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फिल्‍म समीक्षा : बजरंगी भाईजान

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-अजय ब्रह्मात्‍मज  सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ को देखने के कई तरीके हो सकते हैं। पॉपुलर स्टार सलमान की फिल्में समीक्षा से परे होती हैं। खरी-खोटी लिखने या बताने से बेहतर होता है कि फिल्मों की अपील की बातें की जाएं। सलमान खान की खास शैली है। एक फॉर्मूला सा बन गया है।  ‘वांटेड’ के बाद से उनकी फिल्मों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। निर्देशक बदलते रहते हैं, लेकिन सलमान खान वही रहते हैं। बात तब अलग हो जाती है, जब उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत निर्देशक कबीर खान मिल जाते हैं। मनोरंजन के मसाले मेे मुद्दा मिला दिया जाता है। स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं…