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फिल्‍म समीक्षा : गोलमाल अगेन

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फिल्‍म रिव्‍यू गोलमान अगेन -अजय ब्रह्मात्‍मज इस फिल्‍म में तब्‍बू अहम भूमिका में हैं। उनके पास आत्‍माओं को देख सकती हैं। उनकी समस्‍याओं का निदान भी रहता है। जैसे कि एक पिता के बेटी के पास सारे अनभेजे पत्र भेज कर वह उसे बता देती हैं कि पिता ने उसके इंटर-रेलीजन मैरिज को स्‍वीकार कर लिया है। तब्‍बू ‘गोलमाल अगेन’ की आत्‍मा को भी देख लेती हैं। चौथी बार सामने आने पर वह कहती और दोहराती हैं कि ‘गॉड की मर्जी हो तो लॉजिक नहीं,मैजिक चलता है’। बस रोहित शेट्टीी का मैजिक देखते रहिए। उनकी यह सीरीज दर्शकों के अंधविश्‍वास पर चल रही है। फिल्‍म में बिल्‍कुल सही कहा गया है कि अंधविश्‍वास से बड़ा कोई विश्‍वास नहीं होता। फिर से गोपाल,माधव,लक्ष्‍मण 1,लक्ष्‍मण2 और लकी की भूमिकाओं में अजय देवगन,अरशद वारसी,श्रेयस तलपडे,कुणाल ख्‍येमू और तुषार कपूर आए हैं। इनके बीच इस बार परिणीति चोपड़ा हैं। साथ में तब्‍बू भी हैं। 6ठे,7वें और 8वें कलाकार के रूप संजय मिश्रा,मुकेश तिवारी और जॉनी लीवर हैं। दस कलाकारों दस-दस मिनट (हीरो अजय देवगन को 20 मिनट) देने और पांच गानों के फिल्‍मांकन में ही फिल्‍म लगभग पूरी हो जाती है। बाकी कसर ना…

फिल्‍म समीक्षा - दृश्‍यम

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-अजय ब्रह्मात्‍मज             मलयालम, कन्नड, तेलूगु और तमिल के बाद ‘दृश्यम’ हिंदी में आई है। हिंदी में इसे दृश्य कहा जाएगा। संस्कृत मूल के इस शब्द को ही हिंदी के निर्माता-निर्देशक ने शीर्षक के तौर पर स्वीकार किया। भाषिक मेलजोल और स्वीकृति के लिहाज से यह उल्लेखनीय है। निर्माता ने फिल्म में इसे ‘दृष्यम’ लिखा है। यह गलत तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हिंदी में प्रचलित नहीं है। इन दिनों अधिकांश निर्माता फिल्मों के पोस्टर हिंदी में लाने में रुचि नहीं लेते। लाते भी हैं तो रिलीज के समय दीवारों पर चिपका देते हैं। तब तक फिल्मों के नाम गलत वर्तनी के साथ पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे होते हैं।               हिंदी में बनी ‘दृश्यम’ में अजय देवगन और तब्बू हैं। दोनों उम्दा कलाकार हैं। तब्बू ने हर बार अपनी अदाकारी से दर्शकों को सम्मोहित किया है। ‘दृश्यम’ में पुलिस अधिकारी और मां की द्विआयामी भूमिका में वह फिर से प्रभावित करती हैं। दृश्यों के अनुसार क्रूरता और ममता व्यक्त करती हैं। अजय देवगन के लिए विजय सलगांवकर की भूमिका निभाने का फैसला आसान नहीं रहा होगा। पिछली कुछ फिल्मों ने उनकी छवि सिंघम की बना दी है। इ…

फिल्‍म समीक्षा : हैदर

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  1990 में कश्मीर में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के लागू होने के बाद सेना के दमन और नियंत्रण से वहां सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बेकाबू हो गई थी। कहते हैं कि कश्मीर के तत्कालीन हालात इतने बदतर थे कि हवाओं में नफरत तैरती रहती थी। पड़ोसी देश के घुसपैठिए मजहब और भारत विरोध केनाम पर आहत कश्मीरियों को गुमराह करने में सफल हो रहे थे। आतंक और अविश्वास के उस साये में पीर परिवार परस्पर संबंधों के द्वंद्व से गुजर रहा था। उसमें शामिल गजाला, हैदर, खुर्रम, हिलाल और अर्शिया की जिंदगी लहुलूहान हो रही थी और सफेद बर्फ पर बिखरे लाल छीटों की चीख गूंज रही थी। विशाल भारद्वाज की 'हैदर' इसी बदहवास दौर में 1995 की घटनाओं का जाल बुनती है। 'मकबूल' और 'ओमकारा' के बाद एक बार फिर विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के कंधे पर अपनी बंदूक रखी है। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा कि प्रकाश झा ने अपनी फिल्मों में नक्सलवाद को हथिया लिया वर्ना उनकी 'हैदर' नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में होती। जाहिर है विशाल भारद्वाज को 'हैदर' की पृष्ठभूमि के लिए राजनीति…

फिल्‍म समीक्षा : डेविड

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नाम में कुछ रखा है -अजय ब्रह्मात्मज लंदन - 1975 मुंबई - 1999 गोवा - 2010
अलग-अलग देशकाल में तीन डेविड हैं। इन तीनों की अलहदा कहानियों को बिजॉय नांबियार ने एक साथ 'डेविड' में परोसा है। फिल्म की इस शैली की जरूरत स्पष्ट नहीं है, फिर भी इसमें एक नयापन है। लगता है नाम में ही कुछ रखा है। लेखक-निर्देशक चाहते तो तीनों डेविड की कहानियों पर तीन फिल्में बना सकते थे, लेकिन शायद उन्हें तीनों किरदारों की जिंदगी में पूरी फिल्म के लायक घटनाक्रम नहीं नजर आए। बहरहाल, बिजॉय एक स्टायलिस्ट फिल्ममेकर के तौर पर उभरे हैं और उनकी यह खूबी 'डेविड' में निखर कर आई है। लंदन के डेविड की दुविधा है कि वह इकबाल घनी के संरक्षण में पला-बढ़ा है। घनी उसे अपने बेटे से ज्यादा प्यार करता है। डेविड को एक प्रसंग में अपने जीवन का रहस्य घनी के प्यार का कारण पता चलता है तो उसकी दुविधा बढ़ जाती है। गैंगस्टर डेविड अपने संरक्षक घनी की हत्या की साजिश में शामिल होता है, लेकिन ऐन वक्त पर वह उसकी रक्षा करने की कोशिश में मारा जाता है। मुंबई के डेविड की ख्वाहिश संगीतज्ञ बनने की है। वह अपने पादरी पिता की करुणा और व्यवहार स…

फिल्‍म समीक्षा : लाइफ ऑफ पाई

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-अजय ब्रह्मात्‍मज यान मार्टेल का उपन्यास 'लाइफ ऑफपाई' देश-विदेश में खूब पढ़ा गया है। इस उपन्यास ने पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया है। विश्वप्रसिद्ध फिल्मकार आंग ली ने इसी उपन्यास को फिल्म का रूप दिया है। 3 डी तकनीक के उपयोग से उन्होंने मार्टेल की कल्पना को पर्दे पर धड़कन दे दी है। जीव-जंतु और प्राकृतिक सौंदर्य की लगभग नैसर्गिक अनुभूति दिलाने में वे सफल रहे हैं। यह फिल्म पाई की कहानी है। पांडिचेरी के निजी चिड़ियाघर के मालिक के छोटे बेटे पाई के माध्यम से निर्देशक ने जीवन, अस्तित्व, धर्म और सहअस्तित्व के बुनियादी प्रश्नों को छुआ है। पाई अपने परिवार के साथ कनाडा के लिए समुद्र मार्ग से निकला है। रास्ते के भयंकर तूफान में उसका जहाज डूब जाता है। मां-पिता और भाई को डूबे जहाज में खो चुका पाई एक सुरक्षा नौका पर बचा रह जाता है। उस पर कुछ जानवर भी आ गए हैं। आखिरकार नाव पर बचे पाई और बाघ के बीच बने सामंजस्य और सरवाइवल की यह कहानी रोमांचक और रमणीय है। किशोर पाई की [सूरज शर्मा] की कहानी युवा पाई [इरफान खान] सुनाते हैं। अपने ही जीवन के बारे में बताते समय पाई का चुटीला अंदाज कहानी को …

तब्‍बू से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

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तब्बू
‘बाजार’ और ‘हम नौजवां’ में झलक दिखलाने के बाद 1987 में तेलुग़ू फिल्म कुली नं. 1 से तब्बू ने अभिनय यात्रा आरंभ की। उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘प्रेम’ बनने में ही सात साल लग गए। बोनी कपूर ने अपने छोटे भाई संजय कपूर के साथ उन्हें लांच किया था। 1994 में आई ‘विजयपथ’ से उन्हें दर्शकों ने पहचाना और मुंबई के निर्माताओं ने रूक कर देखा। तब्बू ने हर तरह की फिल्मों में काम किया। उन्हें ‘माचिस’ और ‘चंादनी बार’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मीरा नायर की फिल्म ‘नेमसेक’ में तब्बू 2007 में दिखी थीं। उसके बाद से उनकी कोई महत्वपूर्ण फिल्म नहीं आई है। दर्शकों को तब्बू का और तब्बू को फिल्मों का इंतजार है। इस साल इरफान के साथ उनकी फिल्म ‘लाइफ ऑफ पी’ आएगी। तब्बू से यह बातचीत किसी विशेष प्रयोजन से नहीं की गई है। तब्बू ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार शेयर किए हैं।
- आप ने ज्यादातर नए डायरेक्टर के साथ काम किया। ऐसे चुनाव में जोखिम भी रहता है। क्या आप को कभी डर नहीं लगा कि आप का बेजा इस्तेमाल हो सकता है? 0 मैंने लगभग हर फिल्म में नए डायरेक्टर के साथ काम किया है। और ऐसा भी नहीं कि वे सब सफल हो ग…

मैं शोर क्यों मचाऊं -तब्‍बू

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