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Tuesday, August 27, 2019

सिनेमालोक : गेट बचा रहेगा आरके का


सिनेमालोक
गेट बचा रहेगा आरके का
-अजय ब्रह्मात्मज
दो साल पहले 16 सितंबर 2017 को आरके स्टूडियो में भयंकर आग लगी थी. इस घटना के बाद कपूर खानदान के वारिसों में तय किया कि वे इसे बेच देंगे. इसे संभालना, संरक्षित करना या चालू रखने की बात हमेशा के लिए समाप्त हो गई. आग लगने के दिन तक वहां शूटिंग चल रही थी. यह आग एक रियलिटी शो के शूटिंग फ्लोर पर लगी थी. देखते ही देखते आरके की यादें जलकर खाक हो गईं. कोई कुछ भी सफाई दे, लेकिन कपूर खानदान के वारिसों की लापरवाही को नहीं भुलाया जा सकता. स्मृति के तौर पर रखी आरके की फिल्मों से संबंधित तमाम सामग्रियां इस आगजनी में स्वाहा हो गईं. अगर ढंग से रखरखाव किया गया रहता और समय से बाकी इंतजाम कर दिया गया होता तो आग नहीं लगती. आरके स्टूडियो की यादों के साक्ष्य के रूप में मौजूद संरचना, इमारतें,स्मृति चिह्न और शूटिंग फ्लोर सब कुछ बचा रहता.
पिछले हफ्ते खबर आई कि आरके स्टूडियो खरीद चुकी गोदरेज प्रॉपर्टीज कंपनी ने तय किया है कि इस परिसर के अंदर में जो भी कंस्ट्रक्शन हो इसके बाहरी रूप में बदलाव् नहीं किया जाएगा. आरके स्टूडियो का गेट जस का तस बना रहेगा. कहा यह भी जा रहा है कि इस प्रावधान से इस परिसर के दर्शकों, पर्यटकों और रहिवासियों को आरके की याद दिलाता रहेगा. चेम्बूर से गुजर रहे राहगीर इसे अपनी सवारियों से ही देख सकेंगे. पूरा मामला कुछ यूं है कि आरके स्टूडियो की यादों को दरबान बना दिया जाएगा. प्रेम पत्र के लिफाफे में बिजली बिल रखने जैसा इंतजाम है यह. राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर ने इस प्रावधान पर खुशी जाहिर की है. राज कपूर के बेटों की मजबूरी रही होगी, लेकिन भारत और महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में पहल कर सकती थी. पूरे भूभाग को खरीदकर राज कपूर समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के संग्रहालय के रूप में इसे विकसित किया जा सकता था. अभी पेडर रोड पर फिल्म्स डिवीजन के प्रांगण में भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय खोला गया है. उसके लिए या एक मुनासिब और यादगार जगह होती’
याद करें तो राज कपूर ने 1948 में आरके स्टूडियो के स्थापना की थी. उस दौर में स्टूडियो सिस्टम का बोलबाला था. इरादों के पक्के राज कपूर ने पहली फिल्म का प्रोडक्शन अपने बैनर से ही किया. उनकी पहली फिल्म ‘आग’ ज्यादा नहीं चल पाई थी, लेकिन दूसरी फिल्म ‘बरसात’ की कामयाबी ने राज कपूर को हौसला दिया. ‘बरसात’ के एक रोमांटिक दृश्य को राज कपूर ने आरके फिल्म्स स्टूडियो का लोगो बना दिया. ‘बरसात’ के उस दृश्य में नरगिस मस्ती भरे अंदाज में राज कपूर की दाहिनी बांह में झूल रही हैं और आज कपूर के बाएं हाथ में वायलिन है. यह युगल दशकों से राज कपूर के प्रशंसकों को लुभाती रही है,
राज कपूर के निधन के बाद उनके तीनों बेटों ने मिलजुल कर स्टूडियो को संभाला. राज कपूर के मशहूर कॉटेज, नरगिस के मेकअप रूम और बाकी स्ट्रक्चर को समय के साथ नया रूप-रंग भी दिया गया. लंबे समय तक बेटे बताते रहे कि वे आरके फिल्म्स के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे. बेटों ने आरंभिक प्रयासों के बाद कुछ नहीं किया. फिर राज कपूर के पोते रणबीर कपूर मशहूर हुए तो उनसे यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या वे आरके के लिए फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करेंगे? रणबीर कपूर ने हमेशा हां कहा, लेकिन कोई निश्चित तारीख या योजना नहीं बताई. मजेदार तथ्य है कि यह सवाल कभी करिश्मा कपूर या करीना कपूर से नहीं पूछा गया. आखिर उत्तराधिकारी तो पुरुष ही होता है? 
आरके स्टूडियो का पटाक्षेप होने के बाद मुंबई में उस दौर के तीन स्टूडियो बच गए हैं. महबूब स्टूडियो, फिल्मिस्तान और फिल्मालय. फिल्मालय का एक हिस्सा मॉल और कुछ हिस्सा अपार्टमेंट में तब्दील हो चुका है. फिल्मिस्तान में बदलाव हुआ है. महबूब स्टूडियो पर भी दबाव है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निजी पहल से इन स्टूडियो के रखरखाव और संरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए. हम एक-एक कर अपनी फिल्म विरासत को नष्ट करते जा रहे हैं. दरअसल, भारतीय समाज और सरकार के पास फिल्मी विरासत के संरक्षण और संभाल की कोई स्कीम ही नहीं है.



Tuesday, August 20, 2019

सिनेमालोक : अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...

सिनेमालोक
अभिनेत्रियों की तू तू... मैं मैं...
-अजय ब्रह्मात्मज
निश्चित ही वे हंस रहे होंगे. उनके लिए यह मौज-मस्ती और परनिंदा का विषय बन गया होगा. ‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के कुछ पहले से अभिनेत्रियों के बीच टिप्पणियों की धींगामुश्तीआरंभ हुई है. यह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. कंगना रनोट और तापसी पन्नू आमने-सामने हैं. दोनों की तरफ से टिप्पणियां चल रही है. एक दूसरे में कमियां निकालने का क्रम जारी है. कहीं न कहीं इस अनावश्यक विवाद से दोनों को लाभ ही हो रहा है. दोनों चर्चा में हैं. सामने से मीडिया और पीछे से इंडस्ट्री का खास तबका मजे ले रहा है. दो बिल्लियों की लड़ाई चल रही है और बाकी उनकी ‘म्याऊं-म्याऊं’ पर सीटी और ताली बजा रहे हैं.
‘जजमेंटल है क्या’ की रिलीज के पहले तापसी पन्नू के ट्वीट का संदर्भ लेते हुए कंगना रनोट की बहन रंगोली चंदेल ने तापसी पन्नू पर टिप्पणी करते हुए उन्हें अपनी बहन की ‘सस्ती कॉपी’ कह दिया. उनकी इस टिप्पणी पर अनुराग कश्यप ने ‘प्रतिटिप्पणी’ की तो रंगोली चंदेल उन पर भी टूट पड़ीं. मामला आगे बढ़ा और ‘जजमेंटल है क्या’ के प्रमोशन के समय कंगना रनोट के हर इंटरव्यू में दो-चार सवाल इस कथित विवाद पर पूछे ही गए. कंगना रनोट ने अपना पक्ष रखा और जवाब देने के लहजे में मखौल और छींटाकशी का टोन रखा. उन्होंने यह भी कहा कि अगर आप किसी पर टिप्पणी करती हैं तो आपको खुद भी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए. सही बात है, लेकिन इस मामले में दोनों ‘आउटसाइडर’ अभिनेत्रियों को सोचना चाहिए कि इस ‘तू-तू मैं- मैं’ में वे खुद को हास्यास्पद स्थितियों में डाल रही हैं.
इस विवाद की पृष्ठभूमि है. ‘मनमर्जियां’ के प्रमोशन के समय एक रैपिड फायर स्टेशन में कंगना रनोट के लिए सलाह के सवाल पर तापसी पन्नू ने कह दिया था कि उन्हें कुछ भी बोलने के पहले ‘डबल फिल्टर’ का इस्तेमाल करना चाहिए. तात्पर्य था कि बयानबाजी में कंगना रनोट संयम से काम लें. यह बिन मांगी रंगोली चंदेल और कंगना रनोट दोनों को नागवार गुजरी थी. दोनों बहनें मौके की तलाश में थीं. उन्हें मौका मिला तो उन्होंने तापसी पन्नू के लिए ‘पलट टिप्पणी’ कर दी और फिर मामले ने तूल पकड़ लिया’ ‘सस्ती कॉपी’ की टिप्पणी तापसी पन्नू को सबक सिखाने के लिए की गई थी. ऐसा कंगना रनोट ने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा.
यूं हीरोइनों की आपसी खटपट देविका रानी के जमाने से चली आ रही है. कामयाबी की राह में आगे बढ़ति अभिनेत्रियां साथ चलते-चलते कई बार अपनी गति और चाल बढ़ाने के लिए हमसफर अभिनेत्रियों पर इस तरह की टिप्पणियां कर देती हैं. पहले यह दबे-ढके और गुटबाजी के तौर पर होता था. द्वंद्व और द्वेष में भी लिहाज रखा जाता था. अब ऐसा नहीं होता. करीना कपूर, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा के सक्रिय दौर में इंटरव्यू और बातचीत में उनकी परस्पर भद्दी टिप्पणियां चलती रहती थीं. कुछ लोगों को याद होगा कि जब बिपाशा बसु आई ही थीं और उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी तो इंडस्ट्री से आई एक अभिनेत्री ने उन पर अशोभनीय टिप्पणी की थी. श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के प्रतियोगी सालों में भी ऐसा होता रहा था.
प्रकृति का नियम है कि हमेशा नई पौध ज्यादा तेजी से लहलहाती है. उससे स्थापित और थोड़ी पुरानी हो चुकी प्रतिभाओं को अनजान खतरा महसूस होता है. पहले तो एक प्रतियोगी अभिनेत्रि को कोई निर्माता-निर्देशक अतिरिक्त भाव दे दे तो दूसरी अभिनेत्रि रूठ जाती थी. फिल्म अटका देती थी. कई बार छोड़ भी देती थी. ताजा मामले में देखें तो कंगना रनोट निजी मेहनत और निर्देशकों के सहयोग से आगे बढ़ी हैं. उन्हें दर्शकों और समीक्षकों का प्यार मिला है, लेकिन ‘मणिकर्णिका’ पर फिल्म इंडस्ट्री और समीक्षकों से अपेक्षित प्रशंसा और सहयोग न मिलने से वह ज्यादा संवेदनशील हो गई हैं. पिनक जाती हैं. दूसरी तरफ सलीके से आगे बढ़ रही तापसी पन्नू जिस तरह दर्शकों और निर्देशकों का ध्यान खींच रही हैं, उससे थोड़ी सीनियर अभिनेत्रियों में खलबली मची हुई है. अभिनेत्रियों के बीच मौखिक झडपें होती हैं तो मीडिया को चटकारे लेने का मौका मिल जाता है और फिर चालू होता है तमाशा...


Tuesday, August 13, 2019

सिनेमालोक : लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर


सिनेमालोक
लोकेशन मात्र नहीं है कश्मीर
--अजय ब्रह्मात्मज
कश्मीर पृष्ठभूमि, लोकेशन और विषय के तौर पर हिंदी फिल्मों में आता रहा है. देश के किसी और राज्य को हिंदी फिल्मों में यह दर्जा और महत्व हासिल नहीं हो सका है. याद करें तो कुछ गाने भी मिल जाएंगे हिंदी फिल्मों के, जिनमें कश्मीर के नजारो और खूबसूरती की बातें की गई हैं. कश्मीर की वादियों की तुलना स्वर्ग से की जाती है. अमीर खुसरो से लेकर हिंदी फिल्मों के गीतकरों तक ने कश्मीर को जन्नत कहा है. कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य हर पहलू से फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है. 1990 के पहले की हिंदी फिल्मों में यह मुख्य रूप से लोकेशन के तौर पर ही इस्तेमाल होता रहा है. ‘जब जब फूल खिले’ जैसी दो-चार फिल्मों में वहां के किरदार दिखे थे.
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के फिल्मकारों से आग्रह किया है कि वे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में अपनी फिल्मों की शूटिंग करें, इससे वहां के लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, फिल्मों की शूटिंग से कुछ हफ्तों और महीनों के लिए स्थानीय लोगों को अनेक तरह के रोजगार मिल जाते हैं, अगर फिल्म लोकप्रिय हो जाए तो बाद में टूरिज्म से उस इलाके का फायदा होता है. कश्मीर घूम चुके हुए लोगों को मालूम होगा कि वहां एक ‘बेताब वैली’ है. कश्मीर के हालात बिगड़ने से पहले देश के संपन्न मद्य्वार्गीय नवदंपतियों के हनीमून का एक ठिकाना कश्मीर हुआ करता था. वहां जाकर कश्मीरी लबादे में तस्वीरें खिंचवाना, शिकारे पर सैर करते हुए शम्मी कपूर के अंदाज में झटकेदार पोज की पिक्चर उतारना और उसे एल्बम में संजोकर रखना. आज भी कुछ घरों में पूर्वजों के एल्बमों में कश्मीर इन तस्वीरों में सुरक्षित है.
‘जंगली’, ‘जानवर’,’कश्मीर की कली’, ‘आरजू और’ ‘जब जब फूल खिले’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों ने देश के दर्शकों को कश्मीर जाने के लिए प्रेरित किया’ वहां की बर्फीली वादियों में घूमने का अलग रोमांच हुआ करता था’ बताते हैं कि 1947 के अक्टूबर महीने में भारत में शामिल होने के फैसले के बाद राजा हरि सिंह ने फिल्मकारों से कश्मीर आने का व्यक्तिगत आग्रह किया था’ उनके आग्रह को राज कपूर ने अधिक गंभीरता से स्वीकार किया. ‘बरसात’ से लेकर ‘हिना’ तक वह अपनी फिल्मों में किसी न किसी बहाने कश्मीर को लाते रहे’ उनकी फिल्म ‘हिना’ में तो किरदार भी कश्मीर के थे’ कश्मीर में पैदा हुई दिक्कतों के बाद हिंदी फिल्मों को स्विट्जरलैंड का चस्का लगा’ कुछ मजबूरी और कुछ वहां मिल रही सुविधाओं ने यश चोपड़ा समेत अनेक फिल्मकारों को खींच लिया’ कश्मीर में शूट की गई हिंदी फिल्मों की सूची बनाएं तो गिनती 60-75 के आसपास होगी.
कश्मीर के अंदरूनी हलचल की जानकारी पहली बार मणि रत्नम की फिल्म ‘रोजा’ में मिलती है. इस फिल्म में मणि रत्नम ने सबसे पहले कश्मीर की वास्तविक स्थिति के बारे में बताया और दिखाया. ऊपर से दिख रही खूबसूरती की तह में लहूलुहान स्थितियां है. ‘रोजा’ में पड़ोसी देश को नाम और चेहरे के साथ रेखांकित किया गया. उसके बाद तो विलेन का कॉस्ट्यूम ही पठानी सूट हो गया. कई सालों के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मिशन कश्मीर’ में वहां की वास्तविक कठिनाइयों और विरोधाभासों को फिल्म के कथानक में प्रस्तुत किया. उसके बाद से लगातार आतंकवाद के साए में जी रहे कश्मीरियों की कहानियां अलग-अलग दृष्टिकोण से पर्दे पर आती रहीं हैं. कभी किसी ने आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया, लेकिन प्रशासन और सैनिकों की मौजूदगी से कश्मीर की आम जिंदगी में पड़ी खलल पर अधिकांश ने उंगली उठाई. ‘हैदर’ में विशाल भारद्वाज ने गंभीरता से कश्मीरियत के सवाल को छुआ और फिल्म के कुछ पर्संग और दृश्य में इसे ‘चुत्स्पा शब्द से अभिव्यक्त किया’
पिछले साल कश्मीर की तकलीफों को लेकर तीन फिल्में आयीं- ‘नोटबुक’, ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ और ‘हामिद’. इनमें से हामिद को 2018 का श्रेष्ठ उर्दू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. ‘मिशन कश्मीर’ की तरह ही पिछले साल की तीनों फिल्मों में वहां के किरदारों के जरिए फिल्मकारों ने स्थानीय व्यथा का वृत्तांत सुनाया, सुजीत सरकार की ‘यहां’, ओनीर की ‘आई एम...’ और संतोष सिवन की ‘तहान’ आदि फिल्मों में हम वहां के दर्द को देख-सुन सकते हैं’ दरअसल, कश्मीर सिर्फ लोकेशन मात्र नहीं है. थोड़ा गहरे उतरने पर हिंदी फिल्मों के तमाम मसाले वहां मौजूद मिलेंगे. कश्मीर में इमोशन, एक्शन, ड्रामा, ट्रेजडी और प्रहसन सब कुछ है. कोई फिल्मकार हमदर्दी के साथ कश्मीर जाए तो दिल दहला देने वाली कहानियां लेकर लौटेगा. आने वाले सालों में कुछ और दर्दनाक कहानियां वहां से आएंगी. उसके साथ ही कोशिश रहेगी कि खुशहाल कश्मीर के मुस्कुराते चेहरों को भी हिंदी फिल्मों के परदे पर लाया जाए.
पिक्चर अभी बाकी है...


Monday, August 12, 2019

फिल्म लॉन्ड्री : ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल


फिल्म लॉन्ड्री
‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो - दीपक डोबरियाल
अजय ब्रह्मात्मज
2003 में आई विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में थापा का किरदार निभाने के पहले दीपक डोबरियाल ने अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ में राजेंद्र भाटी और  अमृत सागर की ‘1971 में फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुर्टू की भूमिकाएं निभा ली थीं. कैमरे से उनका सामना हो चूका था. संयोग कुछ ऐसा बना कि इन दोनों फिल्मों से पहले विशाल भारद्वाज की ‘ओमकारा’ रिलीज हो गई. इस फिल्म में लंगड़ा त्यागी(सैफ अली खान) के साथ वह राजेश तिवारी की भूमिका में दिखे. इस भूमिका में उन्हें भरपूर सराहना और फिल्म फेयर का स्पेशल अवॉर्ड मिला. ‘ओमकारा’ में उनके नाम के पहले ‘इंट्रोड्यूसिंग’ लिखा गया था, जिसे देखकर अनुराग कश्यप ने अफसोस और खुशी जाहिर की थी. दरअसल, ‘गुलाल’ नहीं अटकती और समय पर रिलीज हो जाती तो दीपक डोबरियाल को’ इंट्रोड्यूस’ करने का श्रेय अनुराग कश्यप को मिल जाता.
बहरहाल, ‘ओमकारा’ ने उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के कबरा गांव में जन्मे दीपक डोबरियाल के कैरियर को आवश्यक गति दे दी. इस फिल्म के लिए मिली सराहना और पुरस्कार के बावजूद बड़ी पहचान बनाने में दीपक डोबरियाल को चार साल लग गए. 2010 में दीपक डोबरियाल को बेला नेगी के निर्देशन में आई ‘बाएं और दाएं’ में नायक रमेश मजीलता और ‘तनु वेड्स मनु’ में पप्पी की भूमिकाएं मिलीं. पहली फिल्म में वह नायक थे, लेकिन ‘बाएं और दाएं’ सीमित रिलीज की वजह से कम देखी गई. वहीं आनंद राय की ‘तनु वेड्स मनु’ की लोकप्रियता ने पप्पी को दर्शकों का प्रिय बना दिया. पप्पी को बहुत पसंद किया गया. पांच सालों के बाद ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में फिर से पप्पी की भूमिका ने दीपक डोबरियाल को दोहरी ख्याति के  के साथ छवि का शिकंजा भी दिया. उन्हें कॉमिक रोल के कलाकार के पाश में बांधने की कोशिश की गयी. वे सचेत रहें उन्होंने प्रसिद्धि कायम रखने की आसान राह नहीं चुनी. दुनियावी तौर पर खुद का नुकसान सहा और बेहतरीन किरदार के इंतजार में रहे. मुहावरों में ही ‘सब्र का फल मीठा’ नहीं होता. इंतजार और लगन से जिंदगी में भी मिठास आती है. ‘हिंदी मीडियम’ में दीपक डोबरियाल को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का बड़ा मौका दिया. साथ में इरफ़ान थे तो समुचित और समक्ष परफॉर्मेंस के लिए उत्साह भी रहा. इरफ़ान ने सहअभिनेता को प्रदर्शन का पूरा मौका दिया. इस फिल्म में उनका किरदार श्याम प्रकाश कोरी निखर कर दर्शकों के बीच पहुंचा और सहानुभूति व सराहना ले गया. सभी ने माना कि दीपक ने इरफ़ान को टक्कर दी. दीपक मानते हैं कि इरफ़ान भाई से सीखने का मौका मिला.
‘बाबा’ की रिलीज के पहले दीपक डोबरियाल फिर से इरफान के साथ ‘अंग्रेजी मीडियम’ की शूटिंग कर रहे थे. कैंसर की बीमारी से स्वस्थ होकर लौटे इरफान ने ‘अंग्रेजी मीडियम’ के लिए हामी भरी तो उनके प्रशंसकों को सुकून के साथ खुशी मिली. दीपक डोबरियाल और इरफान की केमिस्ट्री फिर से इस फिल्म में दिखेगी. दीपक इस फिल्म के बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं. उनके लिए एक फ्रेम में इरफान के साथ आना किसी ने नेमत से कम नहीं है. दीपक बताते हैं,’ उन्होंने पूरे फन और एनर्जी के साथ काम किया. इस बार उनका सुर अलग ही दर्जे का है. कहीं भी नहीं लगता कि वे किसी चीज से जूझ रहे हैं. थोड़े दार्शनिक भाव में रहते हैं और शांत हो गए हैं. उन्होंने हमें इतना केयर और प्यार दिया. सेट पर हंसी-खुशी का माहौल रहता था. शॉट लेने से पहले हमारी बैठकी में हंसी-मजाक के फव्वारे फूटते थे. सभी उस में भीग जाते थे. माहौल बन जाता था. मेरी तो यही दुआ है कि वे जल्दी से जल्दी पहले की तरह एक्टिव हो जाएं. दर्शकों को उनका अंदाज दिखे.’ दीपक डोबरियाल इरफ़ान को ‘बाबा’ दिखाना चाहते हैं. इरफ़ान की  प्रतिक्रिया और सराहना की उम्मीद से अधिक दीपक को विश्वास है कि ‘मेरी फिल्म देखकर वे बहुत खुश होंगे. वे मुझे इतना मानते और स्नेह देते हैं कि उनकी खुशी की कल्पना से ही मैं अभिभूत रहता हूं.
‘हिंदी मीडियम’ के बाद दीपक डोबरियाल ‘लखनऊ सेंट्रल’, ‘कालाकांडी’ और  ‘बागी 2 में दिखे. पिछले साल उनकी ‘कुलदीप पटवाल आई डिड नॉट डू इट’ आई थी. भूमिका बड़ी थी,फिल्म छोटी थी. बड़ी रिलीज नहीं मिलने से यह अधिक दर्शकों तक नहीं पहुंच सकी. इस बीच राज गुप्ता ने उनसे मिलने और ‘बाबा’ की स्क्रिप्ट सुनाने की अनेक कोशिशें कीं. दीपक के डेढ़ महीने के टालमटोल को समझते हुए एक दिन राज ने सीधे शब्दों में कह दिया, ‘आपको मना ही तो करना है. एक बार सुन लो.’ दीपक बताते हैं,’ राज की यह बात मुझे चुभ गई. मुझे लगा कि नया लड़का है. जरूर कोई बात होगी. मैंने स्क्रिप्ट सुनी और फिर अभी फिल्म सभी के सामने है. अब तो मैंने तय कर लिया है कि कोई भी स्क्रिप्ट हो. मैं सुनूंगा जरूर. नए बंदों को भी अनदेखा नहीं करूंगा.’ दीपक यारी रोड के एक कैफ़े में नितमित रूप से से नए कलाकारों से मिलते हैं और उन्हें गाइड करते हैं.
दीपक नहीं चाहते कि नए लड़के अनावश्यक झेंप और संकोच में न रहें . फिल्म इंडस्ट्री के भौकाल से ना डरें.
बातचीत के मुख्या अंश
‘बाबा’ में नायक की भूमिका है आपकी. इस फिल्म की रिलीज को अपनी उपलब्धि के तौर पर लेंगे या सिर्फ आंतरिक खुशी मिली है कुछ कर पाने की?
मेरे लिए आंतरिक खुशी का वक्त है. हमें और आपको मालूम है कि इंडस्ट्री में हमारे जैसे कलाकारों को कैसे रोल मिलेंगे? इस कमरे से उस कमरे में जाते हुए मैं कभी सोचता और विजुलाइज करता हूं कि क्या कोई मेरे मुताबिक रोल ले आएगा. मराठी फिल्म ‘बाबा’ में मुझे मेरी सोच और कल्पना का रोल मिल गया है. मैं खुद को सौभाग्यवान मान रहा हूं कि यह स्क्रिप्ट मेरे पास आई.
उत्तराखंड के कबरा गांव से मुंबई के यारी रोड तक के सफर को पलट कर देखें तो क्या एहसास पनपते हैं?
शुरू में तो कुछ सोच ही नहीं पाता था. तब केवल काम चाहिए था. थोड़ा काम मिला... बाद में कुछ और काम मिला. तब एक एहसास और गर्व होता था कि मैं आगे आया हूं. कबरा गांव से यहां तक आ गया. मेरी ही तरह मेरे गांव और दिल्ली के दोस्तों को लगता होगा कि मेरी तरक्की हो रही है, लेकिन सच कहूं तो यही लगता है कि असली खुशी छोड़ आई जगहों में रह गयी है. आगे बढ़ने और पीछे रह जाने के भेद से मैं निकल चुका हूं. अब मुझे छूट गई चीजों की कदर पता चलने लगी है. अभी पिछले दिनों गांव गया तो झड़ते पहाड़ों को देखकर दुख हुआ. वहां पलायन जारी है. स्खलन से पहाड़ नंगे हो रहे हैं. मेरे घर के पास का 800 साल पुराना पेड़ गिर गया. मैंने वहां एक पेड़ लगाया. उसका लहलहाना देख कर जोश आया और मैंने डेढ़ सौ पेड़ लगाए. आम. लीची. आडू, कटहल के पेड़ लगाए हैं. अपने गांव से फिर से जुड़ गया हूं. कुछ और स्थिरता आ जाये तो तीन-चार महीने वहीँ रहूँगा.
फिर भी दुनियावी पहचान और कामयाबी तो आगे बढ़ना है ही....
कहां सर? अभी मैंने लंदन में वैन गॉग की पेंटिंग ‘स्टारी नाइट’ देखि. देखकर दंग रह गया. वह पेंटिंग हिप्नोटाइज कर लेती है. उसे देखते हुए लगा कि मैं किस बात पर इतरा रहा हूं. अभी मैंने किया ही क्या है. यहां फिल्म के दिग्गजों का काम देख कर एहसास ए कमतरी होती है. मीडिया और अखबार दिखला रहे हैं कि आज के लोकप्रिय स्टार/एक्टर फलां हैं. लेकिन एक एक्टर के तौर पर मुझे तो दिख ही जाता है कि कौन क्या है? बलराज साहनी को ले लें. उन्होंने किस डिग्निटी के साथ ‘गर्म हवा’ की भूमिका निभाई है? उन्होंने कैसे निभाई होगी? फिर उन्हीं को आप ‘दो बीघा जमीन’ में देखते हैं. गंवई किसान और रिक्शावाला के रूप में.. और फिर ‘वक्त’ में उनका अंदाज देख लें. मुझे मालूम है कि मेरे जैसा कौन खाता था? यहां तो स्टार को एसिडिटी हो रखी है और वह चौड़े होकर चला जा रहा है. उधार की उर्जा लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहता मैं. 10 सालों के बाद यह एहसास नहीं चाहता कि अरे मैं तो भटक गया था. मैं अपनी कमजोरी, आकांक्षा, समाज के जोर से अनचाहे रास्ते पर नहीं जाऊंगा. इरफान भाई को देख लें. उन्हें लंबा वक्त लगा, लेकिन उन्होंने हिला कर रख दिया, एक बार उनसे मैंने पूछ दिया कि अपनी ‘बेइज़्ज़तियों’ के बारे में बताइए. वे खूब हंसे मेरे सवाल पर. उन्होंने मजे लेकर कई किस्से सुनाए.
इरफान की ‘बेइज्ज़ती’ तो आप नहीं बताएंगे. अपनी बताएं. आपकी कैसी और कब ‘बेइज्जती’ हुई?
मेरे भी कई किस्से हैं. एक तो शुरुआती दिनों का है. दिल्ली के सराय रोहिल्ला में ‘एक्टिंग सीखो’ बोर्ड लगा हुआ था. उसे देख कर मैं उनके यहां पहुंचा. पता किया तो मालूम हुआ कि हर महीने 150 रुपये देने होंगे और छह महीने के बाद नाटक होगा तो रोल मिलेगा. छह महीनों तक मैं डेढ़ सौ रुपये’ देता रहा. फिर नाटक हुआ तो मुझे पांच दिनों पहले बताया गया कि तुम इसमें शैतान का रोल कर रहे हो. और तुम्हारे दाएं बाएं दो गुर्गे होंगे. मेरा रोल हिंदू-मुसलमान में भेद डालकर दंगा करवाने का था. ऐवान ए गलिन  में शो था. मैंने दोस्तों को बता दिया. वे नाटक देखने आये.  मुझे स्टेज पर देखकर वे सभी हंसते हुए पागल होते रहे. नाटक ख़त्म होने के बाद मैंने अपने काम के बारे में पूछा तो सब ने मेरा मजाक उड़ाया और हँसे. उनकी हंसी मेरे दिल में चुभ गई. बड़ी बेइज्जती महसूस हुई. वहां से मैं सीधे मंडी हाउस गया. पहले अरविंद गौड़ और फिर एक्ट वन में मैंने काम किया. दोनों जगहों पर मेर ट्रेनिंग हुई. ढाई सालों के बाद पुराने दोस्तों में से दो ने किसी पोस्टर पर मुझे देखा तो नाटक देखने आए. नाटक देख कर दोनों अचंभे में रह गए..फिर एक संतुष्टि हुई. मैंने तभी सीख लिया कि ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो. मुंबई की हर ‘बेइज्ज़ती’ को अपनी असफलता मानकर मैंने सीखने की कोशिश की. महंगाई और प्रतियोगिता के इस शहर में कुढ़ने से काम नहीं चलेगा. अपने अनुभव नए लोगों में बाँटता हूं. उन्हें बताता हूं कि संकोच ना करो. मैं इंडस्ट्री का हौआ शांत कर देता हूं. मुझे ऐसा कोई नहीं मिल पाया था. बाकी ‘बेइज्ज़ती’ के कितने किस्से सुनाऊं? अपनी फिल्म के प्रीमियर पर रोक दिया गया हूं. अपमानित होता रहा हूँ.
दिल्ली में रंगमंच की सक्रियता के दिनों में किन लोगों ने आप को तराशा?
सबसे पहले अरविंद गौड़ का नाम लूंगा. फिर एनके शर्मा, पियूष मिश्रा, शाहिद अनवर(अब नहीं रहे). शाहिद भाई से मेरा याराना था. उन्होंने शायरी और किताबों से प्रेम करना सिखाया. वह हमेशा साथ रहे. एनएसडी के राम गोपाल बजाज रोबिन दास, प्रसन्ना... प्रसन्ना के साथ मैं काम नहीं कर पाया. सीनियर और अनुभवी के साथ रहो तो एनर्जी बचती है. खुद खोजने और सोचने में वक्त बिताने से बेहतर है कि गुरुओं से पूछ लो. उनसे निर्देश ले लो. संगत का बहुत असर रहा है मुझ पर.
ऐक्टर होने के आरंभिक तैयारी के पाठ क्या थे?
परस्पर ऑब्जर्वेशन... मैं तो नाटक देख कर ही सीखता गया. एनएसडी के प्ले नहीं छोड़ता था. बाकी थिएटर ग्रुप के भी नाटक देखा करता था. यशपाल शर्मा, चितरंजन गिरि, मुकेश तिवारी, विजय राज आदि से काफी कुछ सीखा, हम कलाकारों ने आपसी विवाद और विमर्श से बहुत कुछ सीखा और खुद को सुधारा. समीक्षकों की भाषा अधिक समझ में नहीं आती थी. जो समझ में नहीं आता था उसके बारे में पता करता था. अब जैसे रोबिन दास ने एक बार कहा कि कलाकारों को ‘कलात्मक पूर्वाग्रह’ छोड़ना चाहिए. मुझे लगा कि हम भी कलाकार हैं तो हमें यह छोड़ना चाहिए, लेकिन समझ में नहीं आया कि क्या छोड़ना है? तो उनसे ही पूछने चला गया. दिल्ली के दिनों में फिल्मों में आने की बात सोची भी नहीं थी मैंने.
आपने रंगमंच से अभिनय सीखा. फिर आप फिल्मों में आ.ए फिल्मों का अभिनय थोड़ा अलग होता है. क्या और कैसे बदलना पड़ा खुद को?
नाटक में प्रोजेक्शन पर जोर रहता है. फिल्मों में रिएक्शन का खयाल रखना पड़ता है. बारीक़ फर्क है, लेकिन कैमरा बहुत संवेदनशील होता है. बारीक से बारीक रिएक्शन भी पकड़ लेता है. फिल्म का अभिनय किफायती होता है. मुझे लगता है कि फिल्मों में आने और निरंतर काम से भी अभिनय में सुधार और निखार आता है. फिल्मों में अभिनय की निजी शैली विकसित हो जाती है. वह ज़रूरी है. सिनेमा के अभिनय में शब्दों के दृश्य साहचर्य को समझना बहुत जरूरी है.
शुरुआती दिनों में कैसी दिक्कतें रहीं? मुंबई आ रहे हैं कलाकारों को अपने अनुभव से क्या बताना चाहेंगे? क्या मंत्र देंगे?
कोई मंत्र पर काम नहीं आता. सभी अपनी यात्रा तय करते हैं. फिर भी मुझे लगता है कि बाहर से आए कलाकारों को ‘कस्बाई संकोच’ छोड़ देना चाहिए. यहां आने पर मेरे दोस्त कहते थे कि दिल्ली के परिचितों को फोन कर... जाकर मिल. मैं संकोच में नहीं जाता था. मुझे लगता है कि ‘कस्बाई संकोच’ नहीं रहना चाहिए. विनम्र भाव से अप्रोच करने में दिक्कत नहीं है. ज्यादा से ज्यादा इंकार ही तो मिलेगा. हां,बदतमीजी नहीं होनी चाहिए. बाहर से आए लोगों में एक फालतू अकड़ भी रहती है. मुझे चार साल लगे. संघर्ष के दिनों में एक कमरे में हम छह लोग साथ रहते थे. एक ही बिस्तर था कोई एक करवट बदलता था तो बाकी पांच को भी करवट बदलनी पड़ती थी. बिस्तर पर करवट की लहर चलती थी समुद्र की लहरों की तरह.
उस दौर का कोई प्यारा और सुखी अनुभव भी तो रहा होगा?
क्या बताऊं? ‘ओमकारा’ के लिए फिल्म फेयर का विशेष पुरस्कार मिला तो सारे खोए-बिछड़े दोस्त मिल गए. सभी अपने संघर्ष और सफलता के बिलों से निकलकर मिलने आए. उन्होंने पार्टी और सेलिब्रेशन के लिए अपने डेबिट और क्रेडिट कार्ड मुझे दे दिए. ऐसी दरियादिली कहां मिल सकती है? आज भी सोचता हूं तो आंखें नम हो जाती हैं. वह सुख और वह प्यार ही तो पूंजी है.
इस सफर में किन फिल्मों का उल्लेख करना चाहेंगे?
सबसे पहले ‘ओमकारा’.... इस फिल्म ने तो पूरी जिंदगी बदल दी. इस फिल्म ने मुझे बताओ एक्टर और इंसान...मेरी जिंदगी... सब कुछ ही बदल दिया. ‘तनु वेड्स मनु’ से पॉपुलर पहचान बनी, लेकिन ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के बाद यही पहचान फांस बन गई. इंडस्ट्री और प्रशंसकों ने बतौर एक्टर बांधने की कोशिश की. पप्पी की छवि से निकलना जरूरी हो गया था. ‘हिंदी मीडियम’ से यह मुमकिन हुआ. उस फिल्म से आदर और सम्मान मिला. इरफान भाई के साथ आना बड़ी बात रही. उन्होंने बहुत मदद की. उस रोल को निभाने में मजदूरों के बीच में किए नाटक और उनसे मेल-मुलाकात का अनुभव काम आया. ‘बाबा’ में मेरा काम लोगों को पसंद आ रहा है. इस फिल्म के लिए मैंने विराम लिया था और लगभग दो सालों का इंतजार किया. तीन-चार चालू किस्म की फिल्में छोडीं और आर्थिक नुकसान सहा. 
‘बाबा’ की भूमिका निभाते समय क्या कभी संजीव कुमार और नाना पाटेकर की फिल्मों की याद आई. उनके प्रभाव या उनसे बचाव की कोई कोशिश करनी पड़ी?
हर भूमिका निभाते समय सामान्य बातें तो एक ही तरीके से जहन में आती हैं. हमें अपनी भाषा तय करनी होती है. संजीव कुमार के साथ गुलजार साहब ने और नाना पाटेकर के साथ संजय लीला भंसाली ने अपने समय के मूक-वधिर की कहानी कही. मुझे राज गुप्ता के मूक-वधिर को पर्दे पर लाना था. हमारे फिल्मकारों ने मूक-वधिरों की अधिक कहानी नहीं कही. गिनती की फिल्में आ पाई हैं. प्रभाव का बोझ नहीं लेता मैं. इस फिल्म के लिए राज गुप्ता से बातचीत में तय हुआ कि माधव इतना गरीब है कि वह साइन लैंग्वेज भी नहीं सीख सकता. हमें इस किरदार को पर्दे पर थोड़े अलग भाव और अंदाज में पेश करना पड़ा.

पुनःश्च : शब्दों का दृश्य साहचर्य
इस बातचीत में दीपक ने शब्दों के दृश्य साहचर्य(विजूअल) की बात की है. इसके उदहारण के रूप में उन्होंने पानी का उल्लेख किया. संवाद में या जीवन में पानी बोलते समय आज के शहरी या मुंबई में पले-बढे कलाकार  के मानस में बोतल.नल और समंदर के पानी का दृश्य साहचर्य होगा. मैं पहाड़ से आता हूँ. मेरे लिए पानी के साथ झरना,वेगवती नदी.शांत नदी,तालाब,लोटे,बाल्टी और कुंए’ के पानी का दृश्य साहचर्य बनेगा. उससे पानी बोलते समय मेरा अनुभव कुच्छ और होगा. कलाकार की इन्द्रियां कितनी जागृत हैं और आप ने कितना पढ़ा या देखा है? इनसे बहुत फर्क पड़ता है.  


संडे नवजीवन : मोदी सरकार,कलाकार और फ़िल्मकार


संडे नवजीवन
मोदी सरकार,कलाकार और फ़िल्मकार
-अजय ब्रह्मात्मज

रेमो फर्नांडिस की ‘स्ट्रीट डांसर’ फिल्म की अभी शूटिंग चल रही है. इसमें वरुण धवन डांसर की भूमिका में हैं. हाल ही में इस फिल्म की शूटिंग के कुछ दृश्य सोशल मीडिया पर शेयर किए गए. एक दृश्य में डांसर राष्ट्रीय ध्वज लेकर दौड़ते नजर आ रहे हैं. निश्चित ही डांसर किसी डांस कंपटीशन में भारत की टीम के रूप में हिस्सा ले रहे होंगे. डांस कंपटीशन में अधिकृत रूप से भारत कोई दल नहीं भेजता. फिर भी डांसर भारतीय होने के नाते तिरंगा लहरा रहे हैं. ‘राष्ट्रवाद के नवाचार’ के तहत फिल्मों में ऐसी दिखावटी दृश्यावलियाँ बढ़ गई हैं. मौका मिलते ही या मौका निकाल कर हर कोई देशभक्ति दिखा रहा है. कभी राष्ट्रगान तो कभी राष्ट्रध्वज.... कभी देश की बात तो कभी अतीत का एकांगी गौरव. हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का चलन बढ़ा है. ‘नेशनलिज्म’ अनेक रूपों में फूट रहा है. सत्ताधारी पार्टी की सोच और देश के प्रति लोकप्रिय अप्रोच की भावनाएं हिलोरें मार रही हैं.
फिल्म एक कलात्मक उत्पाद है. मुख्यधारा की फिल्मों में कला पर उत्पाद हावी हो चुका है. निर्माता की कोशिश रहती है कि वह दर्शकों के लिए मनोरंजन का ऐसा उत्पाद लेकर थिएटर में आए, जिसे ज्यादा से ज्यादा दर्शक देखने आयें. दर्शकों को लुभाने के लिए यूं तो हमेशा से लोकप्रिय धारणाओं और विचारों पर केंद्रित फिल्में आती रही हैं. प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न रूप से आजादी के पहले और बाद के दशकों में भी निर्माता-निर्देशक राष्ट्रीय चेतना और आकांक्षा से आलोड़ित होते रहे हैं. केंद्रीय सत्ता के दिखाए और बांटे सपनों की कथा फिल्मों में परोसी जाती रही है. हिंदी फिल्मों में यह चलन आम रहा है. फर्क इतना आया है कि एक-दो दशक पहले तक ऐसे प्रयास सायास नहीं होते थे. विचार कहानी का हिस्सा बनकर आते थे. आज की तरह उन्हें थोपना, पिरोना या चिपकाना नहीं पड़ता था. इधर की फिल्मों में जब अचानक हमारे नायक और उसके पक्ष के लोग ‘राष्ट्रवाद’ का सुर पकड़ते हैं व्तो खटका सा होता है. ऐसा लगता है कि कहीं कोई दबाव, प्रभाव या झुकाव काम कर रहा है. अभी खौफ या जबरदस्ती की स्थिति नहीं है. वैसे जानकार बताते हैं कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए संगठित रूप से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं.
सोशल मीडिया से लेकर सभा-सेमिनारों तक में सुचारू रूप से सक्रिय दक्षिणपंथी विचारों के कार्यकर्ता अपने तई समर्थन जुटाने, आधार बनाने और सोच फैलाने में लगे हुए हैं. प्रगतिशील और विरोधी विचारों को ‘सूडो लिबरल’ और ‘सूडो सेक्युलर’ बता कर कोसने का काम बखूबी जरी है. पूरी कोशिश है कि ‘पैराडाइम’ ही बदल जाए और सिर्फ सत्ता के सुकून की बातें की जाए. प्रतिकूल विचार आते ही टूट पड़ो और अपनी सीमित नकारात्मक जानकारी से धज्जियां उड़ाओ. सोशल मीडिया को नक्कारखाना बना दो. जहां संयत और संतुलित विचार तूती की आवाज बन कर रह जाए. सोशल मीडिया पर एक्टिव भीड़ विवेक त्याग चुकी है. पारंपरिक मीडिया की स्थिति इससे अलग या बेहतर नहीं है. वहां भी विचार और विश्लेषण के नाम पर कचरा फैलाने का काम चल रहा है. चंद पंक्तियों के सवाल और टिप्पणियों के जवाब में अग्रलेख, संपादकीय और समाचार लिखे जा रहे हैं. विमर्श को खास दिशा दी जा रही है. मीडिया और सोशल मीडिया के इस चलन से फिल्म बिरादरी का प्रभावित होना लाजमी है. सोच=समझ और वैचारिकता के अभाव में फिल्मकार तेजी से लुढ़क रहे हैं.
पिछले चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी लगातार फिल्म बिरादरी के चुनिंदा सदस्यों से मिलते रहे हैं. प्रधानमंत्री के साथ फिल्म बिरादरी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं. मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में कुछ व्यक्तियों को संपर्क साधने और करीब लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. नतीजा यह होता है कि प्रधानमंत्री से मिलकर लौटने के बाद करण जौहर समेत तमाम लोकप्रिय चेहरे सोशल मीडिया पर ‘नए भारत’ के लिए जरूरी परिवर्तन की ताकीद करते हैं... हामी भरते हैं. पिछले दिनों जब देश के 49 बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि कैसे ‘जय श्रीराम’ युद्धघोष बनता जा रहा है तो उस पर विमर्श और चिंता जाहिर करने के बजाय दक्षिणपंथी धड़े ने खुला पत्र लिखा कि क्यों चुनिंदा मामलों में ही ऐसी आवाजें उठती हैं. इस पत्र पर प्रसून जोशी और कंगना रनोट समेत 62 व्यक्तियों के हस्ताक्षर थे. स्थिति यह है कि कोई भी सवाल पूछे तो जवाबी हमला कर दो
पीछे पलट कर देखें तो आजादी के बाद के दशकों में हिंदी फिल्में और फिल्मकार नेहरू और के सपनों के भारत की कहानियां लिख और दिखा रहे थे. साम्यवाद, बराबरी, प्रेम व् भाईचारा, तरक्की आदि विषयों को प्राथमिकता दी जा रही थी. सामंतवाद की बेड़ियों में जकड़े भारत ने गुलामी तोड़कर अंगडाई ली थी. महात्मा गांधी ने प्रेम, अहिंसा और सद्भाव का पाठ पढ़ाया था. देश की विविधता में एकता की तलाश की जा रही थी. आजादी के बाद के भारत में मौजूद सामाजिक विसंगतियों को निशाना बनाया जा रहा था. राष्ट्र निर्माण की लहर थी. फ़िल्मकार और कलाकार की भागीदारी थी. कह सकते हैं यह तब की सत्ता के अनुकूल होने के प्रयास में हो रहा था. सच भी है, लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यह प्रयास गहरी सोच के साथ ऑर्गेनिक तरीके से अमल में लाया जा रहा थे. उस दौर के फिल्मकार स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से प्रेरित और प्रभावित थे. हर तरफ से रूढ़िवादिता और पुरातनपंथी आग्रहों पर चोट किया जा रहा था
पिछले एक दशक में माहौल बदल गया है. निस्संदेह देश में दक्षिणपंथी सोच की लहर है. इस लहर को बनाने, समझने और इस्तेमाल करने में मोदी और शाह की जोड़ी सफल रही है. उन्होंने देश के नागरिकों की धारणा और मानसिकता बदली है. दोबारा मजबूत बहुमत से केंद्र में उनका आना सबूत है कि देश का बहुमत उनके अनुगमन के लिए तैयार है. कायदे से यही मतदाता दर्शक होते हैं. दर्शकों की रुचि, पसंद और प्राथमिकता को व्यावसायिक निर्माता नजरअंदाज नहीं कर सकटा’ उनके लिए फिल्म पहले एक प्रोडक्ट है. वे फिल्मों को खरीदार की पसंद के सांचे में ढाल कर प्रचलित नारों,मुहावरों और संवादों से सजा कर आकर्षक पैकेजिंग करते हैं. दशकों से प्रचलित प्रेम कहानियों में बाजार(दर्शक) की मांग के मुताबिक मसाले जोड़ते हैं और अधिकाधिक कमाई की कामना करते हैं. इस साल की सर्वाधिक कमाई की दो फिल्में ‘उरी’ और ‘कबीर सिंह’ का उदाहरण शामिल सामने है. एक में ‘नए भारत का उग्र राष्ट्रवाद’ है तो दूसरे में 21वीं सदी में ‘स्त्रीविरोधी पुरुष’ का नायकत्व है.
समाजशास्त्रियों के मुताबिक अपनी प्रसिद्धि और लोकप्रियता के बावजूद फिल्मी हस्तियां सत्ता(पावर) के करीब रहने की कोशिश करती हैं. इसका उन्हें अतिरिक्त लाभ मिले या ना मिले... नियमित नुकसान से वे बच जाते हैं. पिछले सालों में हमने देखा कि कैसे आमिर खान, शाह रुख खान और दूसरी फिल्मी हस्तियां छोटी आपत्तियों, टिप्पणियों और भिन्न विचारों से निशाने पर आ गए. अभी ज्यादातर ने खामोशी ओढ़ ली है. जरूरी नहीं है कि वेसभी खौफ में हों, लेकिन व्यर्थ का पंगा लेने और आंख की किरकिरी बनने से बेहतर है कि सरकारी अभियानों में दिख जाओ और समर्थन में दो-चार शब्द बोल दो. यही समर्थन प्रभाव और झुकाव की अभिव्यक्ति के रूप में फिल्मों में आता है तो हमें ‘नेशनलिज्म’ के नारे की अनुगूंज सुनाई पड़ने लगती है. हमेशा से सत्ता और फिल्म बिरादरी की नजदीकी रही है. यह वैचारिक से ज्यादा व्यवहारिक रही है यह नजदीकी. चापलूसी से दूर. नए दौर में सीधे, क्रूर और जबरन तरीके से वर्तमान सत्ता की राजनीतिक विचारधारा और नारों को शब्दों-दृश्यों में बदला जा रहा है. भयंकर महिमामंडन हो रहा है. इसी साल ऐसी अनेक फिल्में आयीं,जिनमें व्यक्ति विशेष पर फोकस किया गया और विरोधी राजनीति के व्यक्तियों और नीतियों की छवि को गंदला और मलिन किया गया. भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ का ट्रेलर शेयर करना स्पष्ट संकेत था कि इरादे क्या हैं?
दरअसल सारा खेल छवि सुधारने और अपनी सोच को जन-जन तक पहुंचाने का है. देश में आमजन तक पहुंचने का एक सशक्त जरिया फिल्में है, इसलिए हम देख रहे हैं कि सरकारी नीतियों, योजनाओं और विचारों को लेकर फिल्में बन रही हैं, उनमें लोकप्रिय अभिनेता-अभिनेत्री काम कर रहे हैं. अक्षय कुमार नए भारत कुमार बन चुके हैं. अजय देवगन, जॉन अब्राहम, कंगना रनोट, विकी कौशल और अन्य सितारे नारों को संवादों में बोल रहे हैं. राष्ट्रीय चेतना की फिल्मों का स्वर बदल चुका है. प्रधानमंत्री पूछ बैठते है...हाउ इज द जोश?
सच्चाई यही है कि कल फिर से सत्ता बदली, सत्ता के विचार बदले और योजनाएं बदलीं तो फिल्मों,कलाकारों और फिल्मकारों को बदलते देर नहीं लगेगी. तब उनके पास नई परिस्थिति के अनुकूल तर्क और कारण होंगे.


Tuesday, August 6, 2019

सिनेमालोक : इतिहास लेखन में आलस्य -


सिनेमालोक
इतिहास लेखन में आलस्य
-अजय ब्रह्मात्मज

भारतीय सिनेमा का इतिहास 100 साल से अधिक पुराना हो चुका है, लेकिन इस इतिहास पर दर्जन भर किताबें भी नहीं मिलती हैं. भारतीय सिनेमा के इतिहास पर बहुत कम लिखा गया है. ज्यादातर किताबें बीसवीं सदी में ही लिखी गईं. 100 साल पूरे होने पर शताब्दी समरोह के तहत भारतीय सिनेमा के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में खूब लिखा गया. लगभग हर फिल्मी और गैर फिल्मी संस्था और संगठन में 100 सालों के भारतीय सिनेमा का बखान हुआ. सभी अपनी सीमित जानकारी से गुणगान करते रहे. आज भी गौरव गाथाएं प्रकाशित होती हैं. अतीत की तारीफ और वर्तमान की आलोचना/भर्त्सना होती रहती है. कहा जाता है कि सिनेमा के हर क्षेत्र में क्षरण हुआ है. दरअसल, समाज में हमेशा कुछ लोग अतीतजीबी होते हैं और देखा गया है कि वे वाचाल और सक्रिय भी रहते हैं. उन्हें वर्तमान से शिकायत रहती है. उनका भी ध्यान इतिहास लेखन की और नहीं रहता.

अतीतगान से निकल के जरा सोचें और देखें तो हम पाएंगे कि सिनेमा के इतिहास के दस्तावेजीकरण का काम हमने नहीं किया है. भारत की किसी भी भाषा की फिल्म इंडस्ट्री का व्यवस्थित इतिहास नहीं मिलता. दशकों पहले कुछ अध्येताओं के प्रयास से कुछ किताबें आ गई थीं. अब उन्हीं में कुछ-कुछ जोड़ा जाता है. उसे अद्यतन कर दिया जाता है. भारत सरकार या किसी फिल्मी संगठन की तरफ से इतिहास लेखन का कोई कदम नहीं उठाया गया है. यहां तक कि विश्वविद्यालयों में ट्रेंड और कंटेंट को लेकर शोध होते रहते हैं. सेमिनार में लाखों खर्च होते हैं. लेकिन इतिहास लेखन का कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाता.

भारतीय फिल्मों का कोई भारतीय कोष भी नहीं है. किताब या ऑनलाइन कहीं भी नहीं है. इंटरनेट की सुविधा और साइबर आर्काइव की संभावनाओं के बावजूद हम आईएमडीबी और विकिपीडिया जैसे विदेशी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर निर्भर करते हैं. भारत में नेशनल फिल्म आर्काइव की तरफ से इसकी कोशिश की जा सकती है. फौरी तौर पर इसी साल से वार्षिक रिपोर्ट के तौर पर तथ्य और आंकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं. अगर कोई ऐसा प्लेटफॉर्म बन जाए तो निर्माता भी अपनी फिल्मों की जानकारी वहां भेज सकते हैं. तथ्य और आंकड़े रहेंगे तो कोई अध्तेता और इतिहासकार उनका विश्लेषण और अध्ययन कर किताब लिख सकता है. हमारी आदत और दिक्कत है कि हम अपने ही इतिहास के संकलन और संग्रहण  में रुचि नहीं रखते. पत्र-पत्रिकाओं के कुछ ही दफ्तरों में फिल्मों से संबंधित सामग्रियों की लाइब्रेरी मिलेंगी. इंटरनेट की सुविधा आ जाने से जानकारियां और तस्वीरें इंटरनेट से ले ली जाती हैं, जिनमें कई बार भयंकर गलतियां रहती हैं.

पिछले दिनों मुंबई स्थित फ़िल्मी संगठनों में जा-जाकर मैंने पता करने की कोशिश की. मुझे यह जानना था कि क्या निर्देशक,निर्माता,कलाकार,लेखक,तकनीकी विभाग के कर्मचारी आदि के संगठन अपने वर्तमान और पुराने सदस्यों की पूरी जानकारी का दस्तावेजीकरण करते हैं? लगभग सभी के यहां से नकारात्मक जवाब ही मिला. इस दिशा में कोई सोचता ही नहीं. उन्हें इसकी जरूरत और उपयोगिता महसूस नहीं होती. कायदे से सभी संगठनों को अपने वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत रिकॉर्ड कर लेनी चाहिए. वे उन्हें अपने साइट पर प्रकाशित करें और शेयर करने की सुविधा दें. यह अभी तक नहीं हुआ है तो जल्दी से जल्दी से आरंभ किया जा सकता है. सभी संगठनों के पास पर्याप्त पैसे हैं,जिनसे संसाधन जुटाए जा सकते हैं. भारत सरकार के अधीन कार्यरत फिल्म निदेशालय इसकी देख-रेख कर सकता है.
किसी भी दस्तावेज को सुरक्षित और दीर्घायु रखने का एक ही तरीका है कि उसे संरक्षित करने के साथ वितरित भी कर दो. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक तथ्य पहुंचे रहेंगे तो किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहेंगे. सरकार,संस्थान,संगठन और  विश्वविद्यालयों को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. लापरवाही में हम बहुत कुछ गवा चुके हैं. अभी से भी जागृत हुए तो बहुत कुछ बचाया भी जा सकता है.


Sunday, August 4, 2019

संडे नवजीवन : खटकता है हिंदी फिल्मों का नकलीपन


संडे नवजीवन
खटकता है हिंदी फिल्मों का नकलीपन
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों मनोज के झा निर्देशित फिल्म ‘फैमिली ऑफ ठाकुरगंज’ आई. फिल्म अगर आपने देखी हो तो मान लें कि हिंदी फिल्मों में उत्तर भारतीय समाज कमोबेश इसी रूप-रंग में आ रहा है. अपराध की दुनिया में लिप्त किरदार बदले, फिरौती और जमींदारि रसूख में डूबे रहते हैं. इन फिल्मों में रिश्तो का लोकतंत्र नहीं रहता. महिलाओं की गौण उपस्थिति रहती है. उत्तर भारत से सामंती प्रथा आजादी के कुछ दशकों के बाद समाप्त हो गई, लेकिन फिल्मों में यह अभी तक चली आ रही है. वेशभूषा, बोली, रहन-सहन और पृष्ठभूमि में दशकों पहले की छाप मौजूद रहती है. चरित्र का निर्माण भी दशको पुराना है. उत्तर भारत में प्रवेश करते ही हिंदी फिल्मों की कहानियां रूढ़िवादी गलियों में भटकने लगती हैं. दिख रहे समाज और संसार का नकलीपन झांकता रहता है. साफ दिखता है कि इन फिल्मों का अपने समाज से आज का कोई संबंध नहीं है.
लंबे समय से हिंदी फिल्मों से गांव गायब हो गया है. फिल्म जब उत्तर भारत में पहुंचती है तो यह स्पष्ट नहीं होता कि किस प्रदेश के किस इलाके की पृष्ठभूमि में किरदार रचे गए हैं. दशकों के अभ्यास और हिंदी फिल्मों ने उत्तर भारत के गांव और कस्बों की धारणा बना दी है. आज के निर्देशक भी उन्हीं धारणाओं पर अमल करते हैं और बार-बार नकली दुनिया रचने की कोशिश करते हैं. नतीजतन इन फिल्मों की लोकप्रिय अपील नहीं बन पाती. मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की ऐसी फिल्मों में कोई रूचि नहीं रहती. निर्देशकों को भी लगता है कि छोटे-मझोले शहरों और कस्बों के दर्शकों को रिझाना है तो सौंदर्यबोध और चित्रण के लिहाज से कुछ दशक पीछे चलना ही ठीक रहेगा. पिछले साल आई राजकुमार गुप्ता की ‘रेड’ में आधुनिकता के बीच भी चित्रण यही पारम्परिकता दर्शकों को चिढ़ा रही थी. आर बाल्की की ‘पैडमैन’ फिल्म में मध्यप्रदेश का माहौल होने के बावजूद अक्षय कुमार की मौजूदगी व्यवधान डालती रही. अक्षय कुमार अपनी लोकप्रियता के अनुरूप उच्चारण और संवाद अदायगी पर मेहनत किए होते तो ‘पैडमैन’ की स्थानीयता उभर कर आती.
हिंदी फिल्मों में उत्तर भारत के चित्रण में इसी स्थानीयता की कमी खटकती है. बोली, भाषा, वेशभूषा, परिवेश और चरित्रों में स्थानीयता का अभाव उन्हें एकरूप और नकली बनाता है. इन दिनों निर्माता-निर्देशक भाषा पर थोड़ा ध्यान दे रहे हैं. कोशिश करने के साथ यह दावा किया जाता है कि अभिनेता/अभिनेत्री ने स्थानीय लहजे में हिंदी बोलना सीखा. उनके लिए प्रशिक्षक रखे गए और सेट पर भी उनके संवादों के उच्चारण के लहजे में आवश्यक सुधार के लिए प्रशिक्षक मौजूद रहे, लेकिन ढाक के वही तीन पात. प्रशिक्षकों के निर्देश और कलाकारों के अभ्यास के बावजूद स्थानीय लहजा सुनाई नहीं पड़ता. कुछ पंक्तियों और उनके भी कुछ शब्दों तक ही उनकी पकड़ बन पाती है. कई बार वे सही और सटीक बोलने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन संवाद अदायगी अपेक्षित पटरी से उतर जाती है और प्रभाव भोंडा हो जाता है. लोकप्रिय अभिनेता/स्टार की मेहनत का झूठा सच पर्दे पर दिखाई और सुनाई पड़ने लगता है. इस मामले में थिएटर से फिल्मों में आए कलाकार फिर भी थोड़े सफल होते हैं.
ताजा उदाहरण के लिए विकास बहल की फिल्म ‘सुपर 30’ में रितिक रोशन को देखा जा सकता है. इस फिल्म में रितिक रोशन ने अपनी परिचित और लोकप्रिय छवि को नोच कर आनंद कुमार बनने का प्रयत्न किया है. कद-काठी और लुक में वह आनंद कुमार की तरह नहीं है. फिर भी आनंद कुमार के की मनोदशा, संघर्ष और मेहनत को उन्होंने आत्मसात किया, खुद को सांवला किया, पटनहिया हिंदी भी बोलने की कोशिश की, लेकिन दूसरे कलाकारों के साथ आते ही उनकी मेहनत की पोल खुलती रही. दरअसल, इस फिल्म में उनके साथ के किरदारों में वीरेंद्र सक्सेना, आदित्य श्रीवास्तव और पंकज त्रिपाठी सरीखे रंगमंच के अभिनेता थे. यहाँ तक कि उनके 30 छात्र भी... भाषा पर उनकी पकड़ रितिक रोशन से कई दर्जे ऊपर थी. यही वजह है कि उनके साथ के दृश्यों में उनकी संवाद अदायगी की कमजोरी उभरती रही. रितिक रोशन ने इस फिल्म में ‘बॉडी लैंग्वेज’ तो पकड़ ली लेकिन ‘लैंग्वेज’ पकड़ने में असफल रहे
‘सुपर 30’ घोषित रूप से आनंद कुमार के जीवन से प्रेरित फिल्म है. आनंद कुमार का ‘सुपर 30 पटना में है. खुद उनका जीवन पटना में बीता. फिल्म में पटना लिखना चाहिए था. अमूमन फिल्मकार किसी भी शहर को स्थापित करने के लिए वहां के ‘सिग्नेचर इमारतों और वास्तु’ को फिल्मों में दिखाते हैं. गलियां और मकान के हुबहू सेट तैयार किये जाते हैं. अगर उन्होंने वास्तविक लोकेशन पर शूट किया होता तो शहर सहज रूप में उनकी फिल्मों में आ जाता है. विकास बहल ने ‘सुपर 30’ में पटना शहर के प्रसिद्ध और परिचित स्थानों को दिखाने का कोई प्रयास नहीं किया. इसके उलट कुछ फिल्मों में कहानी किसी और प्रदेश और इलाके की रहती है, लेकिन शूटिंग की सुविधा-असुविधा से पृष्ठभूमि का लोकेशन लापरवाही की चुगली कर जाता है
वास्तविकता और स्थानीयता के लिहाज से इस साल आई फिल्मों में अभिषेक चौबे की ‘सोनचिरैया’ और अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15 का उल्लेख किया जा सकता है. पिछले साल आई डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘मोहल्ला अस्सी’ भी उल्लेखनीय है. तीनों ही फिल्में में अनेक चरित्र थे. उन सभी की भूमिका दमदार थी. ‘सोनचिरैया में’ चंबल का इलाका स्पष्ट तरीके से दिखा. चंबल के बीहड़ों और बस्तियों को अभिषेक चौबे और उनके कैमरामैन ने बारीकी से कैद किया और विश्वसनीयता कायम रखी थी. अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’ का लालगांव काल्पनिक गाँव था,लेकिन वहां की गलियां, थाना, तालाब और भाषा उत्तर भारत की थी. निश्चित इसे रचने में फिल्म के प्रोडक्शन डिज़ाइनर और लेखकों ने अनुभव सिन्हा की मदद की होगी.उनके कलाकारों ने स्क्रिप्ट में निर्दिष्ट गांव को पर्दे पर स्थापित किया और दर्शकों को अपने साथ वहां पहुंचा दिया. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ में पप्पू के चाय की दुकर और अस्सी की गली देखकर ‘कशी का अस्सी’ के लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह हैरत में रह गए थे.
उत्तर भारत की चरित्रगत स्थानीयता के संदर्भ में प्रकाश झा का उल्लेख जरूरी होगा. उनकी फिल्मों की भाषा और पृष्ठभूमि बिहार की रहती है. उन्होंने ‘दामुल’ की शूटिंग जरूर बिहार में की थी, लेकिन दूसरी पारी में वे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में बिहार सृजित करते रहे. उन्होंने महाराष्ट्र के वाई और मध्यप्रदेश के भोपाल को बिहार बना दिया था. गौर करना होगा कि लहजे, उच्चारण और शैली के हिसाब से उन्होंने अपनी फिल्मों में खास भाषा विकसित की है, जो उनके संवादों और कलाकारों के परफॉर्मेंस को प्रभावशाली बना देती है. दूसरे निर्देशक उनके अनुकरण में सफल नहीं हो पाते.
इन दिनों एक और बात खटकती है.उत्तर भारत की पृष्ठभूमि के फिल्मों में पंजाबी गानों का कोई तुक नहीं बनता है, लेकिन हम बार-बार ऐसी फिल्मों में पंजाबी गाने सुनते हैं और देखते हैं. उत्तर भारत में प्रचलित गीत-संगीत के बजाय पंजाबी धुनों और बोलो के गीत-संगीत की भरमार रहती है. हमारे निर्देशकों को पंजाबी गाने डालने के इस दबाव से निकलना होगा. उन्हें अपनी फिल्मों में स्थानीय धुनों और बोलो को के साथ प्रयोग करना होगा.