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Friday, May 25, 2018

फिल्‍म समीक्षा : परमाणु


फिल्‍म समीक्षा
फ़िल्मी राष्‍ट्रवाद का नवाचार
परमाणु
-अजंय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में राष्‍ट्रवाद का नवाचार चल रहा है। इन दिनों ऐसी फिल्‍मों में किसी घटना,ऐतिहासिक व्‍यक्ति,खिलाड़ी या प्रसंग पर फिल्‍में बनती है। तिरंगा झंडा,वतन या देश शब्‍द पिरोए गाने,राष्‍ट्र गर्व के कुछ संवाद और भाजपाई नेता के पुराने फुटेज दिखा कर नवाचार पूरा किया जाता है। अभिषेक शर्मा की नई फिल्‍म ‘परमाणु’ यह विधान विपन्‍नता में पूरी करती है। कल्‍पना और निर्माण की विपन्‍नता साफ झलकती है। राष्‍ट्र गौरव की इस घटना को कॉमिक बुक की तरह प्रस्‍तुत किया गया है। फिल्‍म देखते समय लेखक और निर्देशक के बचकानेपन पर हंसी आती है। कहीं फिल्‍म यूनिट यह नहीं समझ रही हो कि दर्शकों की ‘लाफ्टर’ उनकी सोच को एंडोर्स कर रही है। राष्‍ट्रवाद की ऐसी फिल्‍मों की गहरी आलोचना करने पर राष्‍ट्रद्रोही हो जाने का खतरा है।
हो सकता है कि यह फिल्‍म वर्तमान सरकार और भगवा भक्‍तों को बेहद पसंद आए। इसे करमुक्‍त करने और हर स्‍कूल में दिखाए जाने के निर्देश जारी किए जाएं। इे राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया जाए और फिर जॉन अब्राहम को श्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार सूचना एवं प्रसारण मंत्री के हाथें दे दिया जाए। इन सारी संभावनाओं के बावजूद ‘परमाणु’ महत्‍वपूर्ण विषय पर बनी कमजोर फिल्‍म है। इस विषय का वितान कुछ किरदारों और घरेलू शक-ओ-शुबहा में समेट कर लेखक-निर्देशक गंभीर विषय के प्रति अपनी अपरिपक्‍वता जाहिर की है। आवश्‍यक तैयारी और निर्माण के संसाधनों की कमी प्रोडक्‍शन में नजर आती है। न्‍यूक्लियर टेस्‍ट के लिए बना लैब किसी टेलीफोन एक्‍सचेंज की तरह लगता है। ‘चेज’ का सीक्‍वेंस किसी पाकेटमार को पकड़ने के लिए गली के मुहाने पर रगेदते पड़ोसी की याद दिलाता है। सीआईए और आईएसआई के एजेंट कार्टून चरित्रों सरीखे ही हरकतें करते हैं। उनके लिए भारतीय सीमा में मुखबिरी करना कितना आसान है? दर्शक जान चुके हैं,फिर भी वह फिल्‍म के हीरो को बताता है कि मैं ‘वेटर’ नहीं हूं। मियां-बीवी के झगड़े का लॉजिक नहीं है। और 1998 में ‘महाभारत’ का प्रसारण...शायद रिपीट टेलीकास्‍ट रहा होगा।
लेखक-निर्देषक ने सच्‍ची घटनाओं के साथ काल्‍पनिक किरदारों को जोड़ा है। बाजपेयी,नवाज शरीफ और क्लिंटन वास्‍तविक हैं। उनके पुराने फटेज से फिल्‍म को विश्‍वसनीयता दी गई है। यह अलग बात है कि स्क्रिप्‍ट में उनके फुटेज गूंथने में सफाई नहीं रही है। यों जॉन अब्राहम ने पहले ही बता दिया है कि ‘इस फिल्‍म में दिखाई गई वास्‍तविक फुटेज का लक्ष्‍य सिर्फ कहानी को अभिलाषित प्रभाव देना  है’।
प्रधान मंत्री बाजपेयी के सचिव(ब्रजेश मिश्रा) की भूमिका में बोमन ईरानी प्रभावित नहीं करते। फिल्‍म के नायक जॉन अब्राहम के सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनकी अभिनय क्षमता का खयाल नहीं रखा गया है। सिर्फ बुजुर्ग किरदार को निभा रहे अभिनेता ही याद रह जाते हैं। डायना पेटी जैसी बेढब सैन्‍य अधिकारी टीम की कमजोर कड़ी हैं। उनकी बीवी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री को कुछ नाटकीय दृश्‍य मिले हैं,जिनमें वह निराश नहीं करतीं। रहे जॉन अब्राहम तो उन्‍होंने अपनी सीमाओं में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। भावभिव्‍यक्ति के संकट से वे निकल नहीं सके हैं।
इन कमियों के बावजूद जॉन अब्राहम और अभिषक शर्मा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्‍होंने घिसी-पिटी कहानी के दायरे से निकल कर कुछ अलग करने की कोशिश की है। उनके पास पर्याप्‍त साधन-संसाधन होते और स्क्रिप्‍ट पर थोड़ी और मेहनत की गई होती तो यह उल्‍ल्‍ेखनीय फिल्‍म बन जाती। उनका ध्‍येय प्रश्‍ंसनीय है।
अवधि – 129 मिनट
** दो स्‍टार  ाष्‍ट्र िक व्‍यक्तित्‍व क्त्त्व

Friday, November 18, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फोर्स 2

चुस्‍त और फास्‍ट
फोर्स 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिनय देव की फोर्स 2 की कहानी पिछली फिल्‍म से बिल्‍कुल अलग दिशा में आगे बढ़ती है। पिछली फिल्‍म में पुलिस अधिकारी यशवर्द्धन की बीवी का देहांत हो गया था। फिल्‍म का अंत जहां हुआ था,उससे लगा था कि अगर भविष्‍य में सीक्‍वल आया तो फिर से मुंबई और पुलिस महकमे की कहानी होगी। हालांकि यशवर्द्धन अभी तक पुलिस महकमे में ही है,लेकिन अपने दोस्‍त हरीश की हत्‍या का सुराग मिलने के बाद वह देश के रॉ डिपाटमेंट के लिए काम करना चाहता है। चूंकि वह सुराग लेकर आया है और उसका इरादा दुष्‍चक्र की जड़ तक पहुंचना है,इसलिए उसे अनुमति मिल जाती है।
रॉ की अधिकारी केके(सोनाक्षी सिन्‍हा) के नेतृत्‍व में सुराग के मुताबिक वह बुदापेस्‍ट के लिए रवाना होता है। फिल्‍म की कहानी चीन के शांगहाए शहर से शुरू होती है। फिर क्‍वांगचओ शहर भी दिखता है। पेइचिंग का जिक्र आता है। हाल-फिलहाल में किसी फिल्‍म में पहली बार इतने विस्‍तार से चीन का रेफरेंस आया है। बदलाव के लिए चीन की झलकी अच्‍छी लगती है। फिल्‍म में बताया जाता है कि चीन में भारत के 20 रॉ ऑफिसर काम में लगे हुए हैं। उनमें से तीन की हत्‍या हो चुकी है। तीसरी हत्‍या हरीश की होती है,जो संयोग से हषवर्द्धन का दोस्‍त है। यहां से फोर्स 2 की कहानी आरंभ होती है।
यशवर्द्धन और केके सुराग के मुताबिक इंफार्मर की तलाश में बुदापेस्‍ट पहुंचते हैं। उन्‍हें पता चल चुका है कि भारतीय दूतावास का कोई भारतीय अधिकारी ही रॉ ऑफिसर के नाम चीनी एजेंटों को बता रहा है। रॉ डिपार्टमेंट और पुलिस डिपार्टमेंट में कौन चुस्‍त और स्‍मार्ट होने की चुहल यशवर्द्धन और केके के बीच होती है। हम देखते हैं कि सूझबूझ और पहल में यशवर्द्धन आगे है,लेकिन केके भी कम नहीं है। चुस्‍ती-फुर्ती में में वह यश के बराबर ही है। दोनों पहले एक-दूसरे से खिंचे रहते हैं। काम करने के दौरान उनकी दोस्‍ती बढ़ती है। वे एक-दूसरे का सम्‍मान करने लगते हैं। अच्‍छा है कि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच प्रेम नहीं कराया है। प्रेम नहीं हुआ तो उनके रोमांटिक गाने भी नहीं हैं। फिल्‍म बहुत ही सलीके से मुख्‍य कहानी पर टिकी रहती है। फिर भी एक बेतुका आयटम सौंग आ ही गया है। उसकी कोई जरूरत नहीं थी। हंगरी में हिंदी गाने गाती लड़की फिल्‍म में फिट नहीं बैठती।
लेखक-निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने फोर्स 2 को विषय से भटकने नहीं दिया है। फिल्‍म में गति है। पर्याप्‍त एक्‍शन है। जॉन अब्राहम एक्‍शन दृश्‍यों में यों भी अच्‍छे और विश्‍वसनीय लगते हैं। फिल्‍म में उनके किरदार को इस तरह गढ़ा गया है वे अपनी खूबियों के साथ फिल्‍म में दिखें। उनकी कमियों को उभरने का मौका नहीं मिला। एक-दो नाटकीय दृश्‍यों में जॉन अब्राहम संघर्ष करते दिखते हैं। उनके चेहरे पर नाटकीय भाव नहीं आ पाते। इस फिल्‍म में उन्‍होंने आम दर्शकों का लुभाने के लिए कुछ प्रसंगों में मुंबइया अंदाज पकड़ा है। उन्‍हें खेलने के लिए दो-तीन दृश्‍य भी मिले हैं। इन दृश्‍यों में वे भाएंगे। सोनाक्षी सिन्‍हा ने जॉन का गतिपूर्ण साथ निभाया है। वह भी रॉ अधिकारी की भूमिका में सक्षम दिखती हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में कूद-फांद और दौड़ लगाने में उनकी सांस नहीं फूली है। इस फिल्‍म में कहीं भी केके के किरदार को अबला नहीं दिखाया गया है। यह एक चेंज है।
फिल्‍म में खलनायक शिव शर्मा की भूमिका निभा रहे ताहिर राज भसीन उम्‍दा अभिनेता हैं। वे अपने किरदार को ओवर द ऑप नहीं ले जाते,फिर भी किरदार के खल स्‍वभाव को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करते हैं। हम ने उन्‍हें मर्दानी में देखा था। इस फिल्‍म में वे और भी सधे अंदाज में हैं। छोटी भूमिका में नरेन्‍द्र झा और आदिल हुसैन अपनी जिम्‍मेदारियां अच्‍छी तरह निभते हैं।
फोर्स 2 रॉ ऑफिसर की जिंदगी के अहम मुद्दे पर बनी फिल्‍म है। किसी भी देश के जासूस जब पकड़े जाते हैं तो उनकी सरकारें  उनकी पहचान से साफ इंकार कर देती हैं। मृत्‍यु के बाद उन्‍हें सम्‍मान तो दूर कई बार उनके परिवारों का अपमान और लांछनों के बीच जीना पड़ता है। इस फिल्‍म का कथित खलनायक ऐसे ही एक रॉ ऑफिसर का बेटा है। कैबिनेट सेक्रेटरी ने उसके पिता की पहचान से इंकार किया था। 23 सालों की उनकी सेवा कहीं रजिस्‍टर नहीं हो सकी थी। वही कैबिनेट सेक्रेटरी अब एचआरडी मिनिस्‍टर है। उसकी हत्‍या करने की मंशा से ही शिव शर्मा यह सब कर रहा है। कुछ वैसा ही दुख यशवर्द्धन का भी है। उसके दोस्‍त हरीश की भी यही गति होती है। फिल्‍म के अंत में यशवर्द्धन के प्रयास और मांग से सभी रॉ ऑफिसर को बाइज्‍जत याद किया जाता है। यह एक बड़ा मुद्दा है। इसमें किसी अधिकारी या व्‍यक्ति से अधिक सिस्‍टम का दोष है,जो अपने ही अधिकारियों और जासूसों को पहचानने से इंकार कर देता है।
भाषा की अशुद्धियां खटकती हैं। भारतीय टीवी एचआरडी मिनिस्‍टर का नाम गलत हिज्‍जे के साथ ब्रीजेश वर्मा लिखता है। हंगरी के अधिकारी सही नाम ब्रजेश वर्मा बोलते हैं। यही मिनिस्‍टर अपने भाषण में हंगेरियन-इंडो बोलते हैं,जबकि यह इंडो-हंगेरियन होना चाहिए था। चीनी शहरों और व्‍यक्तियों के नामों के उच्‍चारण और शब्‍दांकन में भी गलतियां हैं।
अवधि- 126 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, November 3, 2016

किरदारों के साथ जीना चाहता हूं -जॉन अब्राहम




-अजय ब्रह्मात्‍मज
जॉन अब्राहम की फोर्स 2 एसीपी यशवर्द्धन की कहानी है। यह फिल्‍म पिछली फोर्स से आगे बढ़ती है। एसीपी यशवर्द्धन की मुश्किलें बढ़ चुकी है। समय के साथ वे नई चुनौतियों के समक्ष हैं। इस फिल्‍म में एक्‍शन भी ज्‍यादा है।
फोर्स 2 के बारे में जॉन अब्राहम की बातें...
फिल्‍म में देशभक्ति की झलक
डेढ़ साल पहले जब हम ने फोर्स 2 के बारे में सोचा तो मैा कैप्‍टन कालिया की स्‍टोरी से काफी प्रेरित हुआ था। वे भारतीय जासूस थे। मैंने यही कहा कि ऐसी और भी कहानियां होंगी। तब यही विचार बना था कि ऐसी कहानियों से फोर्स 2 का विस्‍तार करें। इस बार वह देश को बचाने की कोशिश में लगा है। हमारी फिल्‍म सच्‍ची घटनाओं से प्रेरित है। पिछली फिल्‍म से ज्‍यादा बड़ी और विश्‍वसनीय फिल्‍म है।
अभी हाल में उरी अटैक में हमारे जवान शहीद हुए। अचानक फोर्स2 प्रासंगिक फिल्‍म बन गई है। कोई कल्‍पना ही नहीं कर सकता था कि ऐसा कुछ होगा। हम ने देशभक्ति की भावना के साथ यह फिल्‍म बनाई है। हम इधर-उधर की  बातें नहीं कर रहे हैं। देश की रक्षा में सेना और सरकार की भूमिका भी दिखेगी। पाकिस्‍तान और चीन से लगी सीमाओं पर चल रही गतिविधियों की झलक मिलेगी। हम ने जरूरी रिसर्च के बाद कहानी लिखी और उसे सच के करीब रखा।
मेरा किरदार
फिल्‍म में एसीपी यशवर्द्धन पुलिस ऑफिसर है। उसका रॉ एजेंट दोस्‍त हरीश की मौत हो जाती है। उसकी मौत के बाद यश मिशन पर जानाउ चाहता है तो रॉ ऑफिसर कहते हैं कि तुम इस मिशन के लिए प्रशिक्षित नहीं हो। इस पर यश का जवाब होता है कि जो प्रशिक्षित थे,वे क्‍या जिंदा हैं? फिर बात आगे बढ़ती है और यश कहता है कि वक्‍त और देश बदल गया है। अभी हम घुस कर मारते हैं। आप देखें तो अब यह हो रहा है। इस फिल्‍म में एक गाना भी है,जो ऐसा लग सकता है कि उरी अटैक के बाद लिख गया हो। फोर्स 2 में आज की सोच दिखेगी। दुश्‍मनों को करारा जवाब देने की बात की गई है।
अंधराष्‍ट्रवाद से दूर रहता हूं
हम ने सच्‍ची और विश्‍वसनीय बातें की हैं। अंधराष्‍ट्रवाद जैसी चीज फिल्‍म में नहीं है। मैं खुद ऐसी बातों से दूर रहता हूं1 हमें अपने देश के जवानों के बारे में सोचना होगा। हम फिल्‍म सितारों से ध्‍यान हटा कर देश के बारे में सभी सोचें। फोर्स 2 ईमानदार तरीके से आज की बात करती है। इस फिल्‍म में विलेन ज्‍यादा खतरनाक हो गया है। अब वह गहरी साजिशें रचने लगा है।
निर्देशक की है बड़ी भूमिका
मैं अपने निर्देशक अभिनय देव को सारा श्रेय दूंगा। उसने पिछली फिल्‍म का कैनवास बढ़ा दिया। अभिनय देव ने दृश्‍य और संवादों में एक्‍शन और कंटेंट को साथ रखा है। इस फिल्‍म के ट्रेलर से प्रभावित लोग सही कह रहे हैं कि इसमें हॉलीवुड के स्‍तर का एक्‍शन है। शूटिंग के दरम्‍यान बुदापेस्‍ट में हमारा काम देख कर स्‍थानीय लोग दंग थे। अभी ग्‍लोबल दौर में दर्शक हर देश और भाषा की फिल्‍में देख रहे हैं। उनकी अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। हमारी खूबी है कि हम कम लागत में ज्‍यादा इंपैक्‍ट क्रिएट करते हैं। बजट की परेशानी तो है। हॉलीवुड तकनीकी लिहाज से हम से आगे है। उनके पास बजट भी रहता है। फिर भी हम मुकाबला कर रहे हैं।
बदलाव जरूरी है
बदलते समय के साथ बदलना होगा। प्रोपोजल नहीं बना सकते।  बगैर कहानी के पांच गाने डाल कर या हीरो को नचवा कर दर्शकों को नहीं बांधा जा सकता। दर्शकों को कहानी चाहिए। अगर हम खराब फिल्‍में बनाएंगे और दर्शकों को निराश करेंगे तो हॉलीवुड टेकओवर कर लेगा। हमें सेंसिबल फिल्‍में बनाने की जरूरत है। हमें भारतीय कंटेंट और कहानी पर ध्‍यान रखना होगा।
...ऐसे किरदार निभाने हैं
कुछ किरदार मेरे साथ रह गए हैं। मैं उन्‍हें पर्दे पर बार-बार निभाना चाहूंगा। एसीवी यशवर्द्धन उनमें से एक है। मान्‍या सुर्वे तो मर गया। अगर वह जिंदा रहता तो उसे फिर से जीना चाहता। धूम के कबीर को कभी भी जी सकता हूं। यही इच्‍छा रहती है कि फिल्‍मों के मेरे किरदार यादगार रह जाएं। उन्‍हें दर्शक बार-बार देखें और वे मेरे भी साथ रहें। मैं अपने करिअर में लगातार अलग फिल्‍में करता रहूंगा। रॉकी हैाडसम देख कर अक्षय कुमार ने मुझे बधाई दी और कहा कि ऐसी फिल्‍में करते रहना। मैं किसी होड़ में नहीं हूं। साल में एक फिल्‍म आए या तीन आए...मैं उेसी कोई प्‍लानिंग कर नहीं चलता।

Thursday, March 31, 2016

फिल्‍म समीक्षा : रॉकी हैंडसम



एक्‍शन से भरपूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
निशिकांत कामत निर्देशित रॉकी हैंडसम 2010 में आई दक्षिण कोरिया की फिल्‍म द मैन फ्रॉम नोह्वेयर की हिंदी रीमेक है। निशिकांत कामत के लिए रितेश शाह ने इसका हिंदीकरण किया है। उन्‍होंने इसे गोवा की पृष्‍ठभूमि दी है। ड्रग्‍स,चाइल्‍ड ट्रैफिकिंग,आर्गन ट्रेड और अन्‍य अपराधों के लिए हिंदी फिल्‍म निर्देशकों को गोवा मु‍फीद लगता है। रॉकी हैंडसम में गोवा सिर्फ नाम भर का है। वहां के समुद्र और वादियों के दर्शन नहीं होते। पूरी भागदौड़ और चेज भी वहां की नहीं लगती। हां,किरदारों के कोंकण और गोवन नामों से लगता है कि कहानी गोवा की है। बाकी सारे कार्य व्‍यापार में गोवा नहीं दिखता।
बहरहाल, यह कहानी रॉकी की है। वह गोवा में एक पॉन शॉप चलाता है। उसके पड़ोस में नावोमी नाम की सात-आठ साल की बच्‍ची रहती है। उसे रॉकी के अतीत या वर्त्‍तमान की कोई जानकारी नहीं है। वह उसे अच्‍छा लग्ता है। वह रॉकी से घुल-मिल गई है। उसे हैंडसम बुलाती है। नावोमी की मां ड्रग एडिक्‍ट है। किस्‍सा कुछ यों आगे बढ़ता है कि ड्रग ट्रैफिक और आर्गन ट्रेड में शामिल अपराधी नावोमी का अपहरण कर लेते हें। दूसरों से अप्रभावित रहने वाला खामोश रॉकी हैंडसम रिएक्‍ट करता है। वह उस बच्‍ची की तलाश में निकलता है। इस तलाश में वह अपराधियों के अड्डों पर पहुंचता है। उनसे मुठभेड़ करता है। पुलिस को सुराग देता है। उसका आखिरी मुकाबला केविन परेरा से होता है। इस दरम्‍यान वह नृशंस तरीके से अपराधियों को कूटता और मारता है। उनकी जान लेने में उसे संकोच नहीं होता।
रॉकी हैंडसम एक्‍शन फिल्‍म है। एक्‍शन के लिए रॉकी और नावोमी के बीच के इमोशनल रिश्‍ते का सहारा लिया गया है। उस रिश्‍ते की प्रगाढ़ता को लेखक-निर्देशक हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित तरीके से नहीं दिखा पाए हैं। नतीजतन फिल्‍म में इमोशन की कमी लगती है। रॉकी हैंडसम देखते हुए लगता है कि जापानी और दक्षिण कोरियाई हिंसक और एक्‍शन फिल्‍मों का भारतीयकरण करते समय हमें भारतीय भाव-अनुभाव का पुट डालना चाहिए। सिर्फ एक्‍शन से दर्शक जुढ़ नहीं पाते। निशिकांत कामत ने हिंदी फिल्‍मों की एक्‍शन फिल्‍मों के ढांचे का इस्‍तेमाल नहीं किया है,लेकिन वे दक्षिण कोरियाई फिल्‍म की थीम को तरीके से भारतीय जमीन पर रोप भी नहीं पाए है।
हम जॉन अब्राहम की खूबियों और सीमाओं से परिचित हैं। निशिकांत कामत ने उनका बखूबी इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने जॉन का निम्‍नतम संवाद दिए हैं,लेकिन बाकी किरदार बोर करने की हद तक बड़बड़ करते हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में जॉन अब्राहम की गति और चपलता देखने लायक है। बाकी हिंदी फिल्‍मों के एक्‍शन हीरो की तरह वे दुश्‍मनों को मार कर भी खुश नजर नहीं आते। उनके लिए यह रेगुलर मशीनी काम है। नावोमी तक पहुंचने के लिए किसी भी प्रकार की हिंसा से उन्‍हें गुरेज नहीं है। फिल्‍म में केविन परेरा की भूमिका में फिल्‍म के निर्देशक निशिकांत कामत ही हैं। उन्‍के अभिनय और मैनरिज्‍म में  पिछली सदी के आठवें-नौवें दशक के खलनायकों की झलक है। उनकी शैली में एक साथ कुलभूषण खरबंदा,अमरीश पुरी और अजीत की झलक मिलती है। यों बाकी फिल्‍म की पटकथा और संरचना भी पुरानी फिल्‍मों जैसी है। नतीजतन,एक्‍शन का नयापन पुरानी फिल्‍मों के फार्मेट में उभर कर नहीं आ पाता।
फिर भी एक्‍शन,मारधाड़ और पर्दे पर खून-खराबे के शाकीन दर्शकों को यह फिल्‍म पसंद आएगी। हर फिल्‍म में लव और इमोशन की चाहत रखनेवाले दर्शक निराश हो सकते हैं। निशिकांत कामत ने एक नई काशिश जरूर की है और उन्‍हें जॉन अब्राहम का बराबर सहयोग मिला है।
अवधि- 126 मिनट
स्‍टार- ढाई स्‍टार

Tuesday, March 15, 2016

दिल से बनना चाहता हूं हैंडसम - जॉन अब्राहम


अजय ब्रह्मात्मज 


जॉन अब्राहम की एक अलग पहचान है। अपनी फिल्‍मों से धीरे-धीरे उन्‍होंने यह खाय पहचान हासिल ीि है। उनकी 'रॉकी हैंडसम' अगले हफ्ते रिलीज हो रही है। उसी मौके पर यह खास बातचीत हुई। 

-आपकी होम प्रोडक्शन फिल्मों का चुनाव अलग तरीके का रहता है। आप बाहरी बैनर की फिल्में अलग तरह की करते हैं। यह कैसे संभव हुआ

0 मैं बहुत क्लियर था। मैं जैसी फिल्में देखने की चाहत रखता था वह भारत में नहीं बनती थी। मैं निर्माता इस वजह से ही बना कि जैसी फिल्में देखने की तमन्ना रखता हूं उन्हें खुद बना सकूं। वही कोशिश की। मैंने अलहदा फिल्मों को तरजीह दी। मैंने कॅामर्स और कंटेंट का भी ध्यान रखा। कंटेंट का अर्थ सिफ फिल्म में संदेश देना नहीं है। मद्रास कैफे यूथ के लिए थी। राजनीति संबंधित थी। आज की युवा पीढ़ी राजीव गांधी से परिचित नहीं है। मैं चाहता था कि लोग उनके बारे में जाने। हालांकि विकी डोनर में संदेश था। बतौर निर्माता चाहूंगा कि मेरी फिल्मों को लोग सराहें। एक्टर होने के नाते मैंने काफी गलतियां की हैं। निर्माता के तौर पर मैं वह गलतियां नहीं करना चाहता हूं। एक्टर होने के नाते मॉस के लिए फिल्में कर रहा। जैसे वेलकम बैक। मुझे कॅामेडी अच्छी लगती है। मैं हेरा फेरी 3 भी कर रहा हूं। फोर्स 2 मेरी होम प्रोडक्शन फिल्म है। बतौर निर्माता मेरे लिए डायरेक्टर और स्क्रिप्ट अच्छी होनी चाहिए।

-नाम रॅाकी साथ में हैंडसम। यह आपकी पिछली फिल्मों से कितना भिन्न है?

0 मेरे मुताबिक रॅाकी हैंडसम इमोशन एक्शन फिल्म है। रॅाकी का वर्ष 2006 से पहले कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। यही इस फिल्म का दिलचस्प पार्ट है। इस फिल्म में एक्शन से ज्यादा इमोशन दिखेंगे। अगर एक्शन इमोशन से नहीं जुड़ा होगा तो एक्शन नहीं चलेगा। निशिकांत कामथ इसके महारथी हैं। उनकी फिल्‍मों का कैनवस बड1ा होता है। उनका मिजाज भी अलग है। वैसे निशिकांत और मैं एक दूसरे से कनेक्ट करते हैं। हम अच्छे दोस्त भी हैं। इसके भी कई कारण है। पहला, वह फिल्मी परिवार से नहीं हैं। शर्मीलें हैं। मेरा भी फिल्मी बैकग्राउंड  नहीं है। मैं भी शर्मीला हूं। हम दोनों बाहरी दुनिया में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते। फिल्म को लेकर हमारा पैशन एकसमान है। इस वजह से फोर्स हमने साथ में की। फोर्सके बाद मैं और निशिकांत एकसाथ काम करने को आतुर थे। हमने दूसरी फिल्म साथ में बनाने पर विचार किया। रॉकी हैंडसम की कहानी मुझे बेहद पसंद आई। हम साथ में जुड़ गए। हमने कुछ दर्शकों को एक्शन दिखाए।
लडक़ों की आंखों में आंसू थे वही लड़कियों को एक्शन पसंद आया। उनकी प्रतिक्रियाओं से मैं उत्साहित हुआ। उसी के अनुस्प अपनी फिल्म की मार्केटिंग स्ट्रेटजी बनाई। 

-;कहानी के बारे में थोड़ा जानकारी देंगे?

0 कहानी पैंतीस साल के आदमी और छह साल की बच्ची के ईदगिर्द बुनी है। बच्ची पड़ोसी है, लेकिन वह रॉकी से बहुत प्यार करती है। उसके घर उसका आना-जाना है। वह रॉकी को हमेशा हैंडसम ही बुलाती है। दोनों के बीच बहुत ही प्यारा रिश्ता है। कुछ घटनाक्रम के चलते लडक़ी को कुछ हो जाता है। रॉकी अपना आपा खो बैठता है। फिर क्या होता है। कहानी इस संबंध में है। फिल्म देखने के बाद बच्ची के पिता के आंखों में आसूं आ गए। मेरा मानना है कि ऐसी फिल्म बनाई नहीं जाती है। बन जाती है।

-फिल्म में हैंडसम होने का अर्थ शारीरिक सुंदरता है या स्वभाव ?

0 इस फिल्म में शारीरिक ही है। दरअसल, रॉकी लोगों से घुलता मिलता नहीं है। अपने में ही रहता है। लोग उसे इसी नाम से पुकारते हैं। असल जिंदगी में मैं चाहता हूं कि लोग मुझे आंतरिक सुंदरता को लेकर हैंडसम संबोधित करें। बाहरी सुंदरता दिखावटी होती है। खूबसूरती भीतरी होती है। मैं चार साल से एसिड हादसे के शिकार लोगों के साथ काम कर रहा हूं। मैंने एक लडक़ी साथ फोटो भी शूट किया था। लडक़ी का चेहरा पूरा जला हुआ है। हाल ही में उस लडक़ी की शादी तय हुई है। तमाम मुश्किलों के बावजूद उसमें जिंदगी जीने की ललक है। मेरे लिए ऐसे लोग हैंडसम होते हैं। लिहाजा जब मेरी फिल्मों के प्रमोशन को लेकर बातचीत चल रही थी, मैंने कहा कि प्रमोशन ऐसे होना चाहिए। जो सच हो उसे दिखाना चाहिए।

-आप आउटसाइडर रहे हैं। अब तो आप आगे निकल गए हैं। आप ने आयुष्मान खुराना जैसे नए कलाकारों को मौका दिया ?

0 मैं हमेशा समर्थन करूंगा। सभी नए कलाकारों का। बहुत सारे नए कलाकार मेरे पास आते हैं। कहते हैं कि कोई उनका साथ नहीं देता है। मैं कोशिश करूंगा कि जो काबिल हो वह मेरी फिल्म करे। इंडस्ट्री अभी भी फिल्मी बैकग्राउंड से ताल्‍लुक रखने वालों को ज्यादा मौके देती है। इसमें कोई खराबी नहीं है, लेकिन सभी को मौका मिलना चाहिए। बाहरी लोगों को भी अवसर मुहैया होने चाहिए।

-जब से आप फिल्मों में आए। फिल्मों ने आपको क्या सिखाया। अच्छी बात और बुरी बात दोनों के बारे में बताएं।

0 फिल्म ने मुझे यह भी सिखाया है कि दूसरों के साथ अच्छा रहो। हमें हर किसी का सम्मान करना चाहिए। मैं तहेदिल से सभी का आदर करता हूं। फिल्म में सबसे खराब चीज है असुरक्षा की भावना। सच बता रहा हूं मैं। असुरक्षा की फीलिंग से उबरना मैंने 95 प्रतिशत सीख लिया है। ज्यादातर लोग उससे निकल नहीं पाते। हर एक्‍टर को दूसरे एक्टर की चिंता सताती है। मसलन मैं उसकी तरह क्यों नहीं कर पा रहा हूं। मेरा लुक खराब तो नहीं हो रहा है। मैं मोटा हो जाऊंगा। मेरा मानना है कि एक्टर को इनसे उबरना चाहिए। आम इंसान की तरह सोचना चाहिए। फिर यह सब मायने नहीं रखेगा। इंडस्ट्री तो ऐसी ही है। आज है। कल नहीं है। लेकिन असुरक्षा हम सभी को बांध कर रखती है। यह बहुत ही खराब चीज है। सारे एक्टर चाहे वे माने या ना माने , सब असुरक्षित महसूस करते हैं। हर कोई किसी ना किसी चीज को लेकर डरा हुआ है।

-आप छोटे से बड़े शहर में जाते रहे हैं। आप विदेश जाते हैं। वहां के और यहां के दर्शकों में क्या अंतर देखते हैं।
 
0 विदेशी दर्शक आपके काम को आसानी से अपना लेते है। उन्‍हें हमारे अतीत में रुचि नहीं होती। वह सिर्फ फिल्म में हमारा काम देखते हैं। जैसे वाटर जब रिलीज हुई। स्टीवन स्पीलबर्ग ने मेरे अभिनय की सराहना की। वहीं भारत में मेरी आलोचना हुई। विदेश में मेरे बारे में पड़ताल नहीं की गई। यहां पर सबको पता है कि मैं मॉडल हूं। लिहाजा वही पुरानी सोच है कि वह क्या करेगा। सिर्फ अपना शरीर दिखाएगा। वहां पर ऐसा नहीं था। मैं वहां पर एक्टर था। कुछ एक्टरों ने वहां पर फिल्म देखी। मुझसे पूछा कि यह सीन कैसे दिया। सीन के लिए क्या सोच थी।

-दोस्त और परिवार की अहमियत क्या है?

0 परिवार मेरे लिए प्रमुख है। मेरे खास दोस्त हैं। वह भी मेरे लिए मायने रखते हैं। मेरे लिए परिवार से बढ?र कुछ नहीं है। मैं अपने माता-पिता के लिए सबकुछ करता हूं। मैं जो भी कमाता हूं ,उनके हाथ में रख देता हूं। वह दोनों मेरे जीवन के सबसे खास इंसान हैं। उनसे पहले मेरे लिए कुछ नहीं आता है। मेरे परिवार में किसी को पैसे की जरूरत पड़ती है, मां मुझसे पूछती है कि जॅान मैं पैसे दे दूं। मैंने उनसे कहता हूं आप दे दें। मुझसे पूछने की क्या जरूरत है। मै जो हूं परिवार की वजह से हूं। वह मेरे लिए सबसे पहले हैं।

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Friday, August 23, 2013

फिल्‍म समीक्षा : मद्रास कैफे

-अजय ब्रह्मात्‍मज
         हमारी आदत ही नहीं है। हम सच को करीब से नहीं देखते। कतराते हैं या नजरें फेर लेते हैं। यही वजह है कि हम फिल्मों में भी सम्मोहक झूठ रचते हैं। और फिर उसी झूठ को एंज्वॉय करते हैं। सालों से हिंदी सिनेमा में हम नाच-गाने और प्रेम से संतुष्ट और आनंदित होते रहे हैं। सच और समाज को करीब से दिखाने की एक धारा फिल्मों में रही है, लेकिन मेनस्ट्रीम सिनेमा और उसके दर्शक ऐसी फिल्मों से परहेज ही करते रहे हैं। इस परिदृश्य में शूजीत सरकार की 'मद्रास कैफे' एक नया प्रस्थान है। हिंदी सिनेमा के आम दर्शकों ने ऐसी फिल्म पहले नहीं देखी है।

        पड़ोसी देश श्रीलंका के गृह युद्ध में भारत एक कारक बन गया था। मध्यस्थता और शांति के प्रयासों के विफल होने के बावजूद इस गृह युद्ध में भारत शामिल रहा। श्रीलंका के सेना की औपचारिक सलामी लेते समय हुए आक्रमण से लेकर जानलेवा मानव बम विस्फोट तक भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसके एक कोण रहे। 'मद्रास कैफे' उन्हीं घटनाओं को पर्दे पर रचती है। हम थोड़ा पीछे लौटते हैं और पाते हैं कि फैसले बदल गए होते तो हालात और नतीजे भी बदल गए होते। शूजीत सरकार ने 'मद्रास कैफे' में सभी व्यक्तियों और संगठनों के नाम बदल दिए हैं। विवादों और मुश्किलों से बचने के लिए उन्होंने ऐसा किया होगा। श्रीलंका-भारत संबंध, श्रीलंका के गृहयुद्ध, वी प्रभाकरन और राजीव गांधी के फैसलों से विरोध या सहमति हो सकती है। स्वतंत्र होने की कोशिश में 'मद्रास कैफे' वैचारिक और राजनीतिक पक्ष नहीं लेती।
'मद्रास कैफे' पॉलिटिकल थ्रिलर है। हिंदी फिल्में पड़ोसी देशों की राजनीति और उसके प्रभाव को टच नहीं करतीं। ले-देकर एक पाकिस्तान को आतंकवाद से जोड़कर अंधराष्ट्रवाद से प्रेरित फिल्में बनती रहती हैं। उनमें भी वास्तविक घटनाएं नहीं होतीं। शूजीत सरकार और जॉन अब्राहम ने इस लिहाज से साहसिक कदम उठाया है। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में श्रीलंका के गृहयुद्ध को रखने के साथ राजीव गांधी के हत्या तक के प्रसंग चुने हैं। उन्होंने अपनी फिल्म के लिए कहानी के अनुरूप ही रंग और टेक्सचर का चुनाव किया है। इस फिल्म के छायांकन में कमलजीत नेगी ने भी कहानी का जरूरत का खयाल रखा है। हम शुरू से अंत तक गति, ऊर्जा और गृहयुद्ध की विभीषिका का सलेटी रंग देखते हैं।
      फिल्म के लेखकों की मेहनत ही दस्तावेजी विषय को एक रोचक फिल्म में बदलती है। यह फिल्म अगर कुछ दृश्यों में डॉक्यूमेंट्री का एहसास देती है तो यह विषय की शिल्पगत चुनौतियों के कारण हुआ है। विदेशों में जरूर ऐसी फिल्में बनती रही हैं और मुमकिन है कि 'मद्रास कैफे' की दृश्य रचना उनसे प्रभावित भी हो, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह पहली ईमानदार कोशिश है। हां, इस फिल्म के लिए खुद को तैयार करना पड़ेगा और अपेक्षित मानसिक तैयारी के साथ थिएटर में घुसना होगा। हिंदी फिल्मों को कथित एंटरटेनमेंट यहां नहीं है, फिर भी 'मद्रास कैफे' एंटरटेन करती है। निकट अतीत के कालखंड से परिचित कराती है।
    शूजीत सरकार ने इस फिल्म में सीमित रेंज के अभिनेता की क्षमताओं का सुंदर इस्तेमाल किया है। जॉन अब्राहम ने किरदार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश की है। निर्देशक की अपारंपरिक कास्टिंग से फिल्म की विश्वसनीयता बढ़ गई है। राशि खन्ना, दिबांग, सिद्धार्थ बसु, प्रकाश बेलवाड़ी, पियूष पांडे और अजय रत्नम आदि ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। नरगिस फाखरी फिल्म में अंग्रेजी जर्नलिस्ट की भूमिका में हैं।
    जॉन अब्राहम और नरगिस फाखरी की बातचीत में अंग्रेजी-हिंदी का फर्क क्यों रखा गया है? दोनों ही उन दृश्यों में किसी एक भाषा हिंदी या अंग्रेजी का इस्तेमाल कर सकते थे। कमियां कुछ और भी हैं, लेकिन अपने ढंग की पहली कोशिश 'मद्रास कैफे' की तारीफ करनी होगी कि यह हिंदी फिल्मों की जमीन का विस्तार करती है।
अवधि-130 मिनट
**** चार स्‍टार

Friday, April 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : विक्‍की डोनर

दर्शनीय है विक्की डोनर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

अपनी शोहरत और दौलत का इस्तेमाल कर अनेक स्टार खुद की प्रोडक्शन कंपनी की फिल्मों में स्वयं को ही अलग-अलग अंदाज में पेश कर रहे हैं। इस दौर और माहौल में जॉन अब्राहम की प्रोडक्शन कंपनी जेए एंटरटेनमेंट की पहली फिल्म विक्की डोनर खूबसूरत साहस और प्रयास है।
निर्देशक शूजित सरकार ने रोचक और रसीले तरीके से पंजाबी मुंडा और बंगाली लड़की के प्रेमकहानी के बैकड्रॉप में स्वमे डोनेशन (वीर्यदान) का परिप्रेक्ष्य रखा है। फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने नए विषय और विचार की फिल्म को सरस रखा है। फिल्म के मुख्य कलाकारों अन्नू कपूर, आयुष्मान खुराना, डोली आहलूवालिया, कमलेश गिल, जयंत दास ने लेखक-निर्देशक की संकल्पना को पर्दे पर बखूबी उतारा है।
दिल्ली के परिवेश में ताजपत नगर का मध्यवर्गीय पंजाबी परिवार के बेरोजगार विक्की और चित्तरंजन पार्क में रह रही बैंकस्टाफ आसिमा के बीच प्यार दिखाने के लिए लेखक-निर्देशक ने हीरो-हीरोइन से न तो गाने गवाए हैं और न जबरदस्ती के रोमांटिक सीन गढ़े हैं। विक्की और आवसिमा का प्रेम महानगरीय भागदौड़ में बैंक, बस स्टॉप, सड़क और सूने मैदान के सामने गाड़ी से टिक कर बतियाते हुए होती है।
बधाई जूही और शूजित। चढ्डा की भूमिका में आए अन्नू कपूर इस फिल्म की जान हैं। उन्होंने इस किरदार को हमेशा की तरह गहराई से समझा है। अपनी भाव-भंगिमाओं में बगैर कोई ऊजजुलूल हरकत किए वे अपनी सादगी से हंसाते हैं। लाउड कामेडी के अभिनेताओं और उनका दुरुपयोग कर रहे निर्देशकों को अन्नू कपूर की विक्की डोनर अवश्य देखनी चाहिए। अन्नू कपूर इस फिल्म के नायक हैं।
अन्नू कपूर और आयुष्मान खुरान की जुगलबंदी से विक्की डोनर शुरू से आखिर तक बांधे रखती है। उस्ताद अन्नू कपूर के शागिर्द के तौर पर आए आयुष्मान ने बराबर कोशिश की है। वे सफल रहे हैं। लेखक-निर्देशक ने फिल्म की साइड स्टोरी के रूप में विक्की की दादी और मां के बीच के अनोखे रिश्ते और आसिमा के पिता के माडर्न दृष्टिकोण को बहुत अच्छे तरीके से चित्रित किया है। बिना मर्द के परिवारों को भी औरतें कितनी अच्छी तरह संभाल सकती हैं।
विक्की की दादी और मां की शराबनोशी और उस दरम्यान चल रही बातों पर हंसी आती है, लेकिन उनके संघर्ष और अकेलेपन का दर्द भी महसूस होता है। विक्की से नाराज होकर जब आसिमा कोलकाता चली जाती है तो विक्की का पक्ष लेते हुए अपनी बेटी के द्वंद्व और डर को उसके पिता सहज ढंग से समझा देते हैं।
विक्की डोनर दर्शनीय फिल्म है। यह वीर्यदान संबंधी भ्रांतियों और पूर्वाग्रह को अप्रत्यक्ष तरीके से खत्म करती है। साथ ही देश की दो संस्कृतियों के दुराग्रहों को दूर कर प्रेम और समन्वय स्थापित करती है।
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार