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Friday, February 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रंगून



फिल्‍म रिव्‍यू
युद्ध और प्रेम
रंगून
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    युद्ध और प्रेम में सब जायज है। युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर बनी प्रेमकहानी में भी सब जायज हो जाना चाहिए। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बैकड्रॉप में बनी विशाल भारद्वाज की रंगीन फिल्म रंगून में यदि दर्शक छोटी-छोटी चूकों को नजरअंदाज करें तो यह एक खूबसूरत फिल्म है। इस प्रेमकहानी में राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम की गुप्‍त धार है, जो फिल्म के आखिरी दृश्‍यों में पूरे वेग से उभरती है। विशाल भारद्वाज ने राष्‍ट्र गान जन गण मन के अनसुने अंशों से इसे पिरोया है। किसी भी फिल्म में राष्‍ट्रीय भावना के प्रसंगों में राष्‍ट्र गान की धुन बजती है तो यों भी दर्शकों का रक्‍तसंचार तेज हो जाता है। रंगून में तो विशाल भारद्वाज ने पूरी शिद्दत से द्वितीय विश्‍वयुद्ध की पृष्‍ठभूमि में आजाद हिंद फौज के हवाले से रोमांचक कहानी बुनी है।
    बंजारन ज्वाला देवी से अभिनेत्री मिस जूलिया बनी नायिका फिल्म प्रोड्रयूसर रूसी बिलमोरिया की रखैल है, जो उसकी बीवी बनने की ख्‍वाहिश रखती है। 14 साल की उम्र में रूसी ने उसे मुंबई की चौपाटी से खरीदा था। पाल-पोस और प्रशिक्षण देकर उसे उसने 20 वीं सदी के पांचवें दशक के शुरूआती सालों की चर्चित अभिनेत्री बना दिया था। तूफान की बेटी की नायिका के रूप में वह दर्शकों का दिल जीत चुकी है। उसकी पूरी कोशिश अब किसी भी तरह मिसेज बिलमोरिया होना है। इसके लिए वह पैंतरे रचती है और रूसी को मीडिया के सामने सार्वजनिक चुंबन और स्‍वीकृति के लिए मजबूर करती है। अंग्रेजों के प्रतिनिधि हार्डी जापानी सेना के मुकाबले से थक चुकी भारतीय सेना के मनोरंजन के लिए मिस जूलिया को बॉर्डर पर ले जाना चाहते हैं। आनाकानी के बावजूद मिस जूलिया को बॉर्डर पर सैनिकों के मनोरंजन के लिए निकलना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी जमादार नवाब मलिक को दी गई है। जांबाज नवाब मलिक अपनी बहादुरी से मिस जूलिया और अंग्रेजों को प्रभावित करता है। संयोग से इस ट्रिप पर जापानी सैनिक एयर स्ट्राइक कर देते हैं। भगदड़ में सभी बिखर जाते हैं। मिस जूलिया और नवाब मलिक एक साथ होते हैं। नवाब मलिक अपनी जान पर खेल मिस जूलिया को भारतीय सीमा में ले आना चाहता है। अंग्रेजों के साथ रूसी बिलमोरिया भी मिस जूलिया की तलाश में भटक रहे हैं। उनकी मुलाकात होती है। अंग्रेज बहादुर नवाब मलिक से प्रसन्न होकर विक्‍टोरिया क्रॉस सम्मान के लिए नाम की सिफारिश का वादा करता है, लेकिन आशिक रूसी बिलमोरिया को नवाब मलिक में रकीब की बू आती है। वह उसके प्रति चौकन्ना हो जाता है। हम प्रेमत्रिकोण में नाटकीयमता की उम्‍मीद पालते हैं। कहानी आगे बढती है और कई छोरों को एक साथ खोलती है। आखिरकार वह प्रसंग और मोड़ आता है, जब सारे प्रेमी एक-एक कर इश्‍क की ऊंचाइयों से और ऊंची छलांग लगाते हैं। राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम का जज्‍बा उन्हें सब कुछ न्‍यौछावर कर देने के लिए प्रेरित करता है।
    विशाल भारद्वाज अच्छे किस्सागो हैं। उनकी कहानी में गुलजार के गीत घुल जाते हैं तो फिल्म अधिक मीठी,तरल और गतिशील हो जाती है। रंगून में विशाल और गुलजार की पूरक प्रतिभाएं मूल कहानी का वेग बनाए रखती हैं। हुनरमंद विशाल भारद्वाज गंभीर प्रसंगों में भी जबरदस्त ह्यूमर पैदा करते हैं। कभी वह संवादों में सुनाई पड़ता है तो कभी कलाकारों के स्‍वभावों में दिखता है। रंगून में भी पिछली फिल्मों की तरह विशाल भारद्वाज ने सभी किरदारों को तराश कर पेश किया है। हमें सारे किरदार अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ याद रहते हैं। यही काबिल निर्देशक की खूबी होती है कि पर्दे पर कुछ भी बेजा और फिजूल नहीं होता। मुंबई से तब के बर्मा के बॉर्डर तक पहुंची इस फिल्म के सफर में अधिक झटके नहीं लगते। विशाल भारद्वाज और उनकी तकनीकी टीम सभी मोड़ों पर सावधान रही है।
    विशाल भारद्वाज ने सैफ अली खान को ओमकारा और शाहिद कपूर को कमीनेहैदर में निखरने का मौका दिया था। एक बार फिर दोनों कलाकारों को बेहतरीन किरदार मिले हैं, जिन्हें पूरी संजीदगी से उन्होंने निभाया है। बतौर कलाकार सैफ अली खान अधिक प्रभावित करते हैं। नवाब मलिक के किरदार में शाहिद कपूर कहीं-कहीं हिचकोले खाते हैं। यह उस किरदार की वजह से भी हो सकता है। सैफ का किरदार एकआयामी है, जबकि शाहिद को प्रसंगों के अनुसार भिन्‍न आयाम व्‍यक्‍त करने थे। मिस जूलिया के रूप में कंगना रनोट आरंभिक दृश्‍यों में ही भा जाती हैं। रूसी बिलमोरिया और नवाब मलिक के प्रेम प्रसंगों में मिस जूलिया के दोहरे व्‍यक्तित्‍व की झलक मिलती है, जिसे कंगना ने बखूबी निभाया है। एक्शन और डांस करते समय वह पिछली फिल्मों से अधिक आश्‍वस्त नजर आती हैं। बतौर अदाकारा उनमें आए निखार से रंगून को फायदा हुआ है। मिस जूलिया के सहायक किरदार जुल्फी की भूमिका निभा रहे कलाकार ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अन्य सहयोगी कलाकार भी दृश्‍यों के मुताबिक खरे उतरे हैं।
    विशाल भारद्वाज की फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म की कहानी का अविभाज्‍य हिस्सा होता है। गुलजार उनकी फिल्मों में भरपूर योगदान करते हैं। दोनों की आपसी समझ और परस्पर सम्मान से फिल्मों का म्यूजिकल असर बढ़ जाता है। इस फिल्म के गानों के फिल्मांकन में विशाल भारद्वाज ने भव्‍यता बरती है। महंगे सेट पर फिल्‍मांकित गीत और नृत्‍य तनाव कम करने के साथ कहानी आगे बढ़ाते हैं।
अवधि- 167 मिनट
स्टार- चार स्‍टार

Monday, January 11, 2016

क्लिंटन सेरेजो से बातचीत



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    क्लिंटन सेरेजो से हिंदी फिल्‍मों के दर्शक भले ही परिचित नहीं हों,लेकिन हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में बतौर म्‍यूजिक अरेंजर और प्रड्यूसर उनका बड़ा नाम और काम है। एआर रहमान और विशाल भारद्वाज उनका ही सहयोग लेते हैं। क्लिंटन सेरेजो कोक स्‍टूडियो से संगीतप्रंमियों के बीच पहचाने गए। उनका गीत मदारी बहुत ही लोकप्रिय हुआ था। पहली बार उन्‍होंने जुगनी फिल्‍म का पूरा संगीत दिया है। शेफाली भूषण की इस फिल्‍म के गीत-संगीत में पंजाबी लोकगीतों और धुनों का असर है। मुंबई के बांद्रा में पल-बढ़े क्लिंटन के सांगीतिक प्रयास को सराहना मिल रही है।

-इस फिल्‍म का आधार थीम क्‍या है ?
0 फिल्‍म की डायरेक्‍टर शेफाली भूषण ने स्‍पष्‍ट कहा था कि फिलम की थीम संगीत है। मानवीय संवेदनाओं की कहानी है। इस फिल्‍म की थीम में लोकेशन और बैकग्राउंड का खास महत्‍व है। मुझे पंजाबी संगीत का इस्‍तेमाल करते हुए किरदारों की संवेदना जाहिर करनी थी।
- आप पंजाबी संगीत से कितने परिचित हैं ? आप तो बांद्रा में पले-बढ़े हैं ?
0 जी, यह तो है। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं पंजाबी संगीत की पूरी जानकारी रखता हूं। इस फिल्‍म के लिए तैयारी करनी पड़ी। तीन महीने पहले से मैंने पंजाबी संगी सुनने-समझने पर ध्‍यान दिया। रोज शाम में लौट कर मैा नुसरत फतेह अली या गुरदास मान को सुनता था। मास्‍टर सलीम और उनके पिता को भी सुना। कुछ संगीत विशाल भारद्वाज जी ने भी दिया। शेफाली मेरे लिए बड़ी स्रोत थीं। उनके पास लोकसंगीत का खजाना है। खुद के सहज ज्ञान पर मैंने ज्‍यादा भरोसा किया। रहमान साहब और विशाल जी के साथ किए काम का अनुभव तो था ही। मैंने इसे चुनौती के तौर पर लिया।

-आप ने अलग किस्‍म के संगीतकारों के साथ काम किया है। क्‍या उनके प्रभाव है ?
0 मेरी बीवी कहती हैं कि मैं स्‍पंज की तरह हूं। मेरी बीवी सिंगर हैं। उन्‍होंने अनेक जिंगल्‍स गाए हैं। तब हमारा प्रेम चल रहा था। मैं उन्‍हें एक स्‍टूडियो से दूसरे स्‍टूडियो पहुंचाने जाता था ताकि कुछ समय साथ रह सकूं। इस वजह से रंजीत बारोट,लुई बैंक्‍स,एहसान नूरानी,शिव माथुर आदि के साथ रहने और सीखने का मौका मिला। खास कर रंजीत बारोट ने मुझ बहुत सिखाया। तब संगीत के स्‍कूल भ्‍सी नहीं थे। क्रेजी लर्निंग पीरियड रहा मेरे लिए।

-यह फिल्‍म कैसे मिली ?
0 कोक स्‍टूडियो सीजन 2 से चर्चा हुई थी। अचानक मुझे शेफाली भूषण का फोन आया। उन्‍होंने स्क्रिप्‍ट सुनाई और पूछा कि क्‍या आप करना चाहोगे ? मुझे फिल्‍म पसंद आई। खास कर इसका अंत... हिंदी फिल्‍मों की तरह नहीं है वह।

- फिल्‍म के मुख्‍य कलाकार क्‍या करते हैं?
0 वह संगीत की खोज में है। व‍ह लोकसंगीत खंगालती रहती है। किरदार की खोज की तरह मेरी भी खोज चलती रहती है। कहानी  और  किरदार से मैंने जुड़ाव महसूस किया। इस फिल्‍म में संगीत का बड़ा हिस्‍सा है।

-जुगनी का संगीत पहली बार सुनने में ही प्रभावित करने के साथ बांध लेता है। यह अलबम किसी फूल की तरह है,जिसमें अलग आकार-प्रकार के गाने है,लेकिन सब में एक ही खुश्‍बू है।
0 वाह,क्‍या बात कह दी आप ने। यह तो बहुत बड़ी सराहना है। मैं आप की इस सराहना को उद्धृत करूंगा।

-अपने बारे में थोड़ा बताएं?
0 मैं एकेडमिक परिवार से हूं। मेरे परिवार में संगीत नहीं था। सभी के लिए मेरा चुनाव चौंकाने वाला रहा। एमबीए की तैयारी करते समय यही लग रहा था कि मैं कर क्‍या रहा हूं ? संगीत के प्रति मेरा रुझान बढ़ता जा रहा था। संगीत में सफलता मिलती रही तो उनका समर्थन बढ़ता गया। मैंने 1997 में शुरुआत की। 2000 तक मैं कमर्शियल करने लगा था। रजत ढोलकिया को मेरे ऊपर और बाकी युवा संगीतकारों पर बड़ा असर रहा है। उनके जिंगल्‍स सभी गाते रहे हैं,जैसे कि ये दिल मांगे मोर... 2000 के मध्‍य से 2002 के जनवरी के बीच में मैंने उनके साथ 500 से अधिक ऐड किए। दिन-रात वही कर रहा था।

-क्‍या ऐड और जिंगल्‍स करते समय भी ध्‍यान में था कि एक दिन मुझे फिल्‍मों में संगीत देना है ?
0 अचेतन में तो था ही। ऐसा नहीं थ कि हड़बड़ी में कोई भी फिल्‍म ले लूं। मुझे पहले भी फिल्‍मों के ऑफर मिले। शुरू से तय था कि अपनी मर्जी का बेहतरीन काम करने की आजादी मिलने पर ही फिल्‍म करुंगा। कुछ लोग दूसरों के अनुसार भी बेहतर काम कर लेते हैं। मैं नहीं कर सकता। मैंपे कुछ फिल्‍मों एक-दो गाने किए हैं। पूरी फिल्‍म पहली बार कर रहा हूं।

-विशाल भारद्वाज ने पहली बार किसी और के लिए गीत गाए और रहमान साहब ने अपनी आवाज के साथ संगी भी दिया। यह कैसे संभव हुआ ?
0 यह उन दोनों का स्‍नेह और प्‍यार है। मेरे संगीत ही नहीं,जीवन पर भी मेरा प्रभाव रहा है। अपने काम में उनका यकीन अनुकरण करने की चीज है। वे लोकप्रिय और कामयाब होने के साथ विनम्र भी हैं।


ै या  का बड़ा नाम और काम है। एक

Thursday, October 1, 2015

मानवीय संवेदनाओं की कहानी 'तलवार'



-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ज
    मुंबई के पाली हिल में गुलजार का बोस्कियाना है। बेटी बोस्‍की के नाम पर उन्‍होंने अपने आशियाने का नाम बोस्कियाना रखा है। गुलजार और राखी की बेटी बोस्‍की ने कभी पर्दे पर आने की बात नहीं सोची। बोस्‍की बड़ी होकर मेघना कहलायीं। उन्‍होंने पर्दे के पीछे रहने और कहानी कहने में रुचि ली। पहली फिल्‍म फिलहाल आई। कुछ समय घरेलू जिम्‍मेदारियोंं में गुजरा। घर-परिवार की आवश्‍यक जिम्‍मेदारी से अपेक्षाकृत मुक्‍त होने पर उन्‍होंने फिर से फिल्‍म निर्देशन के बारे में सोचा। इस बार उन्‍हें अपने पिता गलजार के प्रिय विशाल भारद्वाज का साथ मिला। तलवार बनी और अब रिलीज हो रही है।
             मेघना टोरंटो फिल्‍म फस्टिवल से लौटी हैं। वहां इस फिल्‍म को अपेक्षित सराहना मिली है। मेघना अपने अनुभव बताती हैं, जिंदगी के कुछ लमहे ऐसे होते हैं,जिन्‍हें आप हमेशा याद रखते हैं। वे यादगार हो जाते हैं। पहले ही सीन में इरफान एक लतीफा सुनाते हैं। इस लतीफे पर यहां की स्‍क्रीनिंग में किसी ने रिएक्‍ट नहीं किया था। मैंने पाया कि वहां 1300 सीट के हॉल में सभी ठठा कर हंसे। इनमें 65 प्रतिशत विदेशी दर्शक थे। यहां से जो माहौल बना,वह फिल्‍म के अंत तक तारी रहा। यह फिल्‍म जुमलों ऑर लतीफों की नहीं है। अगर आप भारतीय नहीं हैं तो इस केस के बारे में जानते भी नहीं। पूरी फिल्‍म को आप सबटायटल से फॉलो कर रहे हैं। दर्शकों के उत्‍साह ने प्रोत्‍साहित किया।
    सबटायटल के साथ फिल्‍म का मजा आता है क्‍या ?  गुलजार हस्‍तक्षेप करते हैं, फिल्‍म का मीडियम ऐसा होता है कि वहां आप केवल पड़ या सुन नहीं रहे होते हें। आप देखते हैं। कानों में ध्‍वनियां आ रही हैं। बैकग्राउंड स्‍कोर दृश्‍यों को संदर्भ और अर्थ देता है। कला‍कारो के बॉडी लैंग्‍वेज से दृश्‍यों का भाव भी समझ में आता है। धीरे-धीरे फिल्‍म से आप का रिश्‍ता बन जाता है। आप डायरेक्‍टर के साथ हो जाते हैं। फिल्‍म समझने लगते हें तो सबटायटल से निगाह हट जाती है। अगर आप डीवीडी से देख रहे हों तो दृश्‍यों को ठीक से समझने के लिए वापिस भी आ जाते हैं। सिनेमाघर में सचेत रहना पड़ता है,क्‍योंकि वहां रिप्‍ले नहीं हो सकता।
    मेघना गुलजार तलवार को ह्यूमन कहानी मानती हैं। फिल्‍म में हत्‍या और अपराध है,लेकिन यह मर्डर मिस्‍ट्री नहीं है। वह स्‍पष्‍ट कहती हैं, अगर हमारी सामाजिक,न्‍यायिक और प्रशासनिक संस्‍थाओं से असंतोष है तो वह कहानियों में चरित्रों के अंतर्संबंधों से जाहिर होता है। कानून व्‍यवस्‍था में कहीं कोई कमी रह जाती है तो वह अखरती है। यह सिस्‍टम में फंसे व्‍यक्तियों की कहानी है। इसकी वजह से ही दर्शक जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। गुलजार जोड़ते हैं, इसमें संवादों में सूचनाएं हैं। भारत के दर्शकों को यह सुविधा रहेगी कि वे इस केस के बारे में जानते हैं। मैंने मेघना को इस फिल्‍म के लिए दिन-रात काम करते देखा है। कई बार तो ऐसा होता था कि मेरा नाती मां के इंतजार से थक कर मेरे पास आकर सो जाता था। फिल्‍मकें जब बन रही होती हैं तो रिश्‍ते किनारे हो जाते हैं।
    सभी जानते हैं कि यह आरुषि कोड पर आधारित फिल्‍म है। लेकिन क्‍या मेघना इसे उस कांड पर बनी आधिकारिक फिल्‍म मानती हैं। और फिर यह भी सवाल है कि क्‍या यह किसी घटना का इस्‍तेमाल नहीं है ? मेघना जवाब देती हैं, न तो हम ने इंकार किया है और न ही स्‍वीकार किया है। हम झूठ नहीं बोलना चाहते। ट्रेलर से ही स्‍पष्‍ट हो जाता है। यह फिल्‍म उस कांड का विजुअल नाटकीयकरण है। हम ने अपने किरदारों को एक से ज्‍यादा डायमेंशन देने की कोशिश की है। केस के फैक्‍ट में कोई छेड़खानी नहीं की गई है। मेरी फिल्‍म का कंटेंट तो पब्लिक डोमेन में है। अगर कोई कहता है हिक हम ने इस का इस्‍तेमाल किया है तो मैं यही कहूंगी कि अगर हमें इसे स्‍कैंडलस फिल्‍म के तौर पर पेश करना होता तो हम चरित्रों के अलग-अलग डायमेंशन में नहीं जाते। एक ही पक्ष की कहानी कह देते तो कट्रोवर्सी और पर्याप्‍त कवरेज मिल जाता।
       मेघना के तर्क को गुलजार विस्‍तार देते हें, यह फिल्‍म मर्डर पर फोकस नहीं करती। कानूनी और जांच प्रक्रिया में क्‍या हुआ और उसका चरित्रों पर क्‍या असर पड़ा ? समाज में कानून औा कानून से व्‍यक्ति के रिश्‍ते को तो आम आदमी झेल ही रहा है। वह इसे समझ सकेगा। उसे अपना हिस्‍सा नजर आएगा। फिल्‍म सुने और पढ़े गए किस्‍से को विजुअल बना देती है। मेघना आगे कहती हैं, मेरे लिए बेटी के साथ एक बीवी और मां की भी कहानी है। मैं स्‍वयं एक बेटी और मां हूं। मैंने स्‍त्री की सोच भी रखी है।
    इस फिल्‍म में गुलजार की कैसी हिस्‍सेदारी रही है ? गुलजार बताते हैं, मेरा सपोर्ट हरमोनियम पर रहा है। मैं पेटी मास्‍टर के साथ था। इस फिल्‍म में गानों की ज्‍यादा गुंजाइश नहीं थी। मैंने ट्राय भी किया और कुछ गीत भी लिखे,लेनि मेघना रिजेक्‍ट कर देती थीं। इनका कहना होता था कि किरदारों के साथ यह नहीं जाता। मैंने फिल्‍म की थीम पर कमेंट की सुरत में कुछ कहा है। जिस दिन आकाश बेदाग होगा,चेहरा चांद का साफ होगा। जिस दिन समय ने आंखें खेलीं,इंसाफ होगा,इंसाफ होगा।