेंगे कि हिंदी फिल्मों में हीरो की स्क्रीन एज लंबी होती है। लेकिन हीरोइनों की उम्र कम होती है?
<>यह हम तय नहीं करते। यह दर्शकों की पसंद पर निर्भर करता है। अगर दर्शक किसी कलाकार को पसंद करते हैं तो वह एक्टर हो कि एक्ट्रेस ़ ़ ़ डायरेक्टर और प्रोड्यूसर उसे काम देंगे। दर्शकों की रुचि कम हो जाएगी तो एक्टर को काम मिलना बंद हो जाएगा। हां,लेकिन आपकी बात सच है कि हीरोइनों की पर्दे पर उम्र कम होती है।

-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की वर्तमान स्थिति के बारे में क्या कहेंगे?
<>फिल्म बिजनेस हमेशा रियलिस्टिक होना चाहिए। सही आंकड़ों का इस्तेमाल होना चाहिए। जो प्रस्ताव या योजना व्यावहारिक नहीं है, उसके ख्वाब देखने से नुकसान ही होगा। मेरी सोच हमेशा यही रही है। मैं मानता हूं कि अगर कोई निर्माता मुझ से कमाता नहीं तो मेरी जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। मेरे लिए यह यह गर्व की बात है कि मेरा निर्माता मुझ से कमाता है। मेरा वितरक मुझ से कमाता है। प्रदर्शक कमाता है। मैं इसे बहुत महत्व देता हूं। जीवन का मेरा यह सिद्धांत है कि अगर मैं किसी चीज से जुड़ता हूं तो जो लोग मुझे जोड़ रहे हैं, उन्हें संतुष्टि मिलनी चाहिए। उन्हें संतुष्टि तभी मिलेगी, जब उन्हें लाभ होगा। फिल्म इंडस्ट्री में जो कोई भी मेरे साथ काम करे, वह फायदे में रहे। मैं यही चाहता हूं और उसकी कोशिश करता हूं।

-छोटी फिल्मों की सफलता के बारे में क्या कहेंगे?
<>मुझे लगता है कि यह बहुत ही अच्छी बात है। अलग-अलग विषयों पर फिल्में बन रही हैं। इससे हमारे दर्शक बढ़ेंगे। हमारा सिनेमा और ज्यादा सेहतमंद होगा। बड़ी फिल्में तो बनती रहेंगी। फिल्में वही चलती हैं, जो सही बनती हैं और अच्छी चलती है। फिर वह बड़ी हो या छोटी। अभी 'तारे जमीन पर' को क्या बोलेंगे? एक तरह से वह छोटी फिल्म थी। क्योंकि बड़े पैमाने पर नहीं बनी थी। लेकिन सफलता की बात करें तो वह बड़ी सफल रही। उसे छोटी या बड़ी फिल्म कहेंगे? मैं अब कह सकता हूं कि वह बड़ी फिल्म है, क्योंकि वैसी सफलता शायद ही किसी और को मिली होगी। सिर्फ कमाई के लिहाज से से ही नहीं, सराहना के लिहाज से भी। मेरे लिए फिल्म छोटी या बड़ी नहीं होती। मेरे लिए जरूरी है कि आप क्या कह रहे हैं। फिल्म का बजट उसकी जरूरत के हिसाब से होना चाहिए। क्या वह जरूरत व्यावहारिक है? हर फिल्म का अपना अर्थशास्त्र होता है।

-छोटी फिल्म का मतलब है-नॉन स्टार, अपारंपरिक विषय, सीमित बजट और नई शैली ़ ़ ़
<>जी, मैं समझ रहा हूं। मैं वैसी फिल्में प्रोड्यूस कर रहा हूं। मैं खुद छोटा निर्माता हूं। मेरी दोनों फिल्में छोटी और सामान्य है। 'देलही बेली' अंग्रेजी में है। अंग्रेजी में बनने से दर्शक वैसे ही घट जाते हैं। अनुषा की फिल्म ग्रामीण भारत पर है। उसमें नाच, गाना, एक्शन, रोमांस थ्रिलर नहीं है। वह मुद्दे पर आधारित फिल्म है। भारत में ऐसी फिल्म आपने नहीं देखी होगी। मैं स्वयं वैसी फिल्में बना रहा हूं। मैं उनमें अभिनय नहीं कर रहा हूं। मुझे लगता है कि अनुषा की कहानी पसंद है तो उस पर फिल्म बननी चाहिए। अब उस पर ठीक बजट में फिल्म बने और सभी को लाभ हो।

-लेकिन क्या आमिर खान किसी छोटी फिल्म का हिस्सा हो सकते हैं? उनके आते ही फिल्म बड़ी हो जाती है। इसमें उनकी फीस शामिल हो जाती है।
<>क्यों नहीं बन सकती? हो सकता है कि उस फिल्म के लिए मैं अपनी फीस ही न लूं।

-मल्टीप्लेक्स संस्कृति की वजह से भारत के छोटे शहरों की तरफ निर्माता ध्यान नहीं दे रहे हैं। क्या फिर से ऐसी फिल्म बन सकती है, जो पूरे भारत में एक सी पसंद की जाए।
<>इसके कई कारण हैं। ग्रामीण और शहरी भारत का फर्क सिर्फ एंटरटेनमेंट में नहीं रह गया है। हर पहलू में नजर आ रहा है। यह अच्छी बात नहीं है। दूसरी चीज ़ ़ हिंदी प्रदेशों से सही कलेक्शन नहीं आता। वहां इतनी चोरी होती है। ऐसी स्थिति में प्रोड्यूसर सोचता है कि क्यों अपना वक्त बर्बाद करें। बिहार से हमें सही आंकड़ा नहीं मिलता तो मैं क्यों परवाह करूं। कुछ हद तक थिएटरों के मालिक और वहां के वितरकों की जिम्मेदारी है। वे वहां एक्टिव हैं। वे जिम्मेदारी निभा सकते हैं। मुंबई के प्रोड्यूसर को रिटर्न नहीं मिलेगा तो वह फिल्म नहीं बनाएगा। फिल्म का बाजार या कोई भी बाजार लाभ की शर्तो पर चलता है। अगर मैट्रो और मल्टीप्लेक्स से फायदा दिख रहा है तो वहां की फिल्में बन रही है। हालांकि मैं स्वयं बाजार के नियमों का पालन नहीं करता, लेकिन में अकेला हूं। मैं अपनी सोच और भावनाओं से चलता हूं। अपनी सोच के बावजूद मैं निर्माता को गलत नहीं कह सकता। क्योंकि जो पैसे लगा रहा है, उसे पैसे वापस चाहिए। बाजार को बदलना जरूरी है। छोटे शहरों से आय दिखे तो बदलाव आएगा।

- ऐसा लग रहा है कि 'गजनी' शहर-देहात के दर्शकों को समान रूप से पसंद आएगी?
<>बिल्कुल। लंबे अरसे के बाद ऐसी फिल्म आ रही है। जिसे हम सही मायने में यूनिवर्सल एंटरटेनर कह सकते हैं। इसमें संभावना है। 'गजनी' ए, बी और सी सभी श्रेणियों के दर्शकों को पसंद आएगी। 'गजनी' दर्शकों की जरूरत पूरी करेगी।

-दर्शकों का प्रोफाइल भी बदला है। पहले मुख्य रूप से मध्यवर्ग ही सिनेमा का दर्शक था। अब यह मल्टीप्लेक्स के जरिए उच्चवर्ग की चीज होती जा रही है?
<>शायद आप सही कह रहे हैं।
-क्या आप मानेंगे कि सिनेमा समाज का आईना है और उसे यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए?
<>फिल्मों का मुख्य उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना है। अक्सर सिनेमा में समाज का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है, लेकिन यह उनका उत्तारदायित्व नहीं है। कैसी भी फिल्म बनाकर मैं दर्शकों का मनोरंजन कर सकता हूं। कुछ फिल्में समाज को दिखाती हैं और कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन करती हैं। दोनों तरह की फिल्में बनती रही हैं और आगे भी बनती रहेंगी। यह फिल्मकार और एक्टर की पसंद पर निर्भर करता है। मैंने अपने ढंग से फिल्में चुनीं। कोई और किसी और ढंग से चुनेगा। हर क्रिएटिव इंसान अलग होता है।
-क्या एक्टिंग खुद के लिए ही करनी चाहिए। कहते हैं आम उपयोग के माध्यमों में अपनी पसंद नहीं थोपनी चाहिए।
<>आपकी बात में एक हद तक वह सच्चाई है कि हमें कुछ भी थोपना नहीं चाहिए। मैं अलग तरह से कहूं तो सिनेमा हमारे सपनों को संतुष्ट करता है। यह हमारे सपनों की अभिव्यक्ति है। जो चीज हमें अपनी निजी जिंदगी में नहीं मिलती, उसे पर्दे पर देख कर हम प्रभावित होते हैं। हमारी रुचि बनती है। मान लीजिए कि मैं एक ऐसे परिवार से हूं, जहां हम सभी एक साथ नहीं रहते। भारत के शहरों में संयुक्त परिवार बिखर चुका है। लिहाजा 'हम आपके हैं कौन' आती है तो सुपर-डुपर हिट होती है। वह इसलिए हिट नहीं होती कि हिंदुस्तानी फैमिली वैसी ही है। 'हम आपके हैं कौन' में हमारी इच्छाएं पूरी होती हैं। सुपरमैन को देख कर मजा आता है। जो चीजें हमारी जिंदगी में नहीं होती हैं, उन्हें पर्दे पर पाकर हम खुश होते हैं। उसे जी लेते हैं।