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Sunday, September 1, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी


कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए - संजय सूरी
अजय ब्रह्मात्मज
देखते-देखते 20 साल हो गए. 25 जून 1999 को संजय सूरी कि पहली फिल्म ‘प्यार में कभी कभी’ रिलीज़ हुई थी. तब से वह लगातार एक खास लय और गति से हिंदी फिल्मों में दिख रहे हैं.
संजय सूरी बताते हैं,’ सच कहूं तो बचपन में कोई प्लानिंग नहीं थी. शौक था फिल्मों का. सवाल उठता था मन में फ़िल्में कैसे बनती हैं? कहां बनती हैं? यह पता चला कि फ़िल्में मुंबई में बनती हैं. मुझे याद है ‘मिस्टर नटवरलाल’ की जब शूटिंग चल रही थी तो उसके गाने ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों’ में हम लोगों ने हिस्सा लिया था. बच्चों के क्राउड में मैं भी हूं. मेरी बहन भी हैं. मैं उस गाने में नहीं दिखाई पड़ता हूं. मेरी सिस्टर दिखाई पड़ती है. मेरी आंख में चोट लग गई थी तो मैं एक पेड़ के पीछे छुप गया था. रो रहा था. श्रीनगर में फिल्में आती थी तो मैं देखने जरूर जाता था. तब तो हमारा ऐसा माहौल था कि सोच ही नहीं सकते थे कि कभी निकलेंगे यहां से...’



Monday, August 12, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल


फिल्म लॉन्ड्री
‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल
अजय ब्रह्मात्मज
2003 में आई विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में थापा का किरदार निभाने के पहले दीपक डोबरियाल ने अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ में राजेंद्र भाटी और  अमृत सागर की ‘1971 में फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुर्टू की भूमिकाएं निभा ली थीं. कैमरे से उनका सामना हो चूका था. संयोग कुछ ऐसा बना कि इन दोनों फिल्मों से पहले विशाल भारद्वाज की ‘ओमकारा’ रिलीज हो गई. इस फिल्म में लंगड़ा त्यागी(सैफ अली खान) के साथ वह राजेश तिवारी की भूमिका में दिखे. इस भूमिका में उन्हें भरपूर सराहना और फिल्म फेयर का स्पेशल अवॉर्ड मिला. ‘ओमकारा’ में उनके नाम के पहले ‘इंट्रोड्यूसिंग’ लिखा गया था, जिसे देखकर अनुराग कश्यप ने अफसोस और खुशी जाहिर की थी. दरअसल, ‘गुलाल’ नहीं अटकती और समय पर रिलीज हो जाती तो दीपक डोबरियाल को’ इंट्रोड्यूस’ करने का श्रेय अनुराग कश्यप को मिल जाता.
बहरहाल, ‘ओमकारा’ ने उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कबरा गांव में जन्मे दीपक डोबरियाल के कैरियर को आवश्यक गति दे दी. इस फिल्म के लिए मिली सराहना और पुरस्कार के बावजूद बड़ी पहचान बनाने में दीपक डोबरियाल को चार साल लग गए. 2010 में दीपक डोबरियाल को बेला नेगी के निर्देशन में आई ‘बाएं और दाएं’ में नायक रमेश मजीलता और ‘तनु वेड्स मनु’ में पप्पी की भूमिकाएं मिलीं. पहली फिल्म में वह नायक थे, लेकिन ‘बाएं और दाएं’ सीमित रिलीज की वजह से कम देखी गई. वहीं आनंद राय की ‘तनु वेड्स मनु’ की लोकप्रियता ने पप्पी को दर्शकों का प्रिय बना दिया. पप्पी को बहुत पसंद किया गया. पांच सालों के बाद ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में फिर से पप्पी की भूमिका ने दीपक डोबरियाल को दोहरी ख्याति के  के साथ छवि का शिकंजा भी दिया. उन्हें कॉमिक रोल के कलाकार के पाश में बांधने की कोशिश की गयी. वे सचेत रहें उन्होंने प्रसिद्धि कायम रखने की आसान राह नहीं चुनी. दुनियावी तौर पर खुद का नुकसान सहा और बेहतरीन किरदार के इंतजार में रहे. मुहावरों में ही ‘सब्र का फल मीठा’ नहीं होता. इंतजार और लगन से जिंदगी में भी मिठास आती है. ‘हिंदी मीडियम’ में दीपक डोबरियाल को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का बड़ा मौका दिया. साथ में इरफ़ान थे तो समुचित और समक्ष परफॉर्मेंस के लिए उत्साह भी रहा. इरफ़ान ने सहअभिनेता को प्रदर्शन का पूरा मौका दिया. इस फिल्म में उनका किरदार श्याम प्रकाश कोरी निखर कर दर्शकों के बीच पहुंचा और सहानुभूति व सराहना ले गया. सभी ने माना कि दीपक ने इरफ़ान को टक्कर दी. दीपक मानते हैं कि इरफ़ान भाई से सीखने का मौका मिला.
‘बाबा’ की रिलीज के पहले दीपक डोबरियाल फिर से इरफान के साथ ‘अंग्रेजी मीडियम’ की शूटिंग कर रहे थे. कैंसर की बीमारी से स्वस्थ होकर लौटे इरफान ने ‘अंग्रेजी मीडियम’ के लिए हामी भरी तो उनके प्रशंसकों को सुकून के साथ खुशी मिली. दीपक डोबरियाल और इरफान की केमिस्ट्री फिर से इस फिल्म में दिखेगी. दीपक इस फिल्म के बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं. उनके लिए एक फ्रेम में इरफान के साथ आना किसी ने नेमत से कम नहीं है. दीपक बताते हैं,’ उन्होंने पूरे फन और एनर्जी के साथ काम किया. इस बार उनका सुर अलग ही दर्जे का है. कहीं भी नहीं लगता कि वे किसी चीज से जूझ रहे हैं. थोड़े दार्शनिक भाव में रहते हैं और शांत हो गए हैं. उन्होंने हमें इतना केयर और प्यार दिया. सेट पर हंसी-खुशी का माहौल रहता था. शॉट लेने से पहले हमारी बैठकी में हंसी-मजाक के फव्वारे फूटते थे. सभी उस में भीग जाते थे. माहौल बन जाता था. मेरी तो यही दुआ है कि वे जल्दी से जल्दी पहले की तरह एक्टिव हो जाएं. दर्शकों को उनका अंदाज दिखे.’ दीपक डोबरियाल इरफ़ान को ‘बाबा’ दिखाना चाहते हैं. इरफ़ान की  प्रतिक्रिया और सराहना की उम्मीद से अधिक दीपक को विश्वास है कि ‘मेरी फिल्म देखकर वे बहुत खुश होंगे. वे मुझे इतना मानते और स्नेह देते हैं कि उनकी खुशी की कल्पना से ही मैं अभिभूत रहता हूं.
‘हिंदी मीडियम’ के बाद दीपक डोबरियाल ‘लखनऊ सेंट्रल’, ‘कालाकांडी’ और  ‘बागी 2 में दिखे. पिछले साल उनकी ‘कुलदीप पटवाल आई डिड नॉट डू इट’ आई थी. भूमिका बड़ी थी,फिल्म छोटी थी. बड़ी रिलीज नहीं मिलने से यह अधिक दर्शकों तक नहीं पहुंच सकी. इस बीच राज गुप्ता ने उनसे मिलने और ‘बाबा’ की स्क्रिप्ट सुनाने की अनेक कोशिशें कीं. दीपक के डेढ़ महीने के टालमटोल को समझते हुए एक दिन राज ने सीधे शब्दों में कह दिया, ‘आपको मना ही तो करना है. एक बार सुन लो.’ दीपक बताते हैं,’ राज की यह बात मुझे चुभ गई. मुझे लगा कि नया लड़का है. जरूर कोई बात होगी. मैंने स्क्रिप्ट सुनी और फिर अभी फिल्म सभी के सामने है. अब तो मैंने तय कर लिया है कि कोई भी स्क्रिप्ट हो. मैं सुनूंगा जरूर. नए बंदों को भी अनदेखा नहीं करूंगा.’ दीपक यारी रोड के एक कैफ़े में नितमित रूप से से नए कलाकारों से मिलते हैं और उन्हें गाइड करते हैं.
दीपक नहीं चाहते कि नए लड़के अनावश्यक झेंप और संकोच में न रहें . फिल्म इंडस्ट्री के भौकाल से ना डरें.
बातचीत के मुख्या अंश
‘बाबा’ में नायक की भूमिका है आपकी. इस फिल्म की रिलीज को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेंगे या सिर्फ आंतरिक खुशी मिली है कुछ कर पाने की?
मेरे लिए आंतरिक खुशी का वक्त है. हमें और आपको मालूम है कि इंडस्ट्री में हमारे जैसे कलाकारों को कैसे रोल मिलेंगे? इस कमरे से उस कमरे में जाते हुए मैं कभी सोचता और विजुलाइज करता हूं कि क्या कोई मेरे मुताबिक रोल ले आएगा. मराठी फिल्म ‘बाबा’ में मुझे मेरी सोच और कल्पना का रोल मिल गया है. मैं खुद को सौभाग्यवान मान रहा हूं कि यह स्क्रिप्ट मेरे पास आई.
उत्तराखंड के कबरा गांव से मुंबई के यारी रोड तक के सफर को पलट कर देखें तो क्या एहसास पनपते हैं?
शुरू में तो कुछ सोच ही नहीं पाता था. तब केवल काम चाहिए था. थोड़ा काम मिला... बाद में कुछ और काम मिला. तब एक एहसास और गर्व होता था कि मैं आगे आया हूं. कबरा गांव से यहां तक आ गया. मेरी ही तरह मेरे गांव और दिल्ली के दोस्तों को लगता होगा कि मेरी तरक्की हो रही है, लेकिन सच कहूं तो यही लगता है कि असली खुशी छोड़ आई जगहों में रह गयी है. आगे बढ़ने और पीछे रह जाने के भेद से मैं निकल चुका हूं. अब मुझे छूट गई चीजों की कदर पता चलने लगी है. अभी पिछले दिनों गांव गया तो झड़ते पहाड़ों को देखकर दुख हुआ. वहां पलायन जारी है. स्खलन से पहाड़ नंगे हो रहे हैं. मेरे घर के पास का 800 साल पुराना पेड़ गिर गया. मैंने वहां एक पेड़ लगाया. उसका लहलहाना देख कर जोश आया और मैंने डेढ़ सौ पेड़ लगाए. आम. लीची. आडू, कटहल के पेड़ लगाए हैं. अपने गांव से फिर से जुड़ गया हूं. कुछ और स्थिरता आ जाये तो तीन-चार महीने वहीँ रहूँगा.
फिर भी दुनियावी पहचान और कामयाबी तो आगे बढ़ना है ही....
कहां सर? अभी मैंने लंदन में वैन गॉग की पेंटिंग ‘स्टारी नाइट’ देखि. देखकर दंग रह गया. वह पेंटिंग हिप्नोटाइज कर लेती है. उसे देखते हुए लगा कि मैं किस बात पर इतरा रहा हूं. अभी मैंने किया ही क्या है. यहां फिल्म के दिग्गजों का काम देख कर एहसास ए कमतरी होती है. मीडिया और अखबार दिखला रहे हैं कि आज के लोकप्रिय स्टार/एक्टर फलां हैं. लेकिन एक एक्टर के तौर पर मुझे तो दिख ही जाता है कि कौन क्या है? बलराज साहनी को ले लें. उन्होंने किस डिग्निटी के साथ ‘गर्म हवा’ की भूमिका निभाई है? उन्होंने कैसे निभाई होगी? फिर उन्हीं को आप ‘दो बीघा जमीन’ में देखते हैं. गंवई किसान और रिक्शावाला के रूप में.. और फिर ‘वक्त’ में उनका अंदाज देख लें. मुझे मालूम है कि मेरे जैसा कौन खाता था? यहां तो स्टार को एसिडिटी हो रखी है और वह चौड़े होकर चला जा रहा है. उधार की उर्जा लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहता मैं. 10 सालों के बाद यह एहसास नहीं चाहता कि अरे मैं तो भटक गया था. मैं अपनी कमजोरी, आकांक्षा, समाज के जोर से अनचाहे रास्ते पर नहीं जाऊंगा. इरफान भाई को देख लें. उन्हें लंबा वक्त लगा, लेकिन उन्होंने हिला कर रख दिया, एक बार उनसे मैंने पूछ दिया कि अपनी ‘बेइज़्ज़तियों’ के बारे में बताइए. वे खूब हंसे मेरे सवाल पर. उन्होंने मजे लेकर कई किस्से सुनाए.
इरफान की ‘बेइज्ज़ती’ तो आप नहीं बताएंगे. अपनी बताएं. आपकी कैसी और कब ‘बेइज्जती’ हुई?
मेरे भी कई किस्से हैं. एक तो शुरुआती दिनों का है. दिल्ली के सराय रोहिल्ला में ‘एक्टिंग सीखो’ बोर्ड लगा हुआ था. उसे देख कर मैं उनके यहां पहुंचा. पता किया तो मालूम हुआ कि हर महीने 150 रुपये देने होंगे और छह महीने के बाद नाटक होगा तो रोल मिलेगा. छह महीनों तक मैं डेढ़ सौ रुपये’ देता रहा. फिर नाटक हुआ तो मुझे पांच दिनों पहले बताया गया कि तुम इसमें शैतान का रोल कर रहे हो. और तुम्हारे दाएं बाएं दो गुर्गे होंगे. मेरा रोल हिंदू-मुसलमान में भेद डालकर दंगा करवाने का था. ऐवान ए गलिन  में शो था. मैंने दोस्तों को बता दिया. वे नाटक देखने आये.  मुझे स्टेज पर देखकर वे सभी हंसते हुए पागल होते रहे. नाटक ख़त्म होने के बाद मैंने अपने काम के बारे में पूछा तो सब ने मेरा मजाक उड़ाया और हँसे. उनकी हंसी मेरे दिल में चुभ गई. बड़ी बेइज्जती महसूस हुई. वहां से मैं सीधे मंडी हाउस गया. पहले अरविंद गौड़ और फिर एक्ट वन में मैंने काम किया. दोनों जगहों पर मेर ट्रेनिंग हुई. ढाई सालों के बाद पुराने दोस्तों में से दो ने किसी पोस्टर पर मुझे देखा तो नाटक देखने आए. नाटक देख कर दोनों अचंभे में रह गए..फिर एक संतुष्टि हुई. मैंने तभी सीख लिया कि ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो. मुंबई की हर ‘बेइज्ज़ती’ को अपनी असफलता मानकर मैंने सीखने की कोशिश की. महंगाई और प्रतियोगिता के इस शहर में कुढ़ने से काम नहीं चलेगा. अपने अनुभव नए लोगों में बाँटता हूं. उन्हें बताता हूं कि संकोच ना करो. मैं इंडस्ट्री का हौआ शांत कर देता हूं. मुझे ऐसा कोई नहीं मिल पाया था. बाकी ‘बेइज्ज़ती’ के कितने किस्से सुनाऊं? अपनी फिल्म के प्रीमियर पर रोक दिया गया हूं. अपमानित होता रहा हूँ.
दिल्ली में रंगमंच की सक्रियता के दिनों में किन लोगों ने आप को तराशा?
सबसे पहले अरविंद गौड़ का नाम लूंगा. फिर एनके शर्मा, पियूष मिश्रा, शाहिद अनवर(अब नहीं रहे). शाहिद भाई से मेरा याराना था. उन्होंने शायरी और किताबों से प्रेम करना सिखाया. वह हमेशा साथ रहे. एनएसडी के राम गोपाल बजाज रोबिन दास, प्रसन्ना... प्रसन्ना के साथ मैं काम नहीं कर पाया. सीनियर और अनुभवी के साथ रहो तो एनर्जी बचती है. खुद खोजने और सोचने में वक्त बिताने से बेहतर है कि गुरुओं से पूछ लो. उनसे निर्देश ले लो. संगत का बहुत असर रहा है मुझ पर.
ऐक्टर होने के आरंभिक तैयारी के पाठ क्या थे?
परस्पर ऑब्जर्वेशन... मैं तो नाटक देख कर ही सीखता गया. एनएसडी के प्ले नहीं छोड़ता था. बाकी थिएटर ग्रुप के भी नाटक देखा करता था. यशपाल शर्मा, चितरंजन गिरि, मुकेश तिवारी, विजय राज आदि से काफी कुछ सीखा, हम कलाकारों ने आपसी विवाद और विमर्श से बहुत कुछ सीखा और खुद को सुधारा. समीक्षकों की भाषा अधिक समझ में नहीं आती थी. जो समझ में नहीं आता था उसके बारे में पता करता था. अब जैसे रोबिन दास ने एक बार कहा कि कलाकारों को ‘कलात्मक पूर्वाग्रह’ छोड़ना चाहिए. मुझे लगा कि हम भी कलाकार हैं तो हमें यह छोड़ना चाहिए, लेकिन समझ में नहीं आया कि क्या छोड़ना है? तो उनसे ही पूछने चला गया. दिल्ली के दिनों में फिल्मों में आने की बात सोची भी नहीं थी मैंने.
आपने रंगमंच से अभिनय सीखा. फिर आप फिल्मों में आ.ए फिल्मों का अभिनय थोड़ा अलग होता है. क्या और कैसे बदलना पड़ा खुद को?
नाटक में प्रोजेक्शन पर जोर रहता है. फिल्मों में रिएक्शन का खयाल रखना पड़ता है. बारीक़ फर्क है, लेकिन कैमरा बहुत संवेदनशील होता है. बारीक से बारीक रिएक्शन भी पकड़ लेता है. फिल्म का अभिनय किफायती होता है. मुझे लगता है कि फिल्मों में आने और निरंतर काम से भी अभिनय में सुधार और निखार आता है. फिल्मों में अभिनय की निजी शैली विकसित हो जाती है. वह ज़रूरी है. सिनेमा के अभिनय में शब्दों के दृश्य साहचर्य को समझना बहुत जरूरी है.
शुरुआती दिनों में कैसी दिक्कतें रहीं? मुंबई आ रहे हैं कलाकारों को अपने अनुभव से क्या बताना चाहेंगे? क्या मंत्र देंगे?
कोई मंत्र पर काम नहीं आता. सभी अपनी यात्रा तय करते हैं. फिर भी मुझे लगता है कि बाहर से आए कलाकारों को ‘कस्बाई संकोच’ छोड़ देना चाहिए. यहां आने पर मेरे दोस्त कहते थे कि दिल्ली के परिचितों को फोन कर... जाकर मिल. मैं संकोच में नहीं जाता था. मुझे लगता है कि ‘कस्बाई संकोच’ नहीं रहना चाहिए. विनम्र भाव से अप्रोच करने में दिक्कत नहीं है. ज्यादा से ज्यादा इंकार ही तो मिलेगा. हां,बदतमीजी नहीं होनी चाहिए. बाहर से आए लोगों में एक फालतू अकड़ भी रहती है. मुझे चार साल लगे. संघर्ष के दिनों में एक कमरे में हम छह लोग साथ रहते थे. एक ही बिस्तर था कोई एक करवट बदलता था तो बाकी पांच को भी करवट बदलनी पड़ती थी. बिस्तर पर करवट की लहर चलती थी समुद्र की लहरों की तरह.
उस दौर का कोई प्यारा और सुखी अनुभव भी तो रहा होगा?
क्या बताऊं? ‘ओमकारा’ के लिए फिल्म फेयर का विशेष पुरस्कार मिला तो सारे खोए-बिछड़े दोस्त मिल गए. सभी अपने संघर्ष और सफलता के बिलों से निकलकर मिलने आए. उन्होंने पार्टी और सेलिब्रेशन के लिए अपने डेबिट और क्रेडिट कार्ड मुझे दे दिए. ऐसी दरियादिली कहां मिल सकती है? आज भी सोचता हूं तो आंखें नम हो जाती हैं. वह सुख और वह प्यार ही तो पूंजी है.
इस सफर में किन फिल्मों का उल्लेख करना चाहेंगे?
सबसे पहले ‘ओमकारा’.... इस फिल्म ने तो पूरी जिंदगी बदल दी. इस फिल्म ने मुझे बताओ एक्टर और इंसान...मेरी जिंदगी... सब कुछ ही बदल दिया. ‘तनु वेड्स मनु’ से पॉपुलर पहचान बनी, लेकिन ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के बाद यही पहचान फांस बन गई. इंडस्ट्री और प्रशंसकों ने बतौर एक्टर बांधने की कोशिश की. पप्पी की छवि से निकलना जरूरी हो गया था. ‘हिंदी मीडियम’ से यह मुमकिन हुआ. उस फिल्म से आदर और सम्मान मिला. इरफान भाई के साथ आना बड़ी बात रही. उन्होंने बहुत मदद की. उस रोल को निभाने में मजदूरों के बीच में किए नाटक और उनसे मेल-मुलाकात का अनुभव काम आया. ‘बाबा’ में मेरा काम लोगों को पसंद आ रहा है. इस फिल्म के लिए मैंने विराम लिया था और लगभग दो सालों का इंतजार किया. तीन-चार चालू किस्म की फिल्में छोडीं और आर्थिक नुकसान सहा. 
‘बाबा’ की भूमिका निभाते समय क्या कभी संजीव कुमार और नाना पाटेकर की फिल्मों की याद आई. उनके प्रभाव या उनसे बचाव की कोई कोशिश करनी पड़ी?
हर भूमिका निभाते समय सामान्य बातें तो एक ही तरीके से जहन में आती हैं. हमें अपनी भाषा तय करनी होती है. संजीव कुमार के साथ गुलजार साहब ने और नाना पाटेकर के साथ संजय लीला भंसाली ने अपने समय के मूक-वधिर की कहानी कही. मुझे राज गुप्ता के मूक-वधिर को पर्दे पर लाना था. हमारे फिल्मकारों ने मूक-वधिरों की अधिक कहानी नहीं कही. गिनती की फिल्में आ पाई हैं. प्रभाव का बोझ नहीं लेता मैं. इस फिल्म के लिए राज गुप्ता से बातचीत में तय हुआ कि माधव इतना गरीब है कि वह साइन लैंग्वेज भी नहीं सीख सकता. हमें इस किरदार को पर्दे पर थोड़े अलग भाव और अंदाज में पेश करना पड़ा.

पुनःश्च : शब्दों का दृश्य साहचर्य
इस बातचीत में दीपक ने शब्दों के दृश्य साहचर्य(विजूअल) की बात की है. इसके उदहारण के रूप में उन्होंने पानी का उल्लेख किया. संवाद में या जीवन में पानी बोलते समय आज के शहरी या मुंबई में पले-बढे कलाकार  के मानस में बोतल.नल और समंदर के पानी का दृश्य साहचर्य होगा. मैं पहाड़ से आता हूँ. मेरे लिए पानी के साथ झरना,वेगवती नदी.शांत नदी,तालाब,लोटे,बाल्टी और कुंए’ के पानी का दृश्य साहचर्य बनेगा. उससे पानी बोलते समय मेरा अनुभव कुच्छ और होगा. कलाकार की इन्द्रियां कितनी जागृत हैं और आप ने कितना पढ़ा या देखा है? इनसे बहुत फर्क पड़ता है.  


Monday, November 12, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में



आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्में पार्ट 3: यथार्थ और ख्याली दुनिया का कॉकटेल
-अजय ब्रह्मात्मज
(अभी तक हम ने मूक फिल्मों और उसके बाद आज़ादी तक की बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों का उल्लेख और आकलन किया.इस कड़ी में हम आज़ादी के बाद से लेकर 20वीं सदी के आखिरी दशक तक की ऐतिहासिक फिल्मों की चर्चा करेंगे.)

देश की आज़ादी और बंटवारे के पहले मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर भी हिंदी फिल्मों का निर्माण केंद्र था.आज़ादी के बाद लाहौर पाकिस्तान का शहर हो गया और कोलकाता में हिंदी फिल्मों का निर्माण ठहर सा गया.न्यू थिएटर के साथ जुड़ी अनेक प्रतिभाएं बेहतर मौके की तलाश में मुंबई आ गयीं.हिंदी फिल्मों के निर्माण की गतिविधियाँ मुंबई में ऐसी सिमटीं की महाराष्ट्र के कोल्हापुर और पुणे से भी निर्माता,निर्देशक,कलाकार और तकनीशियन खिसक का मुंबई आ गए.
मुंबई में नयी रवानी थी.नया जोश था.लाहौर और कोलकाता से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्म इंदस्ट्री को मजबूत और समृद्ध किया.देश के विभिन्न शहरों से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों को बहुमुखी विस्तार दिया.इसी विविधता से माना जाता है कि पांचवा और छठा दशक हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल है,जिसकी आभा सातवें दशक में भी दिखाई पड़ती है.आज़ादी के तुरंत बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति रुझान नहीं दिखाई देता,जबकि कुछ सालों पहले तक मुगलों,मराठों और राजस्थान के राजपूत राजाओं की शौर्य गाथाओं पर फ़िल्में बन रही थी.आज़ादी के पहले इन फिल्मों से राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन किया जा रहा था.मुमकिन है आज़ादी के बाद फिल्मकारों को ऐसे उद्बोधन की प्रासंगिकता नहीं दिखी हो.
सोहराब मोदी और उनकी ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले ‘पुकार(1939),’सिकंदर(1941) और ‘पृथ्वी वल्लभ(1943) जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में निर्देशित कर चुके सोहराब मोदी ने अजाची के बाद पहले ‘शीशमहल(1950) नामक सोशल फिल्म का निर्देशन किया.फिर 1952 में उन्होंने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘झाँसी की रानी का निर्माण और निर्देशन किया.यह फिल्म जनवरी 1953 में रिलीज हुई थी.इसका एक अंग्रेजी संस्करण भी बना था. अंग्रेजी में इसका शीर्षक था ‘द टाइगर एंड द फ्लेम. बता दें कि अंग्रेजी में डब करने के बजाय अलग से साथ में ही शूटिंग की गयी थी.इस वजह से फिल्म के सेट और शूटिंग पर भारी खर्च हुआ था.इस फिल्म की नायिका सोहराब मोदी की पत्नी महताब थीं.कहते हैं कि महताब रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में नहीं जंची थीं.उनकी उम्र किरदार की उम्र से ज्यादा लग रही थी.लिहाजा दर्शकों ने फिल्म नापसंद कर दी थी.हिंदी की पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘झाँसी की रानी का अब सिर्फ श्वेत-श्याम प्रिंट ही बचा हुआ हैं.अध्येता बताते हैं कि अंग्रेजी संस्करण का टेक्नीकलर प्रिंट मौजूद है. इस फिल्म से सोहराब मोदी को बड़ा नुकसान हुआ.
फिर भी दो सालों के अन्दर सोहराब मोदी ने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का निर्माण और निर्देशन किया.किस्सा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु को एक साल जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे सोहराब मोदी ने ग़ालिब का शेर सुनाया तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के दिन हों पचास हज़ार
नेहरु ने शायर का नाम पूछा और सोहराब मोदी से उनके ऊपर फिल्म बनाने की बात कही.सोहराब मोदी ने उनकी बात मान ली. भारत भूषण और सुरैया के साथ उन्होंने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब बना डाली.इस फिल्म को पहला राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला.फिल्म में सुरैया ने ग़ालिब की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी.जिन्हें सुन कर नेहरु ने सुरैया से कहा था,’आप ने तो मिर्ज़ा ग़ालिब की रूह को जिंदा कर दिया.’पुरस्कृत और प्रशंसित होने के बावजूद ‘मिर्ज़ा ग़ालिब नहीं चली थी.सोहराब मोदी इस उम्मीद में आगे फ़िल्में बनाते रहे कि किसी एक फिल्म के चलने से उनके स्टूडियो की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी.ऐसा नहीं हो सका.एक दिन ऐसा आया कि मिनर्वा मूवीटोन बिक गया.
सोहराब मोदी ने बाद में ‘नौशेरवां-ए-एदिल’ और ‘यहूदी जैसी ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया.सोहराब मोदी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अकेले फ़िल्मकार हैं,जिन्होंने आज़ादी के पहले और बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण और निर्देशन पर जोर दिया.उनके समकालीनों ने छिटपुट रूप से ही इस विधा पर ध्यान दिया.
सामान्य उदासीनता के बावजूद
यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि आज़ादी के बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति क्यों उदासीनता रही? देश के आजाद होने के बाद राष्ट्र निर्माण की भावना से नयी कहानी लिखने-रचने का जोश कहीं न कहीं नेहरु के सपनों के भारत के मेल में था.नए दौर में फ़िल्मकार आत्म निर्भरता की चेतना से सामाजिक बदलाव की भी कहानियां लिख रहे थे.और जैसा कि हम ने पहले कहा कि देशभक्ति की भावना और राष्ट्रीय चेतना का फोकस बदल जाने से सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का चलन बढ़ा.प्रेम कहानियों में नायक-नायिका के बीच सामाजिक,आर्थिक और शहर-देहात का फर्क रखा गया.उनके मिलन की बाधाओं के ड्रामे में पुरानी धारणाओं और रुढियों को तोड़ने का प्रयास दिखा.प्रगतिशील और सेक्युलर समाज की चिंताएं फिल्मकारों की कोशिशों में जाहिर हो रही थीं.
कुछ फिल्मकारों ने मुग़लों और मराठों की कहानियों को दोहराया.ऐतिहासिक फिल्मों के सन्दर्भ में हम बार-बार उल्लेख कर रहे हैं कि फ़िल्मकार नयी कहानियों की तलाश में कम रहे हैं.आज़ादी के बाद के दौर में भी सलीम-अनारकली,जहाँगीर,शाहजहाँ आदि मुग़ल बादशाहों के महलों के आसपास ही हमारे फ़िल्मकार भटकते रहे.सलीम-अनारकली की काल्पनिक प्रेमकहानी पर पहले ‘अनारकली और फिर ‘मुग़लेआज़म’ जैसी मनोरंजक और भव्य फिल्म आई.’अनारकली में प्रदीप कुमार और बीना राय की जोड़ी थी.इस फिल्म में अकबर की भूमिका मुबारक ने निभाई थी.फिल्म के निर्देशक नन्दलाल जसवंतलाल थे. ‘मुग़लेआज़म’ में के आसिफ ने पृथ्वीराज कपूर,दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ ऐसी कहानी रची कि फिर कोई इस कमाल के साथ इसे नहीं दोहरा सका.हाँ,तीन सालों के बाद ए के नाडियाडवाला ने ज़रूर एम सादिक के निर्देशन में प्रदीप कुमार और बीना राय के साथ ‘ताजमहल का निर्माण किया.साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी के रचे गीत-संगीत ने धूम मचा दी थी.एम् सादिक ने फिर प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ ‘नूरजहाँ का निर्देशन किया.इसके निर्माता शेख मुख़्तार थे.उन्होंने इस फिल्म में एक किरदार भी निभाया था.इस फिल्म के बाद शेख मुख़्तार फिल्म लेकर पाकिस्तान चले गए थे.भारत में यह फिल्म दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई थी,जबकि पाकिस्तान में यह फिल्म खूब चली.
समकालीन नायक और जीवनीपरक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्मों के विस्तार के रूप में हम राजनेताओं पर बनी जीवनीपरक फिल्मों को देख सकते हैं.अभी बायोपिक फैशन में है.गौर करें तो बायोपिक की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों पर बनी फिल्मों से होती है.आज़ादी के पहले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी राजनेताओं का नाम लेना और उनके ऊपर फिल्म बनाना मुमकिन नहीं था.ब्रिटिश हुकूमत बर्दाश्त नहीं कर पाती थी.आज़ादी के बाद लोकमान्य तिलक,भगत सिंह,गाँधी,सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं पर फ़िल्में बनीं.आज़ादी के बाद 20वीं सदी के पांच दशकों में नौवें दशक में अनेक राजनेताओं पर फ़िल्में बनीं.रिचर्ड एटेनबरो की ‘गाँधी के निर्देशक भले ही विदेशी हों,लेकिन यह भारत सरकार के सहयोग से बनी फिल्म थी.’गाँधी(1982) और ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा(1996) एक साथ देख लें तो महात्मा गाँधी के जीवन और कार्य को आसानी से सम्पूर्णता में समझा जा सकता है.शहीदेआज़म भगत सिंह के जीवन पर बनी ‘शहीद ने बहुत खूबसूरती से किंवदंती बन चुके क्रान्तिकारी के जीवन को राष्ट्र धर्म और मर्म के सन्दर्भ में पेश किया.भगत सिंह की जन्म शताब्दी के समय 2002 में एक साथ अनेक फ़िल्में हिंदी और अन्य भाषाओँ में बनी.यहाँ तक कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आमिर खान अभिनीत ‘रंग दे बसंती भी उनके जीवन से प्रेरित थी.
अन्य ऐतिहासिक फिल्मे
आज़ादी के बाद की अन्य ऐतिहासिक फिल्मों में हेमेश गुप्ता की ‘आनंद मठ(1952),केदार शर्मा की ‘नीलकमल(1947),सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाडी(1977),लेख टंडन की ‘आम्रपाली(1966),एम् एस सथ्यू की ‘गर्म हवा(1974),श्याम बेनेगल की ‘जुनून’(1978),केतन मेहता की ‘सरदार(1993} आदि का उल्लेख आवश्यक होगा.इन फिल्मों के निर्देशकों ने समय की प्रवृतियों से अलग जाकर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं पर काल्पनिक कथा बुनी या ऐतिहासिक प्रसंगों के सन्दर्भ के साथ उनका चित्रण किया.एक कमी तो खटकती है कि स्वाधीनता आन्दोलन,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम,भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्ध,देश में चले सुधार आन्दोलन,किसानों और मजदूरों के अभियान और संघर्ष जैसे सामयिक विषयों पर फिल्मकारों ने ध्यान नहीं दिया.देश के विभाजन की राजनीतिक और मार्मिक कथा भी नहीं कही गयी.हम अपने अतीत के यथार्थ से भागते रहे.हिंदी फ़िल्में और कमोबेश सभी भारतीय फ़िल्में मुख्य रूप से ख्याली दुनिया में ही उलझी रहीं.अर्द्धसामन्ती देश में प्रेम कहानियां भी एक तरह से विद्रोह की ही दास्तानें हैं,लेकिन फिल्मों में इसकी अति दिखाई पड़ती है.
21वीं सदी में अलबत्ता अनेक ऐतिहासिक फ़िल्में बनती हैं.साधन और सुविधा के साथ भव्यता की चाहत ने फिल्मकारों को ऐतिहासिक फिल्मों के लिए प्रेरित किया है.पिछले दो सालों में अनेक फ़िल्में प्रदर्शित हुई हैं और अभी कुछ ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण में लोकप्रिय और बड़े बैनर संलग्न हैं.

 
प्रसंग  
पारसी परिवार में जन्मे सोहराब मोदी का बचपन मुंबई की पारसी कॉलोनी में बीता था.किशोर उम्र में वे अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के रामपुर चले गए थे.उनके पिता रामपुर के राजा के मुलाजिम थे.सोहराब मोदी का मन पढ़ाई-लिखाई में अधिक नहीं लगता था.खास कर इतिहास में वे फिसड्डी थे.शिक्षकों ने कई बार उनके पिता को उलाहना भी दिया था.सोहराब का मन खेल और कसरत में अधिक लगता था.14-15 की उम्र में सोहराब को रंगमंच का शौक चढ़ा और वे शेक्सपियर के नाटक करने लगे,उनके भाई रुस्तम भी उनका साथ देते थे.विडम्बना देखें कि इतिहास की पढाई में कमज़ोर सोहराब मोदी भविष्य में ऐतिहासिक फिल्मों के बड़े फ़िल्मकार हुए.उन्होंने अनेक ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया.उन्होंने एक बार कहा था,’हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने के बाद मैंने ध्यान से इतिहास पढ़ना आरम्भ किया.फिर एहसास हुआ कि इतिहास में कितना ज्ञान छिपा है.अगर हम ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन का अनुसरण करें और उनसे शिक्षा लें तो हम अपना जीवन बदल सकते हैं.मुझे लगा कि मेरी तरह अनेक छात्र इतिहास पढ़ने में रूचि नहीं रखते होंगे.क्यों न उन सभी के लिए ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण करूं? इन फिल्मों से उनकी इतिहास की समझदारी बढ़ेगी और वे इतिहास के सबक से अपना भविष्य संवार सकेंगे.

Tuesday, October 23, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले


फिल्म लॉन्ड्री
भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले
-अजय ब्रह्मात्मज
प्राण नेविले से मेरा परिचय सबसे पहले ट्विटर के जरिए हुआ.पार्टीशन म्यूजियम के एक अपडेट में मुझे प्राण नेविले का छोटा विडियो दिखा.उस विडियो में वे लाहौर में 1941 में बनी फिल्म ‘खजांची का ज़िक्र कर रहे थे.इस फिल्म ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया था.यह अविभाजित भारत की बात है.तब लाहौर भारत का हिस्सा था.उसे ‘पूर्व का पेरिस’ कहा जाता था. अविभाजित भारत में कलकत्ता और बॉम्बे के अलावा लाहौर में भी फिल्म निर्माण की गतिविधियाँ आरम्भ हो चुकी थीं.कलकत्ता और बॉम्बे की तुलना में निर्माण की संख्या और क्वालिटी के हिसाब से लाहौर की फ़िल्में कम और कमतर थीं.हालांकि लाहौर से निकले अभिनेता,अभिनेत्री,गायक और निर्देशक देश भर में अपनी प्रतिभा और कामयाबी से खास जगह बना रहे थे,लेकिन लाहौर में निर्मित फ़िल्में कमाई और कामयाबी में पिछड़ जाती थीं. निर्माता दलसुख पंचोली और निर्देशक मोती बी गिडवानी की फिल्म ‘खजांची की नायिका रमोला थीं.इस फिल्म के एक गीत में रमोला ‘सावन के नज़ारे हैं गाती सहेलियों के साथ साइकिल पर सवार हैं.उनका दुपट्टा लहरा रहा है.प्राण नेविले बता रहे थे कि इस गीत की वजह से ‘खजांची को आधुनिक फिल्म कहा गया था,जिसमें आजाद ख्याल नायिका फिल्म के नायक की तरह साइकिल चला रही थी और बेफिक्र अंदाज में गाना गा रही थी.आज़ादी और विभाजन के पहले की इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा पर दूरगामी प्रभाव डाला.
‘खजांची की रिलीज के समय प्राण नेविले की उम्र 19 साल थी.उन्हें उस फिल्म के बारे में सब कुछ याद रहा.उनकी याददाश्त का यह आलम था कि 1937 में के एल सहगल की लाहौर यात्रा के बारे में उन्होंने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘के एल सैगल- द डेफिनीटिव बायोग्राफी में लिखा है.तब वे सिर्फ 15 साल के थे.अपने दोस्त के साथ वे के एल सैगल को सुनने गए थे.उन्होंने उमड़ी भीड़ के बीच दो रुपये के टिकट ब्लैक में तीन रुपये में खरीदे थे.उनकी याददाश्त जबरदस्त थी.इसी साल अप्रैल में उनके गुरुग्राम निवास में हुई बातचीत मुझे अच्छी तरह याद है.लाहौर और लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री से संबंधित मेरे हर सवाल का उन्होंने दो टूक जवाब दिया था.उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री के योगदान को रेखांकित कर रहा हूँ.स्रोत और सामग्री की दिक्कतों का प्रसंग आने पर जब मैंने बताया कि अभी के हालत में लाहौर जाना मुम्किन नहीं है.मैं तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय से किसी प्रकार के सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकता,क्योंकि अपने लेखों और टिप्पणियों में मैं सत्तारूढ़ पार्टी का विरोधी घोषित हो चूका हूँ.उन्होंने मेरी बात धयान से सुनी और फिर धीमे स्वर में अनोखी सलाह दी. उन्होंने सुझाया कि भाजपा की सरकार के मंत्री के पास तुम पत्र भेजो.उस पत्र में लिखों कि विभाजन के पहले लाहौर में सक्रिय अधिकांश निर्माता और स्टूडियो के मालिक हिन्दू थे. मुझे उनके बारे में पता करना है.देखना सरकार तुम्हारी हर मदद करेगी.मैं अभी तक वह पत्र नहीं लिख सका,लेकिन उनके इस सुझाव से मुझे एहसास हुआ कि वे बिल्कुल व्यवहारिक व्यक्ति और विचारक थे.सार्वजानिक हित में सत्ता का इस्तेमाल उन्हें आता था.हो सकता लम्बे समय तक भारतीय विदेश सेवा में रहने के कारन वे सत्ता के गलियारों और कार्यप्रणाली से वाकिफ हों.
उनके बारे में जानने और उनकी किताबें पढने के बाद मिलने की इच्छा होने पर भी उनसे संपर्क करने का मन नहीं कर रहा था.मुझे हमेशा लगता है कि सक्रिय बुजुर्गों को नाहक तंग नहीं करना चाहिए.मिलने-मिलाने की औपचारिकता में उनका वक़्त खर्च होता है.बहरहाल,ट्विटर की पाकिस्तानी दोस्त अमारा अहमद ने उनसे मुलाक़ात का कहीं ज़िक्र किया था.मैंने अमारा से ही इस बाबत पूछा.अमारा ने सलाह दी कि मुझे उनसे संपर्क कर मिलने का वक़्त माँगना चाहिए.और सचमुच तब मुझे विस्मित ख़ुशी हुई,जब उन्होंने मेरा आग्रह मान लिया और मिलने के लिए तैयार हो गए.निश्चित तारीख को वक़्त से कुछ पहले ही मैं उनके गुरुग्राम निवास पर हाज़िर था.मुझे उनकी स्टडी में बिठा दिया गया.स्टडी में जाते समय मैंने उनकी झलक पा ली थी और यही सोच कर खड़ा रहा कि वे पीछे से आते ही होंगे.5 से 10 मिनट हो गए,लेकिन वे नहीं आये.थोड़ी देर तक उनकी किताबों को निहारने के बाद मैं बैठ गया.ठीक 11 बजे वे आये....11 का वक़्त ही मुकम्मल हुआ था.आने के साथ उन्होंने कहा कि मैं वक़्त पर आ गया.तुम पहले आ गए थे,इसलिए इंतजार करना पड़ा.मेरी हंसी छूट गयी और वे भी हंसने लगे.फिर तो घंटे भर से ज्यादा देर तक मैं कुछ न कुछ पूछता रहा और वे पूरी संजीदगी से मेरी हर जिज्ञासा का जवाब देते रहे.अप्रैल 2018 में उनकी उम्र 96 साल थी.
जी हाँ, उम्र उन्हें छू नहीं पाई थी.वे लगातार सक्रिय और सचेत रहे.भारतीय बुजुर्ग इस उम्र में घर,परिवार और समाज से नाराज़ रहते हैं.उन्हें लगता है कि आज की पीढ़ी नाकारा और नासमझ है.अपनी बातचीत में मैंने महसूस किया कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत नहीं है.वे आज की पीढ़ी को संबोधित करना चाहते हैं.उनके संपर्क में रहते हैं.उनके पास ठोस योजनायें थीं.वे उन पर काम कर रहे थे.जब मैंने निवेदन किया कि आप की किताबें हिंदी में आयें और आप हिंदी में भी लेख लिकहें.उन्होंने झट से सूफी संगीत पर लिखा एक लेख थमा दिया और कहा कि इसे छपवा लो.वे अपनी किताबें हिंदी में लाना चाहते थे.इन किताबों का हिंदी अनुवाद आना ही चाहिए.प्राण नेविले लाहौर शहर पर केन्द्रित ‘लाहौर-ए सेंटीमेंटल जर्नी’ नामक किताब लिखी है.इस किताब में उन्होंने अपने दौर के लाहौर का सजीव चित्र शब्दांकित किया है.छोटी-छोटी रवायतों पर विस्तार से लिखा है.वे सही लिखते हैं,’शहर केवल अपने बाज़ार और इमारतों में नहीं होता.यह माहौल,परिवेश,ख़ुशी और ग़म के आलम,पागलपन और उदासी,मौज-मस्ती और सबसे बढ़ कर अपने बाशिंदों में होता है. वे ही उसकी आत्मा होते है.’प्राण नेविले की यह पुस्तक किसी भी शहर की धड़कन को समझने का कारगर टूल देती है.प्राण साहेब ने लाहौर के राजनीतिक और आर्थिक हलचल पर अधिक ध्यान नहीं दिया है.वे लाहौर के उस सांस्कृतिक पहलू को सामने ले आते हैं,जो भारत और पाकिस्तान से अलग लाहौर को उजागर करता है.लाहौरी इस तथ्य में फख्र महसूस करते हैं कि एक भारत है और एक पाकिस्तान है....और एक लाहौर है.विभाजन के पहले के लाहौर के बारे में पढने-जानने पर शिद्दत से यह बात महसूस होती है.
प्राण नेविले का प्राण लाहौर में ही था.वे भारत ज़रूर आ गए थे,लेकिन किसी ब्याहता की तरह वे अपने मायके लाहौर को कभी नहीं भूल पाए.मौका मिलते ही वे लाहौर जाते थे.लाहौर के बारे में खूब लिखते थे. कोठेवालियों पर उनकी किताब शोधपूर्ण मानी जाती है. ब्रिटिश राज के विशेषज्ञ के रूप में उनकी खास पहचान थी.इसके साथ ही भारतीय चित्रकला और कंपनी स्कूल के अवसान पर उनकी महत्वपूर्ण किताब है.उन्होंने सुगम संगीत और फ़िल्मी संगीत पर भी भरपूर लिखा है. वे ठुमरी गायिका नैना देवी के मुरीद और दोस्त थे.उनके जरिए वे बेगम अख्तर से मिले.उन्होंने इन दोनों गायिकाओं पर भी लिखा है.उन्होंने बेगम अख्तर की गायी कुछ ठुमरी और ग़ज़ल एक वक़्त के बाद उनके प्रशंसकों के बीच बिखेरी.दिल्ली में हर साल संगीत सभा का आयोजन उनका खास शगल था.के एल सैगल पर किताब लिखने के साथ ही उनकी गायकी और खूबियों की याद बनाये रखने के लिए उनकी जन्म शताब्दी पर भारत सरकार के सहयोग से भव्य आयोजन करने में वे सफल रहे थे.
चौथे और पांचवे दशक के लाहौर में सांस्कृतिक सामूहिकता थी.अविभाजित भारत का यह शहर उत्तर भारत के पश्चिम का सांस्कृतिक,शैक्षणिक और राजनीतिक केंद्र था.इसके समानान्तर पूर्व में स्थित इलाहाबाद ही प्रभाव में इसके समक्ष ठहरता है.यह तुलनात्मक अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे और क्यों उत्तर भारत के दोनों शहर आज़ादी के बाद अपनी चमक और धमक बरक़रार नहीं रख सके.और अब तो इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रखने के साथ योगी आदित्यनाथ ने बची-खुची गरिमा भी समाप्त कर दी.

Thursday, October 11, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : #MeToo: मुंबई फिल्म उद्योग का खुला और घिनौना सच

फिल्म लॉन्ड्री
नया नहीं है यौन शोषण का मसला
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता ने 2008 में ‘हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर एक डांस सीक्वेंस के समय हुए अप्रत्याशित और अपमानजनक अनुहवों को शेयर करते हुए नाना पाटेकर पर यौन शोषण का ताज़ा आरोप लगाया है. इस आरोप के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोषण के मामले ने तूल पकड़ा है. पत्रकार छोटे,मझोले और बड़े फिल्म स्टार और अन्य हस्तियों से उनकी राय पूछ रहे हैं.कुछ समर्थन में तो कुछ महिलाओं के प्रति निस्संग सहानुभूति में अपनी रायरख रहे हैं. हॉलीवुड में ‘मी टू’ अभियान के जोर पकड़ने और हार्वी वाइनस्टीन का मामला सामने आने के बाद भारत में भी अभिनेत्रियों के बीच सुगबुगाहट दिख रही है. पिछले साल दबे स्वर में ही सही,लेकिन अनेक अभिनेत्रियों ने खुद के हौलनाक अनुभव शेयर किये.इसके बावजूद यह सच्चाई है कि कभी बदनामी और कभी अलग-थलग कर दिएजाने के डर से अभिनेत्रियाँ ऐसे अपराधियों के नाम लेने से हिचकिचाती हैं. एक निर्माता,एक निर्देशक.एक कास्टिंग डायरेक्टर और एक को-एक्टर का चेहराविहीन उल्लेख किया जाता है. अपराधियों का पर्दाफाश नहीं होता. कुछ समय के बाद फिल्म इंडस्ट्री पुराने ढर्रे पर चलने लगती है.
इसी साल डेज़ी ईरानी ने जब पचास साल पुराना भेद खोला कि उनके संरक्षक और अभिभावक के तौर पर साथ आए पुरुष ने उनके साथ दुष्कर्म किया तो फिल्म इंडस्ट्री में खलबली सी मच गयी.एक बार फिर पुराने किस्से सुनाई पड़ने लगे. दिक्कत यह है कि हमेशा आरंभिक शोर के बाद सब कुछ कानाफूसी में तब्दील होकर अगली घटना तक दब जाता है.याद करें कि  इसी साल अप्रैल में ‘कास्टिंग काउच’ की कितनी घटनायें सुनाई और बताई गईं. राधिका आप्टे,स्वरा भास्कर,रिचा चड्ढा,उषा जाधव ने अपने अनुभव बताये. उस समय कुछ अभिनेत्रियों ने तो ऑफ द रिकॉर्ड कुछ कास्टिंग डायरेक्टर और डायरेक्टर के नाम भी बताये. उनमें से कोई भी दोषियों के नामों के सार्वजानिक उद्घाटन का सहस नहीं कर पाया. सभी को एक ही डर है कि हिंदी फिल्मों का तंत्र उसे पीस डालेगा और निकल बहार करेगा. उनमें से एक सक्रिय अभिनेत्री तनुश्री का प्रकरण सामने आने और उनकी हिम्मत की दाद देने पर यही कहा कि उसे फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं चाहिए,इसलिए वह हिम्मत कर सकती है.सारा मसला और मामला एकता के अभाव और सामूहिक स्वर की कमी से बेजान हो जाता है. फिल्म और टीवी कलाकारों के एसोसिएशन CINTAA के मानद सचिव और प्रवक्ता सुशांत सिंह ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि 2008 में तनुश्री की शिकायत पट उचित फैसला नहीं लिया जा सका था.उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया है कि एसोसिएशन के संविधान में तीन साल से पुराने मामले पर विचार करने का प्रावधान नहीं है. उन्होंने अधिकारीयों से अपील की है कि इस मेल की निष्पक्ष जांच करवाएं.
इस बीच नाना पाटेकर के वकील ने तनुश्री दत्ता को लीगल नोटिस भेजी है.महारष्ट्र सर्कार के गृह मंत्री दीपक केसरकर ने पहले तो नाना पाटेकर के बारे कहा कि वे महज अभिनेता नहीं हैं. वह सोशल वर्कर भी हैं और उन्होंने महाराष्ट्र के लिए अनेक कार्य किये हैं. संकेत यह था कि उन्हें किसी आरोप में घसीटना उचित नहीं होगा.बाद में उन्होंने यह कहना शुरू किया कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत करती हैं तो पूरी पारदर्शिता के साथ जाँच होगी.शनिवार को तनुश्री दत्ता ने अँधेरी के ओशिवारा पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कर दिया है. तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर और गणेश आचार्य के साथ ही निर्माता सामी सिद्दीकी,निर्देशक राकेश सारंग और मनसे के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है.अब देखना रोचक होगा कि मुंबई पुलिस और महारष्ट्र सरकार पारदर्शी जांच के लिए क्या कदम उठाती है. उन्होंने अपनी शिका्यत में लिखा है कि तीन दिनों के रिहर्सल के बाद गाने की शूटिंग के चौथे दिन 26 मार्च 2008 को ज़रुरत नहीं होने के बावजूद नाना पाटेकर सेट पर मौजूद थे. मुझे डांस सिखाने के नाम पर हाथ पकड़ कर खींच और धकेल रहे थे. इस प्रक्रिया में अनुचित तरीके से वे मुझे छू रहे थे.मुझे सब असहज लगा तो मैंने निर्माता-निर्देशक से शिकायत की.शूटिंग रोक दे गयी. एक घंटे के बाद जब मुझे बुलाया गया तो नए स्टेप जोड़ दिए गए,जो अन्तरंग होने के साथ मुझे छूने के भी थे. इस मामले में नाना पाटेकर और उनके समर्थक तर्क दे रहे हैं कि सेट पर सकदों लोगों की मौजूदगी में कैसे कोई ऐसी हरकत करेगा? बस,बाज़ार और मेले की छेडखानियों को याद करें तो वह भीड़ के बीच ही होती है.यौन उत्पीडन के दोषी उत्तेजना में हिंसक और आक्रामक हो जाते हैं. उन्हें परिणाम की चिंता नहीं रहती.अमूमन देखा गया है कि ऐसे मामलों में प्रत्यक्षदर्शी भी खामोश रह जाते हैं.फिल्म इंडस्ट्री में ताकतवर और रसूखदार का दबदबा बना रहता है.उनकी लॉबी नाराज़ होने पर इंडस्ट्री से निकाल बाहर करने का इंतजाम कर लेती है.तनुश्री के बारे में प्रचार हो गया कि वह अनप्रोफेशनल है.स्थिति यह बन गयी कि आख़िरकार तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री छोडनी पड़ी.
नाना पाटेकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय मराठी एक्टर हैं.किसी राजनीतिक पार्टी से उनका सीधा ताल्लुक नहीं है,लेकिन सत्ता में मौजूद सभी नेता बतौर अभिनेता और सोशल वर्कर उनका सम्मान करते हैं.अपने बेबाक और ढीठ व्यक्तित्व से उन्होंने एक अलग पहचान बनायीं है.फिल्म इंडस्ट्री में सभी मानते हैं कि नाना ‘नो नोंसेंस’ व्यक्ति हैं और सेट पर निर्माता-निर्देशक और सहयोगी कलाकारों से कुछ भी कह सकते हैं.रूखे व्यवहार के लिए मशहूर नाना तुनकमिजाज हैं. वे थोड़े अप्रिय और अप्रत्याशित माने जाते हैं नाना.फिल्मों में उनकी प्रतिभा की वजह से लेने के बावजूद डायरेक्टर डरे-सहमे रहते हैं.अनेक फिल्मकारों और को-एक्टर के खट्टे अनुभव रहे हैं.व्यर्थ औपचारिकताओं का पालन न करने की वजह से उनका व्यवहार उज्जड और उदंड लगता है.इसका उन्हें लाभ भी मिलता है.वह कुछ बोल कर निकल जाते हैं.उन्हें ‘मूडी' कलाकार की संज्ञा मिली हुई है.साथ कर चुके कलाकार कहते हैं कि वे ऐसे ही हैं.
तनुश्री दत्ता के ताज़ा एफ़आईआर  से स्पष्ट है कि वह पिछली बार की तरह खामोश नहीं रहेंगी.पिछली बार अपमान के घूँट पीकर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से तौबा करनी पड़ी थी.फिल्म इंडस्ट्री में इतिहास कुरेदें तो अनेक नई-पुरानी घटनाएं मिल जायेंगीं. ‘दो शिकारी' (1979) फिल्म में बिश्वजीत ने निर्माता-निर्देशक से साठगांठ कर फिल्म में चुम्बन का दृश्य डलवाया.फिल्म की नायिका रेखा थीं.इस सीन को फिल्माते समय बिश्वजीत ने रेखा को दबोचा और निर्देशक ने पांच मिनट तक कट नहीं बोला.रेखा तब नयी-नयी थीं.माधुरी दिक्सित को भी ऐसे जबरन दृश्यों से गुजरना पड़ा है.1935 की कोलकाता के न्यू थिएटर की एक घटना है. कोलकाता के बोउ बाज़ार(रेड लाइट ) की इमाम बांदी को बी एन सरकार की टीम ने चुना और उन्हें ‘यहूदी की लड़की',’कारवां-ए-हयात' जैसी फिल्मों में काम दिया.रतन बाई को राष्ट्रिय ख्याति मिली.लेकिन जब ‘कारवां-ए-हयात' रिलीज हुई तो रतन बाई अपनी भूमिका के कट जाने से हैरान हुईं और उन्होंने इसकी लिखित शिकायत की.तब बी एन सरकार के वकील ने जवाब में जो चिट्ठी लिखी,उसमें उनकी पृष्ठभूमि का उल्लेख कर यह जताने की कोशिश की कि न्यू थिएटर ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया,भला बी एन सरकार रतन बाई की प्रतिष्ठा को कैसे आंच पहुंचा सकते हैं? रतन बाई चुप नहीं बैठीं. उन्होंने पलट कर जवाब भेजा कि सोनागाछी,रामबागान.हरकटा गली और बोउ बाज़ार से सैकड़ों लड़कियां चुनी गईं,लेकिन उनमें से कितनी को राष्ट्रीय ख्याति मिली ? मेरी पैदाईश और पृष्ठभूमि के बारे में बता कर सरकार अपनी घृणा व्यक्त कर रहे हैं.
ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है,जिसमें अभिनेत्रियों का यौन शोषण और उत्पीडन किया गया.कानन देवी और दुर्गा खोते ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे बुरे अनुभवों का ज़िक्र किया है.उन दिनों तो मन ही जाता था कि सभ्य और शिक्षित परिवारों की लड़कियां फिल्मों में नहीं आतीं.अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ़ बेगम अख्तर के साथ किशोरावस्था में ही दुष्कर्म हुआ.उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया,लेकिन उसे बेटी का दर्जा नहीं दे सकीं.उसे बहन ही बताती रहीं.हर दशक में मशहूर होने के पहले अभिनेत्रियों को बुरे और अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा है.फिल्म इंडस्ट्री में यह मानी हुई बात है किआउटसाइडर लड़कियों को यह सब भुगतना ही पड़ेगा.अभी लड़कियां थोड़ी सजग हो गयी हैं.उन्हें हमेशा सचेत रहना पड़ता है.इसी हफ्ते पूजा भट्ट ने दिल्ली में बताया कि एक बार एक को-एक्टर ने एअरपोर्ट पर उनकी छाती पर हाथ रखा था.फैंटम दो दिनों पहले बंद हो गया,उसके चार निदेशकों में से एक विकास बहल पर एक सहायिका ने यौन उत्पीडन का आरोप लगाया था.फैंटम के विलयन में इस आरोप का भी असर रहा है.महिला और बाल विकास मंत्रालय के सख्त आदेश के बावजूद फिल्म कंपनियों में यौन उत्प्पेदन और शोषण की कार्रवाई के लिए ज़रूरी कमिटी नहीं हैं.शशित और उत्पीडित लड़कियां बदनामी के डर और कुछ भी नतीजा न निकलने की आशंका से घटनाओं को खुलेआम नहीं करती हैं.उन्हें सलाह दी जाती है कि देख लो,कुछ होगा नहीं और तुम्हें बदनामी मिलेगी.
तनुश्री दत्ता के मेल में ही अमिताभ बच्चन,सलमान खान और दुसरे बड़े स्टार का रवैया खेदजनक है.सपोर्ट करना तो दूर,उन्होंने सिरे से किनारा कर लिया और कुछ भी कहने से बचे.एक रेणुका शहाणे खुल कर समर्थन में आईं और उन्होंने तार्किक तरीके से अपना पक्ष रखा.युवा कलाकारों ने बेशक हमदर्दी दिखाई है.कुछ ऐसी भी प्रतिक्रियाएं आईं कि ऐसे मामले तो हर जगह होते हैं.और देखना पड़ेगा कि कौन दोषी है और किस का आरोप सही है.पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की शिकायत को सबसे पहले ख़ारिज कर दिया जाता है.अमूमन सभी सोचते हैं कि यह कौन सी नयी बात है.’नो मीन्स नो' की किताबी और फ़िल्मी वकालत तो की जाती है,लेकिन व्यवहार में उसके पैरोकार ही पलटते नज़र आते हैं.
पिछले दो सालों में जागरूकता आई है.फिल्म इंडस्ट्री के दफ्तरों,सेट और स्टूडियो में लड़कियों की तादाद बढी है.अब अभिनेत्रिय अपनी बहनों या मां के साथ शूटिंग पर नहीं जातीं’कमरे में कोई लड़की मौजूद हो तो फिल्म यूनिट के पुरुष सदस्य अपनी टिप्पणियों,बैटन और मजाक में सावधान रहते हैं.समबन्ध और स्थितियां बदल रही है. अगर तनुश्री दत्त के आरोपों का उचित नतीजा निकला तो इसके व्यापक परिणाम होंगे.कास्टिंग काउच के अगले चरण के शोषण और उत्पीडन की संभावनाओं पर अंकुश लगेगा.

Sunday, September 23, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के पहले की बोलती ऐतिहासिक फ़िल्में


फिल्म लॉन्ड्री
ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले की बोलती फ़िल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
ऐतिहासिक फिल्मों को इतिहास के तथ्यात्मक साक्ष्य के रूप में नहीं देखा जा सकता.इतिहासकारों की राय में ऐतिहासिक फिल्मे किस्सों और किंवदंतियों के आधार पर रची जाती हैं.उनकी राय में ऐतिहासिक फ़िल्में व्यक्तियों,घटनाओं और प्रसंगों को कहानी बना कर पेश करती हैं. उनमें ऐतिहासिक प्रमाणिकता खोजना व्यर्थ है. ऐतिहासिक फिल्मों के लेखक विभिन्न स्रोतों से वर्तमान के लिए उपयोगी सामग्री जुटते हैं. फिल्मों में वर्णित इतिहास अनधिकृत होता है.फ़िल्मकार इतिहास को अपने हिसाब से ट्रिविअलाइज और रोमांटिसाइज करके उसे नास्टैल्जिया की तरह पेश करते हैं. कुछ फ़िल्मकार पुरानी कहानियों की वर्तमान प्रासंगिकता पर ध्यान देते हैं.बाकी के लिए यह रिश्तों और संबंधों का ‘ओवर द टॉप चित्रण होता है,जिसमें वे युद्ध और संघर्ष का भव्य फिल्मांकन करते हैं.इतिहास की काल्पनिकता का बेहतरीन उदहारण ‘बाहुबली है. हाल ही में करण जौहर ने ‘तख़्त के बारे में संकेत दिया कि यह एक तरह से ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म का ही ऐतिहासिक परिवेश में रूपांतरण होगा.फिल्मकारों की सोच और मानसिकता को ध्यान में रखें तो ऐतिहासिक फिल्मों को लेकर होने वाले विवादों की व्यर्थता समझ में आ जाती है.बहरहाल,इस बार हम बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों की बातें करेंगे.
आर्देशिर ईरानी की ‘आलम आरा’ हिंदी की पहली बोलती(टॉकी} फिल्म थी.इसका निर्माण इम्पीरियल फिल्म् कंपनी ने किया था.कंपनी के मालिक आर्देशिर ईरानी कुछ नया करने के लिए हमेशा सक्रिय रहते थे.उन्होंने ही पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या भी बनायीं थी,जिसे सआदत हसन मंटो ने लिखा था.उन्हीं की प्रोडक्शन कंपनी ने एज्रा मीर के निर्देशन में पहली बोलती ऐतिहासिक फिल्म ‘नूर जहां का निर्माण किया. यह चुथी बोलती फिल्म थी.जहाँगीर और नूर जहां के ऐतिहासिक प्रेम की कहानी मुग़ल साम्राज्य की प्रेम किंवदतियों में काफी मशहूर है.सलीम-अनारकली की कल्पित कहानी से अलग इसका ऐतिहासिक आधार है.एजरा मीर की यह फिल्म मूक फिल्म के तौर पर शुरू हुई थी,लेकिन टॉकी की तकनीक आ जाने से इसे बोलती फिल्म में तब्दील कर दिया गया.यह हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ बनी थी.एक साल पहले ही जहाँगीर के विख्यात न्याय पर ‘आदिल-ए-जहाँगीर मूक फिल्म आ चुकी थी.
मूक फिल्मों के दौर की तरह ही बोलती फिल्मों के दौर में भी मुग़ल साम्राज्य,हिन्दू राजाओं,संत कवियों और मराठा वीरों की कहानियां ऐतिहासिक फिल्मों का विषय बनती रहीं.छिटपुट रूप से मिथकों के सहारे भी ऐतिहासिक फिल्मों के रूपक रचे गए.राजा,महल,दरबार और वन-उपवन के दृश्यों से प्रेम की साधारण कहानियों में भी भव्यता और रम्यता आ जाती थी.कुछ निर्माताओं ने पॉपुलर रहीं मूक ऐतिहासिक फिल्मों का बोलती फिल्मों के रूप में भी रीमेक  किया.उदहारण के लिए1930 की ‘आदिल-ए-जहाँगीर के सरदार के निर्देशन में 1934 में फिर से बनी.रोचक तथ्य है कि 1955 में जी पी सिप्पी ने प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ इसका पुनर्निर्माण किया.यह उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी.
आज़ादी के पहले फिल्मों के निर्माण का प्रमुख केंद्र मुंबई और आसपास के शहरों पुणे व् कोल्हापुर में स्थित था.फिल्मों में मराठीभाषी फिल्मकारों ने मराठा इतिहास और समाज के चरित्रों को प्रमुखता दी.उन्होंने मराठी के साथ हिंदी में भी इन फिल्मों का निर्माण किया. इन फिल्मकारों में वी शांताराम,दामले और जयंत देसाई प्रमुख थे.उन्होंने पेशवाओं, उनके सेनापतियों और अन्य विख्यात व्यक्तियों पर फ़िल्में बनायीं. मराठी और हिंदी में बनायीं जा रही ऐतिहासिक फ़िल्में एक स्तर ओअर अंग्रेजी शासन में राष्ट्रीय अस्मिता,पहचान और गौरव के रूप में भी प्रकट हो रही थीं. फ़िल्मकार राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे. फ़िल्में केवल मनोरंजन और मुनाफे का धंधा नहीं बनी थीं.
इसी दौर में लाहौर से कोलकाता शिफ्ट कर चुके ए आर कारदार ने मौर्य वंश के प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त पर ‘चन्द्रगुप्त नामक फिल्म निर्देशित की.इसका निर्माण ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था.के सी डे के संगीत से रची इस फिल्म में गुल हामिद,सबिता देवी और नज़ीर अहमद खान ने मुख्या भूमिकाएं निभाई थीं.इस फिल्म की सफलता ने ए आर कारदार को कोलकाता में स्थापित कर दिया था.कोलकाता में न्यू थिएटर में के एल सहगल आ चुके थे. उनके और पहाड़ी सान्याल के साथ प्रेमांकुर एटोर्थी ने मशहूर फिल्म ‘यहूदी की लड़की का निर्देशन किया.यह फिल्म आगा हश्र कश्मीरी के नाटक पर आधारित था.इस फिल्म मे रत्तनबाई ने भी एक किरदार निभाया था.कम लोग जानते हैं कि वह पटना की पैदाइश थीं.1933 में हिमांशु राय और देविका रानी की ‘कर्मा,जे बी एच वाडिया की ‘लाल-ए-यमन,देबकी बोस की ‘पूरण भगत और ‘मीरा बाई फ़िल्में भी आईं.इन फिल्मों की थीम देशी-विदेशी राज परिवारों से सबंधित थी.पी सी बरुआ की ‘रूप लेखा में के एल सहगल ने सम्राट अशोक की भूमिका निभाई थी.इस दौर में कोलकाता और मुंबई के फ़िल्मकार संतों पर भी फ़िल्में बना रहे थे. संत रविदास,संत तुलसी दास,सूरदास,मीरा बाई.संत तुकाराम.चंडीदास.संत ध्यानेश्वर आदि पर कुछ फ़िल्में बनीं.इन फिल्मों के निर्माण की एक वजह यह भी हो सकती है कि निर्देशकों को संत कवियों के लोकप्रिय गीत और भजन के उपयोग से दर्शकों को थिएटर में लाने की युक्ति मिल गयी होगी.संतों के आदर्श श्रद्धालु दर्शकों को अलग से आकर्षित करते होंगे.अंग्रेजों के दमन और शासन भुगत रहे लोगों को नैतिक संबल मिलता होगा.
1939 में आई सोहराब मोदी की ‘पुकार ऐतिहासिक फिल्मों की परंपरा में बड़ी घटना है.इस फिल्म की कहानी भी जहाँगीर के न्याय पर आधारित थी.कहते हैं,मंगल अपने प्यार कँवर को पाने के लिए उसके भाई और पिता की हत्या कर देता है,बादशाह के वफादार मंगल के पिता संग्राम सिंह उसे गिरफ्तार कर दरबार में हाज़िर करते हैं.जहाँगीर उसे मौत की सजा देते हैं.कुछ समय के बाद एक धोबिन नूरजहाँ को अपने पति का कातिल ठहरती है,जो शिकार के समय रानी के हाथों मारा गया था.अपने न्याय के लिए मशहूर न्यायप्रिय जहाँगीर सजा के तौर खुद की जान पेश करते हैं.बादशाह के न्याय से प्रभावित धोबिन उन्हें माफ़ कर देती है. इस फिल्म की कहानी कमाल अमरोही ने लिखी थी.फिल्म में संवाद और गीत भी उनके ही लिखे हुए थे. ‘पुकार में नूरजहाँ की भूमिका नसीम बानो ने निभाई थी. इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने सोहराब मोदी को आगे भी ऐतिहासिक फ़िल्में बनाने का उत्साह दिया.उनकी कंपनी मिनर्वा मूवीटोन बड़ी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण के लिए विख्यात हुई. उन्होंने मिनर्वा मूवीटोन के बैनर में ‘सिकंदर,’पृथ्वी वल्लभ.’एक दिन का सुलतान’ जैसी फ़िल्में आज़ादी के पहले बनायीं.इनमें ‘एक दिन का सुलतान को दर्शकों ने नापसंद किया. उनकी ‘झाँसी की रानी और ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का ज़िक्र आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फिल्मों की कड़ी में करेंगे.
सोहराब मोदी ने अपनी महँगी,भव्य,संवादों से पूर्ण फिल्मों से ऐतिहासिक फिल्मों का नया मानदंड स्थापित कर दिया.इस फिल्मों की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाये जा सकते हैं.सोहराब मोदी का कंसर्न इतिहास से अधिक ड्रामा था,जिनके जरिए वे दर्शकों को मनोरंजन और आनंद दे रहे थे.’सिकंदर उनकी अत्यंत सफल फिल्म थी.पृथ्वीराज कपूर ने इसमें सिकंदर की भूमिका निभाई थी और सोहराब मोदी पोरस बने थे. इस फिल्म में लाहौर से आई खुर्शीद उर्फ़ मीना ने एक खास किरदार निभाया था.मीना बाद में मीना शोरी के नाम से मशहूर हुईं. कॉमिक भूमिकाओं में मोतीलाल के साथ उनकी जोड़ी बनी.
आज़ादी के पहले की ऐतिहासिक फिल्मों में मुग़ल साम्राज्य जहाँगीर के अलावा बाबर,हुमायूँ,अकबर और शाहजहाँ के जीवन की घटनाओं पर भी फ़िल्में बनीं. किसी ने सत्ता के लिए औरंगजेब और दाराशिकोह के संघर्ष को नहीं छुआ. इन सभी फिल्मों में बादशाहों की न्यायप्रियता,उदारता और दयानतदारी का चित्रण किया गया.आजादी के पहले भारतीय इतिहास को देखने-दिखाने का नजरिया अलग था.दर्शकों के अन्दर यह एहसास भी भरा जाता था कि हमारा इतिहास गौरवपूर्ण था,जिसमें प्रजा की बातें और शिकायतें भी सुनी जाती थीं.कहीं न कहीं फिल्मकारों की यह भावना भी रहती थी कि वे वर्तमान शासक अंग्रेजों के खिलाफ आम दर्शकों को प्रेरित करें.कई बार ब्रिटिश राज के सेंसर से इन फिल्मकारों को जूझना पड़ता था.कुछ फिल्मों के टाइटल और गीत भी बदले गए थे.याद करें तो यह राष्ट्रीय भावना के उबाल का भी समय था.हमारे फ़िल्मकार कैसे अलग-थलग रह सकते थे.आज़ादी के पहले के ऐतिहासिक फिल्मों के निर्देशकों में वजाहत मिर्ज़ा(बाबर),कमल रॉय(शहनशा अकबर),महबूब खान(हुमायूँ),ए आर कारदार(शाहजहाँ),जयंत देसाईं(तानसेन,चन्द्रगुप्त) का नाम लिया जाना चाहिए.इसी दौर में 1944  में आई ‘रामशास्त्री महत्वपूर्ण फिल्म है.इसे गजानन जागीरदार,विश्राम बेडेकर और रजा नेने ने मिल कर निर्देशित किया था. गजानन जागीरदार ने जज रामशास्त्री की भूमिका निभाई थी.रामशास्त्री ने एक मामले में अपने भतीजे के हत्या के जुर्म में पेशवा को ही सजा सुनाई थी.
आज़ादी के पहले के चौथे और पांचवे दशक में फिल्मों के विषय और उनके निर्वाह में मूक फिल्मों के दौर से अधिक फ़र्क नहीं आया था.उस दौर की फिल्मों के जानकारों के मुताबिक तकनीकी आविष्कारों की वजह से फिल्मों के निर्माण में अवश्य निखार आता रहा.कुछ बड़ी और भव्य फ़िल्में महंगे बजट में बनीं.ऐतिहासिक फिल्मों से फिल्मकारों को आज ही की तरह युद्ध और द्वंद्व के दृश्य दिखने का बहाना मिल जाता था.इन दो दशकों में फिल्मों के आर्ट डायरेक्शन में काफी बदलाव आया.ए आर कारदार ने ‘शाहजहाँ’ में मशहूर पेंटर एम आर आचरेकर को आर्ट डायरेक्शन का मौका देकर भविष्य की फिल्मों की साज-सज्जा ही बदल दी. ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रिन को गढ़ने में फ़िल्मकार और आर्ट डायरेक्टर कैलेंडर आर्ट के प्रभाव में लुक और कॉस्टयूम गढ़ते रहे.
आज़ादी के पहले की ऐतिहासिक फिल्मों ने मनोरंजन के साथ भारतीय इतिहास का पॉपुलर ज्ञान दिया. ऐतिहासिक फ़िल्में डोक्युमेंट्री नहीं होतीं.उनमें सामान्य बोध का उपयोग किया जाता है ताकि अधिकाधिक दर्शकों को संतुष्ट किया जा सके. एक तरह से ऐतिहासिक फिल्मे सच्ची घटनाओं की काल्पनिक कहानियां ही होती हैं.
प्रसंग- सोहराब मोदी की ‘सिकंदर की मीना का रोचक किस्सा यूँ है कि लाहौर से वाया कोलकाता मुंबई पहुंची खुर्शीद फिल्मों में अभिनय करने के लिए बेताब थी.वह मुंबई आ चुकी थी,लेकिन उसे कोई खूबसूरत मौका नहीं मिल पा रहा था.सोहराब मोदी ‘सिकंदर की घोषणा और मुहूर्त के लिए बड़ा कार्यक्रम कर रहे थे.खुर्शीद ने कहीं से उस फंक्शन का निमंत्रण हासिल कर लिया.उसके पास कार्यक्रम में जाने के लायक फैशनेबल कपडे नहीं थे. उसने पैड्स की अफगानी महिला से मदद मांगी.उस उदार अफगानी महिला ने कपडे देने के साथ खास मौके के लिए उसके बाल भी बना दिए.खुर्शीद जब कार्य्रम के लिए पहुंची तो एकबारगी सबी की निगाहें उसकी ओर पलतीं.वह बाला की खूबसूरत लग रही थी.फोटोग्राफरों को लगा कि हा न हो यही फिल्म की नयी हीरोइन हो. उनके फ़्लैश चमकाने लगे. अब सोहराब मोदी चौंके.उस अंजन चेहरे से आकर्षित हुए.कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद उन्होंने खुर्शीद से बात की और अगले दिन आने के लिए कहा.सोहराब मोदी ने खुर्शीद को साइन कर लिया और उसे नया नाम दिया मीना.