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Saturday, December 6, 2014

‘3 इडियट’ के तीनों इडियट ही ला रहे हैं ‘पीके’

आमिर खान ने आगामी फिल्म ‘पीके’ के प्रचार के लिए इस बार नया तरीका अनपाया है। वे इस फिल्म की टीम के साथ सात शहरों की यात्रा पर निकले हैं। आज पटना से इसकी शुरुआत हो रही है। इस अभियान में वे ‘3 इडियट’ का प्रदर्शन करेंगे और फिर आमंत्रित दर्शकों से बातचीत करेंगे। पटना के बाद वे बनारस, दिल्ली, अहमदाबाद, हैदराबाद, जयपुर और रायपुर भी जाएंगे। पटना के लिए उड़ान भरने से पहले उन्होंने अजय ब्रह्मात्माज से खास बातचीत की।

प्रचार के इस नए तरीके के आयडिया के बारे में बताएं ?

हमलोग ‘3 इडियट’ दिखा रहे हैं। मकसद यह बताने का है कि ‘3 इडियट’ की टीम एक बार फिर आ रही है। इस बार वही टीम ‘पीके’ ला रही है। ‘3 इडियट' के तीनो इडियट राजू,विनोद और मैं अब ‘पीके’ लेकर आ रहे हें। हमलोग तयशुदा सात शहरों में ‘3 इडियट’ की स्क्रीनिंग करेंगे। इस स्क्रीनिंग में आए लोगों के साथ फिल्म खत्म होने के बाद हमलोग बातचीत करेंगे। कोशिश है कि हमलोग ग्रास रूट के दर्शकों से मिलें।
पटना से शुरूआत करने की कोई खास वजह...?
पटना से शुरूआत करने की यही वजह है कि ‘पीके’ में मेरा किरदार भोजपुरी बोलता है। वास्तव में हमलोग भोजपुर जाना चाहते थे। वहां की पुलिस ने मना कर दिया कि आप न आएं। हम कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। मेरा तो यही मन था कि भोजपुर से शुरू करें। उनके मना करने के बाद अब पटना से शुरू कर रहे हैं।

हां,डर तो रहता है कि कहीं कुछ हो गया तो ?

कुछ भी नहीं होता है। सभी मुझे प्यार करते हैं। उन्होंने यही कहा कि भीड़ के नियंत्रण में दिक्कत होगी। प्रशासन असुविधा महसूस कर रहा था। चूंकि भोजपुरी भाषा है तो बिहार से आरंभ करना लाजिमी था। अब पटना से शुरूआत होगी।

भोजपुरी का आयडिया कैसे आया? मैंने सुना कि आप ने ही भोजपुरी पर जोर दिया था।
मेरे लिए इसे अभी बताना मुश्किल है। फिल्म देखने पर आप समझ जाएंगे कि पीके क्यों भोजपुरी बोल रहा है। स्क्रिप्ट में तो वह खड़ी बोली हिंदी ही बोल रहा था। स्क्रिप्ट सुनने पर मैंने राजू से कहा कि उसे भोजपुरी में बोलने दो। उस भाषा से किरदार में एक कलर आएगा। वह निखर जाएगा।

मेरी धारणा है कि कहीं न कहीं आप में और दिलीप कुमार की कार्यशैली में कई समानताएं हैं। हालांकि आप स्पष्ट प्रभाव या प्रेरणा से मना करते हैं। अब ‘पीके’ की भोजपुरी लें। मुझे दिलीप साहब की ‘गंगा जमुना’ याद आ रही है।
दिलीप साहब तो गजब की भोजपुरी बोलते थे। भाषा पर उनकी पूरी कमांड थी। मैंने भी कोशिश की है। हमारे साथ एक विशेषज्ञ और प्रशिक्षक शांतिभूषण थे। शूटिंग के चार महीने पहले से मैंने अभ्यास आरंभ कर दिया था। वे संवाद बोलते थे और मैं उसे फोनटिकली लिख लेता था और फिर याद करता था। मैं शब्दों और वाक्यों को ध्वनि और लहजे के साथ याद रखता था। एक चीज स्पष्टर कर दूं कि मैंने भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। किसी भी भाषा को अपनाने में वक्ती लगता है।

भोजपुरी की कितनी गालियां सीखी आप ने...?
पीके गाली नहीं देता। इस फिल्मे में गालियां नहीं हैं। मैंने कहा न कि भोजपुरी भाषा नहीं सीखी है। मैं अपने संवादों तक सीमित रहा। उन्हें ही सही उच्चाकरण के साथ बोलता रहा। बोलते-बोलते एक टच आ ही जाता है। उन दिनों मेरी हिंदी में भोजपुरी का असर सुनाई पड़ता था।
पीके विचित्र प्राणी लग रहा है। क्या कुछ बता पाएंगे?

'पीके' के बारे में नहीं बता पाऊंगा। हां, फिल्म का अनुभव बहुत कमाल रहा। पहली दफा ऐसा हुआ कि शॉट की तैयारी का टेक में इस्तेंमाल नहीं हुआ। टेक देते समय मैं किसी और बहाव में आकर कुछ अलग कर जाता था। वह राजू को अच्छा लगता था। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ? किसी एक शॉट की बात नहीं कह रहा हूं। कई बार ऐसा हुआ। लगातार हुआ। कमाल की कहानी है ‘पीके’। मैंने कल फाइनल फिल्म देखी और मैं काफी खुश हूं। हमें लगता है कि हम जो बनाने चले थे, उसमें कामयाब हुए हैं। अब दर्शकों की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

राजकुमार हिरानी के क्रिएटिव धैर्य की तरीफ करनी होगी कि वे आज के इस दौर में भी किसी हड़बड़ी में नहीं हैं। उनकी फिल्म पांच सालों के अंतराल के बाद आ रही है।
मेरे हिसाब से अभी वे हिंदी सिनेमा के नंबर वन डायरेक्टर हैं।

‘सत्यमेव जयते’ तो जारी रहेगा ?
हां,जारी रहेगा। 2015 में हम नहीं करेंगे। हमलोग रिसर्च और बाकी इंतजाम में इमोशनली थक गए हैं। अब ब्रेक लेने के बाद आरंभ करेंगे। 2015 में न तो ‘सत्यमेव जयते’ आएगा और न ही मेरी कोई फिल्म आएगी। मैंने कोई फिल्म साइन नहीं की है। अभी स्क्रिप्ट सुन रहा हूं। कोई स्क्रिप्ट पसंद भी आ गई तो वह 2016 में ही आ पाएगी।

Thursday, March 14, 2013

व्यंग्य निर्देशक सुभाष कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
    बाहर से आए निर्देशक के लिए यह बड़ी छलांग है। खबर है कि सुभाष कपूर विधू विनोद चोपड़ा और राज कुमार हिरानी की ‘मुन्नाभाई  ... ’ सीरिज की अगली कड़ी का निर्देशन करेंगे। पिछले हफ्ते आई इस खबर ने सभी को चौंका दिया। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ और ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के बाद ‘मुन्नाभाई चले अमेरिका’ की घोषणा हो चुकी थी। उसके फोटो शूट भी जारी कर दिए गए थे। राजकुमार हिरानी उस फिल्म को शुरू नहीं कर सके। स्क्रिप्ट नहीं होने से फिल्म अटकी रह गई। इस बीच राजकुमार हिरानी ने ‘3 इडियट’ पूरी कर ली। उसकी अपार और रिकार्ड सफलता के बाद वे फिर से आमिर खान के साथ ‘पीके’ बनाने में जुट गए हैं। इसी दरम्यान सुभाष कपूर को ‘मुन्नाभाई ....’ सीरिज सौंपने की खबर आ गई।
    सुभाष कपूर और विधु विनोद चोपड़ा के नजदीकी सूत्रों की मानें तो यह फैसला अचानक नहीं हुआ है। राजकुमार हिरानी की व्यस्तता को देखते हुए यह जरूरी फैसला लेना ही था। ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज में दो फिल्में कर लेने के बाद राजकुमार हिरानी अन्यमनस्क से थे। शायद वे इस सीरिज से ऊब गए हों या नए विषयों का हिलोर उन्हें बहा ले जाता हो। ‘मुन्नाभाई ...’ के मुन्ना और सर्किट की जोड़ी को दर्शक नई स्थितियों और परिवेश में देखने के लिए लालायित हैं। संजय दत्त के पास अभी कोई बेहतर फिल्म भी नहीं है। ‘जिला गाजियाबाद’ जैसी फिल्म में हम ने संजय दत्त और अरशद वारसी को एक साथ देखा, लेकिन उनके बीच मुन्ना-सर्किट की केमिस्ट्री नहीं दिखी। स्पष्ट है कि दोनों ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज में ही जमते हैं।
    सुभाष कपूर के चुने जाने की बात कर रहा था। विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी दोनों चाहते थे कि फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी किसी को दी जाए। इस सिलसिले में वे पहले हबीब फैजल से मिले। उन्हें लगा था कि युवा निर्देशक ‘मुन्नाभाई ...’ सीरिज के साथ न्याय कर सकेंगे। बातचीत और विमर्श में उनसे संतुष्ट नहीं होने पर फिर ‘फरारी की सवारी’ के निर्देशक राजेश मापुसकर के बारे में सोचा गया। राजेश मापुसकर पहले राजकुमार हिरानी के सहयोगी थे और उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा के लिए ही ‘फरारी की सवारी’ बनाई थी। उन पर भी सहमति नहीं बनी। तभी फिल्म पत्रकार और समीक्षक अनुपमा चोपड़ा ने सुभाष कपूर का नाम सुझाया। अनुपमा चोपड़ा के पति हैं विधु विनोद चोपड़ा। अनुपमा को ‘फंस गया रे ओबामा’ अच्छी लगी थी। उन्होंने यह भी बताया कि सुभाष कपूर की ‘जॉली एलएलबी’ आ रही है। अनुपमा के सुझाव पर चोपड़ा और हिरानी ने पहले ‘फंस गया रे ओबामा’ और फिर अप्रदर्शित ‘जॉली एलएलबी’ देखी। उन्हें सुभाष कपूर की शैली और व्यंग्य की धार पसंद आई। उन्होंने तय कर लिया कि सुभाष कपूर को ही लेंगे।
    सुभाष कपूर ने हिंदी से एमए किया है। हिंदी से एम ए का विशेष उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि आम तौर पर हिंदी पढ़े व्यक्ति की एक रूढि़वादी और पिछड़ी छवि है। माना जाता है कि जो विद्यार्थी किसी और विषय में प्रवीण नहीं होते वे मजबूरी में हिंदी और मराठी चुनते हैं। सुभाष कपूर ने पढ़ाई के दिनों में छात्र आंदोलन और थिएटर गतिविधियों में हिस्सा लिया। वे वामपंथी रुझान के व्यक्ति हैं। टीवी और प्रिंट की पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया। इरादा था कि हिंदी में फिल्में बनाएंगे। उनकी पहली फिल्म ‘से सलाम इंडिया’ क्रिकेट के विषय पर थी। वह आई और चली गई, फिर भी इंडस्ट्री में उन्हें नोटिस किया गया। अगली फिल्म ‘फंस गया रे ओबामा’ थी। इस फिल्म के लिए कलाकार जुटाने में सुभाष कपूर को भारी मशक्कत करनी पड़ी। संजय मिश्र को केंद्रीय भूमिका में लेकर फिल्म बनी। यह फिल्म चली और खूब पसंद की गई। अगली फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ 15 मार्च को रिलीज हो रही है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक असफल वकील जॉली की कहानी है। समाज और सत्ता पर एक साथ चोट करती सुभाष कपूर की फिल्में सीधे तौर पर कोई उद्घोष या नारा नहीं लगातीं। उनकी फिल्मों में आम जीवन के प्रसंगों का मनोरंजन रहता है। हमारे आसपास के किरदार हमारी ही भाषा में चुटीली बातें करते हैं और हमें घायल कर देते हैं।
    उम्मीद है कि सुभाष कपूर अपनी धार बनाए रखेंगे और ‘मुन्नाभाई  ...’ सीरिज को मनोरंजक मजबूती के सथ आगे बढ़ाएंगे।

Monday, July 9, 2012

कामना चंद्रा : गृहिणी से बनीं फिल्म लेखिका

Mrs Chandra.jpg 
-अजय ब्रह्मात्मज
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से 1953 में हिंदी से स्नातक कामना चंद्रा की शादी उसी साल हो गई थी। हिंदी की पढ़ाई और इलाहाबाद के माहौैल ने कामना चंद्रा में लेखन को शौक पैदा किया। उनकी टीचर मिस निगम ने सलाह दी कि कामना तुम अच्छा लिखती हो। चाहे कुछ भी हो, लिखना मत बंद करना। कामना चंद्रा ने अपने टीचर की सलाह गांठ बांध ली। घर-गृहस्थी के बाद भी कामना चंद्रा का लेखन चलता रहा। शादी के बाद कामना चंद्रा के पति नवीन चंद्रा की पोस्टिंग दिल्ली हुई। दिल्ली में उन्होंने आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन किया। फिर भी कामना चंद्रा ने घर-परिवार को प्राथमिकता दी। बच्चों की परवरिश से फुर्सत मिलने पर ही वह लिखती थीं। बेटे विक्रम चंदा और बेटियां अनुपमा और तनुजा चंद्रा के पालन-पोषण पर उन्होंने पूरा ध्यान दिया। उन्होंने अपनी मर्जी से तय किया था कि वह जॉब नहीं करेंगी। 1977 में उनके पति मुंबई आ गए। यहां आने के बाद कामना चंद्रा की इच्छा जगी कि राज कपूर को एक स्टोरी सुनाई जाए। और फिर फिल्मों का सिलसिला चालू हुआ।

‘प्रेमरोग’
    ‘आग’ के समय से ही मैं राज कपूर की प्रशंसिका थीं। मैंनेे उनकी सारी फिल्में देख रखी थीं। मुंबई में भी एक साल तक आकाशवाणी के लिए लेखन करने के बाद मैंंने राज कपूर से मिलने की कोशिश की। बच्चे हंसे ़ ़ ़ क्या मम्मी राज कपूर तुम्हारी कहानी सुनेंगे? तब तक फिल्म इंडस्ट्री के किसी व्यक्ति से मेरा संपर्क नहीं था। डायरेक्टरी से नंबर देख कर मैंने आर के स्टूडियो फोन कर दिया। राज कपूर के सेक्रेटरी हरीश भिबरा ने फोन उठाया। बातें हुई तो मैंने स्पष्ट कहा कि मुझे राज साहब को ही कहानी सुनानी है। बहरहाल, एक हफ्ते के अंदर हरीश भिबरा का कॉल आया कि आप का समय तय हो गया है। आप आकर मिल लें और अपनी कहानी सुना दें।
    मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। पहली मुलाकात में मैंने राज कपूर साहब को दो कहानियां सुनाईं। उन्होंने दो घंटे से ज्यादा समय दिया। मेरी कहानियां सुनीं और एक कहानी पसंद की। उन्होंने मुझे कहा कि आप इस कहानी को पूरे विस्तार के साथ लिख दें। मैंने लगभग 120 पृष्ठों में कहानी का विस्तार किया। उन्होंने मुझे गाइड किया कि अपनी कहानी जरिस्टर करवा लें। फिर मुझ से पूछा कि अगर मैं इस कहानी के स्क्रीनप्ले और डायलॉग के लिए किसी और को जोड़ूं तो आप को कोई दिक्कत तो नहीं होगी? इस तरह जैनेन्द्र जैन जुड़े। उस फिल्म के निर्माण के समय मेरे पति का ट्रांसफर हांगकांग हो गया। मैं जाने लगी तो राज साहब ने तब तक शूट हो चुकी फिल्म के 10 रील मुझे और मेरे परिवार को दिखाए। उन्होंने मेरी तारीफ की। संयोग ऐसा रहा कि फिल्म की रिलीज के समय मैं अपने परिवार के साथ भारत आ गई थी। पोस्टर और फिल्म में उन्होंने कहानीकार का क्रेडिट दिया।

चांदनी
    सबसे पहले यश चोपड़ा की पत्नी पामेला चोपड़ा का फोन आया। उन्होंने कहा कि मैंने आप की फिल्म ‘प्रेमरोग’ देखी है। अगर वैसी कोई कहानी है तो बताएं। मैं यश चोपड़ा जी से मिलने गई। इतने विनम्र हैं यश चोपड़ा। उन्होंने पूरे आदर के साथ बिठाया। मेरी कहानी सुनी। कहानी पसंद आ गई तो लिख कर देने के लिए कहा। इस बार भी मैंने कहानी पूरे विस्तार से लिख कर उन्हें सौंप दी। उसके डायलॉग सागर सरहदी ने लिखे और स्क्रिनप्ले किसी और ने किया। ‘चांदनी’ फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आई। यश चोपड़ा के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा। उन्होंने मुझे पूरा सम्मान दिया। इस फिल्म के समय तक मेरे बच्चे बड़े हो गए थे। मैं भी तैयार थी कि कुछ और फिल्में लिखूं।

1942-ए लव स्टोरी
    मैं अपने बच्चों से मिलने अमेरिका गई थी। उनकी भी छुट्टियां थीं। एक दिन हम सभी ने वीडियो पर ‘परिंदा’ देखी। मेरे पूरे परिवार को फिल्म अच्छी लगी। मेरी बेटी अनुपमा ने कहा कि मम्मी अगली कहानी इसके डायरेक्टर को सुनाना। भारत लौटने के बाद मैंने विनोद के यहां फोन किया तो उनकी मां ने फोन उठाया। बाद में विनोद से बातें हुईं। अगले दिन मुलाकात हुई तो मैंने कहानी सुनाई। मेरी इच्छा  थी कि ‘प्रेमरोग’ और ‘चांदनी’ की ही तरह विनोद कहानी ले लें। विनोद ने कहा कि मेरे साथ तो काम करना होगा। स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखने के समय रहना होगा। 1989 में ‘1942-ए लव स्टोरी’ का काम शुरू हुआ और फिल्म 1995 में आई। मैंने उन्हें समकालीन प्रेम कहानी दी थी, जिस वे 1942 में ले गए। मैंने अपने बचपन की यादों के सहारे उस दौर को जिंदा किया।
    बाद में कामना चंद्रा ने अरुणा राजे के लिए ‘भैरवी’ लिखी और अभी बेटी तनुजा चंद्रा के लिए एक फिल्म लिखी हैं। बीच में राजश्री के टीवी सीरियल ‘वो रहने वाली महलों की’ के साथ सलाहकार के तौर पर जुड़ी रहीं। कामना चंद्रा संतुष्ट जीवन जी रही हैं। छोटी बेटी तनुजा चंद्रा उनके साथ रहती हैं। वह फिल्म निर्देशक हैं। बड़ी बेटी अनुपमा चंद्रा की विधु विनोद चोपड़ा से शादी हो गई है। अनुपमा देश की मशहूर फिल्म समीक्षक और लेखक हैं। बेटा विक्रम चंद्रा अंग्रेजी में लिखते हैं और अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में क्रिएटिव रायटिंग के प्रोफेसर हैं।

Friday, April 13, 2012

खास है पुनरावलोकन (रेट्रोस्‍पेक्टिव)

-अजय ब्रह्मात्‍मज

विदेश में फिल्मकार, प्रोडक्शन हाउस, ऐक्टर और फिल्म से संबंधित तकनीशियनों पर केंद्रित फिल्म समारोहों और रेट्रोस्पेक्टिव (पुनरावलोकन) के आयोजन होते हैं। ऐसे आयोजनों में फिल्मप्रेमी और आम दर्शक पहुंचते हैं। दो से सात दिनों में अपने प्रिय कलाकारों, तकनीशियनों, लेखकों या निर्देशकों की फिल्मों का आनंद उठाने के साथ वे संबंधित फिल्मों के बारे में अपना नजरिया भी बदलते हैं।

ऐसे आयोजनों का सामान्य उद्देश्य फिल्मों से संबंधित किसी खास व्यक्ति के योगदान का रेखांकन ही होता है। एक साथ सारी फिल्में देखने का प्रभाव बिल्कुल अलग होता है। हम ज्यादा स्पष्ट होते हैं। मुंबई में पिछले दिनों फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की फिल्मों का ऐसा ही पुनरावलोकन हुआ। 30 मार्च से 4 अप्रैल के बीच जुहू के एक मल्टीप्लेक्स में फिल्म अध्येता, पत्रकार, शोधार्थी और छात्रों ने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्में देखीं। खास बात थी कि विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्मों के साथ उन फिल्मों को भी शामिल किया गया था, जिनके वे निर्माता थे।

विधु खुद को भिन्न किस्म का निर्माता मानते हैं। वे सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्में नहीं बनाते, इसलिए अपने बैनर की सभी फिल्मों में उनका क्रिएटिव योगदान रहता है। उनके बैनर की फिल्मों परिणीता, लगे रहो मुन्नाभाई, मुन्नाभाई एमबीबीएस और 3 इडियट्स को सजाने-संवारने और रिलीज करने तक में उनकी बड़ी भूमिका रही है।

इस आयोजन का एक उल्लेखनीय पक्ष भी रहा। मुंबई में आयोजित होने की वजह से विधु विनोद चोपड़ा प्रदर्शित फिल्मों से संबंधित तकनीशियनों और कलाकारों को संस्मरण और विमर्श के लिए बुला सके। सभी प्रदर्शित फिल्मों पर एक से डेढ़ घंटे तक उन्होंने थिएटर में मौजूद दर्शकों से बातें कीं और उनके सवालों के जवाब दिए। खासकर फिल्म और मीडिया स्कूल के छात्रों को इस इंटरैक्शन से बहुत फायदा हुआ। उन्होंने फिल्म निर्माण के अनुभव कलाकारों और तकनीशियनों से साक्षात सुने। अपनी तमाम जिज्ञासाएं रखीं और उन्हें उद्वेलित किया।

विधु विनोद चोपड़ा के पुनरावलोकन से सबक लेकर अगर तमाम हमारे फिल्मकार इस तरह के आयोजन देश के दूसरे शहरों में भी करें, तो दर्शकों को इससे सीधा लाभ होगा। खासकर मीडिया स्कूल के छात्र फिल्मों के बारे में ठोस, विशद और गहरी जानकारी हासिल कर सकेंगे। अभी तकपुनरावलोकन के आयोजन फिल्म समारोहों के साथ जुड़े रहे हैं। आम दर्शक और फिल्म से जुड़े छात्र ऐसे समारोहों में प्रवेश ही नहीं कर पाते और फिर महोत्सवों में आयोजकों का ध्यान पुनरावलोकन पर केंद्रित भी नहीं रहता। उन्हें ढेर सारे इवेंट के बीच पुनरावलोकन भी निबटाना होता है।

दूसरी ओर देखें तो दूसरे शहरों में कलाकारों और तकनीशियनों की शिरकत मुंबई जैसी नहीं हो सकती। फिल्म की चर्चा के लिए स्थानीय फिल्म विशेषज्ञों का सहारा लिया जा सकता है। फिल्मकार के साथ फिल्म से संबंधित किसी एक कलाकार और तकनीशियन को बुलाया जा सकता है। जरूरत है कि ऐसी पहल अवश्य हो। स्थानीय प्रशासन थिएटरों की मदद से व्यक्ति या विषय विशेष पुनरावलोकन का आयोजन कर सकते हैं। ऐसे आयोजनों से लोगों में फिल्मों का व्यावहारिकज्ञान बढ़ेगा।

दर्शक फिल्म देखने के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। वे सिर्फ मनोरंजन की चाहत के लिए फिल्म नहीं देखेंगे। इसी बहाने हम अपने फिल्मकारों, कलाकारों और तकनीशियनों के योगदान के रेखांकन के साथ उनका सार्वजनिक अभिनंदन भी कर सकेंगे। वक्त आ गया है कि दर्शकों और फिल्मों के बीच के रिश्ते का पारंपरिक समीकरण टूटे और नए मजबूत रिश्ते बनें। कई फिल्में अपनी रिलीज के समय छोटी महसूस होती हैं, लेकिन समय के साथ दर्शक उनका महत्व बढ़ा देते हैं। पुनरावलेकान इस प्रोसेस को समझने में मदद कर सकते हैं।