Search This Blog

Tuesday, July 30, 2019

सिनेमालोक : गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’


सिनेमालोक
गुरु-शिष्य संबधों पर दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’.
-अजय ब्रह्मात्मज

दुर्वा सहाय हिंदी की लेखिका हैं. उनकी कहानियां ‘हंस’ समेत तमाम पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है. ‘रफ्तार’ नाम से उनका एक कहानी संग्रह भी है. लेखन के साथ फिल्मों में भी उनकी रुचि रही है. 1993 में आई गौतम घोष की ‘पतंग’ की वह सहनिर्माता थीं. इसे उस साल सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. हाल-फिलहाल में उन्होंने कुछ शार्ट फिल्में बनाईं,जिन्हें लेकर वह कान फिल्म महोत्सव तक गयीं. इन फिल्मों के लिए उनकी प्रशंसा हुई. प्रशंसा और सराहना से उनकी हिम्मत बढ़ी और अब उन्होंने ‘आवर्तन’ नाम की फीचर फिल्म पूरी की है. उन्होंने स्वयं ही इसका लेखन और निर्देशन किया है.
गुरु-शिष्य परंपरा और संबंध के नाजुक पहलुओं को उकेरती यह फिल्म स्नेह, राग, द्वेष, ईर्ष्या और कलह के मनोभावों को अच्छी तरह से दर्शाती है. भावना सरस्वती कत्थक की मशहूर नृत्यांगना हैं. वह युवा प्रतिभाओं को नृत्य का प्रशिक्षण भी देती हैं. उनकी एक शिष्या निरंतर अभ्यास और लगन से दक्ष होती जाती है. उसके नृत्य प्रतिभा से प्रभावित होकर भावना सरस्वती उसके मंचप्रवेश की तैयारी करती हैं. एक तरह से वह अपने गुरु होने का दायित्व पूरा करती हैं और शिष्या को सुधि दर्शकों और समीक्षकों के बीच ले जाती हैं. समस्या मंच से ही आरंभ होती है. नृत्य में मगन शिष्य मंच के बीच में आ जाती है और लाइमलाइट ले लेती है. गुरु को बगल में परफॉर्म करना पड़ता है. अगले दिन एक रिपोर्टर उल्लेख करता है कि शिष्य ने गुरु के प्रभाव को कम किया.
गुरु ईर्ष्यावश शिष्य से द्वेष करने लगती हैं. वह शिष्य को किनारे करने लगती हैं. उसकी उपेक्षा करती हैं. उनका प्रेम और सद्भाव बदल जाता है. वह बोलती तो नहीं हैं, लेकिन उनके व्यवहार में तिरस्कार नजर आने लगता है. शिष्या अपनी गुरु के इस भाव और प्रतिक्रिया से अनजान है. उसे लगता है कि उससे ही कोई भूल हुई है. वह पूछती भी है, लेकिन गुरु सही जवाब देने की जगह तंज मारती हैं. शिष्यको एहसास हो जाता है, लेकिन वह विवश है. प्रेम और नृत्य के दोराहे पर खड़ी शिष्य दुविधा से जूझती है.
दुर्वा सहाय ने ‘आवर्तन’ में गुरु-शिष्य के बीच में पल रही ईर्ष्या और उससे उपजे द्वेष को बारीकी से चित्रित किया है. उन्हें शोवना नारायण जैसीसमर्थ नृत्यांगना मिली हैं. ‘आवर्तन’ में भावना सरस्वती की भूमिका शोभना नारायण ने निभाई है. वह ख्यातिलब्ध कत्थक नृत्यांगना हैं. इस फिल्म में भावना के किरदार को निभाते हुए शोभना जाहिर करती हैं कि वह कुशल अभिनेत्री भी हैं. उनके अभिनय की स्वभाविकता प्रभावित करती है. पर्दे पर अभ्यास, नृत्य और परफॉर्मेंस के दृश्यों में अपने नृत्य कौशल की वजह से वह अद्भुत रूप से बाँध लेती हैं. फिल्म के भावुक,द्वंद्व और भिन्न मनोभावों के दृश्यों में भी वह भावपूर्ण लगती हैं. यह दुर्वा सहाय की पारखी नजर है कि उन्होंने नृत्यांगना भावना के किरदार के लिए कत्थक प्रवीण शोभना नारायण को चुना.
‘आवर्तन’ छोटे पैमाने पर बनाई गई खूबसूरत फिल्म है. इसमें प्रचलित हिंदी फिल्मों का ताम-झाम नहीं है. दुर्वा सहाय शिल्प और तकनीकी कलाकारी पर जोर नहीं दिया है. उन्होंने सिंपल तरीके से गुरु-शिष्य के चक्र(आवर्तन) की कहानी कही है. हिंदी फिल्मों में ऐसे विषयों पर कम फिल्में बनी हैं. कुछ सालों पहले तनुजा चंद्रा के निर्देशन में ‘सुर’ आई थी, जिसमें गायन के क्षेत्र में गुरु-शिष्या के बीच की कलह और ईर्ष्या का चित्रण किया गया था. लकी अली और गौरी कर्णिक अभीनीत ‘सुर’ के बाद दुर्वा सहाय की ‘आवर्तन’ आएगी. ‘आवर्तन’ नृत्य जगत की पृष्ठभूमि की गुरु-शिष्या की फिल्म है.
दुर्वा सहाय ने फिल्म के लिए जरूरी कुछ नृत्य परफॉर्मेंस रखे हैं. इनका फिल्मांकन रेअलिस्ट तरीके से लाइव कथन और वादन के साथ हुआ है. शोभना नारायण को कत्थक के भावमुद्राओं में देखना अद्भुत अनुभव है. उनकी शिष्या की भूमिका मृणालिनी ने निभाई है. फिल्म की मांग के मुताबिक मृणालिनी ने शोभना नारायण का बराबर साथ दिया है. परफॉर्मेंस में वह आभास देती है कि कौशल में वह अपने गुरु के समकक्ष पहुंच रही है. यही फिल्म की जरूरत थी. अभ्यास के दृश्यों में दुर्वासा सहाय ने शोभना नारायण की शिष्याओं को लेकर नृत्य के सभी दृश्यों को समान रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है.
दुर्गा सहाय ने गुरु-शिष्या संबंध की फिल्म ‘आवर्तन’ में यह बताने और दिखाने की कोशिश की है कि श्रेष्ठ प्रतिभाएं भी कमजोर पड़ने पर मानवीय दुर्बलताओं में फिसलती हैं. और किसी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करती हैं. फिर उन्हें जब अपनी भूल और दायित्व का एहसास होता है तो वह उदात्त व्यवहार से दिल जीत लेती हैं.


Tuesday, July 23, 2019

सिनेमालोक : इलाकाई सिनेमा और ‘धुमकुड़िया’


सिनेमालोक
इलाकाई सिनेमा और ‘धुमकुड़िया’
-अजय ब्रह्मात्त्मज
पिछले दिनों रांची में निर्माता सुमित अग्रवाल और निर्देशक नंदलाल नायक की फिल्म ‘धुमकुड़िया’ देखने का अवसर मिला. झारखंड के नागपुरिया भाषा में बनी यह फिल्म वहीं के स्थानीय समस्या मानव तस्करी (खासकर लड़कियां) पर केंद्रित है. बताते हैं कि पिछले 10 सालों में 38000 लड़कियों की तस्करी हो चुकी है. उन्हें रोजगार दिलाने के लालच में ले जाया जाता है. घरेलू काम करवाने के अलावा खुलेआम उनका यौन शोषण भी होता है. मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. इनमें से बहुत कम लड़कियां ही अपने गांव लौट पाती हैं. अधिकांश इस देश की अनगिनत आबादी में खो जाती हैं या मर-खप जाती हैं. निर्देशक नंदलाल नायक ने सच्ची घटनाओं पर आधारित एक कहानी बुनी है और उसे फिल्म का रूप दिया है. गौरतलब है कि नंदलाल नायक स्वयं इसी कम्युनिटी के सदस्य हैं और तस्करी की शिकार लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम कर रहे हैं. उन लोगों की कोशिश है कि मानव तस्करी पर ही रोक लगाई जाए.
नंदलाल नायक ने मुंबई के कुछ प्रसिद्ध कलाकारों के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को शामिल कर फिल्म यूनिट तैयार की. फिल्म में रिशु को हॉकी खेलने का शौक है. उसके पिता भी हॉकी खिलाड़ी रहे थे. अपने इसी शौक के वशीभूत वह अपने जीजा के साथ गांव से निकलती है. उसका सपना है हॉकी खिलाड़ी बनना. सीधे स्वभाव का जीजा का संपर्क बुधुआ से होता है, जो उसे हॉकी खिलाड़ी के प्रशिक्षण के बहाने दिल्ली भेज देता है. दिल्ली पहुंचने पर रिशु को घरेलू नौकरानी का काम करना पड़ता है. परिवार के मर्द की नजर उस पर है. वह उसके साथ लगातार बलात्कार करता है, जिससे रिशु गर्भवती हो जाती है, एक दिन उसे दिल्ली का घर छोड़ना पड़ता है, वहां से झारखंड लौटने में उसे आगे भी शोषण का शिकार होना पड़ता है,
नंदलाल नायक ने रिशु के जरिए झारखंड से गायब होती लड़कियों की दर्द भरी दास्तान दिखाई है, उनकी तस्करी में परिवार के सदस्यों से लेकर उनके समुदाय के लोग भी शामिल रहते हैं, कुछ के लिए यह धंधा है तो कुछ के लिए अनजान मजबूरी... इसी फिल्म में जीजा और बुधुआ को देख सकते हैं. बुधुँआ को अपने समुदाय के हित की चिंता भी है, लेकिन वह पूरे कुचक्र का एक छोटा हिस्सा बन चूका है. नंदलाल नायक ने झारखंड के वास्तविक और मनोहारी लोकेशन पर फिल्म की शूटिंग की है. फिल्म के गीतों में स्थानीय धुनों और भाव का सुंदर इस्तेमाल किया गया है.
इलाकाई फिल्मों में ‘‘धुमकुड़िया’ जैसे प्रयासों की सराहना होनी चाहिए. उन्हें दर्शकों का समर्थन भी मिले, लेकिन उसके लिए ऐसी फिल्मों का थिएटर में आना जरूरी है. यहीं समस्या बड़ी हो जाती है. झारखंड समेत उत्तर भारत के सभी राज्यों में हिंदी फिल्मों का प्रचार और प्रभाव बहुत ज्यादा है. वितरकों और प्रदर्शको का तंत्र लाभ के लिए इन फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन में अधिक रूचि नहीं लेता. वे ऐसी फिल्मों को प्रश्रय नहीं देते. अगर ‘धुमकुडिया’ रिलीज भी हो जाती है तो उसका मुकाबला उसी हफ्ते रिलीज हुई हिंदी और हॉलीवुड की फिल्मों से होगा. ऐसी स्थिति में दर्शकों के अनुकूल शोटाइम का मिल पाना मुमकिन नहीं है. अगर प्रदेशों की सरकारें महाराष्ट्र की तरह राज्य की भाषाओं के समर्थन में खड़ी हों और उन्हें प्राइम टाइम में शो देना सुनिश्चित करवाएं, तभी ऐसी फिल्मों को थिएटर और दर्शक मिल पाएंगे.
हिंदी प्रदेशों में इलाकाई और भाषा की फिल्मों का निर्माण की सक्रियता नहीं दिखाई दे रही है. सच्चाई यह है कि इलाकाई फिल्मों की सक्रियता से ही स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को सिनेमाई अभिव्यक्ति मिलेगी. विविधता से पूर्ण देश में भाषा और संस्कृति के विकास में सिनेमा का बड़ा योगदान हो सकता है. सरकारें इनका महत्व समझ कर पहल और हस्तक्षेप करें तो निश्चित ही इलाकाई फिल्मों के निर्माण में तेजी आएगी. हालांकि झारखंड में एक फिल्म नीति बनी है, जिसके तहत आर्थिक सहयोग का प्रावधान है. रोचक तथ्य है कि प्रावधान का लाभ स्थानीय प्रतिभाएं कम ले पाती हैं. इसका लाभ भी महेश भट्ट और अनुपम खेर जैसे फिल्मकार और कलाकार हथिया लेते हैं.
धूम कुरिया के साथ नंदलाल नायक ने दमदार दस्तक दी है अब इसे सरकार और दर्शक दर्शकों का सहयोग मिले तो बात आगे बढ़े हां नंदलाल नायक इस मुंह में से बचना होगा कि वह इसे अखिल भारतीय स्तर पर रिलीज कर या फेस्टिवल में दिखाकर कारोबारी प्रतिष्ठा अर्जित कर लेंगे उन्हें अपने समुदाय के बीच इस फिल्म को लेकर जाना चाहिए तभी इलाकाई सिनेमा को सार्थकता मिलेगीज़


Tuesday, July 16, 2019

सिनेमालोक : कंगना से ताज़ा टकराव के बाद


सिनेमालोक
कंगना से ताज़ा टकराव के बाद
पिछले दिनों कंगना रनोट की एक फिल्म के सोंग लॉन्च के इवेंट में एक पत्रकार से उनकी तू तू मैं मैं हो गई. बात उलाहने से शुरू हुई और फिर फिसलती गई. लगभग 8 मिनट की इस बाताबाती में कंगना रनोट का अहम और अहंकार उभर कर आया. पत्रकार लगातार उनकी बातों से इंकार करता रहा. बाद में कंगना रनोट के समर्थकों और उनकी बहन रंगोली चंदेल ने उक्त पत्रकार के पुराने ट्वीट के स्क्रीनशॉट दिख कर यह साबित करने की कोशिश की कि वह लगातार उनके खिलाफ लिखता रहा है. उनकी गतिविधियों का मखौल उड़ाता रहा है. हालाँकि इस आरोपण में दम नहीं है.
फिलहाल फिल्म पत्रकारिता का जो स्वरूप उभरकर आया है, उसमें फिल्म बिरादरी के सदस्यों से सार्थक और स्वस्थ बातचीत नहीं हो पाती, पत्रकारों की संख्या बढ़ गई है, इसलिए फिल्म स्टार के इंटरव्यू और बातचीत का अंदाज और तरीका भी बदल गया है. पहले बमुश्किल एक दर्जन फिल्म पत्रकार होते थे. उनसे फिल्म कलाकार की अकेली और फुर्सत की बातचीत होती थी. लिखने के लिए कुछ पत्र पत्रिकाएं थीं. उनमें ज्यादातर इंटरव्यू, फिल्म की जानकारी और कुछ पन्नों में गॉसिप छपा करते थे, पत्रिकाओं से अखबारों में आने और फिल्म के रंगीन होने के बाद फिल्म पत्रकारिता में तेजी से परिवर्तन आया, उधर फिल्म इंडस्ट्री में पीआर (प्रचारक) का जोर बढ़ा. इन सभी के साथ मीडिया का विस्तार होता रहा. कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के आ जाने के बाद तो संयम और सदाचार के सारे बांध टूट गए. टाइमलाइन की रिपोर्टिंग और कवरेज ने गंभीरता समाप्त कर दी. यह दोनों तरफ से हुआ. इसके लिए पत्रकार और कलाकार दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं.
कुछ मीडिया संस्थानों से जुड़े फिल्म पत्रकारों की ही क़द्र रह गई है. बाकी को पीआर और फिर इंडस्ट्री भीड़ से अधिक नहीं समझते. इसकी बड़ी वजह मीडिया की भेड़चाल ही है. मीडिया की बेताबी और जरूरतों को देखते हुए फिल्म कलाकारों के पीआर ने अंकुश लगाने के साथ शर्तें लड़नी शुरू कर दी हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि पिछले दिनों एक लोकप्रिय स्टार का इंटरव्यू का वॉइस मेल सभी पत्रकारों को भेज दिया गया. बताया गया स्टार को फुर्सत नहीं है. पीआर ने तो अपनी सुविधा देखी. ताज्जुब तब हुआ जब ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं में उसी वॉइस मेल की बातचीत छपी हुई पढ़ने-सुनने को मिली.
कंगना रनोट अपने वीडियो मैं बोलते समय असंयमित हो गई और उन्होंने पत्रकारों के बारे में कुछ उटपटांग बातें भी कीं. उन्होंने एक तरफ से सभी को समेट लिया. जिन्हें ‘मणिकर्णिका’ पसंद नहीं आई,उन्हें ‘देशद्रोही’ तक कह डाला. यह कैसा बचकानापन है. दरअसल, गुस्से में कई बार हम व्यक्ति के साथ उसके परिवार, समूह, समुदाय और समाज को भी समेट लेते हैं, करना रनोट भूल गईं कि इसी मीडिया में से अधिकांश ने हमेशा उनकी हिम्मत की दाद दी, उनकी प्रतिभा का बखान किया, दिग्गजों से भिड़ने के समय उनके साथ रहे. वह अपने उलाहने में उन्हें अलग नहीं कर सकीं. नतीजतन मीडिया के सक्रिय सदस्य दुखी और नाराज हुए.
फिलहाल गतिरोध बना हुआ है, लेकिन कंगना रनोट अपनी आगामी फिल्म के प्रचार में जुटी हुई हैं. आनन-फानन में बने संगठन द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद कंगना से मीडिया की बातचीत हो रही है. आज के संदर्भ में किसी फ़िल्म पत्रकार के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह अपने समूह के आवाहन पर संस्थान के निर्देशों का उल्लंघन कर सके. पेशेवर पत्रकार के तौर पर यह मुमकिन भी नहीं है.
यह मौका है कि हम सभी फिल्म पत्रकारिता के स्वरूप और ढंग पर विचार करें. आज की जरूरतों और मांग के अनुसार उस में फेरबदल करें. कलाकारों से हो रही बातचीत को केवल क्विज और रैपिड फायर के नाम पर लतीफा और छींटाकशी का मंच न बनाएं. चंद् पत्रकार ही कलाकारों से बातें करते समय फिल्मों पर खुद को केंद्रित करते हैं. ज्यादातर बातचीत में कलाकारों की प्रतिक्रिया और सफाई रहती है. वे खुलासा कर रहे होते हैं. कलाकारों से ढंग की बातचीत नहीं हो पाने का सबसे बड़ा कारण बगैर फिल्म देखे किसी फिल्म पर बातचीत करना है. कलाकार कुछ बताना नहीं चाहते और पत्रकारों के पास भेदी सवाल नहीं होते. विदेशों की तरह फिल्म दिखा कर बातचीत की जाए तो उससे फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया संस्थान और दर्शक सभी का भला होगा.


Tuesday, July 9, 2019

सिनेमालोक : अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार


 सिनेमालोक
अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार
-अजय ब्रह्मात्मज
वेब सीरीज धड़ल्ले से बन रही हैं. लगभग सारे कलाकार, तकनीशियन और बैनर किसी ने किसी वेब सीरीज के निर्माण से जुड़े हैं, फिल्म और टीवी के बाद आया वेब सीरीज का यह क्रिएटिव उफान सभी के लिए अवसर और लाभ जुटा रहा है. वेब सीरीज के प्रसारण के लिए विशेष प्लेटफॉर्म बन गए हैं. देश-विदेश के अनेक उद्यमी इस दिशा में सक्रिय हैं. सभी को अनेक संभावनाएं दिख रही है. खासकर वेब सीरीज पर सेंसर का अंकुश नहीं होने की वजह से लेखक, निर्देशक और कलाकार अभिव्यक्ति की नई उड़ानें भर रहे हैं, कुछ के लिए यह उनकी कल्पना का असीमित विस्तार है तो कुछ क्रिएटिव व्यभिचार में मशगूल हो गए हैं.
वेब सीरीज में गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स की भरमार चिंता का विषय है, समाज के नैतिक पहरुए तो लंबे समय से शोर मचा रहे हैं कि वेब सीरीज के कंटेंट की निगरानी हो. वे आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों पर कैंची चलाना चाहते हैं. दूसरा तबका सेंसरशिप के सख्त खिलाफ है. फिल्म और टीवी की सेंसरशिप से उकताया यह तबका थोड़ी राहत महसूस कर रहा है. पिछले दिनों निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने एक बातचीत में साफ शब्दों में कहा था कि पहली बार हमें क्रिएटिव आजादी मिली है. हम दर्शकों को बेहतरीन कंटेंट दे पा रहे हैं. फिल्म और टीवी माध्यम पर सेंसरशिप का अंकुश न होने की वजह से विषय, कथ्य और दृश्यों के वर्जित क्षेत्र खुल गए हैं’ लेखकों और निवेशकों को बड़ा मौका मिला है.
यह बड़ा मौका किसी बाढ़ की तरह गंदगी भी लेकर आ चुका है. खासकर वेब सीरीज की भाषा(गाली-गलौज) और सेक्स चित्रण में कुछ लेखक-निर्देशक मिली छूट और स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं. वे उत्तेजना और आकर्षण के लिए फूहड़ और अश्लील हो जाने की गलतियां कर रहे हैं. इस तरह वे पाबंदी और सेंसरशिप के समर्थकों को अवसर दे रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने ऐसी आपत्तियों और जनहित याचिकाओं को फिलहाल ठुकरा दिया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही वेब सीरीज की ढीली लगाम खींच ली जाएगी. ऐसा हुआ तो वेब सीरीज के विस्तार और संभावनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.
वेब सीरीज पर पाबंदी और सेंसरशिप के पक्ष-विपक्ष की बहसों से अलग भी इस मुद्दे से संबंधित समस्याएं हैं. पिछले दिनों एक अभिनेता ने इसका खुलासा किया. अभिनय का प्रशिक्षण लेकर फिल्मों में आए इस अभिनेता की पिछले कुछ सालों में अपनी पहचान मिली है. सार्वजनिक स्थानों पर उनके दर्शक-प्रशंसक उनके साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए बेताब रहते हैं. प्रशंसकों से घिरे अभिनेता ने फुर्सत मिलते ही अपनी दुविधा और उससे जुड़ा द्वंद्व शेयर किया. उन्हें इन दिनों काफी काम मिल रहा है और काम का बड़ा हिस्सा वेब सीरीज है.
अभिनेता ने बताया कि इन दिनों वेब सीरीज की भाषा से हमें दिक्कत होती है. कई दृश्यों में गाली-गलौज की जरूरत नहीं होती है. अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए संवादों में हम ममूली शब्दों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन उसे नाटकीय  और कथित रूप से प्रभावपूर्ण बनाने के लिए जबरन गालियां ठूसी जा रही हैं. गालियों में अद्भुत प्रयोग हो रहे हैं. भाषा की अश्लीलता के साथ ही सेक्स दृश्यों की अधिकता भी हमें परेशान कर रही है. मुमकिन है कि स्त्री-पुरुष के अंतरंग और कामुक दृश्यों में दर्शकों को स्फुरण और आनंद आता हो, लेकिन हमारी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. पिछले दिनों एक निर्देशक ने बताया कि बेडरूम सीन के बाद हम आपके नितंब से कैमरा पुल करेंगे और आपको नंगे खड़े होकर तौलिया लपेटते हुए अपना संवाद बोलना है. जब मैंने आपत्ति की तो निर्माता का फोन आ गया. वह धमकी भरे अंदाज में अनुबंध का हवाला देने लगा. यह भी तर्क दिया गया कि हम इसे पूरे एस्थेटिक के साथ शूट करेंगे. आपको लाज या ग्लानि नहीं होगी. निर्देशक निर्माता की जिद देखने के बाद मुझे दूसरे इमोशनल और लॉजिकल तरीके से उन्हें समझाना पड़ा. फिर बात बनी और उन्होंने बॉक्सर पहनने की अनुमति दे दी. लेकिन एक अभिनेता कब तक ऐसे दबावों से बचेगा. मैं मना करूंगा तो कोई और तैयार हो जाएगा.  


Tuesday, July 2, 2019

सिनेमालोक : महज टूल नहीं होते कलाकार


 सिनेमालोक
महज टूल नहीं होते कलाकार
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दो हफ्तों में ‘कबीर सिंह’ और ‘आर्टिकल 15 रिलीज हुई हैं. दोनों में दर्शकों की रुचि है. वे देख रहे हैं. दोनों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण से बहसें चल रही हैं. बहसों का एक सिरा कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है. क्या फिल्मों और किरदारों(खासकर नायक की भूमिका) को चुनते समय कलाकार अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

‘आर्टिकल 15 के संदर्भ में आयुष्मान खुराना ने अपने इंटरव्यू में कहा कि कॉलेज के दिनों में वह नुक्कड़ नाटक किया करते थे. उन नाटकों में सामाजिक मुद्दों की बातें होती थीं. मुद्दों से पुराने साहचर्य के प्रभाव में ही उन्होंने अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15 चुनी. कहा यह भी जा रहा है कि अनुभव ने उन्हें पहले एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ऑफर की थी, लेकिन ‘मुल्क’ से प्रभावित आयुष्मान खुराना ने वैसे ही मुद्दों की फिल्म में रुचि दिखाई.अनुभव ने मौका नहीं छोड़ा और इस तरह ‘आर्टिकल 15 सामने आई. कह सकते हैं कि आयुष्मान खुराना ने अपनी लोकप्रियता का सदुपयोग किया. वह एक ऐसी फिल्म के साथ आए जो भारतीय समाज के कुछ विसंगतियों को रेखांकित करती हैं. उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति का लाभ फिल्म को मिला. उसे दर्शक मिले.

आमिर खान फिल्म को मनोरंजन का माध्यम समझते हैं. उनकी फिल्में इसी उद्देश्य से बनती और प्रदर्शित होती हैं. फिर भी हम देखते हैं कि उनकी ज्यादातर फिल्मों में संदेश और कुछ अच्छी बातें रहती हैं. अपने कैरियर के आरंभ में आमिर खान ने भी दूसरे अभिनेताओं की तरह हर प्रकार की फिल्में कीं. उनमें कुछ ऊलजलूल भी रहीं, लेकिन ‘सरफरोश’ के बाद उनका चुनाव बदल गया है. उनकी स्लेट सार्थक फिल्मों से भरी है. उन्होंने एक बातचीत में मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं अपनी लोकप्रियता का उपयोग ऐसी फिल्मों में करना चाहता हूं, जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सुकून और शिक्षा भी दें. हमारे होने की वजह से उन फिल्मों में दर्शकों की जिज्ञासा रहती है. वे फ़िल्में देखने आते हैं.

फिल्म कलाकारों में बड़ी जमात ऐसे अभिनेता/अभिनेत्री की है, जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है. वे और उनके प्रशंसक समर्थक मानते हैं कि कलाकार दो कलाकार होता है. उसे जो भी किरदार दिया जाता है, वह उसे निभाता है. एक स्तर पर यह तर्क सही है, लेकिन फिल्मों के प्रभाव को देखते हुए किसी भी अभिनेता/अभिनेत्री को यह तो देखना ही चाहिए कि उसकी फिल्म अंतिम प्रभाव में क्या कहती है? फिल्म में उनका किरदार पॉजीटिव या नेगेटिव हो सकता है, लेकिन इन किरदारों को निर्देशक कैसे ट्रीट करता है और फिल्म का क्या निष्कर्ष है? अगर इन बातों पर ध्यान ना दिया जाए तो फिजूल फिल्मों की झड़ी लग जाएगी. घटिया, अश्लील और फूहड़ फिल्मों की संख्या बढ़ती चली जाएगी. फ़िल्में  मनोरंजन और मुनाफा हैं, लेकिन इन उद्देश्यों के लिए उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता.

‘कबीर सिंह’ सिंह के संदर्भ में शाहिद कपूर के प्रशंसक और समर्थक के साथ कुछ समीक्षक और विश्लेषक भी कहते नजर आ रहे हैं कि हमें शाहिद कपूर की मेहनत और प्रतिभा का कायल होना चाहिए. उनकी तारीफ करनी चाहिए. उन्होंने एक नेगेटिव किरदार को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया. और फिर उन्होंने निर्देशक की मांग को पूरा किया. एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी है कि वह अपने किरदार को सही तरीके से निभा ले जाए, लेकिन यह सोचना जरूरी है कि क्या कलाकार कोई मशीन है? वह मनुष्य है और उसकी अपनी सोच-समझ होनी चाहिए. कलाकार केवल टूल नहीं है कि चाभी देने या ऑन करने मात्र से चालू हो जाए. अपनी समझदारी से वह तय करता है कि कैरियर के लाभ के लिए उसे कौन सी फिल्म चुननी है? खासकर नायक हैं तो इतनी संवेदना तो होनी चाहिए कि  किरदार और फिल्म के प्रभाव को समझ सके.

भारतीय समाज में फिल्म कलाकारों की भूमिका बढ़ गई है, अब वे फिल्मों के अलावा सोशल इवेंट और प्रोडक्ट एंडोर्समेंट भी करते हैं. ज्यादातर कलाकारों को देखा गया है कि वे इवेंट और प्रोडक्ट चुनते समय यह खयाल रखते हैं कि उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? किसी इवेंट में जाना या किसी प्रोडक्ट को एंडोर्स करना उनके लिए कितना उचित होगा? इसी आधार पर उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझ व्यक्त होती है. मामला सिर्फ फिल्मों के चुनाव का ही नहीं है. पूरी जीवन शैली और उन सभी फैसलों का भी है, जिनका असर सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है. कोई भी कलाकार सिर्फ यह कहने से नहीं छूट या बच सकता कि हमें निर्देशक जो भी कहते हैं, हम कर देते हैं.